सोमवार, 28 सितंबर 2026

श्राद्ध भोज हेतु किनको बुलाया जाना चाहिए?

मूलतः श्राद्ध भोजन सप्त पितरः और दस विश्वेदेवाः के निमित्त किया जाता है।

सृष्टि उत्पत्ति क्रम में -- सबसे पहले के वल परमात्मा ही था परमात्मा - परम आत्मा - परम आत्म अर्थात परम मैं, वास्तविक मैं, सबका वास्तविक स्वरूप।
परमात्मा के कल्याणमय ॐ सञ्कल्प से परब्रह्म (ब्रह्म से भी परे) परमेश्वर सर्वव्यापी विष्णु और उनकी शक्ति माया हुए। विष्णु के गुण - सत (अस्तित्व अर्थात है पन अर्थ है), चित (ज्ञान स्वरूप), आनन्द और सर्ववयापकता तथा निरन्तर विस्तार होते रहना, जो सबसे बड़े से भी सबसे बड़ा होने से परब्रह्म कहलाता है।

परमात्मा के उसी ॐ सञ्कल्प से आगे और विस्तार होकर ब्रह्म सवितृ और उनकी शक्ति सावित्री। गायत्री मन्त्र इन्हीं सवितृ की उपासना है।
ब्रह्म मतलब बड़े से महा या महा से भीई बड़ा। सवितृ के गुण हैं - वे सृष्टि के जन्मदाता जनक हैं, प्रेरित करने वाले प्रेरक हैं, और रक्षक हैं। इन्हीं को प्रभविष्णु और उनकी शक्ति श्री और लक्ष्मी कहलातीं हैं। भू-भव मतलब होना, प्रभ मतलब जो हुआ और जिससे सब-कुछ हुआ। विष्णु मतलब सर्वव्याप्त। प्रभविष्णु मतलब सर्वत्र विद्यमान रहने वाला जिससे सब-कुछ हुआ है। 
श्री मतलब सत्ता, अधिकार, आधिपत्य (राज्य, शासन, जायदाद, अचल सम्पत्ति, गुण- विशेषताएँ) और लक्ष्मी मतलब दृश्यमान सम्पत्ति (चल सम्पत्ति, मुल्यवान रत्न, स्वर्ण आदि), 
ब्रह्म प्रभविष्णु-श्री लक्ष्मी (सवितृ-सावित्री) से अपर ब्रह्म (ब्रह्म से छोटे) नारायण श्रीहरि और उनकी शक्ति नारायणी कमलासना गण सेविता लक्ष्मी प्रकट हुए।
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 32 में जिस विश्वरूप को कालोऽस्मि कहा है वह नारायण ही हैं। अर्थात अब पहली बार काल अस्तित्व में आया। इसलिए इनकी और इनके पहले प्रकट हुए स्वरूपों की काल गणना आयु अवस्था (वय Age) नहीं बतलाई जा सकती।
अपरब्रह्म नारायण श्रीहरि के सञ्कल्प से नारायण के केन्द्र (नाभि) में अण्डाकार (पाँच मुखी) हिरण्यगर्भ ब्रह्मा हुए।  
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की शक्ति वाणी है। हिरण्यगर्भ ब्रह्मा ही वेदों (ज्ञान) को प्रकट करने वाले वक्ता हैं। हिरण्यगर्भ ब्रह्मा ही विश्व रचियता विश्वकर्मा हैं। हिरण्यगर्भ ब्रह्मा को त्वष्टा और उनकी शक्ति रचना के रूप में जाना जाता है। ऋग्वेद के अनुसार त्वष्टा ने सृष्टि के बड़े बड़े नक्षत्र (तारे) और ग्रहों उपग्रहों आदि के गोले सुतार (बढ़ई) की भाँति गढ़ा (घड़ा)।
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की आयु 31 नील, 10 खरब, 40 अरब मानव वर्ष है। उसमें से आधी आयु पूर्ण कर चुके हैं। जब ये अपर ब्रह्म नारायण में लीन हो जाएँगे तब प्राकृत प्रलय हो जाएगा। नारायण श्रीहरि और नारायणी कमलासना गज सेविता लक्ष्मी ही रह जाएँगे।
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के द्वारा अर्धनारीश्वर एक रुद्र, सनक सनन्दन सनत्कुमार और सनातन तथा नारद, धर्म और उनकी शक्ति धृति (धारण शक्ति/ धैर्य) और कामदेव एवम् उनकी शक्ति रति हुए।
वाणी हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के सञ्कल्प से चारों ओर मुख वाले (गोलाकार) प्रजापति ब्रह्मा हुए। प्रजापति ब्रह्मा की शक्ति सरस्वती है।

प्रजापति ब्रह्मा की आयु चार अरब, बत्तीस करोड़ मानव वर्ष है। ये भी अपनी आधी से अधिक अवस्था (वय) 01 अरब, 97 करोड, 29 लाख, 49 हजार 127 मानव वर्ष पूरी कर चुके हैं। जब ये वाणी हिरण्यगर्भ ब्रह्मा में लीन हो जाएँगे तब नैमित्तिक प्रलय हो जाएगा। केवल आकाश, अन्तरिक्ष, सूर्यादि तारे ही बचेंगे और महर्लोक निवासी ब्रह्मर्षि गण बचेंगे।

सरस्वती हिरण्यगर्भ ब्रह्मा से उत्पन्न होने के कारण हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की मानस पुत्री मानी जाती है। और प्रजापति ब्रह्मा की पत्नी हैं।
इन्हीं ने मैथुनिक सृष्टि प्रारम्भ की।
प्रजापति ब्रह्मा के कहने पर अर्धनारीश्वर एक रुद्र स्वयम् शंकर और उमा के स्वरूप में प्रकट हुए। प्रजापति ब्रह्मा के बाद तैंतीस देवताओं में सबसे बड़े होने के कारण महादेव कहलाते हैं।
प्रजापति ब्रह्मा से 
 *(1) दक्ष प्रजापति (प्रथम)-प्रसुति, (2) रुचि प्रजापति-आकुति और (3) कर्दम प्रजापति-देवहूति। 4 *स्वायम्भुव मनु-शतरूपा ये चारों भूस्थानी प्रजापति हुए।
प्रसुति, आकुति और देवहूति भी ब्रह्मा की मानस सन्तान है किन्तु इन्हे स्वायम्भुव मनु-शतरूपा की पुत्री भी कहा जाता है। 
प्रजापति ब्रह्मा के इन मानस पुत्रों के अलावा ग्यारह मानस पुत्र और भी हैं। जिनमें से दो देवस्थानी प्रजापति (1) इन्द्र - शचि और (2) अग्नि - स्वाहा एवम् एक (3) सप्त पितर - स्वधा।  
प्रजापति ब्रह्मा के पौत्र और वाचस्पति के पुत्र आठ भूस्थानी प्रजापति ये हैं (4) मरीची-सम्भूति, (5) भृगु-ख्याति, (6) अङ्गिरा-स्मृति, (7) वशिष्ट-ऊर्ज्जा, (8) अत्रि-अनसुया, (9) पुलह-क्षमा, (10) पुलस्य-प्रीति, (11) कृतु-सन्तति। ये सभी ब्रह्मर्षि भूस्थानी प्रजापति हुए। ये सभी ब्रह्मज्ञानी हैं और इनकी पत्नियाँ दक्ष प्रजापति (प्रथम) और उनकी पत्नी प्रसुति की पुत्रियाँ थी। इन *ब्रह्मर्षियों का वासस्थान ब्रह्मर्षि देश कहलाता है। (ब्रह्मर्षि देश यानी हरियाणा में गोड़ देश अर्थात कुरुक्षेत्र के आसपास का क्षेत्र) एवम इनकी सन्तान ब्रह्मज्ञ ब्राह्मण हुए।* 
 इन्द्र - शचि और अग्नि - स्वाहा और नारद जी के अलावा निम्नलिखित स्वर्गस्थानी देवगण हुए 
 (12) रुद्र- रौद्री (शंकर - सति पार्वती) - रुद्र मूलतः अन्तरिक्ष स्थानी देवता है लेकिन भूलोक में हिमालय में शंकरजी कैलाश वासी भी हैं।
(13) धर्म - और उनकी तेरह पत्नियाँ । (१) श्रद्धा, (२) लक्ष्मी, (३) धृति, (४) तुष्टि, (५) पुष्टि, (६) मेधा, (७) क्रिया, (८) बुद्धि, (९) लज्जा, (१०) वपु, (११) शान्ति, (१२) सिद्धि, (१३) कीर्ति ) ये देवस्थानी प्रजापति हैं। इनकी पत्नियाँ दक्ष प्रजापति (प्रथम) और प्रसुति की कन्याएँ थी । धर्म द्युलोक का अर्थात स्वर्गस्थानी देवता है। लेकिन भूमि पर कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र कहाजाता है। इनके अलावा (14) पितरः - स्वधा अन्तरिक्ष स्थानी प्रजापति हुए। पितरः ने स्वयम् सप्त पितरों और उनकी शक्ति (पत्नी) को में प्रकट किया। जिनमें से *(१) अग्निष्वात (२) बहिर्षद और (३) कव्यवाह तीन निराकार और (४) अर्यमा, (५) अनल (६) सोम और (७) यम चार साकार हैं। अर्यमा इनमें मुख्य हैं।*
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के मानस पुत्र नारद बाल ब्रह्मचारी ही रहे। अतः प्रजापति के स्थान पर मुनि और देवर्षि ही कहे जाते हैं।

*श्राद्ध में स्वधा बोलते हुए इन्ही सात पितरों को कव्यभाग अर्पित कर तृप्त किया जाता है। (१) अग्निष्वात (२) बहिर्षद और (३) कव्यवाह तीन निराकार और (४) अर्यमा, (५) अनल (६) सोम और (७) यम चार साकार हैं। अर्यमा इनमें मुख्य हैं। इसलिए श्राद्ध में सात ब्राह्मण को और स्वधा के निमित्त इन ब्राह्मणों से अलग परिवार की एक विदुषी ब्राह्मणी को भोजन करवाया जाता है।*

*इनके साथ ही दस विश्वैदेवाः (1) दक्ष (द्वितीय), (2) कृतु, (3) सत्य, (4) काल (यम), (5) काम, (6) मुनि, (7) एल पुरुरवा, (8) श्रव, (9) रोचमान, (10) आर्द्रवान को भी कव्य भाग अर्पित करते हैं।*
 *इसलिए गुरुकुल के आचार्य सात वेदज्ञ ब्राह्मणों के साथ कुछ लोग गुरुकुल के दस बटुक (विप्र ब्रह्मचारियों) को भी भोजन करवाते हैं।*

सोमवार, 14 सितंबर 2026

प्रति वर्ष अधिकांश व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहारों एक दो दिन या एक माह का अन्तर क्यों आता है - इसका कारण और निवारण।

प्रति वर्ष अधिकांश व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहारों एक दो दिन या एक माह का अन्तर क्यों आता है - इसका कारण और निवारण।

1 गणितागत मतभेद ---
वेधशाला से प्राप्त आकड़ों (डेटा) पर आधारित वेधतुल्य पञ्चाङ्गो में भी दो मत हैं।

(क) *भारत में  प्रचलित नक्षत्रीय पद्यति पर आधारित निरयन सौर संक्रमण आधारित निरयन सौर मास और निरयन चन्द्रमा के आधार पर निरयन सौर-चान्द्रमासों वाले पञ्चाङ्ग। ये प्रायः लाहिरी अयनांश के आधार पर ही निकलते हैं। लेकिन कुछ शुद्ध चित्रा पक्षीय अयनांश के आधार पर भी निवलते हैं।*
*लाहिरी अयनांश और शुद्ध चित्रा पक्षीय अयनांश में 22 मार्च 285 ईस्वी को मात्र 03" विकला का अन्तर था जो वर्तमान में चित्रा तारे के निरन्तर विचलन के परिणाम स्वरूप लगभग 01' कला (अर्थात 60 विकला) से अधिक का अन्तर हो गया है। लेकिन भारतीय ज्योतिषी इसे नगण्य मानते हैं।*
(ख) उक्त दृग्तुल्य पञ्चाङ्गो के अतिरिक्त कुछ स्थानीय स्तर पर सूर्य सिद्धान्त के मकरन्द और ग्रह लाघव नामक करण ग्रन्थों पर आधारित स्थूल गणित वाले पञ्चाङ्ग भी प्रचलित हैं। जिनके निरयन सौर संक्रमण, और चन्द्रमा तथा ग्रहों की नक्षत्रीय (निरयन) स्थिति प्रायः गलत ही होती है। परिणाम स्वरूप सूर्य के निरयन संक्रमण का समय तथा तिथि और  चन्द्रमा के नक्षत्र का प्रारम्भ और समाप्ति का समय भी गलत ही रहता है। गुरु बृहस्पति एवम् शुक्र का अस्त और उदय का दिन और समय भी गलत ही रहता है। इसलिए व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार भी प्रायः गलत ही रहते हैं। कई बार अधिक मास क्षय मास भी गलत ही बतलाइए थे। क्षय तिथि और अधिक तिथि तो प्रायः गलत ही रहतीं हैं।
लेकिन ग्रहगणित ज्योतिष (सिद्धान्त ज्योतिष अर्थात एस्ट्रोनॉमी) का ज्ञान नहीं होने के कारण मन्दिरों के पुजारियों का समर्थन इन परम्परागत पञ्चाङ्ग को अभी तक प्रचलन में बनाए हुए हैं।
(ग) ऐसे ही गुजरात में किसी अन्य करण ग्रन्थ के आधार पर पञ्चाङ्ग निकलते हैं
(घ) पहले महाराष्ट्र में लोकमान्य बालगङ्गाधर तिळेक के गणित के आधार पर श्री मोरोपन्त छत्रे, लगभग 04° अंश कम वाला झीटापक्षीय अयनांश पर पञ्चाङ्ग निकालते थे। जो कभी भी लोकप्रचलित नहीं हो पाया। इसकी वर्तमान स्थिति ज्ञात नहीं है।

*पञ्चाङ्गो में उक्त गणितीय त्रुटि के अलावा धर्मशास्त्रिय मत भिन्नता महत्वपूर्ण कारण है।
इसे समझने के लिए कुछ पारिभाषिक शब्दावली और कुछ तथ्यों का ज्ञान आवश्यक है। जो लेख के अन्त में दिए गए है।*

*समस्या का निवारण का उपाय।*

*कुछ व्रत सूर्योदय के समय जो तिथि रहती है उस सूर्योदय व्यापिनी  तिथि के अनुसार इस लिए मनाए जाते हैं क्योंकि उन व्रत पर्व में मुख्य पूजा सूर्योदय के समय ही होती है। अर्थात उन व्रत पर्वों का पर्वकाल ही सूर्योदय का समय होता है।* *लेकिन यह नियम सभी व्रत पर्व, उत्सव और त्यौहारों में इसलिए लागू नहीं होता है क्योंकि, सभी व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहारों का पर्वकाल अलग-अलग होता है।*
*कोई प्रातः काल व्यापिनी तिथि में मनाते हैं तो कुछ पूर्वाह्न व्यापिनी तिथि में मनाते हैं, तो कोई मध्याह्न काल व्यापिनी तिथि में मनाते हैं तो कुछ अपराह्न काल व्यापिनी तिथि में मनाते हैं। कोई सूर्यास्त कालीन तिथि में मनाते हैं तो कुछ  प्रदोषकाल व्यापिनी तिथि में मनाते हैं तो कुछ पूर्व रात्रि व्यापिनी तिथि में मनाते हैं। कुछ मध्यरात्रि कालीन तिथि में मनाते हैं तो कुछ महानिशिथ काल व्यापिनी तिथि में मनाते हैं। कुछ तो उत्तर रात्रि कालीन तिथि में तो कुछ अरुणोदय कालीन व्यापिनी तिथि अर्थात ब्रह्म मुहूर्त मे जो तिथि हो उसमें मनाते हैं। तो कुछ चन्द्रोदय कालीन तिथि में मनाते हैं। ये सब पर्वकाल कहलाते हैं।*
*पर्वकाल के विषय में भी पौराणिक साहित्य में मतभेद के कारण धर्मशास्त्र पर निबन्धकारों ने अलग-अलग मत व्यक्त किए हैं। यह बहुत गहन विषय है।*

*इसके अलावा दक्षिण भारत में निरयन सौर मास में चन्द्रमा का नक्षत्र के आधार पर व्रत, पर्व उत्सव और त्यौहार मनाये जाते हैं वहाँ सौर- चान्द्रमास (लूनी-सोलर मन्थ) का उपयोग न के बराबर बहुत कम होता है। इसलिए तिथियाँ भी लगभग अप्रचलित है।*
*जैसे निरयन मेष राशि के सूर्य में अर्थात मेष मास में पुनर्वसु नक्षत्र में श्रीराम जयन्ती मनाते हैं और  निरयन सिंह राशि के सूर्य (सिंह मास) में रोहिणी नक्षत्र में श्रीकृष्ण जयन्ती मनाते हैं। और निरयन सिंह राशि के सूर्य (सिंह मास) में श्रवण नक्षत्र में वामन जयन्ती ओणम नाम से मनाते हैं। 
फिर उसमें भी आचार्यों के सम्प्रदाय के अनुसार मतभेद हैं जैसे कुछ सूर्योदय कालीन चन्द्र नक्षत्र देखकर व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाते हैं तो कुछ पूर्वकालीन चन्द्र नक्षत्र के अनुसार व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाते हैं।*
*यह मतभेद उत्तर भारत में भी वैष्णव सम्प्रदायों में प्रचलित है। उत्तर भारत में भी कुछ सूर्योदय कालीन (उदिया) तिथि के अनुसार व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाते हैं तो विष्णु, देवी शंकर, सूर्य और गणपति पाँचो देवों को पूजने वाले स्मार्त मतावलम्बी पूर्वकालीन तिथि के अनुसार व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाते हैं।*
*सौर-चान्द्रमासों में तिथि के साथ-साथ पर्वकाल में चन्द्रमा के नक्षत्र के अनुसार देवी पूजा विधान है जैसे महाराष्ट्र में ज्येष्ठा गौरी व्रत में भाद्रपद शुक्ल षष्ठी तिथि में अनुराधा नक्षत्र में आह्वान, भाद्रपद शुक्ल सप्तमी तिथि में ज्येष्ठा नक्षत्र में पूजन, भाद्रपद शुक्ल अष्टमी तिथि में मूल नक्षत्र में विसर्जन करते हैं और बङ्गाल में नवरात्र में आश्विन शुक्ल सप्तमी तिथि में मूल नक्षत्र में सरस्वती देवी का आह्वान, आश्विन शुक्ल अष्टमी तिथि में पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में सरस्वती देवी का पूजन, आश्विन शुक्ल नवमी तिथि में उत्तराषाढ़ नक्षत्र में सरस्वती देवी को बलिदान, तथा आश्विन शुक्ल दशमी तिथि में श्रवण नक्षत्र में सरस्वती देवी का विसर्जन होता है।
इतने सारे तथ्यों को पञ्चाङ्गकार ध्यान में रखकर धर्मशास्त्रियों से चर्चा कर अपनी पञ्चाङ्ग में व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार बतलाते हैं।*

*अथर्ववेदोक्त दिन और रात के मुहूर्त तथा प्रातःकाल, मध्याह्न, मध्याह्न काल सन्ध्या काल, प्रदोषकाल, महानिशिथ काल जैसे विषयों पर प्रथक आलेख देखना चाहिए।*

*सनातन वैदिक धर्मियों के सभी व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार चूंकि सिद्धान्त ज्योतिष अर्थात एस्ट्रोनॉमी पर आधारित हैं और वेधशालाएँ भारत शासन के अधीन हैं इसलिए भारत शासन को चाहिए कि पूरे भारत वर्ष के लिए संस्कृत, हिन्दी और सांवैधानिक मान्यता प्राप्त सभी प्रादेशिक भाषाओं में अगले वर्ष के लिए ऑनलाइन पञ्चाङ्ग, ऑफलाइन पञ्चाङ्ग और पुस्तकाकार पञ्चाङ्ग छापकर जन साधारण के लिए सस्ते मुल्य पर उपलब्ध करवाए।*  जिसमें 
 *विषुव सम्पात से गणना आरम्भ कर औसत सुर्योदय समय भारतीय मानक समय 06:00 बजे  के लिए* ---* 

 *वेदिक सायन सौर मास के गते अनुसार।*

 *सायन प्रधियों (राशियों) में सूर्य चन्द्रमा एवम् सभी ग्रहों और पात (राहु-केतु) के सायन भोगांश, शर और क्रान्ति,विशुवांश आदि का ज्योतिष पत्रक (इफेमेरीज़/ अल्मनाक) की सारणी हो।* 

*वेदिक 12 मासों की आरम्भ की सायन संक्रान्तियाँ तथा सायन प्रधियों (राशियों) में सुर्य, चन्द्रमा, ग्रहों और पातों के प्रवेश का समय भिन्न रंग के गाढ़े अक्षरों में दर्शानें वाली सारणी भी प्रथक से दी जाये।*

 *वास्तविक भोगांश वाले वेदिक 27 नक्षत्रों  में सुर्य, चन्द्रमा, सभी ग्रहों एवम् पातों के प्रवेश का समयकी सारणी दी जाये।*

*(1)  सायन संक्रान्ति  गते, (2) सूर्योदय समय का वेदिक सायन सौर मास गतांश का समाप्ति समय, (3) के साथ दशाह के वासर, (4) निरयन सौर मास संक्रमण गतांश समाप्ति समय, (5) निरयन सौर मास गते, (6) सायन सौर संक्रान्ति आधारित चान्द्र मास और निरयन सौर संक्रमण आधारित चैत्र वैशाख आदि चान्द्रमास के नाम सहित शुक्लपक्ष में 01 से 120 तक चन्द्र कलाओं का समाप्ति समय जिसमें   01 से 30 तक तिथी समाप्ति का समय, स्पष्ट दिखाने के लिए बोल्ड अक्षरों में दर्शाया जाए।* 
और 
*(7) सूर्य और चन्द्रमा के सायन भोगांशादि के योग से निर्मित योग का समाप्ति समय, (8)  शुद्ध चान्द्र मास के अमावस्या गते , (9) चन्द्र दर्शन गते, (10) ग्रेगोरियन केलेण्डर के दिनांक, और (11) सप्ताह के वार दर्शक सारणी हो।*

*सामने वाले पृष्ठ पर अलग से सारणियों में*

 *वेदिक सायन संवत्सर, वेदिक उत्तरायण (पौराणिक उत्तर गोल)/ वेदिक दक्षिणायन (पौराणिक दक्षिण गोल), उत्तर तोयन (पौराणिक दक्षिणायन) / दक्षिण तोयन (पौराणिक उत्तरायण), वेदिक ऋतु / पौराणिक ऋतु , वेदिक सायन सौर मास / पौराणिक सायन सौर मास , निरयन सौर मास, सायन सौर संक्रान्तियों पर आधारित चान्द्र मास, निरयन सौर संक्रमण आधारित चैत्र वैशाख आदि चान्द्र मास का प्रारम्भ का समय सहित वास्तविक व्यतिपात और वैधृतिपात प्रारम्भ और अन्त का समय दर्शाया जाए।*
इसके अलावा *सम्प्रदायों के मतानुसार व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार दर्शाये जाए।* 

 *साथ ही प्रथक प्रथक सारणियों में भी दर्शाये जाए।* 

 *वेदिक सायन कलियुग संवत्सर प्रारम्भ समय,सायन सौर संक्रान्तियों पर आधारित चान्द्र संवत को युग संवत्सर (के नाम से) प्रारम्भ का समय सायन सौर संक्रान्तियों पर आधारित चान्द्र मासों का प्रारम्भ समय दर्शाया जाए।*

 *युधिष्ठिर  निरयन सौर संवत्सर एवम् निरयन सौर विक्रम संवत्सर का प्रारम्भ समय, निरयन सौर मास आरम्भ समय दर्शाया जाए* 

 *निरयन सौर संक्रमण आधारित चान्द्र संवत्सर शकाब्द का प्रारम्भ समय* 
 *निरयन सौर संक्रमण आधारित चैत्र वैशाख आदि चान्द्र मास के प्रारम्भ का समय दर्शाया जाए।* 

 *वास्तविक व्यतिपात वैधृतिपात प्रारम्भ और अन्त का समय दर्शाया जाए।* 
 *श्रोत्रिय (वेदिक), स्मार्त, पौराणिक, और  प्रत्यैक मत, सम्प्रदाय और पन्थ के आधार पर उन मत, सम्प्रदाय और पन्थ के नाम सहित प्रारम्भ और अन्त के समय सहित दर्शाया जाए।*

 *जिसमें अधिकांश व्रत पर्व, उत्सव और त्योहारों के संक्रान्ति वर्तमान अंश या संक्रान्ति गतांश या संक्रान्ति गते को आधार बनाया जाए।*
 *केवल महाशिवरात्रि को व्याघ तारा रातभर दिखना चाहिए इसलिए इसे नाक्षत्रीय पद्यति पर आश्रित निरयन सौर धनु मास के २०°१३'१३" वर्तमानांश या गतांश हो उस रात में दर्शाया जाए।* 
 *होली, जन्माष्टमी, दिवाली जैसे जो व्रत पर्व, उत्सव और त्योहार में ऋतु विशेष दर्शाई जाती है; लेकिन एकाष्टका, पूर्णिमा, अष्टका या अमावस्या का भी महत्व है उन व्रत पर्व, उत्सव और त्योहारों को सायन सौर संक्रान्ति आधारित चान्द्रमासों की एकाष्टका पूर्णिमा, तिथि अष्टका या अमावस्या के दिन दर्शाया जाए।*

*जहाँ सौर मास और चन्द्रमा के नक्षत्र से व्रत, पर्व, उत्सव और त्योहार मनाते हैं जैसे बङ्गाल में नवरात्र में मूल नक्षत्र से श्रवण नक्षत्र तक में सरस्वती आव्हान, पूजन, बलिदान, विसर्जन आदि और महाराष्ट्र में ज्येष्ठा आव्हान, पूजन, बलिदान, विसर्जन आदि ज्येष्ठा आदि नक्षत्र में तथा तमिलनाडु में ओणम को सौर सिंह मास में श्रवण नक्षत्र और असमान भोगांश वाले सत्ताइस नक्षत्र के आधार पर सम्बन्धित नक्षत्र के अनुसार दर्शाया जाए।*

साथ ही *महामहोपाध्याय पं. श्रीकृष्णदत्त जी शास्त्री रचित स्मार्त कर्मकलाप या  गृहस्थ कर्मकलाप का आधार लेकर वैदिक संहिताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों, शुल्ब सूत्रों, श्रोत सूत्रों, गृह्य सूत्रों, धर्म सूत्रों और पूर्व मीमांसा ग्रन्थ के आधार पर पर्वकाल सहित वैदिक कर्मकाण्ड के लिए विधि-विधान और निषेधाज्ञाओं के आधार पर वैदिक कर्मकलाप ग्रन्थ तैयार किया जाए। जिसे केवल लागत मूल्य पर प्रकाशित कर जन साधारण हेतु सुलभ करवाया जाए। और इसका ऑनलाइन और ऑफ लाइन संस्करण भी उपलब्ध कराया जाए।*

*कुछ पारिभाषिक शब्दावली और कुछ तथ्यों का ज्ञान।*
*निरयन सौर मास - अर्थात जिस निरयन राशि में सूर्य स्थित हो उसे सौर माह कहते हैं।
चन्द्रमा जिस नक्षत्र में स्थित हो उसे नक्षत्र कहते हैं।*
*चान्द्र सौर मास जिसे प्रायः चान्द्रमास ही लिख देते हैं - अमावस्या समाप्ति समय से अमावस्या समाप्ति समय तक अमान्त चान्द्रसौर मास (अंग्रेजी में लूनी-सोलर मन्थ) या चान्द्र मास या अमान्त मास कहलाता है।*
*पूर्णिमा समाप्ति समय से पूर्णिमा समाप्ति समय तक पूर्णिमान्त मास कहलाता है।*

*सूर्य से चन्द्रमा की प्रत्येक बारह अंश (डिग्री) का अन्तर तिथि कहलाती है।*
और
*दो सूर्योदय के बीच का समय वार कहलाता है। अर्थात वार सूर्योदय से बदलता है।* (न कि, ब्रह्म मुहूर्त या मध्यरात्रि से।)
*ऐसे ही सूर्योदय पश्चात छः घटि अर्थात 02 घण्टे 24 मिनट अर्थात तीन मुहूर्त तक जो तिथि रहे वह शाकल्यपादिता तिथि कहलाती है। और बहुत से धार्मिक कार्यों, व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार आदि में उक्त शाकल्यपादिता तिथि को पूरे दिन-रात वही तिथि है ऐसा मान लिया जाता है। कुछ प्रकरणों में 04 घण्टे 48 मिनट अर्थात छः मुहूर्त व्यापिनी तिथि को पूरे दिन माना जाता है।*

सोमवार, 7 सितंबर 2026

भगवान श्रीरामचन्द्र क लिए नल द्वारा तैयार किया गया राम सेतु केरल के कन्नुर से लक्ष्यद्वीप के किल्तान द्वीप तक 296 कि.मी का वास्तविक रामसेतु।

एक बार वाल्मीकि रामायण अवश्य पढ़ें।
हो सके तो भारत का नक्शा साथ में रखना।
तो पता चलेगा कि, 
1 सुग्रीव जी ने सीता खोजी दल को पाण्ड्य देश में प्रवेश करने से ही इन्कार कर रखा था। इसलिए दक्षिण दिशा में  सीता खोजी दल ने कभी तमिलनाडु में प्रवेश ही नहीं किया।
और  सुग्रीव जी श्री रामचन्द्र जी और लक्ष्मण जी को कभी तमिलनाडु लेकर कभी नहीं गये।
2 अङ्गद, जामवन्त जी, हनुमानजी आदि सहित दक्षिण में सीत खोजी दल ने विंध्याचल  से सीता जी की खोज प्रारम्भ की। और वसन्त ऋतु प्रारम्भ होने तक वे विन्ध्याचल के दक्षिण पश्चिमी सिरे तक पहूँच गए थे जहाँ से एक ओर (दक्षिण में) प्रसवण गिरी दिख रहा था, निकट ही पश्चिम में समुद्र था। जिसके पानी में भीगे हुए पङ्ख और परागकण चिपके (चकवा) पक्षी स्वयम्प्रभा की गुफा से निकल रहे थे। उस गुफा में प्रवेश कर वह दल दूसरी ओर सागर तट पर एक शिखर पर पहूँचा। अर्थात खम्बात की खाड़ी के पूर्वी तट पर भरुच पहूँचे; जहाँ उन्हें जटायु जी के भाई सम्पाति मिले और उन्होंने वहाँ से लगभग 1287 किलोमीटर (सौ योजन) दूर दक्षिण दिशा में रावण की लङ्का (लक्ष्यद्वीप के किल्तान द्वीप) में अशोक वाटिका में सीता जी को बैठे देखा। और सीता खोजी दल को बतलाया।
श्री हनुमानजी ने वहीं से सौ योजन की छलाङ्ग लगाकर समुद्र पार किया था। मतलब बीच में कोई भू भाग नहीं था, अन्यथा वे दोड़़ते हुए भी जा सकते थे।
3 लौटते समय हनुमान जी उसी मार्ग से न लौटकर सीधे कर्नाटक के हम्पी में सुग्रीव की राजधानी पहूंचे मतलब वे पश्चिम घाट पर होते हुए हम्पी पहूँचे और वानर दल खम्बात के भरुच से सीधे पश्चिम घाट होते हुए कर्नाटक के हम्पी पहूँचे।

4 शरद ऋतु के प्रारम्भ में सुग्रीव जी की सेना सहित श्री रामचन्द्र जी और लक्ष्मण जी कर्नाटक के हम्पी से पश्चिम घाट (सह्याद्रि पर्वत) पर चलते हुए कर्नाटक सीमा और केरल सीमा के मिलन स्थल सह्य और मलय पर्वत के मिलन स्थल कोझीकोड होते हुए  कन्नूर पहूँचे। जहाँ श्री रामचन्द्र जी ने इजीमाला पर्वत के महेन्द्र शिखर पर चढ़कर पश्चिम सागर (अरब सागर) देखा।
कन्नूर में ही डेरा डालकर वहीँ से पाँच दिन में  296 किलोमीटर का सेतु बना कर लक्ष्यद्वीप के किल्तान द्वीप पर पहूँचे।
पहले दिन 14 योजन सेतु बना। दुसरे दिन 6 योजन और बना कर कुल बीस योजन सेतु बना। तीसरे चौथे और पाँचवें दिन एक एक एक योजन सेतु बढ़ा कर तीसरे दिन कुल 21 योज का सेतु बना।
चौथे दिन कुल 22 योजन सेतु बना। और पाँचवे दिन कुल 23 योजन सेतु बना। अर्थात 23×12.87= 296 किलोमीटर का सेतु बना।
जिसे प्रोग्रेसिव टोटल जोड़कर सौ योजन कहा गया। 14+20+21+22+23= 100 योजन लिख दिया। जबकि उथले समुद्र में पहले दिन 14 योजन सेतु बना, दुसरे दिन सेतु 14 से 20 योजन हुआ, तीसरे दिन से गहराई बढ़ने के कारण एक-एक योजन ही बढ़ा और तीसरे दिन 20 से 21 दिन हुआ । चौथे दिन 21 से 22 योजन हुआ और पाँचवे दिन बचा हुआ सेतु एक योजन बढ़ा कर 22 से कुल 23 योजन का सेतु बना लिया।
इसी प्रकार 100 योजन विस्तार वाली लङ्का पुरी का मतलब है रावण की लङ्का का क्षेत्रफल 100 वर्ग योजन था। (अर्थात लगभग 10 योजन लम्बी और 10 योजन चौड़ी = 100 वर्ग योजन था।) अर्थात 128.7×187.7 = 16563.69 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल था।।

नासा ने केवल इतना कहा था कि, धनुषकोडी से श्रीलंका के बीच मन्नार की खाड़ी में एडम ब्रिज (सिंहल द्वीप से भारत मे आने के लिए आदम के द्वारा उपयोग किया गया सेतु) प्राकृतिक संरचना नहीं लगता है। मानव निर्मित संरचना लगती है।
आई टी सेल द्वारा प्रसारित झूठी अफवाह के कारण में गीता प्रेस ने कल्याण में एक लेख छपा था। बाद में नासा का स्पष्टीकरण प्राप्त हुआ तो सम्पादक श्री राधेश्याम खेमका जी ने खेद प्रकट कर पाठकों से क्षमा प्रार्थना की।

शनिवार, 5 सितंबर 2026

मन्त्र सिद्धि

वास्तविकता यह है कि, किसी भी देवता के किसी भी मन्त्र की सिद्धि के लिए सर्वप्रथम उस देवता के वैदिक मन्त्र दृष्टा से दीक्षा लेकर उनके आदेशानुसार अमावस्या से अमावस्या पर्यन्त या पूर्णिमा से पूर्णिमा तक कृच्छ चान्द्रायण व्रत करके अपनी व्यक्तिगत समस्त धन-सम्पदा दान करके, ग्राम/ नगर के मध्य खड़ा होकर अपने द्वारा किए गए समस्त मानसिक, वाचिक और शारीरिक अपराध अर्थात पापों को सार्वजनिक रूप से प्रकट कर स्वीकार कर क्षमा प्रार्थना करना होता है।
फिर गुरु के निर्देशानुसार किसी तपोस्थली पर बैठ कर नैष्टिक ब्रह्मचर्य पालन करते हुए नित्य पञ्च महायज्ञ करते हुए जीवन निर्वाह हेतु अत्यावश्यक केवल फल आदि सात्विक आहार लेते हुए पहले उस देवता के कमसे कम दस लाख मन्त्र जप करें या पुरुश्चरण पूर्ण कर जप किए गए मन्त संख्या का दशांश आहुति देकर अग्निहोत्र करें, फिर जप किए गए मन्त्र संख्या का शतांश तर्पण करें, फिर जप किए गए मन्त्र संख्या का सहस्त्रांश श्राद्ध करें , फिर जप किए गए मन्त्र संख्या का दश सहस्त्रांश ब्राह्मण भोजन कराकर उन्हें समुचित दक्षिणा प्रदान करें। उन्हें सौ कदम छोड़ने जाकर कमी के लिए क्षमा प्रार्थना कर आशिर्वाद लें।
उसके बाद गुरु के आदेश पर उस देवता के पौराणिक मन्त्र का निर्धारित संख्या में जप, होम, तर्पण, श्राद्ध, और ब्राह्मण भोजन करवा कर वैदिक मन्त्र जप में रह गई कमी की पूर्णता कर मन्त्र को पुष्ट करें।
फिर गुरुजनों को प्रणाम कर उनसे बीज मन्त्र सीखकर उसका जप कर देवता को प्रकट प्रणाम पूजा आदि कर उस देवता द्वारा प्रदत्त शक्ति को धारण कर लें।
इसके बाद वैदिक मन्त्र, पौराणिक मन्त्र और बीज मन्त्र का एक हजार जप रोज करता हुआ सायन सौर संक्रान्ति , निरयन सौर संक्रमण, शुक्ल पक्ष की अष्टमी, पूर्णिमा, कृष्ण पक्ष की अष्टमी और अमावस्या को वैदिक मन्त्र के साथ 108 आहुति देकर पौराणिक मन्त्र जप कर एकसौ आठ बार बीज मन्त्र पढ़कर देवता को प्रकट कर उनकी सेवा पूजा कर कृपा प्राप्त कर पुष्टि करता रहे।
जब भी सार्वजनिक हित में अत्यावश्यक हो
बीज मन्त्र का उच्चारण कर जल छिड़क कर आये सङ्कट से मुक्ति दिला सकता है।
या किसी भी धुल या तिनके आदि किसी भी वस्तु को अभिमन्त्रित कर फैंक कर शत्रु पर प्रहार कर उसे यथोचित दण्ड दे सकता है।
केवल बीज मन्त्र का जप नहीं होता है।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

शिवलिङ्ग पर मुखाकृति बनाना शैव और पाशुपत आगम के विरुद्ध है।

सारस्वत (सिन्धु घाटी की) सभ्यता के समय इराक और सीरिया से आकर बसे तान्त्रिक व्यापारियों द्वारा मोहन जोदड़ो में उनके घरों में छुपकर लिङ्ग और योनि के प्रतिक और ध्यान मुद्रा में बैठे पशुपालक (पशुपति) की प्रतिमाएँ बनाकर पूजना प्रारम्भ कर दिया था।
वैदिक लोग इनका विरोध करते थे।
फिर 
लगभग 345 ईसा पूर्व से 329 ईसापूर्व में महापद्मनन्द राजा के समय शालिग्राम शिला विष्णु लिङ्ग, जलाधारी में फिट बेलनाकार शिवलिङ्, मातृलिङ्ग बिजोरा निम्बू, बेडोल चौड़ा चिकना पत्थर का विनायक लिङ्ग, और त्रिकोणीय पत्थर का भैरव लिङ्ग तो प्रचलित होने लगे थे।
उसी समय जैनों ने चैत्य (मन्दिर) बनाकर ऋषभदेव की मूर्ति बनाकर पूजा प्रारम्भ कर दी थी।
लेकिन किसी भी लिङ्ग अर्थात चिह्न पर आँख-नाक और चेहरा बनाना प्रचलित नहीं था। सम्भवतः कुछ शैवों ने ऐसा प्रयोग किया होगा तो शैव आगम, पाशुपत आगम में इसे निषिद्ध घोषित कर दिया।
लेकिन आजकल तो उज्जैन के महाकालेश्वर मन्दिर में महाकाल ज्योतिर्लिङ्ग पर भाँग आदि से चेहरा बना कर निषेधाज्ञाओं का उलङ्घन तो किया ही; बल्कि शिवलिङ्ग पर कभी अर्धनारीश्वर तो नारायण-श्रीहरि, तो कभी विनायक की मुखाकृति बनाना प्रारम्भ कर दिया। जो आगम ग्रन्थों की आज्ञाओं का सर्वथा उलङ्घन है।
ऐसे ही इसके देख-देखी सिन्दूर पुती विनायक प्रतिमों और भैरव प्रतिमाओं पर भी चेहरा बनाना प्रारम्भ हो गया है। ये सभी आगमोक्त निषिद्ध कर्म हैं।