फिर गुरु के निर्देशानुसार किसी तपोस्थली पर बैठ कर नैष्टिक ब्रह्मचर्य पालन करते हुए नित्य पञ्च महायज्ञ करते हुए जीवन निर्वाह हेतु अत्यावश्यक केवल फल आदि सात्विक आहार लेते हुए पहले उस देवता के कमसे कम दस लाख मन्त्र जप करें या पुरुश्चरण पूर्ण कर जप किए गए मन्त संख्या का दशांश आहुति देकर अग्निहोत्र करें, फिर जप किए गए मन्त्र संख्या का शतांश तर्पण करें, फिर जप किए गए मन्त्र संख्या का सहस्त्रांश श्राद्ध करें , फिर जप किए गए मन्त्र संख्या का दश सहस्त्रांश ब्राह्मण भोजन कराकर उन्हें समुचित दक्षिणा प्रदान करें। उन्हें सौ कदम छोड़ने जाकर कमी के लिए क्षमा प्रार्थना कर आशिर्वाद लें।
उसके बाद गुरु के आदेश पर उस देवता के पौराणिक मन्त्र का निर्धारित संख्या में जप, होम, तर्पण, श्राद्ध, और ब्राह्मण भोजन करवा कर वैदिक मन्त्र जप में रह गई कमी की पूर्णता कर मन्त्र को पुष्ट करें।
फिर गुरुजनों को प्रणाम कर उनसे बीज मन्त्र सीखकर उसका जप कर देवता को प्रकट प्रणाम पूजा आदि कर उस देवता द्वारा प्रदत्त शक्ति को धारण कर लें।
इसके बाद वैदिक मन्त्र, पौराणिक मन्त्र और बीज मन्त्र का एक हजार जप रोज करता हुआ सायन सौर संक्रान्ति , निरयन सौर संक्रमण, शुक्ल पक्ष की अष्टमी, पूर्णिमा, कृष्ण पक्ष की अष्टमी और अमावस्या को वैदिक मन्त्र के साथ 108 आहुति देकर पौराणिक मन्त्र जप कर एकसौ आठ बार बीज मन्त्र पढ़कर देवता को प्रकट कर उनकी सेवा पूजा कर कृपा प्राप्त कर पुष्टि करता रहे।
जब भी सार्वजनिक हित में अत्यावश्यक हो
बीज मन्त्र का उच्चारण कर जल छिड़क कर आये सङ्कट से मुक्ति दिला सकता है।
या किसी भी धुल या तिनके आदि किसी भी वस्तु को अभिमन्त्रित कर फैंक कर शत्रु पर प्रहार कर उसे यथोचित दण्ड दे सकता है।
केवल बीज मन्त्र का जप नहीं होता है।
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