गुरुवार, 19 नवंबर 2020

दान देने के नियम।

दान देनें के नियम।

दान देनें के लिये सुयोग्य पात्र मिलनें पर दानगृहिता द्वारा दान गृहण करनें की स्वीकृति प्रदान करनें पर दानगृहिता का आभार मानना चाहिए
जिन्हे दान गृहण करनें हेतु निवेदन करने, निमन्त्रण देनें और आमन्त्रित करनें जा रहे हैं वे , या बलिवैश्वदेव कर्म के समय बिना बुलाये अचानक उपस्थित अतिथि और याचक जिसकी प्रार्थना या यााचना पर दान देनें जा रहे हैं इन तीनों की जाँच परख करना अत्यावश्क है।

दान देने के पूर्व यह निश्चित करलें कि, दान गृहिता निर्व्यसनी, अहिंसक, सत्यवादी, सदाचारी, निर्लोभ, अपरिग्रही (अकारण संग्रह न करने वाला न हो), ब्रह्म की ओर चलनेवाला ब्रह्मचारी, स्वच्छ, पवित्र, शुद्ध अन्तःकरण वाला, प्राप्ति में सन्तुष्ट, विद्यध्ययन , दान देनें, परमार्थ कर्म और सेवा करने यानी यज्ञ करने में, ईश्वर भक्ति करनें में सदा असन्तूष्ट हो। स्वधर्म पालन में आनेवाली बाधाओं का सक्षमता पुर्वक सामना कर निवारण करनें में होनें वाले कष्टों को सहर्ष सहन करनें वाला तपस्वी, सत्शास्त्राध्ययन, मनन, चिन्तन और अनुशिलन करनें वाला योगाभ्यासी, और परमात्मा में एकनिष्ठ समर्पित हो ऐसा व्यक्ति सर्वश्रेष्ठ दान देनें के लिए सुपात्र होता है।

1- दानगृहिता का आभार मानना चाहिए ।क्योंकि दानगृहिता नें  हमे इस योग्य माना कि, वे दान गृहण करें/ हमसे दान स्वीकार करलें। इस प्रकार उननें हमारा सम्मान किया है।

2 - नियमानुसार दानदाता को दानगृहिता के पास स्वयम् जाना चाहिए। यदि उन्हे घर बुलाकर दान देना चाहे तो उन्हें पहले सादर निमन्त्रित करें, फिर मार्गव्यय और उनके समय की क्षतिपूर्ति पहले ही करके आमन्त्रित करना चाहिए। दानगृहण करने पर आभार प्रदर्शन कर उनके द्वारा दान गृहण क्रिय और कर्म के लिये पारिश्रमिक स्वरूप योग्य दक्षिणा देना चाहिए।

3 - यदि वे बिना बुलाये अतिथि स्वरूप उपस्थित होगये हों तो बिन्दु 2 में उल्लेखित भार अधिक मानकर सवाया दान दक्षिणा देना चाहिए।

4 - आमन्त्रित और अतिथि दोनों को घर के बाहर दस कदम छोड़नें जाना और चरण वन्दन और पुनः आभार प्रदर्शन कर बिदा करना चाहिए।
5 सन्तुष्ट होनें पर ही दान गृहिता आपको शुद्ध अन्तःकरण से शुभाशीष प्रदान करेंगे।

सज्जन और दुर्जन की परीक्षा का एक आसान उपाय श्लेष अलंकार में बतलाया गया है।
मंगत देखत देत पट। 
यहाँ पट शब्द के दो अर्थ हैं प्रथम (धारण किये हुए) वस्त्र और द्वितीय (घर के) द्वार
सज्जन वह जो याचक को देखकर अपने पहने हुए वस्त्र (पट) तक उतार कर दे दे। और
दुर्जन वह जो याचक / भिक्षुक को देखकर  घर के पट (द्वार) बन्द करदे।

तुलसीदास जी और रहीम का निम्नांकित संवाद स्मरणीय है।⤵️

ऐसी देनी देन जू - कित सीखे हो सैन।
  ज्यों-ज्यों कर ऊँचे करो, त्यों-त्यों नीचे नैन॥
                          #तुलसीदास

 देनहार कोई और है, देवत है दिन रैन।
 लोग भरम हम पर करें, याते नीचे नैन॥
                              #रहीम

अर्थ
हम कहाँ किसी को कुछ देते हैं। देने वाला तो दूसरा ही है, जो दिन-रात भेजता रहता है इन हाथों से दिलाने के लिए। लोगों को व्यर्थ ही भरम हो गया है कि रहीम दान देता है। मेरे नेत्र इसलिए नीचे को झुके रहते हैं कि माँगने वाले को यह भान न हो कि उसे कौन दे रहा है, और दान लेकर उसे दीनता का अहसास न हो।

पहले भगवान/ ईश्वर हमें धन,धान्य, सम्पदा, सामर्थ्य और सहृदयता का भाव देता है, तभी तो हम किसी को कुछ दे पाते हैं, किसी की कुछ सहायता कर पाते हैं। तो इसमें हमारा महत्व कुछ भी नही है। यह तो ईश्वरीय कृपा है जो उसनें हमें माध्यम बनाया।
अतः देनें वाला /कर्ता यह भ्रम कभी न पाले कि, मैं दे रहा हूँ या मैं मैं कर रहा हूँ।

दान, दक्षिणा, सहायता और भिक्षा में अन्तर।
ये सभी कर्तव्य है।

१ आय का १०% दान और उसपर दान ग्रहिता द्वारा दान प्राप्त करने हेतु किये गए श्रम के लिए उपयुक्त दक्षिणा देना नित्य कर्म है। क्योंकि, दान ग्रहिता दान लेकर आप पर उपकार करता है।
दान किसी व्यक्ति या संस्था या दोनों को दिया जाता है।

२ अबला, बालक, वृद्ध,  असहाय, रुग्ण, अपङ्ग, दरीद्र, दुःखी की बिना माँगे/ अयाचित करुणार्द्र होकर की गई सहायता दान नही कहलाता।  क्योंकि इसमें कोई दक्षिणा का प्रावधान नही है। यह सहायता कहलाती है। शरण देना भी इसी श्रेणी में आता है। इसका कोई निर्धारित समय नही हो सकता। ये अवसर मिलने पर ईश्वरीय कृपा समझना चाहिए।

३ उक्त कथित ये लोग ही यदि  याचक बनकर माँगे तब, इनको दी गई वस्तु भिक्षा कहलाती है। इसमें भी कोई दक्षिणा नही दी जाती। इसका समय भी निश्चित नही है। उनने आपको योग्य समझा यह उनकी कृपा है।

४ किसी कर्मकाण्ड की क्रिया करवानें के उपरान्त दी गई दक्षिण (फीस) भी दान नही है, बल्कि श्रम मुल्य है। जैसे ट्युटर, डॉक्टर, इञ्जिनयर, कारीगर आदि को फीस दी जाती है।

सारांश 
1 सदाचारी, 2 निर्वव्यसनी 3 जरूरतमन्द को 4 उसकी आवश्यकता की वस्तु 5 उसी समय  देना ही दान कहलाता है।
याचक हो या न हो यदि ऐसे व्यक्ति की आवश्यकताओं और विवशता की जानकारी मिलते ही उसकी आवश्यकता पूर्ति करना कर्तव्य है। लेकिन अपनी आय और सम्पत्ति का दस प्रतिशत से अधिक दान करना हो तो जनसहयोग लेना चाहिए।

 दानग्रहिता के श्रम और समय की क्षतिपूर्ति हेतु दान वस्तु के मुल्य का दस प्रतिशत दक्षिणा भी देना आवश्यक है।

बुधवार, 18 नवंबर 2020

सिद्धान्त ज्योतिष की सायन गणना - निरयन गणना,नाक्षत्रीय गणना, सायन सौर संस्कृत चान्द्र गणना, निरयन सौर संस्कृत चान्द्र गणना, और शुद्ध चान्द्र गणना सभी का महत्व है।

सायन सौर गणना आधारित वेदिक संवत्सर,वेदिक वर्ष या वेदिक अयन (जिसे पौराणिक गोल कहते हैं।) ,वेदिक तोयन (जिसे पौराणिक अयन कहते हैं।),वेदिक ऋतु, वेदिक मास - और उनके गतांश और गते, तथा सुर्योदयास्त, चन्द्रोदयास्त , ग्रहों के दर्शन - अदर्शन  इसे भी उदय अस्त ही लिखा जाता है।अगस्तादि तारों का उदय - अस्त, तारों और ग्रहों के लोप -दर्शन, ग्रहण, होराशास्त्र के दशमभाव और लग्नादि की गणना सायन बिना नही हो सकती।
किसी योगतारा का  सायन भोगांश और निरयन भोगांश दोनों उल्लेख करनें पर भविष्य में इतिहास लेखकों को समय निर्धारण आसान होगा। 
ऐसे ही थोड़े से अभ्यास से सुर्योदय के पहलें  पूर्व में लुप्त होनें के पहले और पश्चिम में क्षितिज के नीचे भूमि की आड़ में छुपनें को तैयार किसी तारों को देखकर और और सुर्यास्त के बाद पूर्व में उदय होनेंवाले तारों और पश्चिम में ठीक क्षितिज पर के तारों को देखकर निरयन मास और संक्रान्ति गतांश और गते  अर्थात संक्रान्ति गत दिवस बतलाये जा सकते हैं। ग्रामीण किसान पहले यह आसानी से समझलेते थे।
चन्द्रमा की कला और कटा हुआ  भाग पु्र्व और पश्चिम की और देखकर पक्ष का ज्ञान हो सकता है जबकि चन्द्रमा का आकार / कला देखकर तिथि का अनुमान किया जा सकता है। अतः चान्द्र गणना का भी अपना महत्व है।
हमारे सौर मण्डल का सुर्य मार्तण्ड भी गेलेक्सी के केन्द्र की परिक्रमा कर रहा है। ऐसे ही नक्षत्रमण्डल में कोई भी तारा अचल नही है।  केन्द्र से दूरी के अनुसार सभी तारों की गति भी अलग अलग होती है। अतः
आकाश का नक्षा या दृष्य कभी एकसा नही रहता। जैसे कुछ दिनों और महिनों में तारों के सापेक्ष मे ग्रहों का स्थान बदलता बदलता रहता है। ठीक वैसे ही नक्षत्र मण्डल के और अन्य सभी तारे भी परस्पर / सापेक्ष अपना स्थान बदलते रहते हैं। इनके लिये  बिन्दू रूप में ऐसा कोई नही खोजा जा सका जिसे आधार माना जा सके। समझनें के लिये भूमिवासी अपनें स्थान के ख स्वस्तिक (मेरेडियन कॉईल) के आधार पर ही तारासमुहों से निर्मित आकृतियों का सहारा लेते हैं। जिन्हे राशि नाम दे दिया गया। किन्तु,
न सायन राशियाँ अपनें पुरानें आकार में बची है  भारतीय नक्षत्रों की आकृति और स्थान वैसे ही पुर्ववत नही रहे। और भविष्य में और बदल जायेंगे। एन्ट्रापी प्रभाव पूर्ण जगत में दिखता है। 
तारे परस्पर भी और अपनें केन्द्र से दूर होते जा रहे हैं। गेलेक्सी भी अपनें केन्द्र से और एक दुसरे से दूर होती जा रही है। इस क्रम में कभी कभार परस्पर टकराव भी होता है। अतः आकाश की एकरूपता सम्भव ही नही है।
सभी आकाशीय पिण्डों का परिक्रमा मार्ग दीर्घवृत्ताकार है इसकारण मन्दोच्च शिघ्रोच्च का उल्लेख भी महत्वपूर्ण है। क्योकि मन्दोच और शिघ्रोच्च की भी चलनशिलता /  गति होती है। व्यतिपात वैधृतिपात  में भी चन्द्र नक्षत्रों के बीच चलनशिलता / गति है। इनका उल्लेख भी इतिहास काल गणना में सहायक होता है।
अतः इस / उक्त आधार पर सायध गणना और निरयन गणना का औचित्य निर्धारण और एक को सही और दुसरे को गलत ठहराया जाना सम्भव नही है।
 सायन गणना का अपना उपयोग है, निरयन गणना का अपना उपयोग है।कोई किसी को प्रस्थापित नही कर सकता।
निष्कर्ष य  की सबका अपना - महत्व है। किन्तु जहाँ जिसकी आवश्यकता हो वहाँ उसीका उपयोग करना चाहिए।

शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

मुर्तिपूजा उचित है या अनुचित ?, मुर्तिपूजा से क्या हानि है?

मुर्तिपूजा के पक्ष - विपक्ष में तर्क।

जो व्यक्ति जिस भाव से जिस विधि से जिस आस्था - विश्वास से परमात्मा के जिस स्वरूप में श्रद्धा पुर्वक जिस किसी देवता की आराधना उपासना करता है,  उस व्यक्ति की उसी परमात्मा के उसी स्वरूप में, उसी देवता में, उसी विधि विधान में, वैसी ही आस्था - विश्वास और भावना दृढ़ हो जाती हैं।
प्रकारान्तर से यही बात श्रीमदभगवदगीता 04/11 एवम् 12 तथा 09/22 एवम् 23  में भी कही है।

वेदों में ईशावास्यमिदम् सर्वम यत्किञ्च जगत्याम् जगत कहकर सर्वखल्विदम् ब्रह्म की घोषणा की है। परमात्मा ही इस जगत इस सृष्टि का निमित्तोपादन कारण कहा है। प्रज्ञानम् ब्रह्म, अयमात्माब्रह्म (अयम्आत्मा ब्रह्म) , तत्वमसि (तत् त्वम् असि) और अहम्ब्रह्मास्मि (अहम् ब्रह्म अस्मि) कहकर जीवन्मात्र का भी परमात्मा से अभेद प्रतिपादित किया है। 
जब परमात्मा को छोड़ कर अन्य कुछ है ही नही तो कौन पूज्य और कौन पूजारी? क्या मूल और क्या प्रतिमा? सबकुछ वही (परमात्मा) ही तो है। उसके (परमात्मा के) सिवा कुछ है ही नही।
यजुर्वेद अध्याय 32 मन्त्र 3 में न तस्य प्रतिमा अस्ति कहकर परमात्मा की प्रतिमा की कल्पना को ही स्पष्ट नकार दिया है।
तान्त्रिक लोगों द्वारा शिष्ण और योनि को जगत्कारण बतला कर शिष्ण और योनि को लिङ्ग (पहचान चिह्न) के रूप में की जानें वाली प्रतिमा पूजन के कारण उन्हें शिश्णेदेवाः कहकर उनके कृत्य  को  दोषपूर्ण निषिद्ध कर्म बतला कर  स्पष्ट कहा है कि,यज्ञकरते समय  लिङ्गपूजकों की छाँया भी यज्ञ में पड़़ जाये तो  यज्ञ बन्द कर स्नानादि से शुद्ध हो पुनः यज्ञ आरम्भ करें।

वेदों में मुर्तिपूजा निषेध होनें का कारण यह है कि, 
1 सर्वव्यापी को सिमित बतलाना, 
2 वैष्णवों के मत में मुर्ति के सामने या मन्दिर में सुरापान, हिन्सा और अश्लीलता निशेध बतला कर अप्रत्क्ष रूप से ऐसे दुष्कर्मों को अन्यत्र करने की छूट देदी गई।
3 उसमें भी विशेषता यह कि, तान्त्रिकों द्वारा तो पञ्चमकार (मुद्रा,मदिरा सेवन कर, मत्स्य, मान्स खाकर, माता, बहन, बैटी, पुत्रवधु आदि को भैरवी बनाकर उसे भी मदिरा सेवन करवा कर मत्स्य - मान्स खिलाकर अश्लील मुद्राएँ दिखाकर उनके  साथ मैथून कर उसी अपवित्र अवस्था में) में ही लिङ्ग (योनि में समाये हूए शिश्ण की प्रतिमा) की पूजन की जाती है। (देखिये पाण्डुरङ्ग वामन काणे रचित धर्मशास्त्र का  इतिहास पञ्चम भाग / अध्याय 26)।
4 विधर्मी आक्रान्ताओं द्वारा मुर्ति भञ्जन से अश्रद्धा, अनास्था उत्पन्न होना। और आक्रांताओं का पन्थ ग्रहण करना।
5 सनातन वेदिक धर्म में ही मुर्ति, पूजन विधि आदि के आधार पर सेकड़ों पन्थ/ सम्प्रदाय बनगये और बन रहे हैं।
अतः मुर्तिपूजन गलत तो है ही।

भारत में प्रतिमा पूजन का इतिहास।
तान्त्रिकों द्वारा लिङ्ग अर्थात शिष्ण और योनि, एवम् योगीराज और योगिनी , शंकर और मात्रका की मुर्तियों/ प्रतिमाओं की पूजा और शत्रु का पुतला बना कर उसे प्रताड़ित करनें की प्रथा तन्त्र के आरम्भ अर्थात वेदिक काल के उत्तरार्ध से ही त्वष्टापुत्र विश्वरूप, शंकर -पार्वती, शुक्राचार्य और उनके पुत्र त्वष्टा ने कर दी थी। जिसे बादमें अत्रिपुत्र दत्तात्रय और उनके शिष्य कार्तवीर्य सहस्त्रार्जून एवम् रावण ने बढ़ाया। फिर जैनों और बौद्धों ने इसका अति विकास किया। अन्त में गिरनार पर्वत और आबु शिखर पर एक मुखी दत्तात्रेय ने नाथ सम्प्रदाय में नेपाल के मत्स्येंद्रनाथ और  गोरखनाथ, जालन्धर नाथ आदि उनके आठ शिष्यों के माध्यम से बहुत व्यापक प्रचारित कर दिया।
उनकी प्रतिस्पर्धा में नागा सम्प्रदाय नें भी अपने अपने मठों में अपने आराध्य की प्रतिमा और प्रतीक रखकर पूजना प्रारम्भ कर दिया। नागाओं के मठों में देवी देवताओं की सात्विक मुर्तियाँ लोक लुभावन रही।
फिर भी मुर्तिपूजा के इतिहास पर दृष्टिपात करें तो पता चलता है कि, भारत भूमि में ईस्वी सन की सातवीँ - आठवीँ सदी के पहले वैष्णव और सौर सम्प्रदायों की प्रतिमाएँ नही मिलती।
लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व जैन सम्प्रदाय नें तिर्थंकरों और यक्षों की प्रतिमाएँ गड़ना और पूजना आरम्भ की। जिसमें तान्त्रिकों का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है।
बाद में बौद्धों नें गोतम बुद्ध की पूजा हेतु विशिष्ट प्रकार का लिङ्ग (प्रतीक चिह्न) बनाकर पूजा आरम्भ की। 
दोनों सम्प्रदायों में चैत्यालय बनानें की होड़ लग गई जो, जैनों में आजतक जारी है।
फिर सनातन धर्म में शैवों ने शिवलिङ्ग ( प्रतीक चिह्न) की पूजा आरम्भ हुई। इसमें तान्त्रिकों के लिङ्ग यानी शिश्ण - योनि का सभ्यस्वरूप निर्धारित किया गया।
विनायक गजानन की प्रतिमा निर्माण पश्चिम एशिया से सीखकर गजानन विनायक की मुर्तियाँ बनने लगी। यह प्रतिमा बनाना सबसे आसान माना जाता है।
सातवीँ सदी के अन्त में और आठवीँ सदी के अन्त में मुर्तिकला का विकास होनें के साथ ही वैष्णव और सौर प्रतिमाएँ बनने लगी।
 साथ ही काली, दुर्गा आदि की मुर्तियाँ बनने लगी।
मानवी स्वरूप की प्रतिमा निर्माण कठिन है। इस कला में युनानी विशेषज्ञ थे।अतः सिकन्दर आक्रमण के पश्चात युनानी सम्पर्क से वैष्णव, सौर शैव शाक्तों नें मानवीय स्वरूप गड़ना आरम्भ किया। और मुर्तिपूजा सम्पूर्ण जोर शोर से सनातन धर्म में भी आरम्भ होगई।

अब मुर्तिपूजकों के पक्ष में तर्कों पर भी विचार किया जाये --

1 ,हरियाणा के ऋषिदेश और पञ्जाब, कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, सिन्ध, राजस्थान, गुजरात, उत्तरी मध्य प्रदेश, उत्तर पश्चिमी महाराष्ट्र, पश्चिमी उत्तरप्रदेश, अफगानिस्तान, और पूर्वी ईरान तक बसे पञ्चमहायज्ञों के माध्यम से प्रकृति की सेवा करनें वाले मूल वेदिक धर्मी प्रजापतियों की सन्तानों और स्वायम्भुव मनु के वंशज मनुर्भरतों के देश वासियों का सम्पर्क; (तिब्बत कश्मीर में आकर बसे कश्यप की सन्तान) द्वादश आदित्यों में से एक विवस्वान की सन्तान सुर्य वंशियों से और  ( मृगशीर्ष नक्षत्र / ओरायन में स्थित सोमलोकपति) सोम के उपासक (चन्द्रमा- तारा के पुत्र बुध की पत्नी ईला जो वैवस्वत मनु की सन्तान थी के पुत्र) पुरुरवा (की पत्नी उर शहर में जन्मी इन्द्र के दरबार की नर्तकी अप्सरा उर्वशी) के पुत्र आयु के वंशज चन्द्रवंशियों से हुआ जो दक्षिण पूर्व टर्की से भारत में कश्मीर तरफ आये थे और सिरिया से आये नागवंशियों तथा पश्चिमी तुर्कीस्तान, तुर्कमेनिस्तान, तजाकिस्तान, कजाकिस्तान की ओर से आये आग्नेयों के बीच जब परस्पर संयोग हुआ तो; ऐसे सम्पर्कों सें सांस्कृतिक घालमेल होनें से वेदिक धर्म में पर्वतों, नदियों, सागर, कूप - तड़ाग (तालाब), पेड़-पौधों, वक्षोंं की पूजा आरम्भ हूई।
2 जब हम उक्त प्रकार से पूर्ण प्रकृति में ही परमात्म भाव रखते हुए प्रकृति पूजन कर सकते हैं तो उसी प्रकृति से निर्मित प्रतिमा में परमात्मा का भाव क्यों नही रख सकते?
3 मुर्तिपूजा में मुर्तिपूजक जीते जागते लीलामय अपनें ईष्ट को ही देखते हैं किसी पाषाणादि में निर्मित किसी प्रतिमा की।

इन तर्कों को भी एकदम नकारना भी सम्भव नही है। अतः मुर्तिपूजा में केवल दोष दर्शन भी तो अनुचित ही है।

निष्कर्ष

जब हम विवशता में नाग - असुर, यक्ष - राक्षसों ,दैत्य- दानवों के आराधकों उपासकों को सह सकते हैं तो देवों - देवताओं को ईष्ट मानकर उनकी मुर्ति बनाकर पूजनें वालों को क्यों नहीँ सह सकते।

शनिवार, 19 सितंबर 2020

विक्रमादित्य, विक्रम संवत और गुप्त संवत

विक्रम संवत और गुप्त संवत
महाराज नाबोवाहन ने पञ्जाब- हरियाणा के मालव प्रान्त से आकर (भोपाल के निकट सोनकच्छ से लगभग २० कि.मी. दर) गंधर्वपुरी को राजधानी बनाया था। बाद में नाबोवाहन के पुत्र गन्धर्वसेन गन्धर्वपुरी के राजा हुए। जिन्हें महेन्द्रादित्य भी कहा जाता था। उनकी पत्नी सोम्यदर्शना थी जिनका अन्य नाम वीरमती था।
भृतहरि और विक्रमादित्य के पिता गन्धर्व पूरी के शासक  गन्धर्वसेन कट्टर वेदिक धर्मावलम्बी और विष्णु भक्त थे। इस कारण जैन आचार्य महेसरा सूरी उनसे रुष्ट थे। जैन आचार्य महेसरा सूरी/ कालक आचार्य ने अफगानिस्तान तक पैदल जाकर शक राजा/ कुषाण क्षत्रप के दरबार में गंधर्वसेन के विरुद्ध गुहार लगाई तथा उज्जैन पर आक्रमण हेतु आमन्त्रित किया। शक शासक/ कुषाण क्षत्रप ने महाराज गन्धर्वसेन पर अनेक अत्याचार किये परिणाम स्वरूप गंधर्वसेन की मृत्यु जंगल में होगई। जैन ग्रन्थों में गन्धर्वसेन को गर्दभिल्ल, गदर्भ भिल्ल, गदर्भ वेश भी कहा गया है।
जैनाचार्य ने अफगानिस्तान तक पैदल यात्रा कर गन्धर्व पूरी के राजा गन्धर्व सेन पर आक्रमण करनें के लिए शकराज को आमन्त्रित किया। गन्धर्व सेन के पुत्र भृतहरि की पत्नी को पर भ्रष्टकर भृतहरि को नाथ सम्प्रदाय में सम्मिलित करने की कुटिल चाल तान्त्रिकों ने चली। बौद्धाचार्यों वें चन्द्रगुप्त द्वितीय के भाई रामगुप्त के विरुद्ध चीन के शकराज को समर्थन दिया और समझोते में रामगुप्त की पत्नी ध्रुव स्वामिनी को शकराज के हवाले करनें का दुष्ट समझोता करवाया। जिसे चन्द्रगुप्त (द्वितीय) ने असफल कर शकराज का वध किया।
इस प्रकार वास्तविक विक्रमादित्य और चन्द्रगुप्त द्वितीय में अन्तर स्पष्ट करनें के बाद मूल विषय पर आते हैं।
अवन्तिका अर्थात उज्जैन के चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने ई.पू. 58 में निरयन मेष संक्रान्ति से विक्रम संवत चलाया था। कुछ स्थानों पर इसे मालव संवत के नाम से भी उल्लेख किया गया है।
निरयन मेष संक्रान्ति वर्तमान में प्रायः 14 अप्रेल को पड़ती है। हर 71 वर्ष में निरमन वर्ष का आरम्भ सायन वर्ष की एक दिन बाद के दिनांक से आरम्भ होता है।
ग्रेगोरियन केलेण्डर सायन वर्ष पर आधारित है अतः हमारे सामनें ही निरयन मेष संक्रान्ति 13 अप्रेल के स्थान पर 14 अप्रेल को पड़ने लगी है।
पञ्जाब, हरियाणा, दिल्ली, जम्मु, हिमाचल प्रदेश, उड़िसा, बङ्गाल, तमिलनाड़ु,और केरल में निरयन सौर वर्ष आज भी प्रचलित है। किन्तु निरयन सौर वर्ष के साथ विक्रम संवत वर्तमान में केवल पञ्जाब में ही प्रचलित रह गया है।
हिन्दीभाषी क्षेत्रों में  निरयन सौर वर्ष से  संस्कारित चान्द्र वर्ष  शक संवत के आरम्भ दिवस यानि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से विक्रम संवत का आरम्भ होता है। जबकि गुजरात में दिवाली के दुसरे दिन अर्थात उक्त शक संवत के कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से विक्रम संवत का आरम्भ होता है।
विक्रमादित्य कौन थे इसे जानने के लिए वेबदुनिया की लिंक प्रस्तुत है। कृपया अवश्य देखें।

https://m-hindi.webdunia.com/indian-history-and-culture/emperor-vikramaditya-117121300044_1.html?amp=1

गुप्त संवत का आरम्भ चन्द्रगुप्त प्रथम ने गुप्त प्रकाल नाम से 319 ई. में किया था। किन्तु यह वर्तमान में अप्रचलित है। किन्तु गुप्तकालीन दस्तावेजों में गुप्त प्रकाल का उल्लेख मिलता है।
कुछ लोग चन्द्रगुप्त द्वितीय को विक्रमादित्य समझने की भूल करते हैं।
चन्द्रगुप्त प्रथम को जानने के लिए गुप्तवंश का इतिहास विकिपीडिया पर देखने का कष्ट करें। लिंक प्रस्तुत है।

https://hi.m.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%B6
इसके अतिरिक्त हिन्दी क्वोरा पर दिनांक 21 मार्च 2020 को  शक संवत का प्रारम्भ कब किया गया था प्रश्न पर मेरा उत्तर भी पढ़ने का कष्ट करें। 






शक संवत का प्रारंभ कब किया गया था?

शक संवत का प्रारंभ कब किया गया था?
भारत में वेदिक काल में संवत्सरारम्भ वसन्त विषुव से होता था। जिस दिन सुर्य भुमध्य रेखा पर आकर उत्तरीगोलार्ध में प्रवेश करता है, पुरे विश्व में दिन रात बराबर होते हैं, उत्तरीध्रुव पर सुर्योदय और दक्षिणी ध्रुव पर सुर्यास्त होता है, सुर्योदय के समय सुर्य ठीक पुर्व में उदय होता है और सुर्यास्त के समय सुर्य ठीक पश्चिम में अस्त होता है उस दिन को वसन्त विषुव कहते हैं। तीनसौ साठ दिन के सावन वर्ष में अन्तिम पाँच/ छः दिन यज्ञ होता था तथा पाँच वर्ष उपरान्त पुरे माह यज्ञसत्र चला कर वसन्त विषुव से संवत्सरारम्भ करते थे।

महाभारत काल के ज्योतिष के अनुसार हर अट्ठावन माह पश्चात दो माह अधिक मास मान कर इकसठवें माह को नियमित मास माना जाता था। यह गणना कठिन थी जिसे भीष्म पितामह द्वारा समझाने पर भी दुर्योधन भी नही समझ पाया था।

आकाश की मध्य रेखा विषुववृत (Meridian) पर उत्तर की ओर जहाँ भूमि का परिभ्रमण मार्ग क्रान्तिवृत्त क्रास करता है उसे वसन्त सम्पात अर्थात सायन मेषादि बिन्दु कहते हैं। इसी बिन्दु पर भूमि के केन्द्र से सुर्य का केन्द्र दिखने को महा विषुव या वसन्त विषुव कहते हैं। यही समय वेदिक संवत्सरारम्भ का है। इस गणना का लाभ यह है कि यह ऋतु चक्र के बिल्कुल अनुकुल होने से इसके मास और मासांश दिवसों को ऋतु ठीक ठीक बैठती है। दिनमान रात्रिमान , सुर्योदयास्त समय प्रति वर्ष ठीक ठीक समान समय पर ही आवृत्ति होती है।

 20 मार्च 2020 शुक्रवार को पुर्वाह्न 09:20 बजे वसन्त विषुव हुआ। इस समय सुर्य का सायन मेष संक्रमण हुआ। अर्थात वेदिक नव संवत्सर आरम्भ हुआ। कल्प संवत्सरारम्भ, सृष्टि संवत्सरारम्भ, और कलियुग संवत्सरारम्भ इसी दिन को माना जाना चाहिए।

महर्षि विश्वामित्र जी ने नवीन गणना प्रणाली का सुत्रपात किया जिसे नाक्षत्रीय गणना कहा जाता है। जब सुर्य के केन्द्र भू केन्द्र और चित्रा नक्षत्र के योग तारा (Spica Virginia) का केन्द्र एक रेखा में हो तब सुर्य अश्विनी नक्षत्र में प्रवेश करता है जिसे निरयन मेष संक्रान्ति कहते हैं। इस गणना का लाभ यह है कि, चलते रास्ते भी चन्द्रमा, और ग्रहों के नक्षत्रचार देखे जा सकते हैं। कौनसा ग्रह किस निरयन राशि और किस नक्षत्र पर है किसान भी बतला देते हैं। वर्तमान में निरयन मेष संक्रान्ति 13/14 अप्रेल को पड़ती है। इसी दिन वैशाखी मनाई जाती है।इस दिन से निरयन संवत्सरारम्भ माने जाना लगा।

इस वर्ष 13 अप्रेल 2020 सोमवार को 20:23 बजे (अपराह्न 08:23 बजे रात में) निरयन मेष संक्रान्ति से कल्पारम्भ गताब्ध संवत 1,97,29,49,121 का आरम्भ होगा , सृष्टिगताब्ध संवत 1,95,58,85,121 का आरम्भ होगा। एवम् युधिष्ठिर संवत तथा कलियुग संवत 5158 का आरम्भ होगा। पञ्जाब हरियाणा उड़िसा, दिल्ली में विक्रम संवत 2077 का आरम्भ मनाया जायेगा। पञ्जाब का मालव संवत भी इसीदिन आरम्भ होता है।

शक और कुषाण तिब्बत में तिब्बत के तरीम बेसिन और टकला मकान क्षेत्र में (उत्तर कुरु/ ब्रह्मावर्त) शिंजियांग उइगुर प्रान्त (चीनी तुर्किस्तान) के मूल निवासी थे।
मध्य चीन के तुर्फन के आसपास युएझी प्रान्त के निवासी युएझी कहलाते थे। वे लोग विजेता के रुप में पहले पश्चिम में ईली नदी पर पहूँच कर अकसास नदी की घाँटी घाँटी पामिर पठार की ओर फिर दक्षिण में हिन्दूकुश पर्वत, ईरान, अफगानिस्तान होते हुए सिन्ध में तक्षशिला,पञ्जाब होते हुए मथुरा तक पहूँच गये। गुर्जरों के कषाणा वंश या कसाणा कबीले को आत्मसात कर कोसोनो कहलाते थे तथा गुसुर कबिले के समान थे। भारत में कुषाण कहलाये । इनने पहले ग्रीक भाषा, फिर बेक्ट्रियाई भाषा और अन्त में पुरानी गुर्जर गांन्धारी और फिर संस्कृत भाषा अपनाई। तथा भारत में गुर्जर के रुप में भी प्रसिद्ध हुए।

इसी कुषाण वंश का सबसे प्रसिद्ध राजा कनिष्क हुआ। जिसका जन्म गान्धार प्रान्त के पुरुषपुर (पेशावर) में (वर्तमान पाकिस्तान) में 98 ई.पू. में हुआ।  इसकी राजधानी पेशावर थी एवम् उप राजधानी कपिशा (अफगानिस्तान) और मथुरा उ.प्र. भारत) को बनाया। तथा मथुरा से अफगानिस्तान, दक्षिणी उज़्बेकिस्तान , ताजिकिस्तान से लेकर मध्यचीन के तुर्फन तक फैला था। जन्मसे यह सनातन धर्मी था किन्तु बाद में बौद्ध धर्म अपना लिया। अफगानिस्तान तथा चीन में महायान बौद्धधर्म फैलाने में विशेष योगदान दिया।

चीन में प्रचलित उन्नीस वर्षिय चक्र वाला सायन सौर संस्कारित चान्द्र केलेण्डर कुषाणों में प्रचलित था। इसी का भारतीय स्वरुप उन्नीस वर्ष, एकसौ बाईस वर्ष और एक सौ एकतीस वर्षिय चक्र वाला निरयन सौर संस्कारित चान्द्र केलेण्डर कनिष्क ने ही उत्तर भारत  तथा गुजरात में में चलाया। दक्षिण में महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश के अलावा मध्यप्रदेश, और पुर्वी, दक्षिणी गुजरात में आन्ध्र प्रदेश के सातवाहन या शालिवाहन वंशी गोतमीपुत्र सातकर्णि ने प्रचलित किया। यह संवत उत्तर भारत में मथुरा विजय कर कनिष्क के सत्त्तारूढ़ होने की खुशी में और दक्षिण भारत में पूणे- नासिक क्षेत्र में पेठण में शकों पर शालिवाहन गोतमीपुत्र सातकर्णि की विजयोपलक्ष्य में इस्वी सन 78 में विक्रम संवत 135 में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से लागु किया गया।
नेटपर सर्च करने पर आपको निम्नांकित तथ्य मिलेंगे।
शक संभवतः उत्तरी चीन तथा यूरोप के मध्य स्थित झींगझियांग प्रदेश के निवासी थे। कुषाणों एवं शकों का कबीला एक ही माना जाता है
पश्चिमी चीन के गांसु प्रदेश में जिउक्वान शहर क्षेत्र में  डुहुआंग नगर,  उत्तर अक्षांश 40 ° 08″32"  N और पुर्व देशान्तर  94 ° 39 '43" E  पर स्थित डुहुआंग नगर, (डुनहुआंग नगरपालिका क्षेत्र) को युझी जाती  का मूल स्थानों में से एक माना जाता है। अर्थात कनिष्क आदि  (भारतीय शकों) का मूल स्थानों में से एक माना जाता है।
3 शक प्राचीन मध्य एशिया में रहने वाली स्किथी लोगों की एक जनजाति या जनजातियों का समूह था, जो सीर नदी की घाटी में रहता था
 4 (आर। ५२२-४८६ ईसा पूर्व) के शासनकाल के लिए , कहा जाता है कि शक सोग्डिया की सीमाओं से परे रहते थे। [४४] इसी तरह ज़ेरक्सस I
5 (आर। ४८६-४६५ ईसा पूर्व) के शासनकाल के एक शिलालेख ने उन्हें मध्य एशिया के दहे लोगों के साथ जोड़ा है । 
6 सोग्डियन क्षेत्र आधुनिक उज्बेकिस्तान में समरकंद और बोखरा के आधुनिक प्रांतों के साथ-साथ आधुनिक ताजिकिस्तान के सुगद प्रांत से मेल खाता है
मध्य चीन के तुर्फन के आसपास युएझी प्रान्त के निवासी युएझी कहलाते थे। वे लोग विजेता के रुप में पहले पश्चिम में ईली नदी पर पहूँच कर अकसास नदी की घाँटी घाँटी पामिर पठार की ओर फिर दक्षिण में हिन्दूकुश पर्वत, ईरान, अफगानिस्तान होते हुए सिन्ध में तक्षशिला,पञ्जाब होते हुए मथुरा तक पहूँच गये। गुर्जरों के कषाणा वंश या कसाणा कबीले को आत्मसात कर कोसोनो कहलाते थे तथा गुसुर कबिले के समान थे। भारत में कुषाण कहलाये । इनने पहले ग्रीक भाषा, फिर बेक्ट्रियाई भाषा और अन्त में पुरानी गुर्जर गांन्धारी और फिर संस्कृत भाषा अपनाई। तथा भारत में गुर्जर के रुप में भी प्रसिद्ध हुए।

इसी कुषाण वंश का सबसे प्रसिद्ध राजा कनिष्क हुआ। जिसका जन्म गान्धार प्रान्त के पुरुषपुर (पेशावर) में (वर्तमान पाकिस्तान) में 98 ई.पू. में हुआ।  इसकी राजधानी पेशावर थी एवम् उप राजधानी कपिशा (अफगानिस्तान) और मथुरा उ.प्र. भारत) को बनाया। तथा मथुरा से अफगानिस्तान, दक्षिणी उज़्बेकिस्तान , ताजिकिस्तान से लेकर मध्यचीन के तुर्फन तक फैला था। जन्मसे यह सनातन धर्मी था किन्तु बाद में बौद्ध धर्म अपना लिया। अफगानिस्तान तथा चीन में महायान बौद्धधर्म फैलाने में विशेष योगदान दिया।

चीन में प्रचलित उन्नीस वर्षिय चक्र वाला सायन सौर संस्कारित चान्द्र केलेण्डर कुषाणों में प्रचलित था। इससे मिलता जुलता उन्नीस वर्षीय चक्र मिश्र और मेसापोटामिया में भी प्रचलित था।  इसी का भारतीय स्वरुप उन्नीस वर्ष, एकसौ बाईस वर्ष और एक सौ एकतीस वर्षिय चक्र वाला निरयन सौर संस्कारित चान्द्र केलेण्डर कनिष्क ने ही उत्तर भारत तथा गुजरात में तथा दक्षिण में महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश के अलावा मध्यप्रदेश, और पुर्वी, दक्षिणी गुजरात में सातवाहन या शालिवाहन वंशी गोतमीपुत्र सातकर्णि ने प्रचलित किया। यह संवत उत्तर भारत में कनिष्क के सत्त्तारूढ़ होने की खुशी में और दक्षिण भारत में शकों पर शालिवाहन गोतमीपुत्र सातकर्णि की विजयोपलक्ष्य में इस्वी सन 78 में विक्रम संवत 135 में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से लागु किया गया।


इसके पहले भारत में निरयन सौर मास और चन्द्रमा के नक्षत्र से वृतोत्सव मनाने का प्रचलन था जो दक्षिण भारत मेंअभी भी प्रचलित है। जैसे निरयन सिंह के सुर्य में श्रवण नक्षत्र पर चन्द्रमा हो तो वामनावतार जयन्ति ओणम मनाते हैं। गया में कन्या राशि के सुर्य में कृष्ण पक्ष में श्राद्ध का विशेष महत्व है। बंगाल में भी नवरात्रि में तुला राशि के सुर्य और मूल, पुर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा और श्रवण नक्षत्र के चन्द्रमा में ही देवी आव्हान, स्थापना, पुजन, बलिदान और विसर्जन होता है।

निरयन सौर संस्कृत चान्द्र केलेण्डर के चैत्रादि मास प्रचलित हो चुके थे। किन्तु तब केवल सुर्य चन्द्र ग्रहण और इष्टि के लिये अमावस्या, पुर्णिमा, तथा अर्ध चन्द्र दिवस उपरान्त अष्टका एकाष्टका के लिये अष्टमी तिथियाँ ही मुख्य रुप से प्रचलित थी। एकादशी का प्रचलन चन्द्रवंशी ययाति के समय हुआ। तिथी वार, नक्षत्र , योग और करण युक्त पञ्चाङ्गों का प्रचलन वराहमिहिर के बाद ही हुआ।


शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

विक्रम संवत एवम् शकाब्द

महाराज नाबोवाहन ने कुरुक्षेत्र हरियाणा के मालव प्रान्त से आकर (भोपाल के निकट सोनकच्छ से लगभग २० कि.मी. दर) गंधर्वपुरी को राजधानी बनाया था। बाद में नाबोवाहन के पुत्र गन्धर्वसेन गन्धर्वपुरी के राजा हुए। जिन्हें महेन्द्रादित्य भी कहा जाता था। उनकी पत्नी सोम्यदर्शना थी जिनका अन्य नाम वीरमती था।
भृतहरि और विक्रमादित्य के पिता गन्धर्व पूरी के शासक  गन्धर्वसेन कट्टर वेदिक धर्मावलम्बी और विष्णु भक्त थे। इस कारण जैन आचार्य महेसरा सूरी उर्फ कालकाचार्य उनसे रुष्ट थे। जैन आचार्य महेसरा सूरी/ आचार्य कालक ने अफगानिस्तान तक पैदल जाकर शक राजा/ कुषाण क्षत्रप के दरबार में गंधर्वसेन के विरुद्ध गुहार लगाई तथा उज्जैन पर आक्रमण हेतु आमन्त्रित किया। शक शासक/ कुषाण क्षत्रप ने महाराज गन्धर्वसेन पर अनेक अत्याचार किये परिणाम स्वरूप गंधर्वसेन की मृत्यु जंगल में होगई। ईसापूर्व ५० में प्राकृत भाषा में रचित जैन कल्प सूत्र में कालकाचार्य कथा में इसका उल्लेख है। इस कथा में गन्धर्वसेन को गर्दभिल्ल, गदर्भ भिल्ल, गदर्भ वेश भी कहा गया है।
जैनाचार्य ने अफगानिस्तान तक पैदल यात्रा कर गन्धर्व पूरी के राजा गन्धर्व सेन पर आक्रमण करनें के लिए शकराज को आमन्त्रित किया। गन्धर्व सेन के पुत्र भृतहरि की पत्नी को पर भ्रष्टकर भृतहरि को नाथ सम्प्रदाय में सम्मिलित करने की कुटिल चाल तान्त्रिकों ने चली। बौद्धाचार्यों ने चन्द्रगुप्त द्वितीय के भाई रामगुप्त के विरुद्ध चीन के शकराज को समर्थन दिया और समझोते में रामगुप्त की पत्नी ध्रुव स्वामिनी को शकराज के हवाले करनें का दुष्ट समझोता करवाया। जिसे चन्द्रगुप्त (द्वितीय) ने असफल कर शकराज का वध किया।
इस प्रकार वास्तविक विक्रमादित्य और चन्द्रगुप्त द्वितीय में अन्तर स्पष्ट करनें के बाद मूल विषय पर आते हैं।

सामान्यतः तो पञ्चाङ्गों में दोनो संवत एक साथ लिखे जाते हैं।
निरयन सौर विक्रम संवत लागु होने के मात्र 135 वर्षों बाद ही निरयन सौर संस्कृत चान्द्र गणनात्मक शकाब्ध लागु होगया। उत्तर भारत में शक वंशी कुशाणों ने इसे लागु किया और दक्षिण भारत में सातवाहनों ने इसे लागू किया।

कुशाणों में कनिष्क और सातवाहनों में गोतमीपुत्र सातकर्णि बड़े लोकप्रिय और निरङ्कुश शासक हुए। जनता में इनका प्रभाव बहुत था। बौद्ध शकों के काफी निकट थे और उज्जेन के एक जैनाचार्य अफगानिस्तान से कुशाणों को स्वयम् आमन्त्रित कर भारतीय मुख्य भूमि में लाये थे अतः इन दोनों सम्प्रदायों में शक संवत की गहरी पैठ रही। सातवाहनों को दक्षिण भारतीय ब्राह्मण मानते थे इसलिए दक्षिण भारतीय सनातन धर्मियों में भी यह अधिमान्य होगया। बादमें सातवाहनों के उत्तराधिकारी के रुप में पेशवाओं के नेत्रत्व में मराठा साम्राज्य उत्तर भारत तक फैल गया।

परिणाम स्वरूप निरयन सौर विक्रम संवत के वैशाखी / बैसाखी पर्व मनाने वाले मालव गणों के उत्तरवर्ती पञ्जाब - हरियाणा और हिमाचल प्रदेश तक ही विक्रम संवत के साथ निरयन सौर केलेण्डर सिमट गया। पुर्व में उड़िसा, बङ्गाल, असम, और दक्षिण में तमिलनाड़ु और केरल में निरयन सौर गणनात्मक केलेण्डर प्रचलित रहा किन्तु विक्रम संवत के साथ केवल पञ्जाब हरियाणा तक सीमित रहा।

निरयन सौर विक्रम संवत निरयन मेष संक्रमण से प्रारम्भ होता है। इसका प्रथम माह वैशाख कहलाता है। दिनांक के लिए संक्रान्ति गत दिवस का उपयोग होता है। ज्योतिर्गणना और धर्मशास्त्र में गतांश का प्रयोग होता है। वर्तमान में 13/14 अप्रेल को निरयन सौर मेष संक्रमण होता है। हर इकहत्तर वर्ष में यह अगले दिनांक को होने लगेगी । थोड़े वर्षों में आप 15 अप्रेल को निरयन मेष संक्रमण होते हुए देखेंगे।  अभी निरयन मिथुन राशि के 19°08'25" पर भूमि सुर्य से सर्वाधिक दूर रहती है इस कारण इसके आसपास के 90° -90° तक के माह 31 दिन के होते हैं। मिथुन मास तो 32 दिन तक का हो जाता है और निरयन धनु राशि के 19°08'25" के पर भूमि सुर्य के निकट होने के कारण शेष मास प्रायः 30 दिन के होते हैं। स्वयम् धनुर्मास तो 29 दिन का ही रहता है।

निरयन सौर मेष संक्रमण आधारित चान्द्र वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुड़ीपड़वा) से आरम्भ होता है। इसमें प्रायः तीसरे वर्ष (अट्ठाइस से अड़तीस माह के अन्तराल से) एक अधिक मास होता है और 19 वर्ष, 122 वर्ष और 141 वर्ष के क्रम में एक क्षय मास होता है। जिस वर्ष क्षय मास होता है उसी क्षय मास के आगे पीछे एक एक अधिक मास पड़ता है। इस प्ररकार 282 वर्ष मेंइस  पञ्चाङ्ग की पुनरावरृत्ति होती रहती है।

अमावस्या से अमावस्या तक चान्द्रमास होता है। मा मतलब चन्द्रमा अतः अमा मतलब जिसदिन आकाश में चन्द्रमा न दिखे और पुर्णिमा मतलब जिसदिन  चन्द्रमा पूर्ण दिखे। इस बीच शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष होते हैं। सुर्य और चन्द्रमा में 12° का अन्तर तिथि कहलाता है। सुर्य और चन्द्रमा में 06 ° का अन्तर करण कहलाता है। चित्रा तारे से 180° पर स्थित निरयन मेषादि बिन्दु से आरम्भ कर चन्द्रमां के प्रत्यैक 13°20' एक नक्षत्र कहलाता है। सूर्य के अंशादि और चन्द्रमा के अंशादि के योग का सत्ताइसवाँ भाग योग कहलाता है। दो सुर्योदयों की बीच की अवधि वासर या वार कहलाती है। तिथि,वार, नक्षत्र, योग, करण ये पाँचो मिलकर पञ्चाङ्ग कहलाती है।

इस तिथि पत्रक से व्रत, पर्व उत्सव मनाने का मुख्य आधार मास और पर्वकाल की तिथि है। पर कभी कभी विष्टि करण (भद्रा) को छोड़ कर शेष आधी तिथि में ही व्रत पर्व उत्सव मनाते हैं। तिथि के साथ नक्षत्र के योग का भी धर्मशास्त्रीय महत्व है। कुछ व्रत पर्व उत्सवों में इस योग का भी ध्यान रखा जाता है। कभी कभार शुभ वार भी महत्व रखते हैं। मुहुर्त में पूर्व दिशा में उदय हो रही राशि अर्थात लग्न सबसे महत्वपूर्ण होता है।

इस विषय में मेरे अन्य आलेख भी देखनें का कष्ट करेंगे तो विस्तृत जानकारी मिलेगी। इस आलेख में वे सब क्लिष्ट गणनाएँ हैं छोड़ रहा हूँ।
उल्लेखनीय है कि, नेटपर सर्च करने पर भी निम्नलिखित तथ्य मिलेंगे।
शक संभवतः उत्तरी चीन तथा यूरोप के मध्य स्थित झींगझियांग प्रदेश के निवासी थे। कुषाणों एवं शकों का कबीला एक ही माना जाता है
पश्चिमी चीन के गांसु प्रदेश में जिउक्वान शहर क्षेत्र में  डुहुआंग नगर,  उत्तर अक्षांश 40 ° 08″32"  N और पुर्व देशान्तर  94 ° 39 '43" E  पर स्थित डुहुआंग नगर, (डुनहुआंग नगरपालिका क्षेत्र) को युझी जाती  का मूल स्थानों में से एक माना जाता है। अर्थात कनिष्क आदि  (भारतीय शकों) का मूल स्थानों में से एक माना जाता है।
3 शक प्राचीन मध्य एशिया में रहने वाली स्किथी लोगों की एक जनजाति या जनजातियों का समूह था, जो सीर नदी की घाटी में रहता था
 4 (५२२-४८६ ईसा पूर्व) के शासनकाल के लिए , कहा जाता है कि शक सोग्डिया की सीमाओं से परे रहते थे।  इसी तरह ज़ेरक्सस I
5 (४८६-४६५ ईसा पूर्व) के शासनकाल के एक शिलालेख ने उन्हें मध्य एशिया के दहे लोगों के साथ जोड़ा है । 
6 सोग्डियन क्षेत्र आधुनिक उज्बेकिस्तान में समरकंद और बोखरा के आधुनिक प्रांतों के साथ-साथ आधुनिक ताजिकिस्तान के सुगद प्रांत से मेल खाता है
मध्य चीन के तुर्फन के आसपास युएझी प्रान्त के निवासी युएझी कहलाते थे। वे लोग विजेता के रुप में पहले पश्चिम में ईली नदी पर पहूँच कर अकसास नदी की घाँटी घाँटी पामिर पठार की ओर फिर दक्षिण में हिन्दूकुश पर्वत, ईरान, अफगानिस्तान होते हुए सिन्ध में तक्षशिला,पञ्जाब होते हुए मथुरा तक पहूँच गये। गुर्जरों के कषाणा वंश या कसाणा कबीले को आत्मसात कर कोसोनो कहलाते थे तथा गुसुर कबिले के समान थे। भारत में कुषाण कहलाये । इनने पहले ग्रीक भाषा, फिर बेक्ट्रियाई भाषा और अन्त में पुरानी गुर्जर गांन्धारी और फिर संस्कृत भाषा अपनाई। तथा भारत में गुर्जर के रुप में भी प्रसिद्ध हुए।

इसी कुषाण वंश का सबसे प्रसिद्ध राजा कनिष्क हुआ। जिसका जन्म गान्धार प्रान्त के पुरुषपुर (वर्तमान पाकिस्तान के पेशावर) में 98 ई.पू. में हुआ। और निधन 44 ई. मे हुआ। इसकी राजधानी पेशावर थी एवम् उप राजधानी कपिशा (अफगानिस्तान) और मथुरा उ.प्र. भारत को बनाया। तथा मथुरा से अफगानिस्तान, दक्षिणी उज़्बेकिस्तान , ताजिकिस्तान से लेकर मध्यचीन के तुर्फन तक फैला था। जन्म से यह सनातन धर्मी था किन्तु बाद में बौद्ध धर्म अपना लिया। अफगानिस्तान तथा चीन में महायान बौद्धधर्म फैलाने में विशेष योगदान दिया।

चीन में प्रचलित उन्नीस वर्षिय चक्र वाला सायन सौर संस्कारित चान्द्र केलेण्डर कुषाणों में प्रचलित था। इससे मिलता जुलता उन्नीस वर्षीय चक्र मिश्र और मेसापोटामिया में भी प्रचलित था।  इसी का भारतीय स्वरुप उन्नीस वर्ष, एकसौ बाईस वर्ष और एक सौ एकतीस वर्षिय चक्र वाला निरयन सौर संक्रमण पर आधारित चान्द्र केलेण्डर कनिष्क ने ही उत्तर भारत तथा गुजरात में लागू किया तथा दक्षिण में महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश के अलावा मध्यप्रदेश, और पुर्वी, दक्षिणी गुजरात में सातवाहन या शालिवाहन वंशी गोतमीपुत्र सातकर्णि ने शालिवाहन शक नाम से प्रचलित किया। यह संवत उत्तर भारत में कनिष्क के सत्त्तारूढ़ होने की खुशी में लागू किया गया जबकि दक्षिण भारत में शकों पर शालिवाहन गोतमीपुत्र सातकर्णि की विजयोपलक्ष्य में इस्वी सन 78 में विक्रम संवत 135 में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से लागु किया गया।
उक्त जानकारी स्पष्ट कर देती है कि, 19 वर्ष,122 वर्ष और 141 वर्ष में आवृत्ति वाला निरयन सौर संक्रमण आधारित शकाब्द पञ्चाङ्ग (केलेण्डर) विदेशी परम्परा है। जबकि वैदिक परम्परा में सायन सौर संवत्सर और सायन सौर मधुमाधवादि मासके साथ गतांश और संक्रान्ति गत दिवस  चलते थे। कभी कभी कुछ विशिष्ठ धार्मिक प्रकरणों में सायन सौर मधुमाधवादि मासके साथ चन्द्रमा का नक्षत्र को ध्यान रखा जाता था। जबकि अन्वाधान और इष्टि भें पुर्णिमा/ अमावस्या एवम् अष्टका एकाष्टका में अर्धचन्द्र की तिथि जिसे वर्तमान में हम अष्टमी तिथि कहते हैं देखी जाती थी। वेदों में केवल अमावस्या, पूर्णिमा, एकाष्टका और अष्टका (शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की अष्टमी) तथा व्यष्टिका (शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा) तथा बालेन्दु (प्रथम चन्द्र दर्शन) का ही उल्लेख है।
तथाकथित उत्तरवैदिक काल में चान्द्रमास के मध्य की तिथि पूर्णिमा के नक्षत्र के आधार पर बने चैत्र- वैशाखादि मास और तिथियाँ प्रचलित हुई। लेकिन तब भी संवतरारम्भ सायन सौर मेष संक्रान्ति को आधार मानकर सायन सौर मीन संक्रान्ति और सायन सौर मेष संक्रान्ति के बीच पड़ने वाली अमावस्या के बाद वाली शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से ही संवत्सर आरम्भ करते थे। जैसा कि, वर्तमान में आचार्य दार्शनेय लोकेश श्री मोहनकृति आर्ष पत्रकम् ग्रेटर नोएडा से प्रकाशित करते हैं। 



संवत्सर आरम्भ और वसन्त विषुव

निरयन सौर संस्कृत चान्द्र संवत का आरम्भ प्रायः मार्च - अप्रेल माह में ही आरम्भ होता है? ऐसा क्यों? 
वेदिक युग में नवसंवत्सरोत्सव, वसन्तोत्सव, नव सस्येष्टि ये सभी उत्सव उस दिन मनाये जाते थे जिस दिन सुर्य ठीक भूमध्यरेखा पर आकर उत्तरीगोलार्ध में प्रवेश.करता है। उस दिन दिन - रात बराबर होते हैं, उत्तरीध्रुव पर सुर्योदय होता है और दक्षिण ध्रुव पर सुर्यास्त होता है । सुर्योदय सुर्यास्त के समय सुर्य भूमध्य रेखा पर होने के कारण सुर्योदय ठीक पुर्व दिशा में और सुर्यास्त ठीक पश्चिम दिशा में होता है।उस दिन मध्याह्न की छाँया देखकर स्व स्थान का अक्षांश देशान्तर ज्ञात करना आसान होता है।उक्त दिवस को महा विषुव, और वसन्त विषुव कहा जाता है। इसे ज्योतिषीय भाषा में सायन मेष संक्रान्ति कहते हैं। मूलतः कलियुग संवत का आरम्भ सायन मेष संक्रान्ति से होता है।

22 मार्च 1957 से भारत शासन ने भी भारतीय राष्ट्रीय शक केलेण्डर के रुप में इस परम्परा को पुनर्जीवित किया है। इसमें महान ज्योतिषी स्व. श्री निर्मल चन्द्र लाहिरी जी का विशेष योगदान रहा।

पहले लगभग पुरे विश्व की प्राचीन संस्कृतियों में ही इसी दिन नववर्ष मनाया जाता था। जमशेदी नवरोज नामक पारसी नववर्ष आज भी इसी दिन मनाते हैं। चीनी केलेण्डर भी सायन सौर संस्कृत चान्द्र केलेण्डर है। जिसमें नव वर्ष सायन सौर संस्कृत चान्द्र माह के अनुसार सायन कुम्भ संक्रान्ति और सायन मीन संक्रान्ति के बीच पड़ने वाली अमावस्या के बाद से नववर्ष होता है।

सऊदी अरब और ईराक में भी सायन मेष संक्रान्ति वाले माह के आसपास वाले दो माह वसन्त ऋतु आरम्भ के पु्र्व वाला माह और वसन्त ऋतु आरम्भ के बादवाला माह को रबीउल अव्वल और रबीउस्सानी कहते हैं।

ग्रेगोरियन केलेण्डर के अनुसार 1975 ईस्वी के पहले यह प्रायः 20 मार्च को पड़ता था एवम् 1975 ई. के बाद आगामी हजारों लाखों वर्ष तक यह अधिकांशतः 21 मार्च को होता है और होगा।

चुँकि, ग्रेगोरियन केलेण्डर सायन सौर वर्ष गणना आधारित केलेण्डर है तथा चार वर्षों में प्लुत वर्ष में एक दिन बढ़ा कर,तथा प्रति 400 वर्षों में प्लुत वर्ष नही करना जैसे सन 1900 ई. में फरवरी 28 दिन का ही था और प्रत्येक 400 वर्ष में पुनः प्लुत वर्ष करना जैसे फरवरी 2000 29 दिन का था।और प्रत्यैक 4000 वर्ष में पुनः प्लुत वर्ष न करना इस प्रकार ग्रेगोरियन केलेण्डर में स्थाई रुप से एक दिन या एक तारीख का अन्तर हजारों लाखों वर्ष में ही आयेगा। तब सायन मेष संक्रान्ति 22 मार्च को पड़ने लगेगी।

इसके अतिरिक्त वेदिक काल में ही महर्षि विश्वामित्र द्वारा नाक्षत्रिय गणना आधारित वर्षगणना प्रचलित की। इस पद्यति में नाक्षत्रिय या निरयन मेष संक्रान्ति से संवत्सर आरम्भ होता है। आज भी पञ्जाब, उड़िसा, बङ्गाल, तमिलनाड़ु, केरल आदि अनेक राज्यों में निरयन मेष संक्रान्ति से ही संवत्सरारम्भ होता है। मूलतः युधिष्ठिर संवत और विक्रम संवत निरयन मेष संक्रान्ति से ही आरम्भ होता है।

सन 285 ईस्वी में दिनांक 22मार्च 285 ई. को सायन और निरयन मेष संक्रान्ति एकसाथ हुई थी। तब से लगभग हर 71 वर्ष में निरयन मेष संक्रान्ति एक दिनांक बाद में होते होते आजकल दिनांक 14 अप्रेल को होने लगी है।अर्थात 1735 वर्षों में 24 दिन का अन्तर पड़ गया है। सन 2189 में 22 अप्रेल को निरयन मेष संक्रान्ति आयेगी। ऐसे ही तथा 12890 वर्ष में पुरे छः मास का अन्तर पड़ जायेगा। और 25780 वर्ष में पुरे एक वर्ष का अन्तर पड़ने से सायन कलियुग संवत 28882 और निरयन युधिष्ठिर संवत 28881 होगा यानि एक वर्ष का अन्तर होगा।

उत्तर भारत में कुशाण राजाओं विशेषकर कनिष्क द्वारा और दक्षिण भारत में सातवाहन राजाओं विशेषकर शालवाहन सातकर्णि द्वारा चलाये गये निरयन सौर संस्कृत चान्द्र शकाब्द का आरम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है।

निरयन मीन राशि में सुर्य हो तब अर्थात वर्तमान में लगभग14 मार्च से 13 अप्रेल के बीच जो अमावस्या होती है उस दिन निरयन सौर संस्कृत शक संवत का वर्ष समाप्त होकर नया वर्ष नया शकाब्ध आरम्भ होता है।

जब दो संक्रान्तियों के बीच अमावस्या न पड़े या यों कहें कि जब दो अमावस्याओं के बीच दो संक्रान्ति पड़े तो वह क्षय मास कहलाता है सन 1982 में आश्विन मास क्षय हुआ था। इसके पहले 1963 ई. में भी क्षय मास आया था। माघ मास को छोड़ कोई भी मास क्षय हो सकता है। क्षय मास वाले वर्ष में क्षय मास के पहले और बादमें अधिक मास पड़ते हैं। ऐसा प्रत्यैक 19 वर्ष, 122वर्ष और 141 वर्ष में होता है। 1963 ई. में 141 वर्ष बाद क्षय मास पड़ा था। 1982 में 19 वर्ष बाद क्षय मास पड़ा था और अब 122 वर्ष बाद वाला क्षय मास सन 2104 ईस्वी में पड़ेगा।

इसी 19,122,141 वर्षों के क्रम से निरयन सौर संस्कृत संवत्सर मे पञ्चाङ्ग के मासा, तिथि, करण, नक्षत्र, और योग तथा सुर्यग्रहण, चन्द्र ग्रहणों की आवृत्ति होती रहतीहै।

इसी प्रकार जब दो संक्रान्तियों के बीच दो अमावस्या पड़े या यों कहें कि अमावस्याओं के बीच कोई संक्रान्ति न पड़े तो अधिक मास होता है। ये चैत्र से कार्तिक तक कोई भी मास अधिकमास हो सकता है।

ऐसे अधिक मास और क्षय मास के प्रावधान कर 354 दिन के चान्द्र वर्ष को 365.256363 दिन के निरयन सौर वर्ष से बराबरी कर ली जाती है।

अब चुँकि अभी निरयन मेष संक्रान्ति 14 मार्च से 13 अप्रेल के बीच पड़ती है इसलिये 15 मार्च से 13 अप्रेल के बीच ही शकाब्ध आरम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पड़ती है। लगभग 1130 वर्ष बाद चैत्र शुक्ल प्रतिपदा अप्रेल माह में ही पड़ा करेगी।

सुचना -

1 प्लुत वर्ष यानि अन्तिम माह में एक दिन अधिक होना । पहले फरवरी अन्तिम माह था।

2 भारतीय सिद्धान्त ज्योतिष के गोलाध्याय (यानि खगोल विज्ञान और भुगोल) में पुरे विश्व के लिये पुर्व पश्चिम दिशा भूमध्यरेखा पर ही मान्य है। वेधलेनें वाले के अक्षांश पर पुर्व पश्चिम मानने से पुर्व पश्चिम दिशा अर्थहीन हो जायेगी। क्यों कि प्रत्यैक देशान्तर के लिये तो पुर्व पश्चिम अलग अलग होती ही है। भारत वासियों का पुर्व और अमेरिका वासियों का पश्चिम लगभग एक ही होता है। ऐसे में यदि अलग अलग अक्षांशों पर उत्तराभिमुख खड़े अक्षांशों वेध लेनें वाले के 90° दाँयें बाँयें पुर्व पश्चिम मानें तो कम्युनिकेशन असम्भव सा होजायेगा। सभी अक्षांशों के पुर्व पश्चिम अलग अलग होंगें।

3 जब सुर्य को केन्द्र मानकर देखनें पर भूमि कृतिका नक्षत्र के सम्मुख दिखे यानि सुर्य, भूमि और चित्रा नक्षत्र का तारा एक पङ्क्ति में दिखे। केन्द्रीय ग्रह स्पष्ट में भूमि चित्रा नक्षत्र के योग तारा का भोग एक ही हो या जब चित्रा तारे से भूमि की युति हो तब निरयन मेष संक्रान्ति होती है।

4 सायन सौर संस्कृत चान्द्र वर्ष गणना लागु करने का प्रयोग काशी के बापुशास्त्री जी ने किया था और कई वर्षों तक सायन सौर संस्कृत पञ्चाङ्ग प्रकाशित किया। किन्तु धर्माचार्यों के असहयोग और लोकप्रिय नही होने के कारण उन्हें प्रकाशन बन्द करना पड़ा। खेर।