सोमवार, 30 सितंबर 2024

आर्य समाज और संघ में अन्तर

संघ परिवार हमेशा कहता है कि, हमें इज्राइल से सीखना चाहिए, यहुदियों से सीखना चाहिए, मुस्लिमों से सीखना चाहिए, यूरोप, अमेरिका और चीन से सीखना चाहिए।
महर्षि दयानन्द सरस्वती कहते थे कि, हमें वेदों से सीखना चाहिए वापस वेदों की ओर चलो विश्व को श्रेष्ठ, सदाचारी, सद्धर्म में प्रवर्त आर्य बनाओ (कृण्वन्तम विश्वार्यम्) आर्यसमाज भी हमेशा कहता है कि हमें वैदिक शिक्षा ही ग्रहण करना चाहिए। वेदों से ही शिक्षा मिल सकती है। वेदों से ही सीखो।
ऐसा कभी संघ या संघ परिवार कहना तो दूर सोच भी नहीं सकता। क्योंकि उनके आदर्श मुसोलिनी और फ़ासिज़्म है, तान्त्रिक हैं वैदिक नहीं।
उधर 
इज्राइल कहता है कि, यह युद्ध कौशल हमने शिवाजी से सीखा।
सम्भवतः शिवाजी मानते हों कि, यह युद्ध कला हमने भगवान श्रीकृष्ण की नारायणी सेना से सीखी।
भगवान श्रीकृष्ण कहते थे कि, उन्होंने वेदों से शिक्षा ग्रहण की। नारायणी सेना यजुर्वेद और धनुर्वेद के सिद्धान्तों पर आधारित संगठन था।
अन्त में दिल्ली आर्यसमाज के डॉक्टर विवेक आर्य के शब्दों में ⤵️

धार्मिक क्षेत्र में संघ अभी तक अपनी मान्यताएं स्थापित नहीं कर पाया है । 
 संघ ने ऐसा कार्य नहीं किया, जिससे कोई बड़ा सामाजिक/धार्मिक परिवर्तन किया हो ।
परन्तु, आर्यसमाज के ऐसे अनेक कार्य हैं जो संघ ने स्वयं आर्यसमाज से उधार लिया है  । 
संघ की सबसे बड़ी अशक्तता उसका सनातन वैदिक धर्मियों  के धार्मिक मामलों में किसी भी प्रकार का कोई मार्गदर्शन नहीं दे पाना है । जैसे ,  संघ ने परम्परागत हिन्दुओं को ना कभी मजारों/ कब्रों पर सर पटकने से रोका है, और ना ही साईं बाबा उर्फ़ चाँद मियां को ईश्वर के रूप में पूजने से | ना ही रामरहीम, रामपाल, राधे माँ के पाखंड में फंसने से रोका, और ना ही वेद ज्ञान के प्रचार प्रसार के लिए कुछ किया है । 
जबकि संघ के पास देश, प्रदेश की सरकार से लेकर नगर निकायों की सत्ता, हजारों विद्यालय, लाखों स्वयंसेवक, मजबूत संगठन आदि सब कुछ है । 
आर्यसमाज के युवा हजारों की संख्या में दिन-रात बिना किसी लोभ, प्रलोभन, पद, नेतागिरी के सनातन धर्मी समाज को वो बात सिखला रहा है , जो वो पिछले 1200 वर्षों में भी नहीं समझ पाया है ।
स्वामी दयानन्द सरस्वती जो समझाना चाहते थे, वह सनातन धर्मी समाज समझने को तैयार नहीं है । 
संघ का चर्चा में रहना, और जुमलेबाजी करना कि 2021 में भारत विश्व गुरु बन जायेगा हम जानते हैं । परन्तु संघ को भी स्वयम् यह ज्ञात नहीं है कि, कैसे बनेगा ? और धरातल पर यथार्थ कार्य करने में और जुमले बाजी करने में बहुत अंतर है। 
आर्यसमाज को भी अपनी प्रचार शैली में परिवर्तन की आवश्यकता है । सरल, प्रभावशाली रूप में स्वामी दयानन्द सरस्वती की मान्यताओं को प्रचारित किया जाये ।
मैं संघ की संगठन क्षमता की प्रशंसा करना चाहूँगा, जिसकी आर्यसमाज में कमी है । 
आशा है कि आप मेरी बात को अन्यथा न लेकर मेरे चिंतन को समझेगें । मैं व्यर्थ में किसी की निंदा करने में अपना समय व्यर्थ नहीं करता । परन्तु मैंने जो वर्षों में देखा, समझा वो आपसे साझा किया है ।

रविवार, 29 सितंबर 2024

पौराणिकों ने सदाचारी, सच्चरित्र श्रीकृष्ण को हिन्दू अर्थात काला-कलूटा, चौर- लुटेरा, लुच्चा-लफंगा-बदमाश, दास-दस्यु, डाकू और बलात्कारी सिद्ध कर दिया।

धूर्त यूरोपीय लोगों ने ईरान के स्थान पर हमेशा पर्शिया शब्द का उपयोग किया जिसमें ईरान के साथ इराक (असीरिया और बेबीलोन) आ जाता है। और अधिक विस्तार देखें तो सीरिया और पूर्वी टर्की भी आ जाता है। जिससे चन्द्रवंशियों अर्थात आदमियों (खातियों और यादवों) को असली आर्य सिद्ध कर सकें।

चन्द्रवंशियों में एकमात्र अपवाद।
जो सदाचारी थे। जिन्हें वास्तव में आर्य कहा जा सकता है।
लेकिन 
हमारे पौराणिकों नें तो श्रीकृष्ण को भी नहीं छोड़ा, उन्हें पक्का हिन्दू अर्थात काला-कलूटा, चोर (चोल), लूटेरा, सेंधमार, लुच्चा- लफंगा, बदमाश, दास- दस्यु (दृविड़), डाकू, बलात्कारी
सिद्ध कर दिया।

यह है तो, थोथा तर्क, लेकिन इस परिकल्पना को आसानी से सिद्ध किया जा सकता है कि,
जरथ्रुस्त्र से अथर्ववेदीय ब्राह्मण ग्रन्थ अवेस्ता पर शास्त्रार्थ करने भारत से ईरान गये श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास जी को अवेस्ता के जेन्द भाष्य में श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास जी को कृष्ण वर्णिय देखकर हिन्दू अर्थात काला  (कृष्ण) लिखा है।
इससे प्रेरित होकर पारसी शब्द हिन्दू के अर्थ काला-कलूटा, चोर (चोल), लूटेरा, सेंधमार, लुच्चा- लफंगा, बदमाश, दास- दस्यु (दृविड़), डाकू, बलात्कारी जान समझकर  पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण के चरित्र पर उक्त सभी आरोप लगा कर श्रीकृष्ण चरित्र लिख दिया हो।

रविवार, 22 सितंबर 2024

श्राद्ध पक्ष में कुतप मुहूर्त मतलब दिन का आठवाँ मुहूर्त और रोहिण मुहूर्त मतलब दिन का नौवा मुहूर्त।

सूर्यास्त समय में से सूर्योदय समय घठाएँ। जो अन्तर घण्टा मिनट आयेगा, वह दिनमान कहलाता है।
दिनमान में पन्द्रह का भाग दें।
भागफल के जो घण्टा मिनट सेकण्ड आये वह एक मुहूर्त का मान होगा। जो लगभग 48 मिनट के आसपास होता है।
भागफल के घण्टा मिनट सेकण्ड में सात का डुणा करें। 
गुणनफल के जो घण्टा मिनट आये उसमें उस दिन का सूर्योदय समय जोड़ दें। योग फल के घण्टा मिनट कुतप काल का प्रारम्भ आयेगा।
कुतप मुहूर्त के प्रारम्भ होने के समय में एक मुहूर्त का मान के घण्टा मिनट जोड़ दें। तो कुतप मुहूर्त का समाप्त होने और रोहिण मुहूर्त का प्रारम्भ समय आयेगा।
रोहिण मुहूर्त में पुनः मुहूर्त मान के घण्क मिनट जोड़ दें तो रोहिण काल आ जाएगा।
धर्मशास्त्र के अनुसार धार्मिक कार्यों में सूर्योदय समय और सूर्यास्त गणितागत भूकेन्द्रीय सूर्योदय समय ही मान्य होता है।
गूगल पर, मौसम एप वाले या समाचारपत्रों में भूपृष्ठ पर उपरी बिम्ब दृष्य सूर्योदय समय और भूपृष्ठ पर उपरी बिम्ब दृष्य सूर्यास्त बतलाया जाता है।
गणितागत सूर्योदय अर्थात धार्मिक सूर्योदय और सूर्यास्त में और भूपृष्ठ पर उपरी बिम्ब दृष्य सूर्योदय/ सूर्यास्त समय में लगभग साढ़े तीन मिनट का अन्तर रहता है। जो ऋतुओं के साथ घटता बढ़ता है।
इसके अलावा एक मुहूर्त के मान में क्रमशः 
7 का गुणा कर गुणनफल नोट करलें।
फिर 
8 का गुणा कर गुणनफल नोट करलें।
और फिर 
9 का गुणा कर गुणनफल नोट करलें।
फिर 
सूर्योदय + 7का गुणनफल = कुतप मुहूर्त का प्रारम्भ समय।=11 बजकर 55 मिनट।
फिर 
सूर्योदय + 8 गुणनफल = कुतप मुहूर्त का प्रारम्भ समय + मुहूर्त मान= कुतप मुहूर्त का समाप्त होने का समय। और रोहिण मुहूर्त का प्रारम्भ समय = 12 बजकर 44मिनट।
फिर 
सूर्योदय + 9 गुणनफल = रोहिण मुहूर्त का प्रारम्भ होने का समय + मुहूर्त मान= रोहिण मुहूर्त का समाप्त होने का समय। अपराह्न काल प्रारम्भ होने का समय।13 बजकर 32 मिनट



उदाहरणार्थ 
दिनांक 28 सितम्बर 2024 को 
धार में गणितागत सूर्यास्त - धार में गणितागत सूर्योदय= दिनमान।
18h22m-6h17m=12h05m

दिनमान ÷15 = मुहूर्त मान।
12h05m÷15=0h48m20s

मुहूर्त मान × 7 = गुणनफल।
0h48m15s ×7= 5h38m20s

सूर्योदय समय+ गुणनफल= कुतप मुहूर्त का प्रारम्भ समय।=11 बजकर 55 मिनट ⤵️
06h17m+5h38m20s=11h55m20s

कुतप मुहूर्त का प्रारम्भ समय + मुहूर्त मान= कुतप मुहूर्त का समाप्त होने का समय। और रोहिण मुहूर्त का प्रारम्भ समय = 12 बजकर 44मिनट⤵️
11h55m20s+0h48m20s= 12h43m40s

रोहिण मुहूर्त का प्रारम्भ होने का समय + मुहूर्त मान=  रोहिण मुहूर्त का समाप्त होने का समय। अपराह्न काल प्रारम्भ होने का समय।13 बजकर 32 मिनट⤵️
12h43m40s+ 0h48m20s=13h32m00s

शनिवार, 21 सितंबर 2024

जो जीवन भर तीर्थ यात्रा पर नहीं जा पाये उनके लिए भरणी श्राद्ध।

भरणी श्राद्ध 
सूर्य से चन्द्रमा के प्रत्येक बारह अंश (12°) के अन्तर को तिथि कहते हैं। और सूर्य से चन्द्रमा के प्रत्येक छः अंश (6°) के अन्तर को करण कहते हैं।
चन्द्रमा भू परिभ्रमण में 27 तारा मण्डल के सम्मुख से निकलता है। जिस तारा मण्डल के सम्मुख से निकलता है उस अवधि को चन्द्र नक्षत्र कहते हैं।
तिथियों के अतिरिक्त नक्षत्रों के श्राद्ध भी होता है। इसमें भरणी श्राद्ध मुख्य है। इसके अलावा मघा श्राद्ध भी होता है।
कारण यह है कि, भरणी नक्षत्र के देवता यम हैं। और यम सप्त पितरों में से एक हैं।
मघा नक्षत्र के देवता पितरः हैं।
इसलिए इन नक्षत्रों के अपराह्न व्यापी होने के दिन श्राद्ध होता है।
इनके अतिरिक्त उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के देवता अर्यमा तो सप्त पितरों के राजा हैं। जिनका अधिकार कव्य में है। अर्थात अर्यमा को भी श्राद्ध भाग प्राप्त होता है।
और 
उत्तराषाढ़ नक्षत्र के स्वामी विश्वेदेवाः को भी श्राद्ध भाग दिया जाता है।

दो सूर्योदय के बीच के समय (प्रायः 24घण्टे) को वार कहते हैं।

सूर्य स्पष्ट और चन्द्र स्पष्ट के योग का सत्ताइसवाँ भाग योग कहलाता है। ये सब पञ्चाङ्ग के अङ्ग है।

श्राद्ध प्रकरण में इन सबके श्राद्ध का भी उल्लेख है। लेकिन प्रचलित केवल तिथियों के श्राद्ध ही हैं शेष प्रचलित नहीं है। फिर भी भरणी श्राद्ध प्रचलित है।

अब मूल मुद्दे *भरणी श्राद्ध पर ही विचार किया जाएगा।* 
सनातन धर्म के स्मृति ग्रन्थों के अनुसार प्रत्येक मानव को जीवन में तीर्थ यात्रा करना ही चाहिए।
चार प्राचीन तीर्थ ये हैं- 
सतयुग का तीर्थ पुष्कर तीर्थ (अजमेर के पास)।
त्रेता का तीर्थ नैमिशारण्य (निमिस उत्तर प्रदेश), 
द्वापर का तीर्थ कुरुक्षेत्र (हरियाणा)। और
कलियुग का तीर्थ गङ्गा। 
सौरों (पश्चिम उत्तर प्रदेश), प्रयागराज, काशी (वाराणसी), हरिद्वार, ऋषिकेश, गङ्गोत्री, और गौ मुख, गङ्गा ग्लेशियर और गङ्गासागर ये गङ्गा के प्रमुख तीर्थ हैं।
ऐसे ही चार अर्वाचीन तीर्थ हैं---
बद्रीनाथ, जगन्नाथपुरी, डाकोर और द्वारका पुरी तथा रामेश्वरम (तमिलनाडु) या परशुरामेश्वर (कर्नाटक-केरल सीमा पर गुरवायुर के निकट)। 
इन तीर्थ स्थानों पर जीवन में एकबार स्नान, दान, होम-हवन, यज्ञ, श्राद्ध, तर्पण और तपस्या करना चाहिए।
जो लोग तीर्थ यात्रा पर नहीं ज पाये उनका श्राद्ध पक्ष में भरणी श्राद्ध भरणी नक्षत्र के दिन किया जाता है।
जो पूरे जीवन काल में तीर्थ यात्रा नहीं कर पाये उसके लिए, और तीर्थ स्थल पर मृत्यु नहीं होने, मृत्यु के समय गोबर से लेपन की हुई भूमि पर पद्मासन में बैठकर ॐ मन्त्रोच्चार के साथ परमात्मा का ध्यान करते हुए मृत्यु न होने या उत्तर में सिर करके चित लेटकर ॐ मन्त्रोच्चार के साथ परमात्मा का चिन्तन न करते हुए मृत्यु को प्राप्त हुए मानव का, मरते समय मुख में गङ्गा जल और तुलसी पत्र नहीं था, ख़राब तिथि, वार, नक्षत्र योग करण, मुहूर्त , घटि या लग्न में मृत्यु होने के लगे दोष के लिए दशाह, एकादशाह, द्वादशाह, मङगलश्राद्ध तृयोदशाह, मासिक श्राद्ध, द्विमासिक श्राद्ध, त्रेमासिक श्राद्ध, अर्ध वार्षिक श्राद्ध (छः मासी), वार्षिक श्राद्ध (बरसी), द्वि वार्षिक श्राद्ध और श्राद्ध में लेने के लिए विष्णु पूजा के समय प्रायश्चित किया जाता है।
बाद में गया श्राद्ध, और बद्रीनाथ में ब्रह्म कपाली में भी इनका प्रायश्चित होता है। अतः बाद में वापस करना आवश्यक नहीं है। लेकिन भयभीत वंशज फिर भी ये श्राद्ध करते हैं।
भरणी श्राद्ध भरणी नक्षत्र में मातृ गया (सिद्धपुर- गुजरात)/ पितृ गया (बिहार), ब्रह्मकपाली - बद्रीनाथ (उत्तराखण्ड) में श्राद्ध पक्ष में अपराह्न व्यापी भरणी नक्षत्र के दिन किया जाता है।

शुक्रवार, 20 सितंबर 2024

श्राद्ध प्रकरण में पार्वण श्राद्ध और एकोद्दिष्ट श्राद्ध का अन्तर तथा दिन रात के विभाग।


 पार्णव श्राद्ध का मतलब क्या है?
उत्तर --
श्राद्ध के मुख्य दो प्रकार हैं - पार्वण श्राद्ध और एकोद्दिष्ट श्राद्ध।
तीर्थ श्राद्ध, विवाह, यात्रा आदि अवसर पर नान्दिमुख श्राद्ध के कर्म सब एकोद्दिष्ट श्राद्ध के अन्तर्गत ही आते हैं।
जो श्राद्ध - श्राद्धपक्ष में किया जाता है, अथवा पूर्णिमा, अमावस्या या संक्रान्ति पर्व पर किया जाता है वह श्राद्ध पार्णव श्राद्ध कहलाता है।
इसमें माता-पिता की मृत्यु तिथि जिस दिन अपराह्न व्यापी हो उस दिन ही श्राद्ध होता है। या अपराह्न व्यापी पूर्णिमा-अमावस्या के दिन श्राद्ध होता है। 
लेकिन श्राद्ध का प्रारम्भ मध्याह्न में करके अपराह्न समाप्ति के पहले तर्पण आदि करके श्राद्ध पूर्ण कर लिया जाना चाहिए।
 जिस दिन कोई पर्व हो या नहीं हो, लेकिन व्यक्ति की मृत्यु तिथि हो, या तीर्थ स्थल पर या विवाह आदि अवसर पर, या यात्रा आदि के पहले किसी कार्यवश किसी एक ही व्यक्ति का श्राद्ध हो तो उसे एकोद्दिष्ट श्राद्ध कहते हैं। यह मध्याह्न काल व्यापी तिथि में किया जाता है।

दुसरा प्रश्न है कि, पूर्वाह्न काल, मध्याह्न काल, अपराह्न काल आदि कैसे ज्ञात करें?
उत्तर -
सामान्यतः सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन कहलाता है। और सूर्यास्त से सूर्योदय तक रात्रि कहलाती है।
उक्त दिन और रात के विभिन्न प्रकार से विभाग किये गए हैं। जैसे दिन के तीन भाग - पूर्वाह्न, मध्याह्न और अपराह्न। साधारणतः इनका ही प्रयोग होता है। विशेष कर देवकर्म में ये ही विभाग उपयोग किये जाते हैं।
दिन के पाँच भाग - प्रातः काल, सङ्गव काल, मध्याह्न काल, अपराह्न काल और सायाह्न काल। ये प्रायः पितृ-कर्म अर्थात श्राद्धादि में ही अधिक उपयोग होते हैं।
सूर्यास्त समय में से सूर्योदय का समय घटाने पर दिनमान आता है।
दिनमान में पाँच का भाग देने पर एक-एक काल की अवधि ज्ञात होती है। उदाहरणार्थ दिनमान यदि बारह घण्टे का हो तो 12÷5= 2 घण्टे 24 मिनट।
अर्थात दिन का प्रत्येक काल 02 घण्टे 24 मिनट का ही होता है। 
सूर्योदय समय में 2 घण्टे 24 मिनट जोड़ने पर सूर्योदय से योगफल तक प्रातः काल।
फिर प्रातः काल के समाप्ति समय में पुनः 2 घण्टे 24 मिनट जोडें तो सङ्गव काल का समाप्ति समय आयेगा। सङ्गव काल का समाप्ति समय में 2 घण्टे 24 मिनट जोडें तो मध्याह्न काल का समाप्त होने का समय मिलेगा। मध्याह्न काल का समाप्त होने का समय में 2 घण्टे 24 मिनट जोडें तो अपराह्न काल का समाप्त होने का समय आयेगा ।अपराह्न काल का समाप्त होने का समय में 2 घण्टे 24 मिनट जोडें तो सायाह्न काल समाप्ति का समय मिलेगा अर्थात सूर्यास्त समय आयेगा।
ऐसे ही रात्रि के भी पाँच विभाग होते हैं। लेकिन अन्तर केवल इतना ही है कि, रात्रि के काल समान न होकर भिन्न-भिन्न होते हैं।
यदि अगले सूर्योदय समय में से आज का सूर्यास्त समय घटाय जाए तो रात्रि मान आयेगा।
रात्रि मान में पन्द्रह का भाग देने पर एक मुहूर्त की अवधि मिलेगी। जो प्रायः 48 मिनट के आसपास होगा।
यदि रात्रि मान 12 घण्टे हुआ तो---
एक मुहूर्त=00 घण्टा 48 मिनट।
दो मुहूर्त = 1 घण्टा 36 मिनट।
तीन मुहूर्त= 02 घण्टे 24 मिनट।
चार मुहूर्त= 3 घण्टे 12 मिनट।
पाँच मुहूर्त= 04 घण्टे।

सूर्यास्त से तीन मुहूर्त (02 घण्टे 24 मिनट) तक प्रदोषकाल।
फिर अगले चार मुहूर्त (3 घण्टे 12 मिनट) तक पूर्व रात्रि काल।
फिर अगला एक मुहूर्त (00 घण्टा 48 मिनट) निशा/ निशिता काल (या महानिशिथ काल)।
फिर अगले पाँच मुहूर्त (4 घण्टे 00 मिनट) तक उत्तर रात्रि।
अन्त में दो मुहूर्त (1 घण्टा 36 मिनट) जोड़ने पर अरुणोदय काल का समाप्ति समय अर्थात अगले सूर्योदय का समय आ जाएगा।
ऐसे सामान्य घण्टा मिनट का जोड़ने का अभ्यास करने पर कोई भी ज्ञात कर सकता है।

ऐसे ही दिनमान के तीन भाग पूर्वाह्न मध्याह्न और अपराह्न भी ज्ञात कर सकते हैं।

स्पष्ट मध्याह्न अर्थात दिनमान के ठीक मध्य का समय।
दिनमान ÷2= अर्ध दिवस।
सूर्योदय+अर्ध दिवस= स्पष्ट मध्याह्न।

स्पष्ट मध्य रात्रि मतलब रात्रि मान का ठीक मध्य का समय।

रात्रि मान ÷2= अर्ध रात्रि।
सूर्यास्त+अर्ध रात्रि= स्पष्ट मध्यरात्रि।

निशा या निशिता काल को ही कालाष्टमी, मास शिवरात्रि, पूर्णिमा, अमावस्या और विशेषकर शरद पूर्णिमा, दीपावली और महाशिवरात्रि पर्व की रात में महानिशिथ काल कहलाता है।
अरुणोदय का उत्तरार्ध अर्थात रात्रि की अन्तिम घटि (लगभग 24 मिनट) या अगले सूर्योदय के पहले की घड़ी (लगभग 24 मिनट) को उषाकाल कहते हैं।
और सूर्यास्त के ठीक बाद की घड़ी (लगभग 24 मिनट) को सन्ध्या कहते हैं।
दिनमान और रात्रि मान का पन्द्रहवाँ भाग (दिनमान या रात्रि मान÷ 15=लगभग 48 मिनट के आसपास का समय) मुहूर्त मान होता है।
और दिनमान और रात्रि मान का तीसवाँ भाग (दिनमान या रात्रि मान÷ 30= लगभग 24 मिनट के आसपास का समय) घटि मान होता है।
प्रत्येक दिन और रात्रि में अथर्व वेदोक्त पन्द्रह-पन्द्रह मुहूर्त होते है।

बुधवार, 18 सितंबर 2024

शास्त्रोक्त कर्म ही करें और शास्त्रोक्त कर्म भी शास्त्रीय विधि से ही करें।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि,

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्‌॥ श्रीमद्भगवद्गीता 16/23
जो पुरुष शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को ही ॥16/23
 तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥ श्रीमद्भगवद्गीता 16/24
इससे तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्र विधि से नियत कर्म ही करने योग्य है ॥16/24॥
केवल शास्त्रीय विधि से ही शास्त्रीय कर्म ही करे। अतः शास्त्र ज्ञान प्राप्त करना सभी का कर्तव्य है।

सम्पूर्ण रूपेण ईश्वरार्पण होकर ही केवल निष्काम भाव से केवल परमात्मा की ही आराधना - उपासना  करें।
क्योंकि,
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसा: ।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जना: श्रीमद्भगवद्गीता 17/4
सत्वगुणी लोग देवताओं की पूजा करते हैं, रजोगुणी लोग यक्षों और राक्षसों की पूजा करते हैं, और तमोगुणी लोग पञ्चमहाभूतों, और मृतकों की कब्र में स्थित प्रेतों (पिशाचों) की पूजा करते हैं. 

प्रश्न उठता है कि कर्म बन्धन से छूटकर परम शान्ति लाभ करने के लिये मनुष्य को क्या करना चाहिये? इस पर भगवान् उसका कर्तव्य बतलाते हुए कहते हैं-

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् श्रीमद्भगवद्गीता 18/ 62

हे भारत ! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में जा। उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शान्ति को तथा सनातन परम धाम को प्राप्त होगा 18/62
 
 इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात कही है --- 
 तमेव शरणं गच्छ सर्व भावेन भारतः। 
 तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में जा।

सभी लोगों को शास्त्र ज्ञान नहीं है; इसलिए मैं व्रत, पर्व, उत्सव और त्योहारों का शास्त्रोक्त कर्मकाल / पर्वकाल/ पूजा का दिनांक और समय बतला देता हूँ।
मैरी सास ऐसा करती थी, मैरे पापा ऐसा करते थे। हम तो केवल चौघड़िया देखते हैं, या हम कोई मुहूर्त नहीं देखते। ऐसा मानने वाले अपने कर्मों के लिए स्वयम् उत्तरदाई हैं न कि, उनके पापा या सास।
सप्तर्षियो द्वारा महर्षि वाल्मीकि को समझाया गया ज्ञान इस बात का प्रमाण है।
वैदिक/ श्रोत्रिय तो दुर्लभ हो गये हैं। सनातनियों में स्मार्त, वैष्णव, सौर, शैव, शाक्त, गाणपत्य और कौमार (कार्तिकेय उपासक) अपनी-अपनी परम्पराओं का पालन करते हैं। और आर्य समाजी, कबीर पन्थी आदि जीते जी माता-पिता और बुजुर्गो की सेवा ही श्राद्ध मानते हैं। ये सब सनातनधर्मी भी जी रहे हैं। और
नाथ, खालसा,जैन, बौद्ध, नवबौद्ध, चीनी, पारसी, यहुदी, इसाई और मुस्लिम अपने-अपने केलेण्डर के अनुसार और उनके शास्त्रों में बतलाई गई विधि से श्राद्ध करते हैं। वे भी जी रहे हैं। 
इसलिए मानना- न मानना व्यक्तिगत स्वातंत्र्य है।

मंगलवार, 10 सितंबर 2024

तिथि और वार के योग से महत्वपूर्ण पर्व शिव पुराण और वीर मित्रोदय के अनुसार।

वायु महापुराण के एक भाग शिव पुराण में कुल छः संहिताएँ हैं।
1 विद्येश्वर संहिता, 2 रुद्र संहिता, 3 शत्रुद्र संहिता , 4 कोटिरुद्र संहिता , 5 उमा संहिता और  6 कैलाश

 शिव पुराण की विद्यश्वर संहिता के में
वार और तिथि के संयोग से बने निम्नांकित चार योगों को सूर्यग्रहण के समान धार्मिक महत्व की कही गई है और कहा गया है कि, इन तिथियों में किया गया स्नान, दान, श्राद्ध, जप और ध्यान अक्षय होता है।
लेकिन ध्यान रखें कि, वार सूर्योदय से सूर्योदय तक रहता है। अगले सूर्योदय से ही वार बदलता है। रात बारह बजे Day & Date (डे और डेट) ही बदलते हैं, वार नहीं।
ये चार तिथि -वार के योग हैं ---
1 रविवारीय सप्तमी,  2 सोमवारी (सोमवती) अमावस्या, 3 मंगलवारी चतुर्थी (अङ्गारकी चतुर्थी) और 4 बुधवारी अष्टमी (बुधाष्टमी) ।
अमावस्या तु सोमेन सप्तमी भानुना सह।

चतुर्थी भूमिपुत्रेण सोमपुत्रेण चाष्टमी।।

चत्सरस्तिथयो स्त्वेताः सूर्यग्रह सन्निभाः।

स्नानं दानं तथा श्राद्धं सर्वं तत्राक्षयं भवेत्।।

सोमवारी अस्त, रविवारी सप्तमी, मंगलवारी चतुर्थी एवं रविवारी अष्टमी तिथियां सूर्य ग्रह के समान फल देने वाली कही गयीं। इन तिथियों में स्नान, दान, जप, तर्पण/श्राद्ध आदि अनंत फल कहा गया है।

इस दिन पवित्र नदियों और झीलों में स्नान करना विशेष शुभ कहा गया है।

अमावस्या तु सोमेन सप्तमी भानुना सह।

चतुर्थी भूमिपुत्रेण बुधवारेण अष्टमी ॥

चत्सरस्तिथयः पुण्यास्कुल्याः सूर्य्ग्रहादिभिः।

सर्वमक्षयमत्रोक्तं स्नानदानजपादिकम् ॥

"वीरमित्रोदय समयप्रकाश"

वीरमित्रोदय समय प्रकाश के अनुसार सोमवार की अमावस्या, रविवार की सप्तमी, मंगल वार की चतुर्थी और रविवार की अष्टमी तिथि, ग्रहण काल ​​के समान पुण्य माना गया है। इस दिन दिए गए पुण्य कर्म नदी स्नान, जपादि अक्षय फल प्रदान करता है।

शास्त्रकारों का निर्णय है कि यह दिन ग्रहण काल ​​के समान होता है। बुधाष्टमी के दिन पवित्र अनुष्ठान, पवित्र स्नान, दान, तर्पण व जपादि पुण्य कर्म अक्षय फल प्रदान करता है।

इस बुधवार की अष्टमी को ही  दुर्वा अष्टमी कहा जाता है।
ऐसी मान्यता है कि, राक्षसों के संहार से थके गणेशजी ने अष्टमी बुधवार के दिन नर्मदा तट पर दुर्वा पर लेट कर विश्राम किया था। जिससे उन्हें अत्यन्त सुखद अनुभव हुआ था।
चतुर्थी और मंगलवार दोनों ही अष्ट विनायक से सम्बन्धित दिन हैं।
रविवार और सप्तमी तिथि दोनों का स्वामी सूर्य है।
और सोम अर्थात चन्द्रमा का वार सोमवार और चन्द्रमा रहित रात्रि अमावस्या ( अमा मतलब चन्द्रमा रहित) दिन चन्द्रमा सम्बन्धित हैं।
यह तो प्रमाण भी है और तर्क भी है।
ऐसे प्रमाण सुने-सुनाई व्रत पर्वों में नहीं मिलते।
मर्जी है आपकी, आखिर धर्म है आपका।