रविवार, 21 जनवरी 2024

धर्म के अधीन राज्य हो तो धर्मराज्य, पन्थ के अधीन राज्य पन्थराज्य और राज्य के अधीन धर्म अधर्म ही होता है।

जिसने भी महर्षि वशिष्ठ और महर्षि विश्वामित्र के अधीन रहकर राज चलाते दशरथ जी और श्री रामचन्द्र जी का इतिहास पढ़ा समझा है। बौद्धकाल का इतिहास पढ़ा समझा है, जिसने ईरान का इतिहास पढ़ा समझा है। जिसने इङ्लैण्ड (इंग्लैंड) का इतिहास पढ़ा है। जिसने भी रोमन कैथलिक चर्च के विरुद्ध प्रोटेस्टेण्ट चर्च और एङ्लिकन चर्च (एंग्लिकन चर्च) बनने का इतिहास पढ़ा है और उसके बाद ईसाई परिवार और सामाजिक व्यवस्था में हुए परिवर्तन का इतिहास समझा है, जिनने देखा है कि, रोमन कैथोलिक चर्च दूसरे विवाह की अनुमति नहीं देता था इसलिए इसाइयों में तलाक देकर दुसरा - तिसरा विवाह कर जीवन में चार-पाँच विवाह नहीं होते थे।
वे सब जानते हैं कि, राज्य पर धर्म का नियन्त्रण और धर्म पर राज्य (और राजनीति) के नियन्त्रण के अन्तर को जान समझ सकते हैं।
और सनातन धर्म का सनातन रहने का कारण भी जान सकते हैं।
इसी बात को ध्यान में रखते हुए आदि शंकराचार्य जी ने भारत की चारों दिशाओं में चार शंकराचार्यों की पदस्थापना की थी। उनके पास तो केरल के राजा की सेना थी। उनने स्वयम् की नागा साधुओं की सेना भी तैयार कर ली थी। नाथ सम्प्रदाय बनने के बाद नाग सेना पर सिद्ध सम्प्रदाय का नियन्त्रण हो गया। फिर भी शंकराचार्यों का औपचारिक सम्मान शेष रहा।
पहले आर्य समाज के प्रचारकों और आर्यसमाज द्वारा संचालित स्वातन्त्र्य आन्दोलन सहित धार्मिक आन्दोलनों, फिर करपात्री जी के नेतृत्व में रामराज्य परिषद के गौरक्षा  आन्दोलनों के कारण जनता को भ्रम हो गया कि, शंकराचार्यों ने भी ऐसे ही प्रवचन देकर प्रचार करना और आन्दोलन चलाना चाहिए। थोड़ा कार्य श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने किया और सफल भी रहे।
रा.स्व.से.संघ ने जनता की इस इच्छा को समझ कर विश्व हिन्दू परिषद के माध्यम से 1984 ईस्वी से गङ्गा यात्रा और रामजन्म भूमि आन्दोलन के माध्यम से  ने जनता की यह इच्छा पूरी की तो जनता उसकी भक्त हो गई।
लेकिन यह कार्य धर्मराज का नहीं है। उसके लिए स्वामी श्रद्धान्द सरस्वती जी और  करपात्री जी जैसे संन्यासी चाहिए।  
जिस दिन राजनीति और राज्य का नियन्त्रण धर्म पर हो जाएगा उसदिन वैदिक सनातन समाप्त हो कर केवल हिन्दूत्व रह जाएगा। हिन्दूत्व का अर्थ है भारतीय या भारतवंशी। वह व्यक्ति जिसके अजमेर -गोवा जैसे तीर्थ स्थान भारत भूमि में हो, जो भारत को अपना देश मानता हो, भारतीय संस्कृति को अपनी संस्कृति मानता हो। वह चाहे बाइबल को धर्मशास्त्र मानता हो; चर्च में बाइबल के भजन गाकर प्रार्थना करता हो, चाहे कुरान को अपना धर्मग्रन्थ मानता हो और हदीस के नियमों का पालन करता हो और मस्जिद में नमाज अदा करता हो वह हिन्दू है। विशेष कर पुरुष खाकी पेण्ट, सफेद शर्ट, काली टोपी और महिलाएँ सलवार कुर्ता पहन कर रा.स्व.से. संघ की शाखा में जाता हो तो वह पक्का हिन्दू कहलायेगा। विशेषता यह है कि, उक्त गणवेश में कुछ भी भारतीय नहीं है।
तब शंकराचार्यों के पद समाप्त हो कर आचार्य धर्मेन्द्र और उमा भारती और प्रज्ञा ठाकुर जैसे साधु होंगे। और 

दासो के (हिन्दुओं के) दस (अ)धर्माचार्य  घोषित किए जाएँगे ---
 नागपुर में (महाराष्ट्रपति) लम्पटराय और राजधानी में परधान मन्त्री राष्ट्रप्रमुख पद पर सत्तासीन रहेंगे। 
इनके अधीन 
1 गुरुग्राम में चम्मचराय (राष्ट्र प्रमुख का प्रधान चम्मच) , 
2 नोएडा में दलपतराय (बहुमत दल का अध्यक्ष), 
3 मुम्बई में घोटाले कर (चम्पत होने में प्रवीण) चम्पतराय, 
4 कोलकाता में बलवन्तराय (गुण्डों का सरदार), 
5 अहमदाबाद में सम्पतराय (प्रचूर सम्पदा का स्वामी), 
6 चेन्नई में धनपतराय (सबसे बड़ा धनवान), 
7 बेंगलुरु, हैदराबाद, गुरुग्राम, नोएडा में मीडिया राय।
ये सातों नौकर राष्ट्र प्रमुख के लिए उत्तरदाई होंगे।
वैदिक सनातन धर्मियों से कर वसूला जाएगा।

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