मंगलवार, 15 अक्टूबर 2024

ब्राह्मणों के शत्रु ब्राह्मण होना दुःख दाई।

यह सुनकर दुःख हुआ कि, भारत में जैन-बौद्ध प्रभाव कितना अन्दर तक धँसा हुआ है कि, जैनाचार्य अधिकतर ब्राह्मण हुए। बौद्धाचार्य अधिकतर ब्राह्मण हुए।
जैन पन्थ और बौद्ध पन्थ के आचार्यों ने सदा से लेकर आज तक यह स्वीकार किया कि, सनातन वैदिक धर्म का अस्तित्व ब्राह्मणों और आचार्यों के बलबूते पर ही सुरक्षित है। उनके प्रचार में सबसे बड़े बाधक ब्राह्मण और आचार्य ही हैं।
यह बात जरथ्रुस्त्र और सिकन्दर ने भी अनुभव की थी।
यही बात ईसाई मिशनरियों ने भी कही।
मुस्लिम और ईसाई आक्रांताओं ने सबसे अधिक प्रताड़ित और हत्या ब्राह्मणों की ही की।

लेकिन हमारी दुर्दशा के लिए ब्राह्मणों और आचार्यों को कोसने वाले अनुसूचित जाति के नवबौद्ध और जनजाति के जयस वाले, यादव कहे तो इतना दुःखद नहीं लगता जितना बौद्ध दर्शन से प्रभावित ब्राह्मणों का विरोध देखकर होता है।
ये अपने पूर्वजों के त्याग और बलिदान का आकलन नही कर पाते, उनकी तत्कालीन समस्याओं, संघर्षों और विवशताओं को नहीं देख समझ पाते, और इन विवशताओं में लिए गए निर्णयों, और किये गए संशोधनों को नहीं समझ पाते इससे बढ़कर दुर्भाग्य क्या होगा।
जबकि, जैन-बौद्ध मत परिवर्तन कर संन्यासी बनने के डर से और आक्रांताओं के कारण बाल विवाह तथा विधवा जीवन में परिवर्तन का संशोधन, सति होने और जोहर करने की विवशता, रात्रि में विवाह करना, वार्षिक पूजा छुपकर करना आदि विवशताएँ विदेशी तक समझ गये।  उनके द्वारा किए गए अनुमोदन के कारण अब समझदार भारतीय भी मानने लगे हैं। लेकिन ब्राह्मण स्वयम् स्वीकार नहीं करते।
निन्दा  करेंगे लेकिन, स्वयम् करेंगे वही जो परम्परा है। वे स्वयम् बदलने को तैयार भी नहीं हैं।
जिन रूढ़ियों और सोच (चिन्तन) को आद्य शंकराचार्य जी जैसे तपस्वी और ज्ञानी को भी स्वीकार कर पञ्च देवोपासना स्वीकार करना पड़ी। यहाँ तक कि, यमोपासकों को भी उनकी उपासना के अतिरिक्त पञ्चदेवोपासना स्वीकारना पढ़ी। वैदिक - श्रोत्रियों के ब्राह्म धर्म और ब्राह्मण धर्म को स्मार्त पन्थ में ही समाविष्ट करना पड़ा।
उनके सामने अन्य कोई इतनी बड़ी विभूति नही हुई। तो इन आचार्यों ने एक विशेष प्रकार से सोचने और मान्यताओं वालों को संगठित करने का कार्य तोड़ने वाला कैसे माना जा सकता है?
जब एकादशी, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, रामनवमी, नृसिंह जयन्ती, आदि में जब स्मार्त पर्वकाल की बात करते हैं। व्रत की तिथि की अगली तिथि में पारण होना आवश्यक बतलाते हैं, तब पौराणिक लोग पौराणिक कथाओं के आधार पर मध्यरात्रि के बाद एकादशी लगे, या पचपन घटि के बाद एकादशी लगे, या छप्पन घटि के बाद एकादशी लगे तो दशमी विद्धा मान लेते हैं। और एकादशी के बजाय द्वादशी में उपवास करके त्रयोदशी में पारण करते हैं।
जन्माष्टमी में उदिया अष्टमी तिथि, सूर्योदय काल में रोहिणी नक्षत्र आवश्यक लगता है । सप्तमी वेध नहीं होना।
लेकिन स्मार्तों का विरोध करने के लिए दिपावली में चतुर्दशी वेध से कष्ट नहीं होता, उस समय पर्वकाल प्रदोषकाल व्यापी और महानिशिथ काल व्यापिनी अमावस्या चाहिए। शास्त्रोक्त मत चुभने और खलने लगे। यही स्थिति शंकराचार्य द्वारा अधूरे मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा के विरोध करने पर भी बनी थी। तब राजनीति शास्त्रों पर भारी पड़ रही थी।
विद्या विवादाय धनं मदाय
शक्तिः परेषां परिपीडनाय ।
खलस्य साधोर्विपरीतमेतत्
ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ॥
सुभाषित स्मरण हो आया।

भारतीय व्यावसायिक पद्यति।

प्राचीन भारतीय संस्कृति में पण्डितों का कार्यकाल, क्षत्रियों की कचहरी, किसानों का अन्न भण्डार, व्यापारी की दुकान, मूर्तिकार, चित्रकार, सुनार, लोहार, सुतार, कुम्भकार, दर्जी आदि विश्वकर्माओं और वैद्य (फिजिशियन), नाई (सर्जन) आदि सबके वर्कशाप आदि घर में आगे ही होती थी ।
भारतीय शास्त्र भारतीय रीति-नीति के अनुसार बने हैं।
इसलिए दो अलग-अलग पूजा की आवश्यकता ही नहीं होती थी।

अंग्रेजी व्यवस्था ने घर से दूर ऑफिस और बाजार कर दिये।
इसलिए समस्या खड़ी हुई।

दीपावली पूजन

आचार्य श्री कमलाकर भट्ट प्रणीत
निर्णय सिन्धु/प्रथम परिच्छेद/पूर्णिमा - अमावस्या तिथि विचार। ---

पौर्णमास्यमावास्ये तु सावित्रीव्रतम् विना परे ग्राह्ये। भूतविद्धे न कर्तव्ये दर्शपूर्णे कदाचन। वर्जयित्वा मुनिश्रेष्ठ सावित्री व्रतमुत्तमम्। इति ब्रह्मवैवर्तात।

पूर्णिमा तिथि तथा अमावस्या तिथि सावित्री व्रत के विना परा ग्रहण करनी चाहिये। ब्रह्मवैवर्त पुराण का मत है कि,-- हेमुनिश्रेष्ठ, व्रतों में उत्तम सावित्री व्रत को छोड़कर चतुर्दशी से विद्ध अमावस्या तथा पूर्णिमा कभी भी नहीं करना चाहिये।


आचार्य काशीनाथ उपाध्याय कृत धर्मसिन्धु/द्वितीय परिच्छेद/ अथामावस्याभ्यङ्गनिर्णयः--

अथाश्विनामावस्यायाम् प्रातरभ्यङ्गः प्रदोषे दीपदानलक्ष्मीपूजनादि विहितम्।।
तत्र सूर्योदयम् व्याप्यास्तोत्तरम् घटिकाधिरात्रिव्यापिनि दर्शे सति न सन्देहः।।
अत्र प्रातरम्यङ्गदेवपूजनादिकम् कृत्वापराह्ने पार्वणश्राद्ध कृत्वा प्रदोष समये दीपदानोल्काप्रदर्शनलक्ष्मीपूजनानि कृत्वा भोजनम् कार्यम् ।। 
अत्र दर्शेबालवृद्धादिभिन्नेर्दिवा न भोक्तव्यम्।।
रात्रो भोक्तव्यमिति विशेषो वाचनिकः।।
तथा च पर दिने एव दिनद्वयेपि वा प्रदोषव्यापौपरा।।
पूर्वत्रैव प्रदोषव्याप्तौ लक्ष्मीपूजनादौ पूर्वा।। अभ्यङ्गस्नानादौ परा।।
एवमुभयत्र प्रदोषव्याप्त्यभावेपि पुरुषार्थचिन्तामणौ तु पूर्वत्रैव व्याप्तिरिति पक्षे परत्र यामत्रयाधिकव्यापिदर्शे दर्शापेक्षया प्रतिपद्वृद्धिसत्तवे लक्ष्मीपूजादिकमपि परत्रैवैत्युक्तम् ।।
एतन्मते उभयत्र प्रदोषव्याप्तिपक्षेपि परत्र दर्शस्य सार्धयामत्रयाधिव्याप्तित्वात्परैव युक्तेति भाति।।
चतुर्दश्यादिदिनत्रयेपि दीपावलिसञ्ज्ञके यत्रयत्राह्नि स्वातीनक्षत्रयोगस्तस्यतस्य प्राशस्त्यातिशयः अस्यामेव निशिथोत्तरम् नगरस्त्रीभिः स्वगृहाङ्गणादलक्ष्मीनिःसारणम् कार्यम्।।

मिहिरचन्द्र कृत अनुवाद ---
इसके अनन्तर आश्विन की अमावस्या को प्रातःकाल अभ्यङ्ग करें। प्रदोष काल में दीपदान, लक्ष्मी पूजन आदि कहा है। 
उसमें यदि सूर्योदय से सूर्यास्त के अनन्तर एक घड़ी से अधिक रात्रि तक अमावस्या हो तो, कुछ सन्देह नहीं है। इसमें प्रातः काल अभ्यङ्ग, देवपूजा आदि करके अपराह्न में पार्वण श्राद्ध करके प्रदोषकाल में दीपदान उल्का प्रदर्शन , लक्ष्मी पूजन, करके भोजन करना। इस अमावस्या के दिन में बालक, वृद्ध आदि को छोड़कर कोई भोजन न करें, रात्रि में ही भोजन करें। यह विशेष वाचनिक है सो दर्शाया जाता है कि, दूसरे दिन (परले दिन ) या दोनों दिन प्रदोष व्यापिनी हो तो, दूसरी (परली) लेना। इस प्रकार दोनों दिन प्रदोष व्याप्ति के अभाव में भी दुसरी (परली) लेना। 
पुरुषार्थ चिन्तामणि में कहा है कि, पहले दिन व्याप्ति हो।
इस पक्ष में यदि आगे तीन प्रहर से अधिक अमावस्या आचार्य श्री कमलाकर भट्ट प्रणीत
निर्णय सिन्धु/प्रथम परिच्छेद/पूर्णिमा - अमावस्या तिथि विचार। ---

पौर्णमास्यमावास्ये तु सावित्रीव्रतम् विना परे ग्राह्ये। भूतविद्धे न कर्तव्ये दर्शपूर्णे कदाचन। वर्जयित्वा मुनिश्रेष्ठ सावित्री व्रतमुत्तमम्। इति ब्रह्मवैवर्तात।

पूर्णिमा तिथि तथा अमावस्या तिथि सावित्री व्रत के विना परा ग्रहण करनी चाहिये। ब्रह्मवैवर्त पुराण का मत है कि,-- हेमुनिश्रेष्ठ, व्रतों में उत्तम सावित्री व्रत को छोड़कर चतुर्दशी से विद्ध अमावस्या तथा पूर्णिमा कभी भी नहीं करना चाहिये।


आचार्य काशीनाथ उपाध्याय कृत धर्मसिन्धु/द्वितीय परिच्छेद/ अथामावस्याभ्यङ्गनिर्णयः--

अथाश्विनामावस्यायाम् प्रातरभ्यङ्गः प्रदोषे दीपदानलक्ष्मीपूजनादि विहितम्।।
तत्र सूर्योदयम् व्याप्यास्तोत्तरम् घटिकाधिरात्रिव्यापिनि दर्शे सति न सन्देहः।।
अत्र प्रातरम्यङ्गदेवपूजनादिकम् कृत्वापराह्ने पार्वणश्राद्ध कृत्वा प्रदोष समये दीपदानोल्काप्रदर्शनलक्ष्मीपूजनानि कृत्वा भोजनम् कार्यम् ।। 
अत्र दर्शेबालवृद्धादिभिन्नेर्दिवा न भोक्तव्यम्।।
रात्रो भोक्तव्यमिति विशेषो वाचनिकः।।
तथा च पर दिने एव दिनद्वयेपि वा प्रदोषव्यापौपरा।।
पूर्वत्रैव प्रदोषव्याप्तौ लक्ष्मीपूजनादौ पूर्वा।। अभ्यङ्गस्नानादौ परा।।
एवमुभयत्र प्रदोषव्याप्त्यभावेपि पुरुषार्थचिन्तामणौ तु पूर्वत्रैव व्याप्तिरिति पक्षे परत्र यामत्रयाधिकव्यापिदर्शे दर्शापेक्षया प्रतिपद्वृद्धिसत्तवे लक्ष्मीपूजादिकमपि परत्रैवैत्युक्तम् ।।
एतन्मते उभयत्र प्रदोषव्याप्तिपक्षेपि परत्र दर्शस्य सार्धयामत्रयाधिव्याप्तित्वात्परैव युक्तेति भाति।।
चतुर्दश्यादिदिनत्रयेपि दीपावलिसञ्ज्ञके यत्रयत्राह्नि स्वातीनक्षत्रयोगस्तस्यतस्य प्राशस्त्यातिशयः अस्यामेव निशिथोत्तरम् नगरस्त्रीभिः स्वगृहाङ्गणादलक्ष्मीनिःसारणम् कार्यम्।।

मिहिरचन्द्र कृत अनुवाद ---
इसके अनन्तर आश्विन की अमावस्या को प्रातःकाल अभ्यङ्ग करें। प्रदोष काल में दीपदान, लक्ष्मी पूजन आदि कहा है। 
उसमें यदि सूर्योदय से सूर्यास्त के अनन्तर एक घड़ी से अधिक रात्रि तक अमावस्या हो तो, कुछ सन्देह नहीं है। इसमें प्रातः काल अभ्यङ्ग, देवपूजा आदि करके अपराह्न में पार्वण श्राद्ध करके प्रदोषकाल में दीपदान उल्का प्रदर्शन , लक्ष्मी पूजन, करके भोजन करना। इस अमावस्या के दिन में बालक, वृद्ध आदि को छोड़कर कोई भोजन न करें, रात्रि में ही भोजन करें। यह विशेष वाचनिक है सो दर्शाया जाता है कि, दूसरे दिन (परले दिन ) या दोनों दिन प्रदोष व्यापिनी हो तो, दूसरी (परली) लेना। इस प्रकार दोनों दिन प्रदोष व्याप्ति के अभाव में भी दुसरी (परली) लेना। 
पुरुषार्थ चिन्तामणि में कहा है कि, पहले दिन व्याप्ति हो।
इस पक्ष में यदि आगे तीन प्रहर से अधिक अमावस्या हो तो दर्श की अपेक्षा से प्रतिपदा की वृद्धि हो तो लक्ष्मी पूजन आदि भी दुसरे दिन (परले दिन) ही करें। इस मत में दोनों दिन प्रदोष व्याप्ति के पक्ष में भी दुसरे दिन (परले दिन) अमावस्या साढ़े तीन प्रहर से अधिक हो तो, इससे दूसरी (परली) ही युक्त है, यह प्रतीत होता है। दीपावली नामक चतुर्दशी आदि तीनों दिन मे जिस जिस दिन स्वाति नक्षत्र का योग हो उस उस दिन की प्रशंसा अधिक है। इसी अमावस्या को अर्धरात्रि के अनन्तर नगर की स्त्रियाँ अपने घर के आंगन में अलक्ष्मी (दारिद्र) का निस्तारण करें (निकालें)।।

धर्मसिन्धु 
पर दिने एव दिन द्वयेऽपिया प्रदोषव्याप्तौपरा। पूर्वत्रैव प्रदोषव्याप्तौ लक्ष्मीपूजनादौ पूर्वा। 

तिथि निर्णय 
इयम् प्रदो, व्यापिनी ग्राह्या, दिनद्वये सत्त्वाऽसत्त्वे परा।

पुरुषार्थ चिन्तामणी 
सदा साहाम्हमारभ्य प्रवृत्तोतरदिने किञचिन्नयुनयामत्रयम् अमावस्या तदत्तुरदिने यामत्रयमिता प्रतिपत्तदाऽमावस्याप्रयुक्त दीपदानलक्ष्मीपूजादिकम् पूर्वत्र। यदा तु द्वितीयदिने यामत्रयममावस्या तदुत्तररदिने सार्धमात्रयम् प्रतिपत्तदा परा।

अर्थात 
 अमावस्या के तीन प्रहर और प्रतिपदा के साढ़े तीन प्रहर समाप्त हो जाने के बाद अगले दिन लक्ष्मी पूजनादि करना चाहिए।
जिस दिन प्रदोषकाल में अमावस्या की सम्भावना कम हो शाम के समय अमावस्या और प्रदोष लग रही हो ; यानी, अमावस्या प्रतिपदा युक्त हो, उसी दिन लक्ष्मी-पूजा करनी चाहिए।

 *उक्त समस्त शास्त्र वचनों को दृष्टिगत रखते हुए दीपावली की लक्ष्मी-पूजन दिनांक 01 नवम्बर 2024 शुक्रवार को किया जाना ही उचित है।* 
 *यद्यपि 01 नवम्बर 2024 शुक्रवार को इन्दौर में प्रदोषकाल में अमावस्या मात्र 24 मिनट ही रहेगी, तथापि, सायंकाल में दीपदान कर प्रदोषकाल में, स्थिर वृषभ लग्न में लक्ष्मी पूजा विधि पूर्वक करें।* 
 *ऐसा संयोग पूर्व में भी 28 अक्टूबर 1962 मे, 17 अक्टूबर 1963 मे और 02 नवम्बर 2013 में हो चुका है। तब भी प्रदोषकाल में अल्पकालिक अमावस्या में ही लक्ष्मी पूजा की गई थी।* 
अतः किसी के बहकावे में न आकर *शास्त्र सम्मत दीपावली 01 नवम्बर 2024 शुक्रवार को ही मनाएँ।*


अमावस्या तिथि 31 अक्टूबर 2024 गुरुवार को दोपहर 03:52 से 01 नवम्बर 2024 शुक्रवार को रात्रि 06:06 बजे तक रहेगी। 
इन्दौर में प्रदोष काल सूर्यास्त समय 05:52 बजे से रात्रि 08:23 बजे तक रहेगा।
वृषभ लग्न रात्रि 06:35 से 08:33 बजे तक रहेगा।
इस प्रकार प्रदोषकाल में अमावस्या तिथि सूर्यास्त समय 05:52 बजे से रात्रि 06:06 बजे तक 24 मिनट रहेगी।
सूर्यास्त समय 05:52 बजे से रात्रि 06:06 बजे के बीच दीपमाला की पूजा कर, दीपदान कर, लक्ष्मी पूजा हेतु घी का दीपक प्रज्वलित कर ले फिर वृषभ लग्न में रात्रि 06:35 से 08:33 बजे के बीच लक्ष्मी पूजा करें।

स्वाति नक्षत्र 31 अक्टूबर उपरान्त 01 नवम्बर 2024 गुरुवार Friday को उत्तर रात्रि 00:44 बजे (12 बजकर 44 मिनट) से 01 उपरान्त 02 नवम्बर 2024 शुक्रवार Saturday को उत्तर रात्रि 03:30 बजे तक रहेगा।

रावण वध तिथि अमान्त फाल्गुन पूर्णिमान्त चैत्र कृष्ण अमावस्या है और श्री रामचन्द्र जी के वनवास से अयोध्या लौटने की तिथि चैत्र शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि है।


गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित पौराणिक ग्रन्थों पर कोई सन्देह नहीं करता है।
महर्षि वाल्मीकि श्री रामचन्द्र जी के राज्यक्षेत्र में ही रहते थे। इसलिए ही गर्भवती सीता जी को उन्होंने वाल्मीकि आश्रम में ही भेजा था। जहाँ कुश और लव जन्में और शिक्षित-प्रशिक्षित हुए। महर्षि वाल्मीकि ने कुश और लव को स्वरचित रामायण कण्ठस्थ करवाई और श्री रामचन्द्र जी के अश्वमेध यज्ञ में कुश और लव ने जा कर सुनाई। श्री रामचन्द्र जी ने उनकी कथा का अनुमोदन किया।
अतः वाल्मीकि रामायण में लिखे श्री रामचन्द्र जी के इतिहास पर कोई सन्देह नहीं किया जा सकता।
अतः कोई भी यदि वाल्मीकि रामायण में उल्लेखित तथ्य से भिन्न मत व्यक्त करे तो वह अमान्य ही होगा।


अयोध्या काण्ड द्वितीय सर्ग श्लोक 12 में---कल प्रातः पुष्य नक्षत्र में मैं युवराज के पद पर नियुक्त करूंगा।
अयोध्या काण्ड तृतीय सर्ग श्लोक 4 में स्पष्ट वर्णन है कि, यह चैत्र मास है। श्रीरामचन्द्र जी को युवराज पद पर अभिषेक की तैयारी का निर्देश दिया। 
श्लोक 15 में कल स्वस्तिवाचन होगा। कहा है।
चतुर्थ सर्ग श्लोक 21 में आज पुनर्वसु नक्षत्र है। कल पुष्य नक्षत्र रहेगा।
आगे श्लोक 22 में पुनः कहा है कि,
 इसलिए पुष्य नक्षत्र में तुम (युवराज पद पर) अपना अभिषेक करा लो। कल पुष्य नक्षत्र में मैं अवश्य युवराज पद पर तुम्हारा अभिषेक कर दूंगा।

स्पष्ट है कि, श्री रामचन्द्र जी का युवराज पद पर अभिषेक चैत्र मास में पुष्य नक्षत्र में होना निश्चित था। चैत्र मास में पुष्य नक्षत्र चैत्र शुक्ल नवमी या दशमी को ही होता है।

षष्ट सर्ग श्लोक 2 से 4 तक श्री रामचन्द्र जी ने भगवान नारायण के निमित्त अग्निहोत्र कर आहुति दी। और यज्ञ शेष हविष्य ग्रहण किया ।
(मतलब भगवान श्री रामचन्द्र जी नारायण उपासना करते थे।)


विजया दशमी (दसरा) के बाद तो सुग्रीव ने वानर दलों को बुलवा कर सीता जी की खोज हेतु भेजा। उनके पास पुष्पक विमान नहीं था। वानर दलों तक सन्देश जाने और उनके एकत्र होने, उन्हें कार्य समझाने का समय जोड़ें।

अङ्गद के नेतृत्व में हनुमानजी, जामवन्त जी आदि विंध्याचल पहूँचे, वहाँ पूरे एक महीने खोज की। वाल्मीकि रामायण/किष्किन्धाकाण्ड/पचासवाँ सर्ग/श्लोक 3

उसके बाद स्वयम्प्रभा की गुफा में प्रवेश कर भोजन आदि ग्रहण कर थकान दूर की।

स्वयम्प्रभा की गुफा से विन्द्याचल के दक्षिण पश्चिम मे पहुँचे जहाँ से एक ओर विन्द्याचल दुसरी ओर सतपुड़ा पर्वत और सामने (अरब) सागर दिख रहा था ऐसा स्थान खम्बात की खाड़ी के तट पर भरुच क्षेत्र में है।  वाल्मीकि रामायण/किष्किन्धाकाण्ड/ तिरेपनवाँ सर्ग/श्लोक 1 एवम्  2

भरूच के पास पर्वत शिखर पर सम्पाति मिले। उन्होंने पूरी जानकारी ली, फिर वहाँ से 1287 किलोमीटर दक्षिण में (लक्ष्यद्वीप के किल्तान द्वीप पर) रावण की लंका में अशोक वाटिका में सीता जी का होने की सूचना दी।  वाल्मीकि रामायण/किष्किन्धाकाण्ड/ तिरेपनवाँ सर्ग / श्लोक  15 से 20 

तब हनुमान जी ने लंका के लिए छलांग लगाई।

फिर हनुमान जी लंका में अशोक वाटिका में सीता जी से मिले, विभिषण से मिले, लंका जलाई, निकुम्भला के मन्दिर और मूर्तियाँ तोड़ी। फिर सीता जी का सन्देश लेकर वानर दल वहाँ से वापस लौटकर किश्किन्धा पहूँचे। सुग्रीव और श्री रामचन्द्र जी को सीता जी की जानकारी दी और सन्देश दिया।

तब जाकर श्रीरामचन्द्र जी और सुग्रीव ने युद्ध का निर्णय किया। फिर सेना तैयार की गई, पहाड़ खोदने और वृक्ष उखाड़ने/ काटने के बड़े-बड़े यन्त्र लेकर पश्चिम घाट पर यात्रा करके केरल के कोझिकोड पहुँचे। तीन दिन समुद्र से प्रार्थना कर मार्गदर्शन मांगा। तब समुद्र ने मार्गदर्शन दिया। और नल-नील का परिचय दिया। तब सेतु निर्माण प्रारम्भ हुआ। वाल्मीकि रामायण/युद्ध काण्ड/ बाईसवाँ सर्ग/ श्लोक 45 से 65

फिर नल-नील के नेतृत्व में केरल के कोझिकोड से लक्ष्यद्वीप के किल्तान द्वीप तक तीन सौ किलोमीटर का रामसेतु पाँच दिन में बनाया। वाल्मीकि रामायण/युद्ध काण्ड/ बाईसवाँ सर्ग/ श्लोक  69 से 72

तब वानर सेना ने रावण की लंका में प्रवेश किया।

तब अवलोकन और अध्ययन कर रावण पर आक्रमण किया।

वाल्मीकि रामायण/ युद्ध काण्ड/ बानवेंवाँ सर्ग/ श्लोक 66-67 के अनुसार 
मेघनाद वध से दुःखी और क्रुद्ध रावण को दी गई राय के आधार पर अमान्त फाल्गुन पूर्णिमान्त चैत्र कृष्ण पक्ष अमावस्या को  रावण द्वारा पूर्ण तैयारी से श्री रामचन्द्र जी के विरुद्ध युद्ध होना निश्चित हुआ।
और 
वाल्मीकि रामायण/ युद्ध काण्ड/ एकसौ आठवाँ सर्ग/ श्लोक 17-23 के अनुसार
अमान्त फाल्गुन पूर्णिमान्त चैत्र कृष्ण पक्ष अमावस्या को सन्ध्या समय हुए इस अन्तिम युद्ध में ही श्री रामचन्द्र जी द्वारा रावण की छाती पर मारा बाण रावण का हृदय वेधता हुआ आर-पार हो गया और पहले धरती में धँस गया। फिर तरकस मे लौट आया।
रावण की मृत्यु होते ही रावण की मृत शरीर रथ से धरती पर गिर पड़ा।
अतः श्री रामचन्द्र जी द्वारा लक्ष्मण जी को रावण के पास राजनीति सीखने की बात शुद्ध गप्प है।
तत्पश्चात्  रावण की अन्त्येष्टि और विभिषण का राज्याभिषेक के उपरान्त विभिषण सीता जी को लेकर आया। उसके बाद ही श्री रामचन्द्र जी को पुष्पक विमान में बैठकर अयोध्या के लिए रवाना हुआ।
चैत्र शुक्ल पञ्चमी के दिन श्री रामचन्द्र जी सीता जी और लक्ष्मण जी तथा हनुमान जी, सुग्रीव सहित महर्षि भरद्वाज के आश्रम पर पहूँचे। दुसरे दिन भरत द्वारा विनय करने पर चैत्र शुक्ल पष्ठी के दिन श्री रामचन्द्र जी सीता जी और लक्ष्मण जी तथा हनुमान जी, सुग्रीव सहित अयोध्या पहूँचे। वाल्मीकि रामायण/ युद्ध काण्ड/ एकसौ चौबीसवाँ सर्ग/ श्लोक १

अतः *रावण वध तिथि अमान्त फाल्गुन/पूर्णिमान्त चैत्र कृष्ण पक्ष अमावस्या है। आश्विन शुक्ल दशमी (दशहरा) नहीं है।* 
और
*श्री रामचन्द्र जी के अयोध्या लौटने की तिथि चैत्र शुक्ल पष्ठी है; अमान्त आश्विन पूर्णिमान्त कार्तिक कृष्ण दीपावली को नहीं।* 
ये सब बाबा वाक्य जो हम बचपन से सुनते आये कितने गलत थे।
मतलब हमें हमारे शास्त्रों का अध्ययन नहीं होने के कारण न तो अपने व्रत-पर्व, उत्सव और त्योहारों का समुचित कारण ज्ञात है, न व्रत-पर्व, उत्सव और त्योहार मनाने की सही विधि भी ज्ञात नहीं है।

विजया दशमी महिषासुर वध के रूप में भी मनाया जाता है।
और
धन्वन्तरि जयन्ती धन तेरस से चित्रगुप्त पूजा यम द्वितीया तक के पाँच दिन यमराज को समर्पित हैं। यमराज के लिए दीपदान होता है। सर्वपितृ अमावस्या को नहीं लौट पाये पितर आकाश दीप के प्रकाश में पितृलोक लौट जाते हैं। यह परम्परा भी है।
अमान्त आश्विन पूर्णिमान्त कार्तिक कृष्ण में
तृयोदशी को धन्वन्तरि जयन्ती है।
चतुर्दशी को श्रीकृष्ण ने नरकासुर वध किया था।
अमावस्या को प्रदोषकाल में दीप यज्ञ कर नई फसल धान की धानी, गन्ना, ज्वार अर्पित कर इष्टि की जाती है। मध्यरात्रि में महाकाली पूजा होती है।
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को बलि प्रतिपदा कहते हैं। नवान्न भक्षण/अन्नकूट होता है।
यम द्वितीया को भगिनी गृह भाई मिलने जाता है। भाई-बहन साथ में भोजन करते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में श्रीरामचन्द्र जी का कहीं कोई उल्लेख नहीं आता।

सोमवार, 7 अक्टूबर 2024

धर्मशास्त्रोक्त मत और कुल परम्परा में भेद हो तो क्या करें?

धर्मशास्त्रोक्त मत और कुल परम्परा में भेद हो तो क्या करें?
आर्य समाज को छोड़कर सनातनी धर्म के शेष सभी पन्थ और आचार्यगण कुल परम्परा का भी समादर करते हैं।
मैरे द्वारा प्रेषित व्रत,पर्व, उत्सव और त्योहार आचार्य हेमाद्रिपंत की चतुर्वर्ग चिन्तामणी, सायणाचार्य के बड़े भाई माध्वाचार्य के ग्रन्थ कालमाधव, आचार्य कमलाकर भट्ट रचित निर्णय सिन्धु और निर्णयसिन्धु के निर्णयों पर आधारित काशीनाथ शास्त्री उपाध्याय पांडुरंग रचित धर्मसिन्धु ग्रन्थों पर आधारित और वेधशाला से प्रमाणित वेदतुल्य / दृक्तुल्य केतकी अयनांश वाली पञ्चाङ्गों पर आधारित रहते हैं।
नवरात्र में भी कुछ नियम हैं। मालवा-निमाड़ अंचल में बङ्गाल, उड़िसा, असम, मेघालय, मणिपुर आदि पूर्वी और उत्तर पूर्वी भारत में प्रचलित गोड़ मत अप्रचलित है, और बहुत से विषयों में आचार्य हेमाद्रिपंत नें चतुर्वर्ग चिन्तामणी में आचार्य कमलाकर भट्ट ने निर्णय सिन्धु ग्रन्थ में गोड़ मत को गलत सिद्ध किया है इसलिए उसपर चर्चा नहीं करेंगे।
लेकिन इन आचार्यों ने भी कुल परम्परा को उस कुल के लोगों को मानने पर आपत्तिजनक नहीं माना है।
वास्तव में कुल परम्परा देश-काल-परिस्थितियों के अनुसार तत्कालीन परिस्थियाँ रहने तक के लिए उस समय के कुलपति द्वारा शास्त्रीय पद्यति में आवश्यकता अनुसार संशोधित किया गया था। लेकिन अब वे केवल रूढ़ि बन चुकी है। जबकि,
वैज्ञानिक आधारों और दीर्घकालिक अनुभवों को जाँच परखकर शास्त्रीय नियम निर्धारित किए गए थे। जो उस मत, पन्थ और सम्प्रदाय को मानने वालों पर समान रूप से लागू होते हैं।

उदाहरणार्थ नवरात्र में देवकर्म होने के कारण देवी सम्बन्धित पूजा आदि कार्यों में प्रातः काल को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। द्वितीय क्रम पर पर्वकाल को। यथा दीपावली के पाँच दिनों में दीपदान प्रदोषकाल में ही उपयुक्त है।
दसरा (दशहरा) पर अभिजित मुहूर्त और विजय मुहूर्त का महत्व है।
काली पूजा और भैरव पूजा में प्रदोषकाल से भी अधिक महत्वपूर्ण महानिशिथ काल माना गया है।

 सप्तमी, अष्टमी और नवमी तीनों तिथियों में व्रत रखकर देवी पूजन करने का शास्त्रीय नियम है। शास्त्रोक्त मतानुसार महाष्टमी और महानवमी की संधि पूजा अष्टमी समाप्ति के चोबीस मिनट पहले से नवमी प्रारम्भ होने के चोबीस मिनट बाद तक के एक मुहूर्त काल में ही संधि पूजा होनी चाहिए। उसके अलावा नवमी को व्रत रखना और नवमी तिथि में देवी पूजन आवश्यक कहा गया है।
लेकिन कुल परम्परा में कुछ लोग पञ्चमी पूजते हैं, कुछ षष्ठी पूजते हैं, कुछ सप्तमी पूजते हैं।
 कोई अष्टमी ही पूजते हैं तो कोई नवमी ही पूजते हैं । 
उसपर भी कुछ प्रातः काल में पूजा करते हैं तो कुछ सायंकाल में तो कुछ रात्रि में पूजते हैं।
दीपावली में धन तेरस को धन्वन्तरि पूजन के स्थान पर धन की पूजा करते हैं। रूप चौदस को चतुर्दशी तिथि के उत्तरार्ध में दीपावली के दिन के सूर्योदय से पहले अरुणोदय काल (सूर्योदय से 01 घण्टा 36 मिनट पहले) तेलाभ्यङ्ग स्नान कर उदयीमान चन्द्रमा को अर्घ्य देकर पूजन करने के स्थान पर चान्दी की पूजा करते हैं।
दीपावली को प्रदोषकाल (सूर्यास्त से 02 घण्टे 24 मिनट के बीच) में दीपदान कर प्रदोषकाल में स्थिर वृषभ लग्न में लक्ष्मी पूजा करने का शास्त्रीय नियम है। और काली उपासकों को महानिशिथ काल (ठीक मध्यरात्रि से 24 मिनट पहले से 24 मिनट बाद तक के बीच) में महाकाली पूजन किया जाने का विधान है। लेकिन कोई प्रातः काल में, कोई दोपहर में चौघड़िया देखकर लक्ष्मी पूजा करते हैं।
सबकी परम्परा अलग-अलग है। आचार्य, शास्त्री और सदाचारी पुरोहित तो शास्त्रीय मत ही बतलाएंगे। अच्छी पञ्चाङ्गों में भी शास्त्रीय मत ही प्रकाशित होता है।
लेकिन लोभ-लालच वश या लोकिक परम्पराओं के सम्मान में पञ्चाङ्ग प्रकाशक और पुरोहित विभिन्न मुहूर्त बतलाने को बाध्य हैं।

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2024

ललिता पञ्चमी व्रत।

गुजराज, महाराष्ट्र और आंशिक रूप से कर्नाटक में प्रचलित देवी त्रिपुर सुन्दरी की पूजा का पर्व ललिता पञ्चमी व्रत 07 अक्टूबर 2024 सोमवार को है।

ललिता पञ्चमी के दिन कामनाओं की देवी शाक्त सम्प्रदाय की प्रमुख इष्ट षोडषी त्रिपुर सुन्दरी ललिता देवी का प्रादुर्भाव कामदेव के शरीर की राख से भाण्डा नामक राक्षस को मारने के लिए हुआ था। इन्हें शंकर जी के उपर बैठा हुआ दर्शाया जाता है। 
वेदों में जो महत्व वाक देवी का है, वही महत्व पौराणिकों में नारायण की योगनिद्रा देवी का है। और वही महत्व शाक्त सम्प्रदाय में त्रिपुर सुन्दरी का है। लेकिन श्रीविद्या के तान्त्रिक उपासकों में प्रथम स्थान काम (मन्मथ) का है।
ललिता पञ्चमी के दिन ललितासहस्रनाम, ललितात्रिशती का पाठ विशेष तौर पर किया किया जाता है। 
देव्य अथर्वशीर्ष के मन्त्र 
ऋग्वेद मण्डल 10 के 125 वे सूक्त - वाक सूक्त या देवी सूक्तम की व्याख्या रूप देव्य अथर्वशीर्ष के मन्त्र संख्या और अर्थ सहित।
गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित दूर्गा सप्तशती से उद्धृत -

कामो योनिः कमला वज्रपाणिर्गुहा हसा मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः । 
पुनर्गुहा सकला मायया च पुरूच्यैषा विश्वमातादिविद्योम् ।। देव्य अथर्वशीर्ष मन्त्र 14

काम (), योनि (), कमला (), वज्रपाणि-इन्द्र (), गुहा (ह्रीं), , -वर्ण, मातरिश्वा - वायु (), अभ्र (), इन्द्र (), पुनः गुहा (ह्रीं), , , -वर्ण और माया (ह्रीं) - यह सर्वात्मिका जगन्माता की मूल विद्या है और वह ब्रह्मरूपिणी है ।

ये परमात्मा की शक्ति हैं । ये विश्वमोहिनी हैं । पाश, अंकुश, धनुष, और बाण धारण करने वाली हैं । ये श्रीमहाविद्या हैं । जो ऐसा जानता है, वह शोक को पार कर जाता है । 
वियदीकारसंयुक्तं वीतिहोत्रसमन्वितम् । 
अर्धेन्दुलसितं देव्या बीजं सर्वार्थसाधकम् ॥देव्य अथर्वशीर्ष मन्त्र 18
एवमेकाक्षरं ब्रह्म यतयः शुद्ध चेतस:।
ध्यायन्ति परमानन्दमया ज्ञानाम्बुराशयः ।।देव्य अथर्वशीर्ष मन्त्र 19
वियत्-आकाश () तथा 'ई'कार से युक्त, वीतिहोत्र -अग्नि () सहित, अर्धचन्द्र से सुशोभित जो देवीका बीज है, वह सभी इच्छाओं को पूर्ण करनेवाला है। इस प्रकार इस एकाक्षर ब्रह्म (ह्रीं) का ऐसे यति ध्यान करते हैं, जिनका चित्त शुद्ध है, जो निरतिशयानन्दपूर्ण और ज्ञान का सागर हैं। (यह मन्त्र देवीप्रणव माना जाता) है। ॐकारके समान ही यह प्रणव भी व्यापक अर्थसे भरा हुआ है। संक्षेपमें इसका अर्थ इच्छा-ज्ञान- क्रियाधार, अद्वैत, अखण्ड, सच्चिदानन्द, समरसीभूत, शिवशक्तिस्फुरण है।) । 
वाङ्माया ब्रह्मसूस्तस्मात् षष्ठं वक्त्रसमन्वितम् ।        सूर्योऽवामश्रोत्रबिन्दुसंयुक्तष्टात्तृतीयकः ।
नारायणेन सम्मिश्रो वायुश्चाधरयुक् ततः। 
          विच्चे नवार्णकोऽर्णः स्यान्महदानन्ददायकः ॥ देव्य अथर्वशीर्ष मन्त्र 20

वाणी (ऐं), माया (ह्रीं), ब्रह्मसू - काम (क्लीं), इसके आगे छठा व्यंजन अर्थात् च, वही वक्त्र अर्थात् आकार से युक्त (चा), सूर्य (), 'अवाम श्रोत्र' - दक्षिण कर्ण (उ) और बिन्दु अर्थात् अनुस्वार से युक्त (मुं), टकार से तीसरा ड, वही नारायण अर्थात् 'आ' से मिश्र (डा), वायु (य), वही अधर अर्थात् 'ऐ' से युक्त (यै) और 'विच्चे' यह नवार्णमन्त्र उपासकों को परमानन्द  एवं मोक्षप्रदाता है । 

[इस मन्त्रका अर्थ- हे चैतन्यस्वरूपिणी महासरस्वती ! हे सत्यस्वरूपिणी महालक्ष्मी ! हे आनन्दरूपिणी महाकाली ! ब्रह्मविद्या पाने के लिये हम निरन्तर आपका ध्यान करते हैं । हे महाकाली-महालक्ष्मी- महासरस्वतीस्वरूपिणी चण्डिके ! तुम्हें नमस्कार है। अविद्यारूप रज्जु की दृढ़ ग्रन्थि को खोलकर मुझे मुक्त करो।]
का जप किया जाता है।⤵️
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं *क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल* ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नमः।

इसे तान्त्रिक लोग कादी मन्त्र के रूप में जानते हैं। इसे ही विकृत कर भिन्न-भिन्न अक्षरों का क्रम बदलकर कादी-हादी आदि सात रूपों में जपते हैं।

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2024

सुसंस्कृत पञ्च महायज्ञ कर्ता में ही निरहंकारिता होती है

संस्कारित व्यक्ति वह है, जिसे पञ्च महायज्ञ करने के संस्कार हो।
पञ्चमहायज्ञ कर्ता में अहंकार इसलिए नहीं होता क्योंकि वह जीवनभर  
1 पुराने लोगों के ज्ञान और पराक्रम से प्राप्त ज्ञान प्राप्त होने और सुख सुविधाओं को भोग पाने का ऋषि ऋण जानते हुए अगली पीढ़ी के लिए स्वयम् भी कुछ देकर जाने की भावना से ऋषि ऋण उतारने के लिए वेदाध्ययन- अध्यापन करना, शास्त्राध्ययन-अध्यापन करना, सत्सङ्ग करना, त्रिकाल सन्ध्या करना, अष्टाङ्ग योग साधना करना, दैनिक अग्निहोत्र करके ब्रह्मज्ञज्ञ करता रहता है। उसे अहंकार हो ही नहीं सकता।
देवताओं, पञ्च महाभूतों की कृपा से निशुल्क प्राप्त प्राकृतिक संसाधनों के अत्यावश्यक दोहन के लिए भी देव ऋण से उऋण होने के लिए देव यज्ञ कर सदैव स्वाहा करने के पश्चात बोलता हैकि,
 इदम् विष्णवै, न मम्। इदम ब्रह्मणे, न मम्। इदम सवित्राय, न मम। इदम् नारायणाय, न मम्।  इदम हिरण्यगर्भाये, न मम्। इदम त्वष्टाये, न मम। इदम् प्रजापतये, न मम। इदम् वाचस्पतत्यै न मम्। इदम् इन्द्रायै, न मम्। इदम् ब्रह्मणस्पत्यै, न मम। इदम आदित्यायै, न मम। इदम् ब्रहस्पतयै, न मम। इदम् वसवै, न मम् । इदम् पशुपतयै, न मम। इदम् रुद्रायै, न मम। इदम् गाणपत्यै, न मम् इदम् सोमाय, न मम्। इदम् सदसस्पतयै, न मम्। इदम् मही देव्यायै, न मम्। इदम् भारती देव्यायै, न मम्। इदम सरस्वत्यै, न मम।इदम् ईळायै, न मम।
जो इतनी बार स्व का हनन करने हेतु स्वाहा बोले और साथ में कहता जाए कि, यह मैरा नहीं है। उसे स्वप्न में भी अहंकार कहाँ से होगा?
मानव समाज से जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त सहयोग के बलबूते पर ही जीवन सफल हुआ यह जानकार नृऋण से उऋण होने हेतु अतिथियों की व्यवस्था करना, बुजुर्गो, असहायों, असमर्थों, रूग्ण जनों, बालको, अबलाओं, गुरुकुलों और संन्यासियों की सेवा सहायता करके अतिथि यज्ञ / मानव यज्ञ/ नृयज्ञ सम्पन्न करने वाले को अहंकार कैसा?
सूर्य, ताराओं, चन्द्रमा, आकाश, अन्तरिक्ष, वायु, अग्नि, जल, भूमि, गौ, वृषभ, अजा, आदि पशु-पक्षियों और पैड़-पौधे से लेकर, कवक- शैवाल तक और अदृश्य सुक्ष्म जीवियों की सहायता से श्वसन,पानी, भोजन,  आवास, दूध- सब्जी , अनाज आदि प्राप्त करने का ऋण जानकर उक्त सबकी यथायोग्य सेवार्थ पर्यावरण स्वच्छता, गृह से लेकर नगर तक और बाग-बगीचे , नदी -तालाब, कुए-बावड़ी, वन आदि सबकी स्वच्छता रखना, वृक्षारोपण, पेड़-पौधों को खाद-पानी, निन्दाई- गुड़ाई, कटनी-छटनी कर उन्हें रोग मुक्त रखना, पशु- पक्षियों को भोजन, दाना- पानी,छाँव, आवास देना, सेवा सुश्रुषा करके भूत यज्ञ करने वाले को अहंकार पालने की समय ही कहाँ रहेगा।

दिवंगत मात-पिता, दादा- दादी, नाना- नानी,ताऊ, काका-भुआ, ताई-काकी,  भाई- बहन, भाभी आदि पितृपक्ष की सात पीढ़ी और मातृ पक्ष की पाँच पीढ़ी के दिवंगत नर-नारियों का तथा आस-पड़ोसी, जाने-अनजाने, सेवकों, स्वामियों की ब्रह्म भोज, कन्या भोजन, गौदान, कुए- बावड़ी, तालाब , बाग-बगीचे, धर्मशाला- सदाव्रत खोलने, शाला, विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, औषधालय, चिकित्सालय आदि बनवाने की अपूर्ण अभिलाषा और अतृप्त इच्छाओं को पूर्ण करने हेतु यथा शक्ति समुचित सहयोग, अर्थ और श्रमदान करके सबका श्राद्ध-तर्पण कर पितृ यज्ञ करने वाले और उक्त समस्त धर्म कर्म पूर्ण करने अधिकारी होने के लिए अगली पीढ़ी को जन्म देकर उनका समुचित पालन-पोषण, शिक्षण, स्वास्थ्य चर्या कर बढ़ा कर सुदृढ़, सक्षम और संस्कारवान बनाने वाले को अहंकार कैसा?

यह है ब्राह्म धर्म है - वैदिक धर्म। इसे ब्राह्मण धर्म भी कहते हैं।
इसमें केवल वामाचारी, तान्त्रिकों, नास्तिकों, अधर्मियों और पैशाच धर्मियों को ही आपत्ति हो सकती है।
इसमें न मन्दिर है, न मूर्ति पूजा, न मान- मन्नत, न टोने-टोटके केवल अपने-अपने कर्तव्य पूर्ण करना है।
स्वाभाविक है देवगण और देवता भी उनके कर्तव्य पूर्ण कर आपकी आवश्यकताएँ पू्ण करेंगे।