एक बार वाल्मीकि रामायण अवश्य पढ़ें।
हो सके तो भारत का नक्शा साथ में रखना।
तो पता चलेगा कि,
1 सुग्रीव जी ने सीता खोजी दल को पाण्ड्य देश में प्रवेश करने से ही इन्कार कर रखा था। इसलिए दक्षिण दिशा में सीता खोजी दल ने कभी तमिलनाडु में प्रवेश ही नहीं किया।
और सुग्रीव जी श्री रामचन्द्र जी और लक्ष्मण जी को कभी तमिलनाडु लेकर कभी नहीं गये।
2 अङ्गद, जामवन्त जी, हनुमानजी आदि सहित दक्षिण में सीत खोजी दल ने विंध्याचल से सीता जी की खोज प्रारम्भ की। और वसन्त ऋतु प्रारम्भ होने तक वे विन्ध्याचल के दक्षिण पश्चिमी सिरे तक पहूँच गए थे जहाँ से एक ओर (दक्षिण में) प्रसवण गिरी दिख रहा था, निकट ही पश्चिम में समुद्र था। जिसके पानी में भीगे हुए पङ्ख और परागकण चिपके (चकवा) पक्षी स्वयम्प्रभा की गुफा से निकल रहे थे। उस गुफा में प्रवेश कर वह दल दूसरी ओर सागर तट पर एक शिखर पर पहूँचा। अर्थात खम्बात की खाड़ी के पूर्वी तट पर भरुच पहूँचे; जहाँ उन्हें जटायु जी के भाई सम्पाति मिले और उन्होंने वहाँ से लगभग 1287 किलोमीटर (सौ योजन) दूर दक्षिण दिशा में रावण की लङ्का (लक्ष्यद्वीप के किल्तान द्वीप) में अशोक वाटिका में सीता जी को बैठे देखा। और सीता खोजी दल को बतलाया।
श्री हनुमानजी ने वहीं से सौ योजन की छलाङ्ग लगाकर समुद्र पार किया था। मतलब बीच में कोई भू भाग नहीं था, अन्यथा वे दोड़़ते हुए भी जा सकते थे।
3 लौटते समय हनुमान जी उसी मार्ग से न लौटकर सीधे कर्नाटक के हम्पी में सुग्रीव की राजधानी पहूंचे मतलब वे पश्चिम घाट पर होते हुए हम्पी पहूँचे और वानर दल खम्बात के भरुच से सीधे पश्चिम घाट होते हुए कर्नाटक के हम्पी पहूँचे।
4 शरद ऋतु के प्रारम्भ में सुग्रीव जी की सेना सहित श्री रामचन्द्र जी और लक्ष्मण जी कर्नाटक के हम्पी से पश्चिम घाट (सह्याद्रि पर्वत) पर चलते हुए कर्नाटक सीमा और केरल सीमा के मिलन स्थल सह्य और मलय पर्वत के मिलन स्थल कोझीकोड होते हुए कन्नूर पहूँचे। जहाँ श्री रामचन्द्र जी ने इजीमाला पर्वत के महेन्द्र शिखर पर चढ़कर पश्चिम सागर (अरब सागर) देखा।
कन्नूर में ही डेरा डालकर वहीँ से पाँच दिन में 296 किलोमीटर का सेतु बना कर लक्ष्यद्वीप के किल्तान द्वीप पर पहूँचे।
पहले दिन 14 योजन सेतु बना। दुसरे दिन 6 योजन और बना कर कुल बीस योजन सेतु बना। तीसरे चौथे और पाँचवें दिन एक एक एक योजन सेतु बढ़ा कर तीसरे दिन कुल 21 योज का सेतु बना।
चौथे दिन कुल 22 योजन सेतु बना। और पाँचवे दिन कुल 23 योजन सेतु बना। अर्थात 23×12.87= 296 किलोमीटर का सेतु बना।
जिसे प्रोग्रेसिव टोटल जोड़कर सौ योजन कहा गया। 14+20+21+22+23= 100 योजन लिख दिया। जबकि उथले समुद्र में पहले दिन 14 योजन सेतु बना, दुसरे दिन सेतु 14 से 20 योजन हुआ, तीसरे दिन से गहराई बढ़ने के कारण एक-एक योजन ही बढ़ा और तीसरे दिन 20 से 21 दिन हुआ । चौथे दिन 21 से 22 योजन हुआ और पाँचवे दिन बचा हुआ सेतु एक योजन बढ़ा कर 22 से कुल 23 योजन का सेतु बना लिया।
इसी प्रकार 100 योजन विस्तार वाली लङ्का पुरी का मतलब है रावण की लङ्का का क्षेत्रफल 100 वर्ग योजन था। (अर्थात लगभग 10 योजन लम्बी और 10 योजन चौड़ी = 100 वर्ग योजन था।) अर्थात 128.7×187.7 = 16563.69 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल था।।
नासा ने केवल इतना कहा था कि, धनुषकोडी से श्रीलंका के बीच मन्नार की खाड़ी में एडम ब्रिज (सिंहल द्वीप से भारत मे आने के लिए आदम के द्वारा उपयोग किया गया सेतु) प्राकृतिक संरचना नहीं लगता है। मानव निर्मित संरचना लगती है।
आई टी सेल द्वारा प्रसारित झूठी अफवाह के कारण में गीता प्रेस ने कल्याण में एक लेख छपा था। बाद में नासा का स्पष्टीकरण प्राप्त हुआ तो सम्पादक श्री राधेश्याम खेमका जी ने खेद प्रकट कर पाठकों से क्षमा प्रार्थना की।
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