सोमवार, 31 मई 2021

पतञ्जलि योग दर्शन की प्राचीनता।

पतञ्जलि योगदर्शन की प्राचीनता।
जैसा कि, महाभारत भीष्म पर्व में श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण नें अर्जुन के प्रति कहा है कि, यह (बुद्धियोग) योग मेने सृष्टि के आदि में सुर्य के प्रति कहा था, सुर्य ने मनु को और मनु ने इक्ष्वाकु को कहा था। 
मतलब वैवस्वत मन्वन्तर के आरम्भ में योग मूल स्वरूप में उपलब्ध था। उसके बीज या सुत्र वेदिक संहिताओं और ब्राह्मणारण्यकोपनिषदों में उपलब्ध हैं।
रामायण में राम भरत मिलाप प्रसङ्ग में श्रीराम जाबालि के उपदेश को को नास्तिक बौद्धमत बतलाते हैं। इसके पहले बौद्धमत का या नास्तिक मत का उल्लेख नही मिलता है।
हाँ शंकर भगवान, त्वष्टा आदित्य के पुत्र विश्वरूप, शुक्राचार्य, शुक्रपुत्र त्वष्टा, अत्रिपुत्र दत्तात्रय, कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन और रावण नामक तन्त्राचार्य हो चुके थे। चूँकि तन्त्र वेद विरोधी मत था और तत्कालीन बौद्ध तन्त्रमत के थे ही यह तो निर्विवाद है। 
सम्भवतया इन्ही में से किसी निवृत्ति मार्गी श्रमण दत्तसम्प्रदाय के शैवमताचार्य  के द्वारा शुष्क बुद्धिवाद, तर्कवाद और सन्देहवादी दर्शन प्रस्तुत किया होगा जो कालान्तर में बौद्धमत कहलाया।

इनमें भी मत भिन्नताएँ उभरी जिसमें से एक     
सन्देहवादी मध्यम मार्गी मत बौद्ध कहलाया। इसी परम्परा में सिद्धार्थ गोतम बुद्ध हुए। जिनके जन्म के समय में ही ज्योतिषियों नें उनके बुद्ध होनें की सफल भविष्यवाणी की थी।और 
दुसरा यक्ष उपासक शुद्ध नास्तिक अर्हत वादी श्रमण मत श्रीकृष्ण के भाई नेमिनाथ, शान्तिनाथ और पारसनाथ द्वारा संगठित होकर महावीर के समय जैन मत कहलाया।
मतलब आज के नौ- दसलाख वर्ष पूर्व श्रीराम युग के आसन्न में ही बौद्धमत आरम्भ हुआ। और उसीमें से अलग होकर श्रीकृष्ण के आसन्नपूर्व पाँच छः हजार वर्ष पूर्व जैनमत आरम्भ हुआ।
बौद्ध और जैनों की परम्परा के बीज तो सनातन परम्परा से ही विकसित हुए थे।इसलिए उसमें और सनातन धर्म में बहुत अधिक अन्तर नही पाया जाता है।

महर्षि पतञ्जलि बौद्ध और जैन परम्परा के उदय कछ बाद में हुए होंगे इसमें कोई सन्देह नही किन्तु गोतम बुद्ध और महावीर के पहले हुए होंगे। क्योंकि, कोषितकि उपनिषद में इनका उल्लेख है। और सुत्रात्मक शैली के षडदर्शन गोतम बुद्ध और महावीर के पहले के ही हैं।

जैसे महर्षि कपिल के पहले ईश्वरकृष्ण की सांखकारिका के रूप में सांख्य दर्शन मौजूद था, गोतम बुद्ध के पहले बौद्ध दर्शन मौजूद था और महावीर के पहले जैन दर्शन मौजूद था। ऐसे ही पूर्व प्रचलित योगदर्शन को पतञ्जलि ने उनके समय प्रचलित सुत्रात्मक शैली में प्रस्तुत किया। किन्तु इसमें जैन और बौद्धों का कोई प्रथक प्रभाव दृष्टिगोचर नही होता। जिन्हें जैन बौद्ध परम्परा माना गया वे सनातन धर्म की ही देन है।

रविवार, 30 मई 2021

सनातन धर्म का वैशिष्ट्य

सनातन धर्मी कहता है; ---
सर्वदेव नमस्कार केशवम् प्रतिगच्छति।
मतलब किसी को भी नमस्कार करो, सभी उस परमात्मा को ही समर्पित होते हैं।
किसी भी नाम से पुजो, किसी भी रूप में पुजो आराधना उस परमात्मा की ही होती है।
क्यों कि, उसको छोड़कर तो कुछ हे ही नही।
श्रीमदभगवदगीता में विष्णु स्वरूप में स्थित हो श्रीकृष्ण कहते हैं जो भी पुजा आराधना जो कुछ भी करता है वह मुझे ही मिलती है।
जो जिस स्वरूप में मुझे भजता है उसी स्वरूप में मैं उसकी श्रद्धा स्थिर कर देता हूँ।
सनातन धर्मी कहता है;---
 हे परमात्मा, हे परमेश्वर, प्रभ , मैं आपका हूँ, केवल आपका ही हूँ। आपके सिवा मेरा कोई नही।
मेरो तो गिरधर गोपाल दुसरो न कोई।
अन्य सम्प्रदाय बोलते हैं ओ माय गॉड, हे मेरे ईश्वर,
मतलब उनका ईश्वर दुसरों का ईश्वर अलग -अलग व्यक्ति हैं। सबके ईश्वर अलग अलग हैं और ईश्वर मेरा है, मैं ईश्वर का नही हूँ।
बस एक यहोवा परमेश्वर या एक अल्लाह ही इबादत के लायक है दुसरे किसी की इबादत करनें वाले और दुसरे किसी देवता/ फरिश्ते को भी इबादत में शरीक करता हो, किसी अन्य की तथा अल्लाह के साथ किसी अन्य की भी इबादत करता है, या जो अल्लाह और उसके पेगम्बर (मूसा/ईसा/ मोह मद) में आस्था और विश्वास नही रखता ऐसे सभी लोगों को जीनें का कोई अधिकार नही है।
मतलब सनातन धर्मी के अनुसार तो उस परमात्मा के अलाव कुछ है ही नही। जो कुछ है सब उसी का स्वरूप ही है। अन्य कुछ नही।
अन्य सम्प्रदाय मानते हैं कि, उनकी मान्यता का ईश्वर एकमात्र नही है उसके अलावा .....मन्यु /इब्लीस/ शैतान भी है। और उनकी मान्यता का ईश्वर, सर्वशक्तिमान नही है  बल्कि उनकी मान्यता के ईश्वर के अलावा  .....मन्यु इब्लीस/ शैतान भी है। जो उसकी इच्छा के विरुद्ध;  उस एकमात्र परम सत्ता की ही शक्ति के दम पर नही बल्कि वह शैतान स्वयम् अपने दम पर ही उस उस अहुरमज्द या यहोवा परमेश्वर या अल्लाह की सत्ता को चुनोती देकर उससे टक्कर लेनें  उसके समकक्ष सत्तावाला और शक्तिशाली है।

देशद्रोह का इतिहास

सनातन वेदिक धर्म कभी चमत्कार को नमस्कार करना नही सिखाता।
तन्त्र, जैन और बौद्ध मत ने सर्वप्रथम यह मुर्खता भारत में आरम्भ की। सनातन धर्म में दत्त सम्प्रदाय के रुप में तन्त्र का प्रवेश हुआ। जिसके झाँसे में सनातन धर्म के शिव परिवार से सम्बद्ध तीनों सम्प्रदाय शैव,शाक्त और गाणपत्य आगये।
सौर तो लगभग रहे नही और वैष्णव भक्ति के नाम पर कहीँ प्रतिमा प्रकट होने जैसे चमत्कार को नमस्कार करने लगे। और नृसिंह के नाम पर चमत्कार तथा कृष्ण की बाल लीलाओं के नाम पर चमत्कार को नमस्कार करना सिखाया गया।
इसमें कम्बन जैसे कवियों से प्रभावित हो तुलसीदास जी ने तो मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम को भी नही छोड़ा। केवल श्वसन करते हुए निराहार, राख लपेटकर गुप्त (छुपी हुई), पाषाणवत स्थिर रहकर तपकरने वाली गोतम पत्नी अहल्या की चरण वन्दना करते हुए अहल्या के चरण छुकर प्रणाम करने वाले श्री राम को लात मारकर (चरण छुआ कर) पाषाण से जीवित नारी बनाने का चमत्कार दिखा दिया।
जब चमत्कार को नमस्कार संस्कार हमारी संस्कृति में प्रवेश करगये तो फिर स्वाध्याय और तप कौन करे। फिर क्या था चमत्कार आधारित ईसाई मुस्लिम सम्प्रदाय को धर्मपरिवर्तन का बड़ा आसान नुस्खा मिल गया।
जबतक विश्व में मुर्ख लोग रहेंगे धुर्त कभी भुखे नही मरेंगे।
ज्ञानि बनो मुर्खों को सुधारो और धर्मरक्षा करो।

आवश्यकता तो तब से है जब से *महाभारत में भारत वीर पुरुषों का सामुहिक संहार होगया। वीरों का नितांत अभाव हो गया* फिर थोड़े बहुत सम्भले तो *बुद्ध और महापीर ने भारत का निशस्त्रीकरण करदिया।* 
 *बौद्धों का चीनियों से लगाव और उज्जैन से अफगानिस्तान जाकर जैनाचार्य द्वारा शकराज कनिष्क को बुला कर लाना जैसे देशद्रोही कर्मठ कार्यकर्ता बड़ गये थे।*
*इन्ही के परिणाम स्वरूप शक, हूण, खस, ठस, बर्बर, म्लेच्छ, यवन सब घुस गये। फिर इनको राजपूत बना कर देश की कमान दी तो उनने घरेलु युद्ध और धर्मयुद्ध के नियम विदेशी आक्रांताओं पर लागु कर उनको निष्कण्टक प्रवेश दे दिया।* 
*वह युग आज की तुलना में कितना भयङ्कर होगा।कल्पना कठिन है।*
पर उस युग में भक्तों की बहुतायत होगई वे जनता को तो मरहम लगा गये पर *तप के अभाव में रक्षक अवतार नही हूआ।*
 सृजन कैसे करुँ कि जिज्ञासा पर ब्रह्मा को उत्तर मिला तप कर। ब्रह्म जिज्ञासु इन्द्र और विरोचन को प्रजापति ने कहा तप कर। गङ्गावतरण के लिये सगर वंशियों ने तप किया। परम पद के अभिलाषा में ध्रुव ने तप किया।
मेने कहीँ नही पड़ा कि, पुर्वकाल में किसी को ताल- मृदङ्ग लेकर नाचने गाने को कहा हो। *मध्य युग में सब नाचने गाने वाले ही हुए।तपस्वी नही हुए।*
*अभी भी नगण्य ही हैं। स्वधर्म पालन का उपदेश केवल दयानन्द सरस्वती नें ही दिया* बाकी सब तो सर्वधर्म समभाव वाले सेक्यूलर ही हुए।
*तो अवतार क्यो आये?*
हम सडे गले मूल्यों का बोझ अपनी संस्कृति समझ कर ढोते रहें और उनके *दुष्परिणाम देख कर ना तो पहले कोई सीख ली ना अब तक ठीक जग सके है । हमारे शत्रु हम स्वयं ही है* ।जापान  
और इजरायल ( इजरायल सबसे ज्यादा ) हम से ज्यादा अच्छे है । *ऐसा नहीं की हम लोगों में पोटेंशियल कम है परंतु कोई बात अवश्य है जो रोकती है ।* वह अवरोध और उनके निर्माण में सहायक लोगो से पहले लोहा लेना होगा । परंतु ऐसे ही लोगों का महिमामंडन हुआ , इन्हीं की सोच को अपनाया गया ।ये ही लोग ऐसे थे की खुद तो सब समझते थे परंतु अपना और अपने आकाओं का स्वार्थ सिद्ध कर प्रजा को मूर्ख बना गए । दूसरी तरफ जागरूक नेता और महापुरुष भी थे परंतु प्रजा ने उनकी उपेक्षा की ,उनकी बात नहीं मानी गई ,अबतक उनकी उपेक्षा ही होती गई ,अब तो परिणाम जिसका भय था सामने दिख रहा है । फिर बलिदान होंगे , फिर उन्ही शहीदों का गुण गान होगा , कुछ सामान्य सा होते हुवे लगने पर फिर उन्ही सड़े गले मूल्यों का आदर होने लगेगा ,हम फिर वहीं लौट आयेंगे । अपने इतिहास से नहीं तो कम से कम वर्तमान से समझ लेना चाहिए ।उपरोक्त दोनों देश यह गलती नहीं करते ।
  *कहा जाता है कि, विश्व में चला वो ४३०० है । इतने सब धर्म एक जैसे कैसे हो सकते है ? इनकी शिक्षाएं अगर एक समान है तो इतने धर्मो का औचित्य क्या है ?
ये सभी धर्म एक ही शिक्षा देते है ऐसा जो कहते है क्या उन्होंने इन सभी धर्मो का गहराई से अध्ययन किया है ? 
सब धर्म समान है कहने का अधिकार इन्हें किसने दिया ? 
विश्व को छोड़िए भारत में ही कितने धर्म है और उनके शाखा प्रशाखा भेद  कितने है ?
 इन सब की आपस में नहीं बनती और ये सब एक दूसरे को नीचा दिखाते है । जब आपस में ही नहीं बनती तो सम भाव कहा रहा ? दूसरे धर्म की तो बात ही दूर है ।* 
   *सब धर्मों की शिक्षा एक है यह कोरी गप्प है। जो केवल भारतीय सनातनधर्मियों के सिर चढ़ कर बोल रही है। उनमें भी विशषकर सेक्युलरों के दिमाग में बहुत बड़ा भूत है। प्राप्त जानकारी के अनुसार अब अपने देश को छोड़ कर और कोई इस बात को नहीं मानता । दुख तो यह है कि हमारे धर्माचार्य भी एक तरफ तो अन्य धर्म की बातों का विरोध करते है और दूसरी तरफ सब धर्म समान है ऐसी शिक्षा भी देते है ।*
 नेता तो अभी सौ साल से पैदा हुए।*सिकन्दर आक्रमण के पहले लगभग पुरा भारत बौद्ध या जैन हो गया था। केवल कश्मीरी और काशी में सनातन धर्मी बचे थे। या थोड़े बहुत दक्षिण भारत में। पर वे वेदिक नही थे।*
*राजन्य भी शक (गुर्जर), हूण (जाट), पारसी आदि थे।*
*चाणक्य का शिश्य चन्द्रगुप्त मोर्य जैन होकर मरा। चाणक्य भी जैन बौद्धों का विरोध करने से बचे।*
*उसके वंशज मोर्य बौद्ध होगये।*
*केवल पुष्यमित्र शुङ्ग, समुद्रगुप्त,और गुप्त वंश, विक्रमादित्य के* दादा जी,पिताजी आदि, *मुञ्जराज और राजा भोज*, के बाद *राजपूत और मराठा लोग सनातन धर्मी शासक हुए।*
*शेष पहले बौद्ध जैन राजा थे और बादमें मुस्लिम।*
*कुमारील भट्ट और शङ्कराचार्य  ने पहली बार जैन बौद्धाचार्यों को शास्त्रार्थ में हरा कर इज्जत बचाई।*
*पृथ्वीराज ने आखरी अश्वमेध यज्ञ किया।* पर गृहयुद्ध और धर्मयुद्ध के नियम गौरी पर भी लागू कर मारा गया।
*शिवाजी ने दक्षिणी हिन्दुत्व अपनाया। पर यज्ञादि नही।*
*कबीर , नानक, ग्यारहों  सिक्ख गुरु ने सेक्युलरिज्म सिखाया।*
*रामकृष्ण परमहन्स, विवेकानन्द ने सेक्युलरिज्म सिखाया।*
*1857 का प्रथम स्वातन्त्र्य संग्राम बहादुर शाह जफर के नैत्रत्व में लड़ा गया।*
अब इतनी तगड़ी नीव पर गान्धी का चलना कौनसी अनोखी बात है।
*दयानन्द सरस्वती अकेले ही सबसे लड़े। अधिकांश क्रान्तिकारी और स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी आर्य समाजी थे।*
स्वदेशी, सत्याग्रह आर्य समाज की ही देन है।
 *शङ्कराचार्य जी के बाद श्रद्धानन्द जी पहले आर्यवीर हुए जिनने शुद्धि कर सनातन धर्म में वापसी करवाई। और भारत तथा सनातन धर्म में पहले व्यक्ति हुए जिनने वैश्यलयों को शुद्ध कर मुख्यधारा में लाये।*
 *गान्धी नेता थे। न कि, कोई ऋषि- मुनि या साधु - सन्यासी।*ऐसी आशाएँ करना ही गलत है।
 *आज आशाराम बापु, राम रहीम, आदि ज्यादा प्रभावशाली थे या कोई नेता?*
*कौनसा नेता इन लोगों की बराबरी कर सकता है?*
*जितन प्रभाव धार्मिक नेता का होता है उसका दशांश भी नेता का नही होता।* आज जो सेक्यलरिटि जनता में दिख रही है वह अकेले गान्धी का प्रभाव मानना तो महिमामण्डन की सभी सीमाएँ पार करने वाली स्थिति है।
 सर्वोच्च सत्ता मानलेना तो अन्ध विरोध की भी पराकाष्ठा है। *यदि गान्धी अकेले ही इतने प्रभावशाली थे तो यह उनकी योग्यता और विरोधियों की कमजोरी कहलायेगी।*
मैं तो किसी शर्त पर माननें को तैयार नही की सनातन धर्मियों में सेक्युलरिज्म गान्धी की देन है। क्यों कि एक तो वह गान्धी के जन्म के सेकड़ों वर्ष पहले से मौजूद था।और दुसरा मैं किसी भी एक तो दूर दस नेता मिलकर भी इतना प्रभावशाली नही मानता कि, वह समाज बदलदे।
*जाति प्रथा नही हटी,क्षछुआत नही हटी ऐसी ही कई चीजें जो गान्धी अजेण्डे में थी वे सब मौजूद है ।* तो सेक्युलरिज्म गान्धी की दैन कैसे मानलें।
फिर यदि सावरकर सिमित रहे, हेडगेवार सिमित रहे, गोलवरकर सिमित रहे तो इसमें उनके एफर्ट्स की कमी है न कि, दुसरों की। 
*जिसमें दम था वह तो विदेशों में भी आजाद हिन्द सेना बना लेता है।*
*नेताजी ने तो कभी रोना नही रोया कि, गान्धी की बाधा के कारण मैं सफल नही हो पाया। सुभाष चन्द्र बोस भी तो राजनेता ही थे ना?* 
*गान्धी का व्यर्थ में महिमामण्डन मुझे तो सावरकर वादियों और हेडगेवार वादियों की गान्धी के प्रति नकारात्मक अन्धभक्ति ही लगती है। या अपनी कमजोरियों को दुसरों पर ढोलनें की मनोवृत्ति हो सकती है।

शत वर्षीय दशराज युद्ध में स्वायम्भुवमनु से लेकर ऋषभदेव के पुत्र भरत चक्रवर्ती की सन्तान मनुर्भरतों के विरुद्ध वशिष्ठ को नीचा दिखाने के चक्कर में विश्वामित्र द्वारा  चन्द्रवंशियों को सहयोग देना देशद्रोह की प्रथम घटना थी।
रावण द्वारा कुबेर के विरुद्ध माली, सुमाली, और मयासुर को लड़नें के लिए बुलाना भारतीय इतिहास की देशविरोधी राष्ट्र विरोधी दुसरी घटना है।
कृष्ण से लड़नें के लिये यमन के राजा कालयमन को बुलाना देशद्रोह की तीसरी घटना थी।
सिकन्दर को सहयोगदेनें वाले राजाओं का इतिहास चाणक्य में देखा ही होगा।
विक्रमादित्य के पिताजी के विरुद्ध उज्जैन के जैनाचार्य द्वारा कुषाणों को निमन्त्रण देनें अफगानिस्तान जाना, चन्द्रगुप्त द्वितीय के बड़ेभाई रामगुप्त के विरुद्ध बोद्धों द्वारा शकराज को समर्थन देना ।
 (और भाभी ध्रुवस्वामिनी के स्थान पर सेना सहित चन्द्रगुप्त द्वितीय ने पालकी में बेठकर शकराज के पास जाना और उसका वध करना भी पढ़ा ही होगा। इसी घटना से प्रेरणा लेकर दो-तीन ऐसे अभियान और हुए जिसमे आगरा में केद शिवाजी राजे को मुक्त कराने वाला अभियान भी है।)

ये सब हमारे वे  अपराधी पुर्वज थे जिनने हुए जिनने भारत को दास बनानें में सहयोग देकर हमारे मूल वेदिक धर्म और संस्कृति का नाश करवाया।
और भविष्य पुराण द्वारा प्रशंसित जयचन्द्र को तो भूल ही गया था। जिसने भविषपुराण द्वारा निन्दित अन्तिम अश्वमेध यज्ञकर्ता, भारत के अन्ति सम्राट पृथ्वीराज चौहान के विरुद्ध मोह मद गौरी को आमन्त्रित किया। और सहयोग दिया।
इसविषय में भविषपुराण में उस समय का वर्णन जोड़नें वाले  व्यक्ति को जयचन्द्र से बड़ा अपराधी मानता हूँ।
ये सभी वेद शत्रु,  तक्षशिला और नालन्दा विध्वन्सकों से मेक्समूलर और मेकाले तथा वामपंथियों तक के पूर्वज हैं।

वेद , वेदिक धर्म और वेदिक संस्कृति, तथा भारतवर्ष प्राणों में बसते हैं। वेद, विष्णु,सवितृ, नारायण, हिरण्यगर्भ, प्रजापति,दक्ष प्रजापति (प्रथम),रुचि प्रजापति, करदम  प्रजापति, धर्, अग्नि, पितरः, महारुद्र,देवर्षि नारद, महर्षि मरीचि,महर्षि भृगु,महर्षिअङ्गिरा, महर्षि वशिष्ठ, महर्षि अत्रि, महर्षि क्रतु, महर्षिपुलह,महर्षि पुलस्य, स्वायम्भुव मनु, 
ब्रहस्पति,  इन्द्र, ब्रह्मणस्पति, आदित्य गण,वाचस्पति वसुगण,पशुपति ,रुद्रगण आदि  देवगण,भरत चक्रवर्ती / जड़भरत, और , वेदिक धर्म और वेदिक संस्कृति, तथा भारतवर्षके प्रति अत्यधिक अनुराग है। स्वाभाविक है इनके शत्रुओं के प्रति उतना ही द्वेष भी है।
 इसलिए इस इतिहास को नही भूल पाता।

विश्वकर्म ऋत के अनुसार होते हैं ईश्वर या प्रकृति कर्ता नही है।

हमें दुनिया से ईश्वर से सबसे बहुत सी अपेक्षाएँऔर शिकायतें हैं।

एक तरफा अन्तर्मुखी होना और अति बहिर्मुखी होना दोनों ही अति बुरे हैं।

केवल यह ध्यान रखो कि, हम क्या कर रहे हैं। हमारे कर्म अन्य पर क्या प्रभाव डालेंगे यह सावधानी भी आवश्यक है।जितना दोष बुरे कार्य करनें में है उतना ही दोष पर दोष दर्शन में भी है।

दुसरों से जो अपेक्षा है। अन्यों की उन्ही अपेक्षाओं को पुर्ण करनें की तत्परता पैदा करो। दूसरों से जो शिकायत है हमारी वही शिकायत दुसरे न कर पाये इसके लिये सावधान रहो।

वेदिक साहित्य, स्वामी रामसुखदासजी महाराज की गीता प्रबोधनी टीका पढ़ो।

सनातन धर्म के अनुसार ईश्वर किसी स्थान विशेष पर बैठकर शासन करनें वाला अधिनायक व्यक्ति नही है यानी ईश्वर कोई तानाशाह नही है। ईश्वरीय संविधान ऋत कहलाता है। ऋत के अनुसार ही सृष्टि संचालन हो रहा है। इसका कर्ता ईश्वर नही अतः वह भोक्ता भी नही है। जैसे लाल, हर और बैंगनी (वायलेट) रंगों का काम्बिनेशन ही समस्त रंगों मे दिख रहा है वैसे ही जड़ प्रकृति के सत्व रज और तम ये तीन गुणों के काम्बिनेशन से जगत की समस्त क्रियाएँ हो रही है। जैसे सुर्य उदय होनें पर संसार सक्रीय होजाता है। कमल खिल जाते हैं कुमुदनी मुरझा जाती है। हारसिंगार (पारिजात) पुष्प झर जाते हैं। हम उठकर काम धन्धे से लग जाते हैं। इसमें सुर्य का न कोई कर्तापन है न कोई गुण दोष है। वही स्थिति ईश्वर के होनें मात्र से प्रकृति के तीनों गुण परस्पर सक्रीय रहते हुए समस्त क्रियाएँ करते रहते हैं। इसमें कोई कर्ता नही है। किन्तु प्रकृति के इन गुणों की सक्रियता के परिणामों को मेनें किया ऐसा भ्रम पाल लेते हैं तब उसी मिथ्या अहंकार का फल दुःख सुख रुपी भ्रम पाल कर हम प्रसन्न या दुखी होते रहते हैं।

इसमें ईश्वर या प्रकृति कोई उत्तरदायी धही है। हम प्रकृति विरुद्ध आचरण कर अस्वस्थ होते हैं, फिर अप्राकृतिक चिकित्सा करवा कर और नई समस्याएँ मोल ले लेते हैं। फिर उनका अप्राकृतिक निवारण कर और नवीन रोग पैदा कर लेते हैं इसमें दोषी कौन?

ध्यान रखो पानी पीकर हम प्यास बुझाते है, जो आग के सामनें या धूप में बैठकर हम गरमी पाते हैं इन नगण्य समझीजानें वाली बातों के पीछे पीढ़ियों का अनुसन्धान और विकास है जो हमें अब ये सहज उपलब्ध है। वैसे ही सामाजिक दुराचरण भी पीढ़ियों की अनुशासन हीनता का ही परिणाम और विकास है। इन्हें वापस प्राकृतिक व्यवस्था लानें में हमारे सहित कई पीढ़ियों के सावधानी पुर्वक सामुहिक सक्रिय योगदान से ही सफलता मिलपायेगी।

जिस प्रकार भारत का शासन प्रशासन संविधान के द्वारा संचालित होता है। न श्री मनमोहन सिंह नामक व्यक्ति हमारे शासक थे न श्री नरेन्द्र मोदी नामक व्यक्ति हमारे शासक हैं। हमपर हमारा ही शासन है क्यों कि इन दोनों को हमनें ही चुना है। हमारा संविधान भी हमनें ही बनाया और हमनें ही आत्मार्पित किया है। ठीक यही लोकतांत्रिक व्यवस्था सृष्टि के शासन में भी है।

हमारे देश के कानून यदि हम ही नही मानेंगे और फिर उसके दुष्परिणाम का दोष शासन को देंगें तो विरोधी विदेशी सत्ताएँ उसका लाभ उठाकर हमपर नियन्त्रण और अधिकार करनें के लिये उनका दुरूपयोग करेगी ही।

वैसे ही प्राकृतिक अनुशासन से बाहर जाकर भी हम दुशासन के नियन्त्रण को स्वयम् आव्हान करते हैंं। कोई अन्य दोषी नही है।

धर्म संस्थापनार्थम् सम्भवामि युगे युगे कितना सही?

1 राजा नल का जुआँ खेलना उचित था या अनुचित।

2 बालीवध न्यायोचित था या नही?

3 सीताजी को अयोध्या की पटरानी बनाना सामाजिक न्यायोचित था या नही?

4 युधिष्ठिर का जुँआ खेल कर राज्य को दाव पर लगान, भाइयों को दाव पर लगाना और पत्नी को दाव पर लगानाँ न्यायोचित था या नही?

महाभारत धर्मयुद्ध में धर्म  प्रश्न तीन थे ।
5 - तेरहवें वर्ष के अज्ञात वास पुर्ण होनें के बाद अर्जुन का प्रकटीकरण हुआ या पहले? 
मतलब पाण्डवों और भीष्म की कालगणना सही थी या दुर्योधन की कालगणना सही थी?
6 - अन्धेहोनें के आधार पर धृतराष्ट्र का राज्याधिकारी नही होना उचित था या गलत।
7 - धृतराष्ट्र पुत्र दुर्योधन पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर से छोटा होनें के कारण युवराज पद का अधिकारी था या नही।
प्रत्यक्ष में तो सप्तम बिन्दु में उल्लेखित केवल प्रथम प्रश्न ही धर्म का प्रश्न था। किन्तु लोक में छटा और सातवाँ प्रश्न भी विचारणीय माना गया। इसी आधार पर बहुसंख्यक राजन्य वर्ग दुर्योधन के पक्ष से युद्ध में उपस्थित हुआ।
मतलब धर्म की निर्विवाद अवधारणा का युग त्रेता के अन्त में ही समाप्त हो गया था। और द्वापर के अन्त में तो विवाद अत्यधिक बड़ गये थे।

क्या श्रीराम और श्रीकृष्ण धर्मसंस्थापना में असफल रहे? लगभग सर्वमान्य मत तो यही लगता है कि धर्म संस्थापना में दोनों अवतार असफल ही रहे।
किन्तु यह भी लगभग सर्वमान्य है कि, अधर्मी शासन के नाश कर धर्मशासन स्थापना में दोनों अवतार  लगभग पुर्णतः सफल रहे।
पौराणिक मान्यता के अनुसार तो अधर्म नाश कर धर्म संस्थापना में भगवान कल्कि ही पुर्णतः सफल होंगे।

यदि यह मान लिया जाए तो, प्रत्येक कलियुग तुल्य अवधि में एक अवतार। अर्थात 
कृतयुग (सतयुग) में चार अवतार - मत्स्य, कश्यप, वराह और नृसिंह।
त्रेता में तीन अवतार - वामन, परशुराम और श्री रामचन्द्र जी।
द्वापर युग में दो अवतार या तो वेदव्यास जी या बलराम जी और श्रीकृष्ण।
कलियुग में एक ही अवतार - श्री कल्कि।
यह फार्मूला गलत सिद्ध हो जाएगा।
या फिर प्रत्येक सामाजिक कार्यकर्ता को अवतार मानना होगा,  जो अधिक उचित जान पड़ता है। ---
जैसा कि श्रीमद्भगवद्गीता दशम अध्याय श्लोक 41 और 42 में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि, 

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्‌ ॥ (10/41)

अर्थात --- जो-जो ऐश्वर्ययुक्त, कांतियुक्त और शक्तियुक्त वस्तुयें है, उन-उन को तू मेरे तेज के अंश से ही उत्पन्न हुआ समझ। (10/41)

अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्‌ ॥ (10/42)

अर्थात --- किन्तु हे अर्जुन! तुझे इस प्रकार सारे ज्ञान को विस्तार से जानने की आवश्यकता ही क्या है, मैं तो अपने एक अंश मात्र से इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को धारण करके सर्वत्र स्थित रहता हूँ। (10/42)

अर्थात जिस किसी में भी जो विभूति है वह मैं हूँ अर्थात विष्णु का ही अंश है।

विचारणीय मुद्दा है। 

सोलह भुवन और अठारह लोक

भुवन --- जहाँ पिण्ड (ग्रह) हो, भूतल  हो वह भुवन कहलाता है तथा 
लोक ---- जहाँ जीवन का आलोक होता है उसे लोक कहते हैं। सभी भुवन में लोक नही होते किन्तु सभी लोक किसी न किसी भुवन में ही होते है।
जैसे मृत्युलोक, भू में है। नागलोक अतल में बतलाया गया है।
एक ही भुवन में कई लोक हो सकते हैं।
चौदह भुवनों के उपर / उत्तर में चार  उर्ध्व लोक हैं।
 1  वैकुण्ठ जो भुवन भी है और लोक भी है। वैकुण्ठ में ही दो और लोक है,  2 साकेत लोक, 3  गोलोक ।
4  ब्रह्मलोक भी स्वयम् भुवन भी है और लोक भी है।
 हम जिस भुवन में रह रहे हैं उसमें ही सप्त उर्व लोक - 1 भूः , 2 भुवः,  3 स्वः,  4 महः, 5 जनः, 6 तपः,7 सत्यम्। ये भूः  
सप्त अधोलोक --- 1 अतल ,2 वितल  ,3 सुतल  ,4 तलातल  ,5 महातल  ,6 रसातल  और 7 पाताल।
इस प्रकार कुल सोलह भुवन ⤵️
1 वैकुण्ठ, 2 ब्रह्मलोक, 3 सत्यम् ,  4 तपः,5 जनः, 6 महः, 7 स्वः, 8 भुवः, 9 भूः , 10 अतल, 11  वितल ,12 सुतल, 13 तलातल ,14  महातल , 15  रसातल  और 16 पाताल
 और अठारह लोक हुए।⤵️
1 वैकुण्ठ 2 गोलोक 3 साकेत लोक, 4 ब्रह्मलोक, 5 सत्यम् ,  6 तपः,7 जनः, 8 महः, 9 स्वः, 10 भुवः, 11 भूः , और 
सप्त अधोलोक--- 12 अतल, 13  वितल ,14 सुतल, 15 तलातल ,16  महातल , 17  रसातल  और 18 पाताल लोक ।

त्रीस्कन्द ज्योतिष अर्थात गोल, गणित और संहिता।

1 त्रीस्कन्द ज्योतिष का मूल भाग तो सिद्धान्त ज्योतिष ही था। उसके दो भाग गणिताध्याय  और दुसरा गोलाध्याय थे।तथा तिसरा स्कन्द संहिता था। जिसके प्रमाण हर वेद सहिंताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों,उपवेद, वेदाङ्ग, शुल्बसुत्रों, स्मृतियों, रामायण, महाभारत, और पुराणों में बिखरे पड़े हैं।
किन्तु होराशास्त्र के सुत्र कहीँ देखनें में नही आये। तो त्रिस्कन्द ज्योतिष में होरा कैसे आ गया यह समझ नही आया।
2 वराहमिहिर नें स्वीकार किया है कि, होरा और ताजिक यवनों की देन है।
अवकहड़ा चक्र, कुण्डली के भावों की संख्या और भावों की संज्ञा से यह बात प्रमाणित भी होती है। ताजिक तो पूर्णतः इराक की ही खोज लगता है। किन्तु सेडरल ईयर से जोड़नें की खोज निस्संदेह भारतीय ही है। यदि जातक होराशास्त्र भारतीय होता तो कुण्डली में 28 भाव होते। बारह भाव कदापि नही होते।
3 फलित करनें वालों को मूलतः देवज्ञ कहा जाता है। इसमें मूलतः सामुद्रिक शास्त्र के प्रमाण ही प्राचीन शास्त्रों में पाये जाते हैं। और दुसरा शकुन शास्त्र के प्रमाण मिलते हैं। होराशास्त्र के प्रमाण नही मिलते।
ज्योतिषी शब्द प्रचलन बहुत अर्वाचीन है। फलित विद्या या देवज्ञान में सामुद्रिक, शकुन के अलावा अंकविद्या,रमल  होराशास्त्र के अन्तर्गत जातक,ताजिक, प्रश्न कुण्डली प्रचलित हैं। पर फलित विद्या बहुत अर्वाचीन है।

4 व्यंकटेश बापजी केतकर के पहले भारत में प्रचलित किसी भी सिद्धान्त ग्रन्थ के गति, लम्बन आदि के शुद्धमान और स्थिरांक   (ज्योतिष की भाषा में ध्रुवे) से ग्रहगणित या सुर्य ग्रहण, चन्द्र ग्रहण, लोप - दर्शन, अगस्तोदय जैसे तारों के उदय अस्त की शुद्ध गणना सम्भव ही नही है। सुर्य केन्द्र के वसन्त सम्पात  पर होनें की गणना हेतु ट्रोपिकल ईयर का शुद्धमान (ध्रुवा) आवश्यक है। किन्तु पुरानें किसी सिद्धान्त ग्रन्थ में एकदम शुद्धमान उपलब्ध नही है। 
सुर्य के स्पष्ट भोगांश और स्पष्ट क्रान्ति के बिना चरान्तर ज्ञात नही हो सकता। और चरान्तर के बिना सुर्योदयास्त गणना भी नही हो सकती थी। 
5 ग्रहण की भविष्यवाणी के आधार पर होरा शास्त्र को प्रामाणिक ठहराने का तर्क निश्चित ही सोशल मिडिया की ही खोज होगी। सोशल मिडिया में ऐसे ऐसे बे सिर-पेरके तर्क दिये जाते हैं। अतः ध्यान देनें योग्य और विचारणीय तर्क नही