शुक्रवार, 16 सितंबर 2022

ऋतु का सम्बन्ध केवल सायन सौर संक्रान्तियों से ही नही अपितु भौगोलिक अक्षांशो से भी से है।

ऋतु का सम्बन्ध केवल सायन सौर संक्रान्तियों से ही नही अपितु भौगोलिक अक्षांशो से भी है। अर्थात देश-काल दोनों से है। क्योंकि समय की अवधारणा ही देश और काल/ दिक्काल से ही है।
सभी जानते हैं कि,
भूमध्य रेखा पर शिशिर ऋतु (ठण्ड) कभी नही होती।
ध्रुवों पर ग्रीष्म ऋतु (गर्मी) नही होती।
वर्षा ऋतु केवल मानसून क्षेत्रों में ही होती है। वह भी सब स्थानों में एक साथ नही अपितु अलग - अलग मानसून क्षेत्र में अलग - अलग समय होती है।
उत्तरी गोलार्ध और दक्षिणी गोलार्ध में ऋतुएँ परस्पर विपरीत होती है। पश्चिम यूरोप में वसन्त ऋतु और दक्षिण भारत में वसन्त ऋतु का समय भिन्न भिन्न होता है।
वैदिक साहित्य ब्राह्मण ग्रन्थों, सुत्र ग्रन्थो में जो ऋतु चक्र बतलाया है वह आर्यावर्त के अनुकूल है। आर्यावर्त पञ्जाब - हरियाणा से कश्मीर वाले क्षेत्र कहलाता है इसके लिए यह ऋतु चक्र बिल्कुल सटीक है। उसे यदि कर्क रेखीय क्षेत्र और कर्क रेखा से  दक्षिणी अक्षांशो पर/ दक्षिण भारत में देखें तो अनुचित होगा। वहाँ बिल्कुल भिन्न अवधि रहेगी।
प. बाल गंगाधर तिलक, प. व्यंकटेश बापूजी केतकर, प.शंकर बालकृष्ण दीक्षित,पं. दीनानाथ शास्त्री चुलेट आदि भारत के कई वैदिक विद्वानों के अनुसार आर्यावर्त में वैदिक वसन्त ऋतु विषुव सम्पात / सायन मेष संक्रान्ति/ (२१ मार्च) से आरम्भ होती है और शरद ऋतु शरद सम्पात/ सायन तुला संक्रान्ति/ (२३ सितम्बर) से आरम्भ होती है।
जबकि पौराणिक काल में कर्क रेखा पर स्थित अवन्तिकापुरी/ उज्जैन को भारत का केन्द्र मानकर वसन्त ऋतु आरम्भ सायन मीन संक्रान्ति सायन मीन संक्रान्ति/ (१८ फरवरी) से होना बतलाया है और शरद ऋतु आरम्भ सायन कन्या संक्रान्ति / (२३ अगस्त) से होना बतलाया है।  महाभारत के पश्चात पुष्यमित्र शुंग से राजा भोज तक के पौराणिक काल  में रचित गणित ज्योतिष के सिद्धान्त ग्रन्थो में भी उज्जैन को केन्द्र मानकर तदनुसार गणना की गई। 
अतः दोनों ही पक्ष अपने अपने स्थान पर पूर्णतः सत्य हैं। इसमें किसी का खण्डन और किसी का समर्थन नही किया जा सकता।

इसी आधार पर वैदिक मधु- माधव मास आरम्भ की संक्रान्तियों में भी मतभेद पड़ गया। प्रथम पक्ष वसन्त सम्पात/ सायन मेष संक्रान्ति (२१ मार्च) से मधु मास आरम्भ मानता हैं। क्योंकि मधु- माधव मास में वसन्त ऋतु होती है। जबकि द्वितीय पक्ष सायन मीन संक्रान्ति (१८ फरवरी) से मधुमास आरम्भ मानता है और वसन्त सम्पात/ सायन मेष संक्रान्ति (२१ मार्च) को मधुमास समाप्त होना मानता है।
प्रथम पक्ष का तर्क है कि, जैसे पूर्णिमान्त मास पर आपत्ति उठाई जाती है कि, आधा चैत्र मास व्यतीत होने पर मध्य चैत्र मास संवत्सर आरम्भ बतलाना अनुचित लगता है वैसे ही वसन्त ऋतु के मध्य में संवत्सर आरम्भ में करना भी अनुचित है।
इसी न्याय के अनुसार वे वसन्त सम्पात से शरद सम्पात तक/ सायन मेष संक्रान्ति से सायन तुला संक्रान्ति (२१ मार्च से २३ सितम्बर तक) उत्तरायण मानते हैं। जिस अवधि में दिन बड़े और रात छोटी होती है। और शरद सम्पात से वसन्त सम्पात तक सायन तुला संक्रान्ति से सायन मेष संक्रान्ति तक/(२३ सितम्बर से २१ मार्च तक) दक्षिणायन मानते हैं।
इसके पक्ष में भाषा शास्त्रीय प्रमाण देते हैं उत्तर अयन यानी सूर्य की उत्तर में स्थिति और उत्तर में गति होना है। जबकि, 
द्वितीय पक्ष पौराणिक और सिद्धान्त ज्योतिष उत्तर की ओर गति मान कर उत्तर परम क्रान्ति / सायन मकर संक्रान्ति (२२ दिसम्बर) से दक्षिण परम क्रान्ति/ सायन कर्क संक्रान्ति (२२ जून) है तक उत्तरायण मानता है। प. दीनानाथ शास्त्री चुलेट इस अवधि को उत्तर तोयन प्रमाणित करते हैं। और दक्षिण परम क्रान्ति से उत्तर परम क्रान्ति तक अर्थात सायन कर्क संक्रान्ति से सायन मकर संक्रान्ति तक (२२ जून से २२ दिसम्बर तक) की अवधि को दक्षिण तोयन कहते हैं। जिसे पौराणिक और सिद्धान्त ज्योतिष दक्षिणायन कहते हैं।
 प्रथम पक्ष का तर्क यही है कि, उत्तरायण के मध्य से संवत्सर आरम्भ अनुचित है। आधा उत्तरायण मे संवत्सर में आरम्भ मानना उसी प्रकार अनुचित है जैसे मध्य चैत्र मास में संवत्सरारम्भ अनुचित है।

धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र - वेराजदेवों, ऋषियों और मानवों का उत्पत्ति स्थल

हरियाणा का  धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र  (थानेसर जिला) वाला क्षेत्र प्राचीन ऋषि देश कहलाता है ।क्योंकि, प्रजापति ब्रह्मा नें एवम् १अर्धनारीश्वर महारुद्र २ सनक,  ३ सनन्दन, ४ सनत्कुमार, ५ सनातन, ६ नारद, ७ इस क्षेत्र के राजा धर्म, ८ अग्नि - स्वाहा की जोड़ी, ९ पितरः (अर्यमा) - स्वधा की जोड़ी, के अलावा तीन प्रजापति -  १० दक्ष प्रजापति (प्रथम) - प्रसुति की जोड़ी, ११ रुचि प्रजापति - आकुति की जोड़ी, १२ कर्दम प्रजापति -  देवहूति की जोड़ी उत्पन्न किए। इनके अलावा ब्रह्मर्षि गण उत्पन्न किए जिनका विवाह दक्ष- प्रसूति की पुत्रियों से हुआ और जिनकी सन्तान ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण हुए) --  १३ महर्षि भृगु - ख्याति  (जो मैरे आदि पूर्वज हैं) तथा १४ मरिची - सम्भूति, १५ अङ्गिरा - स्मृति, १६ वशिष्ट-ऊर्ज्जा, १७ अत्रि - अनसुया, १८ पुलह - क्षमा, १९ पुलस्य - प्रीति, २० कृतु - सन्तति आदि ऋषियों तथा २१ स्वायम्भू मनु - शतरुपा की जोड़ी को कुरुक्षेत्र में ही उत्पन्न किया था । 
इसे गोड़ देश भी कहते हैं। पञ्जाब - हरियाणा का मालव प्रान्त भी इससे लगा हुआ है। और कुछ क्षेत्र तो कॉमन ही है।
विक्रमादित्य के दादा जी महाराज नबोवाहन जो सोनकच्छ के निकट गन्धर्वपुरी में आकर बसे थे, उनके पुत्र गन्धर्वसेन ने गन्धर्वपुरी को राजधानी बनाया। कहा जाता है कि, चूँकि,नबोवाहन पञ्जाब हरियाणा के मालवा प्रांत के राजा थे इसलिए उसकी स्मृति में मालवा के पठार का नाम मालवा रखा गया।
आद्यगोड़, श्रीगोड़, गुजरगोड़ आदि पञ्चगोड़ ब्राह्मण यहीँ उत्पन्न हुए थे। हमारे पूर्वज इस गोड़ देश/ ऋषि देश से श्रीनगर में बस गए इसलिए श्रीगोड़़ कहलाए। औरंगजेब के अत्याचारों से त्रस्त होकर  मालवा आ गये तो मालवी श्रीगोड़़ कहलाये।
मैरे पूर्वजों की भूमि श्रीनगर के निकट देवगढ़ नामक स्थान है, इसलिए हमारे पूर्वज देवगढ़ के व्यास कहलाते थे। वहाँ जानें की बचपन से इच्छा रही है। पर अभी तक जा नही पाया।

बुधवार, 14 सितंबर 2022

भागवत पुराण, वायु पुराण, शिव पुराण, मार्कण्डेय पुराण, दुर्गासप्तशती की रचना बोपदेव ने राजा भोज के समय की।

राजा भोज के समय तेलंगाना के तेलंग ब्राह्मण बोपदेव वेदव्यास जी के नाम पर तीन पुराण - 
१ भागवत पुराण -भाद्रपद शुक्ल पक्ष में अष्टमी से पूर्णिमा तक मन्दिरों में भागवत सप्ताह सत्र आयोजित कर कथा वाचक पौराणिक पण्डित एक सप्ताह में भागवत कथा सुनाते हैं। 
२ वायु पुराण जिसका एक भाग शिव पुराण कहलाता है जो शैव सम्प्रदाय का सबसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ माना जाता है। आजकल श्रावण मास में और अन्य माहों में भी शिवपुराण के आयोजन प्रचलित हो गये हैं।
३ मार्कण्डेय पुराण जिसमें जिसका पाठ नवरात्र में होता है। शाक्तपन्थ और तन्त्रशास्त्र का सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ दुर्गा सप्तशती है।
राजा भोज नें उनकी भाषा,शैली और काव्य की प्रशंसा करते हुए कहा कि, यदि आप स्वयम् के नाम पर इसे लिखते तो मैं पुरस्कार देता। लेकिन महर्षि वेदव्यास जी के नाम पर लिखकर आप जनता को धोखा दे रहे हैं इसलिए आप मृत्यु दण्ड के पात्र हैं।
चूंकि ब्राह्मण अवध्य होता है अतः मैं आपको देश निकाला का दण्ड देता हूँ।
इसी भागवत पुराण में सिद्धार्थ गोतम बुद्ध को कलियुग में जन्मा नौवा अवतार बतलाया है।
इसलिए आपके मित्र गलत होते हुए भी एकदम ग़लत नही है।
दोष उनका नही हमारे पोंगे पण्डितों का है जो इन मिथ्या ग्रन्थो का प्रचार कर रहे हैं।

भारत का नाम हिम वर्ष, नाभि वर्ष और भारत वर्ष तथा भरतखण्ड।

भारत का नामकरण - भारतवर्ष होना।

विष्णु पुराण द्वितीय अंश/ प्रथम अध्याय / श्लोक ११ से ३३ के अनुसार जम्बूद्वीप के दक्षिण के भाग हिम वर्ष को ही कालान्तर में राजाओं के नाम पर नाभि वर्ष या अजनाभ वर्ष तथा भारतवर्ष नाम रखा गया।
स्वायम्भुव मनु के पुत्र प्रियव्रत हुए। प्रियव्रत ने एक पुत्र आग्नीध्र को जम्बूद्वीप का शासनाधिकार दिया।
आग्नीध्र ने अपने एक पुत्र नाभि या अजनाभ को जम्बूद्वीप के दक्षिण का भाग हिम वर्ष पर शासनाधिकार दिया।
इसी हिमवर्ष का नाम अजनाभ / नाभि नें नाभिवर्ष या अजनाभ वर्ष रखा।
अजनाभ/ नाभि ने अपने पुत्र ऋषभदेव को नाभि वर्ष का शासनाधिकार दिया। 
ऋषभदेव अपने पुत्र भरत चक्रवर्ती को नाभि वर्ष का शासनाधिकार दिया। इन्ही भरत ने हिमवर्ष या नाभिवर्ष का नाम भारत वर्ष रखा।
चन्द्रवंशी दुष्यन्त के शकुन्तला से उत्पन्न पुत्र भरत द्वारा शासित क्षेत्र भरतखण्ड कहलाता है।

मंगलवार, 13 सितंबर 2022

समय की कमी - सत्य या आवश्यक कार्य केवल टालने की प्रवृत्ति?

समय की कमी - सत्य या आवश्यक कार्य केवल टालने की प्रवृत्ति?
प्रत्येक व्यक्ति दिनभर व्यर्थ की परिचर्चा में बहुत सा समय व्यतीत कर देता है। आदि से अन्त तक एक ही बात की बारम्बार पुनरावृत्ति करना, या अपनी त्रुटियों/गलतियों को स्वीकार कर सुधारनें का निश्चय करने के स्थान पर, नये नये आधारों और तर्कों से अपनी त्रुटियों/गलतियों को उचित ठहराया जानें का प्रयत्न करते रहने, और इसका प्रारुप तैयार करनें हेतु अत्यधिक सोच विचार करनें में हम अधिकतम समय, शक्ति और सामर्थ्य व्यर्थ करते हैं।
जबकि विश्व की विभूतियों नें इन विषयों पर न कभी विचार किया न चर्चा की। त्रुटि स्वीकारी, सुधारी या भविष्य के लिए सावधान रहे। जो भी कार्य किया पूर्ण जानकारी प्राप्त कर कुशलतापूर्वक एक ही प्रयास में पूर्ण किया। वे बारम्बार सुधारने की गुंजाइश नही रखते हैं। इसलिए सफल होते हैं।
जबकि,  वास्तविक कार्य के लिए हमारे पास प्राथमिकता ही नही रहती और हम व्यर्थ विचार और चर्चाओं में इतने मशगूल रहते हैं कि, उस वास्तविक कार्य करने के लिए समय ही नहीं रहता।
यदि वास्तव में समय की कमी होती तो बड़े-बड़े राजनेताओं, राष्ट्राध्यक्षों, प्रधानमन्त्री - मन्त्रियों, सचिवों, बड़ी-बड़ी कम्पनियों के स्वामियों, चेयरपर्सन, सी.ई.ओ. संचालकों को तो कभी समय ही नही मिलता। लेकिन वे अपने कार्य विस्तार करते रहते हैं। कभी - कभार ही उलझन अनुभव करते हैं। उनके विचार प्रायः सुलझे हुए ही होते हैं।
लेकिन इससे विपरीत समय की कमी उन्हीं को रहती है जो उक्त लोगों की तुलना में नगण्य कार्य करते हैं।  कोई बड़ा व्यवसायी किसी छोटे व्यवसायी को उसके उद्यम के साथ कुछ पूरक उद्यम का सुझाव देता है तो छोटा व्यवसायी उत्तर देता है, इस काम से ही फुर्सत नही मिल पाती, टेमीज नी है भिया। कहाँ से करूँ, एकला पड़ जाता हूँ। जबकि वह यह भूल जाता है कि, सामनें वाला भी अकेला ही बहुत से उद्यम संचालित करते हुए नित नई प्रगति कर रहा है।
घर में बैठे अधिकांश कार्मिकों, गृहणियों, अकुशल श्रमिकों यहाँ तक कि, भिखारियों को कहते सुना जा सकता है कि, समय ही नही मिलता, टेम नी है भिया।

रविवार, 11 सितंबर 2022

सनातन धर्मियों का उद्धारक।

अभी तक तो मोदी राज में भी फ्री राशन और मकान बनाने पर सब्सीडी और सनातन धर्मियों की  सर तन से जुदा होते हुए ही देखे हैं। बङ्गाल के भाजपाई अत्यन्त भयभीत हैं। केरल में संघ कार्यकर्ताओं की हत्या हो रही है।

जिस दिन जो दल और नेता वास्तव में आतंकवादी ट्रेनिंग सेण्टर मदरसे बन्द करवा देगा। अजान पर रोक लगा देगा, सनातन धर्मियों को उत्सवों पर निर्भय कर देगा, हज हाउस और वक्फबोर्ड की सम्पत्ति सरकारी सम्पत्ति घोषित कर देगा, समस्त पुराने एतिहासिक मन्दिरों को उनका गौरव पुनः दिला देगा, बहु विवाह बन्द कर जनसंख्या नियंत्रण कर देगा, विदेशियों को वापस भगा देगा, सनातन धर्मियों का मतान्तरण बन्द कर पहले मतांतरित हुए ईसाई -मुस्लिमों को स्वधर्म में ले आयेगा तभी निर्विवाद रूप से सभी सनातन धर्मी उसे अपना उद्धारक मान लेंगे।

केवल मीडिया सेल के प्रचार से कोई नही मानेगा। कर के दिखाना होगा।

फिर भी निम्नांकित भा.ज.पा. नेता मुझे पसन्द हैं।
१ नरेन्द्र दामोदरदास मोदी प्रधानमन्त्री
२ नितिन गडकरी भारत शासन के केबिनेट मन्त्री (सड़क परिवहन, राजमार्ग, जहाजरानी, जल संसाधन, नदी विकास, गङ्गा संरक्षण मन्त्रालय)।
३ हिमन्ता बिस्वा सरमा असम के मुख्यमन्त्री
४ बासवराज बोम्बई कर्नाटक के मुख्यमन्त्री
५ योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री

मंगलवार, 6 सितंबर 2022

मैरे सन्देश - मैरी मंशा

मैरे सन्देशों में कुछ बातों की आवृत्ति बारम्बार की जाती है। जो सन्देश प्रसारण की मेरी मंशा स्पष्ट करती है।
मेरे मत में ---
मुख्य धर्मशास्त्र ऋग्वेद, शुक्ल यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद , कृष्ण यजुर्वेद संहिता है।  इन वैदिक संहिताओं को ही परम प्रमाण मानता हूँ।
उक्त संहिताओं के ब्राह्मण ग्रन्थ, (ब्राह्मण ग्रन्थों के ही अन्तिम भाग आरण्यक और अन्तिम अध्याय उपनिषद सहित पूरे ब्राह्मण ग्रन्थों) को प्रमाण मानता हूँ। 
वैदिक संहिताओं और ब्राह्मण ग्रन्थों में जो आदेश, निर्देश, नीति, धर्म मीमान्सा, तत्व मीमान्सा, ज्ञान मीमान्सा दर्शन हैं वही मैरे लिए प्रथम एवम् अन्तिम सत्य है और मुख्य प्रमाण है।

उक्त वैदिक संहिताओं और ब्राह्मण,आरण्यक और उपनिषदों को समझने के लिए मुख्य आधार ग्रन्थ - उक्त चारों वेदों के उपवेद और वेदाङ्ग के ग्रन्थों तथा दर्शन शास्त्र के ग्रन्थ हैं। इन उपवेद, वेदाङ्ग और दर्शन के ग्रन्थों के आधार पर ही वेदों को समझा जा सकता है। यहीँ तक उल्लेखित ग्रन्थ ही वैदिक धर्मग्रन्थ हैं।
उपवेद - १ आयुर्वेद,२ धनुर्वेद, ३ गन्धर्व वेद ४ स्थापत्य वेद/ शिल्पवेद के ग्रन्थ उपवेद कहलाते हैं। तथा 
वेदाङ्ग -  १ कल्प, २ ज्योतिष, ३ शिक्षा, ४ व्याकरण, ५ निरुक्त, ६ छन्द के ग्रन्थ वेदाङ्ग कहलाते हैं । इसके अलावा जैमिनी की पूर्वमीमान्सा दर्शन और बादरायण की उत्तर मीमान्सा दर्शन और श्रीमद्भगवद्गीता के अध्ययन को भी वेदाङ्ग में ही गणना की जा सकती है।

1 कल्प - १ शुल्ब सुत्र २ श्रोत सुत्र ३ गृह्यसुत्र ४ धर्मसुत्र कल्प कहलाते हैं।
(धर्मसुत्रों के सम्पादित ग्रन्थ ही स्मृति कहलाते हैं।)
ब्राह्मण ग्रन्थों की पूर्व मीमान्सा तथा आरण्यकों और उपनिषदों  की उत्तर मीमान्सा दर्शन तथा श्रीमद्भगवद्गीत भी कल्प के ही भाग माने जा सकते हैं। अतः ये भी अत्यन्त महत्वपूर्ण शास्त्र हैं।
2 ज्योतिष - सिद्धान्त ज्योतिष - १ ब्रह्माण्ड विज्ञान २ गणित (एस्ट्रोनॉमी Astronomy), ३ खगोल और ४ संहिता (मौसम विज्ञान, वास्तु शास्त्र, मुहुर्त,  सामुद्रिक शास्त्र, शकुन आदि इसी के भाग हैं)
3 भाषा सम्बन्धी वेदाङ्ग ---
१ शिक्षा / उच्चारण शास्त्र (फोनेटिक्स Phonetics), 
२ निरुक्त और  निघण्टु  - भाषा शास्त्र/ भाषाविज्ञान - शब्द व्युत्पत्ति और शब्दकोश , 
३ व्याकरण, 
४ छन्द/ काव्य शास्त्र, पिङ्गल शास्त्र।

यहाँ तक उल्लेखित ग्रन्थ वैदिक धर्म शास्त्र कहलाते हैं।

4 दर्शन शास्त्र - 
१जेमिनी की पूर्व मीमान्सा, 
२ बादरायण की उत्तर मीमान्सा, 
३ श्रीमद्भगवद्गीता कर्मयोग शास्त्र, 
(उक्त तीनों मीमान्सा दर्शन भी वैदिक धर्म ग्रन्थ ही हैं।)
४ कपिल का सांख्य शास्त्र और ईश्वर कृष्ण आदि की सांख्य कारिकाएँ, 
५ पतञ्जली का योग दर्शन, 
६ गोतम का न्याय दर्शन, 
७ कणाद का वेशेषिक दर्शन।

४ स्मृतियाँ - धर्मसुत्रों के आधार पर रचित बीस स्मृतियाँ। ये तुलनात्मक अर्वाचीन ग्रन्थ हैं। इसमें मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति तथा ब्रहस्पति स्मृति अधिक मान्य हैं।
इतिहास के ग्रन्थ ---
५ वाल्मीकि रामायण।
६ वेदव्यास रचित महाभारत।
७ गर्ग संहिता।(श्रीकृष्ण चरित्र।)
(उक्त ऐतिहासिक ग्रन्थों में उल्लेखित तथ्य भी इतिहास की दृष्टि से प्रमाण की कोटि में आते हैं।)

८ अठारह पुराण, अठारह उप पुराण।
(इनमें विष्णु पुराण वेदव्यास जी के पिता महर्षि पाराशर की रचना मानी जाती है और शेष महर्षि वेदव्यास जी की रचना। जबकि वास्तविकता यह है कि, इतिहास - पुराण का उल्लेख तो वेदों में भी है। महर्षि दयानन्द ब्राह्मण ग्रन्थों को पुराण मानते थे। कुछ लोग (पारसी धर्मग्रन्थ जेन्दावेस्ता का मूल ग्रन्थ अवेस्ता जिसपर ज़रथ्रुष्ट ने व्याख्या की है उक्त मूल ग्रन्थ) अवेस्ता को अथर्ववेद का ब्राह्मण ग्रन्थ और कुछ पुराण मानते हैं क्योकि, जेन्दावेस्ता के साथ भी गाथाएँ जुड़ी है जैसे वैदिक संहिताओं और ब्राह्मण ग्रन्थों के साथ गाथाएँ जुड़ी है। 
वर्तमान उपलब्ध पुराण पुष्यमित्र शुङ्ग से राजा भोज के शासनकाल में रचे गए ग्रन्थ हैं। 
वेदव्यास जी के नाम से वायु पुराण जिसका एक भाग शिवपुराण है, भागवत पुराण और मार्कण्डेय पुराण की रचना कर तेलंङ्ग ब्राह्मण बोपदेव ने धार के राजा भोज (प्रथम) के समक्ष प्रस्तुत किये। राजाभोज नें ग्रन्थो की भाषा, शैली, काव्य की साहित्यिक दृष्टि से प्रशंसा करते हुए कहा कि, यदि इन ग्रन्थों को आपने अपने ही नाम पर लिखा होता तो मैं आपको इनाम देता। लेकिन प्राचीन ऋषि के नाम का दुरुपयोग कर आप मृत्यु दण्ड के भागी बने हैं। लेकिन ब्राह्मण अवध्य होता है, इसलिए आपको देश निकाला का दण्ड देता हूँ।
इसलिए पुराण प्रमाण की कोटि में नही आते हैं। पुराणों के केवल वेद सम्मत भाग ही ग्राह्य हैं।

९ निबन्ध ग्रन्थ - शुल्ब सुत्रों, श्रोत सुत्रों, गृह्यसुत्रों,  धर्मसुत्रों,  स्मृतियों और पुराणों के आधार पर सम्पादित निबन्ध ग्रन्थों में उक्त शास्त्रों के  निर्णयों की मीमान्सा की गई है। इसलिए वर्तमान में कर्मकाण्ड में स्व. शास्त्री दुर्गाशंकर उमाशंकर शर्मा द्वारा रचित तथा उनके पुत्र यज्ञदत्त उमाशंकर ठाकुर द्वारा परिवर्धित ब्रह्मनित्यकर्म समुच्चय तथा यज्ञ एवम् वेदी निर्माण सम्बन्धित ग्रन्थों की मान्यता है । धार्मिक निर्णयों में स्व. कमलाकर भट्ट रचित निर्णय सिन्धु तथा काशीनाथ उपाध्याय रचित धर्मसिंधु को पौराणिक जन प्रमाण के रूप में स्वीकार करते है। जबकि आर्यसमाज महर्षि दयानन्द सरस्वती रचित ग्रन्थों को आधारभूत प्रामाणिक ग्रन्थ मानताहै।
सुचना --- शास्तों के नाम जानने के लिए कृपया मेरा ब्लॉग ब्राह्म धर्म के वैदिक शास्त्र, ब्राह्मण धर्म के ब्राह्मणारण्यकोपनिषद, दर्शन, सनात धर्म के स्मार्त शास्त्र,रामायण, महाभारत,पुराणादि धर्मशास्त्र और आगम,तन्त्र,निबन्ध ग्रन्थ आदि हिन्दू धर्मशास्त्र पढ़नें का कष्ट करें।⤵️
http://jitendramandloi.blogspot.com/2021/07/blog-post.html 

१० क्रमांक १ से ३ तक वेद, ब्राह्मण, उपवेद, वेदाङ्ग, शास्त्र को श्रोत्रिय / वैदिक लोग मानते हैं। और १ से ४ तक वेद, ब्राह्मण, उपवेद, वेदाङ्ग, शास्त्र और स्मृतियों को स्मार्त जन निर्विवाद स्वीकारते हैं।
१ से ७ तक वेद, ब्राह्मण, उपवेद, वेदाङ्ग, शास्त्र, स्मृतियों , रामायण, महाभारत और पुराणों के वचनों को भी स्मार्त जन आदर देते हैं। लेकिन पूर्णतः पालन केवल पौराणिक ही करते हैं
अतः निबन्ध ग्रन्थों को भी स्मार्त स्वीकार्य मानते हैं।
११ लेकिन अलग-अलग मत, पन्थ, आम्नाय, सम्प्रदायों और मठों के अलग अलग आगम ग्रन्थ हैं। ये आगम ग्रन्थ तन्त्र कहलाते हैं जिन्हें उन मत, पन्थ, आम्नाय, सम्प्रदायों और मठों के अनुयाई ही मानते हैं। उनमें भी कई शाखाएँ हो गई है। उनके अपनी अलग अलग व्याख्या है। वैदिक एम् स्मार्त इन्हें स्वीकार नही करते हैं, मान्यता नही देते हैं।
मत, पन्थ, आम्नाय, सम्प्रदायों और मठों के आगम ग्रन्थों में कई वेद विरुद्ध वचन और मत उधृत किये हैं।मत, पन्थ, आम्नाय, सम्प्रदायों और मठों के अनुयाई इनको भी श्रद्धा पूर्वक स्वीकारते हैं। इसलिए मुझे इन आम्नायों के आगम ग्रन्थों में श्रद्धा नही है। 

१२ वैदिक/ श्रोत्रिय और स्मार्त जन पर्वकाल को महत्व देते हैं। अर्थात जिस व्रत, पर्व या उत्सव की जो ऋतु, जो मास, जो पक्ष, जो तिथि और जो समय शास्त्रों में बतलाये गये हैं जब इन चारों का योग होता है तभी व्रत रखा जाता है, पर्व माना जाता है और उत्सव मनाया जाता है।
इसलिए व्रत उसी निर्धारित तिथि में किया जाता है दुसरे दिन नही। जैसे एकादशी का व्रत एकादशी में ही करते हैं। द्वादशी में नही।  

१३ उत्सव भी उसी समय मनाया जाता है जब सम्बन्धित उत्सव का पर्वकाल हो। जैसे मध्यान्ह में चैत्र शुक्ल नवमी तिथि हो तभी राम नवमी मनाते हैं। सूर्योदय के समय चैत्र पूर्णिमा हो तभी हनुमान जयन्ती मनाते हैं। और सूर्यास्त के समय वैशाख शुक्ल चतुर्दशी तिथि हो तभी नृसिंह जयन्ती मनाते हैं। मध्य रात्रि में अमान्त श्रावण पूर्णिमान्त भाद्रपद कृष्ण अष्टमी होनें पर ही श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है। न उदिया तिथि को महत्व देते हैं न रोहिणी नक्षत्र पर चन्द्रमा होना आवश्यक मानते हैं।

१४ व्रत पूर्ण तभी माना जाता है जब व्रत की अगली तिथि में ही भोजन कर व्रत का पारण होना आवश्यक है। जैसे एकादशी का पारण द्वादशी तिथि में होना आवश्यक है। लेकिन शंखचक्रांकित महाभागवत, पौराणिक वैष्णव द्वादशी तिथि में भी एकादशी का व्रत करते हैं।

१५ इसी प्रकार ऋतुओं का भी महत्व है। रामनवमी वसन्त ऋतु में और सायन मेष राशि के सूर्य में जन्मोत्सव मनाया जाना चाहिए। 
१५ लेकिन वर्तमान में सायन संक्रान्तियों की तुलना में निरयन सौर मासों का आरम्भ लगभग २४ - २५ दिन बाद होता है। इस कारण ऋतु और सायन सौर मास का पालन नही हो रहा है।
१६ सभी पञ्चाङ्ग शोधन समितियों में सायन संक्रान्तियों पर आधारित सौर मास के गतांश या गते के आधार पर व्रत, पर्व और उत्सव मनाने या सायन संक्रान्तियों पर आधारित चान्द्र मास की तिथियों से  व्रत, पर्व और उत्सव मनाने का अभिमत दिया गया। दो- दो शंकराचार्य भी स्वीकार कर चुके हैं। 
१७ लेकिन पञ्चाङ्गकारों का स्वार्थ और उनकी जीद के कारण यह सम्भव नही हो पाया है। इससे सनातन धर्मियों का धर्मभ्रष्ट हो रहा है।
१८ आम्नायों और आगम ग्रन्थो के आधार पर सम्प्रदायों और मठों / मन्दिरों में गलत तिथियों में व्रत, पर्व और उत्सव मनाए जाते हैं। इससे नास्तिकता फैल रही है। 
१९ इसलिए भारत शासन को पहल कर व्रत, पर्व और उत्सवों में एकरूपता लानें के लिए धर्माचार्यों, कर्मकाण्ड करवाने वालों और पञ्चाङ्ग कर्ताओं को वैदिक धर्मशास्त्र, शुल्बसुत्र, श्रोतसुत्र, ग्रह्यसुत्र, धर्मसुत्रों  और सिद्धान्त ज्योतिष  अर्थात गणित और खगोल (एस्ट्रोनॉमी) का गहन अध्ययन करना आवश्यक करना चाहिए। 
२० वर्णाश्रम धर्म के अनुसार जीवन यापन आवश्यक होना चाहिए।
२१ पञ्च महायज्ञ, पञ्चाग्नि सेवा और अष्टाङ्गयोग तथा वैदिक दर्शन का सबको ज्ञान कराया जाए। तथा दृढ़तापूर्वक पालन करवाया जाए। इसके लिए गुरुकुल पुनर्स्थापित किये जाए।
२२ सभी को तकनीकी शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण, और सैन्य शिक्षा आवश्यक हो। ताकि, प्रत्येक व्यक्ति में राष्ट्रीयता जागृत हो।
यही मेरा मन्तव्य है जिसके लिए मैं सन्देश प्रसारित करता रहता हूँ।