धर्म और दर्शन एक ही है जो वैदिक मन्त्र संहिताओं में उल्लेखित है।
ब्राह्मण ग्रन्थों के पूर्व के अध्याय धर्म- व्यवहार और कर्मकाण्ड सम्बन्धित वेद मन्त्रों की व्याख्या करते हैं। इनकी मीमांसा जैमिनी ने पूर्व मीमांसा दर्शन में की है।
उल्लेखनीय है कि, ब्राह्मण ग्रन्थों का अन्तिम भाग आरण्यक कहलाता है। आरण्यकों में वानप्रस्थ आश्रम सम्बन्धित वेद मन्त्रों की व्याख्या की गई है।
इन्हीं आरण्यकों के प्रायः अन्तिम अध्याय होने से वेदान्त और आत्म विद्या प्रधान होने उपनिषद कहलाते हैं और ब्रह्मविद्या प्रधान होने से श्रीमद्भगवद्गीता में उपनिषदों को ब्रह्म सूत्र कहा गया हैं।
इन आरण्यकों और उपनिषदों की मीमांसा बादरायण ने उत्तर मीमांसा दर्शन में की है। जिसे शारीरिक सूत्र भी कहते हैं। और ब्रह्मवाद की मीमांसा होने से ब्रह्म सूत्र भी कहते हैं।
वैदिक मन्त्र संहिताओं को समझने में सहायक ग्रन्थों को वेदाङ्ग कहते हैं। जिसमे
1 उच्चारण की शिक्षा को शिक्षा वेदाङ्ग कहते हैं।
2 (पाणिनि की अष्टाध्याई व्याकरण, इसपर पतञ्जली का महाभाष्य, इस भाष्य पर व्यास की विश्लेषणात्मक व्याख्या भोज वृत्ति और कात्यायन की आलोचनात्मक व्याख्या वार्तिक इन सब को मिलाकर व्याकरण वेदाङ्ग कहते हैं।
3 मन्त्र संहिताओं में आये शब्दों की व्युत्पत्ति को (यास्क का ) निरुक्त और (अमरकोश आदि) शब्दकोश को निघण्टू कहते हैं। ये दोनों मिलकर ही निरुक्त वेदाङ्ग कहलाते हैं।
4 वेद मन्त्रों के छन्दों का का व्याकरण (पिङ्गल का छन्द शास्त्र) छन्द वेदाङ्ग कहलाता है।
5 वैदिक मन्त्रों में आये ब्रह्माण्ड विज्ञान और गणित सम्बन्धित मन्त्रों की व्याख्या विशेषकर अथर्ववेद, तैत्तिरीय संहिता, तैत्तिरीय ब्राह्मण, (नारद संहिता, गर्ग संहिता, लगध) आदि के ग्रन्थ ज्योतिष वेदाङ्ग कहलाता है।
6 कल्प के अन्तर्गत वैदिक संहिताओं में उल्लेखित आचार नियमों पर आधारित विधि-विधान और निषेधों के सूत्र धर्म सूत्र ।
ब्रह्माण्डो, आकाश गङ्गाओं, सौर मण्डलों आदि के नक्शों के अनुरूप मण्डप और मण्डल और यज्ञ वेदी बनाने की विधि विधान शुल्ब सूत्र।
संस्कार, उत्सव आदि के सम्बन्ध में वैदिक मन्त्रों और ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित गृह्यसूत्र।
बड़े-बड़े यज्ञ सत्रों के विधि विधान सम्बन्धित वेद मन्त्रों और ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित श्रोत सूत्र।
ब्राह्मण ग्रन्थों द्वारा इनकी पुष्टि होती है। ये सब मिलाकर कल्प वेदाङ्ग कहलाता है।
इनके अलावा ऋग्वेद के स्वास्थ्य चर्या सम्बन्धित मन्त्रो पर ग्रन्थ आयुर्वेद नामक उपवेद है।
यजुर्वेद के मन्त्रों पर आधारित युद्ध विद्या, दुर्ग निर्माण और सुरक्षा, अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण, रखरखाव और सञ्चालन का विज्ञान धनुर्वेद उपवेद। इसी के साथ राजनीति के ग्रन्थ अर्थशास्त्र कहलाते हैं।
सामवेद के मन्त्रों पर आधारित सङ्गीत के उपकरण निर्माण और रखरखाव, गायन, वादन,, नाट्य में उपयोगी मञ्च निर्माण, व्यवस्था, अभिनय और नृत्य-नाट्य आदि सम्बन्धित मन्त्रों पर आधारित गन्धर्ववेद।
अथर्ववेद में उल्लेखित शिल्प विद्या और वास्तु विज्ञान, भवन निर्माण, सेतु और मार्ग और पथ निर्माण, रखरखाव आदि की विद्या शिल्पवेद या स्थापत्य वेद।
जो अहिन्सा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य , अपरिग्रह, शोच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान को मानने वाला वैदिक मन्त्र संहिताओं और ब्राह्मण ग्रन्थों और सूत्र ग्रन्थों पर आधारित आचरण, और तदानुसार पञ्च महायज्ञ ही धर्म है
अर्थात जो धर्म उक्त क्राइटेरिया में फिट बैठता हो बस वही सच्चा धर्म है।
और अभेद दर्शन ही दर्शन है। जो
ॐ ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम्।।
तथा
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत् समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥
सर्व खल्विदम् ब्रह्म, प्रज्ञानम् ब्रह्म, अयमात्मा ब्रह्म, तत् त्वम असि और अहम् ब्रह्मास्मि आदि महावाक्यों को सिद्ध करता हो वही सोच-विचार, मान्यता और अनुभव सच्चा दर्शन है।
सांख्य दर्शन में मात्र तत्व मीमांसा है, योग दर्शन में जीवन पद्धति और कर्म मीमांसा है।
जिसके आधार पर श्रीमद्भगवद्गीता में कर्म मीमांसा की गई है। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार स्वयम् को ईश्वरीय कार्य में नियुक्त मानकर, सभी कर्तव्य कर्मों को ईश्वरीय विधान समझकर, शास्त्रोक्त कर्म शास्त्रोक्त विधि से ही निष्काम भाव से कर्म करने को ही सत्य और उचित कर्म कहती है। परम के लिए अर्थात परमार्थ कर्म ही करना अर्थात यज्ञ के लिए यज्ञ करना श्रीमद्भगवद्गीता की कर्म मीमांसा है।
वैशेषिक दर्शन भौतिक वैज्ञानिक पद्धति दृष्टि से सृष्टि के तत्वों की विवेचना है।
न्याय दर्शन तर्कशास्त्र है, जो बतलाता है कि, निर्णय पर कैसे पहूँचा जाए।
वस्तुतः ये विचारधारा है, सोच-विचार और मान्यताएँ हैं अनुभव नहीं इसलिए ये दर्शन भी नहीं है।
जो अनादि है वह अनन्त होगा ही। अतः वह सर्वव्यापी होगा।
जब ब्रह्म अनादि, अनन्त सर्वव्यापी है तो अन्य कोई तत्व अनादि नहीं हो सकता।
यदि जीव को भी अनादि अनन्त माने तो जहाँ जीव रहेंगे वहाँ से ब्रह्म हट जाएगा या शुद्ध ब्रह्म नहीं रहेगा। जैसे पानी से लबालब भरे बर्तन में कुछ डालने पर या तो पानी बाहर हो जाएगा। या यदि पानी के अणुओं के बीच में समा भी गया तो पानी के गुण धर्म बदल देगा।
यही स्थिति प्रकृति की है, यदि प्रकृति अनादि अनन्त है तो जीव, ब्रह्म और प्रकृति ये तीनों एक साथ वैसे ही घुल मिल कर रह सकते हैं जैसे पानी में शकर या नमक। लेकिन इस स्थिति में ब्रह्म निर्गुण निराकार और निरञ्जन तो रह ही नहीं सकता।
यदि तीनों साकार हैं तो उनका आयतन (वॉल्युम) होगा। यदि आयतन है तो एक दुसरे को हटाये बिना रह नहीं सकते।
इसलिए न जीव न प्रकृति अनादि अनन्त हो सकती है।
अतः जीव और प्रकृति को सत्य नहीं कहा जा सकता।
इसलिए जीव को ब्रह्म का आवरण (शरीर) मानने वाला और जगत (प्रकृति) को जीव का शरीर मान कर विशिष्ट अद्वैत कहने वाला रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत दर्शन असिद्ध हो गया।
ब्रह्म के लोक में और बाहर रहने वाले अनेक श्रेणियों में वर्गीकृत अनेक अनादि जीव और अनादि प्रकृति मानने वाले वल्लभाचार्य जी का शुद्धाद्वैत दर्शन असिद्ध हो जाता है।
ईश्वर जीव और प्रकृति को अनादि अनन्त मानने वाले माध्वाचार्य जी का द्वैत वाद और दयानन्द सरस्वती जी का आर्यसमाजी त्रेत वाद और वसुगुप्त का त्रिक दर्शन स्वतः असिद्ध हो जाते हैं।
या तो अभेद सत्य हो सकता है या द्वैत/ त्रेत सही हो सकता है। यह भी सही और वह भी सही व्यावहारिक सत्य हो सकता है लेकिन वास्तविक सत्य नहीं हो सकता। अतः निम्बार्काचार्य का स्वाभाविक भेदाभेद दर्शन/ स्वाभाविक द्वैताद्वैत दर्शन और श्रीकृष्ण महाप्रभु का अचिन्त्त्य भेदाभेद दर्शन स्वतः असिद्ध हो जाता है।
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