रविवार, 14 सितंबर 2025

श्राद्ध पक्ष में पूजा प्रारम्भ करने या पूजन करने का किसी भी शास्त्र में निषेध नहीं है।

श्राद्ध पक्ष में किसी भी देवता की पूजा करने का निषेध नहीं है।
पितृ पक्ष में अर्थात श्राद्ध पक्ष में किसी भी देवता की पूजा प्रारम्भ करने का भी निषेध नहीं है।
उठावने के दिन मन्दिर में जाते हैं।
गरुड़ पुराण सुनने के समय विष्णु पूजा करते हैं।
एकादशाह, द्वादशाह, त्रयोदशाह में, मासिक त्र श्राद्ध में, त्रेमासिक श्राद्ध में, अर्ध वार्षिक श्राद्ध में, वार्षिक श्राद्ध में, दो वर्ष पश्चात श्राद्ध में सम्मिलित करने के समय, प्रतिवर्ष मृत्यु तिथि को होने वाले एकोदिष्ट श्राद्ध में और श्राद्ध पक्ष में होने वाले पार्वण श्राद्ध में विष्णु पूजा करते हैं।
अर्थात श्राद्ध में विष्णु पूजा का विधान है, और विष्णु परम पद है। सर्वोच्च देव हैं। जब उनकी पूजा होती है तो किसी देवता और रामभक्त हनुमान जी की पूजा का निषेध कैसे हो सकता है?
किसी भी शास्त्र में श्राद्ध पक्ष में पूजा प्रारम्भ करने और पूजा करने का निषेध नहीं है।

शुक्रवार, 12 सितंबर 2025

मैं शास्त्रोक्त कर्म शास्त्रोक्त विधि से ही करने पर जोर क्यों देता हूँ।

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 16, श्लोक 23 और 24

 शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्‌॥
भावार्थ : जो पुरुष शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को ही ॥16-23॥
 
 
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥
भावार्थ : इससे तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्र विधि से नियत कर्म ही करने योग्य है ॥16-24॥

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 18, श्लोक9

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः।। 18-9

हे अर्जुन! जो शास्त्रविहित कर्म करना कर्तव्य है—इसी भाव से आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है—वही सात्विक त्याग माना गया है।

श्राद्ध क्यों आवश्यक है और श्राद्ध ग्रहण कौन करता है? और श्राद से क्या लाभ होगा?

हम आज जो पानी पीते हैं, इस पानी से प्यास बुझती है यह खोज करने वाले वैज्ञानिक, जल स्त्रोत की खोज करने वाले वैज्ञानिक, जल स्रोत तसे हमारे मुख तक पहूंचाने के लिए संसाधन की खोज करने वाले अनेक वैज्ञानिकों (जिन्होंने बाल्टी, मटका, ग्लास से लेकर नर्मदा जल हमारे घर तक पहूँचने में प्रयुक्त विद्युत निर्माण से पारेषण तक, पाइप लाइन, फिटिंग्स , लगने वाले औजार आदि की खोज करने वाले वैज्ञानिक) ऐसे अरबों खरबों लोगों के योगदान और कृपा से हम पानी पी पा रहे हैं, उन सबके प्रति श्रद्धा समर्पण सर्वपितृ अमावस्या को हम जरासा त्याग कर एहसान नहीं करते हैं। यह तो हमारा दायित्व बनता है, कर्तव्य है।
श्राद्ध में ये पितर और विश्वेदेवाः के लिए स्वधा (स्व को धारण करने की शक्ति) समर्पित की जाती है।
जिन सात पीढ़ी के पूर्वजों और ऐसे ही अभीतक मर चुके सर्व पितरों के लिए आप जो श्राद्ध करते हैं उनमें से कोई एक का जन्म लेकर सम्भव है कि, स्वयम् आप ही हो, या आपके परिवार में ही कई व्यक्ति हों, जो उस समय उसी स्थान पर हो, इसलिए सात पीढ़ी के पूर्वजों और ऐसे ही अभी तक मर चुके सर्व पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए आपको जिन भोग पदार्थों के प्रति लगाव है उनको चुंकि वे भोग पदार्थ सृष्टि के आदि से आज तक उत्पन्न लोगों के सहयोग से ही आप तक पहूँची है, इसलिए उसका एक अंश जरुरतमंद लोगों को दान कर अपना कर्तव्य निर्वहन करते हैं। इस प्रकार आप
*(1) अग्निष्वात (2) बहिर्षद (3) कव्यवाह (4) अर्यमा, (5) अनल (6) सोम और (7) यम* 
तथा
 *1 दक्ष, 2 व्रतु, 3 वसु, 4 काम, 5 सत्य, 6 काल, 7 रोचक, 8 आद्रव, 9 पुरुरवा तथा 10 कुरज*
के प्रति अपनी श्रद्धा समर्पित करते हैं। 
ये पितर और विश्वेदेवाः उन पदार्थों में से एक परमाणु भी ग्रहण नहीं करते हैं, वे केवल आपकी श्रद्धा और प्रेम ग्रहण कर अब जो चीजें आपके पास बची है, उन चीजों में उनका अपना स्नेह और प्रेम डाल देते हैं इस कारण अब वे चीजें आपके लिए आयु, पुष्टि, तुष्टि और सन्तुष्टि कारक, बल वर्धक, स्वास्थ्य वर्धक हो जाती है।
और आपने जिन मृतको के निमित्त श्राद्ध किया है उन्हें भी तुष्टि और पुष्टि, बल और सामर्थ्य के रूप में पहूँचा देते हैं।
न कोई देवता, न देव, न भगवान न ईश्वर न परमात्मा कोई भी आपके द्वारा अर्पित भोग का एक परमाणु भी ग्रहण नहीं करते हैं। उसमें से वे केवल आपकी श्रद्धा और प्रेम ग्रहण कर उस भोग में डाल देते हैं इस कारण वह प्रसाद (कृपा) बन जाता है। और आपको अत्यन्त रोचक, स्वादिष्ट लगने लगता है। यह चमत्कार प्रायः सभी ने अनुभव किया है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन का अर्थ।

परिणाम प्राप्त्यर्थ ही कर्म का आरम्भ होता है। गन्तव्य तक पहूँचने के लिए ही पहला कदम उठाया जाता है। 
निरुद्देश्य कर्म तो निषिद्ध कर्म माना जाता है।
अनर्गल चेष्ठाएँ जैसे बैठे बैठे पेर हिलाना, हाथों की उँगलियों से अकारण कुछ करन, फोन पर बात करते हुए कागज पर कुछ चितरना (अनघड़ डिजाइन बनाना, हस्ताक्षर करना आदि) निरुद्देश्य कर्म होने से निषिद्ध कर्म है।
दान देना एक कर्तव्य है।
लेकिन दान देने के पीछे कई मंशा या आशय (इण्टेन्शन) और उद्देश्य हो सकते हैं,
1 किसी जरुरतमंद की आवश्यकता पूर्ति करना।
चूंकि वह वस्तु मेरे पास है और जरुरतमंद व्यक्ति को उस चीज की आवश्यकता मुझ से अधिक है, उसे इसकी आपूर्ति की तत्काल आवश्यकता है इसलिए तत्काल दे देना।
अर्थात कर्तव्य मान कर दान करना। बस यही दान सार्थक है। यही दान है।
शेष व्यापार मात्र है।
2 देखनें वालों में मेरी दानशीलता का प्रभाव पड़ेगा, यश, प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि और प्रचार होगा। इसका फल तत्काल मिल जाता है और कर्मफल पूर्ण हो जाता है।
ये थे कर्म फल जिसमें पहले वाला निष्काम कर्म अर्थात यज्ञ के लिए यज्ञ था।
शेष सभी राजसी तामसी दान केवल बन्धन कारक हैं।

3 अनन्त गुना होकर मेरे अकाउण्ट में जमा रहेगा और आवश्यकता पड़ने पर लौटकर मुझे मिल जाएगा। अर्थात स्वार्थ बुद्धि। खाते में पुण्य संचय होकर इसका फल होता है।
4 स्वर्गादि लोक प्राप्ति। 
5 अन्तःकरण शुद्धि - यह नया फण्डा है। जो मेरे मत में केवल मुर्खतापूर्ण सोच है। त्रिगुणात्मक प्रकृति और प्राकृतिक पदार्थ चित्त, बुद्धि, अहंकार और मन कभी शुद्ध नहीं हो सकते। क्योंकि ये प्रकृति में आये विकार का परिणाम है। विकृति ही है। शुद्ध तो केवल प्रज्ञात्मा ही है। मूलतः ये लोग प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) को जीव भाव से मुक्त कर प्रज्ञात्मा की ओर ले जाकर प्रज्ञात्मा में लीन करना चाहते हैं, लेकिन तत्व मीमांसा के ज्ञान के अभाव में गलत शब्द बोलते हैं।
 
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
का अर्थ लोगों ने गलत किया है। परिणाम की अपेक्षा से ही कर्म होता है, लेकिन कर्मफल ऋत के अनुसार स्वतः होता ही है, कर्मफल की इच्छा रखना या न रखने से ऋत को कोई अन्तर नहीं पड़ता। ऋत की प्रक्रिया नियत है। उसे आपकी सोच नहीं बदल सकती।

शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

ईश्वर तथा देवता गण के बारे में वैदिक और इब्राहीमी अवधारणा में अन्तर

सातवें आसमान पर बैठा व्यक्ति निश्चित ही सातवें आसमान से आकार (साइज) मेंं छोटा होगा। अतः गोलाकार हो या दृव और गैस के समान कूटाकृति लेकिन निराकार तो हो ही नही सकता।

निराकार सर्वव्यापक परमात्मा ही हो सकता है।

ॐ कार नाम से ही स्पष्ट है कि ॐ भी साकार ही है। शेष देव हों या देवता निराकार नही मानें गये हैं। चाहे वे तरङ्गाकार हो, कूटाकृति हो, दीर्घगोलाकर (सामान्य भाषा में अण्डाकार) हो, गोलाकार हो या पुरुषाकृति (देह के समान आकार वाले) हों।

यहूदी यहोवा परमेश्वर के अलावा पवित्रात्मा (उनके देवताओं या फरिश्तों) को भी नमन / दण्डवत नमन करते हैं। विद्या ददाति विनयम्, विनयम् ददाति पात्रताम्। विनम्रता गुण है कोई दोष नहीँ। अपने से योग्य और वरिष्ठों का आदर करना सद्गगुण है दोष नही। उनके सामने विनम्र होना ही चाहिए । ठूंठ जैसे खड़े रहना तो ढीठता ही है। पर वे भी देवताओं को परमेश्वर नही मानते। अतः उनके लिये भी यह नही कहा जा सकता कि, वे यहोवा परमेश्वर के समतुल्य किसी देवता फरिश्ते / पवित्र आत्मा को मानते हैं।

ईसाइयों का धर्म भी यहुदियों के ही समान है।केवल कर्मकाण्ड की क्रियाओं में थोड़ा अन्तर है। ईसाई भी यहोवा परमेश्वर के अलावा पवित्रात्मा (उनके देवताओं या फरिश्तों) को भी नमन करते हैं। पर वे भी देवताओं को परमेश्वर नही मानते। साथ ही यीशु को भी परमेश्वर का पुत्र मानते हैं। पर सर्वोच्च स्थान उनके मन में भी यहोवा के प्रति ही है।यीशु दुसरे स्थान पर ही हैं। अतः उनके लिये भी यह नही कहा जा सकता कि, वे यहोवा परमेश्वर के समतुल्य किसी देवता फरिश्ते / पवित्र आत्मा को मानते हैं।

फिर उन्हें मुशरिक कैसे कहा जाता है। यह तो केवल उन्हें मुशरिक कहनें वाले ही जानें।

अब आता हूँ सनातन वेदिक धर्म पर—

सनातन.वेदिक धर्म के सर्वव्यापी परमात्मा की अवधारणा सर्वोच, परमपद परमेश्वर को ही अन्तिम सत्य माननें वाले समझ ही नही पाये।

परमात्मा सबकुछ है। जो सत और असत से भी परे है। ज्ञान और अज्ञान से भी परे है, (वेदोsहम अवेदोsहम )।आनन्द और अनानन्द से भी परे है। अर्थात परमात्मा के बारे में सोचना ही सम्भव नही है। उसे परम आत्म स्वरूप जानकर ही परमात्मा होकर ही समझा जा सकता है। क्योंकि परमात्मा ही वास्तविक मैं / परम आत्म है।

सनातन वेदिक धर्म में (ऋग्वेद में) विष्णु परमपद कहा गया है। परमेश्वर कहा गया है। सवितृ देव को महेश्वर और नारायण को जगदीश्वर कहा गया। हिरण्यगर्भ को भी ईश्वर कहा जाता है। और सनातन वेदिक धर्मी तो अवस्था मेंबड़े, योग्यता मेबड़े, सदाचरण में श्रेष्ठ, पद में बड़े, प्रतिष्ठा में बड़े सबको प्रणाम करते हैं। कहा भी है कि, जो जितना विनमृ हो समझना चाहिए कि, वह उतना ही योग्य और क्षमतावान होगा। क्षमा वीरस्य भूषणम्। विद्या ददाति विनयम्।

मतलब ईश्वरों की श्रेणी है। ईश्वरत्व मात्र पदाधिकारी है। सर्वोच्च सत्य/ परम सत्य नही है। किन्तु इनमें से किसी के भी समतुल्य कोई विरोधी देवता (इब्लीस जैसा शैतान) नही है। और परमात्मा तो परम है/ एब्सोल्यूट है।

यह अवधारणा नही समझपाने के कारण सनातन वेदिक धर्म को बहूदेववादी होनें का आरोप लगाया जाता है।

जबकि देवता/ फरिश्ते तो यहूदी, ईसाई, और इस्लाम अर्थात इब्राहीमी सम्प्रदायों में भी है। यहूदी तो उन्हें दण्डवत प्रणाम भी करते हैं।

खेर अपनी अपनी समझ।

गुरुवार, 4 सितंबर 2025

वेदों पर हिन्दी में भाष्य रचकर महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने उपकार किया।

जिस समय भारत में वास्कोडिगामा भी नहीं आया था, तब भी भारतीय यह जानते थे कि, सर्प के कान नहीं होते। वह केवल भूमि का कम्पन्न ही त्वचा के माध्यम से अनुभव करता है।
इसका प्रमाण है - सूरदास जी का पद जो उन्होंने तानसेन की प्रशंसा में लिखा था ---
विधना यह जिय जानि कै, सेसहिं दियें न कान |
 धरा मेरु सब डोलि हैं, तानसेन की तान।

इसीलिए उस समय भी और आज भी सपेरे भी यही कहते रहे कि, साँप/ नाग सुन नहीं सकते फिर भी वे बीन ही बजाते हैं और कोई वाद्य नहीं बजाते हैं। ताकि बीन की ध्वनि से उत्पन्न कम्पन बिल में छुपा सर्प या नाग सह नहीं पाता और तत्काल बाहर आ जाता है।
लेकिन यह तथ्य आज भी वैज्ञानिक नहीं समझ पाये।

इसलिए आधुनिक व्यावसायिक शिक्षा के अलावा हमारे गुरुकुलों में दिया जाने वाला वैदिक मन्त्र संहिताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों, षड वेदाङ्गो, चार उप वेदों, अर्थशास्त्र, श्रीमद्भगवद्गीता कर्मयोग शास्त्र, पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा दर्शन, योग शास्त्र, सांख्य शास्त्र, न्याय शास्त्र, वैशेषिक शास्त्र, का ज्ञान होना आवश्यक है।
क्योंकि श्रीमद्भगवद्गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि, शास्त्रोक्त विधि से ही केवल शास्त्रोक्त कर्म ही करें, अर्थात केवल निष्काम भाव से (परम के लिए ही अर्थात परमार्थ कर्म) यज्ञ के लिए ही यज्ञ करें। और निषिद्ध कर्मों के विषय में मन में विचार ही उत्पन्न नहीं हो। निषिद्ध कर्मों के प्रति उपरामता हो। यह तभी सम्भव है जब आपको शास्त्र ज्ञान हो।
लेकिन पौराणिकों ने वेदों को अनावश्यक सिद्ध करने के लिए लिखा कि, यह व्रत करने से या केवल यह कथा सुनने से ही हजारों अश्वमेध यज्ञ और राजसूय यज्ञों का फल मिल जाएगा। वेदों का अर्थ नही किया जा सकता। केवल कर्मकाण्ड तक वेद मन्त्रों का विनियोग है। पण्डितों ने प्रचार कर दिया कि,घर में महाभारत नहीं रखना और पढ़ना भी नहीं। नही तो जानकर हो जाओगे तो पुराणों को फैंक दोगे। वाल्मीकि रामायण में सत्य इतिहास मत पड़ो कम्बन और तुलसी कृत मन गढ़न्त रामचरितमानस पढ़ो।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने भगवान विष्णु के बीहाफ पर स्पष्ट कहा है कि, सदाचारी अनन्योन्याश्रित भक्त के योग क्षेम मैं स्वयम् वहन करता हूँ।
चमत्कारों के चक्कर में करोड़ों बर्बाद हो चुके हैं।
लेकिन जिन्हें ऋत पर पूर्ण विश्वास है, वे ही सदाचारी अनन्योन्याश्रित भक्त इन चक्करों में कभी नहीं पड़ते। वे केवल ईश्वर पर आस्था रखते हैं क्रियाओं पर नहीं।
जब वेदों का अनुवाद मेक्समूलर ने यूरोपीय जातियों को ही ज्ञानी और श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए किया तो, वैदिक संहिताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों, वैदिक भाषा छन्दस, संस्कृत, उच्चारण शास्त्र शिक्षा, पाणिनि अष्टाध्याई, पतञ्जली महाभाष्य, वररुचि का वार्तिक, भोज वृत्ति, यास्क का निरुक्त, पिङ्गल का छन्द शास्त्र, जैमिनी की और बादरायण की मीमांसा, ज्योतिष और शुल्ब सूत्र, धर्म सूत्र, गृह्य सूत्र और श्रोत सूत्र अर्थात कल्प का ज्ञान नहीं होने लेकिन अंग्रेजी शिक्षित, उसके पूर्व सायण, महिधर आदि अनेक विद्वानों के वेद भाष्य होते हुए भी भारतियों को मेक्समूलर के अनुवाद पर आस्था टिक गई ।
मेक्समूलर द्वारा स्थापित गलत अवधारणाओं का व्याकरण, निरुक्त, न्याय शास्त्र के आधार पर वेदों पर हिन्दी भाषा में भाष्य रच कर सशक्त खण्डन कर सांख्य शास्त्र और पूर्व मीमांसा दर्शन पर आधारित मान्यताओं को पुनर्स्थापित करने का कार्य दयानन्द सरस्वती जी ने किया।
यदि वेदों का भाष्य करना अनुचित है तो क्या, पूर्व में हुए भाष्यकार, उपनिषदों पर भाष्य करने वाले भगवान शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, निम्बार्काचार्य आदि सब गलत थे?
या पौराणिक लोग पुराणों द्वारा थोपी गई भ्रामक और गलत अवधारणाओं के खण्डन होने के भय से वेदाध्ययन का विरोध कर रहे हैं?

बुधवार, 3 सितंबर 2025

भक्ति कैसे करें। तीर्थ सेवन कैसे हो।

सम्पूर्ण सृष्टि रचयिता को केवल, श्रद्धा, प्रेम, भक्ति ही अर्पित कर सकते हैं। कोई सन्तान आदि व्यक्ति, रत्न, स्वर्ण, नगद, मनी ट्रांसफर या चेक आदि से रुपये -पैसे, वस्त्र, मिष्ठान आदि वस्तु, भूखण्ड आदि स्थान (संञ्ज्ञा) नहीं दिया जा सकता।
केवल मैं (अहंकार) और मेरा पन (ममत्व/ ममता), संसार और सांसारिक व्यक्ति, वस्तु और स्थान से लगाव (आसक्ति) का त्याग कर पूर्ण समर्पण कर परमात्मा में मन लगाकर एकमेव परमात्मा का ही सदा स्मरण बना रहे ऐसी एकनिष्ठ, अव्यभिचारी भक्ति हो। 
बिना लगाव के, केवल कर्तव्य पालन हेतु 
सार्वजनिक संस्थानों का सञ्चालन रखरखाव में योगदान आवश्यक है । सकामोपासन का विरोध -  कामना रहित होना चाहिए, क्यों कि, जिसने पूरी सृष्टि रचकर  "तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा , मा गृधः कस्यस्विद् धनम्।" अर्थात इसका त्याग पूर्वक केवल यथा आवश्यकता भोग करो, किसी के धन का लोभ मत करो क्योंकि यह धन (सृष्टि) केवल माया है। यह किसी की भी नहीं होती, किसी की नहीं रहती कहकर यह सृष्टि हमें सोप दी। 
अपनी योग्यता बढ़ाते जाओ आपको स्वयम् प्राप्त हो जाएगी। जैसे जो सुविधाएँ प्रधानमन्त्री को मिलती हैं वह आपको तभी मिलेगी जब आप प्रधानमन्त्री बन जाओ। यह योग्यता वर्धन आपको करना है। इसका उपाय है निष्काम रहना हमारी कामना की सामर्थ्य इतनी नहीं है कि, हम वाञ्छित प्राप्त कर सकें।

विकास के नाम पर विनाश वाली बातें और तीर्थों को उनके मूल स्वरूप में रहने पर ही वे तीर्थ रह पाएंगे। तीर्थो को पर्यटन केन्द्र न बनाया जाए इस विषय में मैं पूर्ण सहमत हूँ।

तीर्थ स्थानों पर मन्दिर में भक्तों, व्रतियो, तपस्वियों और परीक्रमा करने वालों के लिए ही व्यवस्था होती है अतः मन्दिरों आदि में  खाने - पीने, ठहरने आदि की व्यवस्था केवल तीर्थ यात्रियों के लिए ही हो न कि, पर्यटकों या सामान्य यात्रियों के लिए।
उनके लिए धर्मशाला, हॉटेल- मोटेल, रेस्टोरेंट आदि ही हैं, न कि, मन्दिर।

 असहमति -
गुरुकुल में रहकर वैदिक मन्त्र संहिताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों, षड वेदाङ्गो, अर्थशास्त्र, चारों उपवेदों, पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा, श्रीमद्भगवद्गीता, तथा  योग, सांख्य, न्याय और वैशेषिक दर्शन का अध्ययन के साथ व्यावसायिक शिक्षा ग्रहण करना अत्यावश्यक है क्योंकि,

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि, शास्त्रोक्त विधि से ही शास्त्रोक्त कर्म करते हुए ही जिएँ। निषिद्ध कर्मों के प्रति उपरामता हो। निषिद्ध कर्म के प्रति कभी भी मन में संकल्प ही नहीं उठे; कल्पना भी नहीं हो।
उक्त प्रकार से यज्ञ के लिए यज्ञ करते हुए ही अविरत हरि स्मरण बना रहे। तब ऐसे सदाचारी अनन्य भक्त के योग क्षेम मैं स्वयम् वहन करता हूँ। इसलिए निश्चिन्त रहा जाए।

साथ ही श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि, इस जन्म में व्यक्ति जितनी योग्यता प्राप्त कर जितनी उन्नति कर लेता है उतनी योग्यता के साथ ही उसका अगला जन्म तदनुकूल परिवार में होता है और वह योग भ्रष्ट पुरुष उस अगले जन्म में उससे आगे ही बढ़ता है। योग भ्रष्ट पुरुष का पतन (नाश) नहीं होता है।