रविवार, 12 मई 2024

विक्रमादित्य, चन्द्रगुप्त द्वितीय , शक, कुषाण कौन थे तथा विक्रम संवत और शकाब्द की तुलना।

विक्रमादित्य और चन्द्रगुप्त द्वितीय 

*विक्रमादित्य के पितामह महाराज नाबोवाहन ने हरियाणा के ऋषिदेश, गोड़ देश, मालव प्रान्त, कुरुक्षेत्र से आकर उक्त मध्यप्रदेश के सोनकच्छ जिला मुख्यालय से लगभग तीस किलोमीटर दूर ग्राम गंधर्वपुरी को राजधानी बनाया था।
बाद में नाबोवाहन के पुत्र गन्धर्वसेन गन्धर्वपुरी के राजा हुए। जिन्हें महेन्द्रादित्य भी कहा जाता था। उनकी पत्नी सोम्यदर्शना थी जिनका अन्य नाम वीरमती था।
गन्धर्वसेन कट्टर वेदिक धर्मावलम्बी और विष्णु और शिव के भक्त थे। इस कारण जैन आचार्य महेसरा सूरी उनसे रुष्ट थे। *जैन आचार्य महेसरा सूरी उर्फ कालकाचार्य ने गन्धर्वपुरी से अफगानिस्तान तक पैदल जाकर शक राजा/ कुषाण क्षत्रप के दरबार में गंधर्वसेन के विरुद्ध गुहार लगाई तथा कुषाण क्षत्रप / शकराज को गन्धर्वसेन पर आक्रमण हेतु आमन्त्रित किया। ईसापूर्व ५० में प्राकृत भाषा में रचित जैन कल्प सूत्र में कालकाचार्य कथा में इसका उल्लेख है।
*शक शासक/ कुषाण क्षत्रप ने शिकार पर गये  महाराज गन्धर्वसेन को अकेला पाकर उनपर अनेक अत्याचार किये परिणाम स्वरूप महाराज गंधर्वसेन की जंगल में ही मृत्यु हो गई। जैन ग्रन्थों में गन्धर्वसेन को गर्दभिल्ल, गदर्भ भिल्ल, गदर्भ वेश भी कहा गया है।* 

 *गन्धर्वसेन के दो पुत्र भृतहरि और विक्रमसेन (विक्रमादित्य) और पुत्री मैनावती थी।* मैनावती के पुत्र गोपीचन्द थे। भृतहरि की पत्नी पिङ्गला से अलाका, शंख नामक दो पुत्र हुए

*गन्धर्वसेन के बड़े पुत्र भृतहरि ने उज्जैन को राजधानी बनाया।भृतहरि ने अपने अनुज विक्रमसेन को सेनापति बनाया।*
 लेकिन भृतहरि की प्रिय पत्नी महारानी पिङ्गला ने महाराज भृतहरि को विक्रमसेन के विरुद्ध भड़का कर विक्रमसेन को देश निकाला दिलवा दिया। सुदृढ़ सेनापति के अभाव में उज्जैन पर शकों के आक्रमण बढ़ने लगे। 
*भृतहरि और विक्रम की बहन मैनावती के पुत्र गोपीचन्द पहले ही नाथ सम्प्रदाय के सम्पर्क में आकर नाथयोगी हो गये। योगी गोरखनाथ भृतहरि को अपना शिष्य बनाना चाहते थे। इसलिए गोरखनाथ जी ने भृतहरि को रानी पिङ्गला की आसक्ति से मुक्त कर भृतहरि को धारा नगरी में नाथ पन्थ में दीक्षित किया।*

 *नाथ पन्थ में दीक्षित होकर वैरागी होने के कारण राजा भृतहरि ने अपने अनुज विक्रम सेन को खोज कर राज्यभार विक्रम सेन को सोंप दिया। विक्रम सेन ने सैन्य सङ्गठन मजबूत कर शकों को देश से निकाल कर अपनी राज्य सीमा अरब तक पहूँचा दी। इस उपलक्ष्य में विक्रम सेन सम्राट विक्रमादित्य कहलाये। और उननें विक्रम संवत प्रवर्तन किया। जो वर्तमान में भी पञ्जाब हरियाणा में प्रचलित नाक्षत्रीय निरयन सौर विक्रम संवत के मूल स्वरूप में प्रचलित है ।* 

*भविष्य पुराण, स्कन्दपुराण तथा तुर्की के शहर इस्ताम्बुल के पुस्तकालय मकतब - ए - सुल्तानिया में रखी अरब के अरबी कवि जरहाम किनतोई की पुस्तक सायर उल - ओकुल पुस्तक में उल्लेख के अनुसार ईरान,अरब, ईराक, सीरिया, टर्की, मिश्र देशों पर विक्रमादित्य की विजय का उल्लेख है और अरबी कवि जरहाम किनतोई की पुस्तक सायर उल - ओकुल पुस्तक में विक्रमादित्य से सम्बन्धित शिलालेख का उल्लेख है; जिसमे विक्रमादित्य को उदार, दयालु, कर्तव्यनिष्ठ, प्रत्यैक व्यक्ति का हितचिन्तक और हितकारी कहकर विक्रमादित्य के शासन काल में जन्में और जीवन व्यतीत करने वाले लोगों को सौभाग्यशाली कहा है। साथ ही कहा है विक्रमादित्य नें मिश्र, टर्की, सीरिया, ईराक, सऊदी अरब, यमन और ईरान में वेदिकधर्म के प्रकाण्ड पण्डित विद्वानों को भेजकर ज्ञानप्रकाश फैलाया।*

 *गुप्त वंशीय समुद्रगुप्त के बाद रामगुप्त (चन्द्रगुप्त द्वितीय के बड़े भाई) राजा हुए।उनके सिक्के पुरातत्वीय खुदाई में मिलने से प्रमाणित हुआ कि, समुद्रगुप्त के बाद चन्द्रगुप्त द्वितीय के पहले रामगुप्त शासक हुए।*
*रामगुप्त की पत्नी ध्रुव स्वामिनी पर शक राजा आसक्त हो गया और बौद्धों के सहयोग से ध्रुव स्वामिनीका अपहरण कर तिब्बत ले गया।*
जिसे चन्द्रगुप्त द्वितीय नें रानी के लिए आवश्यक वस्त्र, श्रंगार और दासियों को भेजने के नाम पर  सैनिकों के साथ पालकियों में सवार होकर शकराज के रनिवास में पहूँच कर पहरेदारों को मारकर वहाँ से ध्रुव स्वामिनी को वापस लाये। और बाद में  चन्द्रगुप्त द्वितीय नें ध्रुव स्वामिनी से विवाह किया।
*भृतुहरि-पिङ्गला- अश्वपाल और विक्रमसेन की घटनाओं में साम्य होने से और चन्द्रगुप्त द्वितीय द्वारा उज्जैन को राजधानी बनाने के कारण  अंग्रेज- मुस्लिम और वामपन्थी इतिहासकारों ने भारत के गौरव सम्राट विक्रमादित्य और भारतीय इतिहास के स्वर्णयुग के सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय को बड़ी सफाई से एक ही व्यक्ति घोषित कर दिया।*
*जबकि टर्की (तुर्किये) में विक्रमादित्य के शासन की प्रशंसा में मे शिलालेख मिलना और उसका काल विक्रमादित्य से मैल खाना विक्रमादित्य के इतिहास को प्रमाणित करता है।*

शक और कुषाण और हूण कौन थे?

*शक और कुषाण उत्तर कुरु/ ब्रह्मावर्त अर्थात तिब्बत के तरीम बेसिन और टकला मकान क्षेत्र में  शिंजियांग उइगुर प्रान्त (चीनी तुर्किस्तान) में गांसु प्रदेश में जिउक्वान शहर क्षेत्र में  डुहुआंग नगर,  उत्तर अक्षांश 40 ° 08″32"  N और पुर्व देशान्तर  94 ° 39 '43" E  पर स्थित डुहुआंग नगर, (डुनहुआंग नगरपालिका क्षेत्र) के मूल निवासी थे।*
हूण भी इसी क्षेत्र के उत्तर में मङ्गोलिया से लगे श्रेत्र के निवासी थे। 
इसलिए वर्तमान में लोग इन्हें विदेशी कहते हैं

"पुराणों अनुसार *शक जाति की उत्पत्ति सूर्यवंशी राजा नरिष्यंत से कही गई है। राजा सगर ने राजा नरिष्यंत को राज्यच्युत तथा देश से निर्वासित किया था। वर्णाश्रम आदि के नियमों का पालन न करने के कारण तथा ब्राह्मणों से अलग रहने के कारण वे म्लेच्छ हो गए थे। उन्हीं के वंशज शक कहलाए।* महाभारत में भी शकों का उल्लेख है। शक साम्राज्य से संबंधित मथुरा के राजकीय संग्रहालय में मूर्ती, स्तंभ, सिंह शीर्ष स्तंभ, मुद्रा आदि कई वस्तुएं रखी हुई है। गार्गी संहिता, बाणभट्ट कृत हर्षचरित में भी शकों का उल्लेख मिलता है।

कुषाण -- मथुरा के इतिहासकार मानते हैं कि वे *शिव के उपासक और कुष्मांडा जाति के थे। इस जाति के लोग प्राचीन काल में भारत से बाहर जाकर बस गए थे और जब वे शक्तिशाली बन गए तो उन्होंने भारत में अपने साम्राज्य का विस्तार किया। गुर्जर इतिहासकार उसे गुर्जर मानते हैं।* 
कुछ लोग पाटिदारों को भी कुषाण मानते हैं। पर पाटिदार नहीं मानते।

हूण --- *हुंडिया एक यक्ष था। उस काल में यक्षों का मूल स्थान तिब्बत और मंगोल के बीच का स्थान था। कुबेर वहीं के राजा थे।कई ऐसे यक्ष थे, जो चमत्कारिक थे। उस काल में भी नास्तिक श्रमण लोगों में यक्षों-यक्षिणिनियों की लोकपूजा भी होती थी। और आज भी जैन पन्थ में यक्ष पूजा होती है।यह वेद विरुद्धकर्म है।*
यक्ष उपासक जैन लोग हुंडिय को महावीर स्वामी के पहले के अर्थात पार्श्वनाथ आदि की परम्परा के अनुयाई मानते हैं।

इतिहासकार ऐसा लिखते हैं कि, उक्त जातियों का राजपूतो की अलग-अलग जातियों से वैवाहिक सम्बन्ध होते थे। जैसे हूणों के वैवाहिक सम्बन्ध गुहिलोत और राठोड़ सूर्यवंशी राजपुतों से होते थे।
कृपया देखें - राजस्थानी ग्रन्थागार प्रकाशन जोधपुर से प्रकाशित श्री ठाकुर बहादुर सिंह बिदासर रचित *क्षत्रिय जाति की सुची* पुस्तक का *पृष्ठ क्रमांक 159,* 

 विक्रम संवत और शकाब्द

*विक्रम संवत लागू होनें के १३५ वर्ष बाद विक्रम संवत १३६ में आन्ध्र प्रदेश के सातवाहन वंशीय गोतमीपुत्र सातकर्णी नें अपने राज्यारोहण या मतान्तर से नासिक क्षेत्र महाराष्ट्र के पेठण विजय के अवसर पर अपने राज्य क्षेत्र महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, तेलङ्गाना, और मध्य भारत में निरयन सौर मासों से सम्बद्ध चान्द्र संवत शालिवाहन शकाब्द आरम्भ किया।*
 *लगभग इसी समय वर्तमान पाकिस्तान के पञ्जाब प्रान्त के  पैशावर के कुशाण वंशीय क्षत्रप कनिष्क नें मथुरा विजय के उपलक्ष्य में मथुरा और उत्तर भारत में निरयन सौर मासों से सम्बद्ध चान्द्र संवत शकाब्द लागू किया।* 

*वर्तमान में यह भ्रम प्रचलित है कि, विक्रम संवत भी शुद्ध निरयन सौर वर्ष न होकर आरम्भ से निरयन सौर मासों पर आधारित चान्द्र वर्ष ही था।* यदि यह कथन सही माना जाए तो प्रश्न खड़ा होता है कि,
 *निरयन सौर विक्रम संवत लागू होने के केवल १३५ वर्ष बाद ही शक संवत में निरयन सौर मासों पर आधारित चान्द्र मास वाली यह नवीन प्रणाली लागू करने के लिए शक संवत आरम्भ करने की क्या आवश्यकता थी?*

*विक्रमादित्य के पूर्वजों के क्षेत्र पञ्जाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश में आज तक विक्रम संवत निरयन सौर मास और गते क्यों प्रचलित रहते?*

*कुछ लोग गुजरात के कार्तिकादि संवत को विक्रम संवत मानते हैं। यह भी उचित नहीं है। क्योंकि यह केवल गुजरात में ही सीमित है।* 

* केवल, सातवाहन और कुशाणों के बहुत बड़े राज्यक्षेत्र में निरयन सौर मास पर आधारित चान्द्र वर्ष वाला शकाब्द पञ्चाङ्ग प्रचलित है और, शेष भारत में अर्थात पञ्चाङ्ग, हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, बङ्गाल,उड़िसा, असम आदि सेवन सिस्टर्स प्रदेश, तमिलनाडु, केरल आदि प्रदेशों में निरयन सौर मासों और गते   या गतांश ही प्रचलित है।*

*केवल पौराणिकों नें विक्रम संवत को  चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ होना बतलाया जिसका अनुकरण सिद्धान्त ग्रन्थों में भी हुआ। लेकिन सिद्धान्त ग्रन्थों में गणना का आधार सदैव शकाब्द ही लिया है। और सिद्धान्त ग्रन्थों नें ही निरयन सौर मास आधारित चैत्र वैशाख वाला शकाब्द लागू किया।*
गुप्त संवत का आरम्भ चन्द्रगुप्त प्रथम ने गुप्त प्रकाल नाम से 319 ई. में किया था। किन्तु यह वर्तमान में अप्रचलित है। किन्तु गुप्तकालीन दस्तावेजों में गुप्त प्रकाल का उल्लेख मिलता है।

अब आप बतलाइएगा कि, विक्रम संवत को किस आधार पर सौरचान्द्र वर्ष कहा जा सकता है? और शकाब्द को सौर वर्ष गणना आधारित कैसे कहा जा सकता है?

विक्रमादित्य कौन थे?

महाराज नाबोवाहन ने हरियाणा के कुरुक्षेत्र के मालव प्रान्त से आकर मध्यप्रदेश में सोनकच्छ जिले के गंधर्वपुरी को राजधानी बनाया था। देवास - भोपाल मार्ग पर देवास से 31 किलोमीटर और भोपाल से 121 किलोमीटर पर  स्थित देवास जिले के सोनकच्छ तहसील मुख्यालय से 11 किलोमीटर पर पिफल्रावा मार्ग पर कराड़िया मेहोर फाँटे से दाहिने हाथ पर टर्होन लेकर गंधर्वपुरी पहुँच सकते हैं। 
बाद में नाबोवाहन के पुत्र महेन्द्रादित्य ने जिन्हें गन्धर्वसेन भी कहा जाता था गन्धर्वपुरी के राजा हुए। उनकी पत्नी सोम्यदर्शना थी जिनका अन्य नाम वीरमती था।

गन्धर्वसेन कट्टर सनातनी स्मार्त मतावलम्बी थे।वे  विष्णु और शिव के परम भक्त थे। इस कारण जैन आचार्य महेसरा सूरी उर्फ कालकाचार्य उनसे रुष्ट थे। उनने अफगानिस्तान तक पैदल जाकर बौद्ध मतावलम्बी शक राजा/ कुषाण क्षत्रप के दरबार में गंधर्वसेन के विरुद्ध गुहार लगाई तथा उज्जैन पर आक्रमण हेतु आमन्त्रित किया। महेन्द्रादित्य/ गन्धर्वसेन शिकार खेलने वन में गये तो घात लगाकर बेठे हुए शक शासक/ कुषाण क्षत्रप ने उनपर अनेक अत्याचार किये परिणाम स्वरूप महेन्द्रादित्य / गंधर्वसेन की मृत्यु जंगल में होगई।
 ईसापूर्व ५० में प्राकृत भाषा में रचित जैन कल्प सूत्र में कालकाचार्य कथा में इसका उल्लेख है। इस जैन कथा में महेन्द्रादित्य / गन्धर्वसेन को गर्दभिल्ल, गदर्भ भिल्ल, गदर्भ वेश भी कहा गया है।

गन्धर्वसेन के पुत्र भृतहरि और विक्रमसेन (विक्रमादित्य) और पुत्री मैनावती थी। मैनावती के पुत्र गोपीचन्द थे। भृतहरि की पत्नी पिङ्गला से अलाका, शंख नामक पुत्र हुए।

भविष्य पुराण के अनुसार विक्रमादित्य का जन्म कलियुग के तीन हजार वर्ष व्यतीत होनें पर अर्थात 101 ईसापूर्व हुआ था। और उनने शतवर्ष राज्य किया।

गन्धर्वसेन की मृत्यु पश्चात शकों के भारत पर आक्रमण के होंसले बुलन्द होगये। महाराज भृतहरि के समय भी अनेकबार शक आक्रमण हुए जिनका सामना उनके छोटेभाई विक्रमसेन (विक्रमादित्य) नें किया।

कलियुग संवत 3068 अर्थात ईसापूर्व 34 में रचित ज्योतिर्विदाभरण ग्रन्थ के अनुसार करुर नामक स्थान पर शकों को परास्त कर शक विजय कर उज्जैन का राज्य सम्भाला। राज्यारोहण के उपलक्ष्य में कलियुग संवत 3044 आरम्भ दिन में निरयन मेष संक्रान्ति को अर्थात 57 ईसापूर्व में विक्रमादित्य नें विक्रम संवत चलाया।

कल्हण की राजतरंगिणी के अनुसार कश्मीर के युधिष्ठिर के वंशज राजा हिरण्य की मृत्यु निस्सन्तान रहते होजानें के कारण अवन्ति नरेश विक्रमादित्य ने मातृगुप्त को कश्मीर का राज्य सोपा था। नेपाल के राजवंशावली के अनुसार - नेपाल के राजा अंशुवर्धन के समय विक्रमादित्य नेपाल भी गये थे।

विक्रमादित्य ने अलग अलग देश और संस्कृति की पाँच पत्नियाँ थी मलयावती, मदनलेखा,पद्मिनी, चेल्ल, और चिल्लमहादेवी। जिनसे पुत्र विक्रम चरित और विनयपाल तथा विद्योत्तमा प्रियमञ्जरी और वसुन्धरा हुई।

विक्रमादित्य के राजपुरोहित त्रिविक्रम एवम् वसुमित्र थे। विक्रमादित्य के सेनापति विक्रमशक्ति एवम् चन्द्र बतलायें गये हैं। भट्टमात्र जो नौरत्नों में से एक वेतालभट्ट भी कहलाते हैं वे विक्रमादित्य के मित्र थे।

1आयुर्वेदाचार्य धन्वन्तरि, 2 ज्योतिषाचार्य वराहमिहिर, 3 महाकवि कालीदास, 4 व्याकरणाचार्य वररुचि, 5 तन्त्राचार्य वेतालभट्ट, 6 अमरकोश अर्थात संस्कृत शब्दकोश रचियता। अमरसिंह, 7 शंकु 8 क्षपणक और 9 घटखर्पर विक्रमादित्य के शासन के नौरत्न थे।

भविष्य पुराण और स्कन्दपुराण तथा तुर्की के शहर इस्ताम्बुल के पुस्तकालय मकतब - ए - सुल्तानिया में रखी अरब के अरबी कवि जरहाम किनतोई की पुस्तक सायर उल - ओकुल पुस्तक में उल्लेख के अनुसार ईरान,अरब, ईराक, सीरिया, टर्की, मिश्र देशों पर विक्रमादित्य की विजय का उल्लेख है और अरबी कवि जरहाम किनतोई की पुस्तक सायर उल - ओकुल पुस्तक में विक्रमादित्य से सम्बन्धित शिलालेख का उल्लेख है; जिसमे विक्रमादित्य को उदार, दयालु, कर्तव्यनिष्ठ, प्रत्यैक व्यक्ति का हितचिन्तक और हितकारी कहकर विक्रमादित्य के शासन काल में जन्में और जीवन व्यतीत करने वाले लोगों को सौभाग्यशाली कहा है। साथ ही कहा है विक्रमादित्य नें मिश्र, टर्की, सीरिया, ईराक, सऊदी अरब, यमन और ईरान में वेदिकधर्म के प्रकाण्ड पण्डित विद्वानों को भेजकर ज्ञानप्रकाश फैलाया।

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के निकट सोनकच्छ जिला मुख्यालय है। सोनकच्छ के निकट गन्धर्वपुरी नामक कस्बा / ग्राम है। यहाँ एक शिवमंदिर है। कहा जाता है कि रात्रि में शिवलिङ्ग के उपर मन्दिर की गुम्मद पर या शिवलिङ्ग की कुछ नाग प्रदक्षिणा करते हैं। प्रातःकाल मन्दिर खोलने पर शिवलिङ्ग के आसपास वृत्ताकार परिपथ में सर्पों की विष्ठा पाई जाती है। या मन्दिर की छत पर शिवलिंग के उपर वृत्ताकार परिपथ में सर्पों की विष्ठा पाई जाती है।

शनिवार, 11 मई 2024

साधन और मार्ग तो केवल पञ्च महायज्ञ ही है और ज्ञान तथा भक्ति तो साध्य और लक्ष्य है।

भक्ति और ज्ञान मार्ग नहीं लक्ष्य है।
भक्ति और ज्ञान साधन नहीं साध्य है।
साधन तो केवल पञ्च महायज्ञ ही है क्योंकि, वास्तविकता में अष्टाङ्ग योग भी ब्रह्मयज्ञ ही है।
अतः 
साधन तो केवल पञ्च महायज्ञ ही है। बस।

बुधवार, 8 मई 2024

परमात्मा और उसकी व्यवस्था ऋत पर विश्वास।

छाया और माया के पीछे भागने वाले के सदा आग-आगे चलती है।
और पीठ फेर लो तो पीछे-पीछे चलती है।
मुझे विश्वास है कि, जो इतनी बड़ी सृष्टि चला रहा है, वही सब देख लेगा। मुझसे भी जो करवाना होगा करवा ही लेगा। मुझे परमात्मा और उसके ऋत पर पूर्ण विश्वास है।

सम्प्रदायों की उत्पत्ति का कारण वैदिक ज्ञान की कमी।

यह सत्य है कि, ब्रह्म बड़ो से महत्तर और महा से बड़ा है लेकिन ब्रह्म शब्द का सही अर्थ निरन्तर बढ़ने वाला भी है। वैदिक ऋचाओं को भी ब्रह्म कहते हैं। ये सब अर्थ ज्ञात होने पर यह समस्या आती है कि, यदि ब्रह्म का मतलब निरन्तर विस्तार होने वाला भी है, तो प्रकृति और ब्रह्म में अन्तर ही क्या रहा।।
क्योंकि अधिकांश लोगों के मन मस्तिष्क में घुसा हुआ था कि, ब्रह्म मतलब सबसे बड़ा।
माना कि, ब्रह्म बड़ो से महत्तर और महा से बड़ा है, लेकिन उससे बड़ा परब्रह्म ही सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि, ब्रह्म सबसे बड़ा नहीं है।
 वास्तविकता में ब्रह्म < परब्रह्म < ॐ < परमात्मा।। परमात्मा को सबसे बड़ा कह सकते हैं।

ऐसी ही समस्या महाभारत के भागवत धर्मियों के साथ भी होती है।
विष्णु परम पद है।
पद है तो वहाँ कर्म, उपासना और ज्ञान की सीढ़ी के सहारे कोई भी पहूँच सकता है।
यह उन्हें स्वीकार नहीं हुआ।
तो वैकुण्ठ के एक देश (भाग) गो लोक को उनने उच्चतम लोक कह दिया और अपने इष्टदेव श्रीकृष्ण को सर्वोच्च घोषित कर दिया।
फिर शैव क्यों पीछे रहते उनने कैलाश और शंकर को वहीं स्थान दे दिया।
शाक्तों के पास ऐसा कोई स्थान था नही। तो उनने भी एक लोक कल्पित कर अपनी इष्टदेवी पराम्बा को स्थापित कर दिया।

मंगलवार, 7 मई 2024

पुराणों के अनुसार शक, कुषाण और हूण कौन थे।

"पुराणों अनुसार *शक जाति की उत्पत्ति सूर्यवंशी राजा नरिष्यंत से कही गई है। राजा सगर ने राजा नरिष्यंत को राज्यच्युत तथा देश से निर्वासित किया था। वर्णाश्रम आदि के नियमों का पालन न करने के कारण तथा ब्राह्मणों से अलग रहने के कारण वे म्लेच्छ हो गए थे। उन्हीं के वंशज शक कहलाए।* महाभारत में भी शकों का उल्लेख है। शक साम्राज्य से संबंधित मथुरा के राजकीय संग्रहालय में मूर्ती, स्तंभ, सिंह शीर्ष स्तंभ, मुद्रा आदि कई वस्तुएं रखी हुई है। गार्गी संहिता, बाणभट्ट कृत हर्षचरित में भी शकों का उल्लेख मिलता है।
अधिकांश इतिहासकार शक, कुषाण , युइशि और हूण सभी को वर्तमान चीन के तुर्किस्तान में तकला-मकान मरुभूमि, झींगझियांग प्रान्त के निवासी मानते हैं। जहाँ वर्तमान में उइगर मुसलमान रहते हैं। तदनुसार -
शक  वर्तमान चीन के पूर्वी तुर्किस्तान के झींगझियांग प्रान्त के निवासी थे जहाँ वर्तमान में उइगर मुसलमान रहते हैं।
शको ने बैक्टीया से होते हुए ईरानी साम्राज्य पार्थिया के मिथिदातस से से हार कर हुए अफगानिस्तान में प्रवेश किया और विजित किया । उनका काल १२३ ई.पू. से २०० ईस्वी तक माना गया है। 
भारत में युनानी साम्राज्य के कमजोर प्रान्तो पर शकों ने आक्रमण कर जीता। सिन्धु नदी के तट पर मीन नगर को राजधानी बनाया। 

कुषाण -- मथुरा के इतिहासकार मानते हैं कि वे *शिव के उपासक और कुष्मांडा जाति के थे। इस जाति के लोग प्राचीन काल में भारत से बाहर जाकर बस गए थे और जब वे शक्तिशाली बन गए तो उन्होंने भारत में अपने साम्राज्य का विस्तार किया। गुर्जर इतिहासकार उसे गुर्जर मानते हैं।* 
कुछ लोग पाटिदारों को भी कुषाण मानते हैं। पर पाटिदार नहीं मानते।

*कुषाण* --- "अधिकांश इतिहासकार शक, कुषाण , युइशि और हूण सभी को वर्तमान चीन के तुर्किस्तान में तकला-मकान मरुभूमि, झींगझियांग प्रान्त के निवासी मानते हैं। जहाँ वर्तमान में उइगर मुसलमान रहते हैं।
 भारतीय इतिहासकार कुष्माण्डा जाति के मानते हैं। कुषाण भी चीन के पूर्वी तुर्किस्तान के झींगझियांग प्रान्त के ही निवासी थे जहाँ वर्तमान में उइगर मुसलमान रहते हैं। कुसान इनका आदि पुरुष था जिनके नाम पर ये कुषाण कहलाये।
कुषाण भी शकों के ही पद चिन्हों पर चल कर बैक्टीया से होते हुए ईरानी साम्राज्य पार्थिया होते हुए अफगानिस्तान में प्रवेश किया कन्धार और काबुल को जीतकर और काबुल को राजधानी बनाया ।
कुजल कडफाइसिस ने ईरानी पारसी पल्लहवों को हराकर भारत के उत्तर उत्तर पश्चिमी सीमा पर कब्जा किया। बाद में पश्चिमी पञ्जाब तक सीमा विस्तार कर लिया। कुजल के पुत्र विम तक्षम ने शुङ्ग वंशियों राजा को हराकर मथुरा तक विस्तार कर लिया। कनिष्क (१२७ ईस्वी से १४० ईस्वी तक) ने काबुल, पेशावर और मथुरा को क्षत्रप क्षेत्र घोषित किया। इसका शासन कश्मीर, पूर्व में सारनाथ (वाराणसी) तक था। कनिष्क की मृत्यु १५१ ईस्वी में हुई।
कुषाण वंश में कुजल, विम कडफाइसिस, कनिष्क प्रथम, वशिष्क , कनिष्क तृतीय, वासुदेव कुषाण द्वितीय प्रमुख राजा हुए।

 *हूण* - हूण भी उत्तरी चीन के चीन के पूर्वी तुर्किस्तान के तकला-मकान मरुभूमि, झींगझियांग प्रान्त (जहाँ वर्तमान में उइगर मुसलमान रहते हैं) की उत्तरी सीमा से लगे मंगोलिया से आये थे।   
फारस के बादशाह बहराम गोर ने सन् ४२५ ई॰ में हूणों को पूर्ण रूप से परास्त करके वंक्षु नद के उस पार भगा दिया। 
बहराम गोर के पौत्र फीरोज के समय में हूणों का प्रभाव फारस में बढ़ा। वे धीरे-धीरे फारसी सभ्यता ग्रहण कर चुके थे और अपने नाम आदि फारसी ढंग के रखने लगे थे। फीरोज को हरानेवाले हूण बादशाह का नाम खुशनेवाज था।
हूणों के राजा तोरणमल ने गांधार (अफगानिस्तान) भारतवर्ष मे सीमान्त प्रदेश कपिश (पेशावर - पाकिस्तान) पर अधिकार किया, फिर उज्जैन (मालवा मध्यदेश) की ओर चढ़ाई पर चढ़ाई करने लगे। 
गुप्त सम्राट कुमारगुप्त इन्हीं चढ़ाइयों में मारे गये। इन चढ़ाइयों से तत्कालीन गुप्त साम्राज्य निर्बल पड़ने लगा। कुमारगुप्त के पुत्र महाराज स्कंदगुप्त बड़ी योग्यता और वीरता से जीवन भर हूणों से लड़ते रहे। फिर भी सन् ४५७ ई॰ तक मगध पर स्कंदगुप्त का अधिकार रहा। 
सन् ४६५ के उपरान्त तोरणमल के नेतृत्व में हुण प्रबल पड़ने लगे और अन्त में स्कंदगुप्त हूणों के साथ युद्ध करने में मारे गए । 
सन् ४९९ ई॰ में हूणों के प्रतापी राजा तुरमान शाह (संस्कृत : तोरमाण) ने गुप्त साम्राज्य के पश्चिमी भाग पर पूर्ण अधिकार कर लिया। इस प्रकार गांधार, काश्मीर, पंजाब, राजपूताना, मालवा और काठियावाड़ उसके शासन में आए। 
तुरमान शाह या तोरमाण का पुत्र मिहिरगुल (संस्कृत : मिहिरकुल) बड़ा ही अत्याचारी और निर्दय हुआ। पहले वह बौद्ध था, पर पीछे कट्टर शैव हुआ।


हूण --- पुराणों के अनुसार लोगों के पूर्वज आपराधिक प्रवृत्ति के अनुशासन हीन क्षत्रिय थे इसलिए इनको देश-निकाला दिया गया था। इसलिए ये लोग *उत्तर* पूर्व सीमा पर बस गये थे।
हुंडिया एक यक्ष था। उस काल में यक्षों का मूल स्थान तिब्बत और मंगोल के बीच का स्थान था। कुबेर वहीं का राजा था।कई ऐसे यक्ष थे, जो चमत्कारिक थे। उस काल में यक्षों-यक्षिणिनियों की लोकपूजा भी होती थी। यह वेद विरुद्धकर्म था।*
यक्ष उपासक जैन लोग हुंडिय को महावीर स्वामी के पहले के जैन परम्परा के अनुयाई मानते हैं।


निरन्तर स्मरण बनये रखना ही ध्यान है, भक्ति साध्य है, लक्ष्य है; साधन नही।

निरन्तर स्मरण बनये रखना ही ध्यान है, न कि; नाम जप, नाम स्मरण । भक्ति साध्य है, लक्ष्य है; साधन नही। भक्ति न भजन-कीर्तन है, न नाम जप।  

वैदिक शास्त्रीय नियम तो यह है कि, धर्म पालन युक्त सदाचारी जीवन जीते हुए पञ्च महायज्ञ और अष्टाङ्ग योग के आचरण द्वारा प्रत्येक श्वास प्रश्वास स्वयम् की जानकारी में  और नियन्त्रण में ही लेते छोड़ते हुए,देह के समस्त आन्तरिक तन्त्र (सिस्टम) और संस्थान स्वयम् के नियन्त्रण में रखते हुए संचालित होते हुए नियमित , संयमित और सजग जीवन जीना। इसके साथ ही ईशावास्यम् इदम सर्वम्। सर्व खल्विदम् ब्रह्म, अहम् ब्रह्मास्मि का बोध सहित ध्यान हर पल होना चाहिए, हर श्वास-प्रवास के साथ सोऽहम् का ध्यान रहना ही चाहिए। यही ज्ञान है;  मानव देह का सदुपयोग भी यही है।
प्रत्येक श्वास प्रश्वास आपकी जानकारी में आपके नियन्त्रण में ही चले देह के समस्त आन्तरिक तन्त्र (सिस्टम) और संस्थान आपके नियन्त्रण में हो इसके लिए अष्टाङ्ग योग आवश्यक है। सम्पूर्ण जीवन ऋत के अनुकूल हो इसलिए पञ्च महायज्ञ आवश्यक है।

लोग बोलते हैं सन्त कहते हैं कि,
यदि भावना सही है तो क्रिया में गलती भी क्षमा हो जाती है।
तो भाई सन्तों की बात मानकर अच्छी भावना से गरम प्रेस पर हाथ रखकर देख लेना; अकल ठिकाने आ जाएगी।
वैदिक ऋषि मुर्ख नहीं थे जिनने सभी क्रिया विधि और निषेध जारी किये।

लोग बोलते हैं सन्त कहते हैं नाम जप करो। इससे ही पञ्च महायज्ञ की पूर्ति हो जाएगी। शायद उनके अनुसार तो केवल नाम जप से अष्टाङ्ग योग भी हो ही जाता होगा। और नाम जप करके लोग स्वस्थ्य,सुघड़, सुन्दर हो गये होंगे पर मुझे तो एक भी नहीं दिखा।
जबकि श्रीकृष्ण ने "श्रीमद्भगवद्गीता 06/35 में कहा है कि,
हे महाबाहो । *निस्सन्देह मन चञ्चल (और) कठिनाई से निग्रह होने वाला है  (नियन्त्रण या वश में करनें में कठिन है।); परन्तु है कून्तिपुत्र  (यह) अभ्यास और वैराग्य से  वश में होता है। (अभ्यास और वैराग्य से ही काबू मे या कब्जे में आता है)।* 06/35

【 *यहाँ अभ्यास से तात्पर्य भगवत्प्राप्ति के लिये भगवान के गुणों और लीलाओं का भजन - कीर्तन, भगवत्प्राप्ति विषयक शास्त्रों का पठन - पाठन श्रवण, मनन, चिन्तन तथा प्रणायाम पूर्वक जप अर्थात श्वास- प्रश्वास पर भी ध्यान देना और फिर सजगता पूर्वक ॐ या गायत्री मन्त्र के अर्थ और भाव को भी ध्यान रखते हुए सम्पूर्ण सजगता पूर्वक जप करना  इत्यादिक चेष्ठाओं से है। यह बात श्रीमद्भगवद्गीता में स्पष्ट रूप से वर्णित है। बल्कि निष्काम कर्म युक्त बुद्धियोग के लिए से यही साधन बतलाया है।* 】"
स्वामी रामसुखदास जी महाराज के अनुसार नाम लेना मतलब करुण पुकार करना। "हे नाथ मेरे नाथ मैं आपको न भूलूँ।" "मैं केवल आपका ही हूँ।"
"मैरो तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई।"
जप से उनका तात्पर्य तोता रटन्त नही है। करुण पुकार करना है।

सन्त सम्प्रदाय के लोग तो राधा नामक स्त्री को श्रीकृष्ण की प्रेयसी और पत्नी मानने है। जबकि, यह निर्विवाद सत्य है कि, ग्यारह वर्ष बावन दिन की अवस्था (उम्र) में श्रीकृष्ण कन्स के निमन्त्रण पर अक्रूर जी के साथ मथुरा चले गए थे और फिर वापस ब्रज, गोकुल, बरसाना में कभी नहीं आये। 
अब ग्यारह वर्ष के बालक की प्रेमिका होना और कामक्रीड़ा करना विचारणीय विषय है।
जबकि राधा का विवाह नन्दराय जी के साले अर्थात यशोदा माता के भाई रायण से हुआ था। न कि, श्रीकृष्ण से। तो राधा तो श्रीकृष्ण की मामी हुई ना।

ये सब कथा जयदेव के गीत गोविन्दम रचने के बाद कथा वाचकों ने गर्ग संहिता में डाल दी। फिर ब्रह्म वैवर्त पुराण में तो इतनी अति अश्लीलता के साथ वर्णन किया कि, कथावाचकों के मोज- मस्ती को रास-लीला नाम दे सके।
वह बात और है कि, ये नकली कथा न महाभारत में है और न भागवत पुराण में है। दोनों ग्रन्थों में राधा का नाम तक नहीं है।
महाभारत में तो श्रीकृष्ण की एक ही पत्नी रुक्मिणी ही बतलाई है।

महाभारत/ शान्तिपर्व/ मौक्ष पर्व/ अध्याय २८३ से २८४ तक के अनुसार तो शंकर जी पार्वती सहित दक्ष-यज्ञ से सहर्ष कैलाश लौटे थे। सती पार्वती ने आत्मदाह किया ही नहीं।
इन महन्तो और कथावाचकों के अनुसार तो शंकर जी के दो विवाह हुए पहला प्रणेताओं की पौत्री और दक्ष द्वितीय और असीक्नी की पुत्री सती के साथ 
फिर दक्ष यज्ञ में सती ने आत्मदाह कर लिया तो  हिमाचल/ हिमावन - मेनावती की पुत्री (और अर्यमा की नातिन)पार्वती के रूप में सती का दुसरा जन्म  हुआ, फिर शंकर जी का दुसरा विवाह  पार्वती के साथ हुआ। देवी- देवता की आयु तो एक मन्वन्तर होती है। इसलिए बीच मे मरने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। देवता ऋत के विरुद्ध नहीं कोई कार्य नहीं करते हैं। लेकिन इनके अनुसार तो देवता भी बीच में ही मर जाते हैं और उनका पुनर्जन्म भी होता है। 
जबकि महाभारत के अनुसार यह ग़लत है। न दक्षपुत्री ने आत्मदाह किया न उनका पुनर्जन्म हुआ।

रामचरितमानस और शिव पुराण के अनुसार श्री राम वनवास के समय सती ने सीता का रूप धर कर श्रीराम के समक्ष जाना भी मानते हैं इस कारण शंकर जी ने मानसिक रूप से सती का त्याग कर दिया। इस प्रकार सती देवी को अल्पज्ञ, और अविवेकी सिद्ध किया गया, और शंकर जी को असहाय पति घोषित कर दिया। जबकि महाभारत के अनुसार यह भी ग़लत है‌ ऐसा कुछ नहीं हुआ। 
पुराणों के अनुसार भस्मीभूत सती के शव को कन्धे पर लाद कर शंकर जी विक्षिप्त हो पूरे भारतवर्ष का चक्कर लगाते हैं। जब देह भस्म हो गई तो शव कहाँ से आया? फिर जब देह ही नहीं बची तो विष्णु जी सती के भस्मीभूत देह के ५१ टुकड़े करने का प्रश्न ही नहीं उठता। ये टुकड़े जहाँ-जहाँ गिरे, वहा शक्तिपीठ बनना भी ग़लत सिद्ध हो जाता है। ये पौराणिक कहना चाहते हैं कि, भगवान शंकर जैसे देवता पगला जाते हैं। और भगवान विष्णु भी उन्हें ठीक नहीं कर पाये। बल्कि उन्हें चुपके से कन्धे पर टंगे भस्मीभूत देह के ५१ टुकड़े करना पड़ता है। जबकि महाभारत के अनुसार सती ने आत्मदाह किया ही नहीं अतः यह भी ग़लत है ऐसा कुछ नहीं हुआ।

महाभारत शान्ति पर्व/ मौक्षधर्म पर्व/अध्याय 332-333 में शर शैय्या पर लेटे भीष्म युधिष्ठिर को बतलाते हैं कि, बहुत समय पहले वेदव्यास जी के पुत्र शुकदेव जी ब्रह्मलोक को सिधार गए। ध्यान दीजिएगा कि, महाभारत युद्ध के समय परीक्षित उत्तरा के गर्भ में ही थे। और उसके बहुत पहले शुकदेव जी ब्रह्मलोक सिधार चुके थे। 
महन्त और कथावाचक सन्त तो श्रीमद्भागवत पुराण को शुकदेव जी का परीक्षित को दिया प्रवचन बतलाते हैं। जबकि कितना विचित्र लगता है कि, महाभारत के लगभग चालीस वर्ष से अधिक समय बाद और शुकदेव जी के ब्रह्मलोक सिधारने के भी कम से कम अस्सी वर्ष बाद वे ही शुकदेव जी परीक्षित को भागवत पुराण सुनाने कहाँ से और कैसे आगये? मतलब ये पौराणिक महन्त, कथावाचक और तथाकथित सन्त कहना चाहते हैं कि, भागवत पुराण लिखते समय वेदव्यास जी सठिया गए थे। जिन्हें अपने पुत्र का ब्रह्मलोक सिधारना याद नहीं रहा ‌

सन्त बनकर घूम रहे ऐसे कथावाचकों और महन्तो से और इनकी मन गड़न्त कथाओं और सिद्धान्तों से तो भगवान ही बचाए। ऐसे सन्तों की बात मानने केवल नास्तिकता ही बढ़ेगी। लाभ तो सम्भव ही नहीं।

संस्कृत ग्रंथों में नाम से अधिक विशेषणो को महत्व दिया गया है। 
श्रीकृष्ण काले थे इसलिए उन्हें कृष्ण या श्याम कहा।
पता नहीं उनका नाम कन्हैया था या और कुछ! लगभग कोई नहीं जानता।
किसी के मन मे कृष्ण बोलने या सुनने से मुरलीधर का स्मरण हुआ, या गिरधर का या चक्रधर का या गीता प्रवचन कर्ता का या वस्त्रावतार का, या कूटनीतिक का या दुर्योधन को दिखाये विराट स्वरूप का, या अर्जून को दिखाये जगतरूप का (विभूति वर्णन का), या काल स्वरूप का या चतुर्भुज रूप का यह उसकी तत्कालीन भावावस्था पर निर्भर होता है। दुसरा कोई निश्चय पूर्वक नहीं कह सकता कि, वह क्या देख रहा हैं।  ऐसे ही राम बोले तो परशुराम समझें, श्रीरामचन्द्र जी समझें या बलराम समझें? इसलिए नाम स्मरण करते समय वाच्य और वाच्यार्थ अलग-अलग हो सकते हैं।
विशेषण में यह समस्या नहीं रहती इसलिए संस्कृत शास्त्रों में विशेषण का प्रयोग अधिक किया गया।
इसीलिए प्रणायाम में परमात्मा के प्राचीनतम नाम ॐ (प्रणव) का ही ध्यान पूर्वक उच्चारण होता है।
योगाचार्य केवल प्रणव को ही केन्द्रित करके लिखते बोलते हैं कि, प्रणव ॐ में ही वाच्य से वाच्यार्थ का ही बोध होता है। इसलिए ध्यान नहीं भटकता।
इसलिए प्रणव ॐ के जप के अलावा अन्य नाम जप करने से भाव स्थिर हो यह अनिवार्य नहीं है।
लेकिन श्रद्धा पूर्वक लीला श्रवण, लीला कथन, लीला स्मरण में भावनात्मक तल्लीनता आती है। मन प्रसन्न होता है, श्रद्धा बढ़ती है। इसलिए वेदों में त्रिविक्रम विष्णु , इन्द्र अग्नि आदि के पराक्रम का वर्णन मिलता है।
इसलिए ईश्वर प्राणिधान में भी गुणों का वर्णन या प्रकारान्तर से पौराणिक पद्यति से लीला श्रवण-कथन- चिन्तन- मनन अधिक उपयोगी है।

नाम स्मरण और स्मरण में अन्तर समझना चाहिए। सतत स्मरण रखना अर्थात लगातार याद रखना ही ध्यान है।

स्मरण करना अर्थात याद करना या नाम रटना ध्यान नहीं है। तोता भी राम-राम बोलता है। वह कोई जप नहीं करता। अतः बार-बार एक नाम लेने को याद करना (स्मरण/ ध्यान) कैसे माना जा सकता है?
बगुला एकाग्र चित्त हो मछली की गतिविधियों को ध्यान रखकर मौका पड़ते ही खा लेता है। वह कोई ध्यान नहीं करता। ऐसे ही एक आसन पर बैठकर शरीर और संसार की स्मृति बनी रहे तो काहेका ध्यान? यह तो केवल दिखावा मात्र है।

वैदिक साहित्य में नामजप का कहीं कोई उल्लेख नहीं है। ॐ के ध्यान का ही उल्लेख है न कि, ओ३म,ओ३म रटने का।
ध्रुव और प्रहलाद तक की कथा में भी मन्त्र ध्यान का ही उल्लेख किया गया है।
नाम जप का प्रथम बार उल्लेख महर्षि वाल्मीकि की कथा में भी नहीं आता है। किन्तु कथावाचकों नें मन से जोड़ लिया।

कबीर दास जी भी कह गए हैं कि, 
माला फेरत जुग भया, गया न मन का मैल, कर का मनका डारि के मन का मनका फेर।
और
पोथी पढ़ी पढ़ी जग मुआ, पण्डित भया न कोई, 
ढाई आखर प्रेम का 
पढ़े सो पण्डित होय।

नाम स्मरण और स्मरण दोनों अलग-अलग बातें हैं।
याद रखना ध्यान है, याद करना नही। स्मरण रखना ध्यान है। स्मरण करना नही अर्थात नाम रटना या केवल वाचिक मन्त्र जप कोई ध्यान नहीं है।

बेहोशी में किया गया कोई भी कर्म वास्तविक में कुछ अन्य कर्म ही होता है। गुणों के प्रति सजगता आवश्यक है तभी भक्ति और प्रेम होता है।
 देह और इन्द्रियों द्वारा की गई क्रिया संकल्पित कर्म तभी कहलाता है जब, जो किया जा रहा है, उसी का भाव चित्त में हो, विचार बुद्धि में हो, संकल्प/ इच्छा मन में हो। अन्यथा बैठे हैं जप कर रहे है लेकिन, दिमाग घर गृहस्थी में, स्कूल/ कॉलेज में ऑफिस में/ कम्पनी में/ दुकान/ व्यवसाय में/ राजनीति में या खेल में चला गया। योजना बनना शुरू हो गई। इसको यह कह देना था , उसको यह कह कर गलत किया, वहाँ, यह करना है, अभी जाकर पहले यही करूँगा। तो काहेका ध्यान?

यदि इसको स्मरण कहा जाए तो ऐसा स्मरण करने और न करने में क्या अन्तर है। 
यही स्थिति पढ़ाई करते समय, व्यायाम करते समय, ध्यान के नाम पर बैठते समय हो तो वह न तो पढ़ाई है, न व्यायाम है, और न ही ध्यान है। 
ऐसे में ही विद्यार्थी पढ़ते समय या ध्यान के लिए बैठकर सो जाते हैं, और ड्राइवर एक्सिडेंट करते हैं। 
जबतक कर्ता भाव है तब-तब ध्यान हो ही नहीं सकता।
किसी विचार, भाव या मनोदशा को लगातार संकल्पित निश्चित अवधि तक एक सी बनी रहना ध्यान है। बाकी आडम्बर है।
यदि कोई भी कार्य जो सजगता पूर्वक ,ध्यान पूर्वक नहीं किया जाता है तो, उस क्रिया  या कार्य को वह कर्म नहीं कहा जा सकता जिसे करने का दिखावा किया जा रहा है। ऐसे मे कर्म वही कहलाएगा जिसके विचारों में खोये थे। जो संकल्प उठ रहे थे।
नाम जप करते समय यदि पुछा जाए कि, आपका मोबाइल कहाँ रखा है? तो यह पढ़ते ही आपका ध्यान आपके मोबाइल पर केन्द्रित हो गया होगा। तब न पठन, न ध्यान, न आप न मैं कोई नहीं बचा था। बस मोबाइल ही रह गया था। लेकिन नाम जप चालू है।
उस समय धारणा थी मोबाइल की, मोबाइल को चित्त में धारण कर लिया। यदि यही अवस्था लम्बे समय तक रहे तो यह मोबाइल का ध्यान कहलाएगा न कि, नाम जप।
मैं संहिताओं को ही आधार मानकर चलता हूँ। क्योंकि मुझे वृहदारण्यकोपनिषद और छान्दोग्योपनिषद् में भी कल्याण और श्रेय शब्द के विषय में महर्षि याज्ञवल्क्य और महर्षि औषस्तिपाद में मतभेद दिखा । दोनों ऋषि एक दूसरे के शब्द को तुच्छ और अपने शब्द को श्रेष्ठ और सही सिद्ध करते हैं।
इसलिए मैं पारिभाषिक शब्दावली प्रयोग नहीं करता। यह उचित नहीं है कि, मैं किसी और सन्दर्भ में कहूँ और आप दूसरे सन्दर्भ में समझें। ऐसे में तो दोनों अपनी-अपनी जगह सही होते हुए भी परस्पर विरुद्ध जाएँगे। क्योंकि सबलोग पारिभाषिक शब्दों के अलग-अलग अर्थ लगाते हैं।
मैंने जिसे भक्ति कहा वह साध्य है, लक्ष्य है; साधन नहीं। वैदों में भक्ति मार्ग नहीं, लक्ष्य हैसाधन नहीं, साध्य है।
भक्ति मार्ग महाभारत ग्रन्थ में उल्लेखित वेदव्यास जी का भागवत धर्म की देन है।आजकल लोग भजन-किर्तन को भक्ति समझने लगे हैं। यह गलत है।

श्रीमद्भगवद्गीता 4.11
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।

भावार्थ - 
जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उसी प्रकार भजता हूं, क्योंकि सब मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुवर्तन करते है।