वैदिक लोग इनका विरोध करते थे।
फिर
लगभग 345 ईसा पूर्व से 329 ईसापूर्व में महापद्मनन्द राजा के समय शालिग्राम शिला विष्णु लिङ्ग, जलाधारी में फिट बेलनाकार शिवलिङ्, मातृलिङ्ग बिजोरा निम्बू, बेडोल चौड़ा चिकना पत्थर का विनायक लिङ्ग, और त्रिकोणीय पत्थर का भैरव लिङ्ग तो प्रचलित होने लगे थे।
उसी समय जैनों ने चैत्य (मन्दिर) बनाकर ऋषभदेव की मूर्ति बनाकर पूजा प्रारम्भ कर दी थी।
लेकिन किसी भी लिङ्ग अर्थात चिह्न पर आँख-नाक और चेहरा बनाना प्रचलित नहीं था। सम्भवतः कुछ शैवों ने ऐसा प्रयोग किया होगा तो शैव आगम, पाशुपत आगम में इसे निषिद्ध घोषित कर दिया।
लेकिन आजकल तो उज्जैन के महाकालेश्वर मन्दिर में महाकाल ज्योतिर्लिङ्ग पर भाँग आदि से चेहरा बना कर निषेधाज्ञाओं का उलङ्घन तो किया ही; बल्कि शिवलिङ्ग पर कभी अर्धनारीश्वर तो नारायण-श्रीहरि, तो कभी विनायक की मुखाकृति बनाना प्रारम्भ कर दिया। जो आगम ग्रन्थों की आज्ञाओं का सर्वथा उलङ्घन है।
ऐसे ही इसके देख-देखी सिन्दूर पुती विनायक प्रतिमों और भैरव प्रतिमाओं पर भी चेहरा बनाना प्रारम्भ हो गया है। ये सभी आगमोक्त निषिद्ध कर्म हैं।