शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

ब्राह्मण, और क्षत्रिय वंश

वेद, ब्राह्मण ग्रन्थ, वाल्मीकि रामायण, महाभारत और विष्णु पुराण के अनुसार, 
प्रजापति के पुत्र दक्ष-प्रसुति, रुचि-आकुति, कर्दम-देवहुति तथा स्वायम्भुव मनु-शतरूपा भूमि के प्रजापति हुए।
धर्म तथा उनकी तेरह पत्नियाँ, अग्नि और स्वाहा तथा पितर और स्वधा भी प्रारम्भ में भूमि पर ही रहे। और प्रजा उत्पन्न की।

इनके अलावा  मरीची-सम्भूति, भृगु-ख्याति, अङ्गिरा-स्मृति, वशिष्ट-ऊर्ज्जा, अत्रि-अनसुया, पुलह-क्षमा, पुलस्य-प्रीति, कृतु-सन्तति की सन्तान ब्रह्मर्षि हुए जो मूलतः धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में रहते थे और वहाँ से अन्य स्थानों पर गये।
स्वाम्भुव मनु-शतरूपा की सन्तान - प्रियव्रत के पुत्र आग्नीध्र हुए। आग्नीध्रके पुत्र अजनाभ या नाभि हुए जिन्हें भारतीय उप महाद्वीप का शासनाधिकार मिला। अजनाभ के पुत्र ऋषभदेव हुए, ऋषभदेव के पुत्र भरत चक्रवर्ती हुए जिनके द्वारा इस क्षेत्र को भारतवर्ष नाम दिया। इन्ही भरत चक्रवर्ती की सन्तान परम्परा मुनुर्भरत कहलाई। ये सब क्षत्रिय कहलाते थे। मनुर्भरतों में दिवोदास के पुरोहित पहले भृगु थे। फिर वशिष्ठ जी हुए जो दिवोदास के पुत्र सुदास के समय भी रहे।
मनुर्भरतों का क्षेत्र भी हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, पञ्जाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तरी राजस्थान तथा उत्तरी मध्य प्रदेश (चम्बल,ग्वालियर सम्भाग) वाले क्षेत्र था। यह क्षेत्र आर्यावर्त कहलाता था।

पञ्जाब, और हरियाणा धर्म क्षेत्र कहलाता था।
हरियाणा के कुरुक्षेत्र अर्थात धर्म का राज्य क्षेत्र था। कुरुक्षेत्र के आस-पास का क्षेत्र धर्मक्षेत्र के अलावा ऋषि देश, गोड़ प्रदेश और मालवा क्षेत्र कहलाता है। गोड़ प्रदेश के निवासी आद्यगोड़, श्रीगोड़, गुजरगोड़ आदि पञगोड़ ब्राह्मण हुए। 
विक्रमादित्य के दादाजी नबोवाहन भी इसी क्षेत्र के निवासी मालव गणों के प्रमुख थे। उनके पुत्र महेन्द्रादित्य गन्धर्वसेन ने सोनकच्छ को राजधानी बनाया। महेन्द्रादित्य गन्धर्वसेन के पुत्र भृतहरि - और विक्रमसेन हुए। इन्होंने उज्जैन को राजधानी बनाया। तब से यह पठार मालवा कहलाया।

 मनुर्भरतों में तृत्सु वंश में उत्पन्न दिवोदास और उनके पुत्र सुदास के समय शत वर्षीय दशराज युद्ध हुआ। 

मरीचि नन्दन कश्यप के पुत्र आदित्य हुए जो तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान, पाकिस्तान, जम्मू कश्मीर, लद्दाख, नेपाल, भूटान, तिब्बत में बसे, यह क्षेत्र स्वर्ग कहलाता था।  ब्रह्मावर्त भी यही क्षेत्र कहलाता था।
इन्ही आदित्यों में से सप्तम आदित्य विवस्वान के पुत्र श्राद्ध देव के समय जल प्रलय हुआ जिसका वर्णन शतपथ ब्राह्मण में भी है और तनख (बाइबल ओल्ड टेस्टामेण्ट) में भी है।
इन श्राद्ध देव को महामत्स्य की कृपा से सभी मूल जीवों और ऋषियों सहित कश्मीर क्षेत्र में हिमालय के किसी शिखर पर सुरक्षित पहूँचाया।
इन्ही श्राद्ध देव को विवस्वान का पुत्र होने के कारण नामकरण वैवस्वत मनु हुआ । और इनके काल को वैवस्वत मन्वन्तर कहते हैं।इन वैवस्वत मनु की सन्तान सूर्य वंशी कहलाए; कश्यप ऋषि की सन्तान होने के कारण महर्षि कश्यप ने इन्हें कश्मीर में बसाया था। ये ऋषि सन्तान होने के कारण मनुर्भरतों के समान भारतीय मूल के ही थे। सूर्यवंश में इक्ष्वाकु वंश प्रमुख रहा। इक्ष्वाकु वंश में भी रघुवंश प्रमुख रहा। ये भी क्षत्रिय कहलाए। इस वंश की राजधानी अयोध्या थी।

भरत चक्रवर्ती की सन्तान मुनुर्भरतों में तृत्सु वंश में उत्पन्न दिवोदास और उनके पुत्र सुदास के समय टर्की से आये चन्द्रवंशी अनु, दुह, यदु, पुरु और तुर्वसु के वंशजों से सौ वर्ष तक दशराज युद्ध हुआ। इसमें वैवस्वत मनु की सन्तान आदित्यों ने दिवोदास और सुदास का साथ दिया। जबकि, सीरिया के नागों ने चन्द्रवंशियों का साथ दिया।

शत वर्षीय दशराज युद्ध में समझौता हुआ। इसके अन्तर्गत कश्मीर में बसे सूर्यवंशियों को अयोध्या सोपा गया। चन्द्र वंशियों को और नागों को कश्मीर में बसने की अनुमति दी गई।

हिमाचल प्रदेश, पञ्जाब, हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश, उत्तरी राजस्थान तथा उत्तरी मध्य प्रदेश (चम्बल,ग्वालियर सम्भाग) वाले क्षेत्र में दक्ष-प्रसुति, रुचि-आकुति और कर्दम-देवहुति का क्षेत्र था। यहाँ पञ्चायती राज व्यवस्था थी।

पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, मध्य भारत और गुजरात स्वायम्भुव मनु-शतरूपा का शासन क्षेत्र था। जिसमें गणतन्त्र था।
दक्षिण भारत में धर्म के पुत्र दृविण और उनकी सन्तानों का शासन था।
मनुर्भरतों वंश का स्वतन्त्र अस्तित्व समाप्त हो गया। अयोध्या वैवस्वत मन्वन्तर में सूर्यवंशियों की राजधानी बनी।
बाद में चन्द्रवंशी बिहार के गया क्षेत्र और झारखण्ड तरफ फैल गये।  जब नाग कश्मीर में प्रबल हो गये तो तो वे भी भारत के अन्य क्षेत्रों में यथा नगालैण्ड, मध्यभारत, नागपुर, राजस्थान तक फैल गये।
चन्द्रवंशियों ने प्रयागराज को राजधानी बनाया।
द्वापर युग में तो पहले हस्ति ने हस्तिनापुर बसाया फिर अजमीढ़ ने पुष्कर के पास अजमेरु (अजमेर) बसाया। पाण्डवों ने इन्द्रप्रस्थ बसाया। जिसे पृथ्वीराज चौहान ने दहली नाम दिया।
मनुर्भरतों का तो नाम ही नहीं रहा। किसी समय मनुर्भरतों को क्षत्रिय कहते थे। फिर सूर्य वंशी भी क्षत्रिय कहलाए। चन्द्रवंशियों का वर्चस्व बढ़ा तो भी क्षत्रिय कहलाने लगे। फिर नागों को भी क्षत्रिय मान लिया गया। जो अब कालबेलिया कहलाते हैं।

वेद ज्ञान परमात्मा में ही स्थित है, यह जानकर ही वेदपाठ करना सार्थक है।

ऋग्वेद १.१६४.३९

ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः।
यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते।।

अर्थ ---

वैदिक ज्ञान ऋचा अविनाशी अक्षर, सर्वव्यापी परम व्योम में, जिस में विश्व के समस्त देवता स्थित हैं या रहते हैं या हैं।
जो यह नहीं जानता, वह ऋग्वेद का क्या करेगा? अर्थात उसके द्वारा केवल वेद पाठ केवल दोहराना मात्र है। जो यह जानते हैं, वे ही परम अभेद (एकत्व) जानने वाले ज्ञानी हैं।

बुधवार, 26 नवंबर 2025

अहोरात्र में काल।

अहोरात्र में इतने काल होते हैं।⤵️
सूर्योदय, प्रातः, सङ्गव, मध्याह्न, अभिजित मुहूर्त, मध्याह्न काल, विजय मुहूर्त, अपराह्न काल, सायाह्न, सूर्यास्त, गोधुलि वेला, सायं सन्ध्या, प्रदोषकाल, रात्रि, मध्यरात्रि, महानिशा यानी महानिशिथ काल, उत्तर रात्रि, ब्रह्म मुहूर्त, प्रातः सन्ध्या, अरुणोदय काल। या फिर किसी लग्न विशेष ।

मानव जीवन के कर्तव्य ब्रह्म मुहूर्त में और रात्रि में शयन पूर्व परमात्मा का स्मरण, सर्वजन हिताय सेवा,दुसरों की गलती देख स्वयम् में सुधार और अधिकतम अर्जन।

मानव जीवन के कर्तव्य

परमात्मा किसी का भाग्य निर्धारित नहीं करता है।
प्रारब्ध तो अपने अनन्त जन्मों के कर्मों के सञ्चित में से इस जन्म में भोगे जा सकने वाले कर्मों का उदय मात्र है।
सत्सङ्ग और सत्कर्म से बड़े से बड़ा सञ्कट ऐसे निकल जाता है कि, कई बार तो पता भी नहीं चलता।
लेकिन कुसङ्गति में पड़े और अधर्मी को तो राज्य भी मिल जाए तो भी वह सुखी नहीं हो पाता है।
प्रातःकाल उठते से ही हरि स्मरण कर लो तो दिन भर हरिनाम संकीर्तन याद आता रहता है ‌
रात को सोते समय हरि स्मरण कर लो तो रात भर स्वप्न में भी भगवान के भजन ही चलते रहते हैं।
इसलिए सुबह से रात तक हरि बोल।

अधिकतम् अर्जन (कमाना) और सत्कर्मों में व्यय (खर्च) करना हमारा सामाजिक और राष्ट्रीय कर्तव्य है।
क्योंकि जैसे अड़ानी-अम्बानी धनार्जन कर रहे हैं तो, उनके बल पर राष्ट्रीय विकास हो रहा है। नौकरी करके या निवेश करके या अन्य प्रकार से समाज के लाखों लोग उनके कार्यों में सहयोग देकर स्वयम् भी सम्पन्न हो रहे हैं।
उन लोगों के बल बुते पर उनके घर काम करने वाले, उनके बच्चों को पढ़ाने वाले, उनका इलाज करने, हॉटेल-रेस्टोरेंट, गार्डन वाले, परिवहन वाले आदि अनेकानेक लोग स्वयम् की ग्रहस्थी चला पा रहे हैं।
और धन-सम्पदा साथ नहीं जाएगी का उपदेश देने वाले बाबा लोग उनसे और उनके सहयोगियों से करोड़ों रुपए की धन-सम्पदा लेकर खुद भी ऐश से जी रहे हैं और चेलों को भी एश करवा रहे हैं।😃

जो दूसरों के शुभाशुभ कर्म और उसके परिणाम स्वरूप उनके ऐश-आराम के बजाय उनके सुख-सन्तोष को देख कर शिक्षा ले वह स्वयम् में सुधार करके उत्तरोत्तर विकास कर जाता है,
इसके विपरित - कितना भी समझाने पर अपनी आदत के अनुसार ही कार्य करने वाले दासों, नौकरों को देखिए वे उत्तरोत्तर पतनोन्मुख ही होते जाते हैं।

गुरुवार, 20 नवंबर 2025

फलित ज्योतिष के अनुसार तलाक य पति-पत्नी में अनबन के कारण।


प्रायः जन साधारण मङ्गल के नाम से भयभीत हैं। और इसका लाभ पुरोहित वर्ग और उनके एजेंट ज्योतिष के नाम पर भय दोहन करने वाले उठाते हैं।
सन 1980 में नासिक के एक पण्डाजी ने कालसर्प दोष नामक नकली योग की खोज कर नागबलि करवा कर कालसर्प दोष की शान्ति का उपाय करवा कर भय दोहन करना शुरू किया।  आजकल काल सर्प दोष के नाम पर ठगी करते हैं।   
आर्किटेक्ट जिसे संस्कृत में वास्तुशास्त्र कहते हैं, उस वास्तुशास्त्र के अनजान लोगों को वास्तु के नाम पर भय दोहन करते हैं ।

दाम्पत्य जीवन में कष्ट के कारण --
कुण्डली में  कुण्डली का सातवाँ खाना जिसमें कोई भी अंक लिखा हो वह सप्तम भाव पति या पत्नी / जीवन-साथी, और विवाह का सूचक है।
सप्तम भाव का सप्तम भाव होने से  कुण्डली का पहला खाना जिसमें कोई भी अंक लिखा हो वह लग्न भाव भी विवाह सूचक है।
द्वितीय भाव दुसरे विवाह को दर्शाता है। तो दुसरे भाव से दुसरा भाव होने से तृतीय भाव भी द्वितीय विवाह का सूचक है। कभी-कभी एक पत्नी के रहते दूसरा विवाह भी तलाक का कारण बन जाता है। द्वितीय भाव सम्पत्ति का सूचक भी है। धन सम्पत्ति के लालच में कुछ लोग धन खोदने जैसी मुर्खतापूर्ण कार्य करने के चक्कर में तान्त्रिकों के चक्कर में फँसकर गृहस्थी बर्बाद कर लेते हैं।
पञ्चम भाव, जीवन-आनन्द (Please of life) और काम-सुख का सूचक है। व्यक्ति व्यभिचारी हो सकता है। और एकाधिक योन सम्बन्ध स्थापित कर दाम्पत्य जीवन नष्ट कर सकता है।
अष्टम भाव लिङ्ग (स्त्री या पुरुष की पहचान करवाने वाला अङ्ग) का सूचक है।
अति कामुकता शारीरिक अक्षमता का कारण बन कर तलाक का कारण बन सकता है।
नवम भाव बिना कर्म किए भाग्य से मिलने वाले सुख अर्थात भाग्य का सूचक है। भारत में पति को पत्नी का सौभाग्य (सुहाग) माना जाता है। जिसका पति जीवित है, वह स्त्री सौभाग्यवती (सुहागिन) कहलाती है। अतः स्त्री की कुण्डली में नवम भाव भी महत्वपूर्ण है।
लेकिन भाग्य भरोसे बैठने वाले पति परिवार का समुचित भरण-पोषण नहीं कर पाते हैं और व्यक्ति लालच में आकर टोने-टोटके और तान्त्रिकों के चक्कर में फँस कर घर गृहस्थी बर्बाद कर बैठते हैं। यह भी तलाक का कारण बन सकता है।
एकादश भाव आय और लाभ का सूचक है। विवाह द्वारा परिवार में एक सदस्य बढ़ता है,  लेकिन पति पर उत्तरदायित्व बढ़ जाता है, इसलिए वह अधिकतम आय अर्जित कर पत्नी और बच्चों तथा मात-पिता आदि की सुख-सुविधाओं के लिए अधिकतम धनार्जन करने के चक्कर में परिवार वालों को समय नहीं दे पाता, और परिवार में मतभेद, क्लेश-कलह उत्पन्न हो जाते हैं। और तलाक हो जाता है। निकाह और अन्य कई फिल्मों में यह तथ्य दिखाया गया है।
अर्थात एकादश भाव जो आवक का भाव है वह भी तलाक का कारण बन सकता है।
या कभी-कभी व्यक्ति लालच में आकर टोने-टोटके और तान्त्रिकों के चक्कर में फँस कर घर गृहस्थी बर्बाद कर बैठते हैं।

द्वादश भाव शय्या सुख (आराम, भोग, और व्यभिचार ) का सूचक है। अत्यधिक कामुकता भी पति-पत्नी में दूरियाँ उत्पन्न कर देती है। ता तो जीवनसाथी परेशान हो जाता है या असन्तुष्ट रहकर कर अवसाद ग्रस्त हो जाता है।
ऐसे में कुछ लोग टोने-टोटके और तान्त्रिकों के चक्कर में फँस कर घर गृहस्थी बर्बाद कर बैठते हैं।

इन (2, 7, 8, 9, 11 और 12) भावों में स्थित ग्रह, इन (2, 7, 8, 9, 11 और 12) भावों में लिखे राशि के अङ्क का स्वामी ग्रह, इन भावों में स्थित ग्रहों के नक्षत्र में स्थित ग्रह, और इन (2, 7, 8, 9, 11 और 12) भावों में लिखे राशि के अङ्क का स्वामी ग्रह के नक्षत्र में स्थित ग्रहों में से वक्री या अस्त ग्रह के नक्षत्र में स्थित ग्रह तथा जो ग्रह स्वयम् वक्री या अस्त हो उन ग्रहों को छोड़कर शेष ग्रह विवाह और पति - पत्नी और विवाह के सूचक ग्रह होते हैं।
इनकी दशा/ अन्तर्दशा/ प्रत्यन्तर दशा में जब ये विवाह सूचक ग्रह गोचर में इन्हीं विवाह सूचक भावों में और इन विवाह सूचक ग्रहों के राशि नक्षत्र में में भ्रमण करते हैं तब विवाह होता है। इन राशियों/नक्षत्रों और ग्रहों के स्वभाव, दिशा, स्थान आदि तथा राशियों/नक्षत्रों और ग्रहों के स्वभाव आदि के अनुसार ही पति/ पत्नी (जीवन-साथी) मिलता है।
इसी प्रकार इन भावों से षष्ठ (शत्रु या रोग के सूचक), अष्टम ( मृत्यु या दुर्घटना का सूचक) और द्वादश (दूरी, व्यय और हानि का सूचक) भाव में में स्थित ग्रह, इन भावों में लिखे राशि के अङ्क का स्वामी ग्रह, इन भावों में स्थित ग्रहों के नक्षत्र में स्थित ग्रह, और इन  भावों में लिखे राशि के अङ्क का स्वामी ग्रह के नक्षत्र में स्थित ग्रहों में से वक्री या अस्त ग्रह के नक्षत्र में स्थित ग्रह तथा जो ग्रह स्वयम् वक्री या अस्त हो उन ग्रहों की दशा/ अन्तर्दशा/ प्रत्यन्तर दशा में जब ये तलाक या मृत्यु के सूचक ग्रह गोचर में इन्हीं तलाक या मृत्यु  सूचक भावों में और इन तलाक या मृत्यु  सूचक ग्रहों के राशि नक्षत्र में में भ्रमण करते हैं तब तलाक या मृत्यु होता/ होती है।
सप्तम भाव का द्वादश भाव षष्ठ भाव है। जो झगड़ा करवाना, शत्रु पैदा करवाना आदि का सूचक है।
सप्तम भाव का सप्तम (मारक भाव) लग्न है जो  अहंकार को चोंट पहूँचने के कारण विवाह विच्छेद सूचित करता है।
सप्तम भाव का द्वितीय भाव अष्टम भाव (सम्पत्ति का भाव) है, जो दहेज की मांग के कारण सम्बन्ध विच्छेद दर्शाता है।
सप्तम भाव का अष्टम भाव (द्वितीय भाव) जीवन-साथी की मृत्यु की स्थितियाँ और कारण दर्शाता है।
ऐसे ही सप्तम भाव से द्वितीय (अष्टम भाव)और सप्तम भाव ( लग्न) की दशा, अन्तर्दशा, प्रत्यन्तर दशा जीवन-साथी की मृत्यु का समय दर्शाती है।
इसी प्रकार देख सकते हैं।

इसी प्रकार ग्रहों के स्वभाव भी तलाक का या अनबन का कारण दर्शाते हैं।
सूर्योदय के समय जन्में बच्चों में -- लग्न में सूर्य।
जैसे --
सूर्यदेव का तेज उनकी पत्नी सरण्यु (संज्ञा) सहन नहीं कर पाई। और सूर्यदेव को छोड़कर चली गई। (अश्विनी के रूप में बाद में मिली। तब अश्विनी कुमार हुए।)
हनुमान जी ने विवाह नहीं किया।
ऐसे ही तलाक की सम्भावना बनती है।

सूर्यास्त के समय जन्में बच्चों में भगवान नृसिंह के समान क्रोधी स्वभाव कष्टकारी होकर क्रोध के कारण एसीडिटी बढ़ती है। गेस के कारण क्षमता कम हो जाती है। तलाक करवा देता है। 

चन्द्रमा -- सत्ताइस पत्नियों में से केवल रोहिणी के साथ ही लगाव रहने के कारण श्वसुर दक्ष प्रजापति (द्वितीय) द्वारा शाप देने के कारण क्षय रोग ग्रस्त हो गये।
स्वयम् की सत्ताईस पत्नियाँ होते हुए देवगुरु ब्रहस्पति की पत्नी तारा का हरण कर लिया और बुध को जन्म दिया।
मतलब व्यभिचारी प्रवृत्ति के कारण अलगाव हो जाता है।
स्त्री का मायके वालों से ही लगाव और ससुराल वालों से द्वेष का स्वभाव।

बुध -- नपुंसक ग्रह है। इसलिए अक्षमता अलगाव का कारण बनता है।

गुरु ब्रहस्पति -- जहाँ बेठता है, वहाँ की हानि करता है।
स्वयम् की पत्नी (तारा) को नहीं सम्भाल पाये। तारा को चन्द्रमा हरण कर ले गया। और बुध को जन्म दिया।
ऐसे ही सप्तम भाव का गुरु गृहस्थ जीवन में विशेष रुचि नहीं होने के कारण दाम्पत्य सम्बन्ध खराब कर देता है।
पति का अपने परिवार वालों से ही लगाव और ससुराल वालों से द्वेष का स्वभाव।

शुक्र -- अत्यधिक काल्पनिक, फिल्म नवरङ्ग जैसे कवि, चित्रकार, मूर्तिकार, गायक, नर्तक, अभिनेता होने के कारण दाम्पत्य जीवन में सफल नहीं होते।
प्रायः अभिनेताओं - अभिनेत्रियों मे तलाक अधिक देखे जाते हैं।
कुटील स्वभाव, दुष्ट सङ्गति भी दाम्पत्य जीवन में बाधक होता है।
द्वादश भावस्थ शुक्र व्यभिचारी बनाता है।
स्त्री हो या पुरुष दोनों का अपने स्वजनों से ही लगाव और ससुराल वालों से द्वेष का स्वभाव।

शनि -- कठोर अनुशासन, न्याय के लिए दण्ड देने की प्रवृत्ति दाम्पत्य जीवन सफल नहीं होने देती।
हत्या- मार-पीट कुछ भी कर सकते हैं।
ससुराल वालों से द्वेष का स्वभाव।

राहु -- भ्रम, भ्रमित करने का स्वभाव, अत्यधिक छल-कपट, षड़यंत्र करना, नीच सङ्गति, जुआ-सट्टा में ही दिमाग व्यस्त रहना आदि कारणों से दाम्पत्य जीवन में पूर्ण असफलता पैदा करता है।
परिवार वालों के प्रति द्वेष का स्वभाव।


केतु -- त्याग प्रवृत्ति, पत्नी का विवाह पत्नी के पूर्व प्रेमी या विवाहेतर सम्बन्ध रखने वाली पत्नी का उसके प्रेमी से विवाह करवाने वाले, घर बेंच कर तीर्थ करने वाले। भक्त नृसिंह मेहता जैसे लोगों का दाम्पत्य जीवन में लगाव ही नहीं होता।
इसलिए तलाक हो जाता है।
द्वादश भावस्थ केतु -- केतु के नक्षत्र में स्थित ग्रह की दशा -अन्तर्दशा में व्यक्ति, नौकरी - धन्धा, या घर गृहस्थी कुछ भी छोड़ देता है। तलाक भी हो सकता है।
परिवार वालों के प्रति द्वेष का स्वभाव।

सोमवार, 17 नवंबर 2025

ॐ विष्णवे नमः ही क्यों लिखता हूँ?

🙏🏼 ॐ विष्णवे नमः।🙏🏼

श्रीरामचन्द्र जी के परम भक्त महाकवि, महा नीतिज्ञ तुलसीदास जी महाराज जी के जीवन की यह घटना मुझे सदैव प्रेरणा देती रही है।
जब सन्त तुलसीदास जी को छल पूर्वक ज्ञान गोदड़ी नामक स्थान पर श्रीकृष्ण मन्दिर ले गये।
तुलसीदास जी केवल श्री रामचन्द्र जी के रूप में ही सर्वत्र परमात्मा के दर्शन करना पसन्द करते थे।
लेकिन जैसे ही तुलसीदास जी की दृष्टि मन्दिर में स्थापित प्रतिमा पर पड़ी तो वे हतप्रभ रह गए।
और उन्होंने भगवान से निवेदन किया कि,
*कहा कहो छवि आपकी, भले बिराजे नाथ ।*
*तुलसी मस्तक तब नवै, धनुष बाण लो हाथ॥*

तत्काल ही भगवान ने भक्त की भावना को आदर देते हुए प्रतिमा का स्वरूप बदल दिया। और

 *कित मुरली कित चन्द्रिका कित गोपियन को साथ।*
*अपने जन के कारणे श्री कृष्ण भये रघुनाथ ॥*
मुझे यह भी भली-भांति स्मरण रहता है कि,
*तुलसी नर का क्या बड़ा? समय बड़ा बलवान।*
*भीलां लूटी गोपियाँ वही अर्जुन वही बाण ||*

इसलिए ईश्वरार्पण होकर भगवान से यही प्रार्थना करता हूँ कि, मेरी आस्था परमात्मा के ॐ सञ्कल्प के साथ प्रकट हुए परमात्मा के परब्रह्म स्वरूप जिसे मानवीय बुद्धि के अनुसार परम पुरुष, परमेश्वर, सर्वव्यापी भगवान विष्णु और उनकी माया शक्ति के रूप में जानते हैं।
बस उसी स्वरूप में मेरी मति स्थिर रहे।
🙏🏼

राशि और वार मिश्र, पश्चिम तुर्कीये, बेबीलोन (इराक) और तुर्किस्तान की खोज है, भारत में आचार्य वराहमिहिर ने परिचय करवाया।

मिश्र,  पश्चिम टर्की (जिसे यूरोपीय लोग ग्रीक सभ्यता कहते हैं),इराक के बेबीलोन, और तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, कज़ाकस्तान,  किर्गिस्तान, और तिब्बत के शिनजियांग प्रांत  में प्रचलित 30° वाली मेष, वृषभ आदि राशियाँ  तथा 19 वर्षीय चक्र वाले सायन सौर संक्रान्ति आधारित चान्द्र वर्ष और रविवार- सोमवार आदि वार प्रचलित थे। 
तिब्बत के शिनजियांग प्रांत के निवासी शक और कुषाणों को भारतीय शक कहते थे। ये लोग अफगानिस्तान से लगे ईरान के पूर्वी भाग में भी बस गए थे इसलिए उस क्षेत्र के निवासी आचार्य वराहमिहिर को भी शक माना जाता है।
आज के 2082 वर्ष पहले सम्राट विक्रमादित्य के राज ज्योतिषी आचार्य वराहमिहिर ने  भारत में 30° वाली मेष, वृषभ आदि निरयन राशियाँ  तथा 19 वर्षीय चक्र वाले निरयन सौर संक्रान्ति आधारित चान्द्र वर्ष और रविवार- सोमवार आदि वार प्रचलित किये थे। 

लेकिन हरियाणा के कुरुक्षेत्र के आस-पास के गोड़ प्रदेश और मालवा प्रान्त के निवासी नाबोवाहन के पुत्र गन्धर्वसेन महेन्द्रादित्य  सोनकच्छ के पास गन्धर्वपुरी के राजा हुए। उनकी पत्नी सोम्यदर्शना  वीरमती के पुत्र उज्जैन के राजा भृतुहरि के अनुज विक्रमसेन ने  सम्राट विक्रमादित्य के रूप में राज्याभिषेक के अवसर पर पञ्जाब-हरियाणा में प्रचलित निरयन सौर मेष-वृषभ मास वाला निरयन सौर विक्रम संवत प्रचलित किया। 
विक्रम संवत 135 के बाद मथुरा से कुषाण वंशीय राजाओं ने उत्तर भारत में तथा  महाराष्ट्र के नासिक के पास पैठण से सातवाहन वंशीय राजाओं ने दक्षिण भारत और मध्य भारत में 19 वर्षीय , 122 वर्षीय और 141 वर्षीय चक्र वाले निरयन सौर संक्रमण आधारित चान्द्र वर्ष शालिवाहन शक संवत चलाया।
इसके पहले तीस अंश वाली मेष-वृषभ राशियाँ और रविवार-सोमवार आदि वार भारत में प्रचलित नहीं थे।

तिथियों के देवता -
1 प्रतिपदा के अग्नि देव, 
2 द्वितीय के ब्रह्मा जी, 
3 तृतीया की गौरी, 
4 चतुर्थी के गणेश, 
5 पञ्चमी के नागदेव, 
6 षष्टी के कुमार कार्तिकेय, 
7 सप्तमी के सूर्य, 
8 अष्टमी के शिव, 
9 नवमी की दुर्गा देवी, 
10 दशमी के यमराज 
11 एकादशी के विश्वेदेवाः, 
12 द्वादशी के विष्णु भगवान, 
13 तृयोदशी के कामदेव, 
14 चतुर्दशी के शंकर ,
15 पूर्णिमा के चन्द्रदेव और 
30 अमावस्या के देवता पितरः हैं । अतः  तिथियों को उनके देवता की ही पूजा करते थे।
लेकिन 
सोशल मीडिया पर और उसके प्रभाव से व्यवहार में भी एक विचित्रता देखने में आती है कि, 
दैनिक और व्यावहारिक जीवन में वारों का महत्व अत्यधिक बढ़ रहा है। 

आजकल रविवार को सूर्यदेव का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे सब देवता गौण हो जाते हैं।
सोमवार को शंकर जी का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे देवता गौण हो जाते हैं ।
मङ्गलवार को हनुमान जी का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे सब देवता गौण हो जाते हैं ।
बुधवार के देवता भगवान विष्णु हैं; लेकिन बुधवार को विनायक गजानन का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे सब देवता गौण हो जाते हैं। 
दुसरे देवता गौण हो जाते हैं ।
गुरुवार के देवता ब्रह्मा जी हैं, लेकिन गुरुवार को भगवान विष्णु या नारायण श्रीहरि  का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे सब देवता गौण हो जाते हैं ।
शुक्रवार को लक्ष्मी जी  का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे सब देवता गौण हो जाते हैं ।और
शनिवार को शनि देव के साथ हनुमान जी और हनुमान जी के साथ भगवान श्री रामचन्द्र जी का भी  का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे सब देवता गौण हो जाते हैं ।
सोमवार को शिव मन्दिर में भीड़, मङ्गलवार को  महाराष्ट्र कर्नाटक तेलङ्गाना, आन्ध्र प्रदेश तमिलनाडु और केरल में विनायक गजानन मन्दिर में और मालवा में हनुमान मन्दिर में भीड़, 
बुधवार को मालवा में विनायक गजानन मन्दिर में भीड़।
गुरुवार को श्रीकृष्ण मन्दिर या श्रीराम मन्दिर में भीड़,
शुक्रवार को लक्ष्मी मन्दिर में भीड़, और शनिवार को शनि मन्दिर और हनुमान मन्दिर में भीड़ हो जाती है।
लेकिन अन्य दिनों में ये मन्दिर सुनसान रहते हैं।

शनिवार, 15 नवंबर 2025

मानव जीवन के कर्तव्य


परमात्मा किसी का भाग्य निर्धारित नहीं करता है।
प्रारब्ध तो अपने अनन्त जन्मों के कर्मों के सञ्चित में से इस जन्म में भोगे जा सकने वाले कर्मों का उदय मात्र है।
सत्सङ्ग और सत्कर्म से बड़े से बड़ा सञ्कट ऐसे निकल जाता है कि, कई बार तो पता भी नहीं चलता।
लेकिन कुसङ्गति में पड़े और अधर्मी को तो राज्य भी मिल जाए तो भी वह सुखी नहीं हो पाता है।
प्रातःकाल उठते से ही हरि स्मरण कर लो तो दिन भर हरिनाम संकीर्तन याद आता रहता है ‌
रात को सोते समय हरि स्मरण कर लो तो रात भर स्वप्न में भी भगवान के भजन ही चलते रहते हैं।
इसलिए सुबह से रात तक हरि बोल।

अधिकतम् अर्जन (कमाना) और सत्कर्मों में व्यय (खर्च) करना हमारा सामाजिक और राष्ट्रीय कर्तव्य है।
क्योंकि जैसे अड़ानी-अम्बानी धनार्जन कर रहे हैं तो, उनके बल पर राष्ट्रीय विकास हो रहा है। नौकरी करके या निवेश करके या अन्य प्रकार से समाज के लाखों लोग उनके कार्यों में सहयोग देकर स्वयम् भी सम्पन्न हो रहे हैं।
उन लोगों के बल बुते पर उनके घर काम करने वाले, उनके बच्चों को पढ़ाने वाले, उनका इलाज करने, हॉटेल-रेस्टोरेंट, गार्डन वाले, परिवहन वाले आदि अनेकानेक लोग स्वयम् की ग्रहस्थी चला पा रहे हैं।
और धन-सम्पदा साथ नहीं जाएगी का उपदेश देने वाले बाबा लोग उनसे और उनके सहयोगियों से करोड़ों रुपए की धन-सम्पदा लेकर खुद भी ऐश से जी रहे हैं और चेलों को भी एश करवा रहे हैं।😃

जो दूसरों के शुभाशुभ कर्म और उसके परिणाम स्वरूप उनके ऐश-आराम के बजाय उनके सुख-सन्तोष को देख कर शिक्षा ले वह स्वयम् में सुधार करके उत्तरोत्तर विकास कर जाता है,
इसके विपरित - कितना भी समझाने पर अपनी आदत के अनुसार ही कार्य करने वाले दासों, नौकरों को देखिए वे उत्तरोत्तर पतनोन्मुख ही होते जाते हैं।


शुक्रवार, 14 नवंबर 2025

अष्टमी, एकादशी, पूर्णिमा और अमावस्या आदि पर व्रत क्यों रखते हैं?

वास्तविकता यह है कि, दोनों अष्टमी तिथि (अर्ध चन्द्रमा) के समय भूमि के केन्द्र पर सूर्य और चन्द्रमा 90° का कोण बनाते हैं।
शुक्ल पक्ष की दशमी समाप्ति और एकादशी प्रारम्भ के समय सूर्य और चन्द्रमा 120° का कोण बनाते हैं। यही स्थिति कृष्ण पक्ष में पञ्चमी तिथि समाप्ति पर बनती है) लेकिन कृष्ण पक्ष की एकादशी को 60° या 300° का कोण बनता है।
इसलिए नारद पुराण में शुक्ल पक्ष की एकादशी को अधिक महत्व दिया है। और एकभक्त- एकासना (एक बार ही बिना आसन से उठे भोजन करना।) करने को लिखा है।
 इसी प्रकार पूर्णिमा तिथि समाप्ति पर सूर्य और चन्द्रमा 180° का सरल कोण बनाते हैं।और
अमावस्या तिथि समाप्ति पर 000° का कोण बनाते हैं।
इसलिए अर्ध चन्द्र के समय , शुक्ल पक्ष की एकादशी प्रारम्भ के समय और कृष्ण पक्ष की पञ्चमी तिथि समाप्ति के समय तथा पूर्णिमा समाप्ति के समय सूर्य और चन्द्रमा के बल अलग-अलग दिशाओं में खींचते हैं। और अमावस्या समाप्ति के समय सूर्य और चन्द्रमा दोनों का बल एक ही दिशा में खींचता है।
भौतिकी के बल समानान्तर चतुर्भुज के नियम आदि के अनुसार इस खींच-तान का प्रभाव भूमि के सागरों पर पड़ता है जिससे ज्वार-भाटा उत्पन्न होते हैं।
परिणाम स्वरूप भूमि की घूर्णन गति तथा परिभ्रमण पर भी पड़ता है।
इन सब का प्रभाव मानव मन पर भी पड़ता है, जिसे लुनेटिक लोगों पर स्पष्ट देखा जा सकता है।
इस कारण पाचनशक्ति कमजोर हो जाती है, चित्त भ्रम होते है, इसलिए आपराधिक मानसिकता उत्पन्न होती है।
इनसे बचाव हेतु, लङ्घन (भूखे रहना) और आराधना-उपासना में दिन व्यतीत करना, जागरण (अलर्ट रहना) आदि के निर्देश धर्मशास्त्रों में दिये गए हैं।

क्या जनन अशोच, मरण अशोच में एकादशी व्रत का पारण हो सकता है?

व्रत पालन मतलब नियम पालन।
जब जिसके माता-पिता का देहान्त होता है वह पुत्र तेरह दिनों तक विष्णु पूजा करता है जिसे घर के बाहर रखे पापा विष्णु की पूजा दस दिन करना कहते हैं, उसे जल चढ़ाना मतलब स्नान करवाना, स्वयम् के द्वारा पकाये भोजन का नैवेद्य अर्पित करना, धूप देना मतलब अग्निहोत्र करना, गरुड़ पुराण सुनना मतलब शास्त्र श्रवण करना आदि सभी कर्म करना होता है तो, नित्य कर्म (वैदिक धर्म-कर्म मतलब पञ्च महायज्ञ) का निषेध कैसे हो सकता है? 
हाँ, अवैदिक कर्म - तन्त्रोक्त कर्म, यथा - मूर्ति पूजन अवश्य निषेध है।

मृतक के निमित्त एकादशी व्रत का संकल्प लिया जाता है अन्य किसी व्रत का संकल्प नहीं दिलाया जाता, वही एकादशी व्रत कैसे छोड़ा जा सकता है?

एकादशी व्रत का सामान्य नियम यह है कि, एकादशी के पूर्व दिन सूर्यास्त पश्चात भोजन त्याग कर पारण समय में पारण करने पर ही एकादशी व्रत पूर्ण होता है। अन्यथा व्रत भङ्ग माना जाता है। यह नियम सभी व्रतों में सामान्य (कामन) है।
तो, 
सूतक में भी निष्काम व्रत पालन अवश्य ही करना चाहिए यह तो समझ आता है लेकिन सूतक में पारण नहीं होता यह उल्टा ज्ञान है।

कभी-कभी एकादशी व्रत का पारण हरिवासर समाप्त होने के बाद भी सीधे अपराह्न काल में ही क्यों बतलाया जाता है?

एक सामान्य जिज्ञासा होती है कि,
*कभी-कभी द्वादशी तिथि का एक चौथाई भाग अर्थात हरिवासर समाप्त होने के भी बाद भी पारण क्यों नहीं कर सकते?
उसका कारण यह है कि,

 *पारण (ब्रेक फास्ट) या तो प्रातः काल में (नाश्ते के समय) होता है या फिर भोजन के समय अपराह्न काल में होता है।* 
क्योंकि भोजन का समय अपराह्न काल को ही माना गया है। 
*क्योंकि वैदिक काल में लोग पूरे अहोरात्र में प्रायः अपराह्न काल में एक बार ही भोजन करते थे।*
मतलब 
*आज की भाषा में समझें तो प्रात काल में ब्रेक फास्ट (नाश्ता) और अपराह्न काल में लञ्च (भोजन) करते थे। डीनर (रात्रि भोज) निषिद्ध है। इसलिए सूर्यास्त के बाद खाने का प्रश्न ही नहीं।* 

सूर्योदय के पहले ब्रह्म मुहूर्त में सन्ध्या होती है, सावित्री (गायत्री) मन्त्र जप पूर्ण कर उदयिमान सूर्य को अर्घ्य देकर अतिथि यज्ञ और दान करके व्रत का पारण होता है।

मध्याह्न पूर्व भी सन्ध्या करके गायत्री मन्त्र जप करके ठीक मध्याह्न में सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
सायाह्न में भी सन्ध्या करके, गायत्री मन्त्र जप पूर्ण कर के सूर्यास्त समय अस्त हो रहे सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद वैदिक कर्म नहीं किए जाते हैं।
इस कारण गोधुलि लग्न में पाणी ग्रहण संस्कार भी उचित नहीं है। क्योंकि इस समय यदि पाणी ग्रहण संस्कार किया जाएगा तो सायाह्न सन्ध्या छूट जाएगी।

वास्तव में महाभारत युद्ध के बाद पौराणिक काल में सभी विद्वानों और धर्मी राजाओं की मृत्यु हो जाने के कारण गुरुकुल समाप्त होने लगे थे। इसलिए ज्योतिष में वेध लेना बन्द हो गया। सिद्धान्त ज्योतिष गणिताध्याय और गोलाध्याय (खगोल) के जानकार समाप्त होने लगे। इसलिए तिथियों और करण तथा असमान विस्तार वाले सत्ताइस नक्षत्रों का ठीक-ठीक प्रारम्भ और समाप्ति समय ज्ञात नहीं हो पाता था। इसलिए लगभग एक चौथाई द्वादशी तिथि (लगभग 06 घण्टे) की त्रुटि सम्भावित मान कर इसे हरिवासर मान कर इस अवधि में व्रत का पारण निषेध किया गया था। लेकिन अब पुनः एस्ट्रोनॉमी का अच्छा विकास हो गया है। ग्रह गणित और तिथि, करण और नक्षत्रों के प्रारम्भ और समाप्ति का समय ठीक-ठीक गणना होने लगी है इसलिए दशमी भेद और हरिवासर में पारण नहीं करना के नियम पालन अनावश्यक हो गया है।

उदाहरण देखिए ---

दिनांक 16 नवम्बर 2025 रविवार को इन्दौर में 

*प्रातः काल सूर्योदय 06:41 से 08:53 बजे तक।* फिर 

सङ्गव काल 08:53 से 11:05 तक । फिर 

मध्याह्न काल 11:05 से दोपहर 01: 17 बजे तक । जिसमें मध्याह्न सन्ध्या होती है। और इसके बाद भोजन का समय

*अपराह्न काल दोपहर 01:17 बजे से दोपहर 03:29 बजे तक रहेगा।*

तदुपरान्त  
सायाह्न काल दोपहर 03:29 से 05:41 सूर्यास्त तक। रहेगा। जिसमें पुनः सन्ध्या होती है।

गुरुवार, 13 नवंबर 2025

सायन गणना, नक्षत्रिय पद्धति, निरयन और सावन गणना सभी दर्शाने वाली पञ्चाङ्ग/ केलेण्डर ही उचित हैं।

श्री रामचन्द्र जी के जन्म के समय के सम शितोष्ण ऋतु का वर्णन, ऋषि पञ्चमी पर अपामार्ग के पानी से स्नान करना, बालध ककड़ी खाना, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन यमुना नदी में बाढ़ आने का वर्णन, नवरात्र  और शरद पूर्णिमा शब्दों में ही ऋतु का उल्लेख होना, पञ्च दिवसीय दीपावली उत्सव में पूजन सामग्री में ज्वार के भुट्टे और गन्ने, सिंघाड़ा आदि का प्रयोग (नव धान्येष्टि), मकर संक्रान्ति पर तिल-गुड़ का प्रयोग, शिवरात्रि पर शिवजी को बदरीफल (बेर) अर्पित करना, होली पर गेंहू की बालियों का होला सेकना, (नव सस्येष्टि) तथा अमान्त चैत्र कृष्ण एकादशी वरूथिनी एकादशी को खरबुजा का फलाहार।
अमान्त वैशाख कृष्ण एकादशी अपरा एकादशी को खरबुजा ( या ककड़ी) का फलाहार।
अमान्त ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी कमला एकादशी को दाख का फलाहार।
ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी निर्जला एकादशी को आम का फलाहार।
श्रावण शुक्ल एकादशी पवित्रा एकादशी को सिंघाड़ा का फलाहार।
 भाद्रपद शुक्ल एकादशी जलझूलनी एकादशी को बालन ककड़ी का फलाहार।
आश्विन शुक्ल एकादशी पापाङ्कुशा एकादशी को फुट काचरी का फलाहार।
अमान्त आश्विन शुक्ल एकादशी पापाङ्कुशा एकादशी को केला का फलाहार।
अमान्त कार्तिक शुक्ल एकादशी सफला एकादशी को तिल शकर का फलाहार।
माघ शुक्ल एकादशी जया एकादशी को गन्ने का रस का फलाहार।
फाल्गुन शुक्ल एकादशी आमलकी एकादशी को आँवला का फलाहार।
संवत्सर की प्रथम ऋतु वसन्त ऋतु होना, शरद ऋतु में ही शरद पूर्णिमा हो सकती है, सायन तुला संक्रान्ति का सम्बन्ध देवताओं की रात्रि प्रारम्भ होने से नवरात्र कहलाना,
ये सब बातें व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहारों का ऋतु आधारित होना प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है।
इसलिए मधु-माधव आदि सायन सौर मासों की संक्रान्तियों पर आधारित चान्द्र मासों में ही उक्त व्रत, पर्व उत्सव और त्यौहार मनाए जाना चाहिए।
सायन मतावलम्बियों के पक्ष में इतने सारे प्रमाण है।
लेकिन रामनवमी पर पुनर्वसु नक्षत्र पर चन्द्रमा होना, श्रीरामचन्द्र जी का राज्याभिषेक चैत्र शुक्ल पक्ष में पूष्य नक्षत्र पर चन्द्रमा होना, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को अमान्त श्रावण कृष्ण अष्टमी को चन्द्रमा रोहिणी नक्षत्र पर होना, भाद्रपद शुक्ल द्वादशी वामन जयन्ती को श्रवण नक्षत्र पर चन्द्रमा होना, बङ्गाल में नवरात्र में सरस्वती आह्वान, पूजन, बलिदान और विसर्जन में चन्द्रमा के नक्षत्र का ही महत्व होना, शिवरात्रि के दिन बहेलिए द्वारा सारी रात मृगशीर्ष नक्षत्र के तारे और लुब्धक (व्याघ) को देखना तथा पश्चिम और मध्य भारत को छोड़कर शेष उत्तर भारत, पूर्वी भारत, बाङ्ग्ला देश और दक्षिण भारत में निरयन सौर संक्रमण से प्रारम्भ होने वाले मेष-वृषभादि मास, वैशाखी, विषु, माघ बिहू आदि पर्व, तथा मेष-वृषभादि मासों में चन्द्रमा के नक्षत्र के अनुसार ही रामनवमी, श्रीकृष्ण जन्मोत्सव और वामन जयन्ती ओणम पर्व वैदिक काल में सायन सौर मधु-माधव आदि मासों में चन्द्रमा किसी विशेष नक्षत्र के साथ होने के आधार पर ही व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार तथा शुभ कार्यारम्भ और पूर्णाहुति करने का स्मरण करवाते हैं।
ये सभी तथ्य नक्षत्रिय पद्धति के पक्ष में तर्क हैं।
वर्षान्त में  वर्षान्त के पाँच दिन पहले दशा पूजन सावन वर्ष को सायन सौर वर्ष से समायोजित करने का उपक्रम है। ठीक इसी प्रकार दीपावली से लाभ पञ्चमी तक गुजरात में अवकाश रहना भी पारसियों के समान सावन वर्ष को सायन सौर वर्ष से समायोजित करने की व्यवस्था है।
इस लिए आदर्श पञ्चाङ्ग वहीं जो सायन संक्रान्ति आधारित सौर और सौर चान्द्र मास, निरयन संक्रमण और निरयन संक्रमण आधारित सौर मास सौर चान्द्र मासों और सावन वर्ष-मासों तथा दशाह के वासर इन तीनों को दर्शाता हो।

बुधवार, 12 नवंबर 2025

वेदों में लिङ्ग पूजक शिश्नेदेवाः से रक्षा हेतु महर्षि वशिष्ठ जी द्वारा इन्द्र से प्रार्थना।

*ऋग्वेद, मंडल 07, सूक्त 21, मंत्र 05 का अर्थ और व्याख्या*

प्रसङ्ग और सन्दर्भ ---
*ऋग्वेद सप्तम मण्डल/ सूक्त 21 मन्त्र 05 में कहा है कि,*
मन्त्र ---
*न यातव इन्द्र जुजुवुर्ना न वन्दना शविष्ठ वेद्यभि।न श्रीरर्द्धयो विष्णुनस्य जन्तोर्मा शिश्नदेवाः अपि गुऋतम् नः।।*

 *ऋषि वसिष्ठ इंद्र से शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधान अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि शत्रुओं से सुरक्षा की प्रार्थना कर रहे हैं।*

मन्त्र का अर्थ ---

*"हे बलवान इंद्र!* 
(दुष्ट, कृतघ्न, अधार्मिक, विलासी) *शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधानों * अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि) शत्रुओं से हमारी रक्षा कीजिए।*
*लिङ्गपूजक असूर लोग हमें परेशान न कर सकें; उन पर हमारी दृष्टि पड़ने, उनकी छाया पड़ने, उनके स्पर्श दोष से, हमारी समृद्धि को आधी न हो पाए। हे सर्वव्यापी विष्णु देव! उनसे हमारी रक्षा कीजिए।*

शब्दार्थ:
1. *यातवः* – यातुधान अर्थात (दुष्ट,पीड़क,शत्रु) *असुर दैत्य, दानव, राक्षस।* 
2 *शविष्ठ* – *अत्यंत बलवान* , (इन्द्र का विशेषण)।
 3 *वेद्यभिः* – *ज्ञानी, विद्वान*,(इन्द्र का विशेषण)।
4 *इन्द्र* – *देवताओं के राजा* (शक्ति के प्रतीक) ।
5. *न जुजुवुः* – *तंग न करें, पीड़ित न करें* ।
6. *न वन्दना* – *नमन न करने वाले, कृतघ्न* ।

7. *श्रीः* – *समृद्धि, सौभाग्य* ।
8. *अर्द्धयः* – *आधा* , अधूरा।
9. *विष्णुनस्य* – व्यापक, *सर्वव्यापी विष्णु* ।
10. *जन्तोः* – *प्राणियों के।* 
11. *शिश्नदेवाः* – (विलासी, कामुक, अधर्मी) *शिश्न और भग रूप में शिवलिङ्ग पूजक* ।
12. *अपि गुऋतम् नः* – *हमसे दूर करे, बचाएं या हमें दूर रखें* ।

मंगलवार, 11 नवंबर 2025

वर्तमान प्रचलित मुहूर्त शास्त्र में मेरी श्रद्धा क्यों नहीं है?

वर्तमान प्रचलित मुहूर्त शास्त्र में मेरी श्रद्धा क्यों नहीं है? 

क्योंकि मेरी श्रद्धा, आस्था और विश्वास केवल वेदों में है।
वैदिक मत, वैदिक वर्णाश्रम धर्म, वैदिक दर्शन, वैदिक कर्म या वैदिक क्रियाओं अर्थात वैदिक कर्मकाण्ड और वैदिक संस्कृति को ही सनातन धर्म मानता हूँ।
जो भी उसके विपरीत और वेद विरुद्ध तन्त्र है उसमें मुझे तनिक मात्र भी श्रद्धा, आस्था और विश्वास नहीं है।

लेकिन गणित, होरा शास्त्र अर्थात फलित ज्योतिष, मुहूर्त, वास्तु शास्त्र, सामुद्रिक शास्त्र, शकुन शास्त्र और धर्म शास्त्र का अध्यन करने और परम्परागत शिक्षा प्राप्त करने के कारण लोग मुझे ज्योतिषी समझते हैं और तत्सम्बन्धी प्रश्न पूछते हैं, राय लेते हैं, मुहूर्त पुछते हैं तो, गुरुदेव का ऋण समझकर मुझे परम्परागत जानकारी के आधार पर उत्तर देना पड़ता है। और बतलाता भी हूँ, लेकिन साथ में वैदिक मत भी बतला देता हूँ।

वर्तमान प्रचलित मुहूर्त शास्त्र में मेरी श्रद्धा क्यों नहीं है? का उत्तर ---

उत्तरायण दक्षिणायन में तीन महीने का तीन महीने आगे खिसका दिया और तीन महीने पहले ही उत्तरायण ले आये। ऋतुओं को एक महीने पहले से मान लिया। इस प्रकार मध्य भारत के मौसम से अनुकूल कर दिया।
फिर भी सन्तोष नहीं हुआ तो शुक्ल पक्ष से प्रारम्भ होने वाले चान्द्र मासों को पन्द्रह दिन पहले कृष्ण पक्ष से प्रारम्भ होना शुरू कर दिया।
वेदों में केवल दोनों प्रतिपदा, चन्द्र दर्शन (द्वितीया समझ सकते हैं), अर्ध चन्द्र (अष्टमी समझ सकते हैं), पूर्ण चन्द्र (पूर्णिमा समझ सकते हैं) और बिना चन्द्रमा वाली रात्रि (अमावस्या समझ सकते हैं) के अलावा किसी तिथि का उल्लेख नहीं है।
वैदिक काल में नक्षत्र असमान विस्तार वाले, चित्रा के समान एक तारा का एक अंश से भी कम विस्तार वाले नक्षत्र, मृगशीर्ष जैसे तीन तारे वाले नक्षत्र, कृतिका जैसे सात तारों वाले नक्षत्र, तो शतभिषा जैसे सौ या वर्तमान में बचे अठासी तारों वाले नक्षत्र तो चित्रा के समान एक तारा का एक अंश से भी कम विस्तार वाले नक्षत्र और
स्वाति जैसे चौबीस अंशों वाले नक्षत्र होते थे। जबकि वर्तमान में सभी नक्षत्रों का एक समान भोग 13°20' मान लिया गया है।
ऐसे ही पश्चिम टर्की, मिश्र, और बेबिलोनिया में पशुओं की आकृति वाली असमान विस्तार वाली राशियाँ मानी जाती थी। वर्तमान एस्ट्रोनॉमी में भी यही मानते हैं। जबकि, गर्गाचार्य और आचार्य वराहमिहिर के समय जब राशियाँ और वार की नई अवधारणा अपनाई गई तो, तीस-तीस अंशों की समान विस्तार वाली राशियाँ बना दी गई। जबकि वेदों में क्रान्तिवृत के बारह समान तीस-तीस अंशों की समान विस्तार वाले सायन प्रधय मधु-माधव आदि मासों की गणना के लिए मानी जाती थी। लेकिन न उनका कोई स्वतन्त्र नाम नहीं दिया और न कोई आकृति बतलाई। क्योंकि सायन प्रधय (राशि) का कोई निश्चित क्षेत्र ही नहीं रहता, छात्राओं से सायन प्रधय का कोई सम्बन्ध ही नहीं रहता है, तो आकृति तो हो ही नहीं सकती।
वेदों में सिद्धान्त (गणित) ज्योतिष के वैधृति पात और व्यतिपात अर्थात सूर्य और चन्द्रमा के अंशों का योग 180° होने और 360° होने को छोड़कर किसी अन्य योग का उल्लेख नहीं है। जबकि वर्तमान में सत्ताईस योग प्रचलित हैं। न भद्रा (विष्टि करण) का उल्लेख है। जबकि वर्तमान में भद्रा को अशुभ मानते हैं।
कुछ महत्वपूर्ण तथ्य स प्रमाण नीचे दिए जा रहे हैं। जिससे प्रमाणित होता है कि वर्तमान में प्रचलित अयन, ऋतु, मास सब गलत हैं।⤵️
‌*संवत्सर व्यवस्था -* 
उत्तरायण की तीन ऋतु - वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा। - 
*देवा ऋतवः वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु उत्तरायण में होती है।* 
शतपथ ब्राह्मण 2/1/3 तथा तै.सं. 6/5/3 तथा नारायण उपनिषद अनु. 80
*उदगयन शब्द और देवयान / देवलोक शब्द स्पष्ट आये हैं।* 
मैत्रायण्युपनिषद में उत्तरायण और नारायण उपनिषद अनु 80
(भा. ज्यो.पृष्ठ 44 एवम् 45)

*वसन्त को प्रथम ऋतु और संवत्सर का शिर, ग्रीष्म को दक्षिण पक्ष (पंख) और शरद को उत्तर पक्ष कहा है।* 
तै.ब्रा. 1/1/2/6 एवम् 7 एवम् 3/10/4/1
*हेमन्त को संवत्सर का मध्य और वर्षा को पुच्छ कहा है।*
तै.ब्रा. 3/10/4/1
(भा. ज्यो. पृष्ठ 47)
उक्त आधार पर प्रमाणित होता है कि, वसन्त सम्पात से शरद सम्पात तक वैदिक उत्तरायण होता था। और शरद सम्पात से वसन्त सम्पात तक वैदिक दक्षिणायन होता था। वैदिक काल के उत्तरायण में वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु होती थी। और दक्षिणायन में शरद, हेमन्त और शिशिर ऋतु होती थी।
तदनुसार संवत्सर का प्रारम्भ वसन्त सम्पात, उत्तरायण, वसन्त ऋतु और मधुमास से होता था।

*तीन मौसम / ऋतु के नाम आये हैं।* 
अग्निर्ऋतुः सूर्य ऋतुश्चन्द्रमा ऋतु।
तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/10/1
(भा.ज्यो पृष्ठ 49)
इससे प्रमाणित होता है कि, वर्तमान के ही समान वैदिक युग में भी तीन मौसम मुख्य रहते थे १ गर्मी, वर्षा और ठण्ड।
वसन्त सम्पात अर्थात सायन मेष संक्रान्ति। जो प्रायः 20/21 मार्च को होती है। और शरद सम्पात अर्थात सायन तुला संक्रान्ति जो प्रायः 22/23 सितम्बर को होती है।
अतः वैदिक उत्तरायण 21 मार्च से 22 सितम्बर तक होता है। इसे उत्तरगोल भी कहते हैं।
और वैदिक दक्षिणायन 23 सितम्बर से 19/20 मार्च तक होता है। इसे दक्षिण गोल भी कहते हैं।

उत्तर परम क्रान्ति अर्थात सायन कर्क संक्रान्ति प्रायः 22/ 23 जून को होती है। और दक्षिण परम क्रान्ति सायन मकर संक्रान्ति प्रायः 22 दिसम्बर को होती है।
उत्तर परम क्रान्ति अर्थात सायन कर्क संक्रान्ति 23 जून से दक्षिण परम क्रान्ति सायन मकर संक्रान्ति 21 दिसम्बर तक वैदिक उत्तर तोयन कहते हैं। पौराणिक काल में इसे दक्षिणायन कहा जाने लगा।
दक्षिण परम क्रान्ति सायन मकर संक्रान्ति 22 दिसम्बर से उत्तर परम क्रान्ति अर्थात सायन कर्क संक्रान्ति 22 जून तक वैदिक दक्षिण तोयन होता है। पौराणिक काल में इसे उत्तरायण कहा जाने लगा।
इसलिए

*फाल्गुन पूर्णिमा/ पूर्वाफाल्गुनी के दिन को संवत्सर का अन्तिम दिन कहा है। और उसके अगले दिन उत्तराफाल्गुनी को संवतरारम्भ कहा है।*
वैदिक असमान विस्तार वाले नक्षत्र - पूर्वाफाल्गुनी और उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र की सन्धि पर पूर्णिमा का चन्द्रमा होगा तो इससे १८०° पर स्थित नक्षत्र पर सूर्य होगा।
तैत्तिरीय संहिता 7/4/8 में तथा पृष्ठ 51 पर सामवेद के ताण्यब्राह्मण 5/9
 तैत्तिरीय ब्राह्मण 7/4/8
(भा.ज्यो.पृष्ठ 50)

*अधिक मास वर्षान्त में जुड़ता था।*
 वाजसनैय संहिता 22/30 एवम् 31 
ऐतरेय ब्राह्मण 3/1 और 17 और तैत्तिरीय ब्राह्मण 3/8/3
(भा. ज्यो. पृष्ठ 40 एवम् 41)
अर्थात वर्तमान में निरयन सौर वर्ष या सायन सौर वर्ष से चान्द्र वर्ष को बराबर करने के लिए निर्धारित १९ वर्ष, १२२ वर्ष और १४१ वर्ष वाला चक्र प्रचलित नहीं था।
महाभारत काल में हर अट्ठावन माह बाद उनसठवाँ और साठवाँ माह अधिक मास करते थे। ऐसे ही वैदिक काल में वर्षान्त पश्चात तेरहवाँ माह अधिक मास करते थे। सम्भवतः कितने वर्ष पश्चात करते थे यह स्पष्ट नहीं है।

इससे सिद्ध होता है कि, सामान्यतः अमान्त मास भी प्रचलित थे लेकिन संवत्सर आरम्भ के लिए सायन मेष संक्रान्ति ही मुख्य थी। उस दिन पड़ने वाले चन्द्रमा जिस नक्षत्र के साथ होता था उस नक्षत्र से भी इंगित करते थे। 

*शुक्ल पक्ष और कृष्णपक्ष को अर्धमास कहा है।* 
*अर्धमासों के नाम पवित्रादि हैं।* 
अथ यदाह । पवित्रन् पवयिष्यन्त्सहस्वान्त्सहीयानरुणोरणरजा इति। एष एव तत्। ए ह्येव तेर्धमासाः एषः मासाः ।
तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/6/3 ।
(भा. ज्यो.पृष्ठ 48)
इससे प्रमाणित होता है कि, छब्बीस पक्षों के भी नामकरण किया गया था।

तिथियाँ प्रचलित नहीं थी। केवल उदृष्टका (शुक्ल प्रतिपदा), एकाष्टका (शुक्लाष्टमी), पूर्णिमा, व्यष्टका (कृष्ण प्रतिपदा) और अष्टका (कृष्णाष्टमी) और अमावस्या तिथि का ही उल्लेख है।

 *कृष्णपक्ष की प्रतिपदा को व्यष्टका और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को उदृष्ट कहा है।* 
तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/8/2 तथा ताण्ड्य ब्राह्मण 10/3/11 ।
 *कृष्णपक्ष की अष्टमी को अष्टका और शुक्ल पक्ष की अष्टमी को एकाष्टका कहा है।* 
तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/5/12 तथा ताण्ड्य ब्राह्मण 10/3/11 ।
(भा.ज्यो.पृष्ठ 59)
इससे प्रमाणित होता है कि, तिथियाँ प्रचलित नही थी। लेकिन चन्द्रमा के चारो फेस का निर्धारण गणना करते थे। यानी अमावस्या, उदृष्यका या शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, एकाष्टका (शुक्ल पक्ष की अष्टमी), पूर्णिमा, व्यष्टका (कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा), अष्टका (कृष्ण पक्ष की अष्टमी), और अमावस्या की गणना की जाती थी।


वैदिक काल में व्यवहार में ३६० दिन का सावन सौर वर्ष भी चलता था, इसमें प्रत्येक महिना ३० दिन का ही होता है ‌ तथा साथ में दशाह के वासर प्रचलित थे।

(१) *संवत्सर*--- संवत्सर नामक सामान्य वर्ष के *बारह महीने में ३६० दिन का संवत्सर* होता था। तथा

(२) *परिवत्सर* --- (३८३५ वें वर्ष को छोड़कर) प्रत्येक *पाँचवाँ वर्ष तेरह मास का* अर्थात *३९० दिन का परिवत्सर* होता था। 

(३) *इदावत्सर* --- ( *३८४० वें वर्ष को छोड़* ) *प्रत्येक ४०वाँ वर्ष ३६० दिन* का अर्थात *बारह मास का* ही होता था।

(४) --- *अनुवत्सर* --- *३८३५ वाँ वर्ष ३६० दिन (बारह मास) का अनुवत्सर* होता था। एवम्

(५) *इद्वत्सर* --- *३८४० वाँ वर्ष ३९० दिन (तेरह मास) का इद्वत्सर* होता था।

इस गणना में पारिश्रमिक वितरण में दशाह चलता था। सप्ताह शब्द भी मिलता है लेकिन उपयोग का उल्लेख नहीं है। वासर सूर्योदय से दुसरे सूर्योदय तक को कहते हैं, लेकिन ग्रहों के नाम वाले वार का उल्लेख नहीं है।

क्रान्तिवृत के उत्तर-दक्षिण में आसपास आठ-आठ अंश चोड़ी पट्टी में असमान आकृति वाले तारा मण्डलों को असमान भोगांश वाले नक्षत्र कहते थे। समान भोग वाले नक्षत्र नहीं थे। 
अथर्ववेद में अट्ठाईस नक्षत्र बतलाये गए हैं। जबकि कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता ४/४/४० में शुक्ल यजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण/ दशम काण्ड/पञ्चमोऽध्याय/ चतुर्थ ब्राह्मण में और सामवेद के जैमिनी ब्राह्मण में सत्ताईस नक्षत्र ही बतलाए गए हैं लेकिन सभी में एक बात निश्चित है कि, नक्षत्र भोग असमान था। 

 चित्रा नक्षत्र का भोग केवल ००°२३'३१" ही था, स्वाती नक्षत्र का भोग २०°५०'५७" था, जबकि धनिष्ठा नक्षत्र का भोग २५°१४'०८" था; ऐसे ही सभी नक्षत्रों के भोगांश अलग अलग थे।*

 शतपथब्राह्मणम् में सत्ताइस नक्षत्रों का उल्लेख दिया हुआ है।

नक्षत्राणि ह त्वेवैषोऽग्निश्चितः तानि वा एतानि सप्तविंशतिर्नक्षत्राणि सप्तविंशतिः सप्तविंशतिर्होपनक्षत्राण्येकैकं नक्षत्रमनूपतिष्ठन्ते तानि सप्त च शतानि विंशतिश्चाधि षट्त्रिंशत्ततो यानि सप्त च शतानि विंशतिश्चेष्टका एव ताः षष्टिश्चत्रीणि च शतानि परिश्रितः षष्टिश्च त्रीणि च शतानि यजुष्मत्योऽथ यान्यधिषट्त्रिंशत्स त्रयोदशो मासः स आत्मा त्रिंशदात्मा प्रतिष्ठा प्राणा द्वे शिर एव षट्त्रिंश्यौ तद्यत्ते द्वे भवतो द्व्यक्षरं हि शिरोऽथ यदन्तरा नक्षत्रे तत्सूददोहा अथ यन्नक्षत्रेष्वन्नं तत्पुरीषं ता आहुतयस्ताः समिधोऽथ यन्नक्षत्राणीत्याख्यायते तल्लोकम्पृणा तद्वा एतत्सर्वं नक्षत्राणीत्येवाख्यायते तत्सर्वोऽग्निर्लोकम्पृणामभिसम्पद्यते स यो हैतदेवं वेद लोकम्पृणामेनं भूतमेतत्सर्वमभिसम्पद्यते

शतपथब्राह्मणम्/काण्डम् १०/अध्यायः ५/ब्राह्मण ४

सामवेद के जैमिनी ब्राह्मण में सत्ताइस नक्षत्र कहे गए हैं।

यास्सप्तपदाश्शक्वर्यो ये सप्त ग्राम्याः पशवो यानि सप्त चतुरुत्तराणि छन्दांसि ये सप्त मुख्याः प्राणा यानि सप्तविंशतिर्दिव्यानि नक्षत्राणि यस्सप्तविंश स्तोमो यत्किं च सप्त सप्त तस्यैषा सर्वस्यर्द्धिस्तस्योपाप्तिः ।)
परवर्ती ज्योतिष ग्रन्थों में इसका समाधान इस प्रकार किया कि,
जब अट्ठाइस नक्षत्रों के बजाय सत्ताइस नक्षत्र लेने का निर्णय लिया, तो उत्तराषाढ़ा की अन्तिम चार घटी और श्रवण नक्षत्र के प्रारम्भ की २५ घटी को मिला कर कुल २९ घटी को अभिजित् नक्षत्र मान लिया।
महर्षि गर्गाचार्य नें गर्ग संहिता और भास्कराचार्य ने सिद्धान्त शिरोमणि में असमान भोगांश वाले नक्षत्रों को मान्यता दी। लेकिन वराहमिहिर ने वृहत् संहिता में १३°२०' के समान भोगांश वाले सत्ताइस को मान्यता दी। साथ ही मिश्र,युनान और बेबीलोन (इराक) में प्रचलित ३०° वाली बारह राशियों को भी मान्यता दी। तथा राशियों और नक्षत्रों में समायोजन स्थापित किया।
योग एवम् करण (तिथ्यार्ध) का उल्लेख नहीं है।
सूर्य से चन्द्रमा के बारह-बारह अंश के अन्तर पर तिथियाँ बदलती है। जैसे 348° से 360° तक अमावस्या रहती है। 00° से 12° अन्तर तक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, 12° से 24° तक द्वितीया, 24° से 36° तक तृतीया ....…. 168° से 180° तक पूर्णिमा। फिर 180° से 192° तक कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा, 192° से 204° तक कृष्ण पक्ष की द्वितीया 204° से 216° तक कृष्ण पक्ष की तृतीया और पुनः 348° से 360° तक अमावस्या रहती है।
ऐसे ही सूर्य से चन्द्रमा के छः-छः अंश के अन्तर को करण कहते हैं।

इसके अलावा मुहूर्त शास्त्र में अक्षांशो के आधार पर ऋतुओं में अन्तर पड़ता है। 
क्या उत्तर गोल यानी वैदिक उत्तरायण में किये जाने वाले कार्य दक्षिणी गोलार्ध में भी उत्तर गोल यानी वैदिक उत्तरायण में ही किये जाने चाहिए। या वहाँ उनमें से कुछ कार्य जिनका सम्बन्ध वास्तु से है वे कार्य दक्षिण गोल अर्थात वैदिक दक्षिणायन में करना चाहिए? ऐसा कोई स्पष्टीकरण नहीं है।

केवल कर्क रेखा और मकर रेखा के आस-पास ही षड ऋतुएँ होती है। इसी कारण ऋग्वेद में पाँच ऋतुओं का ही उल्लेख किया है। हेमन्त ऋतु का उल्लेख नहीं है।
भूमध्य रेखीय क्षेत्रों में ग्रीष्म ऋतु और वर्षा ऋतु के अलावा कोई ऋतु होती ही नहीं।
उत्तर अक्षांश 66° 40 के उत्तर में जब ग्रीष्म ऋतु होती ही नहीं तब कोई व्यक्ति ग्रीष्म वाले कार्य कैसे करेगा? ऐसे ही 
 दक्षिण अक्षांश 66° 40 के उत्तर में जब ग्रीष्म ऋतु होती ही नहीं तब कोई व्यक्ति ग्रीष्म वाले कार्य कैसे करेगा?

अधिक उत्तर दक्षिण अक्षांशो पर दिनमान 24 घण्टे से भी अधिक होते हैं वहाँ कोई व्रत, व्रत का पारण कैसे किया जाए इस सम्बन्ध में उचित अनुचित की व्यवस्था देने वाले धर्मशास्त्र में भी उल्लेख नहीं है, तो, धर्म शास्त्र के अङ्ग रूप मुहूर्त शास्त्र में सूर्योदय, प्रातः, सङ्गव, पूर्वाह्न, मध्याह्न, अभिजित मुहूर्त, विजय मुहूर्त, अपराह्न, सूर्यास्त, गोधुलि, सायं सन्ध्या, प्रदोषकाल, पूर्व रात्रि, महानिशा, मध्य रात्रि, ब्राह्म मुहूर्त, ब्रह्म मुहूर्त, उषा काल, अरुणोदय, का निर्णय उक्त कालों में कैसे किया जाएगा इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है

जब उत्तर अक्षांश 66° 40 के उत्तर में जब मकर लग्न दिखता ही नहीं तब कोई व्यक्ति मकर लग्न वाले कार्य कैसे करेगा?ऐसे ही 
 दक्षिण अक्षांश 66° 40 के उत्तर में जब कर्क लग्न दिखता ही नहीं तब कोई व्यक्ति कर्क लग्न वाले कार्य कैसे करेगा?
कोई स्पष्टीकरण नहीं है।

इतनी सब विसङ्गतियों का प्रभाव यह पढ़ा कि, मुहूर्त निकलाने वाले भी मुहुर्त में कोई कार्य नहीं कर पाते। या
मन वाञ्छित दिन में मन वाञ्छित समय में ही मुहूर्त चाहते हैं।
वैदिक अग्निहोत्र रात्रि में नहीं होते फिर विवाह में रात्रि में अग्निहोत्र कर फैरे का चक्कर मेरी समझ से अत्यन्त परे है।
मेरे मातृ कुल में ही मेरे भतिजे का विवाह वेदतुल्य गणित वाली पञ्चाङ्ग से उनके जन्म राशि/नक्षत्र/ चरण के आधार पर नहीं निकल रहे थे तो, लड़की के जन्म नाम के स्थान पर बोलते नाम पर मुहूर्त निकलवा लिया गया।
जबकि मेरे अनुज ने मेरे भतिजे का नाम बदलकर चन्द्रमा के राशि नक्षत्र पर अवकहड़ा चक्र के अनुसार कर दिया था। उसी के विवाह के लिए लड़की के जन्म नाम से मुहूर्त जून में निकल रहे थे तो उन्होंने होने वाली पुत्र वधू के आधार कार्ड वाले नाम से मुहूर्त निकलवा लिया।
विवाह लग्न के समय मेरे भतीजे को नवम सूर्य पूज्य है और भतिजा बहू के जन्म कुण्डली की चन्द्र राशि से गुरु ब्रहस्पति तृतीय अर्थात पूज्य है। जबकि मेरा अनुज पूज्य गुरु ब्रहस्पति में सगाई करने को भी तैयार नहीं था।
यह तो सभी ने देखा है कि, जि समय लग्न मुहूर्त में पाणिग्रहण संस्कार (हथलेवा) का समय होता है उसी समय वर का प्रोसेशन निकल रहा होता है और बाराती फुहड़ डान्स कर रहे होते हैं। (नृत्य नहीं कहा जा सकता इसलिए लिख रहा डान्स कर रहे होते हैं ऐसा लिख रहा हूँ)  

पाँच सौ वर्षों के संघर्ष के बाद शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी के अनुचरों, ग्रामीणों की प्रशिक्षित सेना के द्वारा ढाँचा गिराने पर माननीय न्यायालय के समक्ष शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी के वकीलों द्वारा अंग्रेजी शासन के दौरान अयोध्या के अंग्रेज कलेक्टर द्वारा सरयु नदी और अन्राय मन्दिरों आदि लेण्डमार्क से नपती करवा कर बनाये गए नक्शे मे प्राचीन रामजन्म भूमि का स्थान नियत करके रखे गए प्रमाण प्रस्तुत किए जाने और वकील श्री विष्णु जैन के द्वारा प्रस्तुत प्रमाणों के आधार पर हुए पूरा तात्विक सर्वेक्षण को आधार बनाकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय और न्याय (फैसले) और आदेश के पालन में राम भक्तों से प्राप्त चन्दे की राशि से बनाए गए अधुरे राम मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा केवल राजनीतिक लाभ की आशा में नीमच की चण्डु पञ्चाङ्ग (निर्णय सागर पञ्चाङ्ग) में बतलाये गए मुहूर्त को मानकर जोड़-तोड़ करके बिना मुहूर्त के दिन कर दी गई। भले ही राजनीतिक लाभ मिला तो मिला नहीं लेकिन मुहूर्त बतलाने वाले शास्त्री जी लगभग छः महीने में ही निपट गए।
ऐसे देश समाज में, कलिकाल मे रहने वाले मेरे भाई के परिवार जनों को क्या दोष दिया जा सकता है।
अब बतलाइये कि, उक्त गलत तथ्यों पर आधारित वर्तमान मुहूर्त शास्त्र पर किस आधार पर और किस कारण से श्रद्धा, आस्था और विश्वास व्यक्त किया जाए?
अतः निर्णय आप पर छोड़ता हूँ।

रविवार, 2 नवंबर 2025

सायन गणना और नक्षत्रिय पद्धति दोनों ही सही हैं। लेकिन दोनों के उपयोग भिन्न-भिन्न हैं।

सायन गणना और नक्षत्रिय पद्धति दोनों ही सही हैं। लेकिन दोनों के उपयोग भिन्न-भिन्न हैं।

वेदों में वसन्त सम्पात, शरद सम्पात, उत्तर परम क्रान्ति, दक्षिण परम क्रान्ति, वसन्त से शरद सम्पात के बीच उत्तर गोल की तीन ऋतु वसन्त, ग्रीष्म एवम् वर्षा तथा मधु-माधव, शुक्र-शचि एवम् नभः-नभस्य मास के साथ ही शरद सम्पात से वसन्त सम्पात के बीच दक्षिण गोल की शरद, हेमन्त एवम् शिशिर ऋतु तथा ईष-उर्ज, सहस-सहस्य एवम् तपः- तपस्य मास का स्पष्ट वर्णन है।
उक्त द्वादश मासों के प्रत्येक माह को तीस-तीस अंशों का मानकर इन तीस-तीस अंशों को प्रथक-प्रथक द्वादश प्रधय कहा गया है। लेकिन द्वादश प्रधयः के नाम नहीं पाये जाते हैं। यह ज्योतिष के गणित स्कन्ध का विषय है।
साथ ही क्रान्तिवृत के उत्तर-दक्षिण में आठ-नौं अंश चौड़ी नक्षत्र पट्टी में एक, दो या अनेक ताराओं द्वारा निर्मित स्थाई सत्ताइस-अट्ठाइस  आकृतियों को नक्षत्र संज्ञा दी गई है। और इन प्रत्येक नक्षत्र का नाम और देवता निर्धारित किए गए हैं। लेकिन इन नक्षत्रों का विस्तार असमान है। क्रान्तिवृत में सभी नक्षत्रों के भोगांश (देशांश) अर्थात कोणीय दूरी अलग-अलग है तथा विषुव वृत में सभी नक्षत्रों के उत्तर दक्षिण शर (अक्षांश) भी अलग-अलग हैं। इसलिए नक्षत्रिय गणना पद्यति विकसित नहीं की जा सकती है।
फिर भी ग्रहों और चन्द्रमा का सञ्चरण नक्षत्रों में ही माना गया है न कि, प्रधय में। साथ ही अथर्ववेद, तैत्तिरीय संहिता, तैत्तिरीय ब्राह्मण, तैत्तिरीय आरण्यक और अन्य  ब्राह्मण ग्रन्थों, सूत्र ग्रन्थों में चित्रा तारे को क्रान्तिवृत और नक्षत्र पट्टी के बिल्कुल मध्य में अर्थात 180° पर बतलाया गया है। तदनुसार चित्रा तारे से 180° पर क्रान्तिवृत और नक्षत्र पट्टी का प्रारम्भ बिन्दु माना गया है। और इसी आधार पर अश्विनी नक्षत्र को प्रथम नक्षत्र माना जाने लगा। लेकिन जिस समय जिस नक्षत्र पर वसन्त सम्पात होता है, उस अवधि में उस नक्षत्र का नाम सर्वप्रथम लिया जाता है। लगभग 25,780 वर्ष की अवधि में वसन्त सम्पात सभी नक्षत्रों में घूम लेता है। इस आधार पर जिस ग्रन्थ या जिस घटना के समय वसन्त सम्पात, शरद सम्पात या उत्तर-दक्षिण परम क्रान्ति का उल्लेख किया जाता है, या किसी नक्षत्र के साथ ऋतु दर्शाई जाती है उस आधार पर लगभग 25,800 वर्ष की कालावधि में वर्ष निर्धारित किया जाता है। यह पद्धति इतिहास जानने में अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हुई है।
(श्री शंकर बालकृष्ण दीक्षित जी ने भारतीय ज्योतिष में इस तथ्य को ही स्थापित किया है। इस बात को वेदकाल निर्णय नामक पुस्तक में तथा इन्दौर पञ्चाङ्ग शोधन कमेटी की रिपोर्ट में परिष्ठ 4 अयनांश निर्णय में 233 पृष्ठों में श्री दीनानाथ शास्त्री चुलेट ने सप्रमाण सिद्ध किया है। इन्दौर पञ्चाङ्ग शोधन कमेटी की रिपोर्ट पीडीएफ इण्टरनेट आर्काइव पर उपलब्ध है।)   लगभग सभी विद्वानों ने इसी आधार पर चित्रा पक्षीय अयनांश को मान्य किया है। इसलिए इसे झुठलाया नहीं जा सकता। 
इतिहास की घटनाओं के समय निर्धारण के लिए तत्कालीन किसी नक्षत्र विशेष में वसन्त सम्पात होने के आधार पर काल निर्धारण लोकमान्य श्री बालगङ्गाधर तिलेक जी ने भी उनकी पुस्तक ओरायन में किया है।
सूत्र ग्रन्थों के रचनाकाल से रामायण और महाभारत इतिहास ग्रन्थों के रचनाकाल के बीच जब चित्रा तारे से 180° पर  रेवती नक्षत्र का योग तारा स्थित था, तब रेवती नक्षत्र के योग तारा को नक्षत्र पट्टी का आदि बिन्दु और अश्विनी नक्षत्र का प्रारम्भ बिन्दु माना जाने लगा। लेकिन वर्तमान में उस स्थान पर कोई तारा नही है और यदि रेवती नक्षत्र का योग तारा  झीटापिशियम तारे को माना जाए तो वह तारा लगभग नौं अंश पीछे खिसक चुका है। इस कारण वर्तमान मे अश्विन्यादि बिन्दु पर कोई तारा नही है।
लेकिन पौराणिक युग के सिद्धान्त ज्योतिष के विद्वानों ने एक खोज की कि, उक्त अश्विन्यादि बिन्दु और वसन्त सम्पात के अन्तर को अयनांश नाम दिया गया जिसे अंग्रेजी में प्रिसेशन ऑफ इक्विनाक्स कहते हैं। सूर्य, चन्द्रमा और ग्रहों के सायन भोगांश में से उक्त अयनांश घटाकर निरयन राशि अंशादि बना लिया। 
पश्चिम टर्की, मिश्र और इराक में प्रचलित असमान विस्तार वाली द्वादश राशियों को परवर्ती युरोपीय गणितज्ञों द्वारा प्रत्येक राशि को निश्चित तीस-तीस अंशों की नियत कर दी। आचार्य वराहमिहिर के समय भारत में उक्त ग्रीक राशियों को अपनाने में असमान विस्तार वाले सत्ताइस नक्षत्रों को 13°20' का नियत कर दिया। इस प्रकार उनके अनुसार यवन राशियाँ और भारतीय नक्षत्रों का समायोजन हो गया। लेकिन इस चक्कर में असमान विस्तार वाले तेरह अरे (वास्तविक राशियाँ) और असमान विस्तार वाले वैदिक नक्षत्र गुम हो गये और तीस-तीस अंशों की बारह राशियाँ और तेरह अंश बीस कला वाले सत्ताइस नवीन नक्षत्र प्रचलित हो गये। इसे निरयन पद्धति कहा गया। निरयन पद्धति में सायन भोगांश में से अयनांश घटाकर निरयन राशि अंशादि बतलाना आसान हो गया। जो आज तक प्रचलित है। 
उल्लेखनीय है कि, वैदिक अट्ठाईस नक्षत्रों में से अभिजित नक्षत्र का योग तारा नक्षत्र पट्टी से बहुत दूर उत्तर में खिसक जाने के कारण वर्तमान में सत्ताईस नक्षत्र ही मानना उचित है।
आचार्य वराहमिहिर ने तेरह अरों शब्द का प्रयोग वास्तविक राशियों के लिए किया था। लेकिन सर्पधारी राशि या ऑफियुकस या ओफियुचस (Ophiuchus) राशि भी नक्षत्र पट्टी से बाहर निकल जाती है। अतः भारतीय सन्दर्भ में असमान विस्तार वाली बारह राशियाँ ही मानना उचित होगा।
खगोलविद जब भी किसी आकाशीय पिण्ड की सूचना देते हैं तो पिण्ड की स्थिति 88 (अठासी) तारामण्डल में और तेरह साईन में दर्शाते हैं। न कि, राशि अंशों में। सायन पोजीशन बतलाने के लिए 000°00'00" से 359°59'59" तक में बतलाते हैं। अर्थात 000 अंश से 360 अंश तक बतलाते हैं न कि, साईन डिग्री मिनट सेकण्ड में।
अर्थात राशि अशं कला विकला भी एस्ट्रोनॉमी की नहीं बल्कि ऐस्ट्रॉलजी की भाषा है।
वेद, ब्राह्मण ग्रन्थों, सूत्र ग्रन्थों, और यहाँ तक कि, वाल्मीकि रामायण और श्रीकृष्ण द्वेपायन व्यास कृत महाभारत में भी सर्वत्र एक समान वर्णन पाया जाता है कि, अमुक ग्रह अमुक नक्षत्र में स्थित है या अमुक ग्रह अमुक नक्षत्र को पीड़ा दे रहा है। कहीं भी यह वर्णन नहीं है कि, अमुक ग्रह किस प्रधय में स्थित है। 
अर्थात प्रधय, ऋतुओं, गोल में सूर्य की स्थिति, अयन और तोयन (परम क्रान्ति की ओर सूर्य की गति) का सम्बन्ध केवल सूर्य से है।
अतः क्रान्तिवृत में सूर्य के भोगांश तथा क्रान्ति और विषुव वृत के उत्तर-दक्षिण क्रान्ति की गणना सूर्य के लिए की गई थी। बाद में ज्योतिष के सूर्य सिद्धान्त, आर्य भट्टीय, सिद्धान्त शिरोमणि आदि ग्रन्थों के गणिताध्याय में चन्द्रमा और ग्रहों की गति की गणना कर ग्रह स्थिति भोगांश, क्रान्ति और शर के साथ दर्शाने की गणना तैयार हुई। 
लेकिन खगोल शास्त्र में फिक्स्ड ज्ञोडिएक में नक्षत्रों के प्रारम्भ, समाप्ति और विस्तार का उल्लेख किया जाता है। जिसे गोलाध्याय कहते हैं।
संहिता ज्योतिष का मुख्य आधार नक्षत्रों में ग्रहों और चन्द्रमा की स्थिति है, लेकिन सूर्य की ऋतु और माहों का भी महत्व है। होरा शास्त्र या जातक फलित ज्योतिष संहिता ज्योतिष के सिद्धान्तो का ही अनुसरण करता है।
अर्थात नक्षत्र पद्धति का आधार चन्द्रमा है। क्योंकि लगभग 27.322 दिन में चन्द्रमा पूरी नक्षत्र पट्टी में घूम लेता है। जबकि प्रधय, सौर मास, ऋतु, गोल, अयन, तोयन और संवत्सर का आधार सूर्य है। जिसके लिए सायन गणना ही उपयुक्त है।
 
किसी भी स्थान पर समय को दर्शाने के लिए सूर्य , चन्द्र और ग्रहों के भोगांश, क्रान्ति और शर दर्शाने भर से काम नहीं चल सकता, क्योंकि, इस स्थिति की आवृत्ति होती रहती है; जबकि, यदि इसके साथ सूर्य , चन्द्रमा और ग्रहों की स्थिति नक्षत्रों में स्थिति दर्शाई जाए तो, इन सभी स्थितियों की आवृत्ति संयोजन करोड़ों वर्ष में भी नहीं हो पाती है। इसलिए एतिहासिक घटना का ठीक-ठीक समय ज्ञात करने के लिए सूर्य चन्द्रमा और ग्रहों की सायन पोजीशन और नक्षत्रों में स्थिति दोनों साथ-साथ जानना अत्यावश्यक है। इसलिए सायन गणना और नक्षत्रिय पद्धति दोनों का ही ज्ञान आवश्यक है।

भारत में यज्ञ कर्म, व्रत पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाने के लिए मुख्य आधार यह है कि, निश्चित गोल, निश्चित अयन में निश्चित ऋतु में उल्लेखित मधु-माधव आदि सौर मास, में चन्द्रमा की किसी नक्षत्र विशेष में स्थिति हो न कि, चान्द्रमास की तिथियाँ। वेदों में तिथियाँ प्रचलित नहीं थी। केवल उदृष्टका (शुक्ल प्रतिपदा), एकाष्टका (शुक्लाष्टमी), पूर्णिमा, व्यष्टका (कृष्ण प्रतिपदा) और अष्टका (कृष्णाष्टमी) और अमावस्या तिथि का ही उल्लेख है।

बाद में चान्द्र मास में सम्बन्धित नक्षत्र में पड़ने वाली तिथि से जोड़ दिया गया। इसमें त्रुटि यह हो गई कि, सूर्य की सायन संक्रान्ति  वाले मधु-माधव आदि सायन सौर मास के स्थान पर पौराणिक काल में प्रचलित निरयन सौर संक्रमण आधारित सौर मास पर आधारित चैत्र-वैशाख आदि चान्द्र मासों की तिथि स्वीकार कर ली गई।
इसके दो कारण थे।
प्रथम -- शिवरात्रि पर्व का आधार बिल्वपत्र के पेड़ पर बैठकर व्याघ (बहेलिए) द्वारा रात-भर मृगशीर्ष नक्षत्र (ओरायन) के तारों का पीछा करते हुए व्याघ तारा लुब्धक (सिरियस केनिस मेजर) देखते हुए चारों प्रहर में मुंह धोने और बेल पत्र तोड़कर गिराने को शंकर जी ने अपनी पूजा मानकर व्याघ (बहेलिए) को दर्शन देकर वरदान दे दिया यह कहानी है।
चूंकि रात-भर व्याघ (लुब्धक) का दर्शन निरयन सौर धनु राशि के 20°13' वाले दिन (वर्तमान में 05 जनवरी के आस-पास) को ही हो सकता है, जो निरयन सौर मकर संक्रमण आधारित अमान्त माघ मास में ही सम्भव है। इसलिए निरयन सौर मकर मास में पड़ने वाली शिव की तिथि चतुर्दशी को शिवरात्रि मनाई जाने लगी।
दुसरा --- निरयन सौर संक्रमण आधारित चैत्र-वैशाख आदि चान्द्र मासों में किसी भी निर्धारित तिथि पर व्रत पर्व के लिए निर्धारित चन्द्रमा का नक्षत्र या उसके आगे-पीछे का नक्षत्र होना।
जैसे अमान्त चैत्र शुक्ल नवमी को चन्द्रमा पुनर्वसु या पुष्य नक्षत्र में चन्द्रमा होने पर राम नवमी मनाना। अमान्त श्रावण कृष्ण अष्टमी तिथि को प्रायः रोहिणी नक्षत्र में चन्द्रमा होने पर श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाना आदि।  
लेकिन यह ध्यान नहीं दिया गया कि, इस कारण व्रत पर्व उत्सव और त्यौहारों की ऋतुएँ गड़बड़ा जाएगी। दुसरा चन्द्रमा की किसी विशेष नक्षत्र में स्थिति असमान भोग वाले वास्तविक नक्षत्र में है भी या नहीं ली गई। इसलिए तिथि प्रणाली  अनुचित ही है।
इसी कारण वेदों में उदृष्टका, चन्द्र दर्शन, एकाष्टका, पूर्णिमा, व्यष्टका, एकाष्टका और  अमावस्या  के अलावा किसी तिथि का उल्लेख नहीं किया गया है।
उसके स्थान पर मधु-माधव आदि मास और चन्द्रमा का वास्तविक नक्षत्र में होना ही दर्शाया गया है। और यही पद्धति ही उचित है।

पञ्चाङ्ग का दुसरा उपयोग --- कृषि, व्यापारिक यात्रा, युद्धों के लिए यात्रा, संस्कारों के लिए समुचित समय निर्धारण हेतु ऋतु ज्ञान होना तथा रात्रि में चन्द्रमा के प्रकाश की उपलब्धि बतलाना है।
इसमें भी मधु-माधव आदि सायन सौर मास और चन्द्रमा की अमावस्या-पूर्णिमा और अर्ध चन्द्र (अष्टका-एकाष्टका) दर्शाना पर्याप्त है। अन्य किसी तिथि के स्थान पर सम्बन्धित देवता का नक्षत्र लेना पर्याप्त है। जैसे प्रथम मास मधु मास में (पौराणिक काल के माधव मास) में पुनर्वसु नक्षत्र पर चन्द्रमा हो तब श्रीराम जन्मोत्सव मनाना और पञ्चम मास नभस मास (पौराणिक काल के अनुसार नभस्य मास) में रोहिणी नक्षत्र में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाना और श्रवण नक्षत्र के चन्द्रमा में वामन जयन्ती मनाना ही उचित पद्धति है।



अपौरुषेय वेदों में अनन्त ब्रह्माण्डों में से केवल हमारे ब्रह्माण्ड की आकाशगङ्गा निहारिका के मार्तण्ड नामक सूर्य के भूमि नामक ग्रह के परिभ्रमण पथ क्रान्ति वृत और भूमि की विषुवत रेखा के समानान्तर आकाश के विषुव वृत और क्रान्ति वृत के तीस-तीस अंशों के समान दूरी वाले द्वादश प्रधेयों और क्रान्तिवृत के उत्तर दक्षिण आठ-नौं अंश चौड़ी पट्टी की नक्षत्र पट्टी में कुछ ताराओं द्वारा निर्मित असमान विस्तार के नक्षत्र तथा सूर्य चन्द्रमा और ग्रहों का वर्णन तो नहीं हो सकता अतः वैदिक ज्योतिर्गणित, वैदिक पञ्चाङ्ग जैसे शब्द तो निरर्थक ही हैं।
अतः ब्राह्मण ग्रन्थों और सूत्र ग्रन्थों में उल्लेखों के आधार पर वैदिक ग्रह गणित और वैदिक पञ्चाङ्ग कहा जा सकता है।