शुक्रवार, 30 जून 2023

महाभारत के अनुसार श्रीकृष्ण की एक पत्नी रुक्मिणी, पुराणों के अनुसार अष्टभार्या।

श्रीकृष्ण की पत्नियाँ
महर्षि श्री कृष्ण द्वैपायन व्यास  अर्थात वेदव्यास जी की मुख्य, सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक प्रामाणिक रचना महाभारत को ही माना जाता है। 
कहा जाता है कि, वेदव्यास जी ने पहले अत्यन्त गूढ़ भाषा में आठ हजार आठ सौ श्लोक मन में रचकर बाद में ग्रन्थ को लिपिबद्ध करने का विचार किया। इन  अत्यन्त गूढ़ भाषा में रचित आठ हजार आठ श्लोकों के विषय में स्वयम् वेदव्यास जी नें लिखा है कि, इन श्लोकों के अर्थ  केवल मैं ( अर्थात स्वयम् वेदव्यास जी) और उनके पुत्र शुकदेव जी ही जानते हैं और शायद उनके शिष्य सुत जी कुछ के अर्थ जानते हों। 

लिपिबद्ध करने तैयारी होनें तक वेदव्यास जी बत्तीस हजार श्लोक बनाकर शुकदेव जी, सुतजी और वैशम्पायनजी को सुना चुके थे। यह जय संहिता कहलाती है। बत्तीस हजार श्लोक की जय संहिता का अर्थ वेदव्यास जी, शुकदेव जी, सुतजी और वैशम्पायनजी जी जानते थे। जिनमें से बहुत से कूट स्व. श्री ग. वा. कविश्वर जी नें महाभारत के तेरह वर्ष, महाभारत के गूढ़ रहस्य और गीता तत्व मीमांसा पुस्तक में उद्घाटित किये।
बाद में गणपति जी नें लिपिबद्ध करना स्वीकार कर लिया तो वेदव्यास जी ने विस्तृत ग्रन्थ की रचना की। जिसका नाम महाभारत रखा।
इस कारण कुछ लोगों की मान्यता है कि, वेदव्यास जी ने बत्तीस हजार श्लोक का जय संहता नामक इतिहास ग्रन्थ रचा था। जिसे बाद में वैशम्पायनजी नें विस्तार किया। और सुत जी ने वर्तमान एक लाख श्लोकों का महाभारत बना दिया। लेकिन इस मत का कोई आधार सिद्ध नहीं कर पाया।
विष्णु पुराण वेदव्यास जी के पिता महर्षि पराशर जी की रचना मानी जाती है। अन्य पुराणों के रचना काल भिन्न-भिन्न हैं। अतः अठारह पुराणों के रचयिता वेदव्यास को मानना केवल मान्यता तक सीमित है, प्रामाणिक नही है।
कुछ पुराणों के बारे में देवीभागवत के टीकाकार नें रहस्योद्घाटन किया था कि, तेलङ्गाना के विद्वान कवि बोपदेव श्रीमद्भागवत पुराण और वायु पुराण तथा मार्कण्डेय पुराण नामक ग्रन्थ वेदव्यास जी के नाम से रच कर धारानगरी के राजा भोज (प्रथम) की राज्यसभा में पुरस्कार की आशा से उपस्थित हुए। लेकिन राजाभोज नें कहा कि, यदि ये ग्रन्थ आप अपने नाम से ही रचते तो मैं आपकी भरपूर प्रशंसा करता और भरपूर पुरस्कार से पुरस्कृत करता। लेकिन आपने महर्षि वेदव्यास जी के नाम पर अपने मत को प्रकाशित कर घोर निन्दनीय और दण्डनीय प्रज्ञा अपराध किया है, अतः आपके इस कृत्य की घोर निन्दा करते हुए ब्राह्मण होनें के कारण आपको मृत्यु दण्ड के स्थान पर देश-निकाला के दण्ड से दण्डित   करता हूँ। 
भविष्य पुराण में अधिकांश घटनाओं का उल्लेख भूतकाल में किया गया है, जो स्पष्ट करता है कि, भविष्य पुराण समय समय पर संशोधित और परिवर्धित होता रहा। ऐसे ही अन्य पुराणों में भी महाभारत के बहुत बाद की घटनाओं का वर्णन भूतकाल में लिखा गया है। जिससे उनके रचनाकाल का अनुमान हो सकता है। अस्तु पुराणों में कथित तथ्यों को प्रामाणिक नहीं माना जा सकता।
महाभारत में जहाँ श्रीकृष्ण की एकमात्र भार्या के रूप में रुक्मिणी और उनके पुत्र प्रद्युम्न का नामोल्लेख ही मिलता है। न सत्रसेन यादव की पुत्री सत्यभामा का न जाम्बवन्त जी की पुत्री जाम्बवन्ती का न अन्य पाँच पत्नियों का। जबकि पुराणों में १ रुक्मणि, २ जाम्बवन्ती, ३ सत्यभामा, ४ कालिन्दी (यमुना नदी), ५ मित्रबिन्दा, ६ सत्या, ७ भद्रा और ८ लक्ष्मणा  अष्टभार्याओं का नामोल्लेख पाया जाता है। जिसका कोई आधार सिद्ध नहीं होता है।
अधिकांशतः पुराणों में भी केवल रुक्मिणी को ही श्रीकृष्ण की पट्टमहिषि (हिन्दी में पटरानी) कहा गया है लेकिन कई कथाकार आठ पटरानियों का उल्लेख करते हैं, जो निराधार है।

पुराणों की तो स्थिति यह है कि, ब्रह्मवैवर्त पुराण में तो श्रीकृष्ण की प्रथम पत्नी वृषभानु पुत्री राधा को बतला दिया और कहा गया कि, ब्रह्मा जी ने श्रीकृष्ण के शैशव अवस्था में ही एकान्त वन में लेजाकर श्रीकृष्ण और उनसे चार वर्ष बढ़ी राधा का विवाह करवा दिया था। जिसे बाद में दोनों ही भूल गए। प्रामाणिक बतलाने के लिए यह वर्णन गर्गसंहिता में भी चिपका दिया गया।
फिर आश्चर्य जनक तथ्य यह है कि, बाद में  श्रीकृष्ण की पालक माता और मौसी यशोदा जी के भाई रायण के साथ उसी राधा का विवाह होना बतला दिया। तदनुसार राधा श्रीकृष्ण की मामी हो गई। इसको उचित ठहराने के लिए गौलोक में रायण को श्रीकृष्ण का अंश बतला दिया गया। यदि रायण श्रीकृष्ण का अंश था तो रायण श्रीकृष्ण का पुत्रवत हुआ। तदनुसार राधा श्रीकृष्ण की पुत्रवधू हुई। 
ब्रह्मवैवर्त पुराण में  राधा और अन्य गोपियों के साथ श्रीकृष्ण की कामक्रिड़ाओं के वर्णन पढ़कर आपको लगेगा कि, वात्स्यायन के कामशास्त्र पर आधारित कोई ग्रन्थ पढ़ रहे हैं। इससे अधिक अश्लील वर्णन अन्यत्र मिलना कठिन है।
महत्वपूर्ण उल्लेखनीय तथ्य यह है कि, श्रीकृष्ण ग्यारह वर्ष बावन दिन की अवस्था (वय) में मथुरा चले गये थे और बाद में कभी ब्रज - गोकुल क्षेत्र में नहीं लौटे। इसनी कम अवस्था के बालक पर गोपियों के प्रति कामुकता का वर्णन पुराणों को अविश्वसनीय सिद्ध करता है।

पुराणों में लिखा कि,भौमासुर (नरकासुर) को प्राग्ज्योतिषपुर में मार कर भौमासुर (नरकासुर) द्वारा कैद की गई सौलह हजार कन्याओं को मुक्त कराया। उन राजकुमारियों नें मन ही मन श्रीकृष्ण का पति के रूप में वरण कर लिया। उन सोलह हजार राजकुमारियों ने श्रीकृष्ण से कहा कि, मातृ- पितृ कुल द्वारा नही अपनायें जानें, और इस कारण कोई विवाह भी नही करेगा उन कन्याओं की इस प्रार्थना पर सामाजिक कर्तव्य को देखते हुए श्रीकृष्ण नें इन सोलह हजार कन्याओं से अलग-अलग रूप धरकर एक साथ विवाह कर लिया। इसे शास्त्रीय जामा पहनाने के लिए कथावाचकों नें सोलह हजार रानियों को वैदिक ऋचाएँ बतलाना शुरू कर दिया। इनके अलावा भी सौ और राजकुमारियों से विवाह का भी उल्लेख किया जाता है।
जबकि श्रीकृष्ण और रुक्मिणी ने विवाह उपरान्त भी श्रेष्ठ सन्तान की प्राप्ति के उद्देश्य से बारह वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन किया। तब जाकर प्रद्युम्न को जन्म दिया।
श्रीमद्भागवत पुराण कथा में नाच - गान करवाने वाले, श्रीकृष्ण जन्मोत्सव और रुक्मिणी विवाह की नाट्य लीला करवा कर दहेज देने के नाम पर हजारों रुपए कमाने वाले कथावाचक तो श्रीकृष्ण की एकमात्र पटरानी के स्थान पर आठ पटरानियाँ बतलाने लगे हैं। पट्ट महिषी या पटरानी वह होती है जो राज्य सभा में राज सिंहासन पर राजन के साथ विराजित होती है। अब एक राजा आठ पटरानियों के साथ राजसिंहासन पर कैसे बैठेगा! यह तो कथावाचक ही समझा सकते हैं।
उनके चेले (श्रोता) उनसे आगे बढ़कर सोशल मीडिया में श्रीकृष्ण की एक हजार एक सौ आठ पटरानियाँ बतलाने लगे हैं। अब उन्हें तो केवल ईश्वर ही ज्ञान प्रदान कर सकतें हैं।
अब ईश्वर ही धर्म की रक्षा करने में समर्थ हैं।

रविवार, 25 जून 2023

नमस्ते - नमस्ते, नमस्कार - नमस्कार, प्रणाम - शुभाशीर्वाद, और राम- राम - जय रामजी की का कोई विकल्प नहीं है।

नमस्ते - नमस्ते, नमस्कार - नमस्कार, प्रणाम - शुभाशीर्वाद, और राम- राम - जय रामजी की का कोई विकल्प नहीं है।
नमस्ते ऐसा अभिवादन है जो छोटे बड़ों के लिए नमन, बराबर वालों के लिए परस्पर अभिवादन और छोटों के लिए बड़ों को दिया गया उत्तर तीनों स्थानों पर वैदिक शास्त्रों में उपयोग किया गया है।
प्रमाण हेतु महर्षि दयानन्द सरस्वती कृत सत्यार्थ प्रकाश पढ़ियेगा। सभी आर्यसमाजी केवल नमस्ते का ही प्रयोग करते हैं।
आपने भी शालेय शिक्षण के समय अपने अध्यापकों को नमस्ते ही बोला होगा।
प्रातः उठकर और रात में सोनें के पहले संस्कारित बच्चे और युवा; बड़ों के चरण स्पर्श कर प्रणाम बोलते हैं। बड़े शुभाशीर्वाद या शुभाशीष कहकर उत्तर देते हैं।

आगन्तुक हाथ जोड़कर नमस्कार करते हैं तो आप भी उसके उत्तर में हाथ जोड़कर नमस्कार बोलते हैं। 
ग्रामीण परस्पर अभी भी हाथ जोड़कर राम-राम बोलकर ही परस्पर अभिवादन करते हैं। सामने वाला भी हाथ जोड़कर राम-राम बोलकर या जय श्रीराम बोल कर उत्तर देता है।

फोन पर हेलो शुरु हुआ, और कान्वेंट स्कुल और अंग्रेजी माध्यम शालाओं ने गुड मॉर्निंग सिखाया।
मोबाइल मैसेजिंग और विशेषकर व्हाट्सएप नें अकारण गुड मार्निंग और सु प्रभात प्रारम्भ करवा दिया।
हमारे यहाँ प्रातः काल शुभ ही माना जाता है, कोई आतंक नही था, अतः गुड मॉर्निंग/ सुप्रभात और गुडनाईट/ शुभरात्रि का चलन कभी रहा ही नही।

जो स्वाभाविक रूप से चल रहा था, उसे ही ही चलने देना ही उचित होगा।

ॐ वेदमन्त्र है। इसलिए ॐ का उच्चारण करते समय भी ध्यान रखना चाहिए कि, स्नान किये हुए, शुद्ध- पवित्र अवस्था में, स्वस्थ चित्त से, तीन सेकण्ड ओ तो एक सेकण्ड म् और म् को भी म्....... लम्बित स्वर में ही उच्चारण अर्थात उच्चारण में समय तीन अनुपात एक के नियम का पालन किया जाना चाहिए।
इस लिए ॐ और हरिॐ के विकल्प उचित नही है।
ॐ का उच्चारण नियमानुसार मर्यादा में ही किया जाना चाहिए। जैसे राष्ट्रगीत या राष्ट्रगान को चाहे जब, चाहे जहाँ, और हर स्थिति में नहीं गाया जाना चाहिए ठीक वैसे ही नियम वेद मन्त्रों के लिए है।

जय श्री राम भी इसलिए उचित नही है क्योंकि, परम्परा यह है कि, राम- राम का उत्तर राम- राम या जय राम जी की बोल कर दिया जाता है। अतः नवीन प्रयोगों के बजाय परम्परा पालन ही उचित है।

सुसंस्कृत नगरीय व्यक्ति हेलो के स्थान पर नमस्ते से ही फोन वार्ता  और ई-मेल, प्रारम्भ कर नमस्ते से ही समाप्त करते हैं।
किसी ग्रामीण को फोन लगाएंगे तो वह सहज रूप से हेलो का उत्तर राम-राम बोलकर ही देगा। और स्वयम् फोन लगाएगा तो भी राम-राम ही बोलेगा।
अर्थात भारत में हेलो का भी परम्परागत विकल्प पहले से उपलब्ध है। उसके लिए किसी आई. टी. सेल को ए.सी. चेम्बर में बैठकर खोज करने की आवश्यकता नहीं है।
ये ए.सी.चेम्बर में बैठकर योजनाएं बनाने वाले नेता और अधिकारी तथा मीडियाकर्मी ही ऐसे बे सिर पैर के सुझाव देते रहते हैं कि, गुड मॉर्निंग की जगह जय श्रीराम, गुड नाईट की जगह सीताराम, ओके की जगह ओम का इस्तेमाल करें। तथा फोन पर हेलो के स्थान पर हरि ॐ बोलें।

सोमवार, 19 जून 2023

संशयात्मा विनश्यति।

पुज्य गुरुदेव आचार्य स्व.श्री भास्करराव गजानन राव करमलकर  से मुझे वैदों के विषय में बहुत सी महत्वपूर्ण जानकारियाँ, और वैदिक शब्दों के अर्थों का ज्ञान प्राप्त हुआ। वे पहले सुतार गली इन्दौर में निवास करते थे और बी.टी.आई. आलिराजपुर में प्राचार्य पद पर पदस्थ थे। बाद में उन्होंने सुदामा नगर इन्दौर निवास स्थान बनाया।
वे मुझे उनके पुज्य पिताश्री का वचन हमेशा बतलाया करते थे कि, 
*" जिन्हें एकबार बुद्ध का भूत लग गया, वे उससे कभी उबर नहीं पाते हैं।"
अर्थात जिन्हें सन्देह करनें की आदत लग जाए, सोच- विचार - चिन्तन कर सांसारिक जीवन की समस्याओं का हल खोजते खोजते जिन्हें जगजीवनराम (जगत, जीव और ब्रह्म) के विषय में भी अध्ययन कर चिन्तन करके निष्कर्ष निकालने की आदत पड़ जाए, वे कभी सोचना बन्द नही करपाते। और सत्य का साक्षात्कार रूपी वैदिक दर्शन तभी प्राप्त होता है जब सोचना बन्द कर दिया जाए। लेकिन इसलिए ऐसे संशयात्मा सदा उलझे ही रहते हैं।
यही बात श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि, संशयात्मा विनश्यति ४/४० एवम्
बहुत से शास्त्रों के अध्ययन से तेरी बुद्धि विचलित हो गई है।२/४२ से ४४ तक एवम् २/५३
ये लोग अहंकार पर ही ध्यान केंद्रित रखते हैं, अहंकार का ही पुनर्जन्म मानते हैं। अहंकार से मुक्त होने के लिए, अन्तः करण शुद्धि हेतु यज्ञ, योग, तप रूपी दैहिक कर्म अर्थात भौतिक साधन खोजते रहते हैं। 
अहंकार का वास्तविक अस्तित्व ही नही है, तो उसकी चिन्ता क्या? और चिन्तन क्यों? 
ऐसे ही उपकरण, वाह्य करण, अन्तः करण, अभिकरण, अधिकरण सभी करण हैं तो जड़ पदार्थ ही ना? ये कभी शुद्ध हो ही नही सकते। शुद्ध तो केवल आत्मा/ परमात्मा ही है, जो कभी अशुद्ध होता ही नही, इसलिए उसे शुद्ध करने की आवश्यकता ही नहीं होती।
वे माध्यमिक , योगाचारी और वज्रयानी बौद्ध यह नही समझ पाते हैं कि, नाश उसी का होता है जो वस्तुतः है ही नही। तो अहंकार के नाश की चिन्ता क्यों ? अन्तःकरण शुद्धि की चिन्ता क्यों?
इन जड़ पदार्थों की चिन्ता पालकर जड़त्व ही प्राप्त होना है; चेतन नही। इससे तो केवल निद्रा आलस्य रूप तमोगुण ही बढ़ेगा।
परम चेतन को स्मरण रखें तो चैतन्य बना रहे। 
जो भजे हरि को सदा, वही परम पद पाएगा,वही परम पद पाएगा।
जबकि, श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को स्पष्ट बतलाया है कि, सृष्टि के आदि में प्रजापति ने सृष्टि रचकर देवताओं और मनुष्यों को कहा कि, हे मनुष्यों, तुम देवताओं के लिए यज्ञ करो, इसके बदले देवता तुम्हें भोग्य पदार्थ प्रदान करेंगे। यज्ञ किये बगेर भोग निश्चय ही चोरी है। अध्याय ३/१०
अर्थात पेड़,पौधे, वनस्पतियों, पशु-पक्षियों, कीट-पतङ्ग से लेकर मानव, और देवयोनियों सहित सम्पूर्ण जगत की सेवा रूप पूरे पर्यावरण की रक्षा और सुचारू व्यवस्था बनाए रखने के लिए पञ्चमहायज्ञ करें। ऐसे ही छटे अध्याय श्लोक ११ से ३२ तक में अष्टाङ्गयोग के ध्यान योग का उपदेश दिया है, सृष्टि उत्पत्ति के लिए तो स्वयम्  प्रजापति , हिरण्यगर्भ ब्रह्मा और नारायण तक को तप करना पड़ा। मतलब यज्ञ, योग और तप ये तो सबके लिए अत्यावश्यक कर्तव्य हैं। इनके न करनें में दोष है, करना तो है ही।
इन लोगों के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक ३४ में सत्सङ्ग करने की विधि बतलाकर सत्सङ्ग करने का उपदेश दिया था ।

सृष्टि का कारण।

सृष्टि की रचना ही क्यों हुई ? प्रथम जीव या मनुष्य को जन्म ही क्यों लेना पड़ा ? जबकि, प्रथम जीव/ मनुष्य के जन्म के पूर्व तो संचित तो था ही नहीं, तो प्रारब्ध कैसा ? प्रथम जन्में जीव/ मनुष्य का प्रारब्ध कैसे निर्धारित हुआ होगा? हमें इस आवागमन के चक्कर में क्यों पड़ना पड़ा?
ऐसे और भी बहुत से प्रश्न बन सकते हैं।
आइये इसपर विचार करते हैं।

 सृष्टि की रचना ही क्यों हुई ? प्रथम जीव/ मनुष्य को जन्म ही क्यों लेना पड़ा ?

तार्किक के लिए यह विश्व का सबसे कठीन प्रश्न और भक्त के लिए यह सबसे सबसे सरल प्रश्न है।
परमात्मा के ॐ संकल्प के परिणाम स्वरूप उत्पन्न जैविक  और जड़ जगत रूपी यह सृष्टि परमात्मा की लीला मात्र है।
सृष्टि, स्थिति और लय उस परमात्मा का मौज है, लीला है। 

पूरुष सूक्त,उत्तर नारायण सूक्त, हिरण्यगर्भ सूक्त, अस्यवामिय सूक्त तथा नासदीय सूक्त कहते है कि,.....

परमात्मा के ॐ संकल्प के साथ ही शाश्वत अमर चेतना नें चेतन से जड़त्व की और स्वतः यात्रा आरम्भ की। तीन चौथाई शाश्वत अमर चेतना बनी रही जबकि, एक चौथाई में ही अर्थात कल्याण स्वरूप ॐ संकल्प में प्रकट जड़-चेतन जगत उत्पन्न हुआ। उसमें भी विशेषता यह है कि, जड़ जगत से चेतन जगत थोड़ा सा (दशाङ्गलम्) वाह्य (बाहर) है। 
(जैसे भूमि पर जन्तु वनस्पति भूतल से उपर हैं। चाहे वे गहरे समुद्र में हो या ज्वालामुखी में हो लेकिन अधिकांशतः भूतल पर ही है। कुछेक भूमि के अन्दर भी रहते है पर वे भी भूतल पर आते रहते हैं।)

फिर इस ॐ संकल्प ने भी स्वयम् को ही (औरकम चेतन स्वरूप में अर्थात)  प्रज्ञात्मा  स्वरूप में प्रकट किया। आधिदैविक रूप से यह परब्रह्म कहलाता है। ये प्रज्ञात्मा/ परब्रह्म ही नियन्ता हैं। 
प्रज्ञात्मा को समझने के लिए  दिव्य परम पुरुष तथा परा प्रकृति के युग्म के रूप में बतलाया जाता है। दिव्य परम  पुरुष-परा प्रकृति को  विष्णु और माया के आधिदैविक युग्म में बतलाया गया है। ये परमेश्वर हैं।
यहाँ विष्णु और माया का स्वरूप सूर्य और प्रकाश के रूप में समझा जाता है। या आकाश और व्याप्ति के अर्थ में समझ सकते हैं। अर्थात प्रथम सगुण स्वरूप और उसका गुण। पौराणिक इन्हें शालिग्राम के रूप में तुलसी क्यारी में रखकर पूजते हैं।

प्रज्ञात्मा परब्रह्म नें स्वयम् को प्रत्यगात्मा  स्वरूप में प्रकट किया। जिसे आधिदैविक दृष्टि से ब्रह्म कहा जाता है। प्रत्यगात्मा/ ब्रह्म विधाता ये हैं। इनका विधान ऋत है।
प्रत्यगात्मा को पुरुष और प्रकृति के रूप में जाना जाता है।  जिसे आधिदैविक दृष्टि से सवितृ- सावित्री कहा जाता है। ये महेश्वर हैं, महाकाश हैं।
पौराणिकों के श्री हरि और  कमला देवी (कमलासना) ये ही हैं। इन्हें पुष्कर के ब्रह्म सावित्री के रूप में भी पूजा जाता है। इनकी विशेषता है कि, दोनों को अलग-अलग कमल पर खड़े हुए  बतलाया जाता है।
यह प्रथम चिन्तनीय स्वरूप है। भौतिक वैज्ञानिक भाषा में तरङ्गाकार या कूटाकृति के रूप में समझ सकते हैं। वैसे यह भी वास्तविक सत्य नहीं है।
प्रत्येक जड़-चेतन का व्यक्तिगत स्वरूप प्रत्यगात्मा ही है। अर्थात ये प्रत्येक की इण्डिविज्वलिटि है।

प्रत्यगात्मा नें स्वयम् को औरकम चेतन स्वरूप जीवात्मा के रूप में प्रकट किया। जिसे आधिदैविक दृष्टि से अपरब्रह्म कहा जाता है। जीवात्मा/ अपरब्रह्म को विराट कहा जाता है। 
ये प्रथम साकार स्वरूप हैं। इन्हें पूर्णतः तरङ्गाकार और दीर्घ गोलाकार (लगभग तरङ्गों से बना अण्डाकार स्वरूप) में समझा जा सकता है। 
समझने के लिए जीवात्मा को अपर पुरुष और अपरा प्रकृति या जीव और आयु के अध्यात्मिक युग्म के रूप में बतलाया जाता है। इसे ही नारायण-श्री, लक्ष्मी के आधिदैविक युग्म में बतलाया गया है। ये जगदीश्वर हैं, महाकाल हैं। अर्जून को महाभारत में इस स्वरूप के दर्शन हुए थे।
जैसे इण्टरनेट जेनेरेशन करनें वाला  ऑस्सीलेटर (Oscillator) का क्वार्ट्ज (Quartz)/ क्रिस्टल (Crystal)  वाईव्रेट होता रहता है। और फ्रिक्वेंसी क्रिएट करता है। 
वैसे ही प्रत्यगात्मा भी कभी प्रज्ञात्म भाव की ओर झुकता है कभी जीवभाव की ओर झुकता है। 
जैसे केरियर (Carrier) का काम करने वाली इन्टरनेट तरङ्गे ध्वनि पिक्सल आदि सिग्लन को वहन करती है वैसे ही प्रत्यगात्मा भी जीवभाव को प्राप्त होकर कर्मफलों को एक जन्म से दुसरे जन्म तक वहन करता है।
गुरु पर पूर्ण समर्पण/ ईश्वर प्राणिधान, सत्सङ्ग, स्वाध्याय, विवेक पूर्वक एकाग्र चिन्तन और अभ्यास से इसे प्रज्ञात्मभाव में स्थिर रखा जा सकता है। फिर गुरुमुख से तत्वमस्यादि महावाक्य श्रवण से आत्मज्ञान होते ही जीवभाव का लय हो कर प्रज्ञात्म भाव में स्थित हो जाता है। यही सद्योमुक्ति है।
अर्थात सद्योमुक्त स्वयम् को प्रज्ञात्मा परब्रह्म स्वरूप में देखता है जबकि, बन्धन में बन्धा स्वयम् को अधिक से अधिक जीवात्मा समझता है। 
निम्न श्रेणी के जीव स्वयम् को सुत्रात्मा, विज्ञानात्मा, ज्ञानात्मा, लिङ्गात्मा, मनसात्मा या स्व तक समझते हैं। यही आर्यत्व और म्लैच्छत्व में भेद प्रकट करता है।
(ध्यान रखें एक ही परिवार में आर्य और म्लैच्छ, देवता और असूर, ऋषि-मुनि और मतिभ्रमित सभी प्रकार के जन हो सकते हैं। इसे जातिगत दृष्टि से न देखा जाये। उदाहरण हिरण्यकशिपु और प्रहलाद एक ही परिवार के सदस्य थे तथा विश्रवा, रावण और विभिषण सब एक ही परिवार के सदस्य थे।)

जीवात्मा ने स्वयम् को भूतात्मा के स्वरूप में प्रकट किया। जिसे आधिदैविक दृष्टि से हिरण्यगर्भ कहा जाता है। वास्तविक विश्वकर्मा या आदि विश्वकर्मा भूतात्मा हिरण्यगर्भ ही हैं।  इन्हें दीर्घ गोलाकार रूप में समझा जा सकता है। भूतात्मा को प्राण (चेतना) और धारयित्व (धृति) के रूप में जाना जाता है।
आधिदैविक दृष्टि से ये त्वष्टा और रचना कहलाते हैं। त्वष्टा ने ही सृष्टि के गोले सुतार की भाँति घड़े थे। ये (केवल) ईश्वर हैं अर्थात ईश्वरत्व के अधिकार की दृष्टि से ये सबसे छोटे अधिकारी हैं। ये महादिक हैं।
त्वष्टा-रचना तथा प्रजापति के अलावा हिरण्यगर्भ की मानस सन्तान  सनक,सनन्दन, सनत्कुमार, सनातन,नारद तथा अर्धनारीश्वर एकरुद्र कहे गये हैं।

भूतात्मा वें स्वयम् को सुत्रात्मा के स्वरूप में प्रकट किया। आधिदैविक दृष्टि से इन्हें प्रजापति कहा जाता है। ये ब्रह्माण्ड स्वरूपी हैं अतः इन्हें (वास्तविक) विश्वरूप कहा जाता है। 
सुत्रात्मा को ओज- आभा या रेतधा-स्वधा के रूप में जाना जाता है। प्रजापति को दक्ष प्रजापति (प्रथम)- प्रसूति, रुचि प्रजापति-आकुति और कर्दम प्रजापति-देवहुति के रूप में जानते हैं। ये ही मैथुनिक सृष्टि के आरम्भ कर्ता हैं। 
 दक्ष प्रजापति (प्रथम)- प्रसूति, रुचि प्रजापति-आकुति, कर्दम प्रजापति-देवहुति के अलावा प्रजापति की मानस सन्तान मरीचि-सम्भूति, भृगु-ख्याति, अङ्गिरा-स्मृति, वशिष्ठ-उर्ज्जा, अत्रि-अनसुया, पुलह-क्षमा, पुलस्त्य-प्रीति तथा स्वायम्भूव मनु- शतरूपा नामक भूस्थानि प्रजापति गण हुए। 
तथा रुद्र- रौद्री (शंकर-उमा),तथा पितरः - स्वधा अन्तरिक्ष स्थानी प्रजापति (देवता) हुए।
इन्द्र- शचि, अग्नि-स्वाहा, धर्म- (धर्म की तेरह पत्नियाँ) श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि,मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि और कीर्ति नामक  पत्नियाँ देवलोक/ स्वः स्थानी प्रजापति (स्वर्ग के देवगण) हुए।
इन सबने मिलकर मैथुनिक सृष्टि का आरम्भ किया।

इस प्रकार चेतना की अल्पचेतना या जड़ता की और यात्रा के ॐ संकल्प के परिणाम स्वरूप सृष्टि की रचना  हुई । इसी क्रम में प्रथम जीव या मनुष्य जन्मा।
उसका न कोई सञ्चित था न प्रारब्ध था। वह सीधा ऋत से सञ्चालित था। 
किन्तु उसने  जीव भाव की ओर झुकाव द्वारा कर्मफल सञ्चित कर लिया। जो आगामी जन्म के लिए प्रारब्ध भी बना। और चक्र आरम्भ हो गया। इस प्रकार कर्मासक्ति और कर्मफलासक्ति के माध्यम से सञ्चित बढ़ते गये और प्रारब्ध बनता गया।

प्रथम जन्में जीव अधिकांश तो निवृत्त होगये। अर्थात वे अन्तरात्मा से जीवभाव की और प्रवृत्त ही नहीं हुए। अतः उनका कोई कर्म बना ही नहीं।
इस कारण प्रत्यगात्मा से भी निचले स्तर जीवात्मा का विकास हुआ। तब भी अधिकांश तो निवृत्त ही रहे। इसी बात को पुराणों में कहा जाता है कि, नारद जी ने न उन्हें निवृत्ति की ओर प्रेरित कर दिया जो प्रवृत्त हुए अपनी अपनी जाति-प्रजाति के प्रजापति ही रहे। उनके द्वारा किये गये कर्मानुसार उनके आगामी जन्म हुए।
उस समय चूँकि, जनसंख्या नगण्य थी। और पालक स्वयम् ईश्वर थे, अतः  कोई संघर्ष या क्लेश था ही नहीं। वे अपने राजा स्वयम् थे। स्वानुशासित थे। पर धीरे धीरे कामना, लगाव/ आसक्ति, बढ़ती गई, जीव अहन्ता-ममता की ओर अग्रसर होता गया।
इसका वर्णन सृष्टि उत्पत्ति सिद्धान्त और सृष्टि उत्पत्ति क्रम और कर्म के वर्णन में उपलब्ध है।

वेदान्तियों का काल

निम्बार्काचार्य (स्वाभाविक भेदाभेद)(ईसापूर्व ३०९६ ई.पू. वैदुर्यपत्तनम/ मुंगीपैठन -ओरङ्गाबाद महाराष्ट्र )

आद्य शंकराचार्य जी का सही समय ५०९ ईसापूर्व से ४७७ ईसापूर्व का है।
कुछ लोगों के मतानुसार शंकराचार्य (अद्वैत) (कलियुग संवत २६३१ अर्थात ईसापूर्व ५०७ ई. पू. कालड़ी केरल में जन्में और  कलियुग संवत २६६३ अर्थात ४७५ ई.पू. केदारनाथ उत्तराखण्ड) में देह त्याग किया।
कामकोटि पीठके ३८वें आचार्य चिदम्बरम वासी श्री विश्वजी के पुत्र आचार्य श्री अभिनवशंकर जी ७८७ ईस्वी से ८४० ईस्वी तक ५३ वर्ष विद्यमान रहे। वे ३० वर्ष तक जगन्नाथ पुरी के गोवर्धन मठ के शंकराचार्य के पद पर रहे।इन्होंने कश्मीर के वाक्पतिभट्ट को शास्त्रार्थ में पराजित किया था। 
वर्तमान इतिहासकार इन्हीं शंकराचार्य अभिनवशंकर जी को आद्य शंकराचार्य बतलाते हैं और उनका काल ७८८ - ८२० ई. का बताते हैं। 

वसुगुप्त का शिव सुत्रोक्त त्रिक दर्शन (८६०ई. से ९२५ई.) ।

रामानुजाचार्य (विशिष्टाद्वैत) परम्परा अनुसार रामानुजाचार्य का जन्म १२५७ ईसापूर्व श्रीपेरंबदूर में हुआ और देहत्याग ११३७ ईसापूर्व में श्रीरङ्गम तमिलनाडु में हुआ। 
लेकिन आधुनिक मतानुसार १०१७ श्रीपेरंबदूर से ११३७ श्रीरङ्गम।

मध्वाचार्य (द्वैत)(१२३८ पाजक (उडुपी) से १३१७ उडुपी कर्नाटक)

रामानन्दाचार्य (भक्ति आन्दोलन) (१४०० प्रयागराज से १४७६ वाराणसी)

वल्लभाचार्य (शुद्धाद्वैत) (१४७९ चम्पारण रायपुर से १५३१ वाराणसी)

श्री कृष्ण चेतन्य महाप्रभु (अचिन्त्य भेदाभेद)(१४८६ नवद्वीप से १५३४ जगन्नाथ पुरी)

विभिन्न मत - सम्प्रदायों की आवश्यकता और प्रासङ्गिकता को सिद्ध करने के लिए यों कहा जा सकता है कि,
निम्बार्काचार्य जी के वैदिक संहिताओं, उपनिषदों  के आधार पर प्रस्तुत स्वाभाविक भेदाभेद दर्शन के द्वैधिभाव से असन्तुष्ट जनों के लिए और बौद्धों और जैनों द्वारा भटकाये गये वैदिक लोगों को वेद विरोधी भटकाव से रोक कर वापस वैदिक मत में लाने के लिए शंकराचार्य जी ने वैदिक संहिताओं, उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता, और बादरायण कृत शारिरिक सुत्र और विष्णु पुराणादि स्मृतियों के आधार पर अद्वैत वेदान्त दर्शन प्रस्तुत कर लोगों को  बचाया।
वसुगुप्त (८६०ई. से ९२५ई.) ।
इससे अप्रसन्न तान्त्रिकों नें सांख्य दर्शन की तत्व मीमांसा और शुन्यवाद एवम विज्ञान वाद मिला कर अद्वैत वेदान्त का भ्रमोत्पादक त्रिक दर्शन वसुगुप्त ने सतहत्तर श्लोक का शिव सुत्र रचकर दिया (८६०ई.-९२५ई.) । जिससे वैदिक देवता शिव के नाम के कारण आस्तिक जन भी सन्तुष्ट रहें।
अभिनव गुप्त (९५० ईस्वी कश्मीर से १०१६ ईस्वी तक मंगम कश्मीर ) ने विभिन्न आगम सिद्धान्तों और पद्धतियों में सर्वश्रेष्ठ रूप में मान्य अनुत्तरषडर्धक्रम (त्रिक) परम्परा में पद्धति और प्रक्रिया का ग्रन्थ तन्त्रालोक रचा।
इस प्रयास को देखकर दृविड़ आलवार सन्त यामुनाचार्य ने ब्राह्मण रामानुजाचार्य को प्रस्तुत किया जिननें कृष्ण यजुर्वेद, उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता, और बादरायण कृत शारिरिक सुत्र और विष्णु पुराण को आधार बनाकर कर वैष्णव भक्ति प्रधान तथा सरल विशिष्टाद्वैत दर्शन प्रस्तुत किया।
उक्त अति शास्त्रिय मत समझ न पानें वाले आस्तिक वैष्णव भक्त जनों को सन्तुष्ट रखनें के लिए मध्वाचार्य जी ने भक्ति प्रधान द्वैतवाद प्रस्तुत किया।
रामानुज सम्प्रदाय के अनुयाई रामानन्दाचार्य नें  निर्गुण ब्रह्म मत प्रचारक कबीरदास जी उनके शिष्य/ अनुयाई नानक देव,सगुण मतावलम्बी और विभिन्न जातियों में उत्पन्न सन्त रविदास आदि अनेक सन्तों और वैष्णव भक्तों की श्रंखला खड़ी करदी।
लेकिन कुछ तान्त्रिक प्रवृत्ति के वैष्णव लोगों को त्रिक दर्शन पसन्द आनें लगा तो वल्लभाचार्य जी नें त्रिक दर्शन का वैष्णव स्वरूप शुद्धाद्वेत दर्शन प्रस्तुत कर दिया।  
उसी समय बङ्गाल में श्रीकृष्ण चेतन्य महाप्रभु ने भजनानन्दियों के लिए न्याय दर्शन के आधार पर अचिन्त्य भेदाभेद दर्शन प्रस्तुत किया।
तो इन सबके बाद सबसे सफल 
इस प्रकार वेदिक धर्म रक्षार्थ सभी नें अपने स्तर पर प्रयत्न किया

सभी आस्तिक दर्शनों का आधार वेद ही होनें से पञ्चमहायज्ञ, अष्टाङ्गयोग, और भक्ति भाव में सभी समान रूप से आस्थावान हैं यह कोई साम्य नही हुआ। क्योंकि मतभेद तत्व मीमांसा या ज्ञान मीमांसा में ही है। नीति दर्शन और उपासना पद्यति अविवादित विषय है।

आचार्य, गुरु और शिष्य

 उपनिषद और श्रीमद्भभग्वद्गीता भी आत्मज्ञ के पास शिष्यभाव से जाकर पुछने पर गुरु द्वारा ज्ञान प्रदान करने पर ही आत्मज्ञान होने का ही निर्देश करते हैं।
क्योंकि, ज्ञान किसी कर्म का फल नही।
वह गुमा हुआ चौथा साँथी तु स्वयम् है कहानी के समान हमारा वास्तविक स्वरूप जो हम भूले हुए हैं और जीवभाव से ग्रस्त है उसके निवारणार्थ ही शिष्य को गुरु के पास जाने का निर्देश है।
 केनोपनिषद में तो स्पष्ट ही कहा है कि, शिष्य गुरु से किस प्रकार प्रश्न करेगा और गुर क्या उत्तर देगा।
कठोपनिषद में यम नचिकेता को उपदेश देते हैं तब नचिकेता को ज्ञान हुआ। प्रश्नोपनिषद में पिप्पलाद सबके संशय और भ्रम निवारण कर ज्ञान देते हैं।
मुण्डकोपनिषद में अङ्गिरा शौनक को ज्ञान प्रदान करते हैं।
तैत्तरीयोपनिषद में गुरुकुल और आचार्य शिष्य की सामुहिक प्रार्थना का उल्लेख है।
छान्दोग्योपनिषद और वृहदारण्यकोपनिषद में तो कई कहानियाँ है जिसमें एक आचार्य दुसरे आचार्य के पास ज्ञान प्राप्त्यर्थ जाकर पुछता है और आचार्य उसे ज्ञान प्रदान करते हैं।
इसके अलावा भी छान्दोग्योपनिषद में अग्नि और वायु को ज्ञान नही हुआ जबकि, यक्ष रूपी ब्रह्म प्रत्यक्ष थे। किन्तु भगवती उमा के कथन मात्र से इन्द्र को तत्काल स्मृति/ ज्ञान हो गया।

प्रज्ञात्मा प्रत्यगात्मा और जीवात्मा में सम्बन्ध।

ऋग्वेद मण्डल 01/सुक्त 164/ मन्त्र 20, 
अथर्ववेद काण्ड 09/ सुक्त14/मन्त्र 20, 
मुण्डकोपनिषद मुण्डक 03/खण्ड01/ मन्त्र 01 एवम् 02
श्वेताश्वतरोपनिषद अध्याय 04/ मन्त्र 06 एवम् 07

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया, समानम् वृक्षम् परिषस्वजाते ;
तयोरन्यः पिप्पलम्  स्वादन्त्यनश्नन्नन्यो, अभिचाकशीति।

समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोनीशया, शोचति मुह्यमान;
जुष्टम् यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य , महिमानमिति वीतशोकः।

कठोपनिषद अध्याय 01/वल्ली 03/ मन्त्र 01 , 

ऋतम् पिबन्तौ सुकृतस्य लोके, गुहाम् प्रविष्टौ परमें परार्धे ;
छाँयातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति, पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः।

इसी सन्दर्भ में छान्दोग्योपनिषद  06/खण्ड03/मन्त्र 01 एवम् 02

तेषाम् खल्वेषाम् भूतानाम् त्रीण्येव बीजानि भवन्त्याण्डजम् जीवजमुद्भिज्जमिति। उध इन (पक्षी आदि) प्रसिद्ध प्राणियों के तीन ही बीज होते हैं -- 01 आण्डज यानि अण्डे से उत्पन्न अण्डज, 02 जीवज यानि जरायुज यथा मानव और पशु आदि गर्भ से सीधे बच्चा होने वाले और 03 उद्भिज यानि वनस्पति के बीज / दाने से उत्पन्न। 01
(सुचना -- यहाँ  पसीने से उत्पन्न स्वेदज और उष्मा से उत्पन्न शंकोकज को भिन्न नही माना है।)

सेयम् देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन , जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरव्राणीति।
उस इस ('सत' नामक) देवता ने ईक्षण किया , 'मै इस जीवात्मा रूप से' इन तीनों देवताओं में अनुप्रवेश कर नाम और रूप की अभिव्यक्ति करूँ।02
अर्थात अण्डज, जरायुज (जीवज) और बीजों से उत्पन्न वनस्पति (उद्भिज) में भी जीवात्मा रहती है।
 एवम् 
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 05/मन्त्र 29 
भोक्तारम् यज्ञतपसाम् , सर्वलोकमहेश्वरम् ;
सुहृदम् सर्वभूतानाम् , ज्ञात्वा माम् शान्तिमृच्छति।
मुझको सब यज्ञों और तपों का भोगनेवाला , सर्वलोकों के ईश्वर हिरण्यगर्भ ब्रह्मा और जगदीश्वर विराट अपरब्रह्म (जीवात्मा) का भी ईश्वर होनें से महेश्वर 【विधाता ब्रह्म, प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा)】तथा सम्पुर्ण भूतप्राणियों का सुहृद (अकारणकरुणाकरण, दयानिधि, और प्रेमी) जानकर शान्ति को प्राप्त होते हैं।

परब्रह्म और प्रत्यगात्मा का देहमें साथ साथ रहना और  प्रत्यगात्मा द्वारा कर्म करना और भोग भोगना भी देखें।

श्वेताश्वतरोपनिषद अध्याय03/मन्त्र20
कठोपनिषद 1/02/20 , 

अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य, जन्तोर्निहितो गुहायाम्, 
तमक्रतु पश्यति वीतशोको , धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः
अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य, जन्तोर्निहितो गुहायाम्, 
तमक्रतु पश्यति वीतशोको , धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः

इस जीवधारि के चित्त में रहने वाला प्रज्ञात्मा  सुक्ष्मतम  भी है और  महा से अतिमहा भी है।  आत्मा/ प्रज्ञात्मा की उस महिमा (महत्ता) को उस जीवधारी को धारण करने वाले प्रज्ञात्मा की कृपा प्रसाद से ही वह कामनारहित, जो जानता है कि, अपर पुरुष की त्रिगुणात्मक प्रकृति के तीनों गुणों का आपसी व्यवहार या बर्ताव ही सब क्रियाएँ है; यह जानने वाला अकृत पुरुष ;  जिनके समस्त दुख सन्ताप निवृत्त हो गये है वे ही जीवन्मुक्त धीरपुरुष ही प्रज्ञात्मा परब्रह्म को जान पाते हैं।

(सुचना --  
जन्तु यानि जीवधारी।
बुद्धिगुहा के केन्द्र अर्थात चित्त में निहित।
निहित अर्थात रहने वाला प्रज्ञात्मा ही देहधारी तत्व है। अतः प्रज्ञात्मा को जन्तोर्निहित कहा गया है।
इलेक्ट्रॉन, पॉजिट्रॉन या फोटान आदि का भी कारण होने से अणोरणीयान् अर्थात सुक्ष्मातिसुक्ष्म कहा है।
जीवात्मा अपरब्रह्म को विराट कहते हैं। इस विराट से महत् विधाता, प्रत्यगात्मा ब्रह्म होता है; किन्तु उस प्रत्यगात्मा ब्रह्म से भी परे, अति महा (महान) प्रज्ञात्मा परब्रह्म है अतः उन्हे परम ब्रह्म कहा है। 
बरः यानि बड़ा से भी महः यानि महा ब्रह्म होता है। और जिससे  आगे या जिसके बादमे उस श्रेणी में कुछ नही हो उसे परम कहते हैं। अतः उसे परब्रह्म कहते हैं।

परमात्मा और विश्वात्मा ॐ गुणातीत हैं अतः उन्हे धारणकर्ता भी नही कहा जा सकता। अतः जीवनधारक प्रज्ञात्मा ही कही जा सकता है।

क्रियाओं को अपने द्वारा होना न मानने वाला, जो जानता है कि, अपर पुरुष की त्रिगुणात्मक प्रकृति के तीनों गुणों के आपसी व्यवहार या बर्ताव को ही सब क्रियाएँ  है उसे अक्रत कहते हैं। उसके कर्म अकर्म हो जाते हैं।
जिनके समस्त दुख सन्ताप निवृत्त हो गये है उन्हे वीतशोक कहते हैं।
वे ही देखपाते है अर्थात वे ही जान पाते है। ऐसे आत्मज्ञ को ईशावास्योपनिषद में धीरपुरुष कहा है। वे सद्योमुक्त यानी जीवनमुक्त होते हैं अर्थात इस जीवन में जीवीत रहते हुए भी मुक्त रहते हैं।)

हमारे अन्तःकरण के बुद्धि आकाश में दो तत्व या देव एक देवता रहते हैं; उपनिषदों में कहागया है कि समान वृक्ष पर दो पक्षी बैठे हैं। उनमें से एक तो वृक्ष के मिठे फलों को खाता है जबकि दुसरा पक्षी केवल दृष्टाभाव से देखता रहता है।
इसमें दृष्टा पक्षी हमारा वास्तविक स्वरूप प्रज्ञात्मा परब्रह्म हैइस अवस्था में सर्वव्यापी भाव होनें के कारण अहन्ता ममता (मैं मेरा) के लिए कोई अवकाश (स्थान) ही नही रहता। सर्वखल्विदम् ब्रह्म वाला भाव रहता है। यह  छुपा हुआ कुटस्थ रहता है। ज्ञान प्रकाश से ही स्वयम् को प्रकट करता है। यह गुणातीत है,  क्षेत्रज्ञ है, पुर्ण है परम गति है। मतलब यहाँ आकर गति अर्थात कर्म और कर्म फल समाप्त हो जाते हैं।
हमारा वास्तविक स्वरूप तो यही है।
किन्तु बिनु हरिकृपा मिलहिं नही सन्ता। और बिन गुरु ज्ञान न होई सिद्धान्त से योग्य पात्र / योग्य शिष्य नही बन जाते तब तक गुरु सामने हो तो भी गुरु से साक्षात्कार नही हो पाता। योग्य होते ही गुरु के उपदेश स्थाई प्रभाव से समझ आ जाते हैं। और हम आत्मस्थ हो जाते हैं।
किन्तु जबतक हम उक्त अवस्था तक न पहूँचें तबतक हम प्रत्यगात्मा ब्रह्म महा आकाश, क्षेत्र की अवस्था में रहते हैं।
यह भी सर्वगुण सम्पन्न है। कालातीत, प्रकृति में स्थित, सुख-दुःख का कारण, (सुख-दुःख हेतु) है, उपदृष्टा, अनुमन्ता (अनुमति देनेवाला), भर्ता-भोक्ता, महेश्वर है। भूतों के नष्ट होनें पर भी नष्ट नही होता है। यह गतिमान है। उपर नीचे होता रहता है। जबतक प्रज्ञात्मा की ओर झुकाव तो उस समय मे आत्मज्ञता अनुभव करता है। पुर्णता अनुभव करता है। इसकारण निर्भय, निर्विकार, निर्वेर रहता है। वहीँ स्थिर रहना भी चाहता है। किन्तु अचानक संस्कार जोर पकड़ते हैं और रजोगुण जोर पकड़ता है।और यह जीवभाव की ओर झुक जाता है।और स्वयम् को  जीवात्मा अपरब्रह्म मानकर क्रियाशील होजाता है। यह स्वयम् को क्षर (क्षरणशील/ खिरने वाला/ अपुर्ण होनें के भय से आक्रान्त) हो जाता है।उस अवस्था में यह प्रकृति जन्य गुणों का भोक्ता होता है। 
गुण सङ्गानुसार ( सत्वरज तम गुणों के जिस काम्बिनेशन के साथ होता है तदनुसार) योनि प्राप्त करता है। मरणोपरान्त जो योनि प्राप्त होती है वह तो है ही। पर इसी देह में रहते भी हम अनेक योनियों में भटकते रहते हैंजिस योनि में रहते मरेंगे उसी योनि में जन्मेंगे।
कई बार हम प्रज्ञात्मा की ओर झुकाव के चलते ब्राह्मण होते हैं। कभी करुणामय होनें से परहित रक्षक क्षत्रिय होजाते हैं। कभी व्यवहार में लेनदेन बराबर करनें में जैसे विवाह आदि में किसको क्या देना कितना देना आदि विचारों में मग्न होकर वैष्य होते हैं। कभी स्वयम् को दीनहीन मानकर जिससे काम पड़ जाये उसकी सेवा में तत्पर होकर शुद्र होजाते हैं। कभी बदले की भावना से म्लेच्छ होजाते हैं। किसी को हानि पहूँचाने के संकल्प के साथ असुर हो जाते हैं। भोग लिप्सा में तदनुरूप योनि में होते हैं। जैसे अति भुख में भोजन करते समय पशुवत सब भरलेते हैं। भक्ष्य अभक्ष्य का ध्यान नही रहे तो शुकर योनि में पहूँच जाते है। पुण्य उदय होजाये तो शुकर से अचानक देवता भी बन जाते हैं।
यही सब माया का प्रभाव है। इसीलिए मार्कण्डेयपुराण में महर्षि मेधातिथि कहते हैं  - 
ज्ञानिनामपि चेतान्सि, देवी भगवती हि सा , बलादाकृष्य मोहाय, महामाय प्रयच्छति। 
दुर्गासप्तशती प्रथम अध्याय के श्लोक 55-56
भगवान नारायण को भी योगनिन्द्रा को वश में करनें वाली भगवती; भगवान विष्णु की महामाया ज्ञानियों के चित्त को बलपुर्वक खीँचकर मोह में डाल देती है।
श्रीमद्भगवद्गीता २/६२ और ३/३७ में में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि, रजोगुण प्रधान होनें पर, मैं भाव उत्पन्न होनें पर हम जिस जिस प्रकार के सोच-विचार, चिन्तन करते हैं, उसी भाव, उस विषय में हमारी आसक्ति (लगाव) हो जाता है। फि उस विषय भोग/ वस्तु आदि की हमें कामना (प्राप्त करने की इच्छा) होनें लगती है। इस प्रकार काम का उदय होता है। यह काम ही सबसे बड़ा शत्रु है। काम्य वस्तु विषय प्राप्त हो जाए तो उससे ममत्व (ममता/ मैरापन) हो जाता है। और काम्य वस्तु प्राप्त होनें के बाद छिनने पर या काम्य वस्तु/ विषय प्राप्ति में विघ्न पड़ने पर विघ्नकारक पर क्रोध उत्पन्न हो जाता है। क्रोध में सही- गलत, उचित -अनुचित का बोध समाप्त हो जाता है, अर्थात मोह वश बुद्धि में मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है। मूढ भाव में बुद्धि स्थिर नही रह पाती अतः विवेक समाप्त हो जाता है। और मनुष्य का पतन हो जाता है।

ऋग्वेदोक्त देवी सुक्त में देवी वाक अम्भृणी (वागाम्भृणी) ने बहुश्रुत के प्रति कहा है--
यम् कामये तम् तमुग्रम् कृणोमि,
तम् ब्रह्माणम् तमृषिम् तम् सुमेधाम्। 
मन्त्र 5
मैं जिस-जिस पुरुष की रक्षा  करना चाहती हूँ, उस-उसको सबकी अपेक्षा अधिक शक्तिशाली बना देती हूँ। उसी को सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, परोक्षज्ञान-सम्पन्न ऋषि (जिन्हे प्त्यक्ष ज्ञान हो ऐसे आत्मज्ञानी- ब्रह्मज्ञानी ऋषि) तथा उत्तम मेधाशक्ति से युक्त बनाती हूँ। 

इसमें हमारा हट भी क्या करेगा ? अतः समर्पण ही सर्वश्रेष्ठ विधि है। उचित यही है कि, अहन्ता (मैं भाव) आते ही हरिशरण ग्रहण कर लें। वे ही अपनी माया समेट सकते हैं।

मतलब हम जो अपनें दम पर सफलता या अपनी गलती से असफलता मानकर सुखी दुःखी होते हैं वास्तव में उसमें हमारे कर्मों का आभास होता है। जैसे स्वीच ऑन किया, पंखा घुमनें लगा अब उसे अन् चाहे भी चलना ही पड़ेगा। इसके पहले पंखा चाह कर भी नही घूम सकता , स्वीच बन्द किया पंखा बन्द हो गया अब पंखा चाहकर भी घुमता नही रह सकता। 
यही स्थिति हमारे शरीर, इन्द्रियों, मन - संकल्प, अहंकार - अस्मिता, बुद्धि - मेधा (स्मरण शक्ति) , चित्त - चेत आदि वृत्तियाँ , तेज - विद्युत, और ओज - कान्ति आदि से सम्पन्न होने वाले कर्मों की भी है। जबतक स्वीच ऑन है तभी तक अपनें आप ही प्रकृति के गुण अपने अपने गुणों में व्यव्हार कर रहे हैं बरत रहे हैं इसमें हमारे कर्म है ही कहाँ? जब कर्म हमारे नही तो फल भी हमारे नही हुए।

वस्तुतः अध्यात्मिक स्वरूप में हम प्रज्ञात्मा (परम पुरुष- परा प्रकृति) या आधिदैविक स्वरूप में परब्रह्म (विष्ण-माया) हैं ।
किन्तु प्रज्ञात्मा होते हुए भी हम पहले बतलाये अनुसार स्वयम् को अध्यात्मिक रूप से प्रत्यागात्मा (अन्तरात्मा) (पुरुष -प्रकृति) आधिदैविक रूप में सवितृ- सावित्री या श्रीहरि - कमलासना ) मानलेनें के कारण तु और मैं, यह- वह के आभासी जगत का अनुभव कर रहे हैं। और माया से लड़ रहे हैं। ठण्ड का आभास हुआ तो ताप लिया औढ़ लिया, गर्मी लगी तो पंखा झेल लिया बरसात से बचनें के लिए छाता लगा लिया या छत के नीचे आ गये। यह सब प्रकृति से लड़ना ही तो है। प्रकृति (माया) के वार से बचनें के लिये ढाल खोजनें में ही पुरा जीवन लग जाता है।
प्रकृति को माया को जिनने माँ मान लिया वे तो उसी की गोद में ही बैठ गये। और निवेदन करते हैं हे माँ    हम और कुछ नही जानते, न जानना चाहते हैं, न और कुछ चाहते हैं, हमें तो और कुछ नही चाहिए, हमें पिताजी (विष्णु परमपद) के चरणों में (गोद में) डाल दीजिये बस और वे माता महामाया भी वात्सल्यमयी होकर पुत्र को श्री विष्णु चरण रूपी श्रेयमार्ग पर डालकर हमारा कल्याण कर देती है।
यह वेदिकों का मायावाद है। यही भक्ति मार्ग है। जहाँ लक्ष्य - मोक्ष पुरुषार्थ है और मार्ग - समर्पण। यह समर्पण तभी आता है जब हमें अपने प्रभु का बोध हो, हमें उनका ज्ञान हो कि हमारे प्रभु विष्णु है, वही ॐ हैं, वही परमात्मा हैं। और उनकी ही माया विद्या रूप में हमें उनतक पहूँचाने वाली है। इसी के लिए अन्तःकरण शुद्धि हेतु पञ्चमहायज्ञ का आलम्बन लेना है। पञ्चमहायज्ञ में ज्ञानयज्ञ के अन्तर्गत ही अष्टाङ्गयोग, जप -तप आदि सब आते हैं। ये कोई अलग विधाएँ नही है।

ज्ञानि भक्त का समर्पण कैसा होता है ? -- ज्ञानि भक्त के भाव ऐसे होते है -- हे प्रभु  हर फेसला तेरा मुझे मञ्जूर है। जाँहि विधि राखे राम ताँहि विधि रहिये।  है प्रभु मैं बस और बस आपका ही हूँ। न मैं आपके अलावा कुछ जानता समझता हूँ और न जानना समझना चाहता हूँ। बस तु ही तु है नाथ बस तु ही तु है।