शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

नामकरण कैसे करें?

*नामकरण के लिए कैसे करें? कौनसी पद्यति सही है? प्राचीन संस्कृत पद्यति के आधार पर जन्माक्षर लें और नाम के अक्षरों का योगांक लें या यवन अवकहड़ा चक्र और कीरो की हिब्रू न्युमरोलॉजी  के आधार पर?*

नामकरण के लिए क्या सही ?  प्राचीन संस्कृत पद्यति? या अवकहड़ा चक्र और कीरो अंकविद्या?



जन्मनाम निर्धारण प्राचीन संस्कृत पद्यति से।

देखिये अग्निपुराण अध्याय 293 श्लोक 10 से 15 तक।
यह विधि अग्नि पुराण मन्त्र - विद्या के अन्तर्गत नक्षत्र - चक्र, राशि चक्र और सिद्धादादि मन्त्र शोधन प्रकार में दी गई है उसमे नामकरण की दृष्टि से आवश्यक संशोधन कर तैयार गई है।
जन्मलग्न के नक्षत्र चरण के अनुसार जन्मनाम/ देह नाम रखें।
नही बने तो अपवाद में दशम भाव स्पष्ट के नक्षत्र चरणानुसार कर्मनाम भी रख सकते हैं।
सुर्य के नक्षत्र चरणानुसार गुरु प्रदत्त अध्यात्मिक नाम / आत्म नाम।
तन्त्र क्रिया हेतु तान्त्रिक आचार्य प्रदत्त नाम मानस नाम जन्म कालिक चन्द्रमा के नक्षत्र चरणानुसार रखें।

प्राचीन संस्कृत पद्यति -- 

राशि /नक्षत्र चरण १ २ ३ ४  
मेष / अश्विनी अ अ अ अ मेष / भरणी आ आ आ आ मेष / कृतिका इ                  
                             १ २ ३ ४
वृष / कृतिका इ ई ई
वृष / रोहिणी उ उ ऊ ऊ
वृष / मृगशिर्ष ऋ ऋ  
                             १ २ ३ ४
मिथुन/ मृगशिर्ष ऋ ऋ
मिथुन/ आर्द्रा ए ए ऐ ऐ
मिथुन/पुनर्वसु ओ ओ औ 
                              १ २ ३ ४
कर्क / पुनर्वसु औ
कर्क / पुष्य अं अं अः अः
कर्क / आश्लेषा क का ख खा 
                               १ २ ३ ४
सिंह / मघा ग गा घ घा
सिंह/पुर्वाफाल्गुनि च चा छ छा
सिंह/उत्तराफाल्गनि ज
                                 १ २ ३ ४
कन्या/उत्तराफाल्गुनि जा झ झा
कन्या / हस्त ट टा ठ ठा
कन्या / चित्रा ड डा   
                                 १ २ ३ ४
तुला / चित्रा ढ ढा
तुला / स्वाती त ता थ था
तुला / विशाखा द दा ध    
                                  १ २ ३ ४
वृश्चिक/ विशाखा धा
वृश्चिक/ अनुराधा न न ना नृ
वृश्चिक/ ज्यैष्ठा प पा फ फा
                                   १ २ ३ ४
धनु / मुल ब बा भ भा
धनु / पुर्वाषाढ़ा म म मा मृ
धनु / उत्तराषाढ़ा य
                                    १ २ ३ ४
मकर/ उत्तराषाढ़ा य य या
मकर / श्रवण र र रा रृ
मकर / धनिष्ठा ल ल
                                     १ २ ३ ४
कुम्भ / धनिष्ठा ला लृ
कुम्भ / शतभिषा व व वा वृ
कुम्भ / पुर्वाभाद्रपद श शा ष  
                                      १ २ ३ ४
मीन / पुर्वाभाद्रपद षा
मीन / उत्तराभाद्रपद स स सा सृ
मीन / रेवती ह ह हा हृ

मात्रा लगाने की विधि / नियम --

प्रथम एवम् त्रतीय चरण में मुल स्वर हैं। द्वितीय और चतुर्थ चरण में आ से औ तक की मात्रा वाले अक्षर जन्मनाम का प्रथमाक्षर रहेगा।

जिन नक्षत्रों में प्रथम और त्रतीय चरण में अलग अलग वर्ण हो उनमें द्वितीय चरण में प्रथम चरण के वर्ण में और चतुर्थ चरण में त्रतीय चरण के वर्ण में ००ं-००' से ००ं-२०' तक ा की मात्रा लगायें। तदनुसार ही आगे भी ००ं-२१' से ००-४०' तक ि की मात्रा लगायें।००ं-४१' से ०१ं-००' तक ई की मात्रा ।०१ं-०१' से ०१ं-२०' तक ु की मात्रा।०१ं-२१' से ०१ं-४०' तक ू की मात्रा।०१ं-४१' से ०२ं-००' तक ृ की मात्रा।०२ं-०१' से ०२ं-२०' तक े की मात्रा।०२ं-२१ से ०२ं-४०' तक ै की मात्रा। ०२ं-४१' से ०३ं-००' तक ो की आत्रा । और , ०३ं-००' से ०३ं-२०' तक ौ की मात्रा लगाकर नाम का प्रथमाक्षर रखें।

जबकि, जिन नक्षत्रों में चारों चरणों में एक ही व्यञ्जन हो वहाँ प्रथम एवम् द्वितीय चरण में मुल वर्ण से नाम का प्रथमाक्षर रहेगा।जबकि, तृतीय और चतुर्थ चरण में ००ं-००' से ००ं-४०' तक ा की मात्रा लगायें। तदनुसार ही आगे भी ००ं-४१' से ०१-२०' तक ि की मात्रा लगायें। ०१ं-२१' से ०२ं-००' तक ई की मात्रा ।०२ं-०१' से ०२ं-४०' तक ु की मात्रा । ०२ं-४१' से ०३ं-२० तक ू की मात्रा।और चतुर्थ चरण में ०३ं-२१' से ०४ं-००' तक ृ की मात्रा।०४ं-०१' से ०४ं-४०' तक े की मात्रा।०४ं-४१ से ०५ं-२०' तक ै की मात्रा। ०५ं-२१ से ०६ं-००' तक ो की आत्रा । और , ०६ं-०१' से ०६ं-४०' तक ौ की मात्रा लगाकर नाम का प्रथमाक्षर रखें।

नाम की संस्कृत, / हिन्दी या मराठी वर्तनी के अक्षरों के अंक।

नाम सरनेम सहित जन्म नाम के अंको को जोड़कर प्राप्त योगफल का ईकाई अंक जन्मसमय के सायन सौर गतांश के ईकाई अंक दोनों एक ही हो।

0- अ, क, ट, प, ष, अः, क्ष, ऽ 0

1- आ, ख, ठ, फ, स, त्र , 1

 2- इ, ई, ग, ड, ब, ह , 2

 3- उ, ऊ, घ, ढ, भ, 3

 4- ऋ, ङ, ण, म, 4
  
 5- ए, च, त, य, 5

 6- ऐ, छ, थ, र, ज्ञ, 6

 7- ओ, ज, द, द, ल, ड़,ॉ 7

 8- औ, झ, ध, व, ढ़ 8
 
 9- अं, ञ, न, श, 9

  0- अ, अः, क, ट, प, ष, ऽ 0


अब नीचे देखिए।⤵️

जन्म नाम जानने का या अवकहोड़ा चक्र जिसका नाम ही विचित्र है और आधारहीन है।

राशि /नक्षत्र चरण १ २ ३ ४  
  
मेष / अश्विनि चु चे चो ला मेष / भरणी ली लू ले लो मेष / कृतिका अ    
                 
                            १ २ ३ ४

वृष / कृतिका इ उ ए
वृष / रोहिणी ओ वा वी वु
वृष / मृगशिर्ष वे वो  

                           १ २ ३ ४

मिथुन/ मृगशिर्ष का की
मिथुन/ आर्द्रा कु ङ ग छ
मिथुन/पुनर्वसु के को ह 

                          १ २ ३ ४

कर्क / पुनर्वसु ही
कर्क / पुष्य हु हे हो ड़ा 
कर्क / आश्लेषा डि डु डे डो

                               १ २ ३ ४

सिंह / मघा मा मे मी मू
सिंह/पुर्वाफाल्गुनि मो टा टी टू
सिंह/उत्तराफाल्गनि टे

                                   १ २ ३ ४

कन्या/उत्तराफाल्गुनि टो पा पी
कन्या / हस्त पु ष ण ठ
कन्या / चित्रा पे पो   

                                  १ २ ३ ४

तुला / चित्रा रा री
तुला / स्वाती रु रे रो ता
तुला / विशाखा ति तू ते  

                                 १ २ ३ ४

वृश्चिक/ विशाखा तो
वृश्चिक/ अनुराधा ना नी नू ने
वृश्चिक/ ज्यैष्ठा नो या यी यू

                                  १ २ ३ ४

धनु / मुल ये यो भा भी
धनु / पुर्वाषाढ़ा भू धा फा ढ़ा
धनु / उत्तराषाढ़ा भे

                                 १ २ ३ ४

मकर/ उत्तराषाढ़ा भो जा जी
मकर/ अभिजित जू जे जो खा
मकर / श्रवण खी खू खे खो
मकर / धनिष्ठा गा गी             

                                  १ २ ३ ४

कुम्भ / धनिष्ठा गु गे
कुम्भ / शतभिषा गो सा सी सू
कुम्भ / पुर्वाभाद्रपद से सो दा  

                                      १ २ ३ ४

मीन / पुर्वाभाद्रपद दी
मीन / उत्तराभाद्रपद दू थ झ ञ
मीन / रेवती दे दो चा ची

जो महानुभाव उक्त अवकहोड़ा/अवकहड़ा चक्र को भारतीय ऋषि मुनियों की रचना मानते हैं कृपया विचार कर बतलायें कि, कौन से भारतीय ऋषि संस्कृत नही जानते थे। जिन्हें यह नही पता था कि, 
1 संस्कृत में ङ (आर्द्रा 2),ण (हस्त 3), से कोई शब्द नही बनता। किसी शब्द का प्रथमाक्षर ङ और ण नही होता।
2 पूरे अवकहड़ा चक्र में ब वर्ण है ही नही। ब के लिए कोई राशि/ नक्षत्र/ नक्षत्र चरण मे स्थान नही है?
कृपया बतलायें कि, बबीता की राशि/ नक्षत्र/ चरण कौनसा है। वृष राशि/ रोहिणी नक्षत्र/ तृतीय चरण तो "वा" वाणी के लिये है न कि, "ब" बबीता के लिए। ऐसा क्यो?
3 कौनसा संस्कृत विद्वान ऐसी बे सिर पेर की अक्षर व्यवस्था बनायेगा? जबकि संस्कृत वर्ण प्रधान भाषा है न कि, अक्षर प्रधान।

ऐसे महान ऋषि और उनके अनुयायियों के लिए हमारे पास कोई शब्द नही है।

सम्भवतया वराहमिहिर के समय प्रचलित हुई उपर्युक्त यमन पद्यति / यवन पद्यति है इसके ही समान ही कीरो की आंग्ल / चाल्डियन / हिब्रु पद्यति (और तथाकथित भारतीय कश्मीरी पद्यति) द्वारा नामाक्षरों के अंको के योगांक वाली पद्यति है। जिसका कोई आधार सिद्ध नही होता। ⤵️

जन्म नाम कीअंग्रेजी स्पेल्लिंग के अक्षरों के अंको का योग का योग या योग कें अंकों का योगांक ग्रेगोरियन केलेण्डर की सुर्योदय वाली दिनांक एक ही हो।
जन्म नाम कीअंग्रेजी स्पेल्लिंग के अक्षरों के अंक

1 = A. I. J. Q. Y = 1
2 = B. K. R. = 2
3 = C. G. L. S. = 3
4 = D. M. T = 4
5 = E. H. N. X = 5
6 = U. V. W = 6
7 = O. Z = 7
8 = F. P = 8

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

भारत की दुरावस्था के दोषी कौन?

दोष  उन सभी लोगों को दे रहा हूँ, जिन्हें चन्द्रवंशियों और नाग वंशियों के महाभारत काल से आज तक के राजा-महाराजा, सामन्तों का जिन्होंने सामुहिक रूप से सीमा पर जाकर  विधर्मी विदेशी आक्रान्ताओ से युद्ध करने, लड़ने भिड़ने के बजाय किले में छुपकर बैठ गये।
जनता लूटती मरती रही और और ये राजा, महाराजा, और उनके सामन्त बिल में छुपकर बैठ रहे।
बाद में साका और जोहर करने के बजाय उन्हें सीमा में घुसने ही नही देने के लिए ईरान और अफगानिस्तान तथा तुर्किस्तान की सीमाओं पर डटे रहना चाहिए था। लेकिन ये अपनी जागीरों/ स्टेट में ही आपस में लड़ते मरते रहे।
और
आक्रमणकारियों की सेना में भर्ती होकर अपने देशवासियों और स्वजाति बन्धुओं (भारतियों) का संहार करने वाले सैनिकों 
और उन देशवासियों का जिन्होंने अपने खेत खलिहान रोन्दते, दुकान - मकान लूटने वाले विदेशी सैनिकों का जरा भी सामुहिक प्रतिरोध नहीं किया।

मैं उन सभी लोगों का विरोध करता हूँ जो;
इन सब लोगों को दोषी ठहराने के बजाय उनकी उक्त मुर्खतापूर्ण कार्रवाइयों का गुणगान करते फिरते हैं और दोष केवल कर्मकाण्डियों, शास्त्रियों और आचार्यों को ही देते हैं। जिनकी रक्षा का भार उक्त निकम्मे डरपोक राजाओं, सामन्तों और सैनिकों का था।

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

प्रारब्ध और पराक्रम का प्रभाव।

1 प्रकृति आयु की गणना श्वास प्रश्वास की संख्या में करतीं हैं।
इसलिए प्राणायाम साधना द्वारा और लम्बी और गहरी श्वास लेने के अभ्यास को आदत में / मसल मेमोरी में डाल देने से ही स्वस्थ्य शरीर, दीर्घायु जीवन और स्वस्थ हुआ जा सकता है।
2 अनन्त जन्मों के सञ्चित कर्मों में से इस जन्म में भोगे जा सकने योग्य कर्म फलों के समुच्चय के उदय को प्रारब्ध कहते हैं ।
3 प्रारब्ध के अनुसार निर्धारित ---
 देश ( अर्थात लोक, ग्रह, महाद्वीप, राष्ट्र, राज्य, प्रदेश, सम्भाग, जिला, तहसील, ब्लाक, ग्राम/नगर, मोहल्ला/ कॉलोनी)।
 काल ( अर्थात कल्प, मन्वन्तर, युग, संवत्सर, अयन, तोयन, ऋतु , मास, पक्ष, दिनांक, और घटि, पल, विपलात्मक समय।)
वंश, कुल, कुटुम्ब और परिवार में , मात-पिता, बड़े-छोटे भाई- बहन, भाभी - जीजा, ताऊ-काका,भुआ, ताई-काकी, फुफा, मामा-मौसी, मामी-मौसा, चचेरे, फुफेरे, ममेरे, मौसेरे भाई- बहन, भाभी - जीजा आदि के बीच जन्म होना, स्व देश, स्व कुल, स्वयम् के परिवार में 
या 
पर देव, अन्य कुल, किसी अन्य परिवार में पालन- पोषण होना, 
शारीरिक बनावट, स्वास्थ्य, सुघड़ता, स्वभाव, आदतें, रुचियाँ-अरुचियाँ, योग्यताएँ- निर्योग्यता, कौशल और पारिवारिक सुख-सुविधाएँ तथा सम्पततियाँ, और आय- व्यय रूपी परिस्थितियों के साथ बच्चे का जन्म होता है।
लेकिन 
4 इनमें विकास करना, वहीँ अटके रहना, घटाना ये सब कर्म पर निर्भर करता है।
यह सही है कि, अधिकांश लोग स्वयम् को परिस्थितियों का दास मानकर परिस्थितियों के अनुसार ही कर्म करते हैं।
किन्तु 
5 सत्वगुण प्रधान, निश्चयात्मकमिका बुद्धि वाले विवेकी पुरुष (शरीर रूपी पुर मे रहने वाला व्यक्ति) समाज में रह रहे लोगों के गुण-दोषों और उनसे उन्हें हुए लाभ हानि को देख-समझकर और गुरुजनों (वरिष्ठ जनों) द्वारा दी गई शिक्षा को अपना कर शुद्र (सेवक), से वैश्य (स्वामी), और फिर क्षत्रिय (शासक) और विप्र (वेदज्ञ), और ब्राह्मण (वेदों को आत्मसात कर आत्मज्ञानी) हो जाता है।
लेकिन 
6 रजोगुण प्रधान आधि-व्याधि, स्त्यान, प्रमाद, आलस्य, संशय, भ्रम, अवरति आदि विक्षेपों से विक्षिप्त और आधिदैविक, अधिभौतिक और आध्यात्मिक दुखों और दौर्मनस्य के कारण पर्याप्त पराक्रम न करने के कारण कष्ट भोगता हुआ, कुछ सुधार करके जैसे-तैसे जी लेता है।

7 तमोगुणी अविवेकी पुरुष तो स्वयम् में केवल गुण ही देख पाता है, बतलाने पर भी दोष नहीं मानता तो सुधार करने का प्रश्न ही नहीं होता इसलिए परिस्थितियों और दुसरों को दोष देकर
आधि-व्याधि, स्त्यान, प्रमाद, आलस्य, संशय, भ्रम, अवरति आदि विक्षेपों से विक्षिप्त और आधिदैविक, अधिभौतिक और आध्यात्मिक दुखों और दौर्मनस्य को अनिवार्य (जिना निवारण नहीं हो सकता ऐसा) मानकर सदा कष्टित, पीड़ित और दुःखी रहता है । फिर भी नहीं सुधरता है और जीवन बर्बाद कर लेता है।