शुक्रवार, 20 सितंबर 2024

श्राद्ध प्रकरण में पार्वण श्राद्ध और एकोद्दिष्ट श्राद्ध का अन्तर तथा दिन रात के विभाग।


 पार्णव श्राद्ध का मतलब क्या है?
उत्तर --
श्राद्ध के मुख्य दो प्रकार हैं - पार्वण श्राद्ध और एकोद्दिष्ट श्राद्ध।
तीर्थ श्राद्ध, विवाह, यात्रा आदि अवसर पर नान्दिमुख श्राद्ध के कर्म सब एकोद्दिष्ट श्राद्ध के अन्तर्गत ही आते हैं।
जो श्राद्ध - श्राद्धपक्ष में किया जाता है, अथवा पूर्णिमा, अमावस्या या संक्रान्ति पर्व पर किया जाता है वह श्राद्ध पार्णव श्राद्ध कहलाता है।
इसमें माता-पिता की मृत्यु तिथि जिस दिन अपराह्न व्यापी हो उस दिन ही श्राद्ध होता है। या अपराह्न व्यापी पूर्णिमा-अमावस्या के दिन श्राद्ध होता है। 
लेकिन श्राद्ध का प्रारम्भ मध्याह्न में करके अपराह्न समाप्ति के पहले तर्पण आदि करके श्राद्ध पूर्ण कर लिया जाना चाहिए।
 जिस दिन कोई पर्व हो या नहीं हो, लेकिन व्यक्ति की मृत्यु तिथि हो, या तीर्थ स्थल पर या विवाह आदि अवसर पर, या यात्रा आदि के पहले किसी कार्यवश किसी एक ही व्यक्ति का श्राद्ध हो तो उसे एकोद्दिष्ट श्राद्ध कहते हैं। यह मध्याह्न काल व्यापी तिथि में किया जाता है।

दुसरा प्रश्न है कि, पूर्वाह्न काल, मध्याह्न काल, अपराह्न काल आदि कैसे ज्ञात करें?
उत्तर -
सामान्यतः सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन कहलाता है। और सूर्यास्त से सूर्योदय तक रात्रि कहलाती है।
उक्त दिन और रात के विभिन्न प्रकार से विभाग किये गए हैं। जैसे दिन के तीन भाग - पूर्वाह्न, मध्याह्न और अपराह्न। साधारणतः इनका ही प्रयोग होता है। विशेष कर देवकर्म में ये ही विभाग उपयोग किये जाते हैं।
दिन के पाँच भाग - प्रातः काल, सङ्गव काल, मध्याह्न काल, अपराह्न काल और सायाह्न काल। ये प्रायः पितृ-कर्म अर्थात श्राद्धादि में ही अधिक उपयोग होते हैं।
सूर्यास्त समय में से सूर्योदय का समय घटाने पर दिनमान आता है।
दिनमान में पाँच का भाग देने पर एक-एक काल की अवधि ज्ञात होती है। उदाहरणार्थ दिनमान यदि बारह घण्टे का हो तो 12÷5= 2 घण्टे 24 मिनट।
अर्थात दिन का प्रत्येक काल 02 घण्टे 24 मिनट का ही होता है। 
सूर्योदय समय में 2 घण्टे 24 मिनट जोड़ने पर सूर्योदय से योगफल तक प्रातः काल।
फिर प्रातः काल के समाप्ति समय में पुनः 2 घण्टे 24 मिनट जोडें तो सङ्गव काल का समाप्ति समय आयेगा। सङ्गव काल का समाप्ति समय में 2 घण्टे 24 मिनट जोडें तो मध्याह्न काल का समाप्त होने का समय मिलेगा। मध्याह्न काल का समाप्त होने का समय में 2 घण्टे 24 मिनट जोडें तो अपराह्न काल का समाप्त होने का समय आयेगा ।अपराह्न काल का समाप्त होने का समय में 2 घण्टे 24 मिनट जोडें तो सायाह्न काल समाप्ति का समय मिलेगा अर्थात सूर्यास्त समय आयेगा।
ऐसे ही रात्रि के भी पाँच विभाग होते हैं। लेकिन अन्तर केवल इतना ही है कि, रात्रि के काल समान न होकर भिन्न-भिन्न होते हैं।
यदि अगले सूर्योदय समय में से आज का सूर्यास्त समय घटाय जाए तो रात्रि मान आयेगा।
रात्रि मान में पन्द्रह का भाग देने पर एक मुहूर्त की अवधि मिलेगी। जो प्रायः 48 मिनट के आसपास होगा।
यदि रात्रि मान 12 घण्टे हुआ तो---
एक मुहूर्त=00 घण्टा 48 मिनट।
दो मुहूर्त = 1 घण्टा 36 मिनट।
तीन मुहूर्त= 02 घण्टे 24 मिनट।
चार मुहूर्त= 3 घण्टे 12 मिनट।
पाँच मुहूर्त= 04 घण्टे।

सूर्यास्त से तीन मुहूर्त (02 घण्टे 24 मिनट) तक प्रदोषकाल।
फिर अगले चार मुहूर्त (3 घण्टे 12 मिनट) तक पूर्व रात्रि काल।
फिर अगला एक मुहूर्त (00 घण्टा 48 मिनट) निशा/ निशिता काल (या महानिशिथ काल)।
फिर अगले पाँच मुहूर्त (4 घण्टे 00 मिनट) तक उत्तर रात्रि।
अन्त में दो मुहूर्त (1 घण्टा 36 मिनट) जोड़ने पर अरुणोदय काल का समाप्ति समय अर्थात अगले सूर्योदय का समय आ जाएगा।
ऐसे सामान्य घण्टा मिनट का जोड़ने का अभ्यास करने पर कोई भी ज्ञात कर सकता है।

ऐसे ही दिनमान के तीन भाग पूर्वाह्न मध्याह्न और अपराह्न भी ज्ञात कर सकते हैं।

स्पष्ट मध्याह्न अर्थात दिनमान के ठीक मध्य का समय।
दिनमान ÷2= अर्ध दिवस।
सूर्योदय+अर्ध दिवस= स्पष्ट मध्याह्न।

स्पष्ट मध्य रात्रि मतलब रात्रि मान का ठीक मध्य का समय।

रात्रि मान ÷2= अर्ध रात्रि।
सूर्यास्त+अर्ध रात्रि= स्पष्ट मध्यरात्रि।

निशा या निशिता काल को ही कालाष्टमी, मास शिवरात्रि, पूर्णिमा, अमावस्या और विशेषकर शरद पूर्णिमा, दीपावली और महाशिवरात्रि पर्व की रात में महानिशिथ काल कहलाता है।
अरुणोदय का उत्तरार्ध अर्थात रात्रि की अन्तिम घटि (लगभग 24 मिनट) या अगले सूर्योदय के पहले की घड़ी (लगभग 24 मिनट) को उषाकाल कहते हैं।
और सूर्यास्त के ठीक बाद की घड़ी (लगभग 24 मिनट) को सन्ध्या कहते हैं।
दिनमान और रात्रि मान का पन्द्रहवाँ भाग (दिनमान या रात्रि मान÷ 15=लगभग 48 मिनट के आसपास का समय) मुहूर्त मान होता है।
और दिनमान और रात्रि मान का तीसवाँ भाग (दिनमान या रात्रि मान÷ 30= लगभग 24 मिनट के आसपास का समय) घटि मान होता है।
प्रत्येक दिन और रात्रि में अथर्व वेदोक्त पन्द्रह-पन्द्रह मुहूर्त होते है।

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