शनिवार, 15 नवंबर 2025

मानव जीवन के कर्तव्य


परमात्मा किसी का भाग्य निर्धारित नहीं करता है।
प्रारब्ध तो अपने अनन्त जन्मों के कर्मों के सञ्चित में से इस जन्म में भोगे जा सकने वाले कर्मों का उदय मात्र है।
सत्सङ्ग और सत्कर्म से बड़े से बड़ा सञ्कट ऐसे निकल जाता है कि, कई बार तो पता भी नहीं चलता।
लेकिन कुसङ्गति में पड़े और अधर्मी को तो राज्य भी मिल जाए तो भी वह सुखी नहीं हो पाता है।
प्रातःकाल उठते से ही हरि स्मरण कर लो तो दिन भर हरिनाम संकीर्तन याद आता रहता है ‌
रात को सोते समय हरि स्मरण कर लो तो रात भर स्वप्न में भी भगवान के भजन ही चलते रहते हैं।
इसलिए सुबह से रात तक हरि बोल।

अधिकतम् अर्जन (कमाना) और सत्कर्मों में व्यय (खर्च) करना हमारा सामाजिक और राष्ट्रीय कर्तव्य है।
क्योंकि जैसे अड़ानी-अम्बानी धनार्जन कर रहे हैं तो, उनके बल पर राष्ट्रीय विकास हो रहा है। नौकरी करके या निवेश करके या अन्य प्रकार से समाज के लाखों लोग उनके कार्यों में सहयोग देकर स्वयम् भी सम्पन्न हो रहे हैं।
उन लोगों के बल बुते पर उनके घर काम करने वाले, उनके बच्चों को पढ़ाने वाले, उनका इलाज करने, हॉटेल-रेस्टोरेंट, गार्डन वाले, परिवहन वाले आदि अनेकानेक लोग स्वयम् की ग्रहस्थी चला पा रहे हैं।
और धन-सम्पदा साथ नहीं जाएगी का उपदेश देने वाले बाबा लोग उनसे और उनके सहयोगियों से करोड़ों रुपए की धन-सम्पदा लेकर खुद भी ऐश से जी रहे हैं और चेलों को भी एश करवा रहे हैं।😃

जो दूसरों के शुभाशुभ कर्म और उसके परिणाम स्वरूप उनके ऐश-आराम के बजाय उनके सुख-सन्तोष को देख कर शिक्षा ले वह स्वयम् में सुधार करके उत्तरोत्तर विकास कर जाता है,
इसके विपरित - कितना भी समझाने पर अपनी आदत के अनुसार ही कार्य करने वाले दासों, नौकरों को देखिए वे उत्तरोत्तर पतनोन्मुख ही होते जाते हैं।


शुक्रवार, 14 नवंबर 2025

अष्टमी, एकादशी, पूर्णिमा और अमावस्या आदि पर व्रत क्यों रखते हैं?

वास्तविकता यह है कि, दोनों अष्टमी तिथि (अर्ध चन्द्रमा) के समय भूमि के केन्द्र पर सूर्य और चन्द्रमा 90° का कोण बनाते हैं।
शुक्ल पक्ष की दशमी समाप्ति और एकादशी प्रारम्भ के समय सूर्य और चन्द्रमा 120° का कोण बनाते हैं। यही स्थिति कृष्ण पक्ष में पञ्चमी तिथि समाप्ति पर बनती है) लेकिन कृष्ण पक्ष की एकादशी को 60° या 300° का कोण बनता है।
इसलिए नारद पुराण में शुक्ल पक्ष की एकादशी को अधिक महत्व दिया है। और एकभक्त- एकासना (एक बार ही बिना आसन से उठे भोजन करना।) करने को लिखा है।
 इसी प्रकार पूर्णिमा तिथि समाप्ति पर सूर्य और चन्द्रमा 180° का सरल कोण बनाते हैं।और
अमावस्या तिथि समाप्ति पर 000° का कोण बनाते हैं।
इसलिए अर्ध चन्द्र के समय , शुक्ल पक्ष की एकादशी प्रारम्भ के समय और कृष्ण पक्ष की पञ्चमी तिथि समाप्ति के समय तथा पूर्णिमा समाप्ति के समय सूर्य और चन्द्रमा के बल अलग-अलग दिशाओं में खींचते हैं। और अमावस्या समाप्ति के समय सूर्य और चन्द्रमा दोनों का बल एक ही दिशा में खींचता है।
भौतिकी के बल समानान्तर चतुर्भुज के नियम आदि के अनुसार इस खींच-तान का प्रभाव भूमि के सागरों पर पड़ता है जिससे ज्वार-भाटा उत्पन्न होते हैं।
परिणाम स्वरूप भूमि की घूर्णन गति तथा परिभ्रमण पर भी पड़ता है।
इन सब का प्रभाव मानव मन पर भी पड़ता है, जिसे लुनेटिक लोगों पर स्पष्ट देखा जा सकता है।
इस कारण पाचनशक्ति कमजोर हो जाती है, चित्त भ्रम होते है, इसलिए आपराधिक मानसिकता उत्पन्न होती है।
इनसे बचाव हेतु, लङ्घन (भूखे रहना) और आराधना-उपासना में दिन व्यतीत करना, जागरण (अलर्ट रहना) आदि के निर्देश धर्मशास्त्रों में दिये गए हैं।

क्या जनन अशोच, मरण अशोच में एकादशी व्रत का पारण हो सकता है?

व्रत पालन मतलब नियम पालन।
जब जिसके माता-पिता का देहान्त होता है वह पुत्र तेरह दिनों तक विष्णु पूजा करता है जिसे घर के बाहर रखे पापा विष्णु की पूजा दस दिन करना कहते हैं, उसे जल चढ़ाना मतलब स्नान करवाना, स्वयम् के द्वारा पकाये भोजन का नैवेद्य अर्पित करना, धूप देना मतलब अग्निहोत्र करना, गरुड़ पुराण सुनना मतलब शास्त्र श्रवण करना आदि सभी कर्म करना होता है तो, नित्य कर्म (वैदिक धर्म-कर्म मतलब पञ्च महायज्ञ) का निषेध कैसे हो सकता है? 
हाँ, अवैदिक कर्म - तन्त्रोक्त कर्म, यथा - मूर्ति पूजन अवश्य निषेध है।

मृतक के निमित्त एकादशी व्रत का संकल्प लिया जाता है अन्य किसी व्रत का संकल्प नहीं दिलाया जाता, वही एकादशी व्रत कैसे छोड़ा जा सकता है?

एकादशी व्रत का सामान्य नियम यह है कि, एकादशी के पूर्व दिन सूर्यास्त पश्चात भोजन त्याग कर पारण समय में पारण करने पर ही एकादशी व्रत पूर्ण होता है। अन्यथा व्रत भङ्ग माना जाता है। यह नियम सभी व्रतों में सामान्य (कामन) है।
तो, 
सूतक में भी निष्काम व्रत पालन अवश्य ही करना चाहिए यह तो समझ आता है लेकिन सूतक में पारण नहीं होता यह उल्टा ज्ञान है।

कभी-कभी एकादशी व्रत का पारण हरिवासर समाप्त होने के बाद भी सीधे अपराह्न काल में ही क्यों बतलाया जाता है?

एक सामान्य जिज्ञासा होती है कि,
*कभी-कभी द्वादशी तिथि का एक चौथाई भाग अर्थात हरिवासर समाप्त होने के भी बाद भी पारण क्यों नहीं कर सकते?* 
उसका कारण यह है कि,

 *पारण (ब्रेक फास्ट) या तो प्रातः काल में (नाश्ते के समय) होता है या फिर भोजन के समय अपराह्न काल में होता है।* 
क्योंकि भोजन का समय अपराह्न काल को ही माना गया है। 
*क्योंकि वैदिक काल में लोग पूरे अहोरात्र में प्रायः अपराह्न काल में एक बार ही भोजन करते थे।*
मतलब 
*आज की भाषा में समझें तो प्रात काल में ब्रेक फास्ट (नाश्ता) और अपराह्न काल में लञ्च (भोजन) करते थे। डीनर (रात्रि भोज) निषिद्ध है। इसलिए सूर्यास्त के बाद खाने का प्रश्न ही नहीं।* 

सूर्योदय के पहले ब्रह्म मुहूर्त में सन्ध्या होती है, सावित्री (गायत्री) मन्त्र जप पूर्ण कर उदयिमान सूर्य को अर्घ्य देकर अतिथि यज्ञ और दान करके व्रत का पारण होता है।

मध्याह्न पूर्व भी सन्ध्या करके गायत्री मन्त्र जप करके ठीक मध्याह्न में सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
सायाह्न में भी सन्ध्या करके, गायत्री मन्त्र जप पूर्ण कर के सूर्यास्त समय अस्त हो रहे सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद वैदिक कर्म नहीं किए जाते हैं।
इस कारण गोधुलि लग्न में पाणी ग्रहण संस्कार भी उचित नहीं है। क्योंकि इस समय यदि पाणी ग्रहण संस्कार किया जाएगा तो सायाह्न सन्ध्या छूट जाएगी।

वास्तव में महाभारत युद्ध के बाद पौराणिक काल में सभी विद्वानों और धर्मी राजाओं की मृत्यु हो जाने के कारण गुरुकुल समाप्त होने लगे थे। इसलिए ज्योतिष में वेध लेना बन्द हो गया। सिद्धान्त ज्योतिष गणिताध्याय और गोलाध्याय (खगोल) के जानकार समाप्त होने लगे। इसलिए तिथियों और करण तथा असमान विस्तार वाले सत्ताइस नक्षत्रों का ठीक-ठीक प्रारम्भ और समाप्ति समय ज्ञात नहीं हो पाता था। इसलिए लगभग एक चौथाई द्वादशी तिथि (लगभग 06 घण्टे) की त्रुटि सम्भावित मान कर इसे हरिवासर मान कर इस अवधि में व्रत का पारण निषेध किया गया था। लेकिन अब पुनः एस्ट्रोनॉमी का अच्छा विकास हो गया है। ग्रह गणित और तिथि, करण और नक्षत्रों के प्रारम्भ और समाप्ति का समय ठीक-ठीक गणना होने लगी है इसलिए दशमी भेद और हरिवासर में पारण नहीं करना के नियम पालन अनावश्यक हो गया है।

उदाहरण देखिए ---

दिनांक 16 नवम्बर 2025 रविवार को इन्दौर में 

*प्रातः काल सूर्योदय 06:41 से 08:53 बजे तक।* फिर 

सङ्गव काल 08:53 से 11:05 तक । फिर 

मध्याह्न काल 11:05 से दोपहर 01: 17 बजे तक । जिसमें मध्याह्न सन्ध्या होती है। और इसके बाद भोजन का समय

*अपराह्न काल दोपहर 01:17 बजे से दोपहर 03:29 बजे तक रहेगा।*

तदुपरान्त  
सायाह्न काल दोपहर 03:29 से 05:41 सूर्यास्त तक। रहेगा। जिसमें पुनः सन्ध्या होती है।

गुरुवार, 13 नवंबर 2025

सायन गणना, नक्षत्रिय पद्धति, निरयन और सावन गणना सभी दर्शाने वाली पञ्चाङ्ग/ केलेण्डर ही उचित हैं।

श्री रामचन्द्र जी के जन्म के समय के सम शितोष्ण ऋतु का वर्णन, ऋषि पञ्चमी पर अपामार्ग के पानी से स्नान करना, बालध ककड़ी खाना, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन यमुना नदी में बाढ़ आने का वर्णन, नवरात्र  और शरद पूर्णिमा शब्दों में ही ऋतु का उल्लेख होना, पञ्च दिवसीय दीपावली उत्सव में पूजन सामग्री में ज्वार के भुट्टे और गन्ने, सिंघाड़ा आदि का प्रयोग (नव धान्येष्टि), मकर संक्रान्ति पर तिल-गुड़ का प्रयोग, शिवरात्रि पर शिवजी को बदरीफल (बेर) अर्पित करना, होली पर गेंहू की बालियों का होला सेकना, (नव सस्येष्टि) तथा अमान्त चैत्र कृष्ण एकादशी वरूथिनी एकादशी को खरबुजा का फलाहार।
अमान्त वैशाख कृष्ण एकादशी अपरा एकादशी को खरबुजा ( या ककड़ी) का फलाहार।
अमान्त ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी कमला एकादशी को दाख का फलाहार।
ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी निर्जला एकादशी को आम का फलाहार।
श्रावण शुक्ल एकादशी पवित्रा एकादशी को सिंघाड़ा का फलाहार।
 भाद्रपद शुक्ल एकादशी जलझूलनी एकादशी को बालन ककड़ी का फलाहार।
आश्विन शुक्ल एकादशी पापाङ्कुशा एकादशी को फुट काचरी का फलाहार।
अमान्त आश्विन शुक्ल एकादशी पापाङ्कुशा एकादशी को केला का फलाहार।
अमान्त कार्तिक शुक्ल एकादशी सफला एकादशी को तिल शकर का फलाहार।
माघ शुक्ल एकादशी जया एकादशी को गन्ने का रस का फलाहार।
फाल्गुन शुक्ल एकादशी आमलकी एकादशी को आँवला का फलाहार।
संवत्सर की प्रथम ऋतु वसन्त ऋतु होना, शरद ऋतु में ही शरद पूर्णिमा हो सकती है, सायन तुला संक्रान्ति का सम्बन्ध देवताओं की रात्रि प्रारम्भ होने से नवरात्र कहलाना,
ये सब बातें व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहारों का ऋतु आधारित होना प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है।
इसलिए मधु-माधव आदि सायन सौर मासों की संक्रान्तियों पर आधारित चान्द्र मासों में ही उक्त व्रत, पर्व उत्सव और त्यौहार मनाए जाना चाहिए।
सायन मतावलम्बियों के पक्ष में इतने सारे प्रमाण है।
लेकिन रामनवमी पर पुनर्वसु नक्षत्र पर चन्द्रमा होना, श्रीरामचन्द्र जी का राज्याभिषेक चैत्र शुक्ल पक्ष में पूष्य नक्षत्र पर चन्द्रमा होना, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को अमान्त श्रावण कृष्ण अष्टमी को चन्द्रमा रोहिणी नक्षत्र पर होना, भाद्रपद शुक्ल द्वादशी वामन जयन्ती को श्रवण नक्षत्र पर चन्द्रमा होना, बङ्गाल में नवरात्र में सरस्वती आह्वान, पूजन, बलिदान और विसर्जन में चन्द्रमा के नक्षत्र का ही महत्व होना, शिवरात्रि के दिन बहेलिए द्वारा सारी रात मृगशीर्ष नक्षत्र के तारे और लुब्धक (व्याघ) को देखना तथा पश्चिम और मध्य भारत को छोड़कर शेष उत्तर भारत, पूर्वी भारत, बाङ्ग्ला देश और दक्षिण भारत में निरयन सौर संक्रमण से प्रारम्भ होने वाले मेष-वृषभादि मास, वैशाखी, विषु, माघ बिहू आदि पर्व, तथा मेष-वृषभादि मासों में चन्द्रमा के नक्षत्र के अनुसार ही रामनवमी, श्रीकृष्ण जन्मोत्सव और वामन जयन्ती ओणम पर्व वैदिक काल में सायन सौर मधु-माधव आदि मासों में चन्द्रमा किसी विशेष नक्षत्र के साथ होने के आधार पर ही व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार तथा शुभ कार्यारम्भ और पूर्णाहुति करने का स्मरण करवाते हैं।
ये सभी तथ्य नक्षत्रिय पद्धति के पक्ष में तर्क हैं।
वर्षान्त में  वर्षान्त के पाँच दिन पहले दशा पूजन सावन वर्ष को सायन सौर वर्ष से समायोजित करने का उपक्रम है। ठीक इसी प्रकार दीपावली से लाभ पञ्चमी तक गुजरात में अवकाश रहना भी पारसियों के समान सावन वर्ष को सायन सौर वर्ष से समायोजित करने की व्यवस्था है।
इस लिए आदर्श पञ्चाङ्ग वहीं जो सायन संक्रान्ति आधारित सौर और सौर चान्द्र मास, निरयन संक्रमण और निरयन संक्रमण आधारित सौर मास सौर चान्द्र मासों और सावन वर्ष-मासों तथा दशाह के वासर इन तीनों को दर्शाता हो।

बुधवार, 12 नवंबर 2025

वेदों में लिङ्ग पूजक शिश्नेदेवाः से रक्षा हेतु महर्षि वशिष्ठ जी द्वारा इन्द्र से प्रार्थना।

*ऋग्वेद, मंडल 07, सूक्त 21, मंत्र 05 का अर्थ और व्याख्या*

प्रसङ्ग और सन्दर्भ ---
*ऋग्वेद सप्तम मण्डल/ सूक्त 21 मन्त्र 05 में कहा है कि,*
मन्त्र ---
*न यातव इन्द्र जुजुवुर्ना न वन्दना शविष्ठ वेद्यभि।न श्रीरर्द्धयो विष्णुनस्य जन्तोर्मा शिश्नदेवाः अपि गुऋतम् नः।।*

 *ऋषि वसिष्ठ इंद्र से शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधान अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि शत्रुओं से सुरक्षा की प्रार्थना कर रहे हैं।*

मन्त्र का अर्थ ---

*"हे बलवान इंद्र!* 
(दुष्ट, कृतघ्न, अधार्मिक, विलासी) *शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधानों * अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि) शत्रुओं से हमारी रक्षा कीजिए।*
*लिङ्गपूजक असूर लोग हमें परेशान न कर सकें; उन पर हमारी दृष्टि पड़ने, उनकी छाया पड़ने, उनके स्पर्श दोष से, हमारी समृद्धि को आधी न हो पाए। हे सर्वव्यापी विष्णु देव! उनसे हमारी रक्षा कीजिए।*

शब्दार्थ:
1. *यातवः* – यातुधान अर्थात (दुष्ट,पीड़क,शत्रु) *असुर दैत्य, दानव, राक्षस।* 
2 *शविष्ठ* – *अत्यंत बलवान* , (इन्द्र का विशेषण)।
 3 *वेद्यभिः* – *ज्ञानी, विद्वान*,(इन्द्र का विशेषण)।
4 *इन्द्र* – *देवताओं के राजा* (शक्ति के प्रतीक) ।
5. *न जुजुवुः* – *तंग न करें, पीड़ित न करें* ।
6. *न वन्दना* – *नमन न करने वाले, कृतघ्न* ।

7. *श्रीः* – *समृद्धि, सौभाग्य* ।
8. *अर्द्धयः* – *आधा* , अधूरा।
9. *विष्णुनस्य* – व्यापक, *सर्वव्यापी विष्णु* ।
10. *जन्तोः* – *प्राणियों के।* 
11. *शिश्नदेवाः* – (विलासी, कामुक, अधर्मी) *शिश्न और भग रूप में शिवलिङ्ग पूजक* ।
12. *अपि गुऋतम् नः* – *हमसे दूर करे, बचाएं या हमें दूर रखें* ।

मंगलवार, 11 नवंबर 2025

वर्तमान प्रचलित मुहूर्त शास्त्र में मेरी श्रद्धा क्यों नहीं है?

वर्तमान प्रचलित मुहूर्त शास्त्र में मेरी श्रद्धा क्यों नहीं है? 

क्योंकि मेरी श्रद्धा, आस्था और विश्वास केवल वेदों में है।
वैदिक मत, वैदिक वर्णाश्रम धर्म, वैदिक दर्शन, वैदिक कर्म या वैदिक क्रियाओं अर्थात वैदिक कर्मकाण्ड और वैदिक संस्कृति को ही सनातन धर्म मानता हूँ।
जो भी उसके विपरीत और वेद विरुद्ध तन्त्र है उसमें मुझे तनिक मात्र भी श्रद्धा, आस्था और विश्वास नहीं है।

लेकिन गणित, होरा शास्त्र अर्थात फलित ज्योतिष, मुहूर्त, वास्तु शास्त्र, सामुद्रिक शास्त्र, शकुन शास्त्र और धर्म शास्त्र का अध्यन करने और परम्परागत शिक्षा प्राप्त करने के कारण लोग मुझे ज्योतिषी समझते हैं और तत्सम्बन्धी प्रश्न पूछते हैं, राय लेते हैं, मुहूर्त पुछते हैं तो, गुरुदेव का ऋण समझकर मुझे परम्परागत जानकारी के आधार पर उत्तर देना पड़ता है। और बतलाता भी हूँ, लेकिन साथ में वैदिक मत भी बतला देता हूँ।

वर्तमान प्रचलित मुहूर्त शास्त्र में मेरी श्रद्धा क्यों नहीं है? का उत्तर ---

उत्तरायण दक्षिणायन में तीन महीने का तीन महीने आगे खिसका दिया और तीन महीने पहले ही उत्तरायण ले आये। ऋतुओं को एक महीने पहले से मान लिया। इस प्रकार मध्य भारत के मौसम से अनुकूल कर दिया।
फिर भी सन्तोष नहीं हुआ तो शुक्ल पक्ष से प्रारम्भ होने वाले चान्द्र मासों को पन्द्रह दिन पहले कृष्ण पक्ष से प्रारम्भ होना शुरू कर दिया।
वेदों में केवल दोनों प्रतिपदा, चन्द्र दर्शन (द्वितीया समझ सकते हैं), अर्ध चन्द्र (अष्टमी समझ सकते हैं), पूर्ण चन्द्र (पूर्णिमा समझ सकते हैं) और बिना चन्द्रमा वाली रात्रि (अमावस्या समझ सकते हैं) के अलावा किसी तिथि का उल्लेख नहीं है।
वैदिक काल में नक्षत्र असमान विस्तार वाले, चित्रा के समान एक तारा का ००°२३'३१" विस्तार वाले नक्षत्र, कृतिका जैसे सात तारों वाले नक्षत्र, तो शतभिषा जैसे सौ या वर्तमान में बचे अठासी तारों वाले नक्षत्र तो चित्रा के समान एक तारा का एक अंश से भी कम विस्तार वाले नक्षत्र और
स्वाति जैसे चौबीस अंशों वाले नक्षत्र होते थे। जबकि वर्तमान में सभी नक्षत्रों का एक समान भोग 13°20' मान लिया गया है।
ऐसे ही पश्चिम टर्की, मिश्र, और बेबिलोनिया में पशुओं की आकृति वाली असमान विस्तार वाली राशियाँ मानी जाती थी। वर्तमान एस्ट्रोनॉमी में भी यही मानते हैं। जबकि, गर्गाचार्य और आचार्य वराहमिहिर के समय जब राशियाँ और वार की नई अवधारणा अपनाई गई तो, तीस-तीस अंशों की समान विस्तार वाली राशियाँ बना दी गई। जबकि वेदों में क्रान्तिवृत के बारह समान तीस-तीस अंशों की समान विस्तार वाले सायन प्रधि मधु-माधव आदि मासों की गणना के लिए मानी जाती थी। लेकिन न उनका कोई स्वतन्त्र नाम नहीं दिया और न कोई आकृति बतलाई। क्योंकि सायन प्रधि (राशि) का कोई निश्चित क्षेत्र ही नहीं रहता, नक्षत्रों से सायन प्रधि का कोई सम्बन्ध ही नहीं रहता है, तो आकृति तो हो ही नहीं सकती।
वेदों में सिद्धान्त (गणित) ज्योतिष के वैधृति पात और व्यतिपात अर्थात सूर्य और चन्द्रमा के अंशों का योग 180° होने और 360° होने को छोड़कर किसी अन्य योग का उल्लेख नहीं है। जबकि वर्तमान में सत्ताईस योग प्रचलित हैं। न भद्रा (विष्टि करण) का उल्लेख है। जबकि वर्तमान में *विष्टि करण को भद्रा नाम देकर भद्रा को अशुभ मानते हैं। आश्चर्य यह है कि, भद्र शब्द आ अर्थ श्रेष्ठ होता है। तो भद्रा निष्कृष्ट कैसे हो गई।*
कुछ महत्वपूर्ण तथ्य स प्रमाण नीचे दिए जा रहे हैं। जिससे प्रमाणित होता है कि वर्तमान में प्रचलित अयन, ऋतु, मास सब गलत हैं।⤵️
‌*संवत्सर व्यवस्था -* 
उत्तरायण की तीन ऋतु - वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा। - 
*देवा ऋतवः वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु उत्तरायण में होती है।* 
शतपथ ब्राह्मण 2/1/3 तथा तै.सं. 6/5/3 तथा नारायण उपनिषद अनु. 80
*उदगयन शब्द और देवयान / देवलोक शब्द स्पष्ट आये हैं।* 
मैत्रायण्युपनिषद में उत्तरायण और नारायण उपनिषद अनु 80
(भा. ज्यो.पृष्ठ 44 एवम् 45)

*वसन्त को प्रथम ऋतु और संवत्सर का शिर, ग्रीष्म को दक्षिण पक्ष (पंख) और शरद को उत्तर पक्ष कहा है।* 
तै.ब्रा. 1/1/2/6 एवम् 7 एवम् 3/10/4/1
*हेमन्त को संवत्सर का मध्य और वर्षा को पुच्छ कहा है।*
तै.ब्रा. 3/10/4/1
(भा. ज्यो. पृष्ठ 47)
उक्त आधार पर प्रमाणित होता है कि, *वसन्त सम्पात से शरद सम्पात तक वैदिक उत्तरायण होता था। और शरद सम्पात से वसन्त सम्पात तक वैदिक दक्षिणायन होता था।*  वैदिक काल के उत्तरायण में वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु होती थी। और दक्षिणायन में शरद, हेमन्त और शिशिर ऋतु होती थी।
तदनुसार संवत्सर का प्रारम्भ वसन्त सम्पात, उत्तरायण, वसन्त ऋतु और मधुमास से होता था।

*तीन मौसम / ऋतु के नाम आये हैं।* 
अग्निर्ऋतुः सूर्य ऋतुश्चन्द्रमा ऋतु।
तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/10/1
(भा.ज्यो पृष्ठ 49)
इससे प्रमाणित होता है कि, वर्तमान के ही समान  *वैदिक युग में भी तीन मौसम मुख्य रहते थे  गर्मी, वर्षा और ठण्ड।*
वसन्त सम्पात अर्थात सायन मेष संक्रान्ति। जो प्रायः 20/21 मार्च को होती है। और शरद सम्पात अर्थात सायन तुला संक्रान्ति जो प्रायः 22/23 सितम्बर को होती है।
अतः  *वैदिक उत्तरायण 21 मार्च से 22 सितम्बर तक होता है। इसे उत्तरगोल भी कहते हैं।*
और  *वैदिक दक्षिणायन 23 सितम्बर से 19/20 मार्च तक होता है। इसे दक्षिण गोल भी कहते हैं।*

उत्तर परम क्रान्ति अर्थात सायन कर्क संक्रान्ति प्रायः 22/ 23 जून को होती है। और दक्षिण परम क्रान्ति सायन मकर संक्रान्ति प्रायः 22 दिसम्बर को होती है।
*उत्तर परम क्रान्ति अर्थात सायन कर्क संक्रान्ति 23 जून से दक्षिण परम क्रान्ति सायन मकर संक्रान्ति 21 दिसम्बर तक वैदिक उत्तर तोयन कहते हैं। पौराणिक काल में इसे दक्षिणायन कहा जाने लगा।*
*दक्षिण परम क्रान्ति सायन मकर संक्रान्ति 22 दिसम्बर से उत्तर परम क्रान्ति अर्थात सायन कर्क संक्रान्ति 22 जून तक वैदिक दक्षिण तोयन होता है। पौराणिक काल में इसे उत्तरायण कहा जाने लगा।*
इसलिए

*फाल्गुन पूर्णिमा/ पूर्वाफाल्गुनी के दिन को संवत्सर का अन्तिम दिन कहा है। और उसके अगले दिन उत्तराफाल्गुनी को संवतरारम्भ कहा है।*
अर्थात उस समय वैदिक असमान विस्तार वाले नक्षत्र - पूर्वाफाल्गुनी और उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र की सन्धि पर पूर्णिमा का चन्द्रमा होगा तो इससे १८०° पर स्थित नक्षत्र पर सूर्य होगा।
तैत्तिरीय संहिता 7/4/8 में तथा पृष्ठ 51 पर सामवेद के ताण्यब्राह्मण 5/9
 तैत्तिरीय ब्राह्मण 7/4/8
(भा.ज्यो.पृष्ठ 50)

*अधिक मास वर्षान्त में जुड़ता था।*
 वाजसनैय संहिता 22/30 एवम् 31 
ऐतरेय ब्राह्मण 3/1 और 17 और तैत्तिरीय ब्राह्मण 3/8/3
(भा. ज्यो. पृष्ठ 40 एवम् 41)
अर्थात वर्तमान में निरयन सौर वर्ष या सायन सौर वर्ष से चान्द्र वर्ष को बराबर करने के लिए निर्धारित  *१९ वर्ष, १२२ वर्ष और १४१ वर्ष वाला चक्र प्रचलित नहीं था।*
*महाभारत काल में हर अट्ठावन माह बाद उनसठवाँ और साठवाँ माह अधिक मास करते थे। ऐसे ही वैदिक काल में वर्षान्त पश्चात तेरहवाँ माह अधिक मास करते थे। सम्भवतः कितने वर्ष पश्चात करते थे यह स्पष्ट नहीं है।*

इससे सिद्ध होता है कि, सामान्यतः  *अमान्त मास भी प्रचलित थे लेकिन संवत्सर आरम्भ के लिए सायन मेष संक्रान्ति ही मुख्य थी। उस दिन पड़ने वाले चन्द्रमा जिस नक्षत्र के साथ होता था उस नक्षत्र से भी इंगित करते थे।* 

*शुक्ल पक्ष और कृष्णपक्ष को अर्धमास कहा है।* 
*अर्धमासों के नाम पवित्रादि हैं।* 
अथ यदाह । पवित्रन् पवयिष्यन्त्सहस्वान्त्सहीयानरुणोरणरजा इति। एष एव तत्। ए ह्येव तेर्धमासाः एषः मासाः ।
तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/6/3 ।
(भा. ज्यो.पृष्ठ 48)
इससे प्रमाणित होता है कि, *छब्बीस पक्षों के भी नामकरण किया गया था।*

*तिथियाँ प्रचलित नहीं थी। केवल उदृष्टका (शुक्ल प्रतिपदा), एकाष्टका (शुक्लाष्टमी), पूर्णिमा, व्यष्टका (कृष्ण प्रतिपदा) और अष्टका (कृष्णाष्टमी) और अमावस्या तिथि का ही उल्लेख है।*

 *कृष्णपक्ष की प्रतिपदा को व्यष्टका और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को उदृष्ट कहा है।* 
तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/8/2 तथा ताण्ड्य ब्राह्मण 10/3/11 ।
 *कृष्णपक्ष की अष्टमी को अष्टका और शुक्ल पक्ष की अष्टमी को एकाष्टका कहा है।* 
तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/5/12 तथा ताण्ड्य ब्राह्मण 10/3/11 ।
(भा.ज्यो.पृष्ठ 59)
इससे प्रमाणित होता है कि, तिथियाँ प्रचलित नही थी। लेकिन  *चन्द्रमा के चारो फेस का निर्धारण गणना करते थे। यानी अमावस्या, उदृष्यका या शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, एकाष्टका (शुक्ल पक्ष की अष्टमी), पूर्णिमा, व्यष्टका (कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा), अष्टका (कृष्ण पक्ष की अष्टमी), और अमावस्या की गणना की जाती थी।*


वैदिक काल में व्यवहार में ३६० दिन का सावन सौर वर्ष भी चलता था, इसमें प्रत्येक महिना ३० दिन का ही होता है ‌ तथा साथ में दशाह के वासर प्रचलित थे।

(१) *संवत्सर*--- संवत्सर नामक सामान्य वर्ष के *बारह महीने में ३६० दिन का संवत्सर* होता था। तथा

(२) *परिवत्सर* --- (३८३५ वें वर्ष को छोड़कर) प्रत्येक *पाँचवाँ वर्ष तेरह मास का* अर्थात *३९० दिन का परिवत्सर* होता था। 

(३) *इदावत्सर* --- ( *३८४० वें वर्ष को छोड़* ) *प्रत्येक ४०वाँ वर्ष ३६० दिन* का अर्थात *बारह मास का* ही होता था।

(४) --- *अनुवत्सर* --- *३८३५ वाँ वर्ष ३६० दिन (बारह मास) का अनुवत्सर* होता था। एवम्

(५) *इद्वत्सर* --- *३८४० वाँ वर्ष ३९० दिन (तेरह मास) का इद्वत्सर* होता था।

इस गणना में पारिश्रमिक वितरण में दशाह चलता था। सप्ताह शब्द भी मिलता है लेकिन उपयोग का उल्लेख नहीं है। वासर सूर्योदय से दुसरे सूर्योदय तक को कहते हैं, लेकिन ग्रहों के नाम वाले वार का उल्लेख नहीं है।

क्रान्तिवृत के उत्तर-दक्षिण में आसपास आठ-आठ अंश चोड़ी पट्टी में असमान आकृति वाले तारा मण्डलों को असमान भोगांश वाले नक्षत्र कहते थे। समान भोग वाले नक्षत्र नहीं थे। 
अथर्ववेद में अट्ठाईस नक्षत्र बतलाये गए हैं। जबकि कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता ४/४/४० में शुक्ल यजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण/ दशम काण्ड/पञ्चमोऽध्याय/ चतुर्थ ब्राह्मण में और सामवेद के जैमिनी ब्राह्मण में सत्ताईस नक्षत्र ही बतलाए गए हैं लेकिन सभी में एक बात निश्चित है कि, नक्षत्र भोग असमान था। 

 चित्रा नक्षत्र का भोग केवल ००°२३'३१" ही था, स्वाती नक्षत्र का भोग २०°५०'५७" था, जबकि धनिष्ठा नक्षत्र का भोग २५°१४'०८" था; ऐसे ही सभी नक्षत्रों के भोगांश अलग अलग थे।*

 शतपथब्राह्मणम् में सत्ताइस नक्षत्रों का उल्लेख दिया हुआ है।

नक्षत्राणि ह त्वेवैषोऽग्निश्चितः तानि वा एतानि सप्तविंशतिर्नक्षत्राणि सप्तविंशतिः सप्तविंशतिर्होपनक्षत्राण्येकैकं नक्षत्रमनूपतिष्ठन्ते तानि सप्त च शतानि विंशतिश्चाधि षट्त्रिंशत्ततो यानि सप्त च शतानि विंशतिश्चेष्टका एव ताः षष्टिश्चत्रीणि च शतानि परिश्रितः षष्टिश्च त्रीणि च शतानि यजुष्मत्योऽथ यान्यधिषट्त्रिंशत्स त्रयोदशो मासः स आत्मा त्रिंशदात्मा प्रतिष्ठा प्राणा द्वे शिर एव षट्त्रिंश्यौ तद्यत्ते द्वे भवतो द्व्यक्षरं हि शिरोऽथ यदन्तरा नक्षत्रे तत्सूददोहा अथ यन्नक्षत्रेष्वन्नं तत्पुरीषं ता आहुतयस्ताः समिधोऽथ यन्नक्षत्राणीत्याख्यायते तल्लोकम्पृणा तद्वा एतत्सर्वं नक्षत्राणीत्येवाख्यायते तत्सर्वोऽग्निर्लोकम्पृणामभिसम्पद्यते स यो हैतदेवं वेद लोकम्पृणामेनं भूतमेतत्सर्वमभिसम्पद्यते

शतपथब्राह्मणम्/काण्डम् १०/अध्यायः ५/ब्राह्मण ४

सामवेद के जैमिनी ब्राह्मण में सत्ताइस नक्षत्र कहे गए हैं।

यास्सप्तपदाश्शक्वर्यो ये सप्त ग्राम्याः पशवो यानि सप्त चतुरुत्तराणि छन्दांसि ये सप्त मुख्याः प्राणा यानि सप्तविंशतिर्दिव्यानि नक्षत्राणि यस्सप्तविंश स्तोमो यत्किं च सप्त सप्त तस्यैषा सर्वस्यर्द्धिस्तस्योपाप्तिः ।)
परवर्ती ज्योतिष ग्रन्थों में इसका समाधान इस प्रकार किया कि,
जब अट्ठाइस नक्षत्रों के बजाय सत्ताइस नक्षत्र लेने का निर्णय लिया, तो उत्तराषाढ़ा की अन्तिम चार घटी और श्रवण नक्षत्र के प्रारम्भ की २५ घटी को मिला कर कुल २९ घटी को अभिजित् नक्षत्र मान लिया।
महर्षि गर्गाचार्य नें गर्ग संहिता और भास्कराचार्य ने सिद्धान्त शिरोमणि में असमान भोगांश वाले नक्षत्रों को मान्यता दी। लेकिन वराहमिहिर ने वृहत् संहिता में १३°२०' के समान भोगांश वाले सत्ताइस को मान्यता दी। साथ ही मिश्र,युनान और बेबीलोन (इराक) में प्रचलित ३०° वाली बारह राशियों को भी मान्यता दी। तथा राशियों और नक्षत्रों में समायोजन स्थापित किया।
योग एवम् करण (तिथ्यार्ध) का उल्लेख नहीं है।
सूर्य से चन्द्रमा के बारह-बारह अंश के अन्तर पर तिथियाँ बदलती है। जैसे 348° से 360° तक अमावस्या रहती है। 00° से 12° अन्तर तक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, 12° से 24° तक द्वितीया, 24° से 36° तक तृतीया ....…. 168° से 180° तक पूर्णिमा। फिर 180° से 192° तक कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा, 192° से 204° तक कृष्ण पक्ष की द्वितीया 204° से 216° तक कृष्ण पक्ष की तृतीया और पुनः 348° से 360° तक अमावस्या रहती है।
ऐसे ही सूर्य से चन्द्रमा के छः-छः अंश के अन्तर को करण कहते हैं।

इसके अलावा मुहूर्त शास्त्र में अक्षांशो के आधार पर ऋतुओं में अन्तर पड़ता है। 
*क्या उत्तर गोल यानी वैदिक उत्तरायण में किये जाने वाले कार्य दक्षिणी गोलार्ध में भी उत्तर गोल यानी वैदिक उत्तरायण में ही किये जाने चाहिए। या वहाँ उनमें से कुछ कार्य जिनका सम्बन्ध वास्तु से है वे कार्य दक्षिण गोल अर्थात वैदिक दक्षिणायन में करना चाहिए? ऐसा कोई स्पष्टीकरण नहीं है।*

*केवल कर्क रेखा और मकर रेखा के आस-पास ही षड ऋतुएँ होती है। इसी कारण ऋग्वेद में पाँच ऋतुओं का ही उल्लेख किया है। हेमन्त ऋतु का उल्लेख नहीं है।*
*भूमध्य रेखीय क्षेत्रों में ग्रीष्म ऋतु और वर्षा ऋतु के अलावा कोई ऋतु होती ही नहीं।
उत्तर अक्षांश 66° 40 के उत्तर में जब ग्रीष्म ऋतु होती ही नहीं तब कोई व्यक्ति ग्रीष्म वाले कार्य कैसे करेगा?*  ऐसे ही 
 *दक्षिण अक्षांश 66° 40 के उत्तर में जब ग्रीष्म ऋतु होती ही नहीं तब कोई व्यक्ति ग्रीष्म वाले कार्य कैसे करेगा?*

*अधिक उत्तर दक्षिण अक्षांशो पर दिनमान 24 घण्टे से भी अधिक होते हैं  यहाँ तक कि, एक माह, दो माह, तीन महीने , चार महीने, पाँच महीने और ध्रुवों पर तो छः महीने के दिवस और रात्रि होती है। वहाँ कोई व्रत, व्रत का पारण कैसे किया जाए इस सम्बन्ध में उचित अनुचित की व्यवस्था देने वाले धर्मशास्त्र में भी उल्लेख नहीं है, तो, धर्म शास्त्र के अङ्ग रूप मुहूर्त शास्त्र में सूर्योदय, प्रातः, सङ्गव, पूर्वाह्न, मध्याह्न, (अथर्ववेदीय अभिजित मुहूर्त, विजय मुहूर्त), अपराह्न, सूर्यास्त, गोधुलि, सायं सन्ध्या, प्रदोषकाल, पूर्व रात्रि, महानिशा, मध्य रात्रि, (विष्णु पुराण का ब्राह्म मुहूर्त), और (अथर्ववेद का ब्रह्म मुहूर्त), उषा काल, अरुणोदय, का निर्णय उक्त कालों में कैसे किया जाएगा इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है।*

*जब उत्तर अक्षांश 66° 40 के उत्तर में जब मकर लग्न दिखता ही नहीं तब कोई व्यक्ति मकर लग्न वाले कार्य कैसे करेगा?*  ऐसे ही 
 *दक्षिण अक्षांश 66° 40 के उत्तर में जब कर्क लग्न दिखता ही नहीं तब कोई व्यक्ति कर्क लग्न वाले कार्य कैसे करेगा?*
*इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं है।*

इतनी सब विसङ्गतियों का प्रभाव यह पढ़ा कि, *मुहूर्त निकलाने वाले भी मुहुर्त में कोई कार्य नहीं कर पाते हैं।*  या
*मन वाञ्छित दिन में मन वाञ्छित समय में ही मुहूर्त चाहते हैं।*
*वैदिक अग्निहोत्र रात्रि में नहीं होते फिर विवाह में रात्रि में अग्निहोत्र कर फैरे का चक्कर मेरी समझ से अत्यन्त परे है।*
*यह तो सभी ने देखा है कि, जि समय लग्न मुहूर्त में पाणिग्रहण संस्कार (हथलेवा) का समय होता है; उसी समय वर का वर निकासी का जुलूस (प्रोसेशन) निकल रहा होता है और बाराती फुहड़ डान्स कर रहे होते हैं। (नृत्य नहीं कहा जा सकता इसलिए लिख रहा डान्स कर रहे होते हैं ऐसा लिख रहा हूँ)  

मेरे मातृ कुल में मेरे अनुज ने मेरे भतिजे का नाम बदलकर चन्द्रमा के राशि नक्षत्र पर अवकहड़ा चक्र के अनुसार कर दिया था। जबकि उसी के पुत्र अर्थात मेरे भतिजे का विवाह वेधतुल्य गणित वाली पञ्चाङ्ग से उनके जन्म राशि/नक्षत्र/ चरण के आधार पर नहीं निकल रहे थे तो, लड़की के जन्म नाम के स्थान पर बोलते नाम पर मुहूर्त निकलवा लिया गया।
मेरा अनुज पूज्य गुरु ब्रहस्पति में सगाई करने को भी तैयार नहीं था। जबकि, विवाह लग्न के समय मेरे भतीजे को नवम सूर्य पूज्य है और भतिजा बहू के जन्म कुण्डली की चन्द्र राशि से गुरु ब्रहस्पति तृतीय अर्थात पूज्य है।  

*पाँच सौ वर्षों के संघर्ष के बाद शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी के अनुचरों, ग्रामीणों की प्रशिक्षित सेना के द्वारा ढाँचा गिराने पर माननीय न्यायालय के समक्ष शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी के वकीलों द्वारा अंग्रेजी शासन के दौरान अयोध्या के अंग्रेज कलेक्टर द्वारा सरयु नदी और अन्य मन्दिरों आदि लेण्डमार्क से नपती करवा कर बनाये गए नक्शे मे प्राचीन रामजन्म भूमि का स्थान नियत करके रखे गए प्रमाण प्रस्तुत किए जाने और वकील श्री विष्णु जैन के द्वारा प्रस्तुत प्रमाणों के आधार पर हुए पूरा तात्विक सर्वेक्षण को आधार बनाकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय और न्याय (फैसले) और आदेश के पालन में राम भक्तों से प्राप्त चन्दे की राशि से बनाए जा रहे अधुरे राम मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा केवल राजनीतिक लाभ की आशा में नीमच की चण्डु पञ्चाङ्ग (निर्णय सागर पञ्चाङ्ग) में बतलाये गए मुहूर्त को मानकर जोड़-तोड़ करके बिना मुहूर्त के दिन कर दी गई। फिर भी राजनीतिक लाभ मिला तो नहीं मिला लेकिन मुहूर्त बतलाने वाले शास्त्री जी लगभग छः महीने में ही निपट गए। मन्दिर निर्माण के संघर्ष से लेकर मन्दिर निर्माण तथा रखराव के नाम पर लिये गये बे हिसाब भूमि दान, रत्न, सोना- चान्दी, ताम्बा, नगद धन राशि, पाषाण, इंटें आदि का कितना घपला हुआ और बाद में चढ़ावा चोरी के प्रकरण सामने आये। इससे लोगों की भावनाओं को ठेस पहूँची वह अलग।

ऐसे देश समाज में, कलिकाल मे रहने वाले मेरे भाई के परिवार जनों को क्या दोष दिया जा सकता है।
*अब बतलाइये कि, उक्त गलत तथ्यों पर आधारित वर्तमान मुहूर्त शास्त्र पर किस आधार पर और किस कारण से श्रद्धा, आस्था और विश्वास व्यक्त किया जाए?*
*अतः निर्णय आप पर छोड़ता हूँ।*