मिश्र, पश्चिम टर्की (जिसे यूरोपीय लोग ग्रीक सभ्यता कहते हैं),इराक के बेबीलोन, और तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, कज़ाकस्तान, किर्गिस्तान, और तिब्बत के शिनजियांग प्रांत में प्रचलित 30° वाली मेष, वृषभ आदि राशियाँ तथा 19 वर्षीय चक्र वाले सायन सौर संक्रान्ति आधारित चान्द्र वर्ष और रविवार- सोमवार आदि वार प्रचलित थे।
तिब्बत के शिनजियांग प्रांत के निवासी शक और कुषाणों को भारतीय शक कहते थे। ये लोग अफगानिस्तान से लगे ईरान के पूर्वी भाग में भी बस गए थे इसलिए उस क्षेत्र के निवासी आचार्य वराहमिहिर को भी शक माना जाता है।
आज के 2082 वर्ष पहले सम्राट विक्रमादित्य के राज ज्योतिषी आचार्य वराहमिहिर ने भारत में 30° वाली मेष, वृषभ आदि निरयन राशियाँ तथा 19 वर्षीय चक्र वाले निरयन सौर संक्रान्ति आधारित चान्द्र वर्ष और रविवार- सोमवार आदि वार प्रचलित किये थे।
लेकिन हरियाणा के कुरुक्षेत्र के आस-पास के गोड़ प्रदेश और मालवा प्रान्त के निवासी नाबोवाहन के पुत्र गन्धर्वसेन महेन्द्रादित्य सोनकच्छ के पास गन्धर्वपुरी के राजा हुए। उनकी पत्नी सोम्यदर्शना वीरमती के पुत्र उज्जैन के राजा भृतुहरि के अनुज विक्रमसेन ने सम्राट विक्रमादित्य के रूप में राज्याभिषेक के अवसर पर पञ्जाब-हरियाणा में प्रचलित निरयन सौर मेष-वृषभ मास वाला निरयन सौर विक्रम संवत प्रचलित किया।
विक्रम संवत 135 के बाद मथुरा से कुषाण वंशीय राजाओं ने उत्तर भारत में तथा महाराष्ट्र के नासिक के पास पैठण से सातवाहन वंशीय राजाओं ने दक्षिण भारत और मध्य भारत में 19 वर्षीय , 122 वर्षीय और 141 वर्षीय चक्र वाले निरयन सौर संक्रमण आधारित चान्द्र वर्ष शालिवाहन शक संवत चलाया।
इसके पहले तीस अंश वाली मेष-वृषभ राशियाँ और रविवार-सोमवार आदि वार भारत में प्रचलित नहीं थे।
तिथियों के देवता -
1 प्रतिपदा के अग्नि देव,
2 द्वितीय के ब्रह्मा जी,
3 तृतीया की गौरी,
4 चतुर्थी के गणेश,
5 पञ्चमी के नागदेव,
6 षष्टी के कुमार कार्तिकेय,
7 सप्तमी के सूर्य,
8 अष्टमी के शिव,
9 नवमी की दुर्गा देवी,
10 दशमी के यमराज
11 एकादशी के विश्वेदेवाः,
12 द्वादशी के विष्णु भगवान,
13 तृयोदशी के कामदेव,
14 चतुर्दशी के शंकर ,
15 पूर्णिमा के चन्द्रदेव और
30 अमावस्या के देवता पितरः हैं । अतः तिथियों को उनके देवता की ही पूजा करते थे।
लेकिन
सोशल मीडिया पर और उसके प्रभाव से व्यवहार में भी एक विचित्रता देखने में आती है कि,
दैनिक और व्यावहारिक जीवन में वारों का महत्व अत्यधिक बढ़ रहा है।
आजकल रविवार को सूर्यदेव का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे सब देवता गौण हो जाते हैं।
सोमवार को शंकर जी का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे देवता गौण हो जाते हैं ।
मङ्गलवार को हनुमान जी का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे सब देवता गौण हो जाते हैं ।
बुधवार के देवता भगवान विष्णु हैं; लेकिन बुधवार को विनायक गजानन का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे सब देवता गौण हो जाते हैं।
दुसरे देवता गौण हो जाते हैं ।
गुरुवार के देवता ब्रह्मा जी हैं, लेकिन गुरुवार को भगवान विष्णु या नारायण श्रीहरि का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे सब देवता गौण हो जाते हैं ।
शुक्रवार को लक्ष्मी जी का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे सब देवता गौण हो जाते हैं ।और
शनिवार को शनि देव के साथ हनुमान जी और हनुमान जी के साथ भगवान श्री रामचन्द्र जी का भी का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे सब देवता गौण हो जाते हैं ।
सोमवार को शिव मन्दिर में भीड़, मङ्गलवार को महाराष्ट्र कर्नाटक तेलङ्गाना, आन्ध्र प्रदेश तमिलनाडु और केरल में विनायक गजानन मन्दिर में और मालवा में हनुमान मन्दिर में भीड़,
बुधवार को मालवा में विनायक गजानन मन्दिर में भीड़।
गुरुवार को श्रीकृष्ण मन्दिर या श्रीराम मन्दिर में भीड़,
शुक्रवार को लक्ष्मी मन्दिर में भीड़, और शनिवार को शनि मन्दिर और हनुमान मन्दिर में भीड़ हो जाती है।
लेकिन अन्य दिनों में ये मन्दिर सुनसान रहते हैं।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें