शुक्रवार, 14 नवंबर 2025

अष्टमी, एकादशी, पूर्णिमा और अमावस्या आदि पर व्रत क्यों रखते हैं?

वास्तविकता यह है कि, दोनों अष्टमी तिथि (अर्ध चन्द्रमा) के समय भूमि के केन्द्र पर सूर्य और चन्द्रमा 90° का कोण बनाते हैं।
शुक्ल पक्ष की दशमी समाप्ति और एकादशी प्रारम्भ के समय सूर्य और चन्द्रमा 120° का कोण बनाते हैं। यही स्थिति कृष्ण पक्ष में पञ्चमी तिथि समाप्ति पर बनती है) लेकिन कृष्ण पक्ष की एकादशी को 60° या 300° का कोण बनता है।
इसलिए नारद पुराण में शुक्ल पक्ष की एकादशी को अधिक महत्व दिया है। और एकभक्त- एकासना (एक बार ही बिना आसन से उठे भोजन करना।) करने को लिखा है।
 इसी प्रकार पूर्णिमा तिथि समाप्ति पर सूर्य और चन्द्रमा 180° का सरल कोण बनाते हैं।और
अमावस्या तिथि समाप्ति पर 000° का कोण बनाते हैं।
इसलिए अर्ध चन्द्र के समय , शुक्ल पक्ष की एकादशी प्रारम्भ के समय और कृष्ण पक्ष की पञ्चमी तिथि समाप्ति के समय तथा पूर्णिमा समाप्ति के समय सूर्य और चन्द्रमा के बल अलग-अलग दिशाओं में खींचते हैं। और अमावस्या समाप्ति के समय सूर्य और चन्द्रमा दोनों का बल एक ही दिशा में खींचता है।
भौतिकी के बल समानान्तर चतुर्भुज के नियम आदि के अनुसार इस खींच-तान का प्रभाव भूमि के सागरों पर पड़ता है जिससे ज्वार-भाटा उत्पन्न होते हैं।
परिणाम स्वरूप भूमि की घूर्णन गति तथा परिभ्रमण पर भी पड़ता है।
इन सब का प्रभाव मानव मन पर भी पड़ता है, जिसे लुनेटिक लोगों पर स्पष्ट देखा जा सकता है।
इस कारण पाचनशक्ति कमजोर हो जाती है, चित्त भ्रम होते है, इसलिए आपराधिक मानसिकता उत्पन्न होती है।
इनसे बचाव हेतु, लङ्घन (भूखे रहना) और आराधना-उपासना में दिन व्यतीत करना, जागरण (अलर्ट रहना) आदि के निर्देश धर्मशास्त्रों में दिये गए हैं।

क्या जनन अशोच, मरण अशोच में एकादशी व्रत का पारण हो सकता है?

व्रत पालन मतलब नियम पालन।
जब जिसके माता-पिता का देहान्त होता है वह पुत्र तेरह दिनों तक विष्णु पूजा करता है जिसे घर के बाहर रखे पापा विष्णु की पूजा दस दिन करना कहते हैं, उसे जल चढ़ाना मतलब स्नान करवाना, स्वयम् के द्वारा पकाये भोजन का नैवेद्य अर्पित करना, धूप देना मतलब अग्निहोत्र करना, गरुड़ पुराण सुनना मतलब शास्त्र श्रवण करना आदि सभी कर्म करना होता है तो, नित्य कर्म (वैदिक धर्म-कर्म मतलब पञ्च महायज्ञ) का निषेध कैसे हो सकता है? 
हाँ, अवैदिक कर्म - तन्त्रोक्त कर्म, यथा - मूर्ति पूजन अवश्य निषेध है।

मृतक के निमित्त एकादशी व्रत का संकल्प लिया जाता है अन्य किसी व्रत का संकल्प नहीं दिलाया जाता, वही एकादशी व्रत कैसे छोड़ा जा सकता है?

एकादशी व्रत का सामान्य नियम यह है कि, एकादशी के पूर्व दिन सूर्यास्त पश्चात भोजन त्याग कर पारण समय में पारण करने पर ही एकादशी व्रत पूर्ण होता है। अन्यथा व्रत भङ्ग माना जाता है। यह नियम सभी व्रतों में सामान्य (कामन) है।
तो, 
सूतक में भी निष्काम व्रत पालन अवश्य ही करना चाहिए यह तो समझ आता है लेकिन सूतक में पारण नहीं होता यह उल्टा ज्ञान है।

कभी-कभी एकादशी व्रत का पारण हरिवासर समाप्त होने के बाद भी सीधे अपराह्न काल में ही क्यों बतलाया जाता है?

एक सामान्य जिज्ञासा होती है कि,
*कभी-कभी द्वादशी तिथि का एक चौथाई भाग अर्थात हरिवासर समाप्त होने के भी बाद भी पारण क्यों नहीं कर सकते?
उसका कारण यह है कि,

 *पारण (ब्रेक फास्ट) या तो प्रातः काल में (नाश्ते के समय) होता है या फिर भोजन के समय अपराह्न काल में होता है।* 
क्योंकि भोजन का समय अपराह्न काल को ही माना गया है। 
*क्योंकि वैदिक काल में लोग पूरे अहोरात्र में प्रायः अपराह्न काल में एक बार ही भोजन करते थे।*
मतलब 
*आज की भाषा में समझें तो प्रात काल में ब्रेक फास्ट (नाश्ता) और अपराह्न काल में लञ्च (भोजन) करते थे। डीनर (रात्रि भोज) निषिद्ध है। इसलिए सूर्यास्त के बाद खाने का प्रश्न ही नहीं।* 

सूर्योदय के पहले ब्रह्म मुहूर्त में सन्ध्या होती है, सावित्री (गायत्री) मन्त्र जप पूर्ण कर उदयिमान सूर्य को अर्घ्य देकर अतिथि यज्ञ और दान करके व्रत का पारण होता है।

मध्याह्न पूर्व भी सन्ध्या करके गायत्री मन्त्र जप करके ठीक मध्याह्न में सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
सायाह्न में भी सन्ध्या करके, गायत्री मन्त्र जप पूर्ण कर के सूर्यास्त समय अस्त हो रहे सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद वैदिक कर्म नहीं किए जाते हैं।
इस कारण गोधुलि लग्न में पाणी ग्रहण संस्कार भी उचित नहीं है। क्योंकि इस समय यदि पाणी ग्रहण संस्कार किया जाएगा तो सायाह्न सन्ध्या छूट जाएगी।

वास्तव में महाभारत युद्ध के बाद पौराणिक काल में सभी विद्वानों और धर्मी राजाओं की मृत्यु हो जाने के कारण गुरुकुल समाप्त होने लगे थे। इसलिए ज्योतिष में वेध लेना बन्द हो गया। सिद्धान्त ज्योतिष गणिताध्याय और गोलाध्याय (खगोल) के जानकार समाप्त होने लगे। इसलिए तिथियों और करण तथा असमान विस्तार वाले सत्ताइस नक्षत्रों का ठीक-ठीक प्रारम्भ और समाप्ति समय ज्ञात नहीं हो पाता था। इसलिए लगभग एक चौथाई द्वादशी तिथि (लगभग 06 घण्टे) की त्रुटि सम्भावित मान कर इसे हरिवासर मान कर इस अवधि में व्रत का पारण निषेध किया गया था। लेकिन अब पुनः एस्ट्रोनॉमी का अच्छा विकास हो गया है। ग्रह गणित और तिथि, करण और नक्षत्रों के प्रारम्भ और समाप्ति का समय ठीक-ठीक गणना होने लगी है इसलिए दशमी भेद और हरिवासर में पारण नहीं करना के नियम पालन अनावश्यक हो गया है।

उदाहरण देखिए ---

दिनांक 16 नवम्बर 2025 रविवार को इन्दौर में 

*प्रातः काल सूर्योदय 06:41 से 08:53 बजे तक।* फिर 

सङ्गव काल 08:53 से 11:05 तक । फिर 

मध्याह्न काल 11:05 से दोपहर 01: 17 बजे तक । जिसमें मध्याह्न सन्ध्या होती है। और इसके बाद भोजन का समय

*अपराह्न काल दोपहर 01:17 बजे से दोपहर 03:29 बजे तक रहेगा।*

तदुपरान्त  
सायाह्न काल दोपहर 03:29 से 05:41 सूर्यास्त तक। रहेगा। जिसमें पुनः सन्ध्या होती है।

गुरुवार, 13 नवंबर 2025

सायन गणना, नक्षत्रिय पद्धति, निरयन और सावन गणना सभी दर्शाने वाली पञ्चाङ्ग/ केलेण्डर ही उचित हैं।

श्री रामचन्द्र जी के जन्म के समय के सम शितोष्ण ऋतु का वर्णन, ऋषि पञ्चमी पर अपामार्ग के पानी से स्नान करना, बालध ककड़ी खाना, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन यमुना नदी में बाढ़ आने का वर्णन, नवरात्र  और शरद पूर्णिमा शब्दों में ही ऋतु का उल्लेख होना, पञ्च दिवसीय दीपावली उत्सव में पूजन सामग्री में ज्वार के भुट्टे और गन्ने, सिंघाड़ा आदि का प्रयोग (नव धान्येष्टि), मकर संक्रान्ति पर तिल-गुड़ का प्रयोग, शिवरात्रि पर शिवजी को बदरीफल (बेर) अर्पित करना, होली पर गेंहू की बालियों का होला सेकना, (नव सस्येष्टि) तथा अमान्त चैत्र कृष्ण एकादशी वरूथिनी एकादशी को खरबुजा का फलाहार।
अमान्त वैशाख कृष्ण एकादशी अपरा एकादशी को खरबुजा ( या ककड़ी) का फलाहार।
अमान्त ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी कमला एकादशी को दाख का फलाहार।
ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी निर्जला एकादशी को आम का फलाहार।
श्रावण शुक्ल एकादशी पवित्रा एकादशी को सिंघाड़ा का फलाहार।
 भाद्रपद शुक्ल एकादशी जलझूलनी एकादशी को बालन ककड़ी का फलाहार।
आश्विन शुक्ल एकादशी पापाङ्कुशा एकादशी को फुट काचरी का फलाहार।
अमान्त आश्विन शुक्ल एकादशी पापाङ्कुशा एकादशी को केला का फलाहार।
अमान्त कार्तिक शुक्ल एकादशी सफला एकादशी को तिल शकर का फलाहार।
माघ शुक्ल एकादशी जया एकादशी को गन्ने का रस का फलाहार।
फाल्गुन शुक्ल एकादशी आमलकी एकादशी को आँवला का फलाहार।
संवत्सर की प्रथम ऋतु वसन्त ऋतु होना, शरद ऋतु में ही शरद पूर्णिमा हो सकती है, सायन तुला संक्रान्ति का सम्बन्ध देवताओं की रात्रि प्रारम्भ होने से नवरात्र कहलाना,
ये सब बातें व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहारों का ऋतु आधारित होना प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है।
इसलिए मधु-माधव आदि सायन सौर मासों की संक्रान्तियों पर आधारित चान्द्र मासों में ही उक्त व्रत, पर्व उत्सव और त्यौहार मनाए जाना चाहिए।
सायन मतावलम्बियों के पक्ष में इतने सारे प्रमाण है।
लेकिन रामनवमी पर पुनर्वसु नक्षत्र पर चन्द्रमा होना, श्रीरामचन्द्र जी का राज्याभिषेक चैत्र शुक्ल पक्ष में पूष्य नक्षत्र पर चन्द्रमा होना, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को अमान्त श्रावण कृष्ण अष्टमी को चन्द्रमा रोहिणी नक्षत्र पर होना, भाद्रपद शुक्ल द्वादशी वामन जयन्ती को श्रवण नक्षत्र पर चन्द्रमा होना, बङ्गाल में नवरात्र में सरस्वती आह्वान, पूजन, बलिदान और विसर्जन में चन्द्रमा के नक्षत्र का ही महत्व होना, शिवरात्रि के दिन बहेलिए द्वारा सारी रात मृगशीर्ष नक्षत्र के तारे और लुब्धक (व्याघ) को देखना तथा पश्चिम और मध्य भारत को छोड़कर शेष उत्तर भारत, पूर्वी भारत, बाङ्ग्ला देश और दक्षिण भारत में निरयन सौर संक्रमण से प्रारम्भ होने वाले मेष-वृषभादि मास, वैशाखी, विषु, माघ बिहू आदि पर्व, तथा मेष-वृषभादि मासों में चन्द्रमा के नक्षत्र के अनुसार ही रामनवमी, श्रीकृष्ण जन्मोत्सव और वामन जयन्ती ओणम पर्व वैदिक काल में सायन सौर मधु-माधव आदि मासों में चन्द्रमा किसी विशेष नक्षत्र के साथ होने के आधार पर ही व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार तथा शुभ कार्यारम्भ और पूर्णाहुति करने का स्मरण करवाते हैं।
ये सभी तथ्य नक्षत्रिय पद्धति के पक्ष में तर्क हैं।
वर्षान्त में  वर्षान्त के पाँच दिन पहले दशा पूजन सावन वर्ष को सायन सौर वर्ष से समायोजित करने का उपक्रम है। ठीक इसी प्रकार दीपावली से लाभ पञ्चमी तक गुजरात में अवकाश रहना भी पारसियों के समान सावन वर्ष को सायन सौर वर्ष से समायोजित करने की व्यवस्था है।
इस लिए आदर्श पञ्चाङ्ग वहीं जो सायन संक्रान्ति आधारित सौर और सौर चान्द्र मास, निरयन संक्रमण और निरयन संक्रमण आधारित सौर मास सौर चान्द्र मासों और सावन वर्ष-मासों तथा दशाह के वासर इन तीनों को दर्शाता हो।

बुधवार, 12 नवंबर 2025

वेदों में लिङ्ग पूजक शिश्नेदेवाः से रक्षा हेतु महर्षि वशिष्ठ जी द्वारा इन्द्र से प्रार्थना।

*ऋग्वेद, मंडल 07, सूक्त 21, मंत्र 05 का अर्थ और व्याख्या*

प्रसङ्ग और सन्दर्भ ---
*ऋग्वेद सप्तम मण्डल/ सूक्त 21 मन्त्र 05 में कहा है कि,*
मन्त्र ---
*न यातव इन्द्र जुजुवुर्ना न वन्दना शविष्ठ वेद्यभि।न श्रीरर्द्धयो विष्णुनस्य जन्तोर्मा शिश्नदेवाः अपि गुऋतम् नः।।*

 *ऋषि वसिष्ठ इंद्र से शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधान अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि शत्रुओं से सुरक्षा की प्रार्थना कर रहे हैं।*

मन्त्र का अर्थ ---

*"हे बलवान इंद्र!* 
(दुष्ट, कृतघ्न, अधार्मिक, विलासी) *शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधानों * अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि) शत्रुओं से हमारी रक्षा कीजिए।*
*लिङ्गपूजक असूर लोग हमें परेशान न कर सकें; उन पर हमारी दृष्टि पड़ने, उनकी छाया पड़ने, उनके स्पर्श दोष से, हमारी समृद्धि को आधी न हो पाए। हे सर्वव्यापी विष्णु देव! उनसे हमारी रक्षा कीजिए।*

शब्दार्थ:
1. *यातवः* – यातुधान अर्थात (दुष्ट,पीड़क,शत्रु) *असुर दैत्य, दानव, राक्षस।* 
2 *शविष्ठ* – *अत्यंत बलवान* , (इन्द्र का विशेषण)।
 3 *वेद्यभिः* – *ज्ञानी, विद्वान*,(इन्द्र का विशेषण)।
4 *इन्द्र* – *देवताओं के राजा* (शक्ति के प्रतीक) ।
5. *न जुजुवुः* – *तंग न करें, पीड़ित न करें* ।
6. *न वन्दना* – *नमन न करने वाले, कृतघ्न* ।

7. *श्रीः* – *समृद्धि, सौभाग्य* ।
8. *अर्द्धयः* – *आधा* , अधूरा।
9. *विष्णुनस्य* – व्यापक, *सर्वव्यापी विष्णु* ।
10. *जन्तोः* – *प्राणियों के।* 
11. *शिश्नदेवाः* – (विलासी, कामुक, अधर्मी) *शिश्न और भग रूप में शिवलिङ्ग पूजक* ।
12. *अपि गुऋतम् नः* – *हमसे दूर करे, बचाएं या हमें दूर रखें* ।

मंगलवार, 11 नवंबर 2025

वर्तमान प्रचलित मुहूर्त शास्त्र में मेरी श्रद्धा क्यों नहीं है?

वर्तमान प्रचलित मुहूर्त शास्त्र में मेरी श्रद्धा क्यों नहीं है? 

क्योंकि मेरी श्रद्धा, आस्था और विश्वास केवल वेदों में है।
वैदिक मत, वैदिक वर्णाश्रम धर्म, वैदिक दर्शन, वैदिक कर्म या वैदिक क्रियाओं अर्थात वैदिक कर्मकाण्ड और वैदिक संस्कृति को ही सनातन धर्म मानता हूँ।
जो भी उसके विपरीत और वेद विरुद्ध तन्त्र है उसमें मुझे तनिक मात्र भी श्रद्धा, आस्था और विश्वास नहीं है।

लेकिन गणित, होरा शास्त्र अर्थात फलित ज्योतिष, मुहूर्त, वास्तु शास्त्र, सामुद्रिक शास्त्र, शकुन शास्त्र और धर्म शास्त्र का अध्यन करने और परम्परागत शिक्षा प्राप्त करने के कारण लोग मुझे ज्योतिषी समझते हैं और तत्सम्बन्धी प्रश्न पूछते हैं, राय लेते हैं, मुहूर्त पुछते हैं तो, गुरुदेव का ऋण समझकर मुझे परम्परागत जानकारी के आधार पर उत्तर देना पड़ता है। और बतलाता भी हूँ, लेकिन साथ में वैदिक मत भी बतला देता हूँ।

वर्तमान प्रचलित मुहूर्त शास्त्र में मेरी श्रद्धा क्यों नहीं है? का उत्तर ---

उत्तरायण दक्षिणायन में तीन महीने का तीन महीने आगे खिसका दिया और तीन महीने पहले ही उत्तरायण ले आये। ऋतुओं को एक महीने पहले से मान लिया। इस प्रकार मध्य भारत के मौसम से अनुकूल कर दिया।
फिर भी सन्तोष नहीं हुआ तो शुक्ल पक्ष से प्रारम्भ होने वाले चान्द्र मासों को पन्द्रह दिन पहले कृष्ण पक्ष से प्रारम्भ होना शुरू कर दिया।
वेदों में केवल दोनों प्रतिपदा, चन्द्र दर्शन (द्वितीया समझ सकते हैं), अर्ध चन्द्र (अष्टमी समझ सकते हैं), पूर्ण चन्द्र (पूर्णिमा समझ सकते हैं) और बिना चन्द्रमा वाली रात्रि (अमावस्या समझ सकते हैं) के अलावा किसी तिथि का उल्लेख नहीं है।
वैदिक काल में नक्षत्र असमान विस्तार वाले, चित्रा के समान एक तारा का ००°२३'३१" विस्तार वाले नक्षत्र, कृतिका जैसे सात तारों वाले नक्षत्र, तो शतभिषा जैसे सौ या वर्तमान में बचे अठासी तारों वाले नक्षत्र तो चित्रा के समान एक तारा का एक अंश से भी कम विस्तार वाले नक्षत्र और
स्वाति जैसे चौबीस अंशों वाले नक्षत्र होते थे। जबकि वर्तमान में सभी नक्षत्रों का एक समान भोग 13°20' मान लिया गया है।
ऐसे ही पश्चिम टर्की, मिश्र, और बेबिलोनिया में पशुओं की आकृति वाली असमान विस्तार वाली राशियाँ मानी जाती थी। वर्तमान एस्ट्रोनॉमी में भी यही मानते हैं। जबकि, गर्गाचार्य और आचार्य वराहमिहिर के समय जब राशियाँ और वार की नई अवधारणा अपनाई गई तो, तीस-तीस अंशों की समान विस्तार वाली राशियाँ बना दी गई। जबकि वेदों में क्रान्तिवृत के बारह समान तीस-तीस अंशों की समान विस्तार वाले सायन प्रधि मधु-माधव आदि मासों की गणना के लिए मानी जाती थी। लेकिन न उनका कोई स्वतन्त्र नाम नहीं दिया और न कोई आकृति बतलाई। क्योंकि सायन प्रधि (राशि) का कोई निश्चित क्षेत्र ही नहीं रहता, नक्षत्रों से सायन प्रधि का कोई सम्बन्ध ही नहीं रहता है, तो आकृति तो हो ही नहीं सकती।
वेदों में सिद्धान्त (गणित) ज्योतिष के वैधृति पात और व्यतिपात अर्थात सूर्य और चन्द्रमा के अंशों का योग 180° होने और 360° होने को छोड़कर किसी अन्य योग का उल्लेख नहीं है। जबकि वर्तमान में सत्ताईस योग प्रचलित हैं। न भद्रा (विष्टि करण) का उल्लेख है। जबकि वर्तमान में *विष्टि करण को भद्रा नाम देकर भद्रा को अशुभ मानते हैं। आश्चर्य यह है कि, भद्र शब्द आ अर्थ श्रेष्ठ होता है। तो भद्रा निष्कृष्ट कैसे हो गई।*
कुछ महत्वपूर्ण तथ्य स प्रमाण नीचे दिए जा रहे हैं। जिससे प्रमाणित होता है कि वर्तमान में प्रचलित अयन, ऋतु, मास सब गलत हैं।⤵️
‌*संवत्सर व्यवस्था -* 
उत्तरायण की तीन ऋतु - वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा। - 
*देवा ऋतवः वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु उत्तरायण में होती है।* 
शतपथ ब्राह्मण 2/1/3 तथा तै.सं. 6/5/3 तथा नारायण उपनिषद अनु. 80
*उदगयन शब्द और देवयान / देवलोक शब्द स्पष्ट आये हैं।* 
मैत्रायण्युपनिषद में उत्तरायण और नारायण उपनिषद अनु 80
(भा. ज्यो.पृष्ठ 44 एवम् 45)

*वसन्त को प्रथम ऋतु और संवत्सर का शिर, ग्रीष्म को दक्षिण पक्ष (पंख) और शरद को उत्तर पक्ष कहा है।* 
तै.ब्रा. 1/1/2/6 एवम् 7 एवम् 3/10/4/1
*हेमन्त को संवत्सर का मध्य और वर्षा को पुच्छ कहा है।*
तै.ब्रा. 3/10/4/1
(भा. ज्यो. पृष्ठ 47)
उक्त आधार पर प्रमाणित होता है कि, *वसन्त सम्पात से शरद सम्पात तक वैदिक उत्तरायण होता था। और शरद सम्पात से वसन्त सम्पात तक वैदिक दक्षिणायन होता था।*  वैदिक काल के उत्तरायण में वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु होती थी। और दक्षिणायन में शरद, हेमन्त और शिशिर ऋतु होती थी।
तदनुसार संवत्सर का प्रारम्भ वसन्त सम्पात, उत्तरायण, वसन्त ऋतु और मधुमास से होता था।

*तीन मौसम / ऋतु के नाम आये हैं।* 
अग्निर्ऋतुः सूर्य ऋतुश्चन्द्रमा ऋतु।
तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/10/1
(भा.ज्यो पृष्ठ 49)
इससे प्रमाणित होता है कि, वर्तमान के ही समान  *वैदिक युग में भी तीन मौसम मुख्य रहते थे  गर्मी, वर्षा और ठण्ड।*
वसन्त सम्पात अर्थात सायन मेष संक्रान्ति। जो प्रायः 20/21 मार्च को होती है। और शरद सम्पात अर्थात सायन तुला संक्रान्ति जो प्रायः 22/23 सितम्बर को होती है।
अतः  *वैदिक उत्तरायण 21 मार्च से 22 सितम्बर तक होता है। इसे उत्तरगोल भी कहते हैं।*
और  *वैदिक दक्षिणायन 23 सितम्बर से 19/20 मार्च तक होता है। इसे दक्षिण गोल भी कहते हैं।*

उत्तर परम क्रान्ति अर्थात सायन कर्क संक्रान्ति प्रायः 22/ 23 जून को होती है। और दक्षिण परम क्रान्ति सायन मकर संक्रान्ति प्रायः 22 दिसम्बर को होती है।
*उत्तर परम क्रान्ति अर्थात सायन कर्क संक्रान्ति 23 जून से दक्षिण परम क्रान्ति सायन मकर संक्रान्ति 21 दिसम्बर तक वैदिक उत्तर तोयन कहते हैं। पौराणिक काल में इसे दक्षिणायन कहा जाने लगा।*
*दक्षिण परम क्रान्ति सायन मकर संक्रान्ति 22 दिसम्बर से उत्तर परम क्रान्ति अर्थात सायन कर्क संक्रान्ति 22 जून तक वैदिक दक्षिण तोयन होता है। पौराणिक काल में इसे उत्तरायण कहा जाने लगा।*
इसलिए

*फाल्गुन पूर्णिमा/ पूर्वाफाल्गुनी के दिन को संवत्सर का अन्तिम दिन कहा है। और उसके अगले दिन उत्तराफाल्गुनी को संवतरारम्भ कहा है।*
अर्थात उस समय वैदिक असमान विस्तार वाले नक्षत्र - पूर्वाफाल्गुनी और उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र की सन्धि पर पूर्णिमा का चन्द्रमा होगा तो इससे १८०° पर स्थित नक्षत्र पर सूर्य होगा।
तैत्तिरीय संहिता 7/4/8 में तथा पृष्ठ 51 पर सामवेद के ताण्यब्राह्मण 5/9
 तैत्तिरीय ब्राह्मण 7/4/8
(भा.ज्यो.पृष्ठ 50)

*अधिक मास वर्षान्त में जुड़ता था।*
 वाजसनैय संहिता 22/30 एवम् 31 
ऐतरेय ब्राह्मण 3/1 और 17 और तैत्तिरीय ब्राह्मण 3/8/3
(भा. ज्यो. पृष्ठ 40 एवम् 41)
अर्थात वर्तमान में निरयन सौर वर्ष या सायन सौर वर्ष से चान्द्र वर्ष को बराबर करने के लिए निर्धारित  *१९ वर्ष, १२२ वर्ष और १४१ वर्ष वाला चक्र प्रचलित नहीं था।*
*महाभारत काल में हर अट्ठावन माह बाद उनसठवाँ और साठवाँ माह अधिक मास करते थे। ऐसे ही वैदिक काल में वर्षान्त पश्चात तेरहवाँ माह अधिक मास करते थे। सम्भवतः कितने वर्ष पश्चात करते थे यह स्पष्ट नहीं है।*

इससे सिद्ध होता है कि, सामान्यतः  *अमान्त मास भी प्रचलित थे लेकिन संवत्सर आरम्भ के लिए सायन मेष संक्रान्ति ही मुख्य थी। उस दिन पड़ने वाले चन्द्रमा जिस नक्षत्र के साथ होता था उस नक्षत्र से भी इंगित करते थे।* 

*शुक्ल पक्ष और कृष्णपक्ष को अर्धमास कहा है।* 
*अर्धमासों के नाम पवित्रादि हैं।* 
अथ यदाह । पवित्रन् पवयिष्यन्त्सहस्वान्त्सहीयानरुणोरणरजा इति। एष एव तत्। ए ह्येव तेर्धमासाः एषः मासाः ।
तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/6/3 ।
(भा. ज्यो.पृष्ठ 48)
इससे प्रमाणित होता है कि, *छब्बीस पक्षों के भी नामकरण किया गया था।*

*तिथियाँ प्रचलित नहीं थी। केवल उदृष्टका (शुक्ल प्रतिपदा), एकाष्टका (शुक्लाष्टमी), पूर्णिमा, व्यष्टका (कृष्ण प्रतिपदा) और अष्टका (कृष्णाष्टमी) और अमावस्या तिथि का ही उल्लेख है।*

 *कृष्णपक्ष की प्रतिपदा को व्यष्टका और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को उदृष्ट कहा है।* 
तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/8/2 तथा ताण्ड्य ब्राह्मण 10/3/11 ।
 *कृष्णपक्ष की अष्टमी को अष्टका और शुक्ल पक्ष की अष्टमी को एकाष्टका कहा है।* 
तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/5/12 तथा ताण्ड्य ब्राह्मण 10/3/11 ।
(भा.ज्यो.पृष्ठ 59)
इससे प्रमाणित होता है कि, तिथियाँ प्रचलित नही थी। लेकिन  *चन्द्रमा के चारो फेस का निर्धारण गणना करते थे। यानी अमावस्या, उदृष्यका या शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, एकाष्टका (शुक्ल पक्ष की अष्टमी), पूर्णिमा, व्यष्टका (कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा), अष्टका (कृष्ण पक्ष की अष्टमी), और अमावस्या की गणना की जाती थी।*


वैदिक काल में व्यवहार में ३६० दिन का सावन सौर वर्ष भी चलता था, इसमें प्रत्येक महिना ३० दिन का ही होता है ‌ तथा साथ में दशाह के वासर प्रचलित थे।

(१) *संवत्सर*--- संवत्सर नामक सामान्य वर्ष के *बारह महीने में ३६० दिन का संवत्सर* होता था। तथा

(२) *परिवत्सर* --- (३८३५ वें वर्ष को छोड़कर) प्रत्येक *पाँचवाँ वर्ष तेरह मास का* अर्थात *३९० दिन का परिवत्सर* होता था। 

(३) *इदावत्सर* --- ( *३८४० वें वर्ष को छोड़* ) *प्रत्येक ४०वाँ वर्ष ३६० दिन* का अर्थात *बारह मास का* ही होता था।

(४) --- *अनुवत्सर* --- *३८३५ वाँ वर्ष ३६० दिन (बारह मास) का अनुवत्सर* होता था। एवम्

(५) *इद्वत्सर* --- *३८४० वाँ वर्ष ३९० दिन (तेरह मास) का इद्वत्सर* होता था।

इस गणना में पारिश्रमिक वितरण में दशाह चलता था। सप्ताह शब्द भी मिलता है लेकिन उपयोग का उल्लेख नहीं है। वासर सूर्योदय से दुसरे सूर्योदय तक को कहते हैं, लेकिन ग्रहों के नाम वाले वार का उल्लेख नहीं है।

क्रान्तिवृत के उत्तर-दक्षिण में आसपास आठ-आठ अंश चोड़ी पट्टी में असमान आकृति वाले तारा मण्डलों को असमान भोगांश वाले नक्षत्र कहते थे। समान भोग वाले नक्षत्र नहीं थे। 
अथर्ववेद में अट्ठाईस नक्षत्र बतलाये गए हैं। जबकि कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता ४/४/४० में शुक्ल यजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण/ दशम काण्ड/पञ्चमोऽध्याय/ चतुर्थ ब्राह्मण में और सामवेद के जैमिनी ब्राह्मण में सत्ताईस नक्षत्र ही बतलाए गए हैं लेकिन सभी में एक बात निश्चित है कि, नक्षत्र भोग असमान था। 

 चित्रा नक्षत्र का भोग केवल ००°२३'३१" ही था, स्वाती नक्षत्र का भोग २०°५०'५७" था, जबकि धनिष्ठा नक्षत्र का भोग २५°१४'०८" था; ऐसे ही सभी नक्षत्रों के भोगांश अलग अलग थे।*

 शतपथब्राह्मणम् में सत्ताइस नक्षत्रों का उल्लेख दिया हुआ है।

नक्षत्राणि ह त्वेवैषोऽग्निश्चितः तानि वा एतानि सप्तविंशतिर्नक्षत्राणि सप्तविंशतिः सप्तविंशतिर्होपनक्षत्राण्येकैकं नक्षत्रमनूपतिष्ठन्ते तानि सप्त च शतानि विंशतिश्चाधि षट्त्रिंशत्ततो यानि सप्त च शतानि विंशतिश्चेष्टका एव ताः षष्टिश्चत्रीणि च शतानि परिश्रितः षष्टिश्च त्रीणि च शतानि यजुष्मत्योऽथ यान्यधिषट्त्रिंशत्स त्रयोदशो मासः स आत्मा त्रिंशदात्मा प्रतिष्ठा प्राणा द्वे शिर एव षट्त्रिंश्यौ तद्यत्ते द्वे भवतो द्व्यक्षरं हि शिरोऽथ यदन्तरा नक्षत्रे तत्सूददोहा अथ यन्नक्षत्रेष्वन्नं तत्पुरीषं ता आहुतयस्ताः समिधोऽथ यन्नक्षत्राणीत्याख्यायते तल्लोकम्पृणा तद्वा एतत्सर्वं नक्षत्राणीत्येवाख्यायते तत्सर्वोऽग्निर्लोकम्पृणामभिसम्पद्यते स यो हैतदेवं वेद लोकम्पृणामेनं भूतमेतत्सर्वमभिसम्पद्यते

शतपथब्राह्मणम्/काण्डम् १०/अध्यायः ५/ब्राह्मण ४

सामवेद के जैमिनी ब्राह्मण में सत्ताइस नक्षत्र कहे गए हैं।

यास्सप्तपदाश्शक्वर्यो ये सप्त ग्राम्याः पशवो यानि सप्त चतुरुत्तराणि छन्दांसि ये सप्त मुख्याः प्राणा यानि सप्तविंशतिर्दिव्यानि नक्षत्राणि यस्सप्तविंश स्तोमो यत्किं च सप्त सप्त तस्यैषा सर्वस्यर्द्धिस्तस्योपाप्तिः ।)
परवर्ती ज्योतिष ग्रन्थों में इसका समाधान इस प्रकार किया कि,
जब अट्ठाइस नक्षत्रों के बजाय सत्ताइस नक्षत्र लेने का निर्णय लिया, तो उत्तराषाढ़ा की अन्तिम चार घटी और श्रवण नक्षत्र के प्रारम्भ की २५ घटी को मिला कर कुल २९ घटी को अभिजित् नक्षत्र मान लिया।
महर्षि गर्गाचार्य नें गर्ग संहिता और भास्कराचार्य ने सिद्धान्त शिरोमणि में असमान भोगांश वाले नक्षत्रों को मान्यता दी। लेकिन वराहमिहिर ने वृहत् संहिता में १३°२०' के समान भोगांश वाले सत्ताइस को मान्यता दी। साथ ही मिश्र,युनान और बेबीलोन (इराक) में प्रचलित ३०° वाली बारह राशियों को भी मान्यता दी। तथा राशियों और नक्षत्रों में समायोजन स्थापित किया।
योग एवम् करण (तिथ्यार्ध) का उल्लेख नहीं है।
सूर्य से चन्द्रमा के बारह-बारह अंश के अन्तर पर तिथियाँ बदलती है। जैसे 348° से 360° तक अमावस्या रहती है। 00° से 12° अन्तर तक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, 12° से 24° तक द्वितीया, 24° से 36° तक तृतीया ....…. 168° से 180° तक पूर्णिमा। फिर 180° से 192° तक कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा, 192° से 204° तक कृष्ण पक्ष की द्वितीया 204° से 216° तक कृष्ण पक्ष की तृतीया और पुनः 348° से 360° तक अमावस्या रहती है।
ऐसे ही सूर्य से चन्द्रमा के छः-छः अंश के अन्तर को करण कहते हैं।

इसके अलावा मुहूर्त शास्त्र में अक्षांशो के आधार पर ऋतुओं में अन्तर पड़ता है। 
*क्या उत्तर गोल यानी वैदिक उत्तरायण में किये जाने वाले कार्य दक्षिणी गोलार्ध में भी उत्तर गोल यानी वैदिक उत्तरायण में ही किये जाने चाहिए। या वहाँ उनमें से कुछ कार्य जिनका सम्बन्ध वास्तु से है वे कार्य दक्षिण गोल अर्थात वैदिक दक्षिणायन में करना चाहिए? ऐसा कोई स्पष्टीकरण नहीं है।*

*केवल कर्क रेखा और मकर रेखा के आस-पास ही षड ऋतुएँ होती है। इसी कारण ऋग्वेद में पाँच ऋतुओं का ही उल्लेख किया है। हेमन्त ऋतु का उल्लेख नहीं है।*
*भूमध्य रेखीय क्षेत्रों में ग्रीष्म ऋतु और वर्षा ऋतु के अलावा कोई ऋतु होती ही नहीं।
उत्तर अक्षांश 66° 40 के उत्तर में जब ग्रीष्म ऋतु होती ही नहीं तब कोई व्यक्ति ग्रीष्म वाले कार्य कैसे करेगा?*  ऐसे ही 
 *दक्षिण अक्षांश 66° 40 के उत्तर में जब ग्रीष्म ऋतु होती ही नहीं तब कोई व्यक्ति ग्रीष्म वाले कार्य कैसे करेगा?*

*अधिक उत्तर दक्षिण अक्षांशो पर दिनमान 24 घण्टे से भी अधिक होते हैं  यहाँ तक कि, एक माह, दो माह, तीन महीने , चार महीने, पाँच महीने और ध्रुवों पर तो छः महीने के दिवस और रात्रि होती है। वहाँ कोई व्रत, व्रत का पारण कैसे किया जाए इस सम्बन्ध में उचित अनुचित की व्यवस्था देने वाले धर्मशास्त्र में भी उल्लेख नहीं है, तो, धर्म शास्त्र के अङ्ग रूप मुहूर्त शास्त्र में सूर्योदय, प्रातः, सङ्गव, पूर्वाह्न, मध्याह्न, (अथर्ववेदीय अभिजित मुहूर्त, विजय मुहूर्त), अपराह्न, सूर्यास्त, गोधुलि, सायं सन्ध्या, प्रदोषकाल, पूर्व रात्रि, महानिशा, मध्य रात्रि, (विष्णु पुराण का ब्राह्म मुहूर्त), और (अथर्ववेद का ब्रह्म मुहूर्त), उषा काल, अरुणोदय, का निर्णय उक्त कालों में कैसे किया जाएगा इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है।*

*जब उत्तर अक्षांश 66° 40 के उत्तर में जब मकर लग्न दिखता ही नहीं तब कोई व्यक्ति मकर लग्न वाले कार्य कैसे करेगा?*  ऐसे ही 
 *दक्षिण अक्षांश 66° 40 के उत्तर में जब कर्क लग्न दिखता ही नहीं तब कोई व्यक्ति कर्क लग्न वाले कार्य कैसे करेगा?*
*इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं है।*

इतनी सब विसङ्गतियों का प्रभाव यह पढ़ा कि, *मुहूर्त निकलाने वाले भी मुहुर्त में कोई कार्य नहीं कर पाते हैं।*  या
*मन वाञ्छित दिन में मन वाञ्छित समय में ही मुहूर्त चाहते हैं।*
*वैदिक अग्निहोत्र रात्रि में नहीं होते फिर विवाह में रात्रि में अग्निहोत्र कर फैरे का चक्कर मेरी समझ से अत्यन्त परे है।*
*यह तो सभी ने देखा है कि, जि समय लग्न मुहूर्त में पाणिग्रहण संस्कार (हथलेवा) का समय होता है; उसी समय वर का वर निकासी का जुलूस (प्रोसेशन) निकल रहा होता है और बाराती फुहड़ डान्स कर रहे होते हैं। (नृत्य नहीं कहा जा सकता इसलिए लिख रहा डान्स कर रहे होते हैं ऐसा लिख रहा हूँ)  

मेरे मातृ कुल में मेरे अनुज ने मेरे भतिजे का नाम बदलकर चन्द्रमा के राशि नक्षत्र पर अवकहड़ा चक्र के अनुसार कर दिया था। जबकि उसी के पुत्र अर्थात मेरे भतिजे का विवाह वेधतुल्य गणित वाली पञ्चाङ्ग से उनके जन्म राशि/नक्षत्र/ चरण के आधार पर नहीं निकल रहे थे तो, लड़की के जन्म नाम के स्थान पर बोलते नाम पर मुहूर्त निकलवा लिया गया।
मेरा अनुज पूज्य गुरु ब्रहस्पति में सगाई करने को भी तैयार नहीं था। जबकि, विवाह लग्न के समय मेरे भतीजे को नवम सूर्य पूज्य है और भतिजा बहू के जन्म कुण्डली की चन्द्र राशि से गुरु ब्रहस्पति तृतीय अर्थात पूज्य है।  

*पाँच सौ वर्षों के संघर्ष के बाद शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी के अनुचरों, ग्रामीणों की प्रशिक्षित सेना के द्वारा ढाँचा गिराने पर माननीय न्यायालय के समक्ष शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी के वकीलों द्वारा अंग्रेजी शासन के दौरान अयोध्या के अंग्रेज कलेक्टर द्वारा सरयु नदी और अन्य मन्दिरों आदि लेण्डमार्क से नपती करवा कर बनाये गए नक्शे मे प्राचीन रामजन्म भूमि का स्थान नियत करके रखे गए प्रमाण प्रस्तुत किए जाने और वकील श्री विष्णु जैन के द्वारा प्रस्तुत प्रमाणों के आधार पर हुए पूरा तात्विक सर्वेक्षण को आधार बनाकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय और न्याय (फैसले) और आदेश के पालन में राम भक्तों से प्राप्त चन्दे की राशि से बनाए जा रहे अधुरे राम मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा केवल राजनीतिक लाभ की आशा में नीमच की चण्डु पञ्चाङ्ग (निर्णय सागर पञ्चाङ्ग) में बतलाये गए मुहूर्त को मानकर जोड़-तोड़ करके बिना मुहूर्त के दिन कर दी गई। फिर भी राजनीतिक लाभ मिला तो नहीं मिला लेकिन मुहूर्त बतलाने वाले शास्त्री जी लगभग छः महीने में ही निपट गए। मन्दिर निर्माण के संघर्ष से लेकर मन्दिर निर्माण तथा रखराव के नाम पर लिये गये बे हिसाब भूमि दान, रत्न, सोना- चान्दी, ताम्बा, नगद धन राशि, पाषाण, इंटें आदि का कितना घपला हुआ और बाद में चढ़ावा चोरी के प्रकरण सामने आये। इससे लोगों की भावनाओं को ठेस पहूँची वह अलग।

ऐसे देश समाज में, कलिकाल मे रहने वाले मेरे भाई के परिवार जनों को क्या दोष दिया जा सकता है।
*अब बतलाइये कि, उक्त गलत तथ्यों पर आधारित वर्तमान मुहूर्त शास्त्र पर किस आधार पर और किस कारण से श्रद्धा, आस्था और विश्वास व्यक्त किया जाए?*
*अतः निर्णय आप पर छोड़ता हूँ।*

रविवार, 2 नवंबर 2025

सायन गणना और नक्षत्रिय पद्धति दोनों ही सही हैं। लेकिन दोनों के उपयोग भिन्न-भिन्न हैं।

सायन गणना और नक्षत्रिय पद्धति दोनों ही सही हैं। लेकिन दोनों के उपयोग भिन्न-भिन्न हैं।

वेदों में वसन्त सम्पात, शरद सम्पात, उत्तर परम क्रान्ति, दक्षिण परम क्रान्ति, वसन्त से शरद सम्पात के बीच उत्तर गोल की तीन ऋतु वसन्त, ग्रीष्म एवम् वर्षा तथा मधु-माधव, शुक्र-शचि एवम् नभः-नभस्य मास के साथ ही शरद सम्पात से वसन्त सम्पात के बीच दक्षिण गोल की शरद, हेमन्त एवम् शिशिर ऋतु तथा ईष-उर्ज, सहस-सहस्य एवम् तपः- तपस्य मास का स्पष्ट वर्णन है।
उक्त द्वादश मासों के प्रत्येक माह को तीस-तीस अंशों का मानकर इन तीस-तीस अंशों को प्रथक-प्रथक द्वादश प्रधि कहा गया है। लेकिन द्वादश प्रधि के नाम नहीं पाये जाते हैं। यह ज्योतिष के गणित स्कन्ध का विषय है।
साथ ही क्रान्तिवृत के उत्तर-दक्षिण में आठ-नौं अंश चौड़ी नक्षत्र पट्टी में एक, दो या अनेक ताराओं द्वारा निर्मित स्थाई सत्ताइस-अट्ठाइस  आकृतियों को नक्षत्र संज्ञा दी गई है। और इन प्रत्येक नक्षत्र का नाम और देवता निर्धारित किए गए हैं। लेकिन इन नक्षत्रों का विस्तार असमान है। क्रान्तिवृत में सभी नक्षत्रों के भोगांश (देशांश) अर्थात कोणीय दूरी अलग-अलग है तथा विषुव वृत में सभी नक्षत्रों के उत्तर दक्षिण शर (अक्षांश) भी अलग-अलग हैं। इसलिए नक्षत्रिय गणना पद्यति विकसित नहीं की जा सकती है।
फिर भी ग्रहों और चन्द्रमा का सञ्चरण नक्षत्रों में ही माना गया है न कि, प्रधि में। साथ ही अथर्ववेद, तैत्तिरीय संहिता, तैत्तिरीय ब्राह्मण, तैत्तिरीय आरण्यक और अन्य  ब्राह्मण ग्रन्थों, सूत्र ग्रन्थों में चित्रा तारे को क्रान्तिवृत और नक्षत्र पट्टी के बिल्कुल मध्य में अर्थात 180° पर बतलाया गया है। तदनुसार चित्रा तारे से 180° पर क्रान्तिवृत और नक्षत्र पट्टी का प्रारम्भ बिन्दु माना गया है। और इसी आधार पर अश्विनी नक्षत्र को प्रथम नक्षत्र माना जाने लगा। लेकिन जिस समय जिस नक्षत्र पर वसन्त सम्पात होता है, उस अवधि में उस नक्षत्र का नाम सर्वप्रथम लिया जाता है। लगभग 25,780 वर्ष की अवधि में वसन्त सम्पात सभी नक्षत्रों में घूम लेता है। इस आधार पर जिस ग्रन्थ या जिस घटना के समय वसन्त सम्पात, शरद सम्पात या उत्तर-दक्षिण परम क्रान्ति का उल्लेख किया जाता है, या किसी नक्षत्र के साथ ऋतु दर्शाई जाती है उस आधार पर लगभग 25,800 वर्ष की कालावधि में वर्ष निर्धारित किया जाता है। यह पद्धति इतिहास जानने में अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हुई है।
(श्री शंकर बालकृष्ण दीक्षित जी ने भारतीय ज्योतिष में इस तथ्य को ही स्थापित किया है। इस बात को वेदकाल निर्णय नामक पुस्तक में तथा इन्दौर पञ्चाङ्ग शोधन कमेटी की रिपोर्ट में परिष्ठ 4 अयनांश निर्णय में 233 पृष्ठों में श्री दीनानाथ शास्त्री चुलेट ने सप्रमाण सिद्ध किया है। इन्दौर पञ्चाङ्ग शोधन कमेटी की रिपोर्ट पीडीएफ इण्टरनेट आर्काइव पर उपलब्ध है।)   लगभग सभी विद्वानों ने इसी आधार पर चित्रा पक्षीय अयनांश को मान्य किया है। इसलिए इसे झुठलाया नहीं जा सकता। 
इतिहास की घटनाओं के समय निर्धारण के लिए तत्कालीन किसी नक्षत्र विशेष में वसन्त सम्पात होने के आधार पर काल निर्धारण लोकमान्य श्री बालगङ्गाधर तिलेक जी ने भी उनकी पुस्तक ओरायन में किया है।
सूत्र ग्रन्थों के रचनाकाल से रामायण और महाभारत इतिहास ग्रन्थों के रचनाकाल के बीच जब चित्रा तारे से 180° पर  रेवती नक्षत्र का योग तारा स्थित था, तब रेवती नक्षत्र के योग तारा को नक्षत्र पट्टी का आदि बिन्दु और अश्विनी नक्षत्र का प्रारम्भ बिन्दु माना जाने लगा। लेकिन वर्तमान में उस स्थान पर कोई तारा नही है और यदि रेवती नक्षत्र का योग तारा  झीटापिशियम तारे को माना जाए तो वह तारा लगभग नौं अंश पीछे खिसक चुका है। इस कारण वर्तमान मे अश्विन्यादि बिन्दु पर कोई तारा नही है।
लेकिन पौराणिक युग के सिद्धान्त ज्योतिष के विद्वानों ने एक खोज की कि, उक्त अश्विन्यादि बिन्दु और वसन्त सम्पात के अन्तर को अयनांश नाम दिया गया जिसे अंग्रेजी में प्रिसेशन ऑफ इक्विनाक्स कहते हैं। सूर्य, चन्द्रमा और ग्रहों के सायन भोगांश में से उक्त अयनांश घटाकर निरयन राशि अंशादि बना लिया। 
पश्चिम टर्की, मिश्र और इराक में प्रचलित असमान विस्तार वाली द्वादश राशियों को परवर्ती युरोपीय गणितज्ञों द्वारा प्रत्येक राशि को निश्चित तीस-तीस अंशों की नियत कर दी। आचार्य वराहमिहिर के समय भारत में उक्त ग्रीक राशियों को अपनाने में असमान विस्तार वाले सत्ताइस नक्षत्रों को 13°20' का नियत कर दिया। इस प्रकार उनके अनुसार यवन राशियाँ और भारतीय नक्षत्रों का समायोजन हो गया। लेकिन इस चक्कर में असमान विस्तार वाले तेरह अरे (वास्तविक राशियाँ) और असमान विस्तार वाले वैदिक नक्षत्र गुम हो गये और तीस-तीस अंशों की बारह राशियाँ और तेरह अंश बीस कला वाले सत्ताइस नवीन नक्षत्र प्रचलित हो गये। इसे निरयन पद्धति कहा गया। निरयन पद्धति में सायन भोगांश में से अयनांश घटाकर निरयन राशि अंशादि बतलाना आसान हो गया। जो आज तक प्रचलित है। 
उल्लेखनीय है कि, वैदिक अट्ठाईस नक्षत्रों में से अभिजित नक्षत्र का योग तारा नक्षत्र पट्टी से बहुत दूर उत्तर में खिसक जाने के कारण वर्तमान में सत्ताईस नक्षत्र ही मानना उचित है।
आचार्य वराहमिहिर ने तेरह अरों शब्द का प्रयोग वास्तविक राशियों के लिए किया था। लेकिन सर्पधारी राशि या ऑफियुकस या ओफियुचस (Ophiuchus) राशि भी नक्षत्र पट्टी से बाहर निकल जाती है। अतः भारतीय सन्दर्भ में असमान विस्तार वाली बारह राशियाँ ही मानना उचित होगा।
खगोलविद जब भी किसी आकाशीय पिण्ड की सूचना देते हैं तो पिण्ड की स्थिति 88 (अठासी) तारामण्डल में और तेरह साईन में दर्शाते हैं। न कि, राशि अंशों में। सायन पोजीशन बतलाने के लिए 000°00'00" से 359°59'59" तक में बतलाते हैं। अर्थात 000 अंश से 360 अंश तक बतलाते हैं न कि, साईन डिग्री मिनट सेकण्ड में।
अर्थात राशि अशं कला विकला भी एस्ट्रोनॉमी की नहीं बल्कि ऐस्ट्रॉलजी की भाषा है।
वेद, ब्राह्मण ग्रन्थों, सूत्र ग्रन्थों, और यहाँ तक कि, वाल्मीकि रामायण और श्रीकृष्ण द्वेपायन व्यास कृत महाभारत में भी सर्वत्र एक समान वर्णन पाया जाता है कि, अमुक ग्रह अमुक नक्षत्र में स्थित है या अमुक ग्रह अमुक नक्षत्र को पीड़ा दे रहा है। कहीं भी यह वर्णन नहीं है कि, अमुक ग्रह किस प्रधि में स्थित है। 
अर्थात प्रधि, ऋतुओं, गोल में सूर्य की स्थिति, अयन और तोयन (परम क्रान्ति की ओर सूर्य की गति) का सम्बन्ध केवल सूर्य से है।
अतः क्रान्तिवृत में सूर्य के भोगांश तथा क्रान्ति और विषुव वृत के उत्तर-दक्षिण क्रान्ति की गणना सूर्य के लिए की गई थी। बाद में ज्योतिष के सूर्य सिद्धान्त, आर्य भट्टीय, सिद्धान्त शिरोमणि आदि ग्रन्थों के गणिताध्याय में चन्द्रमा और ग्रहों की गति की गणना कर ग्रह स्थिति भोगांश, क्रान्ति और शर के साथ दर्शाने की गणना तैयार हुई। 
लेकिन खगोल शास्त्र में फिक्स्ड ज्ञोडिएक में नक्षत्रों के प्रारम्भ, समाप्ति और विस्तार का उल्लेख किया जाता है। जिसे गोलाध्याय कहते हैं।
संहिता ज्योतिष का मुख्य आधार नक्षत्रों में ग्रहों और चन्द्रमा की स्थिति है, लेकिन सूर्य की ऋतु और माहों का भी महत्व है। होरा शास्त्र या जातक फलित ज्योतिष संहिता ज्योतिष के सिद्धान्तो का ही अनुसरण करता है।
अर्थात नक्षत्र पद्धति का आधार चन्द्रमा है। क्योंकि लगभग 27.322 दिन में चन्द्रमा पूरी नक्षत्र पट्टी में घूम लेता है। जबकि प्रधि, सौर मास, ऋतु, गोल, अयन, तोयन और संवत्सर का आधार सूर्य है। जिसके लिए सायन गणना ही उपयुक्त है।
 
किसी भी स्थान पर समय को दर्शाने के लिए सूर्य, चन्द्र और ग्रहों के भोगांश, क्रान्ति और शर दर्शाने भर से काम नहीं चल सकता, क्योंकि, इस स्थिति की आवृत्ति होती रहती है; जबकि, यदि इसके साथ सूर्य , चन्द्रमा और ग्रहों की स्थिति नक्षत्रों में स्थिति दर्शाई जाए तो, इन सभी स्थितियों की आवृत्ति संयोजन करोड़ों वर्ष में भी नहीं हो पाती है। इसलिए एतिहासिक घटना का ठीक-ठीक समय ज्ञात करने के लिए सूर्य चन्द्रमा और ग्रहों की सायन पोजीशन और नक्षत्रों में स्थिति दोनों साथ-साथ जानना अत्यावश्यक है। इसलिए सायन गणना और नक्षत्रिय पद्धति दोनों का ही ज्ञान आवश्यक है।

*भारत में यज्ञ कर्म, व्रत पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाने के लिए मुख्य आधार यह है कि, निश्चित गोल, निश्चित अयन में निश्चित ऋतु में उल्लेखित मधु-माधव आदि सौर मास, में चन्द्रमा की किसी नक्षत्र विशेष में स्थिति हो न कि, चान्द्रमास की तिथियाँ। वेदों में तिथियाँ प्रचलित नहीं थी। केवल उदृष्टका (शुक्ल प्रतिपदा), एकाष्टका (शुक्लाष्टमी), पूर्णिमा, व्यष्टका (कृष्ण प्रतिपदा) और अष्टका (कृष्णाष्टमी) और अमावस्या तिथि का ही उल्लेख है।*

*बाद में चान्द्र मास में सम्बन्धित नक्षत्र में पड़ने वाली तिथि से जोड़ दिया गया। इसमें त्रुटि यह हो गई कि, सूर्य की सायन संक्रान्ति  वाले मधु-माधव आदि सायन सौर मास के स्थान पर पौराणिक काल में प्रचलित निरयन सौर संक्रमण आधारित सौर मास पर आधारित चैत्र-वैशाख आदि चान्द्र मासों की तिथि स्वीकार कर ली गई।*
इसके दो कारण थे।
प्रथम -- *शिवरात्रि पर्व का आधार बिल्वपत्र के पेड़ पर बैठकर व्याघ (बहेलिए) द्वारा रात-भर मृगशीर्ष नक्षत्र (ओरायन) के तारों का पीछा करते हुए व्याघ तारा लुब्धक (सिरियस केनिस मेजर) देखते हुए चारों प्रहर में मुंह धोने और बेल पत्र तोड़कर गिराने को शंकर जी ने अपनी पूजा मानकर व्याघ (बहेलिए) को दर्शन देकर वरदान दे दिया यह कहानी है।*
*चूंकि रात-भर व्याघ (लुब्धक) का दर्शन निरयन सौर धनु राशि के 20°13' वाले दिन (वर्तमान में 05 जनवरी के आस-पास) को ही हो सकता है, जो निरयन सौर मकर संक्रमण आधारित अमान्त माघ मास में ही सम्भव है। इसलिए निरयन सौर मकर मास में पड़ने वाली शिव की तिथि चतुर्दशी को शिवरात्रि मनाई जाने लगी।*
दुसरा --- *निरयन सौर संक्रमण आधारित चैत्र-वैशाख आदि चान्द्र मासों में किसी भी निर्धारित तिथि पर व्रत पर्व के लिए निर्धारित चन्द्रमा का नक्षत्र या उसके आगे-पीछे का नक्षत्र होना।
जैसे अमान्त चैत्र शुक्ल नवमी को चन्द्रमा पुनर्वसु या पुष्य नक्षत्र में चन्द्रमा होने पर राम नवमी मनाना। अमान्त श्रावण कृष्ण अष्टमी तिथि को प्रायः रोहिणी नक्षत्र में चन्द्रमा होने पर श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाना आदि।*  
लेकिन *यह ध्यान नहीं दिया गया कि, इस कारण व्रत पर्व उत्सव और त्यौहारों की ऋतुएँ गड़बड़ा जाएगी। दुसरा चन्द्रमा की किसी विशेष नक्षत्र में स्थिति असमान भोग वाले वास्तविक नक्षत्र में है भी या नहीं ली गई। इसलिए तिथि प्रणाली  अनुचित ही है।*
*इसी कारण वेदों में उदृष्टका, चन्द्र दर्शन, एकाष्टका, पूर्णिमा, व्यष्टका, एकाष्टका और  अमावस्या  के अलावा किसी तिथि का उल्लेख नहीं किया गया है।*
*उसके स्थान पर मधु-माधव आदि मास और चन्द्रमा का वास्तविक नक्षत्र में होना ही दर्शाया गया है। और यही पद्धति ही उचित है।*

पञ्चाङ्ग का दुसरा उपयोग --- *कृषि, व्यापारिक यात्रा, युद्धों के लिए यात्रा, संस्कारों के लिए समुचित समय निर्धारण हेतु ऋतु ज्ञान होना तथा रात्रि में चन्द्रमा के प्रकाश की उपलब्धि बतलाना है।*
इसमें भी *मधु-माधव आदि सायन सौर मास और चन्द्रमा की अमावस्या-पूर्णिमा और अर्ध चन्द्र (अष्टका-एकाष्टका) दर्शाना पर्याप्त है। अन्य किसी तिथि के स्थान पर सम्बन्धित देवता का नक्षत्र लेना पर्याप्त है। जैसे प्रथम मास मधु मास में (पौराणिक माधव मास) में पुनर्वसु नक्षत्र पर चन्द्रमा हो तब श्रीराम जन्मोत्सव मनाना और पञ्चम मास नभस मास (पौराणिक नभस्य मास) में रोहिणी नक्षत्र में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाना और श्रवण नक्षत्र के चन्द्रमा में वामन जयन्ती मनाना ही उचित पद्धति है।*

सृष्टि उत्पत्ति और ज्योतिष।
परमात्मा के ॐ सङ्कल्प के साथ प्रकट परब्रह्म विष्णु और उनकी शक्ति माया द्वारा इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए स्व संकल्प से ब्रह्म प्रभविष्णु सवितृ और उनकी शक्ति सावित्री श्री लक्ष्मी को प्रकट किया। और उन्हें ॐ संकल्प का अर्थ विस्तार किया। यही ज्ञान वेद कहलाता है।
इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए ब्रह्म से अपर ब्रह्म नारायण (श्रीहरि) और नारायणी (कमलासना गज लक्ष्मी) प्रकट हुए। ब्रह्म द्वारा इन्हें वेद प्राप्त हुए। अपर ब्रह्म से वाणी- हिरण्यगर्भ (विश्वकर्मा) प्रकट हुए। अपर ब्रह्म से इन्हें वेद प्राप्त हुए। हिरण्यगर्भ (विश्वकर्मा) को त्वष्टा (सृष्टि के गोलों, भुवनों, और लोको के सृजक) और उनकी शक्ति रचना के रूप में जाना जाता है।  हिरण्यगर्भ (अण्डाकार पञ्च मुखी ब्रह्मा ब्रह्मा) से प्रजापति (गोलाकार चतुर्मुख ब्रह्मा) और उनकी शक्ति सरस्वती हुए। साथ ही अर्धनारीश्वर एक रुद्र (महारुद्र), सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, सनातन और नारद हुए। लेकिन ये अकेले होने के कारण सृष्टि विस्तार नहीं कर सकते थे। फिर धर्म और उनकी शक्ति धृति तथा काम और उनकी शक्ति रति को उत्पन्न किया।
इन्हें हिरण्यगर्भ से वेद प्राप्त हुए। प्रजापति ने दक्ष (प्रथम) प्रजापति और प्रसुति, रुचि प्रजापति और आकुति, कर्दम प्रजापति और देवहुति, स्वायम्भुव मनु और शतरूपा की जोड़ी उत्पन्न की। जिनके द्वारा प्रजा उत्पत्ति हुई। इनके अलावा 1 मरीचि, 2  अङ्गिरा, 3 वशिष्ठ, 4 भृगु, 5 अत्रि, 6 कृतु 7 पुलह और 8 पुलस्य ऋषियों को प्रजापति के रूप में उत्पन्न किया। जिनके विवाह दक्ष-प्रसुति की कन्याओं से कराया। इन सबको प्रजापति से वेद (ज्ञान) प्राप्त हुआ। फिर अर्धनारीश्वर रुद्र ने स्वयम् को पुरुष शंकर और स्त्री उमा के स्वरूप में विभक्त किया। इन सब को प्रजापति से वेद प्राप्त हुए थे।

फिर प्रजापति ब्रह्मा ने वैदिक मन्त्रों के पद्यभाग ऋचाओं के ऋग्वेद नाम से अग्नि को, गद्य भाग यजुष को यजुर्वेद के नाम से वायु को, गायन योग्य साम भाग को सामवेद नाम से सूर्य को और शेष भाग को अथर्वाआङ्गरस  अङ्गिरा ऋषि को प्रदान कर मृत्यु लोक भूमण्डल में प्रजाओं को प्रदान करने का कार्य सोपा। तब से वेदों को श्रुति परम्परा से अन्तरित होने के कारण श्रुति कहा जाने लगा। और इस ज्ञान का रचियता परमात्मा होने से वेद अपौरुषेय कहलाते हैं। इन वैदिक संहिताओं की ब्रह्मर्षियों द्वारा की गई व्याख्या ब्राह्मण ग्रन्थ कहलाते हैं। इनको समझने के लिए ऋषियों ने षड वेदाङ्गो और चार उपवेद की रचना की। 1 उच्चारण के लिए  शिक्षा के ग्रन्थ रचे, 2 शब्द व्युत्पत्ति और भाषा विज्ञान समझने के लिए यास्क आदि ऋषियों ने निरुक्त , और अमरसिंह आदि ने अमरकोश जैसे शब्दकोश निघण्टु रचा, 3 वाक्य निर्माण और वाक्य विन्यास जानने के लिए पाणिनि आदि ऋषियों ने अष्टाध्याई आदि व्याकरण रचा जिस पर वररुचि रचना की और   पतञ्जली ने महाभाष्य लिखा,  राजा भोज ने महाभाष्य पर वृत्ति की रचना की, 4 छन्दों की रचना और अर्थ ज्ञान हेतु पिङ्गल आदि ऋषियों ने छन्दशास्त्र रचा, 5 सूर्य ने उनके शिष्य मायासुर को ब्रह्माण्ड विज्ञान और सिद्धान्त ज्योतिष का ज्ञान दिया। 6 (क)बहुत से ऋषियों ने अपने-अपने वेद और ब्राह्मण ग्रन्थ और शाखा के अनुसार सृष्टि और ब्रह्माण्ड, भुवन और लोकों की प्रतिकृति सम्बन्धित देवताओं के आह्वान, और स्थापना हेतु नियत स्थान दर्शाने हेतु मण्डप और वेदी निर्माण हेतु शुल्ब सूत्रों की रचना की। (6 ख) बड़े यज्ञों के विधि-विधान और निषेध ज्ञान हेतु श्रोत सूत्रों की रचना की। इनकी मीमांसा हेतु जेमिनी ने पूर्व मीमांसा ग्रन्थ रचा (6 ग) बहुत से ऋषियों ने अपने-अपने वेद और ब्राह्मण ग्रन्थ और शाखा के अनुसार दैनिक कर्म,संस्कार, व्रत पर्व उत्सव और त्यौहारों के विधि-विधान और निषेध ज्ञान हेतु गृह्य सूत्रों की रचना की। और (6 घ) अपने क्षेत्र, काल और प्रजा को ध्यान रखते हुए बहुत से ऋषियों ने अपने-अपने वेद और ब्राह्मण ग्रन्थ और शाखा के अनुसार राजा - प्रजा, ग्राम, कुल, कुटुम्ब, परिवार के सदस्यों के अहिंसा , सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य,  अपरिग्रह, शोच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान, दया, करुणा, क्षमा, दान, त्याग, तितिक्षा आदि सार्वभौमिक, सर्वकालिक आचरण नियम, कर्तव्य और निषेध तथा अधिकार, विवाह - उत्तराधिकार आदि के नियमों हेतु धर्मसूत्र रचे। जिनकी स्मृति के आधार पर बाद में अलग-अलग राज्यों के संविधान स्मृति ग्रन्थों के नाम से रचे गए।
इनके अलावा कर्म मीमांसा हेतु श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश श्रीकृष्ण ने दिया। और परमात्मा, आत्मा और जीवात्मा,परब्रह्म परमेश्वर, और जगत - संसार के सम्पूर्ण ज्ञान के लिए वैदिक संहिताओं के अन्तिम भाग की व्याख्या ब्राह्मण ग्रन्थों के अन्तिम भाग में आरण्यकों और उपनिषदों के नाम से रचे गए ब्रह्मसूत्रों की मीमांसा बादरायण ने शारीरिक सूत्र में की। जिसकी व्याख्या/ भाष्य वेदव्यास जी, भगवान आदि शंकराचार्य ने की और उसपर भी पतञ्जली ने अपने महाभाष्य में भी विवेचना की।
इनके अलावा स्वतन्त्र रूप से ईश्वर कृष्ण की सांख्य कारिका और महर्षि कपिल ने सांख्य दर्शन, में तत्व मीमांसा की, पतञ्जली ने योग दर्शन में अष्टांग योग विवेचना की। महर्षि गोतम ने तर्क और प्रमाण शास्त्र पर न्याय दर्शन रचा। और कणाद ने जगत को नौ तत्वों में विभाजित कर वैशेषिक दर्शन रचा। नागार्जुन ने माध्यमिक दर्शन पर अपनी विवेचना प्रस्तुत की।
ऐसे ही १ ऋग्वेद के उपवेद आयुर्वेद में चरक, सुश्रुत आदि ऋषियों ने ग्रन्थ रचे २ यजुर्वेद के उपवेद धनुर्वेद के ग्रन्थ और अर्थशास्त्र के लिए विष्णु गुप्त चाणक्य आदि ने राजनीति के ग्रन्थ अर्थशास्त्र के ग्रन्थ रचे। ३ सामवेद के उपवेद गन्धर्ववेद के अन्तर्गत काव्य, गायन, वादन, वाद्ययंत्रों के निर्माण, उपयोग और रखरखाव के ज्ञान के लिए , नाट्य-नर्तन , मञ्चन आदि के ज्ञान के लिए ग्रन्थ रचे। और ४ अथर्वेद के उपवेद स्थापत्य वेद और शिल्प वेद के ज्ञान के लिए विश्वकर्मा प्रकाश, मायासुर शिलप शास्त्र आदि ग्रंथ और राजा भोज के समराङ्गण सूत्र जैसे ग्रन्थ रचे गए।
द्वापरयुग के अन्त में कलियुग के प्रारम्भ होने के पहले ही वेदव्यास जी ने अपने शिष्यों में पैल को ऋग्वेद, वैषम्पायन को यजुर्वेद , जेमिनी को सामवेद और सुमन्तु को अथर्ववेद का ज्ञान देकर मानवों में ज्ञान प्रसार का काम सोपा।

फिर प्रजापति ब्रह्मा से प्राप्त अपौरुषेय वेदों में अनन्त ब्रह्माण्डों में से केवल हमारे ब्रह्माण्ड की आकाशगङ्गा निहारिका के मार्तण्ड नामक सूर्य के भूमि नामक ग्रह के परिभ्रमण पथ क्रान्ति वृत और भूमि की विषुवत रेखा के समानान्तर आकाश के विषुव वृत और क्रान्ति वृत के तीस-तीस अंशों के समान दूरी वाले द्वादश प्रधेयों और क्रान्तिवृत के उत्तर दक्षिण आठ-नौं अंश चौड़ी पट्टी की नक्षत्र पट्टी में कुछ ताराओं द्वारा निर्मित असमान विस्तार के नक्षत्र तथा सूर्य चन्द्रमा और ग्रहों का वर्णन तो नहीं हो सकता अतः वैदिक ज्योतिर्गणित, वैदिक पञ्चाङ्ग जैसे शब्द तो निरर्थक ही हैं।
अतः ब्राह्मण ग्रन्थों और सूत्र ग्रन्थों में उल्लेखों के आधार पर वैदिक ग्रह गणित और वैदिक पञ्चाङ्ग कहा जा सकता है।