बुधवार, 7 मई 2025

ग्रीष्म ऋतु विवरण ---

ग्रीष्म ऋतु विवरण --- विशेष कर सन 2025 ईस्वी में ---

ऋतुओं का सम्बन्ध सायन सौर संक्रान्तियों और भौगोलिक अक्षांशों से है।
निरयन सौर या नक्षत्रीय सौर वर्ष से ऋतुओं का कोई सम्बन्ध नहीं जोड़ा जा सकता है। अतः सूर्य के निरयन संक्रमण आधारित चान्द्र वर्ष और चैत्र - वैशाख आदि चान्द्र मास से तो ऋतुओं का किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है।
दक्षिण भारत में सातवाहन शासकों ने और उत्तर भारत में कुषाण शासकों ने निरयन सौर संक्रमण आधारित चान्द्र वर्ष शकाब्द के साथ चैत्र-वैशाख आदि चान्द्र मास प्रचलित कर दिया। जो ऋतुओं से बिल्कुल असम्बद्ध है।
22 मार्च 285 ईस्वी को जब अयनांश शुन्य अंश था। अतः  
सायन संक्रान्ति और सूर्य का निरयन संक्रमण एक साथ होता था। इसलिए ऋतुओं का आधार सायन सौर संक्रान्तियों और ऋतुओं से असम्बन्धित सूर्य के निरयन संक्रमण के अन्तर पर धर्मशास्त्रियों का ध्यान नहीं गया। 
लगभग 800 ईसापूर्व से सन 1000 ईस्वी तक राजा भोज के समय तक अयनांश 10° ही था। अतः केवल दस दिन का अन्तर पड़ता था। इसलिए व्याकरण तथा छन्दशास्त्र के विद्वान लेकिन खगोल तथा सिद्धान्त ज्योतिष की कम जानकारी वाले धर्मशास्त्रियों का ध्यान इस अन्तर पर नहीं गया। महाराजा पृथ्वीराज चौहान के पतन के बाद सन 1206 के बाद  कुतुबुद्दीन एबक के गुलाम वंश के शासन और आक्रमणों के कारण भारतीय संस्कृति पतनोन्मुख होने लगी। संस्कृत, धर्मशास्त्र, खगोल और सिद्धान्त ज्योतिष का ज्ञान कुछ शास्त्रियों तक सीमित रह गया। अस्तु इस अन्तर पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।
वस्तुतः सम्राट विक्रमादित्य के ज्योतिषाचार्य वराहमिहिर के पहले तक
आर्यावर्त क्षेत्र में ग्रीष्म ऋतु सायन वृषभ और मिथुन के सूर्य में मानी जाती थी।
अर्थात सायन वृषभ संक्रान्ति दिनांक 19 उपरान्त 20 अप्रैल 2025 शनिवार Sunday को उत्तर रात्रि 01:27 बजे  से सायन कर्क संक्रान्ति 21 जून 2025 शनिवार को प्रातः 08:13 बजे तक भारत के मध्य क्षेत्र में ग्रीष्म ऋतु रहती है।
जबकि कुरुक्षेत्र हरियाणा, पञ्जाब, उत्तर प्रदेश से उत्तर में ब्रह्मावर्त क्षेत्र में ग्रीष्म ऋतु सायन मिथुन संक्रान्ति 20 उपरान्त 21 मई को उत्तर रात्रि 12:25 बजे से सायन सिंह संक्रान्ति दिनांक 22 जुलाई 2025 मङ्गलवार को सायम् 07:00 बजे तक रहेगी।
वर्तमान में इस अन्तर पर पञ्चाङ्गकार ध्यान नहीं देते हैं और पूरे भारत वर्ष और नेपाल भूटान तक में ग्रीष्म ऋतु सायन वृषभ और मिथुन के सूर्य में ही दर्शाई जाती है।
इसके अलावा 

निरयन वृषभ राशि में सूर्य 14 उपरान्त 15 मई 2025 बुधवार Thursday को 00:21 बजे प्रवेश करेंगे।
वृषभ संक्रमण का पुण्य काल 14 जनवरी 2025 बुधवार को सूर्योदय समय (इन्दौर में 05:44 बजे) से सूर्यास्त समय (इन्दौर में07:02 बजे) तक रहेगा। तथा निरयन वृषभ राशि से निरयन मिथुन राशि में सूर्य का संक्रमण 
 15 जून 2025 रविवार को प्रातः 06:45 होगा।
तदनुसार निरयन मिथुन संक्रमण का पुण्य काल 15 जून 2025 रविवार को प्रातः 06:45 से दोपहर 01:09 बजे तक रहेगा।

सेनापति के ऋतु वर्णन में ग्रीष्म ऋतु वर्णन में इसका उल्लेख ऐसे किया गया है।
 *वृष को तरनि तेज, सहसौ किरन करि, ज्वालन के जाल बिकराल बरसत हैं। तपति धरनि, जग जरत झरनि, सीरी छाँह कौं पकरि, पंथी-पंछी बिरमत हैं।*

और भी 

रोहिणी नक्षत्र में सूर्य दिनांक 25 मई 2025 रविवार को दिन में 09:32 बजे से 08 जून 2025 रविवार को प्रातः 07:19 बजे तक रहेगा।
ऐसी मान्यता है कि, रोहिणी नक्षत्र के सूर्य में भी बहुत गर्मी होती है।

इतना ही नहीं 

निरयन वृषभ राशि के सूर्य में जब चन्द्रमा धनिष्ठा नक्षत्र से रोहिणी नक्षत्र तक रहता है तो उन नौ दिनों को जैन ज्योतिष में धनिष्ठा नवक कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि इन नौ दिनों में गर्मी बहुत होती है।
इस वर्ष धनिष्ठा नवक 19 मई 2025 को सायम्  07:29 बजे से 27 उपरान्त 28 मई 2025 मङ्गलवार को उत्तर रात्रि 02:50 बजे तक रहेगा।

शुक्रवार, 2 मई 2025

भगवान आद्यशंकराचार्य के महत्वपूर्ण कार्य।

भगवान आद्य शंकराचार्य जी का मुख्य कार्य ग्यारह उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता और आचार्य बादरायण रचित शारीरिक सूत्र का भाष्य कर अद्वैत वेदान्त मत को सुदृढ़ कर वैदिक अभेद दर्शन को शास्त्रीय स्वरूप प्रदान करने, स्मार्त मत स्थापना, बौद्धों को शास्त्रार्थ में और तानत्रिकों को उनके स्तर पर युद्ध आदि कर विजय कर उन्हें शुद्ध कर स्मार्त मत में सम्मिलित करना रहा है।
विभिन्न बौद्ध मठ मन्दिरों का अधिग्रहण तथा देवी-देवताओं के स्तोत्र रचना में तो परवर्ती शंकराचार्यों का योगदान भी है।

मंगलवार, 29 अप्रैल 2025

01 जनवरी 2021 की स्थिति में नक्षत्रों के योग तारा की निरयन स्थिति।

कृतिका वृषभ 06°07'07"। 
 21 मई।

मृगशीर्ष मिथुन 00°51'59" । 16 जून।

मघा सिंह 05° 52'14" 
23 अगस्त।

चित्रा कन्या 29°59'01"
17 अक्टूबर।

अयनांश 
01 जनवरी 2021 को 24°07'55 
 और 
01 जनवरी 2022 को 24°08'46" ।

बुधवार, 23 अप्रैल 2025

मुहूर्त निकालने में अक्षांश का महत्व।

क्या ब्रह्म मुहूर्त, अभिजित मुहूर्त, विजय मुहूर्त आदि तीस मुहुर्त को भी प्रातः,सङ्गव, मध्याह्न, अपराह्न, सायाह्न, प्रदोष, महानिशिथ काल और अरुणोदय काल के समान दीनमान-रात्रिमान के अनुपात में गणना की जाना चाहिए या निश्चित दो घटि (48 मिनट) के ही माना जाना चाहिए।
यह विषय धर्मशास्त्र सम्बन्धित है। इसमें ज्योतिष केवल सहायक की भूमिका में ही रहता है। निर्णय धर्मशास्त्र का ही मान्य होता है।
उपर उल्लेखित ब्रह्म मुहूर्त, अभिजित मुहूर्त, विजय मुहूर्त अथर्ववेद में वर्णित हैं। अतः अथर्ववेद के अनुसार ही मान्य होगा।
 मुहूर्त समय मापन की इकाई है, अतः घटि-पल-विपल के समान ही मुहुर्त मान भी निश्चित और अपरिवर्तनीय होता है। अतः अथर्ववेदोक्त तीस मुहुर्त का मान निश्चिन्त दो घटिका अर्थात 48 मिनट के निश्चित समय के ही होते हैं।
लेकिन प्रातः,सङ्गव आदि कालावधि है, अतः ये दिनमान या रात्रि मान के घटबड़ के अनुपात में घटते-बढ़ते रहते हैं।
इसलिए ये काल या कालावधि 66°40' से अधिक उत्तर दक्षिण अक्षांश पर लागू नहीं होता।
इसी प्रकार 66°40' से अधिक उत्तर अक्षांश पर मकर लग्न उदय होते नहीं दिखता है। और 66°40' से अधिक दक्षिण अक्षांश पर कर्क लग्न उदय होता नहीं देखा जा सकता है।
ध्रुव प्रदेशों में तो दिन और रात ही छः-छः महीने के होते हैं। वहाँ मध्याह्न नहीं होता तथा कोई भी लग्न उदय अस्त नहीं होता। 
अतः वहाँ के लिए मुहूर्त निकालते समय इन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

रविवार, 13 अप्रैल 2025

महाभारत युद्ध के बहुत पहले वेदव्यास जी के पुत्र शुकदेव जी ब्रह्म लोक को प्रयाण कर गए थे।

शुकदेव जी ने कभी भी आस्तिक मत से तटस्थता नहीं दर्शाई।
फिर वे कैशोर्य अवस्था तक पहूँचने के पूर्व ही ब्रह्मलोक को सिधार गए।
कृपया महाभारत शान्ति पर्व/ मौक्षधर्म पर्व/ अध्याय ३३२ एवम् ३३३ गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित महाभारत पञ्चम खण्ड (शान्ति पर्व) पृष्ठ ५३२५ से ५३२९ तक  देखें। विशेषकर श्लोक २६-१/२ पृष्ठ ५३२८ देखें।

शनिवार, 12 अप्रैल 2025

जयन्ती और जन्मोत्सव उदाहरण


जयन्ती शब्द का जीवित और मरने के बाद से कोई सम्बन्ध नहीं है।
जीवित व्यक्ति की भी जयन्ती ही होती है। क्योंकि वह इतने वर्ष तक जी रहा है, यह भी उसकी विजय ही है।
मरे हुओं का भी जयन्ती के दिन उनके जन्म समय पर जन्मोत्सव ही मनाया जाता है।
चैत्र शुक्ल पूर्णिमा हनुमान जयन्ती है। और सूर्योदय के समय आरती आदि करके जन्मोत्सव मनाया गया।
चैत्र शुक्ल नवमी (राम नवमी) श्रीरामचन्द्र जी की जयन्ती ही है। और मध्याह्न के समय उनका जन्मोत्सव मनाते हैं।
अमान्त श्रावण पूर्णिमान्त भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (जन्माष्टमी) श्रीकृष्ण जयन्ती ही है। और मध्यरात्रि के समय श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाते हैं।
जयन्ती पूरे दिन भर रहती है, जबकि जन्मोत्सव बमुश्किल आदा-एक घण्टा।

सोमवार, 7 अप्रैल 2025

वैदिक विष्णु के दो हाथ हैं। पुराणों में भूमा (प्रभविष्णु) अष्टभुजा और महाभारत में भी श्रीहरि चतुर्भुज हैं।

ऋग्वेद का विष्णु चार हाथो वाला होने की बजाय दो हाथो वाला है उसके साथ लक्ष्मी भी नहीं है न ही सवारी गुरूड़ है । वेदों के बाद उपनिषद में भी विष्णु चार हाथों वाला लक्ष्मी या गरुण के साथ नहीं है । 
जबकि, बुद्धिज्म में बोधिसत्व वज्रपाणि, बोधिसत्व अमिताब बुद्ध, मंजूसिरी की हाथो में शंख चक्र गदा पद्म देखने को मिलता है फिर अचानक से पुराणों में विष्णु चार हाथो वाला शंख चक्र गदा पद्म और गरुण इत्यादि वाला हो जाता है ।
क्या वेद उपनिषद के रचना के बाद पुराण लेखकों को भगवान विष्णु ने स्वयम् बताया की अब उनका स्वरूप ऐसा हो गया है।
यदि भगवान विष्णु का मूल स्वरूप ऐसा ही होता तो, क्या वैदिक मन्त्र दृष्टा ऋषि और उपनिषद के ऋषियों को जानकारी नहीं होती? वे ही ऐसा उल्लेख कर सकते थे।
अर्थात बौद्ध धर्माचार्यों के शुद्धिकरण पश्चात वैदिक मत में लौटाए गये लोगों ने पुराण लिखे या पुराणों में संशोधन किया  और विष्णु 4 हाथ शंख चक्र गदा पद्म इत्यादि जोड़ लिया ।
वेद उपनिषद में किसी देवता के हाथ में शंख चक्र गदा पद्म है 4 हाथ, उससे ज्यादा है ? जिसे देखकर को देख कर पुराण में ये विष्णु का ऐसा स्वरूप आया ? 
जबकि भारत सहित सभी बौद्ध देशोंमें पुरातत्त्वीय महत्व की मूर्तियों में मंजूसिरी, वज्रपाणि, अवलिकेतेश्वर बुद्ध की मूर्तियो में ही यह स्वरूप दिखता है ।
ऐसे ही चतुर्मुख ब्रह्मा, द्विमुख अग्नि के विषय में भी विचार किया जाना चाहिए।