सोमवार, 15 नवंबर 2021

भारत को पुर्ण स्वतन्त्रता 26 जनवरी 1950 को मिली न कि, 2014 में

निर्विवादित रूप से वर्तमान के वामपन्थी (जिन्हें तथाकथित मार्क्सवादी कहा जाता है), वर्तमान में वे भारत विरोधी, भारतीय सनातन संस्कृति और  सनातन वैदिक धर्म के न केवल विरोधी अपितु शत्रु भी हैं यह माननें में मुझे किञ्चित मात्र संकोच नही है।
वहीँ स्वातन्त्र्य आन्दोलन में मुख्य पुरोधा अमर शहीद लाला लाजपतराय, चन्द्रशेखर आजाद, भगतसिंह,सुभाषचन्द्र बोस आदि सभी क्रान्तिकारी मार्क्सवादी थे। यह माननें में दक्षिणपन्थियों को संकोच करना गलत है।
क्रान्तिकारी दल का नाम ही हिन्दुस्तान सोसलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन था। जिसमें कट्टर आर्यसमाजी और शुद्धिकरण आन्दोलन में मुस्लिमों को पुनः वैदिक धर्म में लानें वाले रामप्रसाद बिस्मिल भी थे उन्हे दक्षिणपन्थी तो कतई नही माना जा सकता।
कार्लमार्क्स प्रथम गैरभारतीय विचारक थे जिनने आर्य आक्रमण थ्योरी और आर्य द्रविड़ थ्योरी का खण्डन कर भारत के मूल निवासी आर्यों को ही माना।जिसे बाद में अम्बेडकर ने भी सही सिद्ध किया।
अब आज के वामपन्थी और भीम-मीम समर्थक बहुजन समाज पार्टि वाले इससे विपरीत मत रखते हैं अतः न उन्हें मार्क्सवादी कहा जा सकता है न अम्बेडकर वादी कहा जा सकता है।
भारतीय स्वातन्त्र्य आन्दोलन में आज के दक्षिणपन्थियों का योगदान से इन्कार नही करता लेकिन उनका योगदान प्रतिशत नगण्य था।
दक्षिणपन्थियों की एक मुख्य संस्था के संस्थापक को ही क्रान्तिकारी सावरकर भी अंग्रेजों का एजेण्ट कहते थे, जिनने सुभाषचन्द्र बोस को सहयोग देनें को राजी नही होकर उन्हें अपना मार्ग बदलकर हिन्दू एकता के लिए कार्य करनें का उपदेश देकर पल्ला छुड़ालिया हो, जिनने क्रान्तिकारियों के लिए तन, मन धन किसी से भी कुछ भी सहयोग नही किया  उन्हें ब्रिटिश विरोधी स्वतन्त्रता आन्दोलन में सहयोगी बोलना सम्भव नही। लेकिन वे लोग सही बोल नही सकते तो बात घुमा रहे हैं।
इसलिए वे स्वतन्त्रता को भीख में मिली घोषित करके आत्मसन्तुष्टि कर रहे हैं।

कंगना उनके ये समर्थक 26 जनवरी 1950 से 2014 के बीच की तुलना नही करते।
15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 तक की स्थिति को ही 15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 के बजाय सीधे 2014 में मान लेते हैं। ब्रिटिश पार्लियामेंट द्वारा हमारे देश पर थोपा इण्डियन इण्डिपेण्डेण्ट एक्ट 1947 निरस्त करके 26 जनवरी 1950 का संविधान की अन्तिम धारा अनुच्छेद 395 भारत को पूर्ण स्वतन्त्र सम्प्रभुता सम्पन्न भारत घोषित करता है।
यहाँ कुछ ब्रिटिश भक्त लोग आपत्ति उठाते हैं कि, अन्तर्राष्ट्रीय कानून के अन्तर्गत इण्डियन इण्डिपेण्डेण्ट एक्ट 1947 निरस्त करने का अधिकार केवल ब्रिटिश पार्लियामेंट को ही है। भारतीय संसद निरस्त नही कर सकती। उसका उत्तर है कि,  इकहत्तर वर्ष पूर्ण हो चुके बहत्तर वर्ष पूर्ण होनें में मात्र दो ढाई माह शेष हैं , ब्रिटेन की सरकार ने अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय में आजतक यह आपत्ति नही उठाई। कृपया वे दास जन बतलायें कि, लिमिटेशन एक्ट में ऐसे कितने वर्ष तक का प्रावधान है कि, कोई आपत्ति न लेने पर भी उसका कब्जा बरकरार माना जायेगा। कनाड़ा पर तो ब्रिटेन ने तत्काल सैन्य कार्रवाई कर दी और विजय हाँसिल की। भारत पर क्यों नही की?
वे दासजन चाहते हैं कि, ब्रिटश पार्लियामेंट इण्डियन इण्डिपेण्डेण्ट एक्ट 1947 निरस्त कर देती तो उनकी यह बात प्रमाणित हो जाती की आजादी भीख में मिली। जबकि सच्चाई वे स्वयम जानते हैं कि, ब्रिटेन की सरकार  सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फौज तथा  भारतीय नौसेना में हुए विद्रोह जिसमें कामरेड डांगे का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा के चलते बिना दस लाख युरोपियन सेन्यबल के भारत पर नियन्त्रण नही रखा जा सकता ; इसी दबाव के चलते अंग्रेजों को भारत छोड़नें के लिए विवश होना पड़ा। और इसी कारण ब्रिटिश शासन-प्रशासन अंग्रेजों के भारत छोड़नें की विवशता में गान्धी कांग्रेस के कार्यक्रमों को महत्वपूर्ण नही मानती।
भारत को आज भी ब्रिटेन का गुलाम घोषित करने वाले ऐसे बेतुके देशद्रोही बयान जारी करनें वाले दासजन विदेशमन्त्री रहकर विदेशी मामलों के विशेषज्ञ मानेजाने वाले भू.पू. प्रधान मन्त्री अटल बिहारी वाजपेई और चाणक्य माने जाने वाले प्रधानमन्त्री नरेन्द्रभाई मोदी पर भी अविश्वास प्रकट कर रहे हैं।
इन्दिरा गान्धी ने बयालीसवें संविधान संशोधन जो 01 अप्रेल 1977 से लागू हुआ तबसे समाजवादी और सेकुलर राष्ट्र घोषित किया। ऐसा 2014 में संविधान में क्या नया हुआ जो पहले नही था। मतलब कुछ नही हुआ। आज भी वही और वैसा ही है जो 1977 में था। यह बात भी कुछ अंग्रेज भक्त दासजन स्वीकारते है।
विदेशनीति परिस्थितियों के अनुसार परिवर्नशील होती है। इसमें किसी भी एक पक्ष का सम्पूर्ण योगदान नही होता। तो विदेशनीति में हुए आंशिक परिवर्तन को स्वतन्त्रता घोषित करना स्वतन्त्रता के अर्थ को ही बदलने का प्रयास मात्र है।
यदि इसे मान्यता दी गई तो भविष्य में भी ऐसे परिवर्तनों पर स्वतन्त्रता प्राप्ति कहा जायेगा।
अतः भारत शासन का दायित्व है कि, वह स्पष्ट करे कि, पूर्ण स्वतन्त्रता 26 जनवरी 1950 को मिली। और उसके बाद सम्प्रभुता में कोई परिवर्तन नही हुआ और सम्पूर्ण सम्प्रभु होने के बाद सम्प्रभुता में कोई और विकास होना सम्भव ही नही है।

मंगलवार, 2 नवंबर 2021

हनुमान जयन्ती

हनुमान जयन्ती की वास्तविक तिथि के विषय में बहुत भ्रम है।

उत्तर भारतीय चैत्र पूर्णिमा को सूर्योदय के समय हनुमान जयन्ती मनाते है। इस दिन प्रायः चन्द्रमा चित्रा नक्षत्र पर रहता है।

उड़ीसा में निरयन मेष संक्रान्ति (वर्तमान में 13/14 अप्रेल) को मनाते हैं। इस दिन सूर्य केन्द्रीय ग्रहों में (मध्यम ग्रह) में भूमि चित्रा नक्षत्र पर रहती है।

अयोध्या के हनुमान गड़ी मन्दिर में अमान्त आश्विन पूर्णिमान्त कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी (काली चौदस/ रूप चौदस) को सूर्यास्त के समय मेष लग्न में हनुमान जयन्ती मनाते हैं। इस दिन भी प्रायः चन्द्रमा चित्रा नक्षत्र पर रहता है।
मतलब चित्रा तारे का हनुमान जन्म से घनिष्ठ सम्बन्ध है।
लेकिन;
कर्नाटक में मार्गशीर्ष शुक्ल त्रयोदशी को हनुमान व्रतम् मनाते हैं। ज्ञातव्य है कि, हनुमान जी का कार्यक्षेत्र कर्नाटक के हम्पी क्षेत्र में ही रहा। सम्भवतः कर्नाटक के हम्पी से 15 किलोमीटर दूर अनेगुड़ी (अञ्जनी) गाँव में स्थित अञ्जनाद्री पर्वत पर पर्वतीय किलेनुमा स्थान पर स्थित मन्दिर को हनुमानजी का जन्मस्थान मानते हैं। रा.स्व.से.संघ नें वहाँ हनुमान जन्मस्थली मन्दिर बनाने हेतु एक सौ बीस करोड़ रुपए का फण्ड तैयार कर रखा है।

तमिलनाडु में अमान्त मार्गशीर्ष अमावस्या* को हनुमथ जयन्ती पर्व मनाया जाता है।

*आन्ध्र* प्रदेश और *तेलङ्गाना* मे चैत्र पूर्णिमा से दीक्षा आरम्भ कर 41 से दिन पश्चात *अमान्त वैशाख पूर्णिमान्त ज्येष्ठ कृष्ण दशमी* को हनुमान जयन्ती मनाते हैं। और पर्व का समापन करते हैं। तो
ध्यातव्य है कि, तिरुमला तिरुपति देवस्थानम तिरुमला स्थित अञ्जनाद्री पर्वत पर स्थित अञ्जनी मन्दिर को हनुमान जन्मस्थली मानता है।

अस्तु;
हनुमानजी का जन्म के समय चित्रा नक्षत्र महत्वपूर्ण माना जा रहा है अतः जिस समय मध्यम ग्रह (सूर्य केन्द्रीय ग्रहों) में भूमि चित्रा नक्षत्र पर रहती है अर्थात निरयन मेष संक्रान्ति को हनुमान जी का जन्म दिन माना जा सकता है। या निरयन तुला संक्रान्ति को हनुमानजी का जन्म दिन मान सकते हैं जिस दिन सूर्य चित्रा तारे पर रहता है। काली चौदस/ रूप चौदस इसी समय पड़ती है।
या फिर चैत्र पूर्णिमा तो है ही, जिस दिन चन्द्रमा चित्रा नक्षत्र पर रहता है। या
निष्कर्ष ---
वसन्त सम्पात के समय सायन मेष संक्रान्ति (20/21 मार्च) को हनुमानजी का जन्म हुआ हो सकता है। और श्री रामचन्द्र जी का जन्म भी वसन्त सम्पात के समय   सायन मेष संक्रान्ति (20/21 मार्च) को हुआ था।  
जिसदिन सूर्य भूमध्य रेखा पर होनें से दिनरात बराबर होते हैं। उत्तरीध्रुव पर सूर्योदय होता है, दक्षिण ध्रुव पर सूर्यास्त होता है।

सूर्य क्रान्तिवृत्त में जिस तारे से आरम्भ होता है अगले वर्ष उस तारे से 50.3' पीछे (पश्चिम में)  आता है। इस अयन चलन के कारण 25778 वर्ष में सूर्य क्रान्तिवृत्त में पूरा 360° घूम जाता है। इससे निरयन मेष संक्रान्ति और सायन मेष संक्रान्तियों में लगभग 71 वर्ष में एक अंश का अन्तर होने से लगभग एक दिन का अन्तर पड़ जाता है। ग्रेगोरियन केलेण्डर सायन मान से चलता है अतः निरयन संक्रान्ति एक दिन बाद होती है। सन 285 ई. में 22 मार्च को वसन्त सम्पात  अर्थात् सायन मेष संक्रान्ति और निरयन मेष संक्रान्ति एक साथ पड़ी थी। जिसमें अब 24° अर्थात 24 दिन से अधिक का अन्तर पड़ गया। 
चूँकि, चैत्र वैशाखादि निरयन सौर संस्कृत चान्द्रमास भी निरयन संक्रान्तियों पर आधारित है अतः वर्तमान में सायन संक्रान्तियों की तुलना में 24 दिन का अन्तर पड़ता है। इसी अन्तर के परिणाम स्वरूप सायन मेष संक्रान्ति कभी चैत्र पूर्णिमा को तो कभी मार्गशीर्ष अमावस्या को पड़ती रही है। इस कारण हनुमान जयन्ती कि तिथियों में बहुत अन्तर देखनें को मिलता है।
हनुमान जी का जन्म यदि त्रेता युग समाप्त होने के मात्र सौ वर्ष पहले भी माना जाए तो;
 त्रेता के अन्तिम सौ वर्ष+ द्वापर युग के आठ लाख चौंसठ हजार वर्ष + वर्तमान कलियुग संवत 5125 वर्ष कुल मिलाकर आठ लाख उनहत्तर हजार दो सौ पच्चीस वर्ष (8,69,225 वर्ष) से अधिक समय पहले हनुमान जी का जन्म हुआ होगा।
फिर भी एक जन्मस्थान आन्ध्र प्रदेश का तिरुमला तिरुपति हो या कर्नाटक में हम्पी के निकट अनेगुड़ी (अञ्जनी) गाँव कोई एक स्थान और निरयन मेष संक्रान्ति (14 अप्रैल) या सायन मेष संक्रान्ति (21 मार्च)या चैत्र पूर्णिमा नियत किया जावे।

बुधवार, 13 अक्टूबर 2021

नवरात्र मे देव्याराधन-उपासना में किन किन देवियो के नामोल्लेख मिलते हैं?


देवियों के नामों सुची -- जिनकी पूजा नवरात्र में होती है।

वैदिक दृष्टि से सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति का निमित्तोपादान कारण परमात्मा ही है। परमात्मा ने अपने ॐ संकल्प से स्वयम् को प्रज्ञात्मा परब्रह्म स्वरूप में प्रकट किया। इसी प्रज्ञात्मा को अध्यात्मिक दृष्टि से परम दिव्य पुरुष और पराप्रकृति कहते हैं और परब्रह्म को विष्णु और माया के आधिदैविक स्वरूप में जानते हैं।

ये विष्णु माया ही प्रथम आदिदेवी हैं। अन्य सभी देवियाँ इन माया देवी के ही अंशभूत स्वरूप हैं। जो क्रमशः (पराप्रकृति) माया -> (प्रकृति) सावित्री-> (अपरा त्रिगुणात्मक प्रकृति) श्रीलक्ष्मी-> (धारयित्व) रचना (वाणी/ब्राह्मी)  -> (आभा) सरस्वती -> (विद्युत) शचि -> (वृति/ चेत) प्रभा -> (मेधा) देवी -> (अस्मिता) उमा -> (संकल्प) शतरूपा -> (स्वभाव) भारती -> (स्वाहा) मही, (वषट) सरस्वती, (स्वधा) ईळा -> तुषिताएँ, मरुताएँ, रौद्रियाँ,-> सिद्धियाँ, रचना और वैनायकी।

तन्त्रशास्त्र का सर्वस्वीकृत प्रामाणिक ग्रन्थ दुर्गा सप्तशती जो मार्कण्डेय पुराण से उद्धृत है।
दुर्गा सप्तशती के अनुसार  भी

 1 मधुकैटभ से रक्षा के लिए नारायण को योगनिद्रा से जाग्रत करने हेतु हिरण्यगर्भ ब्रह्माजी ने योगनिद्रा की स्तुति की। नारायण के नैत्रों से योगनिद्रा दशभुजा महाकाली स्वरूप में प्रकट हुई। इन्हें दुर्गासप्तशती में महाकाली अवतार भी कहा है। ये महाकाली (श्रीलक्ष्मी) देवी ही आदि शक्ति मानी गई है।  प्राकृतिक रहस्य में इनके अन्यनाम योगमाया, योगनिद्रा, तामसी और नन्दा (नन्द यशोदाजी की पुत्री / विन्द्यवासीनि देवी) भी कहा है।
अन्य सभी देवियाँ इन्ही आदिशक्ति योगमाया अपरा प्रकृति श्रीलक्ष्मी के ही स्वरूप या अवतार हैं। जो क्रमशः इस प्रका है।

2  महामाया के  परम्परागत प्रचलित स्वरूप - सावित्री देवी, श्री देवी, लक्ष्मी देवी, सरस्वती देवी (ब्राह्मी), उमा - पार्वती (माहेश्वरी) देवी, ऐन्द्री, (कार्तिकेय की शक्ति) कौमारी, तथा अवतारों की शक्ति वाराही और नारसिंही के अलावा निम्नांकित देवियोंका वर्णन है।
3 महिषासुर से रक्षार्थ देवताओं की स्तुति पर देवताओं के तेज के संयुक्तिकरण से प्रकट हुई महालक्ष्मी अवतार। 
दुर्गासप्तशती अध्याय दो मध्यम चरित्र में इनको चण्डिका, अम्बिका, और जगदम्बा भी कहा है। प्राकृतिक रहस्य में रक्त दन्तिका भी महालक्ष्मी अवतार को ही बतलाया गया है। इनकी सहस्त्रों भुजाएँ बतलाई गई है लेकिन मुर्तिरहस्य के अनुसार प्रतिमाओं और चित्रों में  बहुरङ्गी, अष्टादश भुजा वाली बतलाई जाती है। द्वितीय अध्याय मध्यम चरित्र के अनुसार चण्डिका ने तलवार से महिषासुर का सिरकाटा था किन्तु प्रतिमाओं में प्रायः शूल (भाले) से महिषासुर का सीना बिन्धते हुए बतलाते हैं।
महिषासुर वध के पश्चात देवताओं की स्तुति पर भविष्य में भी देवताओं के आव्हान पर प्रकट होकर सहायता का आशिर्वाद प्रदान किया था। अतः
 
4 शुम्भ निशुम्भ से रक्षणार्थ हिमालय पर एकत्र हो देवताओं को पुकार करते देख पार्वतीजी ने देवताओं से पुछा कि, आपलोग किसका स्तवन कर किसको पुकार रहे हैं? तब देवताओं के उत्तर देनें के पूर्व ही पार्वतीजी के शरीर कोश से अत्यन्त गौरवर्ण अति सुन्दर, कौशिकी देवी प्रकट हुई; उन कौशिकी देवी ने ही पार्वतीजी को उत्तर दिया कि, ये स्तुति द्वारा मुझे पुकार रहे हैं। पार्वती जी के शरीर कोश से प्रकट होनें के कारण ही इनका नाम कौशिकी पड़ा।
कौशिकी को दुर्गा सप्तशती अध्याय तीन, पाँच, सात, आठ और ग्यारह तथा प्राकृतिक रहस्य में कात्यायनी, चण्डी, दुर्गा और शाकम्भरी भी कहा गया है।

5 पार्वतीजी के शरीर कोश से कौशिकी के प्रकटीकरण से माता पार्वतीजी एकदम काली पड़ गई। शिवजी उन्हें कृष्णा (कालीका) कहकर चिड़ाते थे। ये चूँकि हिमालय के गड़ में विचरती थी अस्तु गड़कालिका भी कहलाई। इसप्रकार पार्वती देवी का ही नाम कालिका और गड़कालिका हुआ।

6 उक्त कौशिकी चण्डी, कात्यायनी, दुर्गा के आव्हान पर  पूर्व से अस्तित्व में रही निम्नलिखित  देवियाँ कौशिकी चण्डी देवी के शरीर से प्रकट हुई और पुनः उनमें ही लय होगई। ---
(क) दक्षयज्ञ विध्वन्स के लिये शिवजी नें पार्वतीजी की प्रसन्नता के लिए जिन वीरभद्र और भद्रकाली को नियुक्त किया था वे ही भद्रकाली
सप्तमोsध्याय मे - चण्डी देवी के क्रोध से तुरन्त कालीदेवी के रूप में प्रकट हुई। इन कालीदेवी का स्वरूप ऐसा बतलाया गया है मानो अस्थिकंकाल पर चर्म लिपटा हो। ये अत्यन्त काली हैं। इनका मुख अति विशाल और भयंकर है। ये नरमुण्डों की माला धारण करती हैं। इनका शस्त्र तलवार, पाश और खट्वाङ्ग है। और चीते के चर्म की साड़ी पहनतीं हैं। ये रथ सहित दैत्यों का भक्षण कर जाती हैं। इन्हे ही प्राकृतिक रहस्य में  कालरात्रि, निऋति, दुरत्यया, एकवीरा, महामारी, निद्रा,तृष्णा, क्षुधा, तृषा कहा है। ये ही ज्यैष्ठा,  अलक्ष्मी, शीतला (ज्वर) भी कहलाती है। चण्ड मुण्ड की गरदन काटकर उनके मुण्ड चण्डी को भेट करने के कारण चण्डी कौशिकी ने इन्हें चामुण्डा नाम दिया।

7 अष्टमोsध्याय मे- ब्राह्मी (ब्रह्माणी), शिवा (माहेश्वरी), कौमारी (कार्तिकेय जी की शक्ति), नारायणी (वैष्णवी), वाराही, नारसिंही और ऐन्द्री भी सहायतार्थ उपस्थित हुई।

8 अष्टमोsध्याय मे ही-  चण्डिका शक्ति जिन्हें  शुम्भ निशुम्भ के पास शिवजी को  दूत बनाकर भेजने के कारण शिवदूती भी कहा गया है प्रकट हुई। ये चण्डिका शक्ति/ शिवदूती सेकड़ों गिदड़ियों के समान उच्च स्वर निकालती है।ये चौसठ योगिनियों की प्रमुख हे। प्राकृतिक रहस्य मे उल्लेखित भ्रामरी देवी भी ये ही ह़ै। भ्रामरी देवी के छः पेर हैं। 
इस प्रकार दुर्गा सप्तशती में उक्त देवियों के चरित्र वर्णन हैं। इन सबकी आराधना-उपासना नवरात्र में होती है।

देव्य कवच में देवी के  निम्नलिखित नाम  दुर्गासप्तशती में उल्लेखित नामों के अलावा आये हैं।
लेकिन वर्ष 2000 ईसवी के बाद से मिडिया ने ना जानें क्यों  केवल तृतीय से पञ्चम श्लोक तक में उल्लेखित नौ दुर्गा के नामों का महत्व बड़ा दिया है।
"प्रथमम् शैलपुत्री, च द्वितीयम् ब्रह्मचारिणी, तृतीयम् चन्द्रघण्टेति, कुष्माण्डेति चतुर्थकम् ।3
पञ्चम स्कन्दमातेति, षष्टम कात्यायनीति च,सप्तम कालरात्रीति, महागौरीति चाष्टकम्।4
नवमम् सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः, उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना।5"
बिना किसी आधार के देवी के उक्त अलग-अलग नौ नामों को देवी न उक्त अलग-अलग देवियाँ घोषित कर दिया। फिर उन्हें नवरात्र की नौ तिथियों की अलग-अलग तिथियों की अलग अलग पूजनीय देवी घोषित कर दिया गया। इसका सिरपेर आजतक कोई भी नही बतला पाया कि, नौदुर्गा के इन नामों का अलग-अलग तिथियों से क्या सम्बन्ध है? पर जन समान्य नें इसे आँखमून्द कर मान लिया।
कवच में आये देवी के  नाम  ---
1 शैलपुत्री (माहेश्वरी), 2 ब्रह्मचारिणी (ब्रह्माणी), 3 चन्द्रघण्टा (सम्भवतया वाराही), 4 कुष्माण्डा (वैष्णवी), 5 स्कन्दमाता (पार्वतीजी या स्कन्द शक्ति कौमारी), 6 कात्यायनी (लक्ष्मी),7 कालरात्रि (चामुण्डा), 8महागौरी ( कौशिकी), 9सिद्धिदात्री ( ऐन्द्री या वैनायकी) हैं। इनके अलावा भी कवच में निम्नलिखित नाम और उल्लेख हैं। ---
10 स्वाहा (अग्निशक्ति),11 वारुणी, 12 मृगवाहना, 13 शूलधारिणी, 14जया, 15 विजया, 16अजिता, 17 अपराजिता, 18 उद्योतिनी, 19 उमा, 20मालाधरी, 21 यमघण्टा, 22 शंखिनी, 23 द्वारवासिनी, 24 सुगन्धा, 25 चर्चिका, 26 अमृतकला, 27  चित्रघण्टा, 28 कामाक्षी, 29  सर्वमङ्गला, 30 भद्रकाली, 31 धनुर्धरी, 32 नीलग्रीवा, 33 नलकुबरी,  34 खड्गिनी, 35 वज्रधारिणी,  36 दण्डिनी, 37 शुलेश्वरी, 38 कुलेश्वरी, 39 महादेवी, 49 शोकविनाशिनी, 41 ललिता, 42 गुह्येश्वरी, 43 पुतना, 44 कामिका, 45 महिषवाहिनी, 46 भगवती, 47 विन्द्यवासीनी,  48 महाबला, 49 तैजसी, 50 श्रीदेवी, 51 द्रंष्टाकराली, 52 उर्ध्वकेशिनी, 53 कौबेरी, 54 वागीश्वरी, 55 पार्वती,  56 मुकुटेश्वरी, 57 पद्मावती, 58 चूड़ामणि, 59  ज्वालामुखी, 60 अभेद्या, 61 छत्रेश्वरी,  62 धर्मधारिणी, 63  वज्रहस्ता, 64 कल्याणशोभना, 65 योगिनी, 66 नारायणी, 67 वैष्णवी, 68 चक्रिणी, 69 इन्द्राणी, 70 सुपथा, 71 क्षेमकरी नाम  आये हैं।

इनके अलावा कुछ कष्टकारी योनियों के नाम भी आये हैं-- भूचर (ग्रामदेवता), खेचराः (आकाशचारी), जलज,उपदेशिका (उपदेश मात्र से सिद्ध होजाने वाले), सहजा, (जन्म के साथ प्रकट होनें वाले देवता), कुलजा (कुलदेवता), माला (कण्ठमाला), डाकिनी, शाकिनी (शक जाति की), महाबला, ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, वैताल, कुष्माण्ड (विनायक), भैरव आदि।

और अर्गलास्तोत्रम्  के प्रथम श्लोक 
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते।
की ग्यारह देवियों को कोई महत्व क्यों नही दिया गया? यह भी समझ से परे है। और अष्टोत्तरशतनाम में तो 108 नाम हैं। उनका क्या तर्क। क्या उन्हें नक्षत्र चरण से जोड़ोगे?
वस्तुतः पूरे नवरात्र की सभी नौ तिथियों में उक्त सभी देवियों की पूजा, आराधना, उपासना होती है।

शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2021

क्या शंकराचार्य वास्तव में जगत को मिथ्या मानते थे? क्या मिथ्या और असत् पर्यायवाची है?

एक भारतीय के विचार

 क्या शंकराचार्य वास्तव में जगत को मिथ्या मानते थे? क्या मिथ्या और असत् पर्यायवाची है? 

क्या शंकराचार्य वास्तव में जगत को मिथ्या मानते थे?
 जी हाँ,आद्यशंकराचार्य जी वास्तव में जगत को मिथ्या ही मानते थे।
आद्यशंकराचार्य जी वेदज्ञ थे, वेदिकमतावलम्बी थे अतः उनने निरालम्बोपनिषद का वाक्यांश ब्रह्मसत्यम् जगत्मिथ्या;जीवो ब्रह्म ना परः का उल्लेख अपनी ब्रह्मज्ञानावलिमाला में किया है। 
 जगत जब मिथ्या है तो क्या जगत असत है? 
 उत्तर होगा नही। जगत असत भी नही है।
 यह प्रश्न स्वाभाविक है उत्पन्न होता है कि, प्रत्यक्ष अनुभव होनें वाला जगत असत तो हो नही सकता है। तो मिथ्या कैसे है?
 तो क्या उपनिषद वाक्य गलत है ?
 नही भाई! असत कहाँ कहा है?  मिथ्या कहा है। असत नही कहा।  मिथ्या और असत दो भिन्न अवधारणा है। 
 मिथ्या का तात्पर्य जो जैसा हो नही, वैसा दिखे। जैसा हो वैसा दिखे नही। जो दिखे, यथार्थ में वैसा हो नही। जो हो वह दिखे नही।
जैसे ट्रेन/ बस में यात्रा के समय पथ के किनारे के वृक्ष पीछे भागते दिखते हैं। और दूरस्थ वृक्षावली चाप बनाती हुई प्रतीत होती है।  यह आप भी जानते हैं कि, यह मात्र भ्रम है, यह दृष्य मिथ्या है फिरभी बच्चे उस दृष्य का मजा लेते हैं। और आप हाँ में हाँ मिलाने के बजाय आप उन्हें उसका विज्ञान समझाते हैं।  यही कार्य श्रुति वाक्य के सहारे से शंकराचार्य जी ने किया है।

मिथ्या शब्द असत से भिन्न है। *मिथ्या का मतलब असत्य नही होता।  प्रतीत होने वाली वस्तु असत नही सत्य सी लगती है। जबकि दिक, काल (अर्थात जगत) प्रतिक्षण बदलता रहता है। और हम अपने मस्तिष्क की मेधाशक्ति के बलपर उस सतत् परिवर्तनशील दिककाल (जगत) में सातत्य अनुभव करते हैं। बदलनें के पहले हम उस दृष्य को स्मृति में बिठा चुके होते हैं। यह इतना तिवृ और स्वाभाविक होता है कि, हम उसे अपना कर्म नही मान पाते हैं। यह प्रतीति है यही मिथ्यात्व है।
जगत हर क्षण बदल जाता है लेकिन उसमें सातत्य आभास के कारण वह सत्य भासता है अतः जगत मिथ्या ही है।
जैसे सिनेमा की रील को देखो तो उसमें दृष्य अनेक खण्ड में विभक्त है। क्योंकि, केमरा जड़ है, उसका कोई संस्कार नही है अतः केमरा प्रति क्षण के अलग अलग चित्र पकड़ता है। लेकिन जब मशीन से निर्धारित समय एक सेकण्ड में लगभग सोलह दृष्य क्रमबद्ध आँखों के सामने से गुजरते हैं तो वे हमें  चलायमान भासित  होते है। जबकि वे सब स्थिर और अलग अलग दृष्य हैं। इसीको मिथ्या कहते हैं। 
वेदान्त की भाषा में न रज्जु असत्य है न सर्प असत्य है  लेकिन अल्प प्रकाश की स्थिति में होने वाला सर्परज्जु भ्रम मिथ्या है।
 परमात्मा को ही जगत का निमित्तोपादान कारण कहने वाले, माया को विष्णु की शक्ति और विष्णु के अधीन बतलाने वाले, माया को सत असत अनिर्वचनीय कहने वाले, जीवो ब्रह्म न परः कहकर अद्वैत प्रतिपादित करनें वाले आद्यशंकराचार्य जी जगत को असत कहें यह सम्भव तो नही । जैसे सत्य और ऋत अति निकट होने के कारण कई विद्वान भी ऋत को सत्य मान बैठते हैं वैसे ही मिथ्या भ्रम के निकट का शब्द है। 
 हाँ यह निश्चित है कि माया समय का कारण विष्णु है अतः वे त्रेतवादियों के समान शंकराचार्य जी माया को अनादि अनन्त नही मानते थे। अर्थात जगत को भी अनादि, अनन्त नही मानते थे।
 शंकराचार्य जी के मत मे परमात्मा के अतिरिक्त कुछ है ही नही और परमात्मा तो परम सत्य है और जब परमात्मा ही जगतरूप में प्रकट हुआ तो परमात्मा का जगतरूप असत कैसे हो सकता है? लेकिन इसकी परिवर्तनशीलता के कारण यह मिथ्या भी है। 
 दृष्यमान परिवर्नशील जगत के दृष्यों में लगाव रखना तो अनुचित ही है ना? अतः इस अनुचित वर्ताव से सावधान करनें हेतु जगत का मिथ्यात्व दर्शाना आचार्य का महत्वपूर्ण कार्य था।

बुधवार, 6 अक्टूबर 2021

आश्विन शुक्लपक्ष के तिथि, व्रतपर्वोत्सव निर्णय। निर्णय सिन्धु के अनुसार।

निर्णयसिन्धु के द्वितीय परिच्छेद /  आश्विन शुक्लपक्ष/ नवरात्र आरम्भ निर्णय प्रकरण पृष्ठ 330 
तिथितत्त्व में और देवीपुराण में भी कहा है कि - प्रातःकाल में देवी का आवाहन करे। प्रातःकाल में ही प्रवेश करे। प्रातःकाल में ही पूजन करे और प्रातःकाल में ही विसर्जन करे।
प्रष्ठ 331 लल्ल ने कहा है कि,  तिथि ही शरीर है, तिथि ही कारण है, तिथि ही प्रमाण है और तिथि ही साधन है।
पृष्ठ 334  नवरात्र में तिथि क्षय होने के कारण  आठ रात होने मे दोष नही है।
प्रकरण - कलशस्थापनम् रात्रो न कार्यम्। पृष्ठ 335 
 मत्स्य पुराण का कथन है कि, --- कलशस्थापन रात्रि में न करे।
रात्रि में कलश स्थापना और कुम्भाभिषेचन नही करना चाहिए।
विष्णुधर्म में कहा है कि, सूर्योदय से आरम्भ कर दशनाड़ी (दस घड़ी) तक (अर्थात चार घण्टा के अन्दर ही)  स्थानारोपण आदि करें। स्थानारोपण आदि के लिए प्रातःकाल कहा है।
पृष्ठ 345 
यदि नवरात्र पूजन का संकल्प ले चुके हो और उसके बाद जन्म, मरण अशोच (सूतक) लगने पर भी नवरात्र पूजन दानादि यथावत जारी रखें। किन्तु रजस्वला स्त्री दूसरे से पूजन करावे।
हेमाद्रि व्रत खण्ड में गरुड़ पुराण का वचन है कि, 
सौभाग्यवती स्त्रियों को नवरात्र में गन्ध, अलंकार,  ताम्बूल(पान), आदि चबाने, पुष्पमाला, अनुलेपन, दन्तधावन, और अभ्यञ्जन की अनुमति है। सौभाग्यवती स्त्रियों के द्वारा नवरात्र में गन्ध, अलंकार,  ताम्बूल(पान), आदि चबाने, पुष्पमाला, अनुलेपन, दन्तधावन, और अभ्यञ्जन से उपवास दूषित नही होता है।
पृष्ठ346   निर्णयामृत में देवी पुराण का वचन है कि, शिष्टमत यह है कि,
आश्विन शुक्ल पक्ष के मूल नक्षत्र के आद्यपाद में दुर्गासप्तशती पुस्तक में सरस्वती का स्थापन करे। पूर्वाषाढ़ा में पूजन करे। उत्तराषाढ़ा में बलि दे (धार्मिक कर अदा करे।) तथा श्रवण नक्षत्र के प्रथम पाद में सरस्वती का विसर्जन करे।
पृष्ठ 347 विद्यापति का लिखित वचन है कि, देवता का शरीर तिथि है।और तिथि में नक्षत्र आश्रित है।इसलिए। तिथि की प्रशंसा करते हैं। तिथि के बिना नक्षत्र की प्रशंसा नही करते हैं।
यही बात देवल ने कही है कि, तिथि तथा नक्षत्र के योग में दोनों ही का पालन करे। दोनों का योग न हो तो देवी पूजनकर्म में तिथि को ही ग्रहण करना चाहिए।
पृष्ठ 347 हेमाद्री में कहा है कि, 
प्रतिपदा से नवमी तक उपवास करनें में असमर्थ हो तो सप्तमी, अष्टमी और नवमी तिथियों में त्रिरात्र मे उपवास करें।
पृष्ठ 349 गोविन्दार्णव में देवीपुराण का मत है कि, नवरात्र करनें मैं अशक्त हो तो त्रिरात्र (सप्तमी, अष्टमी, नवमी) या एकरात्र (केवल नवमी तिथि)  को जो भक्त करता है उसे इच्छित फल देती हूँ।
मुर्तिस्थापनेदिकविचारः   प्रकरण  पृष्ठ 350
दुर्गा भक्ति तरङ्गिणी में देवी पुराण का मत है कि, देवी मुर्ति स्थापना में दक्षिणाभिमुखी दुर्गा की मुर्ति सदा स्थापना के लिए उत्तम है। तथा उत्तराभिमुखी दुर्गा की मुर्ति स्थापना न करे।
पृष्ठ 354 355 शरदकाल में नवमीतिथि से युक्त महाअष्टमी पूज्य होती है। सप्तमी युक्त अष्टमी तिथि नित्य शोक तथा सन्ताप करनें वाली होती है।पुत्र पौत्र, पशुओं और राज्य का नाश करती है।  
घटिका मात्र भी औदयिकी अष्टमी तिथि ग्रहण करें।
देवल ने भी कहा है कि, व्रत और उपवास में एक घड़ी भी उदिया तिथि ग्रहण करें।
मदनरत्न का वचन है कि, अष्टमी तिथि में सूर्योदय होने पर तथा दिनान्त में नवमी तिथि हो तथा उसदिन यदि मङ्गलवार भी हो तो उस दिन प्रयत्न करके भी पूजन अवश्य करें।
पद्मपुराण का मत है कि,अष्टमी तिथि नवमी से युक्त हो या नवमी तिथि अष्टमी तिथि से युक्त हो और यही तिथि मूल नक्षत्र से युक्त हो तो उसे महानवमी कहते हैं।
हेमाद्रि का वाक्य है कि, आश्विन शुक्ल पक्ष में मूल नक्षत्र से युक्त अष्टमी तिथि नवमी युक्त अष्टमी महानवमी कहलाती है।
निर्णयामृत के दुर्गोत्सव में कहा है कि, मूल नक्षत्र युक्त भी लेशमात्र भी सप्तमी तिथि से युक्त अष्टमी तिथि त्याज्य है।
प्रष्ठ 356 अष्टमी तिथि में ही सूर्यास्त हो जाये तब भी अष्टमी युक्त नवमी तिथि में ही पूजा होती है। दशमी युक्त नवमी में नही।

पृष्ठ 357
हेमाद्री में और निर्णयामृत में भविष्य पुराण का मत है कि, कन्या के सूर्य में शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से युक्त और मूल नक्षत्र से युक्त आश्विन शुक्ल पक्ष की  नवमी महा नवमी कहलाती है।
पृष्ठ 365
 उदिया नवमी तिथि मे महानवमी पूजन तभी करें जब उदिया नवमी तिथि सूर्यास्त के तीन मुहूर्त (2 घण्टा 24 मिनट) के बाद समाप्त होकर दशमी तिथि लगे।
यद्यपि हेमाद्री मत में दो मुहुर्त का भी वेध है।तथापि वह सूर्योदय से ही है। सायंकाल में तो तीन मुहूर्त का ही वेध होता है। उसी बात को दीपिका में भी कहा है कि, सायंकाल में तीन मुहुर्त तिथि हो तो सम्पूर्ण तिथि जाने। माधव ने भी कहा है कि, सायंकाल में तो इससे तीन मूहुर्त के योग में पहली/ उदिया नवमी तिथि लें।
अन्यथा नवमी तिथि दशमीतिथि से युक्त कभी भी न करें।  स्कन्दपुराण में भी परा (उदिया) नवमी तिथि का निषेध है।
निर्णय -  तीन मुहूर्त का योग न होने से तो निषिद्धा भी परा ही(उदिया नवमी तिथि)ही करे यह निष्कर्ष (सिद्धान्त) है।
संग्रह में कहा हैकि,  मे, जप तथा होम नवमी तिथि या श्रवण नक्षत्र में समाप्त करे।
देवी पुराण में कहा है कि, व्रत, जागरण तथा विधिवत (धार्मिक कर अदायगी रूप) बलि नवमी में करें।
पृष्ठ 366
कामरूप निबन्ध में कहा है कि, अष्टमी तिथि के अवशिष्ठ भाग (बचे हुए भाग) में और नवमी तिथि के पूर्वभाग में ही की हुई पूजा महाफल को देनें वाली है।
नवरात्र पारण निर्णय पृष्ठ 372
हेमाद्री में धौम्य का वचन है कि, आश्विन मास के शुक्लपक्ष में नवमी तिथि समाप्ति तक नवरात्र करें या सप्तमी, अष्टमी, नवमी का त्रिरात्र करें। नवरात्र पारण दशमी तिथि में करें।
नवमी तिथि पर्यन्त वृद्धि से पूजा जप  (कन्या भोज) आदि करें। नवमी पर्यन्त भूतपूजादि प्रधान कर्म है। उपवास तो पूजा का अङ्ग है।
कोई शंका करे कि, तिथि के ह्रास (घट जाने) में आठ उपवास होंगे -  यथा समाख्या (नाम) कैसे होगा।
इसमें कर्म विशेष में नवरात्र शब्द रूढ़ है। इसलिए देवी पुराण में कहा है कि, तिथि वृद्धि मेंऔर तिथि के ह्रास में नवरात्र शब्द ठीक नही है।
तिथि के ह्रास में भी नव तिथियों का उपोष्यत्व होनें से (अर्थात नौ दिन) मानना मूर्ख का कथन परास्त हुआ।
पृष्ठ 374
यज्ञ में वरण का प्रारम्भ होना, व्रत और सत्रयाग में संकल्प का होना, विवाह आदि में नान्दीमुख श्राद्ध होना और श्राद्ध में पाक (पिण्ड का पाक बनना) की क्रिया होनें पर अशौच (सूतक) नही होता।
विजया दशमी निर्णय -- पृष्ठ 377
सूर्योदय कालीन आश्विन शुक्ल दशमी विजयादशमी कहलाती है। इसमें मुख्य कर्म अपराह्न का है। प्रदोष तो गौण है।
दोनो दिन अपराह्न व्यापि हो तो पूर्वा (उदिया दशमी) में विजया दशमी होगी। इसमें प्रदोष व्याप्त में आधिक्य होने से।
दोनों दिन प्रदोष व्यापि हो तो परा ग्रहण करें। क्योंकि अपराह्न व्याप्ति के आधिक्य होने से।
दोनो दिन में अपराह्न के अस्पर्श में तो पूर्वा (उदिया दशमी तिथि) ही लें। किन्तु दोनो दिन में अपराह्न के अस्पर्श में यदि दूसरे दिन श्रवण नक्षत्र का योग हो तो ही परा ही लें।
आश्विन पूर्णिमा निर्णय -- पृष्ठ 378
 आश्विन पूर्णिमा परा ही ग्रहण करें।
दीपिका में कहा है कि, (वट) सावित्री व्रत को छोड़कर तो पूर्णिमा और अमावस्या परा ग्रहण करें।

गुरुवार, 30 सितंबर 2021

परिणाम मिलने में समय लगता है पर कर्मफल तत्काल होता है।

कर्म का परिणाम देरी से दिखता है। फल तो तत्काल ही मिलता है।
आपके मन में कोई संकल्प उठा, तत्काल उसका कोई विकल्प भी उपस्थित हो जायेगा। इस संकल्प-विकल्प की उधेड़बुन में न पड़ते हुए आपनी बुद्धि से जाँचा- परखा और  (निश्चयात्मिका बुद्धि से)  विवेक पूर्वक उचित और सही निर्णय किया और कार्यान्वयन में जुट गये
स्वाभाविक है कार्यान्वयन में भौतिक  जैविक और मानव संसाधन जुटाने, उन्हें अपनी बात समझाने, उनको प्रशिक्षित करने, और कार्यपर लगानें और कार्यान्वित होनें तक बारम्बार निरीक्षण-परीक्षण करते रहनें पर ही अनुकूल परिणाम मिलेगा। जहाँ-जितनी छूट/ ढील दी उतनी ही कार्यान्वयन अवधि बड़ेगी और उसी अनुपात में कार्य बिगड़ेगा।

बहुत साधारण उदाहरण है आप घरपर बोलें कि, भूख लगी है भोजन करना चाहता हूँ। इसी में उक्त सभी चीजें परिलक्षित हो जायेगी।
आटा-दाल-सब्जी- मसाले-पानी- इंधन, बरतन  कितने भौतिक जैविक संसाधन लगेगें! फिर इन संसाधनों को जुटाने वाला, भोजन बनाने वाला, परोसनें वाला मानव संसाधन । क्या खाना है? कैसे बनाना है? कितनी देरी में खाना है यह सब भी समझाना पड़ेगा। तब समय पर मनचाहा भोजन मिलेगा।
परिणाम में देरी हुई। लेकिन भोजन के निश्चय के साथ ही कर्मफल आरम्भ हो गया। अन्यथा क्रियान्वयन सम्भव ही नही। कर्म का संस्कार और  अगली स्टेप (अगलाकर्म) फल ही है।
इसीलिए श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में समझाया कि, कर्मफल की चाह अनावश्यक है कर्मफल तो तत्काल मिलना ही है अतः केवल परिणामपेक्षित कर्म कर्तव्य है  जबकि, फलाशा से कर्म करना मुर्खता है।

बुधवार, 29 सितंबर 2021

नक्षत्रों के देवताओं के आधार पर राशियों, नक्षत्रों के स्वामी ग्रह, तत्व, वर्ण, लिङ्ग, दिशा आदि।

नक्षत्रों के देवताओं के आधार पर नक्षत्रों के स्वामी ग्रह, वर्ण, तत्व, दिशा, लिङ्ग आदि।

क्रमांक,नक्षत्र ।स्वामी । देवता। तत्व । वर्ण । लिङ्ग । दिशा।


अश्विनी - शनि ।अश्विनौ । वायु । वैश्य । पुरुष । दक्षिणपूर्व।
2 भरणी - शनि । यम । वायु। शुद्र ।पुरुष ।दक्षिण ।
3  कृतिका- मंगल। अग्नि । अग्नि।  क्षत्रिय। पुरुष । आग्नैय।
4  रोहिणी- ब्रहस्पति। प्रजापति । आकाश । ब्राह्मण। पुरुष । उत्तर 
5  मृगशीर्ष - चन्द्रमा । सोम । जल । वैश्य । स्त्री । पश्चिमोत्तर ।
6  आर्द्रा - शुक्र । रुद्र ।जल। शुद्र। उभय।  उत्तर पूर्व (ईशान)।
पुनर्वसु - नेपच्युन् ।अदिति ।जल । क्षत्रिय । स्त्री । पूर्वोत्तर ।
8  पुष्य- ब्रहस्पति । ब्रहस्पति ।  आकाश । ब्राह्मण । पुरुष । उत्तर पश्चिम।
9  आश्लेषा - युरेनस । सर्प । भूमि । म्लैच्छ। उभय । पश्चिम दक्षिण
10   मघा - यूरेनस । पितृ । भूमि ।पञ्चम । उभय । दक्षिण पश्चिम ।
11  पूर्वाफाल्गुनी । मंगल । भग ।अग्नि । क्षत्रिय । स्त्री । दक्षिण पूर्व।
12 उत्तराफाल्गुनी -शनि । अर्यमा । वायु । शुद्र । उभय । दक्षिण पश्चिम।
13  हस्त - सूर्य । सवितृ । आकाश । ब्राह्मण । पुरुष । उर्ध्व (आकाश)।
14  चित्रा -सूर्य । त्वष्टा । आकाश । ब्राह्मण । पुरुष । मध्य ।
15  स्वाती - बुध । वायु । वायु । विप्र ।पुरुष । वायव्य ।
16  विशाखा - नेपच्युन् । इन्द्राग्नि । अग्नि । क्षत्रिय । पुरुष । पूर्व दक्षिण।
17 अनुराधा- बुध । मित्र । वायु । क्षत्रिय । पुरुष । पश्चिमोत्तर ।
18 ज्यैष्ठा-चन्द्रमा । वरुण / इन्द्र । जल । वैष्य । पुरुष । पश्चिम । 
19  मूल - युरेनस । निऋति । भूमि । म्लेच्छ । नपुन्सक ।  दक्षिण पश्चिम (नैऋत्य)। 
20 पूर्वाषाढ़ा - चन्द्रमा । अप् । जल । वैष्य । स्त्री । पश्चिम दक्षिण
21 उत्तराषाढ़ा - मंगल । विश्वैदेवाः । अग्नि । वैश्य । उभय । दक्षिण पूर्व।
22 श्रवण - सूर्य - विष्णु - आकाश । ब्राह्मण । पुरुष । आकाश/पाताल। 
23 धनिष्टा - बुध । वसु । वायु । क्षत्रिय । पुरुष । उत्तर पश्चिम।
24 शतभिषा - नेपच्युन् ।  इन्द्र/ वरुण । अग्नि ।क्षत्रिय । पुरुष । पूर्व ।
25 पूर्वाभाद्रपद - शुक्र । अजेकपात । भूमि । शुद्र । उभय । उत्तर पूर्व।
26 उत्तराभाद्रपद - शुक्र ।  अहिर्बुधन्य । भूमि । शुद्र । उभय । पूर्वोत्तर ।
27 रेवती - ब्रहस्पति । पूषा । आकाश । ब्राह्मण । पुरुष । उत्तर पूर्व।
--------------------------------------------------------------------

नक्षत्रों के देवताओं के आधार पर राशियों, नक्षत्रों के स्वामी ग्रह, वर्ण, तत्व, दिशा, लिङ्ग आदि।

क्रमांक, राशि/ नक्षत्र ।स्वामी । (आदित्य)/ देवता। तत्व । वर्ण । लिङ्ग । दिशा।

मेष - शनि। अर्यमा । वायु । वैश्य/ शुद्र। पुरुष । दक्षिण।
अश्विनी - शनि ।अश्विनौ । वायु । वैश्य । पुरुष । दक्षिणपूर्व।
भरणी - शनि । यम । वायु। शुद्र ।पुरुष ।दक्षिण ।
कृतिका- मंगल। अग्नि । अग्नि।  क्षत्रिय। पुरुष । आग्नैय।

वृष - ब्रहस्पति । धातृ । क्षत्रिय । वायु । पुरुष ।  उत्तर पश्चिम ।
कृतिका- मंगल। अग्नि । अग्नि । क्षत्रिय। पुरुष । आग्नैय।
रोहिणी- ब्रहस्पति। प्रजापति । आकाश । ब्राह्मण। पुरुष । उत्तर 
मृगशीर्ष - चन्द्रमा । सोम । जल । वैश्य । स्त्री । पश्चिमोत्तर ।

मिथुन- शुक्र । विवस्वान ।  जल । शुद्र । स्त्री । पूर्वोत्तर।
मृगशीर्ष - चन्द्रमा । सोम । जल । वैश्य । स्त्री । पश्चिमोत्तर ।
आर्द्रा - शुक्र । रुद्र ।जल। शुद्र। उभय।  उत्तर पूर्व (ईशान)।
पुनर्वसु - नेपच्युन् ।अदिति ।जल । क्षत्रिय । पूर्वोत्तर ।

 कर्क -  ब्रहस्पति । अंशु । आकाश । विप्र ।  पुरुष / उभय। पाताल 
/ उत्तर ।
10 पुनर्वसु - नेपच्युन् ।अदिति ।जल । क्षत्रिय । स्त्री । पूर्वोत्तर ।
11 पुष्य- ब्रहस्पति । ब्रहस्पति ।  आकाश । ब्राह्मण । पुरुष । उत्तर पश्चिम।
12 आश्लेषा - युरेनस । सर्प । भूमि । म्लैच्छ। उभय । पश्चिम दक्षिण

सिंह- मङ्गल । भग । अग्नि । क्षत्रिय । उभय ।पुर्व दक्षिण (आग्नैय) ।
13  मघा - यूरेनस । पितृ । भूमि ।पञ्चम । उभय । दक्षिण पश्चिम ।
14 पूर्वाफाल्गुनी । मंगल । भग ।अग्नि । क्षत्रिय । स्त्री । दक्षिण पूर्व।
15 उत्तराफाल्गुनी -शनि । अर्यमा । वायु । शुद्र । उभय । दक्षिण पश्चिम।

कन्या - सूर्य । सवितृ । आकाश ।  क्षत्रिय । पुरुष । मध्य ।
16 उत्तराफाल्गुनी -शनि । अर्यमा । वायु । शुद्र । उभय । दक्षिण पश्चिम।
17 हस्त - सूर्य । सवितृ । आकाश । ब्राह्मण । पुरुष । उर्ध्व (आकाश)।
18 चित्रा -सूर्य । त्वष्टा । आकाश । ब्राह्मण । पुरुष । मध्य ।

तुला - बुध । त्वष्टा । वायु । विप्र । पुरुष । वायव्य (उत्तरपूर्व) ।
19 चित्रा -सूर्य । त्वष्टा । आकाश । ब्राह्मण । पुरुष । मध्य ।
20 स्वाती - बुध । वायु । वायु । विप्र ।पुरुष । वायव्य ।
21 विशाखा - नेपच्युन् । इन्द्राग्नि । अग्नि । क्षत्रिय । पुरुष । पूर्व दक्षिण।

वृश्चिक - चन्द्रमा । वरुण । जल । क्षत्रिय । पुरुष । पश्चिमोत्तर ।
22 विशाखा - नेपच्युन् । इन्द्राग्नि । अग्नि । क्षत्रिय । पुरुष । पूर्व दक्षिण।
23 अनुराधा- बुध । मित्र । वायु । क्षत्रिय । पुरुष । पश्चिमोत्तर ।
24 ज्यैष्ठा-चन्द्रमा । वरुण / इन्द्र । जल । वैष्य । पुरुष । पश्चिम । 

धनु - युरेनस । मित्र । जल । शुद्र ।  उभय / स्त्री। दक्षिण पश्चिम (नैऋत्य)।
25 मूल - युरेनस । निऋति । भूमि । म्लेच्छ । नपुन्सक ।  दक्षिण पश्चिम (नैऋत्य)। 
26 पूर्वाषाढ़ा - चन्द्रमा । अप् । जल । वैष्य । स्त्री । पश्चिम दक्षिण
27 उत्तराषाढ़ा - मंगल । विश्वैदेवाः । अग्नि । वैश्य । उभय । दक्षिण पूर्व।

मकर - सूर्य । विष्णु । आकाश । ब्राह्मण । पुरुष । आकाश/ पाताल ।
28 उत्तराषाढ़ा - मंगल । विश्वैदेवाः । अग्नि । वैश्य । उभय । दक्षिण पूर्व।
29 श्रवण - सूर्य - विष्णु - आकाश । ब्राह्मण । पुरुष । आकाश/पाताल। 
30 धनिष्टा - बुध । वसु । वायु । क्षत्रिय । पुरुष । उत्तर पश्चिम।

कुम्भ - नेपच्युन् । इन्द्र ।  अग्नि  (वायु )। क्षत्रिय । पुरुष । पूर्व ।
31 धनिष्टा - बुध । वसु । वायु । क्षत्रिय । पुरुष । उत्तर पश्चिम।
32 शतभिषा - नेपच्युन् ।  इन्द्र/ वरुण । अग्नि ।क्षत्रिय । पुरुष । पूर्व ।
33 पूर्वाभाद्रपद - शुक्र । अजेकपात । भूमि । शुद्र । उभय । उत्तर पूर्व।

मीन - शुक्र । पुषा । भूमि। विप्र। उभय/ स्त्री। उत्तर पूर्व  (ईशान) ।
34 पूर्वाभाद्रपद - शुक्र । अजेकपात । भूमि । शुद्र । उभय । उत्तर पूर्व।
35 उत्तराभाद्रपद - शुक्र ।  अहिर्बुधन्य । भूमि । शुद्र । उभय । पूर्वोत्तर ।
36 रेवती - ब्रहस्पति । पूषा । आकाश । ब्राह्मण । पुरुष । उत्तर पूर्व।

--------------------------------------------------------------------

नक्षत्रों के देवताओं के आधार पर राशियों के स्वामी ग्रह, आदित्य/ देवता, तत्व, वर्ण, लिङ्ग, दिशा आदि।

क्रमांक - राशि ।स्वामी । आदित्य। तत्व । वर्ण । लिङ्ग । दिशा।

1 मेष - शनि। अर्यमा । वायु । वैश्य/ शुद्र। पुरुष । दक्षिण।

2 वृष - ब्रहस्पति । धातृ । क्षत्रिय । वायु । पुरुष ।  उत्तर पश्चिम ।

3 मिथुन- शुक्र । विवस्वान ।  जल । शुद्र । स्त्री । पूर्वोत्तर।

कर्क -  ब्रहस्पति । अंशु । आकाश । विप्र ।  पुरुष / उभय। पाताल 
/ उत्तर ।

5 सिंह- मङ्गल । भग । अग्नि । क्षत्रिय । उभय ।पुर्व दक्षिण (आग्नैय) ।

6 कन्या - सूर्य । सवितृ । आकाश ।  क्षत्रिय । पुरुष । मध्य ।

7 तुला - बुध । त्वष्टा । वायु । विप्र । पुरुष । वायव्य (उत्तरपूर्व) ।

8 वृश्चिक - चन्द्रमा । वरुण । जल । क्षत्रिय । पुरुष । पश्चिमोत्तर ।

9 धनु - युरेनस । मित्र । जल । शुद्र ।  उभय / स्त्री। दक्षिण पश्चिम (नैऋत्य)।

10  मकर - सूर्य । विष्णु । आकाश । ब्राह्मण । पुरुष । आकाश/ पाताल ।

11 कुम्भ - नेपच्युन् । इन्द्र ।  अग्नि  (वायु )। क्षत्रिय । पुरुष । पूर्व ।

12 मीन - शुक्र । पुषा । भूमि। विप्र। उभय/ स्त्री। उत्तर पूर्व  (ईशान) ।