परमात्मा किसी का भाग्य निर्धारित नहीं करता है।
प्रारब्ध तो अपने अनन्त जन्मों के कर्मों के सञ्चित में से इस जन्म में भोगे जा सकने वाले कर्मों का उदय मात्र है।
सत्सङ्ग और सत्कर्म से बड़े से बड़ा सञ्कट ऐसे निकल जाता है कि, कई बार तो पता भी नहीं चलता।
लेकिन कुसङ्गति में पड़े और अधर्मी को तो राज्य भी मिल जाए तो भी वह सुखी नहीं हो पाता है।
प्रातःकाल उठते से ही हरि स्मरण कर लो तो दिन भर हरिनाम संकीर्तन याद आता रहता है
रात को सोते समय हरि स्मरण कर लो तो रात भर स्वप्न में भी भगवान के भजन ही चलते रहते हैं।
इसलिए सुबह से रात तक हरि बोल।
क्योंकि जैसे अड़ानी-अम्बानी धनार्जन कर रहे हैं तो, उनके बल पर राष्ट्रीय विकास हो रहा है। नौकरी करके या निवेश करके या अन्य प्रकार से समाज के लाखों लोग उनके कार्यों में सहयोग देकर स्वयम् भी सम्पन्न हो रहे हैं।
उन लोगों के बल बुते पर उनके घर काम करने वाले, उनके बच्चों को पढ़ाने वाले, उनका इलाज करने, हॉटेल-रेस्टोरेंट, गार्डन वाले, परिवहन वाले आदि अनेकानेक लोग स्वयम् की ग्रहस्थी चला पा रहे हैं।
और धन-सम्पदा साथ नहीं जाएगी का उपदेश देने वाले बाबा लोग उनसे और उनके सहयोगियों से करोड़ों रुपए की धन-सम्पदा लेकर खुद भी ऐश से जी रहे हैं और चेलों को भी एश करवा रहे हैं।😃
जो दूसरों के शुभाशुभ कर्म और उसके परिणाम स्वरूप उनके ऐश-आराम के बजाय उनके सुख-सन्तोष को देख कर शिक्षा ले वह स्वयम् में सुधार करके उत्तरोत्तर विकास कर जाता है,
इसके विपरित - कितना भी समझाने पर अपनी आदत के अनुसार ही कार्य करने वाले दासों, नौकरों को देखिए वे उत्तरोत्तर पतनोन्मुख ही होते जाते हैं।
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