रविवार, 11 जून 2023

वास्तु और मुहूर्त।

वास्तुशास्त्र में ७० % भाग भूमि चयन का और ३०% भाग भवन निर्माण का होता है।
वास्तुशास्त्र और मुहुर्त उचित अनुचित दर्शाते हैं शुभ-अशुभ नही।
एक अच्छा आर्किटेक्ट सच्चा वास्तुशास्त्री होता है और एक अच्छा वास्तुविद ही अच्छा आर्किटेक्ट हो सकता है।
यदि भूखण्ड के उत्तर पूर्व में ढाल है, खुला है तो दक्षिण पश्चिम स्वतः उँचा होगा। परिणाम स्वरूप भूखण्ड और फर्श पर सदैव प्रातः काल की धूप मिलेगी। और सायंकाल की धुप से फर्श गर्म नही होगा।
यदि वायव्य कोण (उत्तर पश्चिम) खुला है और आग्नेय कोण (दक्षिण पूर्व) में हवनकुण्ड, रसोई आदि है तो, गर्मी और धुँआ बाहर निकल जाएगा; न घर गर्म होगा न घर में धुँआ भरेगा। यही वास्तुशास्त्र/ आर्किटेक्चर है।
वास्तुशास्त्र के अनुसार घर की छत उँची होनी चाहिए, मध्म भाग में खुला चौक होना चाहिए, जिसके चारों ओर कमरे हों जिसके दर्वाजे चौक में खुलना चाहिए। बाहर की ओर चारों ओर गलियारे हो, और खिड़कियाँ गलियारों में खुलना चाहिए ताकि, वायु का सहज आवागमन बना रहे और घर की गरम हवा उजालदान (वेण्टिलेटर) से निकल सके। पंखे से भी हवा ठण्डी मिले। ए.सी. की आवश्यकता ही न पड़े।
सम्भव हो तो मुख्यद्वार के अलावा पार्श्व में भी एक द्वार होना चाहिए, मतलब कॉलोनी ऐसे डिज़ाइन हो कि, प्रत्येक मकान कार्नर वाला हो। मूख्य सड़क घर के पूर्व में हो अर्थात मुख्य द्वार पूर्व में हो और  तथा छोटी सड़क उत्तर या दक्षिण में हो। उत्तर वाली सड़क के मकान को ईशान कोण खुला मिलेगा तथा दक्षिण में छोटी सड़क वाले मकान को ठण्ड में भी घर में धूप मिलेगी। पश्चिम में पिछवाड़ा होना अच्छा रहता है। जहाँ दिनभर धूप रहने से गन्दगी और सीलन नही रहती। 
ऐसे तार्किक और वैज्ञानिक आधार वाले वास्तुशास्त्र को अल्पज्ञों नें शुभाशुभ से जोड़ कर ढकोसला बना दिया।

ऐसे ही मुहुर्त किसी कार्य के लिए अनुकूल और उचित समय को कहते हैं न कि, शुभ समय को।
किसी कार्य विशेष के लिए उचित अनुचित काल दर्शक मुहुर्त शास्त्र कहलाता है। न कि, शुभाशुभ काल दर्शक।
वर्षा ऋतु में समारोह करना दुष्कर कार्य है, अतः वर्षा ऋतु में विवाह आदि निषिद्ध हैं, यह मुहुर्त है। 
वैदिक काल में अमावस्या का दुसरा दिन अर्थात प्रतिपदा, एकाष्टका अर्थात शुक्ल पक्ष की अष्टमी, पूर्णिमा,अमावस्या, अर्धचन्द्र दिवस अष्टका अर्थात कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथियों का ही उल्लेख मिलता है। दस दिनों का दशाह शब्द अवष्य मिलता है; लेकिन, वारों का उल्लेख नही मिलता है। एक निश्चित रेखिक आकृति बनानें वाले २७ और अट्ठाइस तारा समुह को नक्षत्र कहते थे, जो असमान भोगांश वाले, वास्तविक नक्षत्र थे, न कि, १३°२०' के निश्चित भोगांश वाले वर्तमान काल्पनिक नक्षत्र। राशियों का कोई उल्लेख नहीं मिलता। 
जब सूर्य ठीक भूमध्य रेखा पर आकर उत्तरी गोलार्ध में प्रवेश करता था, वसन्त विषुव दिवस से संवत्सर, उत्तरायण, वसन्त ऋतु और मधुमास आरम्भ होता था। उस दिन दिन रात बराबर होते हैं, उत्तरी ध्रुव पर सूर्योदय होता है, दक्षिण ध्रुव पर सूर्यास्त होता है।
सूर्य की उत्तर परम क्रान्ति जब सूर्य ठीक कर्क रेखा पर होता था, जब सबसे बड़े दिन और  सबसे छोटी रात होती है, उज्जैन में ठीक मध्याह्न में वृक्षों की छाँया सबसे छोटी होती है मनुष्य की छाँव उसके कदमों मे होती है, उस दिन उत्तर तोयन होता था।
जब सूर्य ठीक भूमध्य रेखा पर आकर दक्षिणी गोलार्ध में प्रवेश करता था, शरद विषुव दिवस से दक्षिणायन, शरद ऋतु और ईष मास आरम्भ होता था। उस दिन दिन रात बराबर होते हैं, दक्षिण ध्रुव पर सूर्योदय होता है, उत्तर ध्रुव पर सूर्यास्त होता है।
सूर्य की दक्षिण परम क्रान्ति जब सूर्य ठीक मकर रेखा पर होता था, जब सबसे छोटा दिन और सबसे बड़ी रात होती है, उस दिन दक्षिण तोयन होता था।
सूर्य की सायन संक्रान्तियों से मधु, माधव, शुक्र, शचि, नभः, नभस्य, ईष, उर्ज, सहस, सहस्य, तपः,और तपस्य मासारम्भ होते थे; जिसे व्यवहार में अगले सूर्योदय से प्रारम्भ मानते थे।  सायन सौर मास और असमान भोगांश वाले वास्तविक नक्षत्र में चन्द्रमा स्थित होनें पर, अथवा सायन सौर मास और प्रतिपदा, एकाष्टका, पूर्णिमा, अष्टका या पूर्णिमा को  व्रत, पर्व, उत्सव मनाये जाते थे।
तदनुसार दक्षिण भारत में बसने, मध्य भारत में जनसंख्या वृद्धि के कारण पौराणिकों नें सायन मकर संक्रांति से अर्थात उत्तरायण प्रारम्भ किया गया, अर्थात दक्षिण तोयन को उत्तरायण नाम देकर, उत्तरायण तीन माह पहले ही प्रारम्भ करने लगे, सायन मीन अर्थात तपस्य मास को मधुमास नाम देकर वसन्तादि ऋतुएँ एक माह पहले प्रारम्भ की गई। सायन सौर मासों के स्थान पर चान्द्रमासों को महत्व दिया गया। चैत्र वैशाख आदि अमान्त मास के स्थान पर पूर्णिमान्त मास लागु किया गया। व्रत, पर्व, उत्सव, त्योहार तिथियों से मनानें लगे। ता कि, मध्यभारत और दक्षिण भारत में वैदिक उत्तरायण में होने वाले वर्षाकाल में मुहुर्त टाले जा सके। और वर्षा के पहले और बाद में विवाह आदि होने लगे।
इस प्रकार वर्तमान मुहुर्तशास्त्र का जन्म हुआ, जिनमें वैदिक परम्परा का पूर्ण लोप कर दिया गया।
ऐसे ही मात्र चन्द्रमा के नक्षत्र के आधार पर गुण मिलान कहाँ तक उचित है उसका आधार क्या है कोई नहीं जानता। बस मिलाना है, लोगों की श्रद्धा है इसलिए बतलाना पड़ता है।
बारह भाव (खानों) में से पाँच भाव (लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम, द्वादश भाव) में मंगल हो तो कुण्डली मांगलिक कहलाती है। यह दोष वर की कुण्डली में हो तो वधु के जीवन पर संकट होना माना जाता है और वधु की कुण्डली में हो तो वर के  जीवन को संकट होता है ऐसा कहा जाता है। क्योंकि इन भावों में बैठा मंगल या तो जीवनसाथी के भाव यानी सप्तम भाव या परिवार के भाव (द्वितीय भाव) पर दृष्टि डालता है या सप्तम भाव में ही स्थित होता है।
इस दोष का परिहार (दोष हरण) यह है कि, वर की कुण्डली में मांगलिक दोष हो तो वधु भी ऐसी ही ढूंढो जिसकी कुण्डली में मांगलिक दोष हो। या वधू की कुण्डली में मांगलिक दोष हो तो वर ऐसा ढूंढो जिसकी कुण्डली में मांगलिक दोष हो। यदि इन (1,4,7,8,12) भावों में मंगल न हो तो शनि हो, या सूर्य या राहु-केतु में से कोई एक तो हो ही।
साधारण ज्योतिषी यह नहीं जानते कि मंगल यदि मेष (स्वग्रही), कर्क (नीच), वृश्चिक (स्वग्रही) या मकर (उच्च) राशि में स्थित हो तो भी कुण्डली का मांगलिक दोष हरण हो जाता है। ऐसे ही सामने वाले (वर/वधु) की कुण्डली में तृतीय, षष्ट या एकादश स्थान पर भी मंगल हो, शनि हो, या सूर्य या राहु-केतु में से कोई एक हो तो भी सामने वाले (वर/वधु) की कुण्डली के मांगलिक दोष का परिहार (परिहरण) हो जाता है।
इतने में से कुछ न कुछ तो मिल ही जाता है। न मिले तो सामने वाले की कुण्डली में चन्द्रमा से इन्ही भावों में मंगल शनि आदि कोई ग्रह होगा तो भी चलेगा। कुछ तो सूर्य से भी इन भावों में मंगल हो तो परिहार मान लेते हैं।
ये कुछ भी न मिले तो वधु की अधिक अवस्था (पच्चीस से अधिक) होगई तो भी चलेगा। और फिर पण्डित जी पूजा करवा कर मंगल को शान्त (चूप) कर ही देंगे।
हर सत्ताइस दिन में से औसत 24 घण्टा 17 मिनट 9.317 सेकण्ड तक चन्द्रमा एक नक्षत्र पर रहता है।
यह भी वास्तविक वैदिक नक्षत्र नहीं है। वैदिक नक्षत्र के भोगांश अलग-अलग होते हैं, एक समान नहीं फिर भी यदि एक अकेले चन्द्रमा के नक्षत्र में स्थिति और उक्त मांगलिक दोष के आधार पर ही वैवाहिक जीवन जाँचा जा सकता है तो कुण्डली बनवाना व्यर्थ है।
जन्म समय में चन्द्रमा जिस राशि में हो उससे बारहवीं राशि, उसी राशि और दूसरी राशि में शनि का भ्रमण चल रहा हो तो साढ़ेसाती कहलाती है। अर्थात साढ़ेसात वर्ष तक समय अशुभ ही रहेगा। समुद्र में बहकर किसी टापू पर रहने वाले, सुरंग में दब जाने वाले, कैंसर जैसे रोग और कोमा में पड़े लोगों को छोड़ दो तो मैंने तो किसी के जीवन में लगातार साढ़े सात वर्ष भी ऐसा कोई संकट नहीं देखा। अधिकांश को तो साढ़े सात घण्टे का भी लगातार कोई कष्ट नहीं होता है।
इसी प्रकार जन्म समय में चन्द्रमा जिस राशि में हो उससे चतुर्थ या अष्टम् राशि में शनि का भ्रमण चल रहा हो तो ढय्या कहलाती है। अर्थात ढाई वर्ष तक समय अशुभ ही रहेगा। 
मतलब केवल चन्द्रमा हर सत्ताइस दिन में से लगभग सवा दो दिन एक राशि में रहता है उस अवधि में जन्मे  सबका ही समय एक समान बीतेगा। हर चौबीस घंटे में लगभग डेढ़ घण्टा से ढाई घण्टे के बीच एक ही लग्न में जन्मे लोगों का ग्रहों का भ्रमण (गोचर) समान ही होगा। उनका भी समय एक सा नहीं होता तो सवा दो दिन में जन्मे लोगों का समय एक समान कैसे हो सकता है?

मुहूर्त में ही काम करना हो तो बहुत पहले से प्लान करना पड़ती है।
विवाह में लड़की के गुरु ब्रहस्पति शुभ अशुभ पूरे साल तक रहते हैं इसलिए दो-तीन साल पहले से विचार करना चाहिए।
मुण्डन संस्कार का विचार भी जन्म के बाद ही कर लेना चाहिए, उपनयन (जनेऊ) संस्कार के विचार भी जन्म के तीन- चार वर्ष बाद ही कर लेना चाहिए। गृहारम्भ का विचार सालभर पहले और गृह प्रवेश का विचार गृहारंभ के बाद ही कर लेना चाहिए।
वाहध कृय, दुकान खोलने आदि के विचार लगभग चार-छः महिने पहले ही करना चाहिए।

शुक्रवार, 9 जून 2023

यात्रा मुहुर्त में विशेष योगिनी, दिशाशूल, कालराहु और चन्द्रमा का विचार

योगिनी तिथि से चलती है।

योगिनी सुखदा वामे, 
पृष्ठे वाञ्छित दायिनी;
दक्षिणे धन हन्त्रीच, सम्मुखेमरणप्रदा।

प्रतिपदा और नवमी को पूर्व में योगिनी रहती है अतः पूर्व और दक्षिण और आग्नेय (दक्षिण पूर्व) की यात्रा न करें।
उत्तर की यात्रा सुखद और पश्चिम की यात्रा वाञ्छित दायिनी रहेगी।
ऐसे ही आगे भी समझें ---
तृतीया एकादशी को आग्नेय कोण (दक्षिण पूर्व) में योगिनी होती है। अतः आग्नेय और नैऋत्य (दक्षिण पश्चिम) तथा दक्षिण में यात्रा न करें।
ईशान की यात्रा सुखद और वायव्य की यात्रा वाञ्छित दायिनी रहेगी।

पञ्चमी और त्रयोदशी को दक्षिण में योगिनी होती है। अतः दक्षिण, पश्चिम और नैऋत्य (दक्षिण पश्चिम) में यात्रा वर्जित है।
पूर्व की यात्रा सुखद और उत्तर की यात्रा वाञ्छित दायिनी रहेगी।

चतुर्थी एवम् द्वादशी को नैऋत्य में योगिनी होती है। अतः नैऋत्य, वायव्य (उत्तर पश्चिम) तथा दक्षिण में यात्रा न करें।
आग्नेय की यात्रा सुखद और ईशान की यात्रा वाञ्छित दायिनी रहेगी।

षष्ठी और चतुर्दशी को पश्चिम में योगिनी होती है। अतः पश्चिम, उत्तर और वायव्य (उत्तर पश्चिम) में यात्रा वर्जित है।
दक्षिण की यात्रा सुखद और पूर्व की यात्रा वाञ्छित दायिनी रहेगी।

सप्तमी और पूर्णिमा को वायव्य कोण में योगिनी होती है। अतः वायव्य, ईशान (उत्तर पूर्व) और उत्तर में यात्रा न करें।
नैऋत्य की यात्रा सुखद और आग्नेय की यात्रा वाञ्छित दायिनी रहेगी।

द्वितीया और दशमी तिथि को उत्तर में योगिनी होती है। अतः उत्तर, पूर्व और ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) दिशा में यात्रा वर्जित है।
पश्चिम की यात्रा सुखद और दक्षिण की यात्रा वाञ्छित दायिनी रहेगी।

अष्टमी और अमावस्या को ईशान कोण में योगिनी होती है। अतः ईशान कोण (उत्तर- पूर्व), आग्नेय कोण (दक्षिण पूर्व) और पूर्व दिशा में यात्रा की यात्रा वर्जित है।
वायव्य की यात्रा सुखद और नैऋत्य की यात्रा वाञ्छित दायिनी रहेगी।

दिशाशूल वार से चलते हैं।

दिशा"शूल वामगतम् कृत्वा,"
पृष्ठदा योगिनी यदा, चन्द्रश्चाभिमुखम्गच्छेत्, नरः सर्वार्थम् भागभवेत्।
ध्यान रखें वार सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है। सूर्योदय से ही प्रारम्भ होता है और सूर्योदय से ही बदलता है। रात बारह बजे Day & Date (डे और डेट) ही बदलते हैं।
तिथि, नक्षत्र और चन्द्रमा की राशि का प्रारम्भ और समाप्ति का समय लाहिरी अयनांश या चित्रा पक्षीय अयनांश वाली दृगतुल्य पञ्चाङ्ग से ही देखें।
सोमवार एवम् शनिवार को पूर्व दिशा में दिशा शूल रहता है अतः सोमवार एवम् शनिवार को पूर्व दिशा की यात्रा वर्जित है। और दक्षिण की यात्रा शुभद रहती है।
ऐसे ही आगे भी समझें--
गुरुवार को दक्षिण में दिशा शूल और पूर्व में शुभ।
रविवार और शुक्रवार को पश्चिम में दिशा शूल और दक्षिण में शुभ।
मंगलवार और बुधवार को उत्तर में दिशाशूल और पश्चिम में शुभ।

काल राहु-- 
काल राहु भी वार से चलते हैं।

काल राहु यात्रायाम् अग्रे पृष्ठे च वर्ज्यः।

शनिवार को पूर्व में कालराहु होता है अतः पूर्व और पश्चिम की यात्रा निषेध।
शुक्रवार को आग्नेय (दक्षिण - पूर्व) में कालराहु होता है अतः आग्नेय (दक्षिण - पूर्व) और वायव्य (उत्तर - पश्चिम) में यात्रा वर्जित है।
गुरुवार को दक्षिण में कालराहु होता है दक्षिण और उत्तर में यात्रा वर्जित है।
बुधवार को नैऋत्य (दक्षिण - पश्चिम) में कालराहु होता है अतः नैऋत्य (दक्षिण - पश्चिम) और ईशान (उत्तर - पूर्व) में यात्रा वर्जित है।
मंगलवार को पश्चिम में कालराहु होता है अतः पश्चिम और पूर्व में यात्रा वर्जित है।
सोमवार को वायव्य (उत्तर पश्चिम) में कालराहु होता है अतः वायव्य (उत्तर - पश्चिम) और नैऋत्य (दक्षिण - पश्चिम) की यात्रा वर्जित है।
रविवार को उत्तर में कालराहु होता है अतः उत्तर और दक्षिण की यात्रा वर्जित है।
(सुचना - ईशान कोण (उत्तर - पूर्व) में कालराहु नही होता है।)

चन्द्रमा -
चन्द्रमा का विचार चन्द्रमा के राशियों में भ्रमण पर आधारित है।

सम्मुखेचार्थ लाभाय, 
दक्षिणे सुख सम्पदा;
पृष्ठतः प्राण नाशाय, 
वामे चन्द्रे धन क्षयः।

आग्नेय राशियों मेष,सिंह और धनु के चन्द्रमा के समय चन्द्रमा पूर्व में रहता है। 
अतः पूर्व की यात्रा से अर्थलाभ और दक्षिण की यात्रा से सुख-सम्पदा प्राप्ति होती है।
पश्चिम की यात्रा प्राण नाशक और उत्तर की यात्रा में धनक्षय का भय रहता है।

पृथ्वी तत्वीय राशियों वृष, कन्या और मकर के चन्द्रमा के समय चन्द्रमा दक्षिण में रहता है। 
अतः दक्षिण की यात्रा से अर्थलाभ और पश्चिम की यात्रा से सुख-सम्पदा प्राप्ति होती है।
उत्तर की यात्रा प्राण नाशक और पूर्व की यात्रा में धनक्षय का भय रहता है।

वायव्य राशियों मिथुन, तुला और कुम्भ के चन्द्रमा के समय चन्द्रमा पश्चिम में रहता है। 
अतः पश्चिम की यात्रा से अर्थलाभ और उत्तर की यात्रा से सुख-सम्पदा प्राप्ति होती है।
पूर्व की यात्रा प्राण नाशक और दक्षिण की यात्रा में धनक्षय का भय रहता है।

जलीय राशियों कर्क, वृश्चिक और मीन के चन्द्रमा के समय चन्द्रमा उत्तर में रहता है। 
अतः उत्तर  की यात्रा से अर्थलाभ और पूर्व की यात्रा से सुख-सम्पदा प्राप्ति होती है।
दक्षिण की यात्रा प्राण नाशक और पश्चिम की यात्रा में धनक्षय का भय रहता है।

गुरुवार, 8 जून 2023

बौद्ध मत

महायान सम्प्रदाय ---
प्रथम संगीति ईसापूर्व ४४३ से ४४२ ईसापूर्व में मगधसम्राट अजातशत्रु ने महाकाश्यप की अध्यक्षता में आयोजित की थी। 
प्रथम बौद्ध संगीति में-
१ सुत्त पिटक का संकलन आनंद ने किया।
 २ विनय पिटक का संकलन उपाली ने किया।
महायान सम्प्रदाय के माध्यमिक/ शुन्यवादी और योगाचार/ विज्ञानवादी दोनों महायान सम्प्रदाय के अन्तर्गत आते हैं। ये चीन जापान और कोरिया में पाये जाते हैं।

१ *माध्यमिक मत* के अनुसार विज्ञान भी सत्य नहीं है। सब कुछ शून्य है। शून्य का अर्थ निरस्वभाव, नि:स्वरूप अथवा अनिर्वचनीय है। *शून्यवाद* का यह शुन्यवाद के शून्य वेदांत के ब्रह्म के बहुत निकट आ जाता है। शुन्यवाद के  प्रवर्तक नागार्जुन २०० ईस्वी।  माध्यमिक सुत्त पिटक और विनय पिटक को ही आधार मानते हैं।

२ *योगाचार* मत के अनुसार बाह्य पदार्थों की सत्ता नहीं। हमे जो कुछ दिखाई देता है वह विज्ञान मात्र है। योगाचार मत विज्ञानवाद कहलाता है। प्रवर्तक मैत्रेय (३०० ईस्वी) हैं  और विकास - असङ्ग और वसुबन्धु  ने किया। योगाचारी/ विज्ञानवादी भी सुत्त पिटक और विनय पिटक को ही आधार मानते हैं।


हीनयान सम्प्रदाय - या थेरवाद --
अशोक के शासनकाल में पाटलिपुत्र में आयोजित तीसरी बौद्ध संगीति में २४९ ईसापूर्व में मोगलीपुत्त तिस्सा ने अभिधम्म पिटक की रचना की थी। इनके अनुयाई थेरवादी कहलाते है। ये ब्रह्मदेश/ म्यांमार और श्रीलंका में पाये जाते हैं। नव बौद्ध भी थेरवादी हैं।

३ *वैभाषिक* मत बाह्य वस्तुओं की सत्ता तथा स्वलक्षणों के रूप में उनका प्रत्यक्ष मानता है। अत: उसे बाह्य *प्रत्यक्षवाद* अथवा " *सर्वास्तित्ववाद* " कहते हैं। वैभाषिक अभिधम्म पिटक को ही आधार मानते हैं।

४ *सैत्रांतिक* मत के अनुसार पदार्थों का प्रत्यक्ष नहीं, अनुमान होता है। अत: उसे *बाह्यानुमेयवाद* कहते हैं।सैत्रांतिक मत का विकास कुमारलात ने किया।सैत्रांतिक मत का प्रचार श्रीलंका में अधिक सेहै।
सैत्रांतिक अभिधम्म पिटक को ही आधार मानते हैं।

५ वज्रयान बौद्ध पन्थ के आचार्य बोधिसत्व मञ्जुश्री के उग्र अवतार भैरव माने जाते हैं। यह परम तान्त्रिक मत है। वज्रयानी बौद्ध तिब्बत में पाये जाते हैं।


दिन-रात के मुहुर्तों के नाम, अवधि और शुभाशुभ

*दिन-रात के मुहूर्तों के नाम, समयावधि और शुभाशुभ की जानकारी* --  
दिनांक २१ मार्च और २३ सितम्बर को भारतीय मध्याह्न रेखा पर स्थित स्थानों के लिए समयावधि (यथा विंध्यवासिनी मन्दिर मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश में।)

1 -- *रुद्र मुहूर्त*  सूर्योदय समय से (06:00 से 06:48 तक) । फल - अशुभ । 

2 -- *अही मुहूर्त* (सर्प) (06:48 से 07:36 तक)। फल - अशुभ । 

3 -- *मित्र मुहूर्त* (07:36 से 08:24 तक)। शुभ।

4-- *पितृ मुहूर्त* (08:24 से09:12 तक)। अशुभ।

5 -- *वसु मुहूर्त* (09:12 से 10:00 तक) । शुभ।
6 -- *वराह मुहूर्त* (10:00 से 10:48 तक)। शुभ

7 -- *विश्वेदेवा मुहूर्त* (10:48 से 11:36 तक) । शुभ।

8 -- *विधि मुहूर्त*  (11:36 से 12:24 तक)। सोमवार और शुक्रवार को छोड़कर शुभ । 

9 -- *सुतमुखी मुहूर्त* (12:24 से 13:12 तक ) शुभ। 
(सतमुखी का अर्थ - "बकरी / सारथी-चेहरा"।)

10 -- *पुरुहूत मुहूर्त* 13:12 से 14:00 तक)। अशुभ। 
(पुरुहूत का अर्थ "कई प्रसाद")

11 -- *वाहिनी मुहूर्त* ("रथ के कब्जे में") (14:00 से 14:48 तक)। अशुभ।   (तारा मण्डल -मिथुन?)

12 -- *नक्तनकरा मुहूर्त* ("नाइट मेकर") (14:48 से 15:36 तक)। अशुभ। योगतारा --"नाइट मेकर"।

13 -- *वरुण मुहूर्त* (15:36 से 16:24 तक)। शुभ। "ऑल-लिवेलपिंग नाइट स्काई" ।
14 -- *अर्यमन् मुहूर्त* ("बड़प्पन के कब्जे") । 16:24 से 17:12 तक)। रविवार को छोड़कर शुभ।

15 -- *भग मुहूर्त* (17:12 से 18:00 सूर्यास्त तक)। अशुभ।

16 -- *गिरीश मुहूर्त* (सूर्यास्त 18:00 से 18:48 तक)। शुभ।

17 -- *अजेकपाद मुहूर्त*  (18:48 से 19:36 तक)। अशुभ।

18 -- *अहिर्बुध्न्य मुहूर्त*  (19:36 से 20:24 तक)। शुभ।

19 -- *पुष्य मुहूर्त* (20:24 से 21:12 तक)। शुभ।

20 -- *अश्विनी मुहूर्त* (21:12 से 22:00 तक)। (अश्विनी)। शुभ।

21 -- *यम मुहूर्त* (22:00 से 22:48 तक) । अशुभ।

22 -- *अग्नि मुहूर्त* (22:48 से 23:36 तक)। शुभ।

23 -- *विधातृ मुहूर्त* (23:36 से 00:24 तक)। शुभ

24 -- *कन्द मुहूर्त*  (00:24 से 01:12 तक)। शुभ।
(कन्द का अर्थ"आभूषण" कोरोना बोरेलिस)

25 -- *अदिति मुहूर्त*  (01:12 से 02:00 तक) ।

26 -- *जीव मुहूर्त* (02:00  से 02:48 तक ) । 

27 -- *विष्णु मुहूर्त*  (02:48 से 03:36 तक)। Auspicious ।

28 -- *द्युमद्गद्युति मुहूर्त*  (03:36 से 04:24 तक) ।

29 -- *ब्रह्म मुहूर्त* (04:24 से 05:12 तक) ।

30 -- *समुद्र मुहुर्त*  (05:12 से 06:00 तक)।



 तैत्तिरीय-ब्राह्मण में 15 मुहूर्तों के नामों का उल्लेख इस प्रकार है:

संज्ञानम
विज्ञानम
प्रज्ञानम
जानद
अभिजानत
संकल्पमानम
प्रकल्पमानम
उपकल्पमानम
उपकप्तम
kptam
श्रेयो
वसीया
आयत
संभूतम
भूतम |
शतपथ ब्राह्मण एक मुहूर्त को एक दिन के 1/15वें भाग के रूप में वर्णित करता है:

मंगलवार, 6 जून 2023

गृहारम्भ मुहूर्त

ग्रहारम्भ मुहूर्त, नीव भरनें और प्रथम शिलान्यास का मुहूर्त ---

 *गृहारम्भ मुहूर्त* 
 *गृहारम्भ मुहूर्त अर्थात भूमि पूजन कर नीव खोदनें का मुहूर्त ---* 

शुभ मास --- सौर मास मेष के सुर्य में (चैत्र मास भी चलेगा), वैशाख मास, वृष के सुर्य में (ज्यैष्ठ मास भी चलेगा), कर्क के सुर्य में (आषाढ़ मास भी चलेगा), श्रावण मास, सिंह के सुर्य में (भाद्रपद मास भी चलेगा), तुला के सुर्य में (आश्विन मास भी चलेगा) कार्तिक मास, मार्गशीर्ष मास, पौष मास, माघ मास, और फाल्गुन मास में।इनके अतिरिक्त नारद के अनुसार ज्यैष्ठ, कार्तिक, और माघ मास भी शुभ कहा है।

शुभ तिथियाँ --(चन्द्र दर्शन के बाद) शुक्लपक्ष की द्वितीया, शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष दोनों पक्षों की तृतीया, पञ्चमी, (षष्टि), सप्तमी, [अष्टमी], दशमी, एकादशी, {द्वादशी}, तृयोदशी, एवम् शुक्ल पक्ष में पुर्णिमा तिथि में।

(गृहप्रवेश में निषिद्ध -- सुर्य गतांश --- सुर्य की राशि (सौर मास के) गतांश 0,3,12 और 21 अर्थात अग्नि बाण छोड़कर। मूलतः ये गृह प्रवेश में निषिद्ध है, लेकिन, आजकल ले ऑउट खीँचनें में लकड़ी की खूँटियाँ प्रयोग की जाती है। और  हत्थे वाले गेती-फावड़े की पूजा की जाती है। अतः अग्नि बाण का निषेध बतलाता गया है।) 


शुभ वार --- सोमवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार, और शनिवार में।
 शुभ नक्षत्र ---वृष वास्तुचक्र अनुसार,वेध रहित चन्द्रमा इन नक्षत्रों में ---
रोहिणी, मृगशिर्ष, पुष्य, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, अनुराधा, उत्तराषाढ़ा, धनिष्ठा,शतभिषा,उत्तराभाद्रपद, और रेवती नक्षत्र में।
भू शयन --- भू शयन यानी सुर्य नक्षत्र से गिन कर पाँचवा, सातवाँ,नौवाँ, बारहवाँ ,उन्नीसवाँ और 26 वाँ चन्द्र नक्षत्र छोड़ कर।

गुरु अस्त और शुक्र अस्त के तीन दिन आगे पीछे सहित गुरु अस्त और शुक्र अस्त अवधि छोड़कर।
व्यतिपात और वैधृतिपात योग छोड़कर, भद्रा (विष्टि करण) छोड़ कर।
(स्थिर लग्न में) अर्थात श्री वृष लग्न, सिंह लग्न, वृश्चिक लग्न (या फिर द्विस्वभाव लग्न में) यानी मिथुन लग्न, कन्या लग्न, धनु लग्न, और मीन लग्न में भूमिपुजन कर नीव खोदना आरम्भ करें।

 *नीव भरनें का मुहूर्त ---* 

नीव भरनें में और प्रथम बार शिलान्यास प्रकरण में ---

शुभ मास --- सौर मास मेष के सुर्य में (चैत्र मास भी चलेगा), वैशाख मास, वृष के सुर्य में (ज्यैष्ठ मास भी चलेगा), कर्क के सुर्य में (आषाढ़ मास भी चलेगा), श्रावण मास, सिंह के सुर्य में (भाद्रपद मास भी चलेगा), तुला के सुर्य में (आश्विन मास भी चलेगा) कार्तिक मास, मार्गशीर्ष मास, पौष मास, माघ मास, और फाल्गुन मास में।इनके अतिरिक्त नारद के अनुसार ज्यैष्ठ, कार्तिक, और माघ मास भी शुभ कहा है।

शुभ तिथियाँ --(चन्द्र दर्शन के बाद) शुक्लपक्ष की द्वितीया, शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष दोनों पक्षों की तृतीया, पञ्चमी, (षष्टि), सप्तमी, [अष्टमी], दशमी, एकादशी, {द्वादशी}, तृयोदशी, एवम् शुक्ल पक्ष में पुर्णिमा तिथि में।

सुर्य गतांश --- सुर्य की राशि (सौर मास के) गतांश 02°, 11°, 20°, 29° अर्थात वर्तमान अंश 03°, 12°, 21° और 30° अर्थात अग्नि बाण छोड़कर,
मंगलवार को पड़ने वाला पञ्चक, और धनिष्ठा नक्षत्र छोड़कर।
शुभ वार --- सोमवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार, और शनिवार में।

शुभ नक्षत्र ---वृष वास्तुचक्र अनुसार,वेध रहित चन्द्रमा इन नक्षत्रों में ---
रोहिणी, मृगशिर्ष, पुष्य, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, अनुराधा, उत्तराषाढ़ा, _धनिष्ठा_ ,शतभिषा, उत्तराभाद्रपद, और रेवती नक्षत्र में।
(धनिष्ठा नक्षत्र में अग्नि भय भी बतलाया जाता है।)
भू शयन --- भू शयन यानी सुर्य नक्षत्र से गिन कर पाँचवा, सातवाँ,नौवाँ, बारहवाँ ,उन्नीसवाँ और 26 वाँ चन्द्र नक्षत्र छोड़ कर।
 *केवल नीव भरनें के समय के शुभ नक्षत्र ---*
अश्विनी, भरणी, रोहिणी, मृगशिर्ष, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पुर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, अनुराधा,मूल, पुर्वाषाढ़ा,उत्तराषाढ़ा, श्रवण, पुर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद,और रेवती नक्षत्र में।
गुरु अस्त और शुक्र अस्त के तीन दिन आगे पीछे सहित गुरु अस्त और शुक्र अस्त अवधि छोड़कर।
व्यतिपात और वैधृतिपात योग छोड़कर, भद्रा (विष्टि करण) छोड़ कर।
(स्थिर लग्न में) अर्थात श्री वृष लग्न, सिंह लग्न, वृश्चिक लग्न (या फिर द्विस्वभाव लग्न में) यानी मिथुन लग्न, कन्या लग्न, धनु लग्न, और मीन लग्न में।
भूमिपुजन कर नीव खोद कर नीव भरना और शिलान्यास करें।

(मुहूर्त शास्त्र में वार अनुकूल न मिलने की स्थिति में अनुकूल वार का होरा में कार्य कर सकते हैं।)
(मुहूर्त शास्त्र में चौघड़िया का कोई महत्व नही है। कालराहू भी यात्रा और संस्कार प्रकरण में टाल देना उचित मानते हैं। पर आवश्यक नही है।)

मृत्यु बाण, अग्निबाण, राजबाण, चोरबाण,रोगबाण तथा पञ्चक की परिभाषा, प्रभाव और निवारण आदि

मृत्यु बाण सूर्य गतांश ०१°, १०°, १९°, २८° हो तो मृत्यु बाण होता है।
शनिवार को पड़ने वाला पञ्चक मृत्यु पञ्चक कहलाता है। 

अग्निबाण सूर्य गतांश ०२°, ११°, २०°, २९° हो तो अग्नि बाण होता है।
मंगलवार को पड़ने वाला पञ्चक अग्नि पञ्चक कहलाता है।
धनिष्ठा नक्षत्र में अग्नि का भय रहता है।

राजबाण/ नृपबाण सूर्य गतांश ०४°, १३°, २२° हो तो नृपबाण/ राज बाण होता है।
सोमवार को पड़ने वाला पञ्चक राज पञ्चक कहलाता है।

चोरबाण सूर्य गतांश ०६°, १५°, २४° हो तो चोर बाण होता है।
शुक्रवार को पड़ने वाला पञ्चक चोर पञ्चक कहलाता है।

रोगबाण सूर्य गतांश ०८°, १७°, २६° हो तो रोग बाण होता है।
रविवार को पड़ने वाला पञ्चक रोग पञ्चक कहलाता है।

 *मुहूर्त - चिंतामणि* के अनुसार ---
'अग्नि-चौरभयं रोगो राजपीडा धनक्षतिः।
संग्रहे तृण-काष्ठानां कृते वस्वादि-पञ्चके।।'-
 *अर्थात* :- पञ्चक में तिनकों और काष्ठों के संग्रह से अग्निभय, चोरभय, रोगभय, राजभय एवं धनहानि संभव है।

*पञ्चक के नक्षत्रों का प्रभाव* ---
1. धनिष्ठा नक्षत्र में अग्नि का भय रहता है।
2. शतभिषा नक्षत्र में कलह होने की संभावना रहती है।
3. पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में रोग बढ़ने की संभावना रहती है।
4. उतरा भाद्रपद में धन के रूप में दंड होता है।
5. रेवती नक्षत्र में धन हानि की संभावना रहती है।
 
१लकड़ी एकत्र करना या खरीदना, 
२ मकान पर छत डलवाना, 
३ शव जलाना, 
४ पलंग या चारपाई बनवाना और 
५ दक्षिण दिशा की ओर यात्रा करना।

 *पञ्चक के प्रकार  ---* 
रविवार को पड़ने वाला पञ्चक रोग पञ्चक कहलाता है।
सोमवार को पड़ने वाला पञ्चक राज पञ्चक कहलाता है।
मंगलवार को पड़ने वाला पञ्चक अग्नि पञ्चक कहलाता है।
शुक्रवार को पड़ने वाला पञ्चक चोर पञ्चक कहलाता है।
शनिवार को पड़ने वाला पञ्चक मृत्यु पञ्चक कहलाता है। 
६ इसके अलावा बुधवार और गुरुवार को पड़ने वाले पञ्चक में ऊपर दी गई बातों का पालन करना जरूरी नहीं माना गया है।
ध्यान रखें कि, वार सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक रहते हैं। और सूर्योदय से ही बदलते हैं। रात बारह बजे डे एवम् डेट (Day & Date) ही बदलते हैं।
तिथि और नक्षत्र लाहिरी अयनांश या चित्रा पक्षीय अयनांश वाली दृगतुल्य पञ्चाङ्ग से ही देखें।

पञ्चक में जन्म मृत्यु का प्रभाव ---
यदि धनिष्ठा में जन्म-मरण हो, तो उस गांव-नगर में पांच और जन्म-मरण होता है। शतभिषा में हो तो उसी कुल में, पूर्वा में हो तो उसी मुहल्ले-टोले में, उत्तरा में हो तो उसी घर में और रेवती में हो तो दूसरे गांव-नगर में पांच बच्चों का जन्म एवं पांच लोगों की मृत्यु संभव है। 

 *समाधान* ---
यदि लकड़ी खरीदना अनिवार्य हो तो पञ्चक काल समाप्त होने पर गायत्री माता के नाम का हवन कराएं। यदि मकान पर छत डलवाना अनिवार्य हो तो मजदूरों को मिठाई खिलने के पश्चात ही छत डलवाने का कार्य करें। 

यदि पञ्चक काल में शव दाह करना अनिवार्य हो तो शव दाह करते समय पांच अलग पुतले बनाकर उन्हें भी अवश्य जलाएं। इसी तरह यदि पञ्चक काल में पलंग या चारपाई लाना जरूरी हो तो पञ्चक काल की समाप्ति के पश्चात ही इस पलंग या चारपाई का प्रयोग करें। अंत में यह कि यदि पञ्चक काल में दक्षिण दिशा की यात्रा करना अनिवार्य हो तो हनुमान मंदिर में फल चढ़ाकर यात्रा प्रारंभ कर सकते हैं। ऐसा करने से पञ्चक दोष दूर हो जाता है।

पञ्चक में मृत्यु होनें पर गरुड़ पुराण के अनुसार  समाधान ---

१ शव के साथ आटे, बेसन या कुश (सूखी घास) से बने पांच पुतले अर्थी पर रखकर इन पांचों का भी शव की तरह पूर्ण विधि-विधान से अंतिम संस्कार किया जाता है। ऐसा करने से पञ्चक दोष समाप्त हो जाता है।
 
 २ अगर पंचक में किसी की मृत्यु हो जाए तो उसमें कुछ सावधानियां बरतना चाहिए। सबसे पहले तो दाह-संस्कार संबंधित नक्षत्र के मंत्र से आहुति देकर नक्षत्र के मध्यकाल में किया जा सकता है। नियमपूर्वक दी गई आहुति पुण्यफल प्रदान करती हैं। साथ ही अगर संभव हो दाह संस्कार तीर्थस्थल में किया जाए तो उत्तम गति मिलती है।

शनिवार, 3 जून 2023

पूजा

वैदिक भाषा में पूज धातु सेवा के अर्थ में प्रयोग होती है।
जैसे माता- पिता बच्चों का लालन पालन नियमित और योग्य तौर तरीके से शास्त्रोक्त विधि से कुशलतापूर्वक करेंगे तो ही बच्चा स्वस्थ,सुघड़ और सुसंस्कृत होगा अन्यथा परिणाम विपरीत होंगे।
यदि व्यक्ति बिमारों, अपङ्गो, पाल्य पशु - पक्षियों, वनस्पतियों का और  गुरुजनों की सेवा नियमित और योग्य तौर तरीके से कुशलतापूर्वक करेंगे तो ही माता - पिता, बिमारों, अपङ्गो, पाल्य पशु - पक्षियों, वनस्पतियों का और  गुरुजनों के शुभाशीर्वाद स्वतः प्राप्त होंगे।
यही वास्तविक पूजा है। लेकिन इसे शास्त्रोक्त विधि से नियम पूर्वक ही की जाना चाहिए।
जिस कार्य की विधि- निषेध जिस शास्त्र में वर्णित हो, उसी विधि को शास्त्रोक्त विधि कहते हैं।