शुक्रवार, 12 सितंबर 2025

श्राद्ध क्यों आवश्यक है और श्राद्ध ग्रहण कौन करता है? और श्राद से क्या लाभ होगा?

हम आज जो पानी पीते हैं, इस पानी से प्यास बुझती है यह खोज करने वाले वैज्ञानिक, जल स्त्रोत की खोज करने वाले वैज्ञानिक, जल स्रोत तसे हमारे मुख तक पहूंचाने के लिए संसाधन की खोज करने वाले अनेक वैज्ञानिकों (जिन्होंने बाल्टी, मटका, ग्लास से लेकर नर्मदा जल हमारे घर तक पहूँचने में प्रयुक्त विद्युत निर्माण से पारेषण तक, पाइप लाइन, फिटिंग्स , लगने वाले औजार आदि की खोज करने वाले वैज्ञानिक) ऐसे अरबों खरबों लोगों के योगदान और कृपा से हम पानी पी पा रहे हैं, उन सबके प्रति श्रद्धा समर्पण सर्वपितृ अमावस्या को हम जरासा त्याग कर एहसान नहीं करते हैं। यह तो हमारा दायित्व बनता है, कर्तव्य है।
श्राद्ध में ये पितर और विश्वेदेवाः के लिए स्वधा (स्व को धारण करने की शक्ति) समर्पित की जाती है।
जिन सात पीढ़ी के पूर्वजों और ऐसे ही अभीतक मर चुके सर्व पितरों के लिए आप जो श्राद्ध करते हैं उनमें से कोई एक का जन्म लेकर सम्भव है कि, स्वयम् आप ही हो, या आपके परिवार में ही कई व्यक्ति हों, जो उस समय उसी स्थान पर हो, इसलिए सात पीढ़ी के पूर्वजों और ऐसे ही अभी तक मर चुके सर्व पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए आपको जिन भोग पदार्थों के प्रति लगाव है उनको चुंकि वे भोग पदार्थ सृष्टि के आदि से आज तक उत्पन्न लोगों के सहयोग से ही आप तक पहूँची है, इसलिए उसका एक अंश जरुरतमंद लोगों को दान कर अपना कर्तव्य निर्वहन करते हैं। इस प्रकार आप
*(1) अग्निष्वात (2) बहिर्षद (3) कव्यवाह (4) अर्यमा, (5) अनल (6) सोम और (7) यम* 
तथा
 *1 दक्ष, 2 व्रतु, 3 वसु, 4 काम, 5 सत्य, 6 काल, 7 रोचक, 8 आद्रव, 9 पुरुरवा तथा 10 कुरज*
के प्रति अपनी श्रद्धा समर्पित करते हैं। 
ये पितर और विश्वेदेवाः उन पदार्थों में से एक परमाणु भी ग्रहण नहीं करते हैं, वे केवल आपकी श्रद्धा और प्रेम ग्रहण कर अब जो चीजें आपके पास बची है, उन चीजों में उनका अपना स्नेह और प्रेम डाल देते हैं इस कारण अब वे चीजें आपके लिए आयु, पुष्टि, तुष्टि और सन्तुष्टि कारक, बल वर्धक, स्वास्थ्य वर्धक हो जाती है।
और आपने जिन मृतको के निमित्त श्राद्ध किया है उन्हें भी तुष्टि और पुष्टि, बल और सामर्थ्य के रूप में पहूँचा देते हैं।
न कोई देवता, न देव, न भगवान न ईश्वर न परमात्मा कोई भी आपके द्वारा अर्पित भोग का एक परमाणु भी ग्रहण नहीं करते हैं। उसमें से वे केवल आपकी श्रद्धा और प्रेम ग्रहण कर उस भोग में डाल देते हैं इस कारण वह प्रसाद (कृपा) बन जाता है। और आपको अत्यन्त रोचक, स्वादिष्ट लगने लगता है। यह चमत्कार प्रायः सभी ने अनुभव किया है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन का अर्थ।

परिणाम प्राप्त्यर्थ ही कर्म का आरम्भ होता है। गन्तव्य तक पहूँचने के लिए ही पहला कदम उठाया जाता है। 
निरुद्देश्य कर्म तो निषिद्ध कर्म माना जाता है।
अनर्गल चेष्ठाएँ जैसे बैठे बैठे पेर हिलाना, हाथों की उँगलियों से अकारण कुछ करन, फोन पर बात करते हुए कागज पर कुछ चितरना (अनघड़ डिजाइन बनाना, हस्ताक्षर करना आदि) निरुद्देश्य कर्म होने से निषिद्ध कर्म है।
दान देना एक कर्तव्य है।
लेकिन दान देने के पीछे कई मंशा या आशय (इण्टेन्शन) और उद्देश्य हो सकते हैं,
1 किसी जरुरतमंद की आवश्यकता पूर्ति करना।
चूंकि वह वस्तु मेरे पास है और जरुरतमंद व्यक्ति को उस चीज की आवश्यकता मुझ से अधिक है, उसे इसकी आपूर्ति की तत्काल आवश्यकता है इसलिए तत्काल दे देना।
अर्थात कर्तव्य मान कर दान करना। बस यही दान सार्थक है। यही दान है।
शेष व्यापार मात्र है।
2 देखनें वालों में मेरी दानशीलता का प्रभाव पड़ेगा, यश, प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि और प्रचार होगा। इसका फल तत्काल मिल जाता है और कर्मफल पूर्ण हो जाता है।
ये थे कर्म फल जिसमें पहले वाला निष्काम कर्म अर्थात यज्ञ के लिए यज्ञ था।
शेष सभी राजसी तामसी दान केवल बन्धन कारक हैं।

3 अनन्त गुना होकर मेरे अकाउण्ट में जमा रहेगा और आवश्यकता पड़ने पर लौटकर मुझे मिल जाएगा। अर्थात स्वार्थ बुद्धि। खाते में पुण्य संचय होकर इसका फल होता है।
4 स्वर्गादि लोक प्राप्ति। 
5 अन्तःकरण शुद्धि - यह नया फण्डा है। जो मेरे मत में केवल मुर्खतापूर्ण सोच है। त्रिगुणात्मक प्रकृति और प्राकृतिक पदार्थ चित्त, बुद्धि, अहंकार और मन कभी शुद्ध नहीं हो सकते। क्योंकि ये प्रकृति में आये विकार का परिणाम है। विकृति ही है। शुद्ध तो केवल प्रज्ञात्मा ही है। मूलतः ये लोग प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) को जीव भाव से मुक्त कर प्रज्ञात्मा की ओर ले जाकर प्रज्ञात्मा में लीन करना चाहते हैं, लेकिन तत्व मीमांसा के ज्ञान के अभाव में गलत शब्द बोलते हैं।
 
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
का अर्थ लोगों ने गलत किया है। परिणाम की अपेक्षा से ही कर्म होता है, लेकिन कर्मफल ऋत के अनुसार स्वतः होता ही है, कर्मफल की इच्छा रखना या न रखने से ऋत को कोई अन्तर नहीं पड़ता। ऋत की प्रक्रिया नियत है। उसे आपकी सोच नहीं बदल सकती।

शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

ईश्वर तथा देवता गण के बारे में वैदिक और इब्राहीमी अवधारणा में अन्तर

सातवें आसमान पर बैठा व्यक्ति निश्चित ही सातवें आसमान से आकार (साइज) मेंं छोटा होगा। अतः गोलाकार हो या दृव और गैस के समान कूटाकृति लेकिन निराकार तो हो ही नही सकता।

निराकार सर्वव्यापक परमात्मा ही हो सकता है।

ॐ कार नाम से ही स्पष्ट है कि ॐ भी साकार ही है। शेष देव हों या देवता निराकार नही मानें गये हैं। चाहे वे तरङ्गाकार हो, कूटाकृति हो, दीर्घगोलाकर (सामान्य भाषा में अण्डाकार) हो, गोलाकार हो या पुरुषाकृति (देह के समान आकार वाले) हों।

यहूदी यहोवा परमेश्वर के अलावा पवित्रात्मा (उनके देवताओं या फरिश्तों) को भी नमन / दण्डवत नमन करते हैं। विद्या ददाति विनयम्, विनयम् ददाति पात्रताम्। विनम्रता गुण है कोई दोष नहीँ। अपने से योग्य और वरिष्ठों का आदर करना सद्गगुण है दोष नही। उनके सामने विनम्र होना ही चाहिए । ठूंठ जैसे खड़े रहना तो ढीठता ही है। पर वे भी देवताओं को परमेश्वर नही मानते। अतः उनके लिये भी यह नही कहा जा सकता कि, वे यहोवा परमेश्वर के समतुल्य किसी देवता फरिश्ते / पवित्र आत्मा को मानते हैं।

ईसाइयों का धर्म भी यहुदियों के ही समान है।केवल कर्मकाण्ड की क्रियाओं में थोड़ा अन्तर है। ईसाई भी यहोवा परमेश्वर के अलावा पवित्रात्मा (उनके देवताओं या फरिश्तों) को भी नमन करते हैं। पर वे भी देवताओं को परमेश्वर नही मानते। साथ ही यीशु को भी परमेश्वर का पुत्र मानते हैं। पर सर्वोच्च स्थान उनके मन में भी यहोवा के प्रति ही है।यीशु दुसरे स्थान पर ही हैं। अतः उनके लिये भी यह नही कहा जा सकता कि, वे यहोवा परमेश्वर के समतुल्य किसी देवता फरिश्ते / पवित्र आत्मा को मानते हैं।

फिर उन्हें मुशरिक कैसे कहा जाता है। यह तो केवल उन्हें मुशरिक कहनें वाले ही जानें।

अब आता हूँ सनातन वेदिक धर्म पर—

सनातन.वेदिक धर्म के सर्वव्यापी परमात्मा की अवधारणा सर्वोच, परमपद परमेश्वर को ही अन्तिम सत्य माननें वाले समझ ही नही पाये।

परमात्मा सबकुछ है। जो सत और असत से भी परे है। ज्ञान और अज्ञान से भी परे है, (वेदोsहम अवेदोsहम )।आनन्द और अनानन्द से भी परे है। अर्थात परमात्मा के बारे में सोचना ही सम्भव नही है। उसे परम आत्म स्वरूप जानकर ही परमात्मा होकर ही समझा जा सकता है। क्योंकि परमात्मा ही वास्तविक मैं / परम आत्म है।

सनातन वेदिक धर्म में (ऋग्वेद में) विष्णु परमपद कहा गया है। परमेश्वर कहा गया है। सवितृ देव को महेश्वर और नारायण को जगदीश्वर कहा गया। हिरण्यगर्भ को भी ईश्वर कहा जाता है। और सनातन वेदिक धर्मी तो अवस्था मेंबड़े, योग्यता मेबड़े, सदाचरण में श्रेष्ठ, पद में बड़े, प्रतिष्ठा में बड़े सबको प्रणाम करते हैं। कहा भी है कि, जो जितना विनमृ हो समझना चाहिए कि, वह उतना ही योग्य और क्षमतावान होगा। क्षमा वीरस्य भूषणम्। विद्या ददाति विनयम्।

मतलब ईश्वरों की श्रेणी है। ईश्वरत्व मात्र पदाधिकारी है। सर्वोच्च सत्य/ परम सत्य नही है। किन्तु इनमें से किसी के भी समतुल्य कोई विरोधी देवता (इब्लीस जैसा शैतान) नही है। और परमात्मा तो परम है/ एब्सोल्यूट है।

यह अवधारणा नही समझपाने के कारण सनातन वेदिक धर्म को बहूदेववादी होनें का आरोप लगाया जाता है।

जबकि देवता/ फरिश्ते तो यहूदी, ईसाई, और इस्लाम अर्थात इब्राहीमी सम्प्रदायों में भी है। यहूदी तो उन्हें दण्डवत प्रणाम भी करते हैं।

खेर अपनी अपनी समझ।

गुरुवार, 4 सितंबर 2025

वेदों पर हिन्दी में भाष्य रचकर महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने उपकार किया।

जिस समय भारत में वास्कोडिगामा भी नहीं आया था, तब भी भारतीय यह जानते थे कि, सर्प के कान नहीं होते। वह केवल भूमि का कम्पन्न ही त्वचा के माध्यम से अनुभव करता है।
इसका प्रमाण है - सूरदास जी का पद जो उन्होंने तानसेन की प्रशंसा में लिखा था ---
विधना यह जिय जानि कै, सेसहिं दियें न कान |
 धरा मेरु सब डोलि हैं, तानसेन की तान।

इसीलिए उस समय भी और आज भी सपेरे भी यही कहते रहे कि, साँप/ नाग सुन नहीं सकते फिर भी वे बीन ही बजाते हैं और कोई वाद्य नहीं बजाते हैं। ताकि बीन की ध्वनि से उत्पन्न कम्पन बिल में छुपा सर्प या नाग सह नहीं पाता और तत्काल बाहर आ जाता है।
लेकिन यह तथ्य आज भी वैज्ञानिक नहीं समझ पाये।

इसलिए आधुनिक व्यावसायिक शिक्षा के अलावा हमारे गुरुकुलों में दिया जाने वाला वैदिक मन्त्र संहिताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों, षड वेदाङ्गो, चार उप वेदों, अर्थशास्त्र, श्रीमद्भगवद्गीता कर्मयोग शास्त्र, पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा दर्शन, योग शास्त्र, सांख्य शास्त्र, न्याय शास्त्र, वैशेषिक शास्त्र, का ज्ञान होना आवश्यक है।
क्योंकि श्रीमद्भगवद्गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि, शास्त्रोक्त विधि से ही केवल शास्त्रोक्त कर्म ही करें, अर्थात केवल निष्काम भाव से (परम के लिए ही अर्थात परमार्थ कर्म) यज्ञ के लिए ही यज्ञ करें। और निषिद्ध कर्मों के विषय में मन में विचार ही उत्पन्न नहीं हो। निषिद्ध कर्मों के प्रति उपरामता हो। यह तभी सम्भव है जब आपको शास्त्र ज्ञान हो।
लेकिन पौराणिकों ने वेदों को अनावश्यक सिद्ध करने के लिए लिखा कि, यह व्रत करने से या केवल यह कथा सुनने से ही हजारों अश्वमेध यज्ञ और राजसूय यज्ञों का फल मिल जाएगा। वेदों का अर्थ नही किया जा सकता। केवल कर्मकाण्ड तक वेद मन्त्रों का विनियोग है। पण्डितों ने प्रचार कर दिया कि,घर में महाभारत नहीं रखना और पढ़ना भी नहीं। नही तो जानकर हो जाओगे तो पुराणों को फैंक दोगे। वाल्मीकि रामायण में सत्य इतिहास मत पड़ो कम्बन और तुलसी कृत मन गढ़न्त रामचरितमानस पढ़ो।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने भगवान विष्णु के बीहाफ पर स्पष्ट कहा है कि, सदाचारी अनन्योन्याश्रित भक्त के योग क्षेम मैं स्वयम् वहन करता हूँ।
चमत्कारों के चक्कर में करोड़ों बर्बाद हो चुके हैं।
लेकिन जिन्हें ऋत पर पूर्ण विश्वास है, वे ही सदाचारी अनन्योन्याश्रित भक्त इन चक्करों में कभी नहीं पड़ते। वे केवल ईश्वर पर आस्था रखते हैं क्रियाओं पर नहीं।
जब वेदों का अनुवाद मेक्समूलर ने यूरोपीय जातियों को ही ज्ञानी और श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए किया तो, वैदिक संहिताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों, वैदिक भाषा छन्दस, संस्कृत, उच्चारण शास्त्र शिक्षा, पाणिनि अष्टाध्याई, पतञ्जली महाभाष्य, वररुचि का वार्तिक, भोज वृत्ति, यास्क का निरुक्त, पिङ्गल का छन्द शास्त्र, जैमिनी की और बादरायण की मीमांसा, ज्योतिष और शुल्ब सूत्र, धर्म सूत्र, गृह्य सूत्र और श्रोत सूत्र अर्थात कल्प का ज्ञान नहीं होने लेकिन अंग्रेजी शिक्षित, उसके पूर्व सायण, महिधर आदि अनेक विद्वानों के वेद भाष्य होते हुए भी भारतियों को मेक्समूलर के अनुवाद पर आस्था टिक गई ।
मेक्समूलर द्वारा स्थापित गलत अवधारणाओं का व्याकरण, निरुक्त, न्याय शास्त्र के आधार पर वेदों पर हिन्दी भाषा में भाष्य रच कर सशक्त खण्डन कर सांख्य शास्त्र और पूर्व मीमांसा दर्शन पर आधारित मान्यताओं को पुनर्स्थापित करने का कार्य दयानन्द सरस्वती जी ने किया।
यदि वेदों का भाष्य करना अनुचित है तो क्या, पूर्व में हुए भाष्यकार, उपनिषदों पर भाष्य करने वाले भगवान शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, निम्बार्काचार्य आदि सब गलत थे?
या पौराणिक लोग पुराणों द्वारा थोपी गई भ्रामक और गलत अवधारणाओं के खण्डन होने के भय से वेदाध्ययन का विरोध कर रहे हैं?

बुधवार, 3 सितंबर 2025

भक्ति कैसे करें। तीर्थ सेवन कैसे हो।

सम्पूर्ण सृष्टि रचयिता को केवल, श्रद्धा, प्रेम, भक्ति ही अर्पित कर सकते हैं। कोई सन्तान आदि व्यक्ति, रत्न, स्वर्ण, नगद, मनी ट्रांसफर या चेक आदि से रुपये -पैसे, वस्त्र, मिष्ठान आदि वस्तु, भूखण्ड आदि स्थान (संञ्ज्ञा) नहीं दिया जा सकता।
केवल मैं (अहंकार) और मेरा पन (ममत्व/ ममता), संसार और सांसारिक व्यक्ति, वस्तु और स्थान से लगाव (आसक्ति) का त्याग कर पूर्ण समर्पण कर परमात्मा में मन लगाकर एकमेव परमात्मा का ही सदा स्मरण बना रहे ऐसी एकनिष्ठ, अव्यभिचारी भक्ति हो। 
बिना लगाव के, केवल कर्तव्य पालन हेतु 
सार्वजनिक संस्थानों का सञ्चालन रखरखाव में योगदान आवश्यक है । सकामोपासन का विरोध -  कामना रहित होना चाहिए, क्यों कि, जिसने पूरी सृष्टि रचकर  "तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा , मा गृधः कस्यस्विद् धनम्।" अर्थात इसका त्याग पूर्वक केवल यथा आवश्यकता भोग करो, किसी के धन का लोभ मत करो क्योंकि यह धन (सृष्टि) केवल माया है। यह किसी की भी नहीं होती, किसी की नहीं रहती कहकर यह सृष्टि हमें सोप दी। 
अपनी योग्यता बढ़ाते जाओ आपको स्वयम् प्राप्त हो जाएगी। जैसे जो सुविधाएँ प्रधानमन्त्री को मिलती हैं वह आपको तभी मिलेगी जब आप प्रधानमन्त्री बन जाओ। यह योग्यता वर्धन आपको करना है। इसका उपाय है निष्काम रहना हमारी कामना की सामर्थ्य इतनी नहीं है कि, हम वाञ्छित प्राप्त कर सकें।

विकास के नाम पर विनाश वाली बातें और तीर्थों को उनके मूल स्वरूप में रहने पर ही वे तीर्थ रह पाएंगे। तीर्थो को पर्यटन केन्द्र न बनाया जाए इस विषय में मैं पूर्ण सहमत हूँ।

तीर्थ स्थानों पर मन्दिर में भक्तों, व्रतियो, तपस्वियों और परीक्रमा करने वालों के लिए ही व्यवस्था होती है अतः मन्दिरों आदि में  खाने - पीने, ठहरने आदि की व्यवस्था केवल तीर्थ यात्रियों के लिए ही हो न कि, पर्यटकों या सामान्य यात्रियों के लिए।
उनके लिए धर्मशाला, हॉटेल- मोटेल, रेस्टोरेंट आदि ही हैं, न कि, मन्दिर।

 असहमति -
गुरुकुल में रहकर वैदिक मन्त्र संहिताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों, षड वेदाङ्गो, अर्थशास्त्र, चारों उपवेदों, पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा, श्रीमद्भगवद्गीता, तथा  योग, सांख्य, न्याय और वैशेषिक दर्शन का अध्ययन के साथ व्यावसायिक शिक्षा ग्रहण करना अत्यावश्यक है क्योंकि,

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि, शास्त्रोक्त विधि से ही शास्त्रोक्त कर्म करते हुए ही जिएँ। निषिद्ध कर्मों के प्रति उपरामता हो। निषिद्ध कर्म के प्रति कभी भी मन में संकल्प ही नहीं उठे; कल्पना भी नहीं हो।
उक्त प्रकार से यज्ञ के लिए यज्ञ करते हुए ही अविरत हरि स्मरण बना रहे। तब ऐसे सदाचारी अनन्य भक्त के योग क्षेम मैं स्वयम् वहन करता हूँ। इसलिए निश्चिन्त रहा जाए।

साथ ही श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि, इस जन्म में व्यक्ति जितनी योग्यता प्राप्त कर जितनी उन्नति कर लेता है उतनी योग्यता के साथ ही उसका अगला जन्म तदनुकूल परिवार में होता है और वह योग भ्रष्ट पुरुष उस अगले जन्म में उससे आगे ही बढ़ता है। योग भ्रष्ट पुरुष का पतन (नाश) नहीं होता है।

शनिवार, 30 अगस्त 2025

ज्येष्ठा, अलक्ष्मी, निऋति और कनिष्ठा लक्ष्मी।

ज्यैष्ठा देवी की तुलना निऋति या निर्ऋति से कर सकते हैं।
निऋति अधर्म और हिन्सा से उत्पन्न, अव्यवस्था (ऋत का अभाव) स्वरूप, अज्ञान, दारिद्र, (कङ्गाली के स्तर की गरीबी), रोग, वृद्धावस्था, बाँझपन (निस्सन्तानत्व), भय, महाभय (आतङ्क) और मृत्यु तथा नर्कवास प्रदाता, दक्षिण-पश्चिम की अधिष्ठात्री देवी है। जिनका स्वरूप दुर्गासप्तशती की चण्ड-मुण्ड विनाशनी काली देवीबर (चामुण्डा) के समान है। इनका वाहन पुरुष का शव है।
पौराणिक मत में समुद्र मन्थन में लक्ष्मी के ठीक पहले प्रादुर्भाव होने के कारण इन्हें ज्येष्ठा कहा जाता है। इन्हें राक्षसों को सोपा गया। निऋति को राक्षसों का शासक माना जाता है।
भय वश लक्ष्मी पूजा के पहले ज्येष्ठा की पूजा की जाती है।

यथार्थ में पहले अलक्ष्मी निस्तारण (अटाला बाहर) करनें के बाद श्री लक्ष्मी का आव्हान करना चाहिए।
इसलिए दीपावली के पहले साफ सफाई करके ही लक्ष्मी पूजा करते हैं।और बची खुची अलक्ष्मी निस्तारण रात में चार-पांच बजे के बीच पुरानी झाड़ू सहित कर दिया जाता है।

लेकिन आदिवासी दीवाली के दिन न तो झाड़ू लगाते हैं, न नहाते हैं। धोते तो कभी नहीं है। उनका मानना है कि, धोने से घर धुल जाता है। इसलिए पत्थर से पोंछ लेते हैं।😃

जैन लोग भी रुद्र देवता की तिथियों अष्टमी और चतुर्दशी को मूंह तक नहीं धोते हैं। अमावस्या को भी नहीं नहाते हैं।

पौराणिक परम्परा में शंकर जी ने लक्ष्मी को बहन माना है।
लक्ष्मी देवी के बहुत से रूप पुराणों में प्रसिद्ध है।--- 
प्रभविष्णु और श्री तथा लक्ष्मी अर्थात नारायण और नारायणी।
श्रीहरि की शक्ति समुद्र मन्थन से निकली कमलासना लक्ष्मी जिन्हें दो गज स्नान कराते रहते हैं।
महर्षि भृगु की पुत्री लक्ष्मी जिसे शंकर जी ने बहन माना है। सम्भवतः इनका विवाह वामन अवतार से हुआ।

गजलक्ष्मी व्रत की कथा 
पूजा विधि ।
 
धर्मशास्त्रों के अनुसार भाद्रपद शुक्ल अष्टमी ज्येष्ठा नक्षत्र युक्त अमान्त भाद्रपद पूर्णिमान्त आश्विन कृष्ण अष्टमी तक हाथी पर सवार देवी गजलक्ष्मी/ मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना की जाती है।  
सोलह दिनों तक चलने वाले इस व्रत में निम्न कथा पढ़ी जाती है। गज लक्ष्मी देवी की पूजा तथा कृपा से अच्छे स्वास्थ्य तथा सुखी जीवन की कामना पूर्ण होती है।  

गजलक्ष्मी व्रत कथा 
 
मान्यतानुसार महाभारत काल में देवी कुंती ने भी यह व्रत किया था। 
एक समय महर्षि श्री वेदव्यास जी हस्तिनापुर पधारे। उनका आगमन सुन महाराज धृतराष्ट्र उनको आदर सहित राजमहल में ले गए। स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान कर उनका पूजन किया। श्री व्यास जी से माता कुंती तथा गांधारी ने हाथ जोड़कर प्रश्न किया- हे महामुने! आप त्रिकालदर्शी हैं अत: आपसे हमारी प्रार्थना है कि आप हमको कोई ऐसा सरल व्रत तथा पूजन बताएं जिससे हमारा राज्यलक्ष्मी, सुख-संपत्ति, पुत्र-पोत्रादि व परिवार सुखी रहें।
 
इतना सुन श्री वेद व्यास जी कहने लगे- मैं आप लोगों के समक्ष एक ऐसे व्रत का पूजन व वर्णन करूँगा; जिससे सदा लक्ष्मी जी का निवास होकर सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है। 
यह श्री महालक्ष्मी जी का व्रत है, इसे गजलक्ष्मी व्रत भी कहा जाता है। जिसे प्रतिवर्ष अमान्त भाद्रपद पूर्णिमान्त आश्विन कृष्ण अष्टमी को विधिवत किया जाता है।
 
कुन्ती और गान्धारी ने कहा हे महामुने! इस व्रत की विधि हमें विस्तारपूर्वक बताने की कृपा करें। 
तब व्यास जी बोले- 
'हे देवी! यह व्रत ज्येष्ठा नक्षत्र युक्त भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से प्रारंभ किया जाता है। इस दिन स्नान करके सोलह सूत के धागों का डोरा बनाएं, उसमें सोलह गांठ लगाएं, हल्दी से पीला करें। प्रतिदिन डोरे को सोलह दूब व सोलह गेहूं चढ़ाएं। 
 
अमान्त भाद्रपद पूर्णिमान्त आश्विन कृष्ण अष्टमी के दिन उपवास रखकर मिट्टी के हाथी पर श्री महालक्ष्मी जी की प्रतिमा स्थापित कर विधिपूर्वक पूजन करें। इस प्रकार श्रद्धा-भक्ति सहित महालक्ष्मी जी का व्रत, पूजन करने से आप लोगों की राज्यलक्ष्मी में सदा अभिवृद्धि होती रहेगी। इस प्रकार व्रत का विधान बताकर श्री वेदव्यास जी अपने आश्रम को प्रस्थान कर गए।
 
इधर समयानुसार ज्येष्ठा नक्षत्र युक्त भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से गांधारी तथा कुंती अपने-अपने महलों में नगर की स्‍त्रियों सहित व्रत का आरंभ करने लगीं। इस प्रकार पन्द्रह दिन बीत गए। सोलहवें दिन अमान्त भाद्रपद पूर्णिमान्त आश्विन कृष्ण अष्टमी के दिन गांधारी ने नगर की स‍भी प्रतिष्ठित महिलाओं को पूजन के लिए अपने महल में बुलवा लिया। माता कुंती के यहां कोई भी महिला पूजन के लिए नहीं आई। साथ ही माता कुंती को भी गांधारी ने नहीं बुलाया। ऐसा करने से माता कुंती ने अपना बड़ा अपमान समझा। उन्होंने पूजन की कोई तैयारी नहीं की एवं उदास होकर बैठ गईं।
 
जब पांचों पांडव युधिष्ठिर, अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव महल में आए तो कुंती को उदास देखकर पूछा- हे माता! आप इस प्रकार उदास क्यों हैं? आपने पूजन की तैयारी क्यों नहीं की?' 
 
तब माता कुंती ने कहा- 'हे पुत्र! आज महालक्ष्मी जी के व्रत का उत्सव गांधारी के महल में मनाया जा रहा है। उन्होंने नगर की समस्त महिलाओं को बुला लिया और उसके सौ पुत्रों ने मिट्टी का एक विशाल हाथी बनाया, जिस कारण सभी महिलाएं उस बड़े हाथी का पूजन करने के लिए गांधारी के यहां चली गईं, लेकिन मेरे यहां नहीं आईं। 
 
यह सुनकर अर्जुन ने कहा- 'हे माता! आप पूजन की तैयारी करें और नगर में बुलावा लगवा दें कि हमारे यहां स्वर्ग के ऐरावत हाथी की पूजन होगी। इधर माता कुंती ने नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया और पूजा की विशाल तैयारी होने लगी। उधर अर्जुन ने बाण के द्वारा स्वर्ग से ऐरावत हाथी को बुला लिया। 
इधर सारे नगर में शोर मच गया कि कुंती के महल में स्वर्ग से इंद्र का ऐरावत हाथी पृथ्वी पर उतार कर पूजा जाएगा। 
 
समाचार को सुनकर नगर के सभी नर-नारी, बालक एवं वृद्धों की भीड़ एकत्र होने लगी। 
उधर गांधारी के महल में हलचल मच गई। वहां एकत्र हुईं सभी महिलाएं अपनी-अपनी थालियां लेकर कुंती के महल की ओर जाने लगीं। देखते ही देखते कुंती का सारा महल ठसाठस भर गया। माता कुंती ने ऐरावत को खड़ा करने हेतु अनेक रंगों के चौक पुरवा कर नवीन रेशमी वस्त्र बिछवा दिए। नगरवासी स्वागत की तैयारी में पुष्प माला, अबीर, गुलाल, केशर हाथों में लिए पंक्तिबद्ध खड़े थे। 
 
जब स्वर्ग से ऐरावत हाथी पृथ्‍वी पर उतरने लगा तो उसके आभूषणों की ध्वनि गूंजने लगी। ऐरावत के दर्शन होते ही जय-जयकार के नारे लगने लगे। सायंकाल के समय इन्द्र का भेजा हुआ हाथी ऐरावत माता कुंती के भवन के चौक में उतर आया, तब सब नर-नारियों ने पुष्प-माला, अबीर, गुलाल, केशर आदि सुगंधित पदार्थ चढ़ाकर उसका स्वागत किया। 

राज्य पुरोहित द्वारा ऐरावत पर महालक्ष्मी जी की मूर्ति स्थापित करके वेद मंत्रोच्चार द्वारा पूजन किया गया। नगरवासियों ने भी महालक्ष्मी पूजन किया। फिर अनेक प्रकार के पकवान लेकर ऐरावत को खिलाए और यमुना का जल उसे पिलाया गया। राज्य पुरोहित द्वारा स्वस्ति वाचन करके महिलाओं द्वारा महालक्ष्‍मी का पूजन कराया गया। सोलह गांठों वाला डोरा लक्ष्मी जी को चढ़ाकर अपने-अपने हाथों में बांध लिया। ब्राह्मणों को भोजन कराया गया। दक्षिणा के रूप में स्वर्ण आभूषण, वस्त्र आदि दिया गया। तत्पश्चात महिलाओं ने मिलकर मधुर संगीत लहरियों के साथ भजन-कीर्तन कर संपूर्ण रात्र‍ि महालक्ष्‍मी व्रत का जागरण किया।

दूसरे दिन प्रात: राज्य पुरोहित द्वारा वेद मंत्रोच्चार के साथ जलाशय में महालक्ष्मी जी की मूर्ति का विसर्जन किया गया। फिर ऐरावत को बिदा कर इंद्रलोक को भेज दिया। इस प्रकार जो स्‍त्रियां श्री महालक्ष्मी जी का विधिपूर्वक व्रत एवं पूजन करती हैं, उनके घर धन-धान्य से पूर्ण रहते हैं तथा उनके घर में महालक्ष्मी जी सदा निवास करती हैं। ऐसी इस गजलक्ष्मी व्रत की महिमा है। 
 
पूजन के समय महालक्ष्मी जी की यह स्तुति अवश्य बोलें-
 
महालक्ष्‍मी नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं सुरेश्वरि।
हरि प्रिये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं दयानिधे।।

*महाराष्ट्र में प्रचलित ज्येष्ठा कनिष्ठा महालक्ष्मी व्रत*
 *ज्येष्ठागौरी का आह्वान पूजन और विसर्जन* ---

अग्निपुराण एवं देवी भागवत (स्कंद ९.३८/३९) में ‘यमराज – सावित्री’ संवाद में भाद्रपद शुक्ल अष्टमी, ज्येष्ठा नक्षत्र में ‘महालक्ष्मी / गौरी पूजन’ का उल्लेख है |
कुछ ग्रंथो के अनुसार रजोगुण से युक्त ज्येष्ठा गौरी यह ‘अलक्ष्मी’ है, जिसका पूजन प्रथम किया जाता है | और कनिष्ठा यह ‘लक्ष्मी’ है जिसका पूजन बादमे होता है |
यह शिवपरिवार की देवी है और ‘कनौज’ में इसका महापीठ है |
इसने स्त्रियोंके सौभाग्य का असुरोंसे रक्षण किया, तभीसे ‘महालक्ष्मी गौरी पूजन’ की शुरुवात हुई ऐसा भी बताया जाता है |
चैत्र मासमे भी प्रतिपदा से अक्षय तृतीया तक इसका पूजन किया जाता है |
 ‘संगीत पारिजात’ ग्रन्थ के अनुसार ‘गौरी’ यह माता पार्वतीकी ‘रागिनी’ है जिसको संध्याकाल में गाया जाता है | (इसमे ऋषभ,धैवत कोमल बाकी सब स्वर शुद्ध है |)

*भाद्रपद शुक्ल पक्ष में अनुराधा नक्षत्र में आह्वान,अष्टमी तिथियुक्त ज्येष्ठा नक्षत्र में पूजन और मूल नक्षत्र में विसर्जन होता है।*

मैत्रेणावाहये देवीं ज्येष्ठायां तु प्रपूजयेत् | मूले विसर्जये देवीं त्रिदिनं व्रतमुत्तमम् ||
यदाज्येष्ठा द्वितीयदिने मध्यान्हात्पूर्वम् समाप्यते | तदा पूर्वदिनमेव पूजनम् |
परदिने अपराण्हे स्पृशति तदा परैव ||

वैशिष्ट्य
इस उत्सव मे ज्येष्ठा / कनिष्ठा देवी की अपत्यप्राण एकत्रित पूजा की जाती है |
इस पूजा में भी बहुत विविधताए दिखती है |

जैसे मिट्टीके द्वारा बनाए हुए परम्परागत देवियों प्रतिमाओं की पूजा कर आराधना की जाती है जहा आकर्षक आरास (साज-सज्जा) और झांकी (शोभा) बनाई जाती है |
कई बार मटको द्वारा रची आरास (साज-सज्जा) को पोशाक अलंकार आदि पहनाकर उनका पूजन किया जाता है |
दक्षिण भारत के कुछ स्थानों पर यह उत्सव भाद्रपद शुक्ल तृतीया से मनाया जाता है। वहाँ आटे से बनी देवी प्रतिमाओं का पूजन किया जाता है |
कुछ स्थानों पर धान्य राशि पर रची देवियों की छवि की पूजा की जाती है |
कोकण प्रांत में नदी / तालाब से बालू व कंकर लाकर उनकी स्थापना एवं पूजन किया जाता है |
कोली आदि कुछ समाज गुलतेवड़ी (तेरडा) नामक वनस्पति के पौधे लाकर उनमे देवियोकी स्थापना व पूजन करते हैं |

पूजन क्रम
साधारणतः यह उत्सव तीन दिन मनाया जाता है तथा यह नक्षत्र प्रधान माना जाता है |

प्रथम दिन
इस दिन अनुराधा नक्षत्र को ‘गौरी देवि’ का आवाहन किया जाता है | घर की सौभाग्यवती महिलाए द्वार पर इसे लेकर आती है |
पश्चात उनका दुध से पाद प्रक्षालन किया जाता है और कुमकुम से ‘महालक्ष्मी पदचिन्ह’ बनाकर मङ्गल ध्वनी से उन्हें घरका दर्शन कराया जाता है |
बादमे जहा आरास (साज-सज्जा) रची हो वहा इन्हें स्थापित किया जाता है |
कई बार जहा इन्हें स्थापित किया जाता है वहा (जैसे विवाह में मण्डप में धातु या मिट्टी के मटकों से झांकी सजाते हैं वैसे ही) धान्य से भरी हुई मटके पायली या मटके का उपयोग किया जाता है | (सात सेर अनाज मापने के बर्तन को पायली कहते हैं।) 
बादमे ‘भाजी-भाकरी’ (अम्बाडे की सब्जी) का भोग चढाने का भी रिवाज पाया जाता है |

द्वितीय दिन
ज्येष्ठा नक्षत्र में ‘गौरी पूजन’ सम्पन्न किया जाता है | इसकी पूजन विधि इस प्रकार है –

पूजन विधी
वंदन ---
घरके सभी बड़े व बुजुर्गोको, अपने घरमे स्थापित देवता और कुलदेवता को वंदन करे |
आचमन / प्राणायाम : तीन बार जल प्राशन करते हुए चौथी बार पत्र में छोड़े और प्राणायाम करे |
देवतास्मरण :
कुलदेवताभ्यो नमः| ग्रामदेवताभ्यो नमः| एतत् कर्म प्रधान देवताभ्यो नमः| सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमो नमः|

संकल्प --- 
(हाथसे जल छोड़े )
मम सकुटुंबस्य सपरिवारस्य अलक्ष्मी निरसनपूर्वक धनधान्य पुत्रपौत्र सौभाग्यादि अभिवृद्धिद्वारा श्रीज्येष्ठादेवी प्रीत्यर्थं भाद्रपद शुक्लपक्षे ज्येष्ठा नक्षत्रे यथाज्ञानेन यथाशक्ति यथामिलित उपचार द्रव्यैः षोडशोपचार ज्येष्ठादेवी पूजनं अहं करिष्ये |

तत्रादौ निर्विघ्नता सिध्यर्थं महागणपति स्मरणं शरीर शुध्यर्थं षडङ्गन्यासं पृथ्वी, कलश, शङ्ख, घण्टा पूजनं च करिष्ये |

श्रीगणेश पूजन ---
वक्रतुण्ड महाकाय सुर्यकोटि समप्रभ |निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा || श्रीगणेशाय नमः ||

पृथ्वी पूजन ---
पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता | त्वं च धारय मां देवी पवित्रं कुरु चासनम् || भूम्यै नमः ||

न्यास विधि --- 
विष्णवे नमः | ऐसा १२ बार कहते हुए मस्तक से लेके चरण पर्यंत स्वयं की शरीर शुद्धि करे | 

कलश पूजन --
कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः | मूले तत्रस्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः || कलशाय नमः ||

शङ्ख पूजन ---
त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृतः करे | नमितः सर्व देवैश्च पाञ्चजन्य नमोस्तुते || शङ्खाय नमः ||

घण्टा पूजन ---
आगमार्थं तु देवानां गमनार्थं तु राक्षसाम् | कुर्वे घण्टारवं तत्र देवताव्हान लक्षणम् || घण्टायै नमः ||

दीप पूजन ---
भो दीप ब्रह्म रूपस्त्वं ज्योतिषां प्रभुरव्ययः | आरोग्यं देहि पुत्रांश्च सर्वान्कामान्प्रयच्छ मे || दीपदेवताभ्यो नमः ||

आत्मशुद्धि---
स्वयं पर एवं पूजा साहित्य पर शंख जल प्रोक्षण करे |
शङ्खोदकेन पूजाद्रव्याणि संप्रोक्ष्य आत्मानं च प्रोक्षेत् |

प्राणप्रतिष्ठा विधी

आवाहित देवता को दाहिने हाथ से स्पर्श करते हुए अग्रिम श्लोको का उच्चारण करे,

अस्यैः प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यैः प्राणाः क्षरन्तु च | अस्यै देवत्वमर्चायै मा महेतिच कच्चन ||
अस्यां मूर्तौ मम प्राण इह प्राणाः | अस्यां मूर्तौ मम जीव इह स्थितः ||

देवता को दर्पण दिखाए तथा अष्टगंध, पुष्प एवं बालभोग (घी-गुड) अर्पण करे |
पात्र में जल छोड़ते हुए बोले,“अनया पूजया अपत्यप्राण सहित श्रीज्येष्ठाकनिष्ठिका: प्रीयताम् |”
अधिक विस्तृत विधी करने हेतु पुरोहितका मार्गदर्शन ले |

पूर्वपूजन
ध्यान ---
हाथ में अक्षत, पुष्प लेकर आवाहित देवता का इस श्लोक से ध्यान करे और उसे अर्पण करे |

त्रिलोचनां शुक्लदन्तीं बिभ्रतीं काञ्चनीं तनुम् |विरक्ता रत्कनयनां ज्येष्ठां ध्यायामि सुन्दरीम् ||
अपत्यप्राण सहित श्रीज्येष्ठाकनिष्ठिकाभ्यां नमः || ध्यानं समर्पयामि ||

पूर्व उपचार--- 
 तत्पश्चात “अपत्यप्राण सहित श्रीज्येष्ठाकनिष्ठिकाभ्यां नमः ||” ऐसा उच्चारण करते हुए या श्रीसूक्त के हरेक मंत्र से आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, पंचामृतस्नान, गंधोदक स्नान, मांगलिक स्नान, शुद्धोदक स्नान आदि सभी पूजा उपचार पुष्प से जल सिंचन करते हुए करे |
धूप, दीप, नैवेद्य ---
 बाद में पुर्वपुजन प्रीत्यर्थ भगवान पर फूल चढ़ाए, धुप – दीप और शेष पंचामृत या घी-गुड का भोग चढ़ाए |
पुर्वपूजन समारोप : अब अभिषेक करने हेतु पहले के पुष्प (निर्माल्य) उतारकर नए पुष्प चढ़ाए और कहे.
“अनेन पुर्वाराधनेन अपत्यप्राण सहित श्रीज्येष्ठाकनिष्ठिका: प्रीयताम् |”
अभिषेक : इस समय श्री देवीस्तुतीपर श्रीसूक्त या देवीस्तोत्र आदिका पठण करे और पुष्प से जलसिंचन करे |
अंग पूजा ---
 प्रत्येक इन्द्रियोपर / प्रत्येक नामके बाद देवीको अक्षत अर्पण करे |
लक्ष्म्यै नमः – पादौ पूजयामि ||, पद्मायै नमः – गुल्फौ पूजयामि ||
कमलायै नमः – जानुनी पूज. ||, क्षिराब्धितनयाय नमः –उरुं पूज.||
इन्दिरायै नमः – कटिं पूज. ||, मन्गलायै नमः – नाभिं पूज. ||
मन्मथवासिन्यै नमः – स्तनौ पूज.||, क्षमायै नमः – हृदयं पूज.||
हरिप्रियाय नमः – कण्ठे पूज. ||, उमायै नमः – नेत्रे पूज. ||
रमायै नमः – शिरं पूज. ||, श्रीमहालक्ष्म्यै नमः – सर्वाङ्गं पूज.||

नामपत्री पूजा --- 
प्रत्येक नाम के साथ उल्लेखित पत्री (ना होने पर अक्षत) अर्पण करे |
श्रीयै नमः – अगस्तीपत्रं समर्पयामि || (अगस्ती वृक्षपान)
श्रीलक्ष्म्यै नमः – केतकीपत्रं समर्प. || (केवड्याचे पान)
श्रीवनमालिकाये नमः – धत्तुरापत्रं समर्प.|| (धोत्र्याचे पान)
बिभिषणायै नमः – तुलसीपत्रं समर्प.|| (तुळशीचे पान)
शाकय नमः – अशोकपत्रं समर्प. || (अशोकाचे पान)
वसुमालिकायै नमः – भृन्गराजपत्रं समर्प. || (माक्याचे पान)
सूर्यायै नमः – किन्वपत्रं समर्प. || (केन्याचे पान)
पन्कजधारिण्यै नमः – पङ्कजपत्रं समर्प. || (कमळाचे पान)
मुक्ता हारसमप्रभायै नमः – दुर्वां समर्प. || (दुर्वा)
पुष्कारिण्यै नमः – जपापत्रं समर्प. || (जास्वंदाचे पान)
पिन्गलिन्यै नमः – बिल्वपत्रं समर्प. || (बेलाचे पान)
हेममालिन्यै नमः – चंपकपत्रं समर्प. || (चाफ्याचे पान)
इन्दिरायै नमः – अपामार्गपत्रं समर्प. || (आघाड्याचे पान)
जमदग्निप्रियाय नमः – ताडपत्रं समर्प. || (ताडाचे पान)
श्रीजगदात्र्यै नमः – नानाविधपत्राणि समर्प. || (इतर सर्व पाने)

उत्तर पूजन

 *अपत्यप्राण सहित श्रीज्येष्ठाकनिष्ठिकाभ्यां नमः |*
 इस श्लोकसे सूती वस्त्र, गंध, अक्षत, पुष्प, हल्दी – कुमकुम, माला, इत्र – सुगंधी द्रव्य, अलंकार आदी उपचार अर्पण करे |
अपने कुलपरम्परा के अनुसार वस्त्र, सूत्र, धान्य-राशि, पत्री आदि अर्पण करे |
कुछ जगहों पर ‘फुलोरा’ बनाया जाता है तथा कुछ जगहों पर ‘कथली आम्बिल’ पूजन किया जाता है |
इसके बाद में गोद भराई /ओटी / वायन दान दिया जाता है |
नैवेद्य में घावन घाटले / पुरणपोली / आंबील / सोलह सब्जी आदि पदार्थोका भोग चढ़ाया जाता है |
आरती व मंत्रपुष्प ---
बाद में आरती व मंत्रपुष्पांजली, प्रदक्षिणा व नमस्कार अर्पण करे,

महालक्ष्मी च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमहि | तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ||”मन्त्रपुष्पाञ्जलिं समर्पयामि ||

अर्घ्यप्रदान ---
 दाहिने हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प, सुपारी, सिक्का लेकर उसपर जल छोड़ते हुए इस श्लोक से अर्घ्य दे |
ज्येष्ठे श्रेष्ठे तपोनिष्ठे ब्रह्ममिष्ठे सत्यवादिनी |इह्येहित्वं महाभागे अर्घ्यं गृह्य सरस्वती ||श्रीज्येष्ठागौर्यै नमः | इदं अर्घ्यं समर्पयामि ||

प्रार्थना ---
हाथ जोड़कर प्रार्थना करे और तदनन्तर ब्राह्मण-सुवासिनी पूजन करे |
त्वं लक्ष्मीस्त्वं महादेवी त्वं ज्येष्ठे सर्वदामरैः |पूजितोsसि मया देवी वरदाभव मे सदा ||

तृतीय दिन

मूल नक्षत्र में आवाहित देवताका विसर्जन किया जाता है |

आवाहित देवता का पंचोपचार पूजन किया जाता है |
कुल परम्परा के अनुसार दहीभात / मुरडपोली इ. का भोग लगाया जाता है |
बादमे पूजा कथा सुनते है और सूत्र को पीले रंगका और सोलह गाठीयोसे बांधा जाता है | इस प्रसादरुपी सूत्र को महिलाए गलेमे धारण कराती है | कई बार यह सूत्र आश्विन पौर्णिमा तक पहना जाता है |  
ग्रामीण भागो में प्राप्त धान्य का ‘राशि भोज’ कराने की प्रथा दिखाई देती है |
इस श्लोक का उच्चारण करते हुए आवाहित देवताका विसर्जन किया जाता है,
ज्येष्ठे देवी समुत्तिष्ठ स्वस्थानं गच्छ पूजिता |ममाभीष्ट पदानार्थं पुनरागमहेतवे ||



*आचार्य कमल नन्दलाल के अनुसार महाकौशल प्रांत में प्रचलित कथा* ⤵️

*संकल्प मंत्र---* 
करिष्यsहं महालक्ष्मि व्रत में त्वत्परायणा। तदविध्नेन में यातु समप्तिं स्वत्प्रसादत:॥

 *सोलह बोल की कथा---* अमोती दमो तीरानी, पोला पर ऊचो सो परपाटन गांव जहां के राजा मगर सेन दमयंती रानी, कहे कहानी। सुनो हो महालक्ष्मी देवी रानी, हम से कहते तुम से सुनते सोलह बोल की कहानी॥

 *विशिष्ट मंत्र---
* ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गजलक्ष्म्यै नमः॥

*सोलह दिनात्मक गजलक्ष्मी व्रत कथा एवम विधि।*

ऋग्वेद में देवी लक्ष्मी को ‘श्री’ व भूमि प्रिय सखी कहा है। लक्ष्मी को चंचला भी कहते हैं अर्थात जो कभी एक स्थान पर रूकती नहीं। 
श्री का अर्थ है व्यक्ति की हैसियत या औकात। 
शब्द “लक्ष्मी” का अर्थ है लक्ष्य को साधना। शास्त्रों में वर्णित लक्ष्मी के आठ स्वरूपों में से गजलक्ष्मी स्वरूप को कलयुग में सर्वश्रेष्ठ माना गया है क्योंकि इससे गरीबी दूर होती है। इन्हीं देवी गजलक्ष्मी की साधना का महापर्व है सोलह दिनों तक चलने वाला महालक्ष्मी व्रत।

ज्योतिष के पञ्चाङ्ग खंड अनुसार गजलक्ष्मी महापर्व अर्थात महालक्ष्मी व्रत का प्रारंभ भाद्रपद शुक्ल अष्टमी ज्येष्ठा नक्षत्र से होगा व इसका समापन अमान्त भाद्रपद पूर्णिमान्त आश्विन कृष्ण अष्टमी के दिन होगा। अर्थात राधा अष्टमी से कालाष्टमी तक चलने वाला गजलक्ष्मी महापर्व सूर्य के स्थिति से संबंधित है। जब सूर्य निरयन कन्या राशि में आता है इन्हीं सोलह दिनों में महालक्ष्मी के गजलक्ष्मी स्वरूप की पूजा का विधान है। 
इस व्रत का आरम्भ ज्येष्ठा नक्षत्र के चंद्र से करना चाहिए। इस व्रत में षोडश यानि 16 की संख्या का महत्व है जैस 16 वर्षों हेतु, 16 दिन हेतु, 16 नर-नारियों हेतु, 16 पुष्प-फल 16 धागों व 16 गांठों का डोरा इत्यादि।

 *पूजन विधि---* 
शास्त्रनुसार इस व्रत में 16 दिनों तक हाथी पर विराजित लक्ष्मी की स्थापना सूर्यास्त के बाद दो घण्टे चौबीस मिनट में अर्थात प्रदोष काल में नीचे दिए गए संकल्प मंत्र
*संकल्प मंत्र:* 
करिष्यsहं महालक्ष्मि व्रत में त्वत्परायणा। तदविध्नेन में यातु समप्तिं स्वत्प्रसादत:॥ बोलकर संकल्प लेकर करें। 
चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर केसर-चंदन से रंगे अक्षत से अष्टदल बनाकर कलश स्थापित कर मिट्टी से बने 2 हाथियों संग गजलक्ष्मी की मूर्ति प्रतिष्ठित करें। गजलक्ष्मी की 16 उपायों से षोडशुपचार पूजा करें। *गौघ्रत का दीप व सुगंधित धूप करें, रोली, चंदन, ताल, पत्र, दूर्वा, इत्र, सुपारी, नारियल व कमल पुष्प चढ़ाएं। नैवेद्य में गेहूं के आटे से बना मीठा रोट चढ़ाएं व 16 श्रृंगार चढ़ाएं। हल्दी से रंगे 16-16 सूत के 16 सगड़े बनाकर हर सगड़े पर 16 गांठे देकर गजलक्ष्मी पर चढ़ाएं।* 
इस व्रत में 16 बोल की कथा ---
*अमोती दमो तीरानी, पोला पर ऊचो सो परपाटन गांव जहां के राजा मगर सेन दमयंती रानी, कहे कहानी। सुनो हो महालक्ष्मी देवी रानी, हम से कहते तुम से सुनते सोलह बोल की कहानी।* 16 बार कहें ।
कमलगट्टे की माला से इस विशिष्ट मंत्र ---
*ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गजलक्ष्म्यै नमः।* 
का 16 माला जाप करें। 

*सोलह बोल की कथा---
*अमोती दमो तीरानी, पोला पर ऊचो सो परपाटन गांव जहां के राजा मगर सेन दमयंती रानी, कहे कहानी। सुनो हो महालक्ष्मी देवी रानी, हम से कहते तुम से सुनते सोलह बोल की कहानी।*

 *विशिष्ट मंत्र---
* ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गजलक्ष्म्यै नमः॥*

सोमवार, 25 अगस्त 2025

सच्चा धर्म दर्शन।

मत और सम्प्रदाय अनेक होते हैं।
धर्म और दर्शन एक ही है जो वैदिक मन्त्र संहिताओं में उल्लेखित है।

ब्राह्मण ग्रन्थों के पूर्व के अध्याय धर्म- व्यवहार और कर्मकाण्ड सम्बन्धित वेद मन्त्रों की व्याख्या करते हैं। इनकी मीमांसा जैमिनी ने पूर्व मीमांसा दर्शन में की है।

उल्लेखनीय है कि, ब्राह्मण ग्रन्थों का अन्तिम भाग आरण्यक कहलाता है। आरण्यकों में वानप्रस्थ आश्रम सम्बन्धित वेद मन्त्रों की व्याख्या की गई है। 
इन्हीं आरण्यकों के प्रायः अन्तिम अध्याय होने से वेदान्त और आत्म विद्या प्रधान होने उपनिषद कहलाते हैं और ब्रह्मविद्या प्रधान होने से श्रीमद्भगवद्गीता में उपनिषदों को ब्रह्म सूत्र कहा गया हैं।
इन आरण्यकों और उपनिषदों की मीमांसा बादरायण ने उत्तर मीमांसा दर्शन में की है। जिसे शारीरिक सूत्र भी कहते हैं। और ब्रह्मवाद की मीमांसा होने से ब्रह्म सूत्र भी कहते हैं।
वैदिक मन्त्र संहिताओं को समझने में सहायक ग्रन्थों को वेदाङ्ग कहते हैं। जिसमे 
1 उच्चारण की शिक्षा को शिक्षा वेदाङ्ग कहते हैं। 
2 (पाणिनि की अष्टाध्याई व्याकरण, इसपर पतञ्जली का महाभाष्य, इस भाष्य पर व्यास की विश्लेषणात्मक व्याख्या भोज वृत्ति और कात्यायन की आलोचनात्मक व्याख्या वार्तिक इन सब को मिलाकर व्याकरण वेदाङ्ग कहते हैं। 
3 मन्त्र संहिताओं में आये शब्दों की व्युत्पत्ति को (यास्क का ) निरुक्त और (अमरकोश आदि) शब्दकोश को निघण्टू कहते हैं। ये दोनों मिलकर ही निरुक्त वेदाङ्ग कहलाते हैं।
4 वेद मन्त्रों के छन्दों का का व्याकरण (पिङ्गल का छन्द शास्त्र) छन्द वेदाङ्ग कहलाता है।
5 वैदिक मन्त्रों में आये ब्रह्माण्ड विज्ञान और गणित सम्बन्धित मन्त्रों की व्याख्या विशेषकर अथर्ववेद, तैत्तिरीय संहिता, तैत्तिरीय ब्राह्मण, (नारद संहिता, गर्ग संहिता, लगध) आदि के ग्रन्थ ज्योतिष वेदाङ्ग कहलाता है।
6 कल्प के अन्तर्गत वैदिक संहिताओं में उल्लेखित आचार नियमों पर आधारित विधि-विधान और निषेधों के सूत्र धर्म सूत्र ।
 ब्रह्माण्डो, आकाश गङ्गाओं, सौर मण्डलों आदि के नक्शों के अनुरूप मण्डप और मण्डल और यज्ञ वेदी बनाने की विधि विधान शुल्ब सूत्र।
संस्कार, उत्सव आदि के सम्बन्ध में वैदिक मन्त्रों और ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित गृह्यसूत्र।
बड़े-बड़े यज्ञ सत्रों के विधि विधान सम्बन्धित वेद मन्त्रों और ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित श्रोत सूत्र।
ब्राह्मण ग्रन्थों द्वारा इनकी पुष्टि होती है। ये सब मिलाकर कल्प वेदाङ्ग कहलाता है।

इनके अलावा ऋग्वेद के स्वास्थ्य चर्या सम्बन्धित मन्त्रो पर ग्रन्थ आयुर्वेद नामक उपवेद है।
यजुर्वेद के मन्त्रों पर आधारित युद्ध विद्या, दुर्ग निर्माण और सुरक्षा, अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण, रखरखाव और सञ्चालन का विज्ञान धनुर्वेद उपवेद। इसी के साथ राजनीति के ग्रन्थ अर्थशास्त्र कहलाते हैं।
सामवेद के मन्त्रों पर आधारित सङ्गीत के उपकरण निर्माण और रखरखाव, गायन, वादन,, नाट्य में उपयोगी मञ्च निर्माण, व्यवस्था, अभिनय और नृत्य-नाट्य आदि सम्बन्धित मन्त्रों पर आधारित गन्धर्ववेद।
अथर्ववेद में उल्लेखित शिल्प विद्या और वास्तु विज्ञान, भवन निर्माण, सेतु और मार्ग और पथ निर्माण, रखरखाव आदि की विद्या शिल्पवेद या स्थापत्य वेद।

जो अहिन्सा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य , अपरिग्रह, शोच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान को मानने वाला वैदिक मन्त्र संहिताओं और ब्राह्मण ग्रन्थों और सूत्र ग्रन्थों पर आधारित आचरण, और तदानुसार पञ्च महायज्ञ ही धर्म है
अर्थात जो धर्म उक्त क्राइटेरिया में फिट बैठता हो बस वही सच्चा धर्म है। 
 और अभेद दर्शन ही दर्शन है। जो 
ॐ ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम्।।
तथा 
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत् समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ 
सर्व खल्विदम् ब्रह्म, प्रज्ञानम् ब्रह्म, अयमात्मा ब्रह्म, तत् त्वम असि और अहम् ब्रह्मास्मि आदि महावाक्यों को सिद्ध करता हो वही सोच-विचार, मान्यता और अनुभव सच्चा दर्शन है।
सांख्य दर्शन में मात्र तत्व मीमांसा है, योग दर्शन में जीवन पद्धति और कर्म मीमांसा है।
जिसके आधार पर श्रीमद्भगवद्गीता में कर्म मीमांसा की गई है। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार स्वयम् को ईश्वरीय कार्य में नियुक्त मानकर, सभी कर्तव्य कर्मों को ईश्वरीय विधान समझकर, शास्त्रोक्त कर्म शास्त्रोक्त विधि से ही निष्काम भाव से कर्म करने को ही सत्य और उचित कर्म कहती है। परम के लिए अर्थात परमार्थ कर्म ही करना अर्थात यज्ञ के लिए यज्ञ करना श्रीमद्भगवद्गीता की कर्म मीमांसा  है।
वैशेषिक दर्शन भौतिक वैज्ञानिक पद्धति दृष्टि से सृष्टि के तत्वों की विवेचना है।
न्याय दर्शन तर्कशास्त्र है, जो बतलाता है कि, निर्णय पर कैसे पहूँचा जाए।
वस्तुतः ये विचारधारा है, सोच-विचार और मान्यताएँ हैं अनुभव नहीं इसलिए ये दर्शन भी नहीं है।

 जो अनादि है वह अनन्त होगा ही। अतः वह सर्वव्यापी होगा।
जब ब्रह्म अनादि, अनन्त सर्वव्यापी है तो अन्य कोई तत्व अनादि नहीं हो सकता।
यदि जीव को भी अनादि अनन्त माने तो जहाँ जीव रहेंगे वहाँ से ब्रह्म हट जाएगा या शुद्ध ब्रह्म नहीं रहेगा। जैसे पानी से लबालब भरे बर्तन में कुछ डालने पर या तो पानी बाहर हो जाएगा। या यदि पानी के अणुओं के बीच में समा भी गया तो पानी के गुण धर्म बदल देगा।
यही स्थिति प्रकृति की है, यदि प्रकृति अनादि अनन्त है तो जीव, ब्रह्म और प्रकृति ये तीनों एक साथ वैसे ही घुल मिल कर रह सकते हैं जैसे पानी में शकर या नमक। लेकिन इस स्थिति में ब्रह्म निर्गुण निराकार और निरञ्जन तो रह ही नहीं सकता। 
यदि तीनों साकार हैं तो उनका आयतन (वॉल्युम) होगा। यदि आयतन है तो एक दुसरे को हटाये बिना रह नहीं सकते।
इसलिए न जीव न प्रकृति अनादि अनन्त हो सकती है।
अतः जीव और प्रकृति को सत्य नहीं कहा जा सकता।

इसलिए जीव को ब्रह्म का आवरण (शरीर) मानने वाला और जगत (प्रकृति) को जीव का शरीर मान कर विशिष्ट अद्वैत कहने वाला रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत दर्शन असिद्ध हो गया।
ब्रह्म के लोक में और बाहर रहने वाले अनेक श्रेणियों में वर्गीकृत अनेक अनादि जीव और अनादि प्रकृति मानने वाले वल्लभाचार्य जी का शुद्धाद्वैत दर्शन असिद्ध हो जाता है।
ईश्वर जीव और प्रकृति को अनादि अनन्त मानने वाले माध्वाचार्य जी का द्वैत वाद और दयानन्द सरस्वती जी का आर्यसमाजी त्रेत वाद और वसुगुप्त का त्रिक दर्शन स्वतः असिद्ध हो जाते हैं।
या तो अभेद सत्य हो सकता है या द्वैत/ त्रेत सही हो सकता है। यह भी सही और वह भी सही व्यावहारिक सत्य हो सकता है लेकिन वास्तविक सत्य नहीं हो सकता। अतः निम्बार्काचार्य का स्वाभाविक भेदाभेद दर्शन/ स्वाभाविक द्वैताद्वैत दर्शन और श्रीकृष्ण महाप्रभु का अचिन्त्त्य भेदाभेद दर्शन स्वतः असिद्ध हो जाता है।