बुधवार, 31 जनवरी 2024

वाल्मीकी रामायण उत्तर काण्ड शम्बुक वध को छोड़कर जाति-प्रथा की उँच-नीच नहीं मिलता। शम्बुक वध का कारण भी तान्त्रिक साधना और तामसी तप होना भी सम्भव है।महाभारत में भी उँच-नीच नहीं दिखती है। परशुराम जी ने गङ्गा पुत्र और वसु अंश मानकर भीष्म को धनुर्वेद की शिक्षा देने के बाद में संकल्प ले लिया कि, केवल विप्र वर्ण के बालकों को ही धनुर्वेद शिक्षा दूँगा। ताकि, चन्द्र वंशियों के अनाचार से समाज सुरक्षित रहे।और द्रोणाचार्य राज्य कर्मचारी होने के नाते अपने और राज परिवार के अतिरिक्त अन्य को धनुर्वेद शिक्षा नहीं दे सकते थे। इसलिए उन्होंने कर्ण और एकलव्य को शिक्षा नहीं दी।लेकिन इसके पीछे कोई जाति-प्रथा नहीं थी। यह केवल दुष्प्रचार मात्र है।सिकन्दर, शक-हूण और पारसी आक्रमण के बाद पञ्चम वर्ण अस्तित्व में आया जिसने म्लेच्छों की सेवा स्वीकार कर ली।

मंगलवार, 23 जनवरी 2024

क्या पाप कर्म का प्रायश्चित सम्भव है?

हम सनातन वैदिक धर्मावलम्बी धर्मशास्त्र के रूप में चारों वेदिक संहिताओं, चारों वेदों के आरण्यक और उपनिषद सहित ब्राह्मण ग्रन्थों, कल्प वेदाङ्ग के अन्तर्गत चारों वेदों के शुल्बसुत्रों, श्रोतसूत्रों, गृह्यसुत्रों और धर्मसुत्रों तथा षड दर्शनों में विशेषकर महर्षि जैमिनी का पूर्वमीमांसा दर्शन और महर्षि बादरायण का उत्तर मीमांसा दर्शन (ब्रह्मसुत्र या शारीरिक सुत्र) को ही धर्मशास्त्र मानते हैं।
वैदिक दर्शन में सहायक के रूप में वरीयता क्रम में सांख्य कारिकाएँ और महर्षि कपिल का सांख्य दर्शन- महर्षि पतञ्जली का योगदर्शन, महर्षि गौतम का न्याय दर्शन- महर्षि कणाद का वैशेषिक दर्शन को मान्यता देते हैं। ये दर्शन उक्त ग्रन्थों के आशय को समझने में सहायक होते हैं। लेकिन इनमें जो भाग  वैदिक संहिताओं के अनुकूल है वहीं भाग मान्य है। शेष भाग त्याज्य है। 
इसके अलावा धर्मसूत्रों के आधार पर बने मनुस्मृति - याज्ञवल्क्य स्मृति आदि स्मृतियों को ही धर्मग्रन्थ के समान ही मानते हैं। लेकिन इनमें भी जो भाग वैदिक संहिताओं के अनुकूल है वहीं भाग मान्य है। शेष भाग त्याज्य है।
वाल्मीकी रामायण और श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास रचित महाभारत को इतिहास के ग्रन्थ मानते हैं। चुँकि, वाल्मीकी रामायण - महाभारत में धर्मपालन कैसे किया जाता है, धर्म पालन में आई दुविधाओं और कठिनाइयों से कैसे निपटा जाता है इसकी सोदाहरण विषद, अच्छी और प्रामाणिक जानकारी है इसलिए वाल्मीकी रामायण - महाभारत को धार्मिक ग्रन्थ कहते हैं, लेकिन धर्मगन्थ नही कहते।

 वाल्मीकी रामायण-महाभारत के प्राचीन इतिहास में सहायक ग्रन्थ के रूप में केवल महर्षि पराशर रचित विष्णु पुराण को पुराण के रूप में मान्यता देते हैं
तथाकथित वेदव्यासजी कृत अन्य पुराणों- उप पुराणों और पौराणिक ग्रन्थों में अनेक विरोधाभासी और बहुत सी अनर्गल बातों का समावेश होने के कारण सनातन वैदिक धर्मी इन्हें प्रामाणिक नहीं मानते। लेकिन पौराणिक- महाभागवत, सौर, शैव, शाक्त और गाणपत्य आदि सम्प्रदायों में अपने अपने पुराणों की अधिमान्यता है।

ऋग्वेद में दो बड़ी महत्वपूर्ण बातें कही हैं जिसे लोग भूल जाते हैं।
(1)  "ऋग्वेद प्रथम मण्डल के बाइसवें सुक्त का बीसवाँ मन्त्र  में स्पष्ट कहा गया है कि, 
तद् विष्णोः परमं पदम् सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्।। ऋग्वेद 1/22/20 (पृष्ठ 43) । 
विष्णु परम पद है, चतुर्मुख प्रजापति ब्रह्मा, इन्द्र, द्वादश आदित्य, अष्ट वसु और (शिव-शंकर- शंम्भ- महादेव सहित) एकादश रुद्र ये तैंतीस देवता भी विष्णु परमपद को देखते हैं। अर्थात विष्णु परमपद के दर्शन को लालायित रहते हैं। ऋग्वेद 1/22/20 (पृष्ठ 43) ।

(2)    तद् विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते। विष्णोर्यत् परमं पदम्। ऋग्वेद 1/22/ 21 
विष्णु का जो परम पद है, उसे कर्मकुशल जाग्रत रहने वाले ज्ञानी सम्यक प्रकाशित हुआ देखते हैं। 21
अर्थात विष्णु का परम पद द्युलोक में फैले हुए प्रकाश के समान ज्ञानी देवता सदा देखते हैं। ऋग्वेद 1/22/ 21 
दोनों मन्त्रों से सिद्ध है कि, विष्णु का पद परमपद है और शेष देवता हैं
ऋग्वेद प्रथम मण्डल के एक-सौ पचपनवें सुक्त का छटा मन्त्र कहता है कि,
चतुर्भिः साकं नवतिं च नामभि श्चक्रं न वृत्तं व्यतीरवीविपत। वृहच्छरीरो विमिमान ऋक्कभिर्युवाकुमारः प्रत्येत्याहवम्। ऋग्वेद 1/155/6
यह विष्णु बीतने वाले काल के चार गुणा नब्भे अर्थात तीन सौ साठ अवयवों को अपनी प्रेरणा से गोल चक्र के समान घुमाता है। तब बड़े शरीर वाला सदा तरुण रहने के कारण कभी भी कुमार न होने वाला यह विष्णु काल को नापता हुआ स्तुतियों से आकर्षित होकर यज्ञ की तरफ आता है।
अर्थात विष्णु के नियन्त्रण में 90×4 (= 360) अरों का नियति चक्र है। कालचक्र या नियति चक्र का नियन्त्रण विष्णु के हाथों में है।
 सृष्टि के प्रारम्भ में जब परब्रह्म विष्णु ने एक से बहुत होने का निश्चय किया तभी विष्णु की कल्पना में सम्पूर्ण सृष्टि की प्रत्येक घटना और समस्त घटनाएँ घट गई। यह ठीक ऐसा ही है जैसे फिल्म की शुटिंग तो पहले ही हो जाती है वैसे ही सृष्टि की सम्पूर्ण घटनाएँ घट चुकी है और हम इसमें लगाव होने के कारण लिप्त भाव से अनुभव कर रहे हैं। जबकि ज्ञानी दृष्टा भाव से केवल देखता रहता है। लिप्त नहीं होता।

साधारण व्यक्ति भावुक दर्शक की भाँति; स्वयम् को पात्र होने का भ्रम पालकर कभी सुखी- कभी दुःखी होते हुए किसी पात्र विशेष की भूमिका मैं ही निबाह रहा हूँ ऐसा समझ लेता है। ऐसे ही जगत में भी भूमिका मैं निभा रहा हूँ और मैं भोग रहा हूँ; ऐसा समझता है। जबकि ज्ञानी तटस्थ भाव से देख अपनी भूमिका (रोल) को निर्वाह करते हैं। क्योंकि, ज्ञानी जन जानते हैं कि, यह माया है, इसलिए इस संसार में मन लगाकर लिप्त होने के बजाय वे तटस्थ होकर केवल शरीर से अपनी भूमिका निबाहते हुए देखते रहते हैं।
पूरी सृष्टि का क्रम नियत है, यही बात भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को  श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय में काल रूप दर्शन देने के समय कही थी।

ऐसे ही शुक्ल यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय के प्रथम और द्वितीय मन्त्र भी अत्यन्त महत्वपूर्ण जीवन जीने की कला सिखाते हैं। प्रथम मन्त्र के प्रथम वाक्यांश के आधार पर इसे ईशावास्योपनिषद कहते हैं।
प्रथम मन्त्र में तीन बातें कही हैं ---
1  "ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।।"
 ईशावास्यम् इदम् सर्वम्, यत्किञ्च जगत्याम् जगत।
अर्थात इस सम्पूर्ण सृष्टि में जो कुछ भी है वह ईश (परमात्मा) से व्याप्त है, (यह जान समझ लो)।
जब परमात्मा नें सृष्टि उत्पत्ति का ॐ संकल्प किया तब अन्य तो कुछ था ही नहीं, अतः परमात्मा नें स्वयम् को ही चेतन प्रकृति (जीव जगत) और अष्टधा जड़ प्रकृति (जगत) के रूप में प्रकट किया। यही बात श्रीमद्भगवद्गीता में भी कही है।
कुछ लोग मानते हैं कि, चेतन जीवात्मा और अष्टधा जड़ प्रकृति भी अनादि हैं। यदि ये जीवात्मा और अष्टधा जड़ प्रकृति भी अनादि अनन्त होते तो परमात्मा सर्वव्यापी कैसे हो सकते हैं? यदि अन्य पदार्थ का एक कण भी विद्यमान हो; तो, परमात्मा सर्वव्याप्त नहीं कहे जा सकते।
दुसरी बात कही है कि, तेन त्यक्तेन भूंजीथा अर्थात उसे त्याग पू्र्वक भोग करें
अर्थात अष्टधा प्रकृति रूप जड़ जगत जीव के भरण-पोषण रूप भोग के लिए ही बना है, अतः इस जगत का उपयोग-उपभोग तो करें लेकिन इसमें लगाव न रखें, आसक्त न हो, इसमें ही लीन न हो जाएँ, लौ लगाना है तो ईश्वर से लगाओ।
तीसरी बात कही है कि, मा गृधः कस्यस्वीत् धनम्। अर्थात किसी के भी धन का लोभ मत करो। अर्थात अपनी सम्पत्ति पर भी स्वामित्व और आधिपत्य (कब्जे) का भाव न रखें।
जिस हिरण्यगर्भ पञ्चमुखी ब्रह्मा ने इस जगत के/ ब्रह्माण्ड को बढ़ाई की भाँति गढ़ा, वह जगत ही उसके शयन काल में उसमें ही लय हो जाता है। जब यह जगत और इसके पदार्थ अपने सृजेता के नही हुए तो हमारे-तुम्हारे क्या होंगे। जब उसी के नहीं हैं तो हम क्यों अपने नाम करने का, स्वामीत्व आधिपत्य का भ्रम पालें। अतः किसी भी चीज की इच्छा न रखें।
दुसरे मन्त्र में कहा है, 
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समाः |
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ||
कुर्वन्नेवेह कर्माणि, जिजीविशेत शरदम् समाः अर्थात कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करें
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ||
इसके अतिरिक्त तेरे पास कोई मार्ग नहीं है। जिससे तुझे कर्म का लेप न हो।
अर्थात अकर्मण्यता पूर्वक जीवन निर्वाह सम्भव नहीं है, और निरुद्देश्य कर्म करने का भी कोई औचित्य नहीं है, लेकिन फलाशा व्यर्थ है। क्योंकि फल इच्छा करने से फल प्राप्त नहीं होता। बल्कि कर्म का फल तो होगा ही। उससे तो आप बच ही नहीं सकते। तो इच्छा करना तो व्यर्थ ही है ना।
संकल्प सहित किये गए सकाम कर्म बान्धते हैं और ज्ञान खोलता है, छुड़ाता है,मुक्त करता है।
बिना संकल्प के, मैं पन के बिना किये गए निष्काम  कर्मों से केवल अन्तःकरण शुद्ध होता है।
मैं- मेरा और हम- हमारा, तु- तेरा, तुम- तुम्हारा, वे- उनका वाले भाव से किए गए कर्म ही बान्धते हैं। इसके बिना मै- मैरा के भाव के बगैर, बिना कामना के, सत उद्देश्य से किये जाने वाले शास्त्रोक्त कर्म शास्त्रोक्त विधि से करने पर बन्धनकारी नहीं होते। 
वैदिक ग्रन्थों के अनुसार किसी भी एक कर्म से दुसरा कर्म नष्ट नहीं होता। प्रत्येक भले-बुरे कर्म का फल तो भोगना ही पड़ता है। 
यदि गलती से तेज चलते दो व्यक्ति आपस में टकरा जाए और एक गिर जाए, लेकिन किसी प्रकार की कोई क्षति न हो और दुसरा व्यक्ति गिरे व्यक्ति से क्षमा प्रार्थना करते हुए उठने में सहायता करे तो क्या गिरने वाला क्षमा नहीं करेगा? यह हुआ छोटे मोटे पाप का प्रायश्चित।
जैसे शैशव, निन्द्रा, स्वप्न, सम्मोहन अवस्था में किया गया अपराध का ज्ञान होने पर जिसके प्रति अपराध हुआ है उससे क्षमा प्रार्थना करने पर और उस व्यक्ति द्वारा क्षमा किया जाने पर उस पाप का शमन हो जाता है, वैसे ही विभिन्न साधारण पापों के प्रायश्चित बतलाये गए हैं।
जिसमें वरिष्ठों का समुचित मान-सम्मान न करना, वचन भङ्ग, पंक्ति भेद, पैर छू जाना, अशालीन भाषा, पर्याप्त दान न कर पाना, पर्याप्त दक्षिणा न देना, पारिश्रमिक कम देना या नही देना, कर्ज चुकाये बिना मृत्यु होना आदि के प्रायश्चित बतलाये हैं। जिससे इन पापों का शमन होता है।
लेकिन सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय न होकर जानबूझकर, केवल स्वार्थवश मच्छर की हत्या का प्रायश्चित भी नहीं हो सकता

कुछ छोटे मोटे पापों के प्रायश्चित के विषय में कुछ स्थानों में उल्लेख है कि, पर्वकाल में तीर्थ स्नान, तीर्थ में दान आदि प्रायश्चित भी हैं। जिसे पौराणिकों और कथावाचकों नें गङ्गास्नान से पाप धुलना मान लिया।

पौराणिक तो कहते हैं कि, जिसने जीवन भर पाप किया और केवल एक बार ही हरि, नारायण, राम, कृष्ण आदि कोई भी नाम ले लेता है तो उस एकबार नाम लेने मात्र से वैकुण्ठ से भगवान विष्णु के पार्षद आते हैं और यम दूतों को भगाकर उसे वैकुण्ठ लेजाते हैं; तो फिर सदाचार पूर्वक वर्णाश्रम धर्म पालन, पञ्चमहायज्ञ क्यों किये जाएँ। पुराणों के इस मिथ्या और असत्य ज्ञान के फलस्वरूप आजकल अधिकांश जन दुराचारी होगये हैं।
वस्तुतः जीवनभर जो सोचोगे तदनुसार वही कर्म करोगे अतः अन्त समय में भी वही स्मरण होगा।
 पौराणिक कथा के आधार पर एक व्यक्ति ने पुत्र का नाम नारायण रख दिया। सोचा जीवनभर कुछ भी करलो, अन्त में पुत्र का नाम याद आता ही है, अतः सब पाप धुल जाएंगे और वैकुण्ठ में सीट पक्की।
अब वह निरंकुश हो गया, उसे पाप कर्म करने में ही रुचि हो गई। मरते समय चार-पाँच बार नारायण, नारायण कह कर पुत्र को पुकारा, लेकिन आखिर दुष्ट का पुत्र था, उसने भी सुनी-अनसुनी कर दी। तब क्रोधित हो कर उस पापी ने पुत्र को तीन चार गन्दी गालियाँ और वैसे ही उसकी मृत्यु हो गई। पौराणिक चालबाजी धरी रह गई।
अतः यह भ्रम छोड़ कर केवल शास्त्रोंक्त वचनानुसार सद्भावना, सद्विचार, सत्य भाषण, सत्कर्म, सदाचार पूर्वक जीवन यापन ही एकमात्र सतपथ है। यही वैदिक सनातन धर्म है।

रविवार, 21 जनवरी 2024

धर्म के अधीन राज्य हो तो धर्मराज्य, पन्थ के अधीन राज्य पन्थराज्य और राज्य के अधीन धर्म अधर्म ही होता है।

जिसने भी महर्षि वशिष्ठ और महर्षि विश्वामित्र के अधीन रहकर राज चलाते दशरथ जी और श्री रामचन्द्र जी का इतिहास पढ़ा समझा है। बौद्धकाल का इतिहास पढ़ा समझा है, जिसने ईरान का इतिहास पढ़ा समझा है। जिसने इङ्लैण्ड (इंग्लैंड) का इतिहास पढ़ा है। जिसने भी रोमन कैथलिक चर्च के विरुद्ध प्रोटेस्टेण्ट चर्च और एङ्लिकन चर्च (एंग्लिकन चर्च) बनने का इतिहास पढ़ा है और उसके बाद ईसाई परिवार और सामाजिक व्यवस्था में हुए परिवर्तन का इतिहास समझा है, जिनने देखा है कि, रोमन कैथोलिक चर्च दूसरे विवाह की अनुमति नहीं देता था इसलिए इसाइयों में तलाक देकर दुसरा - तिसरा विवाह कर जीवन में चार-पाँच विवाह नहीं होते थे।
वे सब जानते हैं कि, राज्य पर धर्म का नियन्त्रण और धर्म पर राज्य (और राजनीति) के नियन्त्रण के अन्तर को जान समझ सकते हैं।
और सनातन धर्म का सनातन रहने का कारण भी जान सकते हैं।
इसी बात को ध्यान में रखते हुए आदि शंकराचार्य जी ने भारत की चारों दिशाओं में चार शंकराचार्यों की पदस्थापना की थी। उनके पास तो केरल के राजा की सेना थी। उनने स्वयम् की नागा साधुओं की सेना भी तैयार कर ली थी। नाथ सम्प्रदाय बनने के बाद नाग सेना पर सिद्ध सम्प्रदाय का नियन्त्रण हो गया। फिर भी शंकराचार्यों का औपचारिक सम्मान शेष रहा।
पहले आर्य समाज के प्रचारकों और आर्यसमाज द्वारा संचालित स्वातन्त्र्य आन्दोलन सहित धार्मिक आन्दोलनों, फिर करपात्री जी के नेतृत्व में रामराज्य परिषद के गौरक्षा  आन्दोलनों के कारण जनता को भ्रम हो गया कि, शंकराचार्यों ने भी ऐसे ही प्रवचन देकर प्रचार करना और आन्दोलन चलाना चाहिए। थोड़ा कार्य श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने किया और सफल भी रहे।
रा.स्व.से.संघ ने जनता की इस इच्छा को समझ कर विश्व हिन्दू परिषद के माध्यम से 1984 ईस्वी से गङ्गा यात्रा और रामजन्म भूमि आन्दोलन के माध्यम से  ने जनता की यह इच्छा पूरी की तो जनता उसकी भक्त हो गई।
लेकिन यह कार्य धर्मराज का नहीं है। उसके लिए स्वामी श्रद्धान्द सरस्वती जी और  करपात्री जी जैसे संन्यासी चाहिए।  
जिस दिन राजनीति और राज्य का नियन्त्रण धर्म पर हो जाएगा उसदिन वैदिक सनातन समाप्त हो कर केवल हिन्दूत्व रह जाएगा। हिन्दूत्व का अर्थ है भारतीय या भारतवंशी। वह व्यक्ति जिसके अजमेर -गोवा जैसे तीर्थ स्थान भारत भूमि में हो, जो भारत को अपना देश मानता हो, भारतीय संस्कृति को अपनी संस्कृति मानता हो। वह चाहे बाइबल को धर्मशास्त्र मानता हो; चर्च में बाइबल के भजन गाकर प्रार्थना करता हो, चाहे कुरान को अपना धर्मग्रन्थ मानता हो और हदीस के नियमों का पालन करता हो और मस्जिद में नमाज अदा करता हो वह हिन्दू है। विशेष कर पुरुष खाकी पेण्ट, सफेद शर्ट, काली टोपी और महिलाएँ सलवार कुर्ता पहन कर रा.स्व.से. संघ की शाखा में जाता हो तो वह पक्का हिन्दू कहलायेगा। विशेषता यह है कि, उक्त गणवेश में कुछ भी भारतीय नहीं है।
तब शंकराचार्यों के पद समाप्त हो कर आचार्य धर्मेन्द्र और उमा भारती और प्रज्ञा ठाकुर जैसे साधु होंगे। और 

दासो के (हिन्दुओं के) दस (अ)धर्माचार्य  घोषित किए जाएँगे ---
 नागपुर में (महाराष्ट्रपति) लम्पटराय और राजधानी में परधान मन्त्री राष्ट्रप्रमुख पद पर सत्तासीन रहेंगे। 
इनके अधीन 
1 गुरुग्राम में चम्मचराय (राष्ट्र प्रमुख का प्रधान चम्मच) , 
2 नोएडा में दलपतराय (बहुमत दल का अध्यक्ष), 
3 मुम्बई में घोटाले कर (चम्पत होने में प्रवीण) चम्पतराय, 
4 कोलकाता में बलवन्तराय (गुण्डों का सरदार), 
5 अहमदाबाद में सम्पतराय (प्रचूर सम्पदा का स्वामी), 
6 चेन्नई में धनपतराय (सबसे बड़ा धनवान), 
7 बेंगलुरु, हैदराबाद, गुरुग्राम, नोएडा में मीडिया राय।
ये सातों नौकर राष्ट्र प्रमुख के लिए उत्तरदाई होंगे।
वैदिक सनातन धर्मियों से कर वसूला जाएगा।

मंगलवार, 16 जनवरी 2024

कल्पारम्भ में ग्रह स्थिति।

केवल मन्द केन्द्रीय ग्रह ही सूर्य केन्द्रीय होते हैं। शेष पूरी ज्योतिष गणनाएँ भू केन्द्रीय ही होती है। क्योंकि, हमें देखना तो भूमि से ही है तो भारतीय भू केन्द्रीय ग्रह स्थिति लेते हैं और यूरोपीय भू पृष्ठीय ग्रह स्थिति लेते हैं; ये ही उपयोगी है।
लग्न मूलतः सायन गणना से ही आता है। उसमें अयनांश घटाकर निरयन बनाना पड़ता है। 
ऐसे ही 
नाक्षत्रीय पद्यति में तो तारामण्डल (नक्षत्र) बतलाया जाता है। इनका उपयोग संहिता ज्योतिष में ही होता है। फलित ज्योतिष/ होरा शास्त्र में नहीं होता।

आधुनिक एस्ट्रोनॉमी में तेरह तारामण्डल को राशियाँ मान जाता है और अठासी तारामण्डल को नक्षत्र (Constilation) कह सकते हैं। भारत में पहले अट्ठाइस नक्षत्र माने जाते थे, लेकिन बाद में अभिजित नक्षत्र क्रान्तिवृत से काफी दूर हो गया इसलिए अब सत्ताइस नक्षत्र ही चलते हैं।
सूर्य सिद्धान्त और वराहमिहिर दोनों के अनुसार कल्पारम्भ में भू-मध्य रेखा और उज्जैन के देशान्तर रेखा के काट पर वसन्त सम्पात का उदय हो रहा था। उस समय सभी ग्रह वसन्त सम्पात (सायन मेषादि बिन्दु) पर ही थे। 
चूंकि उस समय अयनांश भी शुन्य ही था अतः निरयन सायन दोनों स्थितियाँ समान ही थी। तदनुसार उस समय चित्रा तारा पश्चिम में अस्त हो रहा था। अतः चित्रा तारे को नक्षत्र मण्डल के मध्य में (180°) पर माना जाता है। और चित्रा तारे से 180° पर अश्विनी नक्षत्र का प्रारम्भ माना जाता है। इसे निरयन मेषादि बिन्दु भी कहा जाता है।

शनिवार, 13 जनवरी 2024

श्री पुष्पेन्द्र श्रीवास्तव के भाषणों का प्रभाव

डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर की पुस्तक पाकिस्तान एण्ड पार्टिशन ऑफ इण्डिया पर श्री पुष्पेन्द्र श्रीवास्तव जी का भाषण कई लोग कई बार सुन चुके हैं।
विशेषता यह है कि, मुस्लिमों के विरुद्ध जो तथ्य डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर जी ने बतलाये उनके प्रष्ठ संख्या सहित बतलाने के बाद भी जो बातें पुष्पेन्द्र श्रीवास्तव जी को समझ आ गये, उनके माध्यम से आपको जानकारी मिली उससे हमारे जैसे लोग समझ गए लेकिन अम्बेडकर वादियों को न पढ़कर समझ आया न पुष्पेन्द्र श्रीवास्तव जी समझा पाये।
जो पहले से जानते-समझते हैं, पहले से ही मानते हैं उनको उनके मत की पुष्टि कर दी, लेकिन जो गलत जानकारी और गलत सोच से ग्रस्त हैं जिनको समझाना आवश्यक है उनको ही नहीं समझा पा रहे हैं उन्हें तो, इतने भाषण देने से भी कोई लाभ नहीं मिला।

आगम ग्रन्थ क्या है। क्या आगम ग्रन्थों का वेदों से कोई सम्बन्ध है?

जैसे वैदिक कर्मकाण्ड के लिए अलग-अलग ब्राह्मण ग्रन्थ के सुत्र ग्रन्थ और सुत्र ग्रन्थों के अनुसार कर्मकाण्ड भास्कर, संस्कार भास्कर जैसे निबन्ध ग्रन्थ बनें वैसे ही
ऐसे ही प्रत्येक सम्प्रदाय के लिए तन्त्रोक विधि से क्रियाएँ करने हेतु अपने-अपने आगम ग्रन्थ रचे गए। मूर्तिपूजा की विधि पुराणों और आगम ग्रन्थों में ही मिलती है।
शंकराचार्य जी ने चारों मठों को चार वेदों से सम्बन्धित बतलाया। वैसे उसका कोई प्रामाणिक आधार तो नहीं था लेकिन दिशाओं के अनुसार और प्रथम मठाधीश सुरेश्वराचार्य, हस्तमालकाचार्य, त्रोटकाचार्य, पद्मपादाचार्य की रुचि को भी आंशिक रूप से आधार मान सकते हैं।
जब आद्य शंकराचार्य जी ने श्रमणों,बौद्धों,जैनों और तान्त्रिकों की शुद्धि कर सनातन धर्म में वापसी करवाई तो, 
इन पूर्व श्रमणों,बौद्धों,जैनों और तान्त्रिकों नें प्राचीन ऋषियों की वर्णाश्रम व्यवस्था नही अपनाई। वानप्रस्थों के समान आश्रम न बनाते हुए अपनी प्रवृत्ति के अनुसार इष्टदेव का चयन कर अपने- अपने मठ स्थापित किए। मठों में अपने इष्ट का मन्दिर बनवाया या कुछ नें पञ्चदेवोपासना हेतु तदनुसार मन्दिर बनवाये। श्रमणों और बौद्धों के मठ अधिग्रहित कर शिवलिंग के समान पत्थर (नाम भूल रहा हूँ) को ही शिवलिंग बना लिया।
इन पूर्व श्रमणों,बौद्धों,जैनों और तान्त्रिकों नें श्रमण/ बौद्ध/ जैन / तान्त्रिक परम्परानुसार ही अपने-अपने मठों के लिए संविधान बनाया जिसे आम्नाय कहते हैं। हर एक आम्नाय का एक आगम ग्रन्थ तैयार किया। जिसमें मठ व्यवस्था, पूजा विधि, पूजारी चयन आदि नियम हैं।
इन्हीं लोगों नें अपने-अपने मतानुसार पुराण रचे और शास्त्रों में संशोधन कर दिये।
प्रत्येक आम्नाय को एक वेद से जोड़ा गया जैसे शंकराचार्य जी ने किया था।


वेद भाष्य के प्रकार

वेद व्याख्याताओं के प्रकार ---
१ ब्राह्मण ग्रन्थों के आधार पर व्याख्या।
२ व्याकरण, निरुक्त, छन्द के जानकार अनुवादक मात्र।
३ सायण/ महिधर भाष्य के अनुवादक।
४ दयानन्द सरस्वती जी या श्रीपाद दामोदर सातवलेकर भाष्य के अनुसार अनुवाद करने वाले।
५ मेक्समूलर के भाष्य के अनुवादक।