सोमवार, 19 जून 2023

अद्वैत दर्शन या अभेद दर्शन और त्रेत दर्शन

१ वैदिक अभेद दर्शन और अद्वैत वेदान्त दर्शन परमात्मा को निमित्तोपादन कारण मानना। अर्थात ईशावास्यम् इदम सर्वम् और  सर्व खल्विदम् ब्रह्म (सबकुछ परमात्मा ही है इसको) स्वीकारने वाला दर्शन ही वैदिक अभेद दर्शन और अद्वैत वेदान्त दर्शन होता है।
अभेद दर्शन/अद्वैत वादी के अनुसार जीव और जगत परमात्मा के ही स्वरूप हैं। जीव और जगत परमात्मा से भिन्न नही है और आत्मा अनेक नही है, बल्कि आत्मा एक ही है, जो परमात्मा से अभिन्न है।
वैदिक अभेद दर्शन का आधार ऋग्वेद, शुक्ल यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद मन्त्र संहिताओं के सुक्त और अध्याय हैं। इसमें वैदिक अभेद दर्शन शुद्ध तात्विक दर्शन है। 
अद्वैत वेदान्त दर्शन तात्विक दर्शन को ही तार्किक ढङ्ग से समझानें का प्रयास है। ये मुख्य रूप से उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता (महाभारत भीष्म पर्व अध्याय २५ से ४३) तथा विष्णु पुराण आदि के आधार पर बनें उत्तर मीमांसा दर्शन (शारीरिक सुत्र यानी ब्रह्मसुत्र) पर आधारित है। 
अद्वैत दर्शन के मुख्य आचार्य आद्यशंकराचार्य जी हैं। अन्य आचार्य सुरेश्वराचार्य (मण्डन मिश्र), हस्तमालकाचार्य, पद्मपादाचार्य, त्रोटकाचार्य, वाचस्पति मिश्र आदि हैं।
जैसे सूर्य का प्रकाश है वैसे ही परमात्मा के विष्णु स्वरूप की शक्ति  माया है। माया परमात्मा की परा प्रकृति है, स्व भाव है। अतः जगत भी परमात्मा से अभिन्न है। इसलिए भक्ति भाव से जगत को परमात्मा की लीला कहा जाता है।
जीवभाव मात्र भाव है, जैसे व्यक्ति मे माता या पिता और सन्तान, पति, या पत्नी, सत्ताधीश और प्रजा (शासक और शासित) जैसे अनेक भाव एक साथ रहते हैं ऐसे ही आत्मभाव और जीवभाव दोनों साथ साथ रहते हैं। जिस समय जो प्रधान रूप से उभर कर प्रत्यक्ष होता है, उस समय व्यक्ति के व्यवहार में झलकता है। जो सदैव आत्मभाव में ही रमता हो वह जीवन्मुक्त है।


२ भेदाभेद या द्वैताद्वैत वादी - इनके मुख्य आचार्य निम्बार्काचार्य हैं। वे उपनिषदों, ब्रह्मसुत्र, और पुराणों के आधार पर मानते हैं कि, वेदों में अभेद, अद्वैत और भेद या द्वैत दोनों ही प्रकार के मन्त्र हैं। इसलिए दोनों ही मान्य हैं।
  
३ त्रेतवाद या विशिष्टाद्वैत वाद --- आर्य समाज के प्रवर्तक महर्षि दयानन्द सरस्वती जी का दर्शन त्रेतवाद कहलाता है। इसका मुख्य आधार कृष्ण यजुर्वेदीय श्वेताश्वतरोपनिषद है।
रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत दर्शन स्मृतियों अर्थात रामायण, महाभारत, विष्णु पुराण आदि पूराणों सहित वेदान्त अर्थात उपनिषदों और ब्रह्म सुत्र के आधार पर ही अपना मतवाद प्रस्तुत करता है। 
विशिष्टाद्वैत वेदान्त दर्शन के मुख्य आचार्य रामानुजाचार्य  का विशिष्टाद्वैत दर्शन और आर्य समाज के प्रवर्तक महर्षि दयानन्द सरस्वती का त्रेतवाद भी लगभग लगभग  समान ही है।

ये सर्वोच्च सत्ता परब्रह्म परमेश्वर, अनेकजीव और जगत (प्रकृति) तीनों को अनादि, अविनाशी मानते हैं। इनके अनुसार जगत के अन्तर्गत जीव अर्थात शरीर के अन्दर जीव और जीव में ब्रह्म का वास होता है। यही विशिष्टाद्वैत दर्शन है।
विशिष्टाद्वैत/ त्रेतवाद में परब्रह्म को परमेश्वर अर्थात सर्वोच्च शासक माना जाता है। लेकिन परब्रह्म परमेश्वर को तानाशाह नहीं माना जाता है। परब्रह्म परमेश्वर सर्वसमर्थ और सर्वज्ञ माना जाता है, जबकि जीव को अल्प सामर्थ्यवान और अल्पज्ञ माना जाता है। जगत को जड़ मानते हैं। इस प्रकार जीव और जगत दोनों ही परब्रह्म परमेश्वर के अधीन मानते हैं।

४ त्रेतवाद का ही एक रूप त्रिक दर्शन है जिसे प्रत्यभिज्ञा दर्शन या कश्मीरी शैव दर्शन भी कहते हैं; जिसके मुख्य आचार्य वसुगुप्त,और उनके शिष्य कल्लट, सोमनन्द  तथा सोमानन्द के पुत्र और शिष्य उत्पलाचार्य,  उत्पलाचार्य के शिष्य अभिनव गुप्त हैं। अभिनव गुप्त नें प्रत्यभिज्ञा दर्शन सुव्यवस्थित व्याख्या प्रस्तुत की। बौद्धधर्म के माध्यमिक दर्शन (नागार्जुन और कुमारलात के शुन्यवाद), योगाचार (आचार्य मैत्रेयनाथ, असङ्ग और वसुबन्धु और कुमारलात के विज्ञान वाद) और आचार्य बोधिसत्व मञ्जुश्री के वज्रयान शाखा का ही उत्तरवर्ती स्वरूप कश्मीरी शैव दर्शन त्रिक दर्शन है, जिसमें वज्रयान के तन्त्र को उपनिषदों (वेदान्त) से जोड़ने का प्रयास किया गया । ये शिव को परब्रह्म परमेश्वर मानते हैं।
शुद्धाद्वेत  दर्शन के मुख्य आचार्य वल्लभाचार्य जी हैं। शुद्धाद्वेत दर्शन त्रिक दर्शन का वैष्णव स्वरूप है। ये श्रीकृष्ण को परब्रह्म परमेश्वर मानते हैं। शुद्धाद्वेत दर्शन का मुख्य आधार श्रीमद्भागवत पुराण, अन्य पुराण, श्रीमद्भगवद्गीता, उपनिषद और ब्रह्मसूत्र है।
त्रिक दर्शन और शुद्धाद्वेत दोनों दर्शन परमेश्वर शिव या कृष्ण के अलावा विभिन्न श्रेणियों वाली अनेक जीवात्मा मानते है  परब्रह्म  परमेश्वर (विष्णु या शिव), जीवात्मा तथा  जगत को अनादि अनश्वर मानते हैं, परब्रह्म परमेश्वर, जीवात्मा और जगत को स्वतन्त्र और प्रथक-प्रथक मानते हैं। लेकिन ये दर्शन स्वयम् को शुद्ध अद्वैत दर्शन मानते हैं। लेकिन परब्रह्म के अलावा विभिभिन्न स्तरों वाली अनेक जीवात्मा और जगत को अनादि, अविनाशी मानने वाले दर्शन को अभेद वादी या अद्वैत वादी नही कहा जा सकता।
त्रिक दर्शन तो इब्राहीमी मजहबों के समान शिव  की तानाशाही (स्वतन्त्र इच्छा) स्वीकार्य करता है। 

५ त्रेतवाद का ही एक रूप द्वैतवाद है। इसके आचार्य मध्वाचार्य हैं। ये विशिष्टाद्वैतवादियों, शुद्धाद्वेत वादियों और त्रेत वादी प्रत्यभिज्ञा वादियों के समान भ्रमित न करते हुए स्वयं को सत्यनिष्ठा के साथ द्वैतवादी मानते हैं क्योंकि ये परब्रह्म परमेश्वर, जीव और जगत को अनादि, अनश्वर और प्रथक-प्रथक सत्ता मानते हैं। ये उपनिषदों और पुराणों के आधार पर अपना मत सिद्ध करते हैं।



सत्य परमात्मा, ऋत विश्वात्मा और जगत की उत्पत्ति परमात्मा की लीला।

१ सत मतलब अस्ति (है), अस्तित्व (हैपन), सत्य, वास्तविक।
असत कुछ होता ही नही। जो है वह सत ही है।
सत ऋत (परमात्मा के संविधान) से भी उच्चतर है। ऋत विश्वात्मा ॐ के निकटतम है। परमात्मा ही सत है।
सत अक्षर ब्रह्म होते हुए भी उससे भी परे साक्षात परमात्मा ही है।
सत के अलावा कुछ है ही नही अतः जो कुछ दिख रहा है, अनुभव हो रहा है वह सब वह परमात्मा अर्थात सत ही तो है।
अक्षर ब्रह्म तो प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) (पुरुष- प्रकृति) ब्रह्म (सवितृ- सावित्री) है।
इससे उत्कृष्ट प्रज्ञात्मा (परम दिव्य पुरुष- परा प्रकृति) परब्रह्म (विष्णु-माया) है। 
इससे उच्चतर विश्वात्मा - परमात्मा का ॐ संकल्प है। इससे उच्चतर और सर्वोच्च परम आत्मा/ परमात्मा ही है। जो एकमात्र सत / सत्य है।
सत सदैव एकसा, समरस, अपरिवर्तनशील, अक्षर एकमेव, सर्वोत्कृष्ट, सर्वोच्च, सर्वोत्तम परमात्मा है।
जबकि अपरिवर्तनशील परमात्मा अर्थात सत का अपरिवर्तनशील, अटल संविधान ऋत है। लेकिन ऋत में धर्म के समान यदि और परन्तुक बहुत होनें से सदैव गतिशील ,अटल लेकिन अचल नही है। इसे एकसाथ पूर्णरूपेण समझ कर स्मरण रखना सबसे कठीन काम है। केवल लगभग आत्मज्ञ ही समझ पाते हैं।

शुन्य मतलब परम मध्य। न धनात्मक न ऋणात्मक। गुण साम्यावस्था।

अ शुन्य मतलब धनात्मक हो या ऋणात्मक लेकिन शुन्य से अनन्त के बीच की अवस्था। विषम, प्रकृति में विक्षेप की अवस्था ।

जो कुछ है सब सत ही है। यही इसका भौतिक स्वरूप है। जो कुछ है सब सत ही है, इसलिए सत के अतिरिक्त कुछ भी नही है, न सत के आगे कुछ है न सत के पीछे दाँये- बाँये, उपर- नीचे कुछ भी नहीं है। ऐसा समझा जा सकता है। लेकिन यह कुछ भी नहीं भी तो सत ही है। नेति नेति।
सत स्थाई, स्थिर है इसीलिए सापेक्ष सबकुछ गतिशील है। इसलिए ऋत भी गतिशील है।
यही बात सत (परमात्मा) से असत (वास्तव में मिथ्या) जगत की उत्पत्ति और असत (केवल परमात्मा) से सत (वर्तमान स्वरूप में जगत) की उत्पत्ति है।
सत्य (परमात्मा) को जितना जान लिया उतने ही आप चेतन होते जाते हैं। और परमात्मा के निकट होते जाते हैं। आनन्दित रहते हैं। पूर्णतः जान लेनें पर परमात्मा ही रह जाता है।
परमात्मा के ॐ संकल्प के परिणाम स्वरूप उत्पन्न जैविक  और जड़ जगत रूपी यह सृष्टि परमात्मा की लीला मात्र है।
सृष्टि, स्थिति और लय उस परमात्मा का मौज है, लीला है।

शुक्रवार, 16 जून 2023

मैरा धर्म दर्शन

वेदिक साहित्य के बाद मैरे विचार  (१) पूर्व मीमांसा दर्शन - शबर स्वामी, कुमारील भट्ट और मण्डन मिश्र और महर्षि दयानन्द सरस्वती जी। की विचारधारा। (माध्वाचार्य को नही पढ़ा।)
उत्तर मीमांसा दर्शन - आद्य शंकराचार्य, सुरेश्वराचार्य, और वाचस्पति मिश्र की विचारधारा।
श्रीमद्भगवद्गीता - ग.वा. कविश्वर और रामसुखदास जी महाराज की विचारधारा से अत्यधिक प्रभावित है।

गुरुवार, 15 जून 2023

निर्गुण स्वरूप में राम नाम के उपासक, वेद, वर्णाश्रम धर्म के पक्षधर,अहिन्सा वादी, गौरक्षक, और जातिप्रथा विरोधी तथा इस्लाम का कड़ा खण्डन करने वाले कबीर


श्री कुमार अवधेश सिंह जी की फेसबुक वाल से प्राप्त जानकारी के अनुसार ---
कबीर दास इस्लामिक सुन्नत, रोजा, नमाज़, कलमा, काबा, बांग और ईद पर क़ुरबानी का स्पष्ट खंडन करते थे। सिखों के प्रसिद्ध ग्रन्थ गुरु ग्रन्थ साहिब में कबीर साहिब के इस्लाम संबंधी चिंतन को यहाँ पर प्रस्तुत किया जा रहा है।  
मुझे भी उनका यह मत उचित ही प्रतीत होता है।

१. सुन्नत का खंडन 

 काजी तै कवन कतेब बखानी ॥
पदत गुनत ऐसे सभ मारे किनहूं खबरि न जानी ॥१॥ रहाउ ॥
सकति सनेहु करि सुंनति करीऐ मै न बदउगा भाई ॥
जउ रे खुदाइ मोहि तुरकु करैगा आपन ही कटि जाई ॥२॥
सुंनति कीए तुरकु जे होइगा अउरत का किआ करीऐ ॥
अरध सरीरी नारि न छोडै ता ते हिंदू ही रहीऐ ॥३॥
छाडि कतेब रामु भजु बउरे जुलम करत है भारी ॥
कबीरै पकरी टेक राम की तुरक रहे पचिहारी ॥४॥८॥
                                                       सन्दर्भ- राग आसा कबीर पृष्ठ 477

अर्थात कबीर जी कहते हैं ओ काजी तो कौनसी किताब का बखान करता है। पढ़ते हुऐ, विचरते हुऐ सब को ऐसे मार दिया जिनको पता ही नहीं चला। जो धर्म के प्रेम में सख्ती के साथ मेरी सुन्नत करेगा सो मैं नहीं कराऊँगा। यदि खुदा सुन्नत करने ही से ही मुसलमान करेगा तो अपने आप लिंग नहीं कट जायेगा। यदि सुन्नत करने से ही मुस्लमान होगा तो औरत का क्या करोगे? अर्थात कुछ नहीं और अर्धांगि नारी को छोड़ते नहीं इसलिए हिन्दू ही रहना अच्छा है। ओ काजी! क़ुरान को छोड़! राम भज। तू बड़ा भारी अत्याचार कर रहा है, मैंने तो राम की टेक पकड़ ली हैं, मुस्लमान सभी हार कर पछता रहे है। 

२. रोजा, नमाज़, कलमा, काबा का खंडन 
रोजा धरै निवाज गुजारै कलमा भिसति न होई ॥
सतरि काबा घट ही भीतरि जे करि जानै कोई ॥२॥

सन्दर्भ- राग आसा कबीर पृष्ठ 480
अर्थात मुसलमान रोजा रखते हैं और नमाज़ गुजारते है। कलमा पढ़ते है।  और कबीर जी कहते  हैं  इन किसी से बहिश्त न होगी। इस घट (शरीर) के अंदर ही सत्तर काबा के अगर कोई विचार कर देखे तो।

कबीर हज काबे हउ जाइ था आगै मिलिआ खुदाइ ॥
सांई मुझ सिउ लरि परिआ तुझै किन्हि फुरमाई गाइ ॥१९७॥

सन्दर्भ- राग आसा कबीर पृष्ठ 1375
अर्थात कबीर जी कहते हैं मैं हज करने काबे जा रहा था आगे खुदा मिल गया , वह खुदा मुझसे लड़ पड़ा और बोला ओ कबीर तुझे किसने बहका दिया।

३. हिंसा (क़ुरबानी) का खंडन 

जउ सभ महि एकु खुदाइ कहत हउ तउ किउ मुरगी मारै ॥१॥
मुलां कहहु निआउ खुदाई ॥ तेरे मन का भरमु न जाई ॥१॥ रहाउ ॥
पकरि जीउ आनिआ देह बिनासी माटी कउ बिसमिलि कीआ ॥
जोति सरूप अनाहत लागी कहु हलालु किआ कीआ ॥२॥
किआ उजू पाकु कीआ मुहु धोइआ किआ मसीति सिरु लाइआ ॥
जउ दिल महि कपटु निवाज गुजारहु किआ हज काबै जाइआ ॥३॥

सन्दर्भ विलास प्रभाती कबीर पृष्ठ 1350

अर्थात कबीर जी कहते है ओ मुसलमानों। जब तुम सब में एक ही खुदा बताते हो तो तुम मुर्गी को क्यों मारते हो। ओ मुल्ला! खुदा का न्याय विचार कर कह। तेरे मन का भ्रम नहीं गया है। पकड़ करके जीव ले आया, उसकी देह को नाश कर दिया, कहो मिटटी को ही तो बिस्मिल किया।  तेरा ऐसा करने से तेरा पाक उजू क्या, मुह धोना क्या, मस्जिद में सिजदा करने से क्या, अर्थात  हिंसा करने से तेरे सभी काम बेकार हैं।

कबीर भांग माछुली सुरा पानि जो जो प्रानी खांहि ॥
तीरथ बरत नेम कीए ते सभै रसातलि जांहि ॥२३३॥

सन्दर्भ विलास प्रभाती कबीर पृष्ठ 1377

अर्थात कबीर जी कहते हैं जो प्राणी भांग, मछली और शराब पीते हैं, उनके तीर्थ व्रत नेम करने पर भी सभी रसातल को जायेंगे।

 रोजा धरै मनावै अलहु सुआदति जीअ संघारै ॥
आपा देखि अवर नही देखै काहे कउ झख मारै ॥१॥
काजी साहिबु एकु तोही महि तेरा सोचि बिचारि न देखै ॥
खबरि न करहि दीन के बउरे ता ते जनमु अलेखै ॥१॥ रहाउ ॥

सन्दर्भ रास आगा कबीर पृष्ठ 483

अर्थात ओ काजी साहिब तू रोजा रखता हैं अल्लाह को याद करता है, स्वाद के कारण जीवों को मारता है। अपना देखता हैं दूसरों को नहीं देखता हैं। क्यों समय बर्बाद कर रहा हैं। तेरे ही अंदर तेरा एक खुदा हैं। सोच विचार के नहीं देखता हैं। ओ दिन के पागल खबर नहीं करता हैं इसलिए तेरा यह जन्म व्यर्थ है।

४. बांग का खंडन

कबीर मुलां मुनारे किआ चढहि सांई न बहरा होइ ॥
जा कारनि तूं बांग देहि दिल ही भीतरि जोइ ॥१८४॥

सन्दर्भ- राग आसा कबीर पृष्ठ 1374

अर्थात कबीर जी कहते हैं की ओ मुल्ला। खुदा बहरा नहीं जो ऊपर चढ़ कर बांग दे रहा है। जिस कारण तू बांग दे रहा हैं उसको दिल ही में तलाश कर।


इसके ठीक विपरीत कबीर साहिब श्री राम के गुणगान करते और गौसेवा के लिए प्रेरणा देते मिलते है। प्रमाण देखिये-

कबीर कूता राम का, मुतिया मेरा नाऊँ।गले राम की जेवडी ज़ित खैंचे तित जाऊँ।।”
कबीर निरभै राम जपि, जब लग दीवै बाती।तेल घटया बाती बुझी, सोवेगा दिन राति।।”
” जाति पांति पूछै नहिं कोई। हरि को भजै सो हरि का होई।।”
साधो देखो जग बौराना,सांची कहौं तो मारन धावै,झूठे जग पतियाना।

अब मोहि राम भरोसा तेरा,
जाके राम सरीखा साहिब भाई, सों क्यूँ अनत पुकारन जाई॥
जा सिरि तीनि लोक कौ भारा, सो क्यूँ न करै जन को प्रतिपारा॥
कहै कबीर सेवौ बनवारी, सींची पेड़ पीवै सब डारी॥114॥

कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढत बन माहि !!
!! ज्यो घट घट राम है, दुनिया देखे नाही !!

श्री राम जी के गुणगान के अनेक प्रमाण कबीर रचनावली में मिलते है। बहुत कम लोग जानते है कि कबीर दास ने गौरक्षा के लिए अपना विवाह करवाने से मना कर दिया था। उनके वधुपक्ष वाले उनके विवाह में गोमांस परोसने की योजना बना रहे थे। कबीर दास गौप्रेमी थे। उन्होंने स्पष्ट कह दिया। अगर गौमाता कटी तो वह विवाह नहीं करेंगे। अंत में कबीर दास ने वह गौ एक ब्राह्मण को दे दी। तब जाकर उनका विवाह संपन्न हुआ। 

इन सभी प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि दलित संत वेद, तीर्थ, जप, राम-कृष्ण,यज्ञपवीत, गौरक्षा आदि वैदिक परम्पराओं में अटूट विश्वास रखते थे एवं इस्लाम की मान्यताओं के कटु आलोचक थे।

कबीर की साधना ---
कबीर की योग साधना वज्रयानी बौद्ध मत के चौरासी सिद्धों और नौ नाथों की परम्परा का अनुसरण है।
इसीकारण कबीर की साधना पद्यति में में योग और भक्ति गड्ड-मड्ड लगती है। लेकिन यज्ञ और मीमांसा दर्शन पर ध्यान नही दिया गया है। जातिप्रथा का कट्टर विरोध के मूल में भी सिद्धों की परम्परा ही है। उनकी भाषा भी सिद्धों के अनुरूप ही है।

कबीर का दर्शन --- 

कबीर के मत में *ब्रह्म एक ही है लेकिन माया के कारण हीं वह अनेक रूपों में दिखायी पड़ता है* ।
 
यह संसार कागद की पुड़िया, 
बुंद परे गलि जाना है।

कबीर का *जीव माया रहित होकर ही ब्रह्म हो जाता है। जगत भी जीव और ब्रह्म से पृथक सत्ता नहीं है। एक ओर जहॉं जगत ब्रह्म की अभिव्यक्ति है वहीं दूसरी ओर वह पंचभौतिक रूपों में जीव के अस्तित्व का नियामक है। इस तरह एक बिन्दु पर ब्रह्म, जीव और जगत एक-दूसरे से अभिन्न हो जाते हैं।* इसी आधार पर कबीर का अद्वैत दर्शन प्रमाणित होता है।

 रज गुण, तम गुण, सत गुण कहिबे, य सव तेरी माया।
चौथे पद को जो जन चिन्हे तिनहि परमु पद पाया।

कबीरदास जी के अनुसार *निर्गुण में ही गुण और गुण में ही निर्गुण समाया हुआ है। परस्पराबलम्बन के कारण ब्रह्म की सत्ता रूपात्मक जगत से पृथक नहीं रह पाती इसलिए वह निर्गुण होकर भी इस सृष्टि के कण-कण में समाया हुआ है।* 

नाति सरूप वरण नहीं जाके धटि-धटि रहया समायो ।
कबीर का *ब्रह्म निर्गुण और अद्वैत होकर भी भक्ति का विषय बनता है इसलिए वह अद्वैत ब्रह्म और सगुण के बीच का ब्रह्म है।* 
उनके अनुसार *यह जगत ब्रह्म की अभिव्यक्ति है। वह उस एक अकेले ब्रह्म का ही फैलाव है।*

 कबीर कहते हैं
एके राम देख्या सबहि में, कहे कबीर मनमाना।
माटि  एक  भेख  धरि नाना, तामें ब्रह्म समाना।

 


बुधवार, 14 जून 2023

यूरोपीयों द्वारा किए गए वैज्ञानिक अनुसंधान और फ्रायड का मनोविश्लेषण का आधार भारतीय ग्रन्थ।

१ सभी विधाओं के मुख्य विज्ञानियों के नाम और उनके शोध का वर्ष देखिये। जिससे सिद्ध हो जाएगा कि, यूरोपीय सभी नये आविष्कार सन १५०० ईस्वी के बाद ही हुए। जब यूरोपियों का भारत से सीधा सम्पर्क हुआ। महाभारत के बाद, विशेष कर विक्रमादित्य के बाद और वास्को डि गामा के पहले वे अरबियों, तिब्बती और चीनियों के माध्यम से भारतीय ज्ञान से परिचित थे।

२ लोगों को केवल अंग्रेजी राज याद है वे पुर्तगालियों के बारे में थोड़ा बहुत जानते हैं, उससे कम  फ्रांसीसियों के बारे मे जानते हैं। लेकिन जर्मनों के बारे में कुछ नहीं जानते क्योंकि जर्मनी का प्रत्यक्ष शासन भारत पर नही रहा। लोग जर्मन बौद्धिकता से अपरिचित हैं। जर्मनों नें वैदिक ग्रन्थों और संस्कृत के ग्रन्थों का गहन अध्ययन कर दानवी सभ्यता की परम्परा अनुसार वैदिक ज्ञान को आधुनिक तकनीक में बदल दिया।

३ जन साधारण के दिमाग में भरा है कि, मेक्समूलर द्वारा वेदों के अनुवाद के बाद ही यूरोपीय वैदिक विज्ञान से परिचित हुए। जबकि, मेक्समूलर नें सनातन वैदिक भारतियों को भ्रमित करने का काम अधिक किया और अप्रत्यक्षतः बौद्धों की महत्ता बखानी। जिसका प्रभाव आजतक भारतियों पर है।
 सत्रहवीं सदी तक सम्पूर्ण यूरोपीय विद्वान वैदिक विज्ञान से परिचित हो चुके थे। 

हमारे शास्त्रों में स्वभाव को तीन भागों में विभाजित माना है। ठीक वैसे ही फ्रायड द्वारा स्वभाव और व्यक्तित्व को तीन भागों में बांटना कोई संयोग नही लगता।- 

स्व से स्व भाव अर्थात स्वभाव हुआ। स्वभाव तीन प्रकार के होते हैं।

तीन प्रकार का स्व भाव---
1 सात्विक स्व भाव या वैकारिक स्व भाव अर्थात स्वाहा अर्थात आधिदैविक शक्ति । 
स्वाहा --  श्रद्धा, भक्ति, ईश्वर प्रणिधान, स्व का त्याग, समर्पण, त्याग, वैराग्य ये स्वाहा के ही परिणाम हैं।
आधिदैविक शक्ति -- आधिदैविक शक्ति  मतलब वैराज देवताओं अर्थात व्यापक आकाश, वायु, सूर्य, विद्युत, अग्नि, जल, भूमि आदि प्राकृतिक देवताओं से जुड़ी सामर्थ्य है।

मनोविज्ञान के मनोविश्लेषण में  वैकारिक स्व भाव अर्थात  (आधिदैविक शक्ति) स्वाहा मतलब स्व का हनन (सुपर इगो) है। इसमें व्यक्ति नैतिक हो जाता है। इस समय इसकी प्रकृति (सम आधि) आधिदेविक साक्षात्कार वाली होती है।

2  राजस स्व भाव या तेजस स्व भाव अर्थात वषट अर्थात अध्यात्मिक शक्ति।
वषट अर्थात मस्तिष्क सम्बन्धी। (ध्यान दें - न्यास में शिखाये वोषट बोलते हैं।) वषट से बुद्धिवादी, तार्किक, गणितीय, वैज्ञानिक सोच होती है। वषट से ही वोषट, वौषट आदि शब्द बनें हैं।
अध्यात्मिक शक्ति अर्थात अध्यात्म मतलब देहेन्द्रिय से अन्तर्वर्ती या इन्द्रियों से अन्तः प्रवेश करते करते आत्म तक पहूँचने से प्राप्त सामर्थ्य है । 

मनोविज्ञान के मनोविश्लेषण में  तेजस स्व भाव अर्थात (अध्यात्मिक शक्ति) वषट (इगो) मतलब मस्तिष्क सम्बन्धी इसमे व्यक्ति अध्यात्मिक (माध्यमिक) (सब कांशियस) प्रवृत्ति का तार्किक और अत्यन्त सक्रिय होता है। सबके सामने सात्विक एकान्त में राजसी स्वभाव होता है।

3 तामस स्व भाव या भूतादिक स्व भाव अर्थात स्वधा  अर्थात अधिभौतिक शक्ति।
स्व धा मतलब स्व का धारण, स्व वादी धारणा, आत्म केन्द्रित, स्वयम् की सुख सुविधा प्रधान मानसिकता, कामना।  
आधिभौतिक शक्ति अर्थात भौतिक विज्ञान में अध्ययन की जाने वाली उर्जा।

मनोविज्ञान के मनोविश्लेषण में  भूतादिक स्व भाव अर्थात (अधिभौतिक शक्ति)। स्वधा मतलब स्व का धारण (इड / कामना) है। 
इसमें व्यक्ति अत्यल्प नैतिक रह जाता है। इस समय इसकी प्रकृति अधिभौतिक तामसिक (अन कांशियस) (निष्क्रियता, निद्रा, आलस्य) प्रधान वाली होती है। नैतिकता इसके लिए गौण और स्वार्थ, लौभ, दैहिक सुख प्रधान होते हैं। काम से कामना (इड) और कामना से वासना (लिबिडो) ध्यान रखियेगा। फ्रायड के दर्शन के इसी भाग की कटु आलोचना होती है

1 (क) सात्विक स्व भाव या वैकारिक स्व भाव अर्थात स्वाहा अर्थात आधिदैविक शक्ति से प्रत्यक्ष या प्रकट स्वभाव हुआ।

मनो विश्लेषण के सम्बन्ध में स्पष्टीकरण ---  प्रत्यक्ष या प्रकट स्वभाव पूर्ण सचेत अवस्था है। पूर्ण जागृत अवस्था है। ऐसी स्थिति तभी बनती है जब चित्त सम अवस्था सम आधि में हो। इस लिए इसे कांशियस (चेतन) कहा गया।

2 (क) राजस स्व भाव या तेजस स्व भाव अर्थात वषट अर्थात अध्यात्मिक शक्ति से अर्धप्रत्यक्ष या अर्धप्रकट स्वभाव हुआ। स्वप्नावस्था, मोहित अवस्था और सम्मोहन अवस्था इसके साक्षात उदाहरण हैं।

मनो विश्लेषण के सम्बन्ध में स्पष्टीकरण --- अर्धप्रत्यक्ष/ अर्ध प्रकट स्वभाव अर्धचेत अवस्था है। मनोराज्यम्/ कल्पना में खोया/ मोहित/ सम्मोहित अवस्था है। यह तन्द्रा अवस्था है। ऐसी स्थिति तभी बनती है जब चित्त अर्ध जाग्रत और अर्ध सुप्त अवस्था में हो। इस लिए इसे सबकांशियस (अर्ध चेतन) कहा गया। अधिकांश परिकल्पनाएँ (अधम्शन्स) इसी अवस्था में होती है।

3 (क) तामस स्व भाव या भूतादिक स्व भाव अर्थात स्वधा अर्थात अधिभौतिक शक्ति से परोक्ष या अप्रत्यक्ष या अप्रकट स्वभाव हुआ।

मनो विश्लेषण के सम्बन्ध में स्पष्टीकरण ---अप्रत्यक्ष या अप्रकट स्वभाव तम समाधि या योग निद्रा अवस्था है या पूर्ण सुषुप्त अवस्था है। ऐसी स्थिति में भी चित्त सम अवस्था सम आधि में ही होता है लेकिन चेतन नही होता/ सचेत नही होता। तम समाधि इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। इस लिए इसे अन् कांशियस (अचेतन) कहा गया। सम्पूर्ण संस्कार इसी अवस्था में व्यवस्थित (सेट) होते हैं।

मनो विश्लेषण के सम्बन्ध में संक्षिप्त स्पष्टीकरण --- मनोविज्ञान में - 
१ स्वाहा को सुपर इगो कहा गया है -  प्रत्यक्ष/ प्रकट स्वभाव को कांशियस कहा गया है।  
२ वषट को इगो कहा गया है -  अर्धप्रत्यक्ष/ अर्धप्रकट स्वभाव को सब कांशियस कहा गया है। और 
३ स्वधा  को इड (कामना) कहा गया है - परोक्ष/ अप्रकट स्वभाव को अन् कांशियस कहा गया है।


रविवार, 11 जून 2023

वास्तु और मुहूर्त।

वास्तुशास्त्र में ७० % भाग भूमि चयन का और ३०% भाग भवन निर्माण का होता है।
वास्तुशास्त्र और मुहुर्त उचित अनुचित दर्शाते हैं शुभ-अशुभ नही।
एक अच्छा आर्किटेक्ट सच्चा वास्तुशास्त्री होता है और एक अच्छा वास्तुविद ही अच्छा आर्किटेक्ट हो सकता है।
यदि भूखण्ड के उत्तर पूर्व में ढाल है, खुला है तो दक्षिण पश्चिम स्वतः उँचा होगा। परिणाम स्वरूप भूखण्ड और फर्श पर सदैव प्रातः काल की धूप मिलेगी। और सायंकाल की धुप से फर्श गर्म नही होगा।
यदि वायव्य कोण (उत्तर पश्चिम) खुला है और आग्नेय कोण (दक्षिण पूर्व) में हवनकुण्ड, रसोई आदि है तो, गर्मी और धुँआ बाहर निकल जाएगा; न घर गर्म होगा न घर में धुँआ भरेगा। यही वास्तुशास्त्र/ आर्किटेक्चर है।
वास्तुशास्त्र के अनुसार घर की छत उँची होनी चाहिए, मध्म भाग में खुला चौक होना चाहिए, जिसके चारों ओर कमरे हों जिसके दर्वाजे चौक में खुलना चाहिए। बाहर की ओर चारों ओर गलियारे हो, और खिड़कियाँ गलियारों में खुलना चाहिए ताकि, वायु का सहज आवागमन बना रहे और घर की गरम हवा उजालदान (वेण्टिलेटर) से निकल सके। पंखे से भी हवा ठण्डी मिले। ए.सी. की आवश्यकता ही न पड़े।
सम्भव हो तो मुख्यद्वार के अलावा पार्श्व में भी एक द्वार होना चाहिए, मतलब कॉलोनी ऐसे डिज़ाइन हो कि, प्रत्येक मकान कार्नर वाला हो। मूख्य सड़क घर के पूर्व में हो अर्थात मुख्य द्वार पूर्व में हो और  तथा छोटी सड़क उत्तर या दक्षिण में हो। उत्तर वाली सड़क के मकान को ईशान कोण खुला मिलेगा तथा दक्षिण में छोटी सड़क वाले मकान को ठण्ड में भी घर में धूप मिलेगी। पश्चिम में पिछवाड़ा होना अच्छा रहता है। जहाँ दिनभर धूप रहने से गन्दगी और सीलन नही रहती। 
ऐसे तार्किक और वैज्ञानिक आधार वाले वास्तुशास्त्र को अल्पज्ञों नें शुभाशुभ से जोड़ कर ढकोसला बना दिया।

ऐसे ही मुहुर्त किसी कार्य के लिए अनुकूल और उचित समय को कहते हैं न कि, शुभ समय को।
किसी कार्य विशेष के लिए उचित अनुचित काल दर्शक मुहुर्त शास्त्र कहलाता है। न कि, शुभाशुभ काल दर्शक।
वर्षा ऋतु में समारोह करना दुष्कर कार्य है, अतः वर्षा ऋतु में विवाह आदि निषिद्ध हैं, यह मुहुर्त है। 
वैदिक काल में अमावस्या का दुसरा दिन अर्थात प्रतिपदा, एकाष्टका अर्थात शुक्ल पक्ष की अष्टमी, पूर्णिमा,अमावस्या, अर्धचन्द्र दिवस अष्टका अर्थात कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथियों का ही उल्लेख मिलता है। दस दिनों का दशाह शब्द अवष्य मिलता है; लेकिन, वारों का उल्लेख नही मिलता है। एक निश्चित रेखिक आकृति बनानें वाले २७ और अट्ठाइस तारा समुह को नक्षत्र कहते थे, जो असमान भोगांश वाले, वास्तविक नक्षत्र थे, न कि, १३°२०' के निश्चित भोगांश वाले वर्तमान काल्पनिक नक्षत्र। राशियों का कोई उल्लेख नहीं मिलता। 
जब सूर्य ठीक भूमध्य रेखा पर आकर उत्तरी गोलार्ध में प्रवेश करता था, वसन्त विषुव दिवस से संवत्सर, उत्तरायण, वसन्त ऋतु और मधुमास आरम्भ होता था। उस दिन दिन रात बराबर होते हैं, उत्तरी ध्रुव पर सूर्योदय होता है, दक्षिण ध्रुव पर सूर्यास्त होता है।
सूर्य की उत्तर परम क्रान्ति जब सूर्य ठीक कर्क रेखा पर होता था, जब सबसे बड़े दिन और  सबसे छोटी रात होती है, उज्जैन में ठीक मध्याह्न में वृक्षों की छाँया सबसे छोटी होती है मनुष्य की छाँव उसके कदमों मे होती है, उस दिन उत्तर तोयन होता था।
जब सूर्य ठीक भूमध्य रेखा पर आकर दक्षिणी गोलार्ध में प्रवेश करता था, शरद विषुव दिवस से दक्षिणायन, शरद ऋतु और ईष मास आरम्भ होता था। उस दिन दिन रात बराबर होते हैं, दक्षिण ध्रुव पर सूर्योदय होता है, उत्तर ध्रुव पर सूर्यास्त होता है।
सूर्य की दक्षिण परम क्रान्ति जब सूर्य ठीक मकर रेखा पर होता था, जब सबसे छोटा दिन और सबसे बड़ी रात होती है, उस दिन दक्षिण तोयन होता था।
सूर्य की सायन संक्रान्तियों से मधु, माधव, शुक्र, शचि, नभः, नभस्य, ईष, उर्ज, सहस, सहस्य, तपः,और तपस्य मासारम्भ होते थे; जिसे व्यवहार में अगले सूर्योदय से प्रारम्भ मानते थे।  सायन सौर मास और असमान भोगांश वाले वास्तविक नक्षत्र में चन्द्रमा स्थित होनें पर, अथवा सायन सौर मास और प्रतिपदा, एकाष्टका, पूर्णिमा, अष्टका या पूर्णिमा को  व्रत, पर्व, उत्सव मनाये जाते थे।
तदनुसार दक्षिण भारत में बसने, मध्य भारत में जनसंख्या वृद्धि के कारण पौराणिकों नें सायन मकर संक्रांति से अर्थात उत्तरायण प्रारम्भ किया गया, अर्थात दक्षिण तोयन को उत्तरायण नाम देकर, उत्तरायण तीन माह पहले ही प्रारम्भ करने लगे, सायन मीन अर्थात तपस्य मास को मधुमास नाम देकर वसन्तादि ऋतुएँ एक माह पहले प्रारम्भ की गई। सायन सौर मासों के स्थान पर चान्द्रमासों को महत्व दिया गया। चैत्र वैशाख आदि अमान्त मास के स्थान पर पूर्णिमान्त मास लागु किया गया। व्रत, पर्व, उत्सव, त्योहार तिथियों से मनानें लगे। ता कि, मध्यभारत और दक्षिण भारत में वैदिक उत्तरायण में होने वाले वर्षाकाल में मुहुर्त टाले जा सके। और वर्षा के पहले और बाद में विवाह आदि होने लगे।
इस प्रकार वर्तमान मुहुर्तशास्त्र का जन्म हुआ, जिनमें वैदिक परम्परा का पूर्ण लोप कर दिया गया।
ऐसे ही मात्र चन्द्रमा के नक्षत्र के आधार पर गुण मिलान कहाँ तक उचित है उसका आधार क्या है कोई नहीं जानता। बस मिलाना है, लोगों की श्रद्धा है इसलिए बतलाना पड़ता है।
बारह भाव (खानों) में से पाँच भाव (लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम, द्वादश भाव) में मंगल हो तो कुण्डली मांगलिक कहलाती है। यह दोष वर की कुण्डली में हो तो वधु के जीवन पर संकट होना माना जाता है और वधु की कुण्डली में हो तो वर के  जीवन को संकट होता है ऐसा कहा जाता है। क्योंकि इन भावों में बैठा मंगल या तो जीवनसाथी के भाव यानी सप्तम भाव या परिवार के भाव (द्वितीय भाव) पर दृष्टि डालता है या सप्तम भाव में ही स्थित होता है।
इस दोष का परिहार (दोष हरण) यह है कि, वर की कुण्डली में मांगलिक दोष हो तो वधु भी ऐसी ही ढूंढो जिसकी कुण्डली में मांगलिक दोष हो। या वधू की कुण्डली में मांगलिक दोष हो तो वर ऐसा ढूंढो जिसकी कुण्डली में मांगलिक दोष हो। यदि इन (1,4,7,8,12) भावों में मंगल न हो तो शनि हो, या सूर्य या राहु-केतु में से कोई एक तो हो ही।
साधारण ज्योतिषी यह नहीं जानते कि मंगल यदि मेष (स्वग्रही), कर्क (नीच), वृश्चिक (स्वग्रही) या मकर (उच्च) राशि में स्थित हो तो भी कुण्डली का मांगलिक दोष हरण हो जाता है। ऐसे ही सामने वाले (वर/वधु) की कुण्डली में तृतीय, षष्ट या एकादश स्थान पर भी मंगल हो, शनि हो, या सूर्य या राहु-केतु में से कोई एक हो तो भी सामने वाले (वर/वधु) की कुण्डली के मांगलिक दोष का परिहार (परिहरण) हो जाता है।
इतने में से कुछ न कुछ तो मिल ही जाता है। न मिले तो सामने वाले की कुण्डली में चन्द्रमा से इन्ही भावों में मंगल शनि आदि कोई ग्रह होगा तो भी चलेगा। कुछ तो सूर्य से भी इन भावों में मंगल हो तो परिहार मान लेते हैं।
ये कुछ भी न मिले तो वधु की अधिक अवस्था (पच्चीस से अधिक) होगई तो भी चलेगा। और फिर पण्डित जी पूजा करवा कर मंगल को शान्त (चूप) कर ही देंगे।
हर सत्ताइस दिन में से औसत 24 घण्टा 17 मिनट 9.317 सेकण्ड तक चन्द्रमा एक नक्षत्र पर रहता है।
यह भी वास्तविक वैदिक नक्षत्र नहीं है। वैदिक नक्षत्र के भोगांश अलग-अलग होते हैं, एक समान नहीं फिर भी यदि एक अकेले चन्द्रमा के नक्षत्र में स्थिति और उक्त मांगलिक दोष के आधार पर ही वैवाहिक जीवन जाँचा जा सकता है तो कुण्डली बनवाना व्यर्थ है।
जन्म समय में चन्द्रमा जिस राशि में हो उससे बारहवीं राशि, उसी राशि और दूसरी राशि में शनि का भ्रमण चल रहा हो तो साढ़ेसाती कहलाती है। अर्थात साढ़ेसात वर्ष तक समय अशुभ ही रहेगा। समुद्र में बहकर किसी टापू पर रहने वाले, सुरंग में दब जाने वाले, कैंसर जैसे रोग और कोमा में पड़े लोगों को छोड़ दो तो मैंने तो किसी के जीवन में लगातार साढ़े सात वर्ष भी ऐसा कोई संकट नहीं देखा। अधिकांश को तो साढ़े सात घण्टे का भी लगातार कोई कष्ट नहीं होता है।
इसी प्रकार जन्म समय में चन्द्रमा जिस राशि में हो उससे चतुर्थ या अष्टम् राशि में शनि का भ्रमण चल रहा हो तो ढय्या कहलाती है। अर्थात ढाई वर्ष तक समय अशुभ ही रहेगा। 
मतलब केवल चन्द्रमा हर सत्ताइस दिन में से लगभग सवा दो दिन एक राशि में रहता है उस अवधि में जन्मे  सबका ही समय एक समान बीतेगा। हर चौबीस घंटे में लगभग डेढ़ घण्टा से ढाई घण्टे के बीच एक ही लग्न में जन्मे लोगों का ग्रहों का भ्रमण (गोचर) समान ही होगा। उनका भी समय एक सा नहीं होता तो सवा दो दिन में जन्मे लोगों का समय एक समान कैसे हो सकता है?

मुहूर्त में ही काम करना हो तो बहुत पहले से प्लान करना पड़ती है।
विवाह में लड़की के गुरु ब्रहस्पति शुभ अशुभ पूरे साल तक रहते हैं इसलिए दो-तीन साल पहले से विचार करना चाहिए।
मुण्डन संस्कार का विचार भी जन्म के बाद ही कर लेना चाहिए, उपनयन (जनेऊ) संस्कार के विचार भी जन्म के तीन- चार वर्ष बाद ही कर लेना चाहिए। गृहारम्भ का विचार सालभर पहले और गृह प्रवेश का विचार गृहारंभ के बाद ही कर लेना चाहिए।
वाहध कृय, दुकान खोलने आदि के विचार लगभग चार-छः महिने पहले ही करना चाहिए।

शुक्रवार, 9 जून 2023

यात्रा मुहुर्त में विशेष योगिनी, दिशाशूल, कालराहु और चन्द्रमा का विचार

योगिनी तिथि से चलती है।

योगिनी सुखदा वामे, 
पृष्ठे वाञ्छित दायिनी;
दक्षिणे धन हन्त्रीच, सम्मुखेमरणप्रदा।

प्रतिपदा और नवमी को पूर्व में योगिनी रहती है अतः पूर्व और दक्षिण और आग्नेय (दक्षिण पूर्व) की यात्रा न करें।
उत्तर की यात्रा सुखद और पश्चिम की यात्रा वाञ्छित दायिनी रहेगी।
ऐसे ही आगे भी समझें ---
तृतीया एकादशी को आग्नेय कोण (दक्षिण पूर्व) में योगिनी होती है। अतः आग्नेय और नैऋत्य (दक्षिण पश्चिम) तथा दक्षिण में यात्रा न करें।
ईशान की यात्रा सुखद और वायव्य की यात्रा वाञ्छित दायिनी रहेगी।

पञ्चमी और त्रयोदशी को दक्षिण में योगिनी होती है। अतः दक्षिण, पश्चिम और नैऋत्य (दक्षिण पश्चिम) में यात्रा वर्जित है।
पूर्व की यात्रा सुखद और उत्तर की यात्रा वाञ्छित दायिनी रहेगी।

चतुर्थी एवम् द्वादशी को नैऋत्य में योगिनी होती है। अतः नैऋत्य, वायव्य (उत्तर पश्चिम) तथा दक्षिण में यात्रा न करें।
आग्नेय की यात्रा सुखद और ईशान की यात्रा वाञ्छित दायिनी रहेगी।

षष्ठी और चतुर्दशी को पश्चिम में योगिनी होती है। अतः पश्चिम, उत्तर और वायव्य (उत्तर पश्चिम) में यात्रा वर्जित है।
दक्षिण की यात्रा सुखद और पूर्व की यात्रा वाञ्छित दायिनी रहेगी।

सप्तमी और पूर्णिमा को वायव्य कोण में योगिनी होती है। अतः वायव्य, ईशान (उत्तर पूर्व) और उत्तर में यात्रा न करें।
नैऋत्य की यात्रा सुखद और आग्नेय की यात्रा वाञ्छित दायिनी रहेगी।

द्वितीया और दशमी तिथि को उत्तर में योगिनी होती है। अतः उत्तर, पूर्व और ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) दिशा में यात्रा वर्जित है।
पश्चिम की यात्रा सुखद और दक्षिण की यात्रा वाञ्छित दायिनी रहेगी।

अष्टमी और अमावस्या को ईशान कोण में योगिनी होती है। अतः ईशान कोण (उत्तर- पूर्व), आग्नेय कोण (दक्षिण पूर्व) और पूर्व दिशा में यात्रा की यात्रा वर्जित है।
वायव्य की यात्रा सुखद और नैऋत्य की यात्रा वाञ्छित दायिनी रहेगी।

दिशाशूल वार से चलते हैं।

दिशा"शूल वामगतम् कृत्वा,"
पृष्ठदा योगिनी यदा, चन्द्रश्चाभिमुखम्गच्छेत्, नरः सर्वार्थम् भागभवेत्।
ध्यान रखें वार सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है। सूर्योदय से ही प्रारम्भ होता है और सूर्योदय से ही बदलता है। रात बारह बजे Day & Date (डे और डेट) ही बदलते हैं।
तिथि, नक्षत्र और चन्द्रमा की राशि का प्रारम्भ और समाप्ति का समय लाहिरी अयनांश या चित्रा पक्षीय अयनांश वाली दृगतुल्य पञ्चाङ्ग से ही देखें।
सोमवार एवम् शनिवार को पूर्व दिशा में दिशा शूल रहता है अतः सोमवार एवम् शनिवार को पूर्व दिशा की यात्रा वर्जित है। और दक्षिण की यात्रा शुभद रहती है।
ऐसे ही आगे भी समझें--
गुरुवार को दक्षिण में दिशा शूल और पूर्व में शुभ।
रविवार और शुक्रवार को पश्चिम में दिशा शूल और दक्षिण में शुभ।
मंगलवार और बुधवार को उत्तर में दिशाशूल और पश्चिम में शुभ।

काल राहु-- 
काल राहु भी वार से चलते हैं।

काल राहु यात्रायाम् अग्रे पृष्ठे च वर्ज्यः।

शनिवार को पूर्व में कालराहु होता है अतः पूर्व और पश्चिम की यात्रा निषेध।
शुक्रवार को आग्नेय (दक्षिण - पूर्व) में कालराहु होता है अतः आग्नेय (दक्षिण - पूर्व) और वायव्य (उत्तर - पश्चिम) में यात्रा वर्जित है।
गुरुवार को दक्षिण में कालराहु होता है दक्षिण और उत्तर में यात्रा वर्जित है।
बुधवार को नैऋत्य (दक्षिण - पश्चिम) में कालराहु होता है अतः नैऋत्य (दक्षिण - पश्चिम) और ईशान (उत्तर - पूर्व) में यात्रा वर्जित है।
मंगलवार को पश्चिम में कालराहु होता है अतः पश्चिम और पूर्व में यात्रा वर्जित है।
सोमवार को वायव्य (उत्तर पश्चिम) में कालराहु होता है अतः वायव्य (उत्तर - पश्चिम) और नैऋत्य (दक्षिण - पश्चिम) की यात्रा वर्जित है।
रविवार को उत्तर में कालराहु होता है अतः उत्तर और दक्षिण की यात्रा वर्जित है।
(सुचना - ईशान कोण (उत्तर - पूर्व) में कालराहु नही होता है।)

चन्द्रमा -
चन्द्रमा का विचार चन्द्रमा के राशियों में भ्रमण पर आधारित है।

सम्मुखेचार्थ लाभाय, 
दक्षिणे सुख सम्पदा;
पृष्ठतः प्राण नाशाय, 
वामे चन्द्रे धन क्षयः।

आग्नेय राशियों मेष,सिंह और धनु के चन्द्रमा के समय चन्द्रमा पूर्व में रहता है। 
अतः पूर्व की यात्रा से अर्थलाभ और दक्षिण की यात्रा से सुख-सम्पदा प्राप्ति होती है।
पश्चिम की यात्रा प्राण नाशक और उत्तर की यात्रा में धनक्षय का भय रहता है।

पृथ्वी तत्वीय राशियों वृष, कन्या और मकर के चन्द्रमा के समय चन्द्रमा दक्षिण में रहता है। 
अतः दक्षिण की यात्रा से अर्थलाभ और पश्चिम की यात्रा से सुख-सम्पदा प्राप्ति होती है।
उत्तर की यात्रा प्राण नाशक और पूर्व की यात्रा में धनक्षय का भय रहता है।

वायव्य राशियों मिथुन, तुला और कुम्भ के चन्द्रमा के समय चन्द्रमा पश्चिम में रहता है। 
अतः पश्चिम की यात्रा से अर्थलाभ और उत्तर की यात्रा से सुख-सम्पदा प्राप्ति होती है।
पूर्व की यात्रा प्राण नाशक और दक्षिण की यात्रा में धनक्षय का भय रहता है।

जलीय राशियों कर्क, वृश्चिक और मीन के चन्द्रमा के समय चन्द्रमा उत्तर में रहता है। 
अतः उत्तर  की यात्रा से अर्थलाभ और पूर्व की यात्रा से सुख-सम्पदा प्राप्ति होती है।
दक्षिण की यात्रा प्राण नाशक और पश्चिम की यात्रा में धनक्षय का भय रहता है।