बुधवार, 24 अप्रैल 2024

हनुमान जी के जन्मस्थान पर मत भिन्नता ।

वाल्मीकि रामायण के किष्किन्धाकाण्ड काण्ड में सर्ग 64 श्लोक बीस में उल्लेख है कि, हनुमान जी का जन्म गुफा में हुआ था जबकि तिरुमला में कोई गुफा नहीं है। और केसरी जी का राज्य किष्किन्धा के निकट माल्यवान पर्वत पर था।
कर्नाटक के कोप्पल जिले के गंगावती तहसील में हम्पी से लगभग 25 किलोमीटर दूर अनेगुड़ी गाँव (अञ्जनी गाँव) ही किष्किन्धा नगरी है।
जहाँ तुङ्गभद्रा नदी (प्राचीन पम्पा नदी), पम्पा सरोवर, तारा पर्वत और बाली-सुग्रीव का किला भी है। यहाँ गुफाओं में पाँच से सात हजार वर्ष पुराने वानर जाति के लोगों द्वारा निर्मित बाली-सुग्रीव के युद्धरत चित्र और पर्वत में उकेरी प्रतिमाएँ मिलती है।
पास ही बाली के खजाने वाली गुफा बाली भण्डार और वाल्मीकि रामायण के किष्किन्धाकाण्ड सर्ग बारह में उल्लेखित मतङ्ग वन जहाँ हनुमानजी ने बाल लीलाएँ की, मतङ्ग ऋषि के आश्रम के पास ही शबरी माता की कुटिया भी है।
निकट ही ऋष्यमूक पर्वत भी है। जहाँ हनुमानजी की सलाह पर बाली से बचने के लिए सुग्रीव ने शरण ली थी। 
अनेगुड़ी गाँव के बीचोंबीच सूर्योदय सूर्यास्त के समय स्वर्णमय दिखने वाले आञ्जनेय पर्वत पर पत्थरों का किला है। जहाँ हनुमानजी का जन्मस्थान मन्दिर है। जिसमें स्थापित पर्वत के पाषाण से बनी प्रतिमा स्वायम्भूव मानी जाती है ।
प्रतिदिन सूर्योदय और सूर्यास्त के समय आञ्जनेय पर्वत को किसी भी कोण से देखने पर सुनहरी रङ्ग का दिखता है।
वाल्मीकि रामायण में हनुमान जी की जन्मस्थली सुनहरे रङ्ग का पर्वत बतलाया गया है।

लेकिन 
आन्ध्र प्रदेश के तिरुमला तिरुपति देवस्थान के सात सदस्यीय कमेटी और कर्नाटक के रा.स्व.से.संघ जिन्होंने कर्नाटक के कोप्पल जिले के गंगावती तहसील में हम्पी से लगभग 25 किलोमीटर दूर अनेगुड़ी गाँव (अञ्जनी गाँव) अर्थात किष्किन्धा नगरी में हनुमान जन्मस्थली मन्दिर निर्माण के लिए 120 करोड़ रुपए का कोष तैयार किया है इन दोनों संस्थाओं के बीच हनुमान जन्मस्थली विवाद तो माननीय न्यायालय में विचाराधीन है। जो कभी न कभी हल हो ही जाएगा और सिद्ध हो जायेगा कि, वास्तविक हनुमान जन्म स्थान कौनसा है?
वराह पुराण में तिरुमला की सात पहाड़ियों में से एक वैंकटाचल के बीस नामों में से एक सुमेरु भी बतलाया है।
वाल्मीकि रामायण उत्तर काण्ड में हनुमान जी का जन्म स्थान सुमेरुशिखराञ्चल बतलाया है।
वास्तविक सुमेरु पर्वत तो उत्तरी ध्रुव या हिमालय पर होगा ।

ब्रह्म पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण और वराह पुराण में तिरुमला की सात पहाड़ियों में से एक अञ्जनाद्री पहाड़ी का उल्लेख है। स्कन्द पुराण में उल्लेख है कि, माता अञ्जनी ने हनुमान जी के जन्म से पहले अञ्जनाद्री पहाड़ी पर तपस्या की थी, उसके बाद ही हनुमान जी का जन्म हुआ। इसी कारण इस पहाड़ी का नाम अञ्जनाद्री पड़ा।
तिरुमला में माँ अञ्जनी का मन्दिर अञ्जनाद्री पहाड़ी पर है।
वैकटाचल महात्म्य में बतलाया है कि, मतङ्ग ऋषि के आदेश पर माता अञ्जनी तिरुमला आई थी और पुष्कररणी में स्नान करने के बाद माता अञ्जनी ने हनुमान जी के जन्म के पहले आकाशगङ्गा नामक स्थान पर तपस्या की थी। आकाशगङ्गा नामक स्थान आज भी तिरुमला में स्थित है।
वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि, सूर्य के आदेश पर हनुमान जी ने सुग्रीव से मित्रता कर सुग्रीव को परामर्श दिया कि, वे बाली से बचने के लिए ऋष्यमूक पर्वत पर शरण ले।
श्री रामचन्द्र जी से मित्रता के पश्चात जब सुग्रीव, हनुमान जी और श्रीराम जब ऋष्यमूक पर्वत से किष्किन्धा लौटे तो उन्होंने बीच में कई प्रदेशों, अरण्यों और नदियों को पार किया था। मतलब ऋष्यमूक पर्वत किष्किन्धा से काफी दूर था। आज भी तिरुमला से किष्किन्धा पैदल पहूँचने में तीन-चार दिन लग जाते हैं।
उक्त प्रमाण सिद्ध करते हैं कि, हनुमान जी का जन्म तिरुमला में अञ्जनाद्री पहाड़ी पर हुआ था। 

इसके अलावा कुछ बे-सिर-पैर के दावे भी किये जा रहे हैं जिनमें प्रमुख है -

 महाराष्ट्र में नासिक से 28 किलोमीटर दूर त्र्यंबकेश्वर के पास अञ्जनेरी मन्दिर
शिवमोंगा मठ ने कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले गोकर्ण नामक स्थान पर भी दावा किया है।
झारखण्ड के गुमला से बीस किलोमीटर दूर आञ्जन गाँव में स्थित पहाड़ी की चोंटी पर स्थित गुफा में भी हनुमान जन्म स्थान का दावा किया गया है।
गुजरात के डाँग जिले में अञ्जनी पर्वत की गुफा में भी हनुमान जन्म स्थान का दावा किया गया है।
और सबसे विचित्र बात यह है कि, हरियाणा के कैथल में भी हनुमान जन्म स्थान का दावा किया गया है।

महाभारत के अनुसार तिब्बत में हिमालय के कैलाश शिखर के उत्तर में स्थित कुबेर के राज्यक्षेत्र अलका पुरी में महर्षि कश्यप की तपोभूमि गन्धमादन पर्वत पर हनुमान जी का वास है, जहाँ कमल सरोवर पर हनुमान जी से भीमसेन की भेंट हुई थी।
यह स्थान भी खोज का विषय है।

गुरुवार, 18 अप्रैल 2024

भूत-प्रेत यक्ष-राक्षस-पिशाच योनि है।

ऋग्वेद में रक्षोहा सूक्त में यातुधान पिशाच और रक्षोहा से रक्षा हेतु उपाय बतलाए हैं। 
कौषितकी उपनिषद के अनुसार पतञ्जली की पत्नी को यक्ष आवेश होता था। पतञ्जली की पुत्री को गन्धर्व आवेश होता था।
इनसे लोग आत्मज्ञान विषयक प्रश्न पूछते थे।
महाभारत के अनुसार युधिष्ठिर ने यक्ष के प्रश्नों का सही उत्तर देकर यक्ष के हाथों बेहोश किए गए अपने भाइयों को बचाया था।
लेकिन किसी को भूत-प्रेत लगा यह पढ़ने में नहीं आया।
आसुरी प्रकृति के यातुधान, ताल- बैताल, विनायक , ब्रह्म राक्षस (रक्षोहा) नामक पिशाच योनि, यक्ष योनि, गन्धर्व योनि में जन्में लोगो को कृमशः असुर पिशाच , असुर राक्षस, असुर यक्ष योनि, गन्धर्व कहलाते थे। नर पिशाच (अफगानिस्तान- पाकिस्तान सीमा पर रहते थे।)
 नर यक्ष (चीन, जापान और मङ्गोलिया में रहते थे) और  नर गन्धर्व (बलुचिस्तान/ अफगानिस्तान में रहते थे), नर असुर असीरिया इराक में रहते थे और नर राक्षस नीग्रो अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, उत्तर अमेरिका दक्षिण अमेरिका महाद्वीप में रहते थे।
ऐसे ही देव पिशाच (शिवगण- विनायक), देव गन्धर्व (तम्बुरा आदि बहुत से प्रसिद्ध हैं।), देव यक्ष (कुबेर, मणिभद्र आदि) और देव असुर वरुण आदि प्रसिद्ध हैं।
इनमें आसुरी प्रवृत्ति के गन्धर्व,यक्ष और पिशाच कमजोर लोगों को वैसे ही आवेशित करते थे जैसे हिप्नोटिस्ट सम्मोहित कर लेता है।
जैसे प्रायमरी कॉइल सेकेण्डरी कॉइल को बिना छुए आवेशित करती है। जैसे चुम्बक लोहे को बिना छुए आवेशित करता है। जैसे रक्त तप्त कोयला या लोहा निकट रखी वस्तुओं को बिना छुए गर्म कर देता है। और बर्फ गर्मी हर लेता है। वैसे ही ये योनियाँ बाहर रह कर ही व्यक्ति को आवेशित कर सकतीं हैं।
इस्लाम के आगमन के पहले न किसी को भूत-प्रेत दिखे, न लगे। अतः उतारने की विधि का आविष्कार होने का प्रश्न ही नहीं है।
लोक कथाओं के अनुसार भूत- प्रेत भोजन ग्रहण करते हैं, मदिरा पान करते हैं,  चीलम फूंकते हैं, बीड़- सिगरेट पीते हैं। अर्थात ग्रहण - उत्सर्जन करते हैं।
पुरुष भूत-प्रेत नारियों से सम्भोग या बलात्कार कर सन्तान उत्पन्न कर देते हैं। और चुड़ेल नर / पुरुषों के साथ सम्भोग करतीं हैं। और प्रजनन करती हैं।(बाईबल भी ऐसा मानती है।)
भूत-प्रेतो और चुड़ेलों में भी परस्पर रतिक्रिया होती है।
गर्भवती भूत- प्रेत के लिए मानव चिकित्सक और दाई को ले जाकर प्रसूति करवाते हैं। अर्थात प्रजनन होता है।
बिमार भूत-प्रेतो और चुड़ेलों की चिकित्सा भी मानव चिकित्सक से करवाते हैं। यहाँ तक कि, एलोपैथिक दवाइयाँ और इंजेक्शन भी लेते हैं। मतलब बिमार भी होते हैं।
प्रचलन अर्थात चलते-फिरते, नाचते-गाते भी हैं।
विवाह समारोह भी आयोजित करते हैं।
मतलब भूत-प्रेत मरे हुए व्यक्ति का देह रहित जीव आदि कुछ नहीं है; बल्कि सदेह योनि हैं।
जबकि, इब्राहीमी मजहब, यहुदी, ईसाई, इस्लाम और वहाबी के अनुसार व्यक्ति के मरते ही उसके प्राण (देही) अशरीरी भूत-प्रेत (जिन्न) बन जाता है। ड्रेकुला अपनी शव पेटी (कबर) लेकर ही घुमता रहता है। इन जिन्नों का आकार प्रकार, शक्ल- सूरत सब मृतक के देह के समान ही होती है। ये जीवित मानव के शरीर में घुस जाते हैं और उसे परेशान करते हैं। या दुसरों को भी परेशान करते हैं। फिर जिसके शरीर में घुस जाते हैं उसकी मृत्यु हो जाती है और वह भी जिन्न (भूत-प्रेत) बन जाता है। दासत्व से पीड़ित भारतीय हिन्दू भी भूत-प्रेत मानने लगे।
सनातन वैदिक धर्म के लोगों को समझना चाहिए कि, हमारे वैदिक शास्त्रों में गन्धर्व यक्ष, राक्षस और पिशाच योनि का उल्लेख है। ऐसे जिन्नों का नहीं। अर्थात वास्तव में गन्धर्व यक्ष, राक्षस और पिशाचों को हम कुसङ्गति से भ्रमित होकर अपना ज्ञान भूलकर इन्हें भूत-प्रेत मान लेते हैं।

सोमवार, 15 अप्रैल 2024

नव संवत्सर प्रारम्भ वसन्त सम्पात से ही उचित है।

प्रश्न - वर्ष का पहला दिन किसे माना जाए?
21-22 March या 13_14 April?
उत्तर -भौगोलिक संवत् अर्थात कलियुग संवत को 20/21 मार्च से प्रारम्भ मानना ही उचित है।

सूर्य की शुन्य क्रान्ति अर्थात वसन्त सम्पात अर्थात सायन मेष संक्रान्ति 20/21 मार्च से वैदिक उत्तरायण/ पौराणिक उत्तर गोल, वैदिक वसन्त ऋतु और वैदिक मधु मास का प्रारम्भ होता है।
शरद सम्पात अर्थात सायन तुला संक्रान्ति 23 सितम्बर से वैदिक दक्षिणायन/ पौराणिक दक्षिण गोल, वैदिक शरद ऋतु और वैदिक ईष मास प्रारम्भ होता है।

सूर्य की उत्तर परम क्रान्ति अर्थात सायन कर्क संक्रान्ति 22 जून से वैदिक उत्तर तोयन / पौराणिक दक्षिणायन और वैदिक शचि मास प्रारम्भ होता है।
दक्षिण परम क्रान्ति अर्थात सायन मकर संक्रान्ति 23 दिसम्बर से वैदिक दक्षिण तोयन / पौराणिक उत्तरायण और वैदिक सहस्य मास प्रारम्भ होता है। 

वैदिक उत्तरायण में वसन्त, ग्रीष्म वर्षा ऋतु होती है तथा मधु, माधव शुक्र, शचि, नभः (नभस), नभस्य मास होते हैं। वैदिक दक्षिणायन में शरद, हेमन्त और शिशिर ऋतु होती है तथा ईष, उर्ज, सहस, सहस्य, तपस और तपस्य मास होते हैं। ये सब सायन पद्यति पर आधारित हैं।
सूर्योदयास्त, दिनमान, लग्न दशम भाव (मेरिडियन कॉइल) सब सायन गणना से ही बनते हैं।अतः भौगोलिक काल गणना का आधार सायन गणना ही है।

लेकिन विषुववृत और वसन्त सम्पात आकाश में नहीं दिखते हैं। इन्हें समझने के लिए एक साधारण कृषक या पथिक ठीक पूर्व में सूर्योदय, ठीक पश्चिम में सूर्यास्त, दिन- रात बराबर होना देखकर जान सकता है कि, आज-कल में ही संवत्सर प्रारम्भ दिन होगा ।  जानकार होगा तो मध्याह्न में खजुर नारियल के पेड़ या खम्बे की छाया देखकर वसन्त सम्पात/ शरद सम्पात/ उत्तरपरम क्रान्ति/ दक्षिण परम क्रान्ति अर्थात अयन- तोयन देख सकता है। इसी क्रिया को वैध लेने वाले ज्योतिषी शंकु खड़ा कर शंंकु की छाया की लम्बाई और कोण आदि मापन कर सिद्ध करते हैं।

ध्यान रहे ऋतुएँ काल अर्थात सायन सौर मास के साथ-साथ भौगोलिक अक्षांश पर भी निर्भर है। उल्लेखनीय है कि, मौसम / ऋतुएँ प्रकृति में भी दिखती है। वसन्त में सभी पेड़ पौधों का पुष्पित होना, ग्रीष्म में गर्मी होना, वर्षा ऋतु में पर्जन्य वर्षण होना, शरद में पुनः प्रकृति पुष्पित हो जाती है। शिशिर में कड़ाके की ठण्ड पड़ती है। 
इन्हें देखकर स्थानीय व्यक्ति को अपने क्षेत्रानुसार ऋतुओं और मधु-माधवादि मास का सहज ही अनुमान हो जाता है। जैसे मध्यप्रदेश के मालवा प्रान्त में (उज्जैन के आसपास) वैदिक तपस्य और मधु मास (सायन मीन और मेष के सूर्य) में वसन्त ऋतु होती है। और ठेठ दक्षिण भारत में तो सायन कुम्भ- मीन के सूर्य (तपः - तपस्य मास में ही वसन्त ऋतु होती है।) 

इसी प्रकार वर्तमान में हम ग्रेगोरी केलेण्डर के मार्च-अप्रैल आदि माहों से ऋतुएँ देखते हैं। क्योंकि ग्रेगोरी केलेण्डर भी सायन गणनाधारित है। लेकिन वर्ष और मासों का प्रारम्भ दिनांक मनमाने करके उसका मटियामेट कर रखा है। 
राष्ट्रीय कैलेण्डर में एक- दो दिन की थोड़ी सी  त्रुटि है लेकिन ऋतु बद्ध होने से बहुत उपयोगी है कृषि/उद्योग/ व्यापार/ बजट सब इसी पर आधारित हो सकते हैं। लेकिन सरकार इसे लागू करने में प्रयत्नशील नहीं है।
कलियुग संवत और मधु- माधव मास शुद्ध सायन गणनाधारित है। नेशनल कैलेण्डर और उसके ही चैत्र - वैशाख मास भी सायन गणनाधारित है। तथा Gregory कैलेण्डर भी सायन सौर कैलेण्डर ही हैं। इसलिए इन तीनों कैलेण्डर की गणना भौगोलिक दृष्टि से सही है।
इसलिए संवत्सर 20/21 मार्च से ही मानना ही उचित है।

नक्षत्रीय परिपथ की पट्टी के आधार पर क्रान्तिवृत आकाश में स्पष्ट दिखता हैं। क्योंकि क्रान्तिवृत के लगभग नौ-नौ अंश उत्तर- दक्षिण में फैला पूरा भचक्र अर्थात नक्षत्रीय परिपथ पट्टी (फिक्स्ड झॉडिएक) में असमान अंशात्मक विस्तार अर्थात असमान भोगांश वाले सत्ताइस नक्षत्र पहचाने जा सकते हैं। आधुनिक एस्ट्रोनॉमी में अठासी नक्षत्र माने गए हैं।
चित्रा तारा स्थिर भचक्र (नक्षत्रीय परिपथ) के ठीक मध्य में 180° पर स्थित है। अतः चलते रास्ते किसान भी चित्रा तारे का सूर्यास्त के समय उदय और सूर्योदय के समय अस्त होना देखकर, और मध्यरात्रि में ठीक सिर पर होना  देखकर भी बतला सकता है कि, आज निरयन मेष संक्रान्ति (13/14 अप्रेल) है।
 
 प्रश्न - क्या निरयन मेष संक्रांति ऋतु बद्ध नहीं है?
उत्तर - हाँ! निरयन मेष संक्रांति ऋतु बद्ध नहीं है।

निरयन मेष संक्रान्ति अर्थात सूर्य चित्रा तारे से 180° पर होना। इसका सम्बन्ध उत्तर क्रान्ति या दक्षिण क्रान्ति से नही है। निरयन भोगांश के साथ आकाशीय अक्षांश अर्थात शर बतलाया जाता है ताकि, चन्द्रमा और ग्रहों या उपग्रहों, धूमकेतु आदि की आकाशीय स्थिति स्पष्ट हो सके। सूर्य का शर सदैव शुन्य ही रहता है।

स्थिर भचक्र डॉयल है और पात, मन्दोच्च , शिघ्रोच्च, ग्रहचार आदि घड़ी की सूइयाँ है।
वसन्त सम्पात 50.3' प्रति वर्ष की वामावर्त गति से स्थिर भचक्र (नक्षत्रीय परिपथ) में पश्चिम की ओर खिसकता रहता है। इस कारण लगभग 25778 वर्ष में वसन्त सम्पात पूरे भचक्र (फिक्स्ड झॉडिएक) का परिभ्रमण कर लेता है। 22 मार्च 285 ईस्वी को वसन्त सम्पात चित्रा तारे से 180° पर निरयन मेषादि बिन्दु पर था। 21 मार्च 13174 ईस्वी को वसन्त सम्पात चित्रा तारे पर रहेगा। 
नाक्षत्रिय नववर्ष या निरयन सौर नव वर्ष फिक्स्ड झॉडिएक पर आधारित है। इसलिए नाक्षत्रीय नववर्ष या निरयन नववर्ष खगोलीय नव वर्ष है। भौगोलिक नव-वर्ष नहीं है । इसलिए ऋतु आधारित नहीं है।

सुचना - आचार्य वराहमिहिर ने वृहत्संहिता में तेरह अरों का उल्लेख किया है। साथ ही वैदिक काल में प्रचलित अट्ठाइस नक्षत्रों का भी वर्णन किया है । लेकिन बाद में अभिजित नक्षत्र भचक्र अर्थात नक्षत्रीय परिपथ से बाहर (दूर) चला गया अतः वर्तमान में असमान भोगांश वाले केवल सत्ताइस नक्षत्र माने जाते हैं। जबकि आधुनिक एस्ट्रोनॉमी में तेरह राशियों (साइन) और अठासी नक्षत्र (कांस्टिलेशन) माने जाते हैं।
तीस अंश वाली बारह राशियाँ और 13°20' (तेरह अंश बीस कला) वाले राशि नक्षत्र केवल होरा शास्त्र/ जातक शास्त्र/ फलित ज्योतिष, ताजिक (वर्षफल) और वर्तमान मुहूर्त शास्त्र में ही चलते हैं।

वेदों, वैदिक ग्रन्थों, वाल्मीकि रामायण और महाभारत में उल्लेखित नक्षत्र असमान भोगांश वाले सत्ताइस या अट्ठाइस नक्षत्रों का उल्लेख ही है। उनमें कार्य के लिए उचित नक्षत्र या नक्षत्रों के आधार पर फल जगत का या स्थान विशेष का फल कथन इन्हीं असमान भोगांश वाले सत्ताइस/ अट्ठाइस नक्षत्रों के आधार पर ही कहे गए हैं। अर्थात मूलतः संहिता ज्योतिष में अर्थात मुहूर्त/ वास्तु और राष्ट्रीय भविष्य कथन में इन्ही असमान भोगांश वाले नक्षत्रों का प्रयोग होना चाहिए।
 
22 मार्च 285 में वसन्त सम्पात अर्थात सायन मेष संक्रान्ति और निरयन मेष संक्रान्ति दोनों एक साथ हुई थी।
तब से आज तक 24 दिन का अन्तर पड़ गया। यही अन्तर अयनांश कहलाता है। जबकि, वर्तमान में 13 -14 April को पड़ने वाली निरयन मेष संक्रांति विवेकानन्द जी के जन्म के समय 11/12 अप्रैल को होती थी। और निरयन मकर संक्रांति 12 जनवरी को होती थी। जो वर्तमान में 14 जनवरी को होती है।

पण्डित दीनानाथ शास्त्री चुलेट पण्डित शंकर बालकृष्ण दीक्षित और पण्डित व्यंकटेश बापूजी केतकर सभी ने वैदिक प्रमाणों के आधार पर वसन्त सम्पात से संवत्सर प्रारम्भ, उत्तरायण प्रारम्भ, वसन्त ऋतु प्रारम्भ तथा मधुमास प्रारम्भ मानते थे। क्योंकि वैदिक ऋषियों का वास स्थान उत्तरी आर्यावर्त और ब्रह्मावर्त में था अर्थात हरियाणा, पञ्जाब , कश्मीर, सिन्ध, बलुचिस्तान, उत्तर पश्चिम सीमा प्रान्त, ताजिकिस्तान कम्बोज, तुर्कमेनिस्तान, तिब्बत और कजाकिस्तान में था। इसलिए वेदों में अयन और ऋतुएँ तदनुसार दी है।
बाद में जब मध्यदेश अर्थात मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात बङ्गाल , उड़िसा और दक्षिण में महाराष्ट्र , कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, तेलङ्गाना, तमिलनाडु और करल तथा श्रीलंका में जनसंख्या वृद्धि हुई, विद्वान दक्षिण में भी बसे और फले-फुले तब पौराणिक काल में उज्जैन को केन्द्र मानकर वसन्त ऋतु और मधुमास सायन मीन संक्रान्ति से प्रारम्भ करने लगे। और सूर्य का उत्तरायण सूर्य की परम उत्तर क्रान्ति सायन मकर संक्रान्ति से प्रारम्भ करने लगे।
चुलेट शास्त्री जी अक्षांशों और सायन सौर मास से ऋतुओं को सम्बन्ध मानते थे। चान्द्रमास शुक्ल पक्ष से प्रारम्भ मानते थे।
चान्द्रमास ऋतु आधारित नहीं माने हैं।

लेकिन यह सबने माना है कि, स्थिर भचक्र (फिक्स्ड झॉडिएक) में जिस जिस नक्षत्र में वसन्त सम्पात होता था संवत्सर का प्रथम नक्षत्र माना जाता था। स्थिर भचक्र में अश्विनी ही प्रथम नक्षत्र मान्य था। लेकिन संवत्सर में प्रथम नक्षत्र और प्रथम निरयन सौर मास और प्रथम चान्द्रमास उसे ही माना जाता था जिसमें वसन्त सम्पात हो। किन्तु सायन सौर मधु मास प्रथम मास ही रहता था।
जब चान्द्रमास प्रचलन में आए तब पूर्णिमा को जिस नक्षत्र पर चन्द्रमा होता था उस चान्द्रमास का नाम उस पूर्णिमा के नक्षत्र के आधार पर रहता था।
अतः पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा जिस नक्षत्र के साथ रहता है, उसके आधार पर यह बतलाया जा सकता हैं कि, कौनसे मास की पूर्णिमा है।
श्री दीनानाथ शास्त्री चुलेट और श्री ग. वा. कविश्वर हो या तिलक जी हो या श्री व्यंकटेश बापूजी केतकर हो या शंकर बालकृष्ण दीक्षित हो सबने चान्द्रमास अमान्त ही माने हैं। लेकिन पौराणिक सन्दर्भ में चुलेट शास्त्री जी ने भी अपवाद स्वरूप कुछ स्थानों पर पूर्णिमान्त चान्द्र मास का उल्लेख भी माना है। स्व. श्री ग. वा. कविश्वर जी ने महाभारत में अपवाद स्वरूप कुछ स्थानों पर पूर्णिमान्त चान्द्र मास का उल्लेख भी माना है। सम्भवतः कुछ प्रयोजन विशेष में ही पूर्णिमान्त मास का उल्लेख किया जाता होगा। क्योंकि ऋग्वेद में तो चौबीस/ छब्बीस पक्षों के पवित्र आदि अलग-अलग नाम दिये हैं। मतलब तब चान्द्रमास नही चलते थे।
वैदिक काल में जिस चान्द्रमास में वसन्त सम्पात पड़ता था, उसी मास को संवत्सर का प्रथम मास माना जाता था।
इसी कारण वर्तमान में निरयन मेष मास को वैशाख कहते हैं। प्रथम मास चैत्र होने से आश्विन शुक्ल पक्ष में नवरात्र (रात्रि प्रारम्भ) होना माना जाता है। गुजरात में कार्तिकादि संवत्सर आज तक प्रचलित है। महाभारत भीष्म पर्व में भगवान श्रीकृष्ण गीता प्रवचन में वसन्त ऋतु और मार्गशीर्ष मास को अपनी विभूति बतलाते हैं। वेदाङ्ग ज्योतिष काल में माघ मास को भी प्रथम मास होने का उल्लेख मिलता है। लेकिन मधुमास में ही चैत्र मास रहेगा ऐसा कोई नियम नहीं मिलता। न ही ऐसा कोई नियम मिलता है कि, संवत्सर प्रारम्भ चैत्र मास से ही माना जाए।
यूरोपीय विज्ञान मुख्यतः युद्ध और यौद्धाओं तथा उद्योगों को ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया। जबकि भारत में सम्पूर्ण समाज को दृष्टिगत रखते हुए विद्याओं का विकास हुआ। राज्य, कृषि, उद्योग, व्यापार ही नहीं अपितु कलाकारों तक को ध्यान में रखा जाता था।
इसलिए यूरोपीय एस्ट्रोनॉमी नाविकों को दृष्टिगत रखते हुए बनी। जबकि भारत में किसान से लेकर व्यापारियों तक, दर्शन, धर्म-कर्म और कर्मकाण्ड से लेकर सामाजिक उत्सव, व्रत, पर्व और त्योहारों तक को ध्यान में रखकर ब्रह्माण्ड विज्ञान, ग्रह गणित, संहिता ज्योतिष आदि का विकास हुआ।

अन्त में मैरा सुझाव है कि,
सायन सौर संक्रान्तियों, निरयन सौर संक्रान्तियों, पुर्णिमा, अमावस्या और अष्टमी तिथि सम्बन्धित व्रत,पर्वोत्सव मनाना।

केवल होली दिवाली जैसी इष्टियाँ, कोजागरी - शरदपुर्णिमा जैसे कुछ विशिष्ट वृतपर्वोत्सवों को छोड़ शेष सभी वृत पर्वोत्सव सायन सौर संक्रान्तियों, और उनके गतांश के अनुसार ही मनाये जावें।
 
 इष्टियों और अष्टका-एकाष्टका वेदिक पर्व है।अतः इन विशिष्ट वृतपर्वोत्सवों को पुर्णिमा, अमावस्या और अष्टमी तिथि (अर्ध चन्द्रमा) पर ही किया जाता था अतः इन्हें दर्शाया जा सकता है।
चूंकि पौराणिक कथाओं में उल्लेखित स्थान कुरुक्षेत्र, अयोध्या, प्रयोग, काशी (वाराणसी), पटना, द्वारका, प्रभास (सोमनाथ), उज्जैन, नासिक और नागपुर जैसे मध्यदेश के ही हैं अतः पौराणिक व्रत-पर्व उत्सव-त्योहार मनाने के लिए वर्तमान प्रचलित निरयन सौर मासाधारित चान्द्रमासों - चैत्र वैशाख मास को राष्ट्रीय कैलेण्डर के चैत्र वैशाख मास मान लिया जाए। अर्थात वैदिक मधु मास के प्रारम्भ दिन वसन्त सम्पात, सायन मेष संक्रान्ति को चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ समय मानकर व्रत-पर्व उत्सव-त्योहार के दिनांक निर्धारित कर लिया जाए।
कृष्णपक्ष की तिथियों को 16, 17, 18 से 30 तक गिनती मानकर जो व्रत पर्वोत्स्व जिस तिथि को मनाया जाता है उसी वर्तमानांश या गतांश या दिनांक पर मनाया जाये। नागपञ्चमी, वटसावित्री जैसे कुछ व्रत पर्वोत्सवों में राजस्थान -उत्तर प्रदेश आदि गोड़ मतावलम्बियों और पश्चिम मध्यप्रदेश में मालवा- निमाड़, और महाराष्ट्र आदि हेमाद्रि, काल माधव, निर्णय सिन्धु- धर्म सिन्धु के मत में एक चान्द्र पक्ष अर्थात लगभग 15 दिन का अन्तर पड़ता है उनका निबटारा भी कर लिया जाए।


शुक्रवार, 12 अप्रैल 2024

युधिष्ठिर संवत्सर 5163 विक्रम संवत 2081 का प्रारम्भ

 
निरयन मेष संक्रान्ति आज दिनांक 13 अप्रैल 2024 शनिवार को 21:03 बजे (रात्रि 09:03 बजे) होगी। 
पुण्यकाल अपराह्न 05:51 बजे ( 17:51 बजे) से 06:46 बजे (18:46बजे) तक (इन्दौर में सूर्यास्त समय तक) की अवधि में पवित्र नदियों/ कुण्ड में स्नान और दान करने का पुण्य काल रहेगा।  
वैशाखी पर्व पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ।

नाक्षत्रीय नव वर्ष युधिष्ठिर संवत 5163 निरयन मेष संक्रान्ति पश्चात सूर्योदय से अर्थात 14 अप्रेल 2024 रविवार को सूर्योदय से प्रारम्भ होगा।

 *पञ्जाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड* में जिन दो सूर्योदय के बीच निरयन मेष संक्रान्ति लगती है, उसी दिन (वार) वैशाखी/ वैसाखी नाम से नव वर्ष विक्रम संवत 2081 का प्रारम्भ भी होता है। इसलिए विक्रम संवत का प्रारम्भ होने का *वैशाखी पर्व आज ही मनेगा* ।

 *उड़िसा में* मी सूर्योदय नियमानुसार आज ही *पणा संक्रान्ति नाम से नववर्ष मनाएंगे।* 

इसी नाक्षत्रीय नव वर्ष को 
 *बङ्गाल में* निरयन मेष संक्रान्ति यदि मध्य रात्रि के पूर्व लगे तो उसी दिन नबा वर्षा या पोहेला बोईशाख के नाम से नव वर्ष मनाते हैं। इसलिए *बङ्गाल में भी आज ही नववर्ष पर्व मनेगा।* 

(निरयन मेष संक्रान्ति यदि मध्यरात्रि के बाद लगने पर बङ्गाल में नबा वर्षा दुसरे दिन मनाते हैं।)
 
 *असम में बिहु नाम से नव वर्ष मनाएँगे।* 

तमिलनाडु में यदि सूर्यास्त के पहले निरयन मेष संक्रान्ति लगे तो उसी दिन पथण्डु नाम से निरयन मेष संक्रान्ति से नव वर्ष मनाते हैं।अन्यथा सूर्यास्त के बाद निरयन मेष संक्रान्ति लगनें पर दुसरे दिन नव वर्ष पथण्डु मनाते हैं।अतः *तमिलनाडु में कल दिनांक 14 अप्रैल 2024 रविवार को नववर्ष पथण्डु मनाया जाएगा।* 
ऐसे ही 
केरल में अठारह घटिका नियम चवता है। अर्थात दिनमान के प्रथम 3/5 वें भाग (सूर्योदय से लगभग 7 घण्टे 12 मिनट में) निरयन मेष संक्रान्ति लगे तो उसी दिन अन्यथा दुसरे दिन नव वर्ष विषुकाणि नाम से मनाया जाता है। अतः *केरल में भी कल दिनांक 14 अप्रैल 2024 रविवार को नववर्ष विषुकाणि मनाया जाएगा।* 
 *इस दिन भूमि चित्रा तारे के सम्मुख रहने से सूर्य चित्रा तारे से 180° पर रहता है। इस कारण एक दिन पहले और इसी दिन भी चित्रा तारा सूर्यास्त के साथ उदय होगा और सूर्योदय के साथ अस्त होगा। पूरी रात चित्रा तारा आकाश में दिखता रहेगा।*
लेकिन नाक्षत्रीय नववर्ष पर्व वैदिक नव संवत्सर पर्व के समान ऋतु बद्ध नहीं है। 25778 वर्ष के चक्र में यह नव वर्ष पर्व प्रत्येक ऋतु में आयेगा।23 सितम्बर 13174 ईस्वी में को युधिष्ठिर संवत का प्रारम्भ शरद सम्पात से प्रारम्भ होगा।

अर्थात *तुर्क, अफगान, ईरान और कजाकिस्तान के आक्रमण झेलने वाले मध्य क्षेत्र को छोड़कर शेष भारत में चारों ओर आज या कल निरयन मेष संक्रान्ति से नव संवत्सर प्रारम्भ माना जाता है।* 
 *लम्बी अवधि की दासता ने मध्य क्षेत्र में सनातनी संस्कृति के साथ सनातनी नव संवत्सर भी लुप्त हो गया और तुर्क/ कुषाणों द्वारा चलाया निरयन सौर चान्द्र वर्ष शकाब्द प्रचलित हो गया।* 

वैदिक और पूर्णतः वैज्ञानिक युगाब्द कलियुग संवत 5125 का प्रारम्भ वसन्त से सम्पात 21 मार्च 2024 गुरुवार के सूर्योदय के साथ हो चुका है। इसी दिन वैदिक मधुमास, ब्रह्मावर्त में वैदिक वसन्त ऋतु और उत्तरायण प्रारम्भ हुआ।
इस दिन दिन रात बराबर रहते हैं। देवताओं का सूर्योदय होता है। उत्तरी ध्रुव पर सूर्योदय होता है। वैदिक उत्तरायण प्रारम्भ, वैदिक वसन्त ऋतु प्रारम्भ और वैदिक मधुमास का प्रारम्भ होता है।
यह नव वर्ष महाभारत युद्ध के बाद प्रायः अप्रचलित हो गया। क्योंकि, महाभारत युद्ध में सभी विद्वान, ज्ञाता, वीर योद्धा समाप्त हो गये थे। 


*अवैदिक और पूर्णतः अवैज्ञानिक पौराणिक शकाब्द 1946 का प्रारम्भ दिनांक ०९ अप्रेल २०२४ मङ्गलवार को चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सूर्योदय से हो चुका है।*
*इस दिन वैदिक कलियुग संवत जैसी कोई विशेषता नहीं होती और नाक्षत्रीय सौर संवत प्रारम्भ दिन जैसी कोई विशेषता भी नहीं होती।*
इसकी एकमात्र विशेषता है - अपने शक राजा को खुश करने के लिए पौराणिकों ने इसे भरपूर समर्थन देकर प्रचार किया।

बल्कि इस पौराणिक नववर्ष का वास्तविक इतिहास यह है कि,⤵️
 *वर्तमान चीन के प्रान्त पूर्वी तुर्की के शिंजियांग उइगु़र प्रान्त के निवासी उइगुर मुस्लिमों के पूर्वज शक-कुषाणों द्वारा प्रवर्तित और प्रचलित १९ वर्षीय, १२२ वर्षीय और १४१ वर्षीय चक्र वाले निरयन सौर चान्द्र वर्ष को अपनाया और पेशावर (पाकिस्तान) के क्षत्रप कुषाण वंशीय कनिष्क द्वारा मथुरा विजय के उपलक्ष्य में उत्तर भारत में प्रचलित निरयन सौर चान्द्र वर्ष शकाब्द प्रचलित किया और आन्ध्र प्रदेश के सातवाहन वंशीय गोतमीपुत्र सातकर्णी द्वारा नासिक के पास पैठण (महाराष्ट्र) पर विजयोपलक्ष्य मे दक्षिण भारत में निरयन सौर चान्द्र वर्ष शकाब्द के नाम से प्रचलित किया।*
*इस कारण उत्तर भारत में कुषाण वंश शासित क्षेत्र एवम् दक्षिण भारत में सातवाहन वंशीय शासित क्षेत्र में एवम् मराठा शासित भारतीय क्षेत्र उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश और तेलङ्गाना में नव चान्द्र वर्ष शकाब्द के नाम से प्रसिद्ध है। आन्ध्र प्रदेश में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा युगादि या उगादि कहते हैं ।जबकि महाराष्ट्र में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा कहते हैं।*  

*निरयन सौर वर्ष आधारित होने के कारण पौराणिक चान्द्र-सौर शकाब्द नववर्ष पर्व (वैदिक नव संवत्सर पर्व के समान) ऋतु बद्ध नहीं है। 25778 वर्ष के चक्र में यह नव वर्ष पर्व प्रत्येक ऋतु में आयेगा। सितम्बर 13174 ईस्वी में को युधिष्ठिर संवत का प्रारम्भ शरद सम्पात से प्रारम्भ होगा। अर्थात शरद ऋतु में प्रारम्भ होगा।*
*इसलिए निरयन सौर चान्द्र वर्ष पूर्णतः अवैज्ञानिक है। वेदों में इसका उल्लेख होने तो सम्भव ही नहीं है अतः अवैदिक है।*
इसलिए मैरी श्रद्धा नहीं है।

गुरुवार, 11 अप्रैल 2024

बाइबल

"यहुदियों और ईसाइयों का ईश्वर-याहवेह (यहोवा), यहुदियों के ऋषि - इब्राहिम, सुलेमान राजा, दाउद, और मूसा । यहुदियों के ग्रन्थ --- तनख दाऊद की किताब जुबेर, मूसा की किताब तोराह (बायबल ओल्ड टेस्टामेंट)। 
ये पुस्तकें सीरिया खाल्डिया और बेबीलोनिया (इराक) की पुरानी अरामी भाषा ( पश्चिमी आरमाईक) भाषा में लिखित है। हिब्रू भाषा भी अरामी भाषा का रूप ही है।
"हिब्रू बाइबल या तनख़ यहूदियों का मुख्य धार्मिक ग्रन्थ है। इसकी रचना 600 से 100 ईसा पूर्व के समय में विभिन्न लेखकों द्वारा विभिन्न देशों में की गई है। हिब्रू बाइबल तीन अलग अलग शास्त्रों का संकलन है। जो कि प्राचीन यहूदी परम्परा का आधार हैं। अतः तनख़ के तीन भाग हैं-"

"निम्नांकित 39 किताबे प्रोटेस्टेंट बाइबिल के पूर्वार्ध (पुराना नियम/ ओल्ड टेस्टामेंट) में हैं, 
"विधान -- १ उत्पत्ति, २ निर्गमन, ३ लैव्य व्यवस्था, ४ गिनती और ५ व्यवस्था विवरण"
"इतिहास --- १ यहोशु २ न्यायियों ३ रूत ४ प्रथम शमुऐल ५ द्वितीय शमुऐल ६ प्रथम राजाओं का व्रतांत ७ द्वितीय राजाओं का व्रतांत ८ इतिहास (प्रथम) ९ इतिहास (द्वितीय)"।
"भजन --- १ एज्रा २ नहेम्याह ३ ऐस्तर ४ अय्यूब ५ भजन संहिता ६ नीति वचन ७ सभोपदेशक ८ श्रेष्ठगीत"।
"नबी --- १ यशायाह २ यिर्मयाह ३ विलापगीत ४ यहेजकेल ५ दानिय्येल ६ होशे ७ योएल ८ आमोस ९ ओबध्याह १० योना ११ मीका १२ नहूम १३ हबक्कूक १४ सपन्याह १५ हाग्गै १६ जकर्याह १७ मलाकी।"
५+९+८+१७ =३९ पुस्तकें।
"यह 39 किताबे प्रोटेस्टेंट बाइबिल के पूर्वार्ध में हैं, तथा कैथोलिक बाइबिल के पूर्वार्ध में 46, जबकि ऑर्थोडॉक्स बाइबिल के पूर्वार्ध में 49 किताबें शामिल हैं। ये चार भागों में विभाजित हैं
ईसाइयों के ऋषि उपर्युक्त के अलावा यीशु। और ईसाइयों के ग्रन्थ उपर्युक्त के अलावा एन्जिल (बायबल नया नियम) यह ग्रीक (युनानी) भाषा में लिखित है।"

बुधवार, 10 अप्रैल 2024

जातियाँ

आर्य जाति/ प्रजाति नही होती। वेदों में आर्य श्रेष्ठ, सदाचारी व्यक्ति को कहते हैं। किसी जाति विशेष को नहीं।
वास्तविक जातियाँ 

देव ---केस्पियन सागर क्षेत्र ताजिकिस्तान और चीन के शिंजियांग स्वायत्तशासी क्षेत्र उइग़ुर ख़ाङ्नत आदि के सीमांत प्रदेश, ,ईरानी बलोचिस्तान के कजान ख़ानत या ख़ाङ्नत, और खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्रों,अफगानिस्तान का पाकिस्तान से लगा भाग नूरीस्तान ,पाकिस्तानी बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा,और भारत के पश्चिमोत्तर अर्थात आधूनिक नूरीस्तान के निवासी थे। 
संक्षेप में ताजिकिस्तान (कम्बोज), किर्गिज़स्तान, कजाकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, कश्मीर, लद्दाख और तिब्बत के तरीम बेसिन और टकला मकान क्षेत्र में शिंजियांग उइगुर प्रान्त के निवासी थे 
मानव --- (स्वायम्भूव मनु- शतरुपा की सन्तान  मनुर्भरत), दृविड़ / दृविण (धर्म वसु की पत्नी दृविण की सन्तान), गन्धर्व (बलूच, अफगान), किन्नर (हिमाचल, उत्तराखण्ड के किन्नौर वासी), यक्ष (तिब्बत और पश्चिम चीन वासी), प्रमथ-मङ्गोल,  सूर (सीरिया वासी) असुर (इराक केअसीरिया) वासी, देत्य अरब प्रायद्वीप के निवासी, दानव (डेन्युब नदी तट वासी युरोपीय) और राक्षस (अफ्रीकी) जातियाँ थी।

ब्राह्मण -- प्रजापति ब्रह्मा-सरस्वती की मानस सन्तान (1) दक्ष (प्रथम)- प्रसुति, (2) मरीची-सम्भूति, (3) भृगु-ख्याति, (4) अङ्गिरा-स्मृति, (5) वशिष्ट-ऊर्ज्जा, (6) अत्रि-अनसुया, (7) पुलह-क्षमा, (8) पुलस्य-प्रीति, (9) कृतु-सन्तति नौ ब्रह्मा कहलाते हैं। 
प्रजोत्पत्ति करने के कारण ये सभी प्रजापति के तुल्य माने जाते हैं। सबसे प्राचीन ऋषि होने से इन्हें अगले मन्वन्तर में वैदिक ज्ञान अन्तरित करने का कार्यभार सोपा जाता है। इसलिए अलग-अलग मन्वन्तर में इनमें से कुछ ऋषि सप्तर्षि कहलाते हैं।
ये कुरुक्षेत्र (हरियाणा) के आसपास के ऋषिदेश (मालवा प्रांत, गोड़ देश) के निवासी थे।

मानव क्षत्रिय --  गेहूँए रङ्ग वाले स्वायम्भूव मनु की सन्तान - स्वायम्भूव मनु - प्रियव्रत - आग्नीध्र - नाभि/ अजनाभ - ऋषभदेव - भरत चक्रवर्ती की सन्तान मनुर्भरत को हम आर्य समझते हैं ।

चान्द्र --  जबकि ब्रहस्पति की पत्नी तारा और चन्द्रमा के पुत्र बुध, वैवस्वत मनु की पुत्री इला और बुध के पुत्र एल पुरुरवा (एल, ईलाही/ अल्लाह), उर (इराक) की निवासी, तिब्बत-कश्मीर- लद्दाख, पूर्वी तुर्किस्तान (उइगुर) प्रान्त स्थित स्वर्ग के राजा इन्द्र की नर्तकी उर्वशी और एल पुरुरवा का पुत्र दक्षिण-पूर्वी टर्की (तुर्किये) के युफ्रेटिस घाँटि में ईलाझी शहर में जन्मे आयु (आदम) के वंशज औराजा खत्तुनस की प्रजा खत्ती (हित्ती) / खाती/ खत्री अर्थात चन्द्रवंशियों को मेक्समूलर ने आर्य माना।
पुरानी/ पश्चिमी आरामी भाषा में रचित तनख (बायबल ओल्ड टेस्टामेंट की पहली पुस्तक उत्पत्ति) के अनुसार यहोवा (एल पुरुरवा) ने आदम (आयु) को दक्षिण पूर्व टर्की के युफ्रेटिस घाँटि में ईलाझी शहर में अदन वाटिका में अकेले ही पाला था।
ये चन्द्रवंशी हैं, अनु, दुह, *यदु* , *पुरू* और तुर्वसु जिनने तृत्सु वंशीय मनुर्भरत - दिवोदास और उनके पुत्र सुदास पर आक्रमण किया था जिसे ऋग्वेद में दशराज युद्ध कहा गया है।
परिणाम स्वरूप पुरू वंशीय प्रयागराज में बसाये गए। तुर्वसु के वंशजों को आदित्यों के क्षेत्र तुर्किस्तान में बसाया, यदु वंशीय पूर्वी भारत में अङ्ग देश में बसे। ये चन्द्रवंशी गोरे और डेन्युब नदी किनारे बसे दानव (युरोपीयन) से मिलते-जुलते थे, इसलिए इन्हें आर्य कहा।

 असुर -- इराक के असीरिया प्रान्त के प्राणवान, बलिष्ट असुर  असीरिया (इराक), मेसापोटामिया, बेबीलोन, सऊदी अरब  में बसे। ये रुद्र भक्त शिवाई  (साबई), बालदेव (नन्दी) उपासक असुर हुए। इनने शुक्राचार्य को अपना गुरु माना। शुक्राचार्य के पुत्र त्वष्टा ने युनान के पास  क्रीट में शाक्तपन्थ की स्थापना की।
परशु--  असुरों के आचार्य जरथ्रुस्त्र ने ईरान के मीड और मगों को आसुरी मत में बदला। ये अग्नि को प्रतिक मानकर असुरमहत् (अहुरमज्द) के उपासक हो गये।

दैत्य -- महर्षि कश्यप और दिति के पुत्र दैत्यगण मिश्र और  अम्मानके पास जोर्डन की जेरिको सभ्यता, इज्राइल, स्वेज और लेबनान (फोनिशिया सभ्यता) में बसे। पश्चिम एशिया दैत्यों का क्षेत्र था ।
दक्षिण भारत पर कब्जा जमाये राजा बलि को वामन / विष्णु द्वारा केरल (भारत)  से निकालने पर  राजा बलि भी भारत के दास, दस्यु ,चोल, चालुक्यों को लेकर पहले लेबनान (फोनिशिया) ही गया था। फिर लेबनान से निकलकर  दक्षिण अमेरिका महाद्वीप के बोलिविया बसा। 

दानव ---महर्षि कश्यप और दनु के पुत्र यानि  दनु (डेन्यूब नदी) के वंशज दानव  युगोस्लाविया  की लेपेन्स्की वीर सभ्यता (Lepennki Vir )  और प्राग(चेकोस्लोवाकिया) से जर्मनी  तक और युनान रोम की युरोपीय सभ्यता दानवों की है। सेल्ट या केल्ट लोग दानव थे ये इंग्लेण्ड में तप करते थे।
राक्षस -- राक्षस अफ्रीका, आस्ट्रेलिया और अमेरिका महाद्वीप के निवासी थे जिन्हें वर्तमान में निग्रो कहते हैं। क्योंकि ये रक्षा का कार्य करते थे। विशेष कर अरब और युरोप में लोग इन्हें अङ्गरक्षक नियुक्त करते थे। रावण के नाना और उनके भाई मालि - सुमाली अफ्रीकी निग्रो थे। जबकि श्वसुर मयासुर मय संस्कृति का रेड इण्डियन था।
इसमें मानवों को छोड़कर अधिकांश विदेशी जातियाँ शिव परिवार की मूर्तियों को पूजने वाले थे।
रावण ने भी लक्षद्वीप स्थित रावण की लङ्का में उसकी कुलदेवी निकम्भला के बहुत से मन्दिर बनवा कर निकुम्भला की मूर्तियाँ स्थापित कर पूजा करता था और तान्त्रिक हवन करता था।
वाल्मीकी रामायण युद्ध काण्ड के अनुसार हनुमान जी ने निकुम्भला के कई मन्दिर और मुर्तियाँ तोड़ी।
लक्ष्मण जी ने मेघनाद का तान्त्रिक हवन ध्वन्स कर रोक दिया।
तो क्या रावण और मेघनाद सदाचारी वैदिक (धार्मिक) हो गये तथा हनुमान जी और लक्ष्मण नास्तिक, अनीश्वरवादी और दुराचारी अधर्मी हो गये?
पौराणिकों नें इसी भ्रम को फैला कर रावण और बली की प्रशंसा में भरपूर गीत गाए हैं। लेकिन वैदिक लोगों को सत्य समझता है। इसलिए वे इन दैत्य - राक्षसों को अधर्मी ही मानते हैं।

हमने ब्राह्म धर्म -> ब्राह्मण धर्म -> प्राजापत्य धर्म -> आर्ष धर्म -> मानव धर्म छोड़ कर हमारे धर्म का नाम सनातन धर्म रखा। तुर्क, अफगान, ईरान, इराक और कजाक मुस्लिम और युरोपीय ईसाइयों के चक्कर में हम हिन्दू और इण्डियन बन बैठे। और दासत्व की इस उपाधि पर गर्व करने लगे।

मंगलवार, 9 अप्रैल 2024

दासता से बन्धा हिन्दू

वैसे तो भारत भूमि पर असुरों, दैत्यों, दानवों, राक्षसों तक के आक्रमण हुए लेकिन उनका स्थाई प्रभाव कम ही रहा।
लेकिन उससे सीमाएँ कमजोर होती रही और एक समय स्थाई प्रभावकारी दशराज युद्ध का सामना मनुर्भरतों के तृत्सु वंश के राजा दिवोदास और उनके पुत्र सुदास को करना पड़ा। जिसमें समझोते में अनु, दृह्यु, यदु, पुरु, तुर्वसु वंशियों को भारतभूमि में प्रवेश और निवास तथा अपने शासन स्थापित करने की अनुमति देना पड़ी। परिणाम स्वरूप बाद में नाग और आग्नेय भी आ गये और उनने भी भारत भूमि पर कब्जा करना शुरू कर दिया।
ऋषियों की सन्तान ब्राह्मण, स्वायम्भूव मनु की सन्तान मनुर्भरत क्षत्रिय और उनके निकट सम्बन्धी सूर्यवंशी दबते गये और ये आक्रान्ता पुरु और यदु वंशीय और नाग वंशीय विकास करते गये। महाभारत युद्ध ने तो सबकुछ बदल दिया। वैदिक ब्राह्मण धर्म सनातन धर्म हो गया। जैन और बौद्ध पन्थ जन्मे, और भारत में सनातन वैदिक धर्म संस्कृति समाप्त प्राय होकर नवीन स्मार्त और पौराणिक संस्कृति जन्मी।
शक हूण आदि तुर्क, अफगान, ईरानी, कजाक आक्रमणकारियों नें धार्मिक और सांस्कृतिक हमला भी बोला। 
सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन ज्योतिष और कालगणना में आया। वसन्त सम्पात से प्रारम्भ होने वाला नव युगाब्द संवत्सर, उत्तरायण, वसन्त ऋतु और मधु मास के स्थान पर पहले निरयन मेष संक्रान्ति से प्रारम्भ होने वाले निरयन सौर युधिष्ठिर संवत और विक्रम संवत चले। उत्तरायण वसन्त सम्पात/ सायन मेष संक्रान्ति के स्थान पर सायन मकर संक्रान्ति से प्रारम्भ होने लगा। वसन्त ऋतु वसन्त सम्पात/सायन मेष संक्रान्ति के स्थान पर सायन मीन संक्रान्ति से प्रारम्भ होने लगी। मधु मास भी वसन्त सम्पात/सायन मेष संक्रान्ति के स्थान पर सायन मीन संक्रान्ति से प्रारम्भ होने लगा। और उसके स्थान पर मेष, वृषभादि निरयन मास प्रचलित होगये। आज भी दक्षिण भारत में चलते हैं।
कुषाण आक्रमण ने तो तुर्किस्तान में प्रचलित सायन सौर 
संक्रान्ति आधारित चान्द्र वर्ष के भारतीय संस्करण निरयन सौर संक्रान्ति आधारित चान्द्र वर्ष शकाब्द प्रचलित कर दिया। अब वैदिक सायन सौर मधु- माधव मास और गतांश के स्थान पर चैत्र - वैशाख आदि चान्द्र-सौर मास और तिथियों का महत्व हो गया। सौर मास और गतांश विस्मृत हो गये।
केवल ग्रहों के उच्चांश और पञ्च बाण में ही सिमट गये।
दशाह के स्थान पर सप्ताह चल गया।

लेकिन तुर्क, अफगान, ईरानी, कजाक और ईराकी मुस्लिम आक्रमणों ने भारत पर प्रथम बार एकदम विपरीत मानसिकता, पूर्णतः विपरीत विचारों वाले धार्मिक- सांस्कृतिक हमले हुए। जिसने यहाँ का आत्मविश्वास डिगा दिया। स्वाभिमान नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। हम मानसिक दास होगये। हमने स्वयम् को हिन्दू अर्थात दास मान लिया। फारसी भाषा प्रधान हो गई। संस्कृत केवल शास्त्रियों तक सीमित हो गई। सलवार कुर्ता प्रचलित हो गये। विवाह में श्वेत और पीत (पीले) वस्त्रों के स्थान पर निषिद्ध अशुभ माने लाल कपड़े पहने जाने लगे। भूत-प्रेत की नवीन अवधारणा आ गई । भूत-प्रेत लगने और तन्त्र - मन्त्र से उतारने वाले जादूगर जासूस पीरों फकीरों का धन्धा चल निकला।
रही बची-खुची कसर युरोपीय आक्रमणकारियों ने पूर्ण करदी।
अब भारत में भारतीयता ही नहीं बची। हम थोड़े- थोड़े अरबी और काले अंग्रेज हो गये। हमारा अपना कुछ नहीं बचा । सनातन वैदिक धर्म की जगह हिन्दू धर्म बन गया। न त्रिकाल संध्या, न पञ्चमहायज्ञ, न गौ सेवा बस सुबह शाम प्रार्थना करलो कर्तव्य पूर्ण।न संस्कार बचे न संस्कृति बची।
 गुरुकुल स्कूल-कॉलेज में बदल गये। संस्कृत की जगह हिन्दी भाषा आ गई। वैदिक काल गणना , संवत्सर की जगह ग्रेगोरी केलेण्डर और रात बारह बजे बदलने वाले डेट एण्ड डे आगये।, न भाव, न श्रद्धा, न वेशभूषा न रहन सहन, न संयुक्त परिवार न भोजन, न चिकित्सा,
प्राकृतिक चिकित्सा की जगह फिजियोथेरेपी, आयुर्वेद की जगह एलोपैथी, चिकित्सालय की जगह हॉस्पिटल हो गये।न उद्योग-धन्धे, न कारोबार- व्यापार- व्यवसाय- वाणिज्य, न इतिहास कुछ भी तो अपना नहीं बचा।