शनिवार, 11 जुलाई 2020

वर्णाश्रम धर्म और प्रवृत्ति मार्ग , निवृत्ति मार्ग और श्रमण परम्परा, और नास्तिक मत और तन्त्र मार्ग

वर्णाश्रम धर्म और प्रवृत्ति मार्ग , निवृत्ति मार्ग और श्रमण परम्परा, और नास्तिक मत और तन्त्र मार्ग 
 
वेदिक वर्णाश्रम धर्म (प्रवृत्ति मार्ग) और निवृत्ति मार्ग के साथ ही तन्त्र भी सहचारी रहा हैं। या यदि समयान्तर है भी तो बहुत कम समय का। जिन्हें वेदों में असुर कहा है वे मूलतः तान्त्रिक ही थे। 

हिरण्यगर्भ ब्रह्मा ने आरम्भ में सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, सनातन और नारद जैसे अकेले पुरुष ही रचे। उनसे सृष्टि का विकास नही होसका अतः फिर उनके रोष से अर्धनारीश्वर महारुद्र शंकर हुए। किन्तु रुद्र के स्वभाव सृजन नहीं प्रलय था। रुद्र हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के आदेश पर रुद्र सृजन नहीं कर पाये अतः हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के आदेश पर रुद्र  तप में संलग्न होगये।
फिर हिरण्यगर्भ ब्रह्मा ने प्रजापति और सरस्वति को उत्पन्न किया। 

 प्रवृत्ति मार्ग -- यह वर्णश्रम धर्म कहलाता है। 

 प्रजापति - सरस्वती ने  स्वःलोक यानि देवलोक के लिये 1 देवेन्द्र - शचि, 2अग्नि - स्वाहा  ये दो जोड़े और 3 देवर्षि नारद को उत्पन्न किया।
भुवः लोक (अन्तरीक्ष) के लिए  पितरः (अर्यमा) - स्वधा को उत्पन्न किया और पुर्व में उत्पन्न रुद्र को भी भुवः लोक में स्थापित किया। ऋग्वेद में रुद्र का वास अन्तरीक्ष बतलाया गया है।
फिर भूलोक के लिये 1 दक्ष -  प्रसुति, 2 रुचि - आकुति, 3 कर्दम - देवहूति नामक प्रजापतियों के तीन जोड़े उत्पन्न किये और 1 मरीची, 2 भृगु, 3 अङ्गिरा, 4  वशिष्ठ, 5  अत्रि, 6 कृतु, 7 पुलह, 8 पुलस्य ऋषियों को उत्पन्न किया। दक्ष को छोड़ शेष सबकी सन्तान ब्रह्मज्ञानी होने से ब्राह्मण कहलाई। जबकि दक्ष प्रजापति राजर्षि हुए। 
स्वायम्भुव मनु  - शतरूपा भूलोक के लिये राजाधिराज महाराज और सम्राट हुए। इनकी सन्तान क्षत्रिय कहलाई। बाद में इन क्षत्रियों में से ही वैष्य और राजकीय सेवक यानि शुद्र भी हुए। 
 1 दक्ष और 2 रुचि और 3 कर्दम तीनों  प्रजापति कहलाये। वर्तमान का उत्तराखण्ड ,कश्मीर, और तिब्बत, पामिर, और ताजिकिस्तान, किरगिस्तान, उजाबेगिस्तान, तुर्कमेनिस्तान,  कजाकिस्तान  इन ऋषियों का क्षेत्र रहा।
शेष 4 मरीचि 5 भृगु,6 अङ्गिरा, 7 वशिष्ठ, 8 अत्रि, 9 कृतु, 10 पुलह और 11 पुलस्य ऋषि कहलाते हैं। दक्ष प्रजापति की पुत्रियों से इनके विवाह हुए।
1 मरीची की पत्नी सम्भूति , 2 भृगु की पत्नी ख्याति , 3 अङ्गिरा की पत्नी स्मृति, 4 वशिष्ठ की पत्नी उर्ज्जा,  5 अत्रि पत्नी अनसूया, 6 कृतु की पत्नी सन्तति, 7 पुलह की पत्नी क्षमा, 8 पुलस्य की पत्नी प्रीति हुई।
वस्तुतः स्वायम्भुव मनु भी प्रजापति ही हैं। इनका क्षेत्र वर्तमान, वर्तमान,इरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान  (उतर पश्चिम सीमान्त प्रान्त,बलुचिस्तान,सिन्ध, पञ्जाब, ) और भारत में पञ्जाब हरियाणा राजस्थान और गुजरात, और उत्तर प्रदेश एवम्  उत्तरी मध्य प्रदेश रहा तथा उत्तर पश्चिमी महाराष्ट्र रहा।
[सुचना - उस समय दक्षिण भारत का हिस्सा भारतीय भूभाग से मिला ही था। विन्द्याचल उँचा हो रहा था। वर्तमान हिमालय के क्षेत्र में उत्तर सागर सिकुड़ कर हिमालय बन रहा था। युराल पर्वत भी उँचा हो रहा था। अतः दक्षिण भारत और पुर्व भारत में बसाहट नही थी। प्रायः वन क्षेत्र था।]
इन सभी (बारहों) नें वर्णाश्रम धर्म यानि प्रवृत्ति मार्ग के प्रवर्तक हुए। ये यज्ञ , योग और ज्ञान मार्गी थे।ये   सर्वव्यापी विष्णु के  स्वरुप मे ईश्वर की आराधना उपासना यज्ञ और योग के द्वारा करते थे।
इन तीनों जोड़ों ने नर नारी रुप सृष्टि की। दक्ष प्रजापति की पत्नी प्रसुति और रुचि प्रजापति की पत्नी आकुति और कर्दम प्रजापति की पत्नी देवहूति को स्वायम्भुव मनु की पुत्री भी माना गया। स्वायम्भुव मनु के पुत्र उत्तानपाद और प्रियवृत हुए। उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव और उत्तम हुए। और प्रियवृत के आग्नीन्ध्र आदि नौ पुत्र हुए।
स्वायम्भुव मनु और शतरूपा के पुत्र प्रियवृत को के दस पुत्र और तीन (मानस) पुत्रियाँ हुई। जिनमें तीन पुत्र निवृत्ति परायण हो गये। मनु पुत्रों में निवृत्ति मार्ग का प्रारम्भ यहीँ से हुआ। शेष सात पुत्रों को प्रियवृत ने  1 आग्नीन्ध्र, 2  मेधातिथि, 3  वपुष्मान, 4  ज्योतिष्मान, 5 द्युतिमान, 6 भव्य,  और 7 सवन सप्तद्विपों का उत्तराधिकारी बनाया।
उन में से आग्नीन्ध्र को जम्बूद्वीप का राज्य मिला। शेष को वर्तमान एशिया से बाहर के द्वीप मिले।
आग्नीन्ध्र के नौ पुत्र 1 नाभि (जो अजनाभ भी कहलाता है),  2 किम्पुरुष  3 हरिवर्ष,  4 इलावृत,  5 रम्य,  6 हिरण्यवान, 8 भद्राश्व, 9 केतुमाल  हुए। अजनाभ को जम्मुद्वीप का दक्षिणी भाग का उत्तराधिकार मिला। शेष आठ पुत्रों को भारत से बाहर के क्षेत्र मिले। अजनाभ ने उसके राज्यक्षेत्र को अजनाभ वर्ष नाम दिया। अजनाभ को नाभि भी कहते हैं अतः अजनाभ वर्ष को नाभिवर्ष भी कहते हैं। 
अजनाभ के तीन.पुत्र 1 ऋषभदेव 2 अतिशय और 3 कान्तिमान  हुए। इनमे वरिष्ठ पुत्र ऋषभदेव को भी नाभिवर्ष का राज्य उत्तराधिकार में मिला।  
ऋषभदेव के पुत्र भरत सहित सौ पुत्र हुए। इनमें भरत चकृवर्ती सबसे बड़े थे।
ऋषभदेव नें शरीर और इन्द्रियों के बलवान रहते ही सन्यास धारण कर लिया।
ऋषभदेव के वरिष पुत्र भरत चकृवर्ती को भी नाभिवर्ष (अजनाभ वर्ष) उत्तराधिकार में मिला पर उनने अजनाभ वर्ष / नाभिवर्ष का नाम बदलकर भारतवर्ष रखा। तब से इस देश का नाम भारतवर्ष प्रचलित है।

निवृत्ति मार्ग 

हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के मानस पुत्रों  सनक, सनन्दन, सनत्कुमार और सनातन, नारद ने निवृत्ति मार्ग का आरम्भ सृष्टि के आदि में ही कर दिया था। जिसे मानवों में उत्तानपाद और प्रियवृत के पुत्रों ने  अपनाया। कपिल ऋषि भी निवृत्त हुए। वेदव्यास जी के पुत्र शुकदेवजी भी निवृत हुए। किन्त वेदानुयायियों  को वर्णश्रम धर्म ही अधिक प्रिय रहा है।
परवर्ती शैव परम्परा नें निवृत्ति मार्ग को अपनाया किन्तु वैष्णव प्रवृति मार्गी ही रहे।

श्रमण परम्परा

निवृत्ति का भिन्न स्वरूप श्रमण परम्परा -- निवृत्ति मार्ग का ही विकृत स्वरूप श्रम परम्परा है। ये स्वयम को तार्किक और बुद्धिवादी मानते थे इसलिए बौद्ध भी कहे जाते थे। जिनकी परम्परा में ही सिद्धार्थ को गोतम बुद्ध कहा गया। सिद्धार्थ गोतम बुद्ध के समय महावीर ने इस परम्परा को जैन कहा। इस प्रकिया में यह दो बौद्ध और जैन सम्प्रदायों में विभक्त हो गया।
 ऋषभदेव ने सन्यास आश्रम की अन्तिम अवस्था मे नग्न रहना आरम्भ किया। इनके पहले के सन्यासी वन में ही रहते किन्तु दिगम्बर नही रहते थे। तब से निवृत्ति मार्ग का एक नवीन स्वरूप श्रमण परम्परा आरम्भ हुई। श्रमण मार्गियों में जैन परम्परा ने ऋषभदेव को आदिगुरु मान लिया। ऋषभदेव को जैन आदि तिर्थंकर कहते है।

नास्तिक मत

जो वेदों को परम सत्य और प्रमाण नही मानते वे नास्तिक कहलाते हैं।
चुँकि वेद सृष्टिकर्ता, और सृष्टि संचालक तथा प्रलय कर्ता परमात्मा के ईश्वर स्वरूप को मानते हैं अतः ईश्वर को सृष्टिकर्ता, और सृष्टि संचालक तथा प्रलय कर्ता न मानने वाले भी नास्तिक कहलाते हैं।

वेद विरोधी मत

पुर्व काल में असुर भी वेदानुयायी ही थे। किन्तु बाद में देत्यों और दानवों के संसर्ग में असुर वेद विरोधी होगये। इसकारण वे वेदों के अनुशासन को अस्वीकार करने लगे। ये वेदिक व्यवस्था को अस्वीकार कर उसका विरोध करने वाले वेद विरुद्ध मतों के प्रवर्तक हुए। 

तन्त्रमार्ग

तन्त्रमार्ग  --   पशुपति महारुद्र शंकर के शिश्य शुक्राचार्य और शुक्राचार्य के पुत्र त्वष्टा और त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप हुए। त्वष्टा और उनके विश्वरूप ने शाक्त सम्प्रदाय और तन्त्रमत आरम्भ किया। उनके अलावा अत्रिपुत्र दत्तात्रय भी विश्वरूप के अनुगामी हुए। पशुपति महारुद्र शंकर जी से हटयोग सीखा और प्रचारित किया।  एवम् पशुपतिनाथ महारुद्र शंकर के शिश्य मण्डला मण्डल के कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन तथा लक्ष्यद्वीप क्षेत्र में लंकावासी रावण भी शाक्त मत, तन्त्र और हटयोग के अनुयायी हुए। इन सबने शाक्त मत, तन्त्र और हटयोग का प्रचार किया।
 तन्त्र का मतलब व्यवस्था है । यह  वेदिक वर्णश्रम व्यवस्था से भिन्न नई व्यवस्था है जो वेदों को अन्तिम प्रमाण नही मानती। तन्त्र अवेदिक और कुछ हद तक वेदविरोधी मत है।
तन्त्रमत वेदिक स्थापनाओं और मान्यताओं का विरोध करते हैं।

 विश्वामित्र और वशिष्ठ ने आपसी संघर्ष के चलते सर्वप्रथम त्वष्टा के तन्त्र का प्रयोग किया । किन्तु त्वष्ठा के पुत्र विश्वरूप के असुर प्रेम को देखते हुए  पहले  वशिष्ठ ने और बादमें  विश्वामित्र ने तन्त्रमत को छोड़ दिया और वेदों की ओर लोट आये। वशिष्ठ और विश्वामित्र द्वारा अपनाया गया त्वष्टा रचित  तन्त्रमत समय मत नाम से प्रचलित है जिसको आगम ग्रन्थों और पाञ्चरात्र  ग्रन्थों में अपनाया गया । सौन्दर्य लहरी के रचियता शंकराचार्य भी इसी मत के थे।

कार्तिकेय के जन्म  से शंकर जी ने फिर तन्त्रमार्ग को आरम्भ किया।  शंकरजी के शिष्य शुक्राचार्य ने तन्त्रमार्ग को आगे बढ़ाया।
शुक्राचार्य के पुत्र त्वष्टा ने भी आदित्य त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप के मार्ग पर चल कर शाक्त पन्थ की स्थापना की सिन्धु घाँटी में मिली मात्रका और लिङ्ग योनि प्रतिमा इनके प्रमाण है। युनान के पास क्रीट द्वीप की शाक्त परम्परा इन्ही की देन है।  यह परम्परा कलियुग में भारत में पुनः आई। इसमें नन्द यशोदा की पुत्री जो कन्स के हाथों छूट कर तड़ित विद्युत के रूप में आकाश में चली गई थी उन्हे ही आदिशक्ति विन्द्यवासिनी देवी के रूप में पुजा जाने लगा।

फिर दत्तात्रय ने वर्तमान तन्त्र मत की स्थापना की। दत्तात्रय के शिष्य कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन हैं। यह भी शैव और शाक्त पनँथ का मिश्रित रूप है। इसमें इष्ट शंकर और उनकी शक्ति पार्वती तथा पुत्र विनायक गजानन और कार्तिकेय भी पुज्य हैं । साथ ही भैरव को शंकर के अवतार के रुप में पुजा जाता है। भैरव इनका मुख्य देव भी है। बगलामुखी देवी और पीताम्बरा पीठ इनकी ही परम्पराए को आगे बढ़ा रहे है। यह भी समय मत का ही विकृत रुप ही था।
दत्तात्रय के दुसरे शिष्य रावण ने सुमाली के सानिध्य में कोल मत आरम्भ किया। मयासुर  से शिक्षा ग्रहण कर रावणपुत्र मेघनाद ने इन्द्रजाल का आरम्भ किया।

इधर जैनाचार्यों ने निवृत्ति के साथ तन्त्र मार्ग को संयुक्त कर अनेकान्त दर्शन के साथ अतिवादी शैवपन्थ का नवीन संस्करण श्रमण संस्कृति तैयार की। जिसे महापीर ने जैन मत नाम दिया। यह भी तन्त्रमार्ग का ही अनुसरण करता हैं

सिद्धार्थ गोतम बुद्ध ने भी इसी परम्परा को आगे बढ़ाया। इनके महायानी शिश्यों नें शुन्यवाद और विज्ञानवाद बनाये। 
इनमें से ही निकला तान्त्रिक सम्प्रदाय वज्रयान मत। जिसपर बादमे ताओ का भी प्रभाव पड़ा।

गिरनार वासी एकमुखी दत्तात्रय ने कापालिक मत का वैतालिक रुप विकसित किया। यह वज्रयान का निकटवर्ती था। जिसे नेपाल के मत्स्येंद्रनाथ को सिखाया। यह लोकमान्य नही हो पाया। मत्स्येंद्रनाथ ने गोरखनाथ को शिष्य बनाया। लेकिन गोरखनाथ ने रावण आदि के ग्रन्थों और अन्य परम्पराओं से सीख कर योग का नवीन स्वरूप हठयोग अपनाया।  तन्त्र में शुन्यवाद और सांख्य दर्शन मिलाकर नया दर्शन तैयार किया जिसका लक्ष्य शिवकेली रखा। इसप्रकार यह भक्तिमत भी दिखता है।यह बहुत लोकप्रिय हुआ।
जलन्धरनाथ ने वैतालिक मत को ही आगे बढ़ाया।
नाथों का एक विचित्र टोटके ने भारत से बौद्धों की समाप्ति में बड़ा योगदान दिया।वह आपने भी पढ़ा होगा। यदि बौद्ध भिक्षु भिक्षा लेने द्वार पर आये वैसे ही उसके सर पर एक लट्ठ मार दो तो वह सोनें का बन जायेगा।
अब वह सोनें का बनें ना बनें भिक्षु तो कम हो ही गया।😂
मोर पंख की झाड़नी भी इनकीही देन है। जो सुफियों ने इस्लाम में भी अपनाई ।

सोमवार, 6 जुलाई 2020

जन्म लग्न के नक्षत्र चरण से जन्मनाम का प्रथम वर्ण और वेदिक सायन सौर मास गतांश के ईकाई अंक से नाम निर्धारण की संस्कृत वर्णमालानुसार प्राचीन विधि

परम्परागत अवकहड़ा चक्र से जन्मनाम रखनें में कई दोष हैं।यथा 
1 वर्ण के स्थान पर अक्षरों का प्रयोग होना। 
2 कुछ ऐसे अक्षर हैं जिनसे कोई शब्द नही बनता। जैसे आर्द्रा  तृतीय चरण का अक्षर ङ  हस्त तृतीय चरण का अक्षर ण, और उत्तराभाद्रपद चतुर्थ चरण का अक्षर से कोई शब्द नही बनता। तो नाम कैसे बनेंगा।
3  किसी भी नक्षत्र चरण में एवम् वर्ण नही होना। इसकारण वर्ण वाले नाम को वृष राशि रोहिणी नक्षत्र द्वितीय,तृतीय और चतुर्थ चरण वा , वी, वू और मृगशिर्ष नक्षत्र प्रथम और द्वितीय चरण के अक्षर वे, वो  मानना पड़ता हैं। अर्थात ओष्ठव्य व्यञ्जन  के स्थान पर दन्त्त्योष्ठव्य व्ययञ्जन  का प्रयोग ध्वनि विज्ञान और संस्कृत वर्णमाला पद्यति के विपरीत है। और वर्ण के लिये हस्त नक्षत्र द्वितीय चरण का अक्षर और कुम्भ राशि में  शतभिषा के द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ  चरण के सा,सी, और सु अक्षर और पुर्वाभाद्रपद नक्षत्र के प्रथम - द्वितीय चरण के से सो अक्षर से काम चलाना पड़ता है।
4 अवकहड़ा चक्र का संस्कृत वर्णमाला से मैल  नही है। अवकहड़ा चक्र किस आधार पर बना इसका कोई प्रमाण भी उपलब्ध नही है। 
उक्त कारणों से असन्तुष्ट होने के कारण मेनें संस्कृत ग्रन्थों में खोजबीन की तो सर्वप्रथम अग्नि पुराण में मन्त्र विद्या में अग्निपुराण अध्याय 293 श्लोक 10 से 15 तक नक्षत्र चक्र राशि चक्र और सिद्धादादि मन्त्र शोधन प्रकार में आधार मिला। इसी आधार पर संस्कृत वर्णमाला पर आधारित यह चक्र तैयार हुआ।

जन्मनाम निर्धारण संस्कृत पद्यति से।

जन्मलग्न के नक्षत्र चरण के अनुसार जन्मनाम/ देह नाम अर्थात प्रचलित नाम जो स्कुल कॉलेज में लिखा जायेगा।आधार कार्ड, पैनकार्ड, पासपोर्ट, बैंक खाते आदि में अंकित होगा उस नाम का प्रथम वर्ण इसी वर्ण पर रखें। या 
जन्मलग्न के नक्षत्र चरण के वर्ण पर नाम नही जम रहा हो तो अपवाद में दशम भाव स्पष्ट के नक्षत्र चरणानुसार कर्मनाम भी रख सकते हैं।
अध्यात्मिक गुरु सुर्य के नक्षत्र चरणानुसार नाम रख  गुरुनाम रखाजाये।
तन्त्र क्रिया हेतु तान्त्रिक आचार्य प्रदत्त नाम मानस नाम जन्म कालिक चन्द्रमा के नक्षत्र चरणानुसार रखें।

राशि/नक्षत्र के चरणानुसार जन्म नाम का प्रथम वर्ण

राशि  /  नक्षत्र चरण       १    २     ३    ४  
  
मेष  /   अश्विनि               अ   अ    अ   अ       
मेष  /    भरणी               आ  आ   आ  आ            
मेष  /   कृतिका               इ    
                 
                                    १    २     ३    ४

वृष   / कृतिका                      इ     ई     ई
वृष   / रोहिणी                 उ   उ     ऊ    ऊ
वृष   / मृगशिर्ष               ऋ  ऋ  

                                    १    २     ३    ४

मिथुन/ मृगशिर्ष                            ऋ  ऋ
मिथुन/ आर्द्रा                   ए    ए     ऐ    ऐ
मिथुन/पुनर्वसु                 ओ  ओ   औ 

                                    १    २     ३    ४

कर्क  / पुनर्वसु                                  औ
कर्क  / पुष्य                    अं  अं    अः  अः
कर्क  / आश्लेषा               क  क    ख   ख 

                                     १    २    ३    ४

सिंह  / मघा                      ग   ग    घ   घ
सिंह/पुर्वाफाल्गुनि              च  च    छ   छ
सिंह/उत्तराफाल्गनि   ज

                                      १    २    ३    ४

कन्या/उत्तराफाल्गुनि                ज   झ   झ
कन्या  /  हस्त                   ट    ट     ठ   ठ
कन्या  /  चित्रा                  ड    ड   

                                      १    २    ३    ४

तुला  /    चित्रा                               ढ   ढ
तुला  /    स्वाती                  त   त    थ   थ
तुला  /  विशाखा                 द   द    ध    

                                      १    २    ३    ४

वृश्चिक/ विशाखा                                  ध
वृश्चिक/ अनुराधा                न    न    न    न
वृश्चिक/ ज्यैष्ठा                    प    प   फ   फ

                                      १    २    ३    ४

धनु   /  मुल                       ब   ब    भ   भ
धनु   / पुर्वाषाढ़ा                 म   म    म    म  
धनु  / उत्तराषाढ़ा                य

                                      १    २    ३    ४

मकर/ उत्तराषाढ़ा                     य    य   य
मकर /  श्रवण                    र    र    र    र
मकर / धनिष्ठा                   ल   ल

                                      १    २    ३    ४

कुम्भ / धनिष्ठा                                ल   ल
कुम्भ / शतभिषा                 व   व    व    व
कुम्भ / पुर्वाभाद्रपद             श   श    ष  

                                       १    २    ३    ४

मीन /  पुर्वाभाद्रपद                                ष
मीन / उत्तराभाद्रपद             स   स    स   स
मीन /  रेवती                       ह   ह     ह    ह




मात्रा लगाने की विधि / नियम --

प्रथम एवम् त्रतीय चरण में मुल स्वर हैं। द्वितीय और चतुर्थ चरण में आ से औ तक की मात्रा वाले अक्षर  जन्मनाम का प्रथमाक्षर रहेगा।

जिन नक्षत्रों में प्रथम और त्रतीय चरण में अलग अलग वर्ण हो उनमें द्वितीय चरण में प्रथम चरण के वर्ण में और चतुर्थ चरण में त्रतीय चरण के वर्ण में ००ं-००' से ००ं-२०' तक आ की मात्रा  की मात्रा लगायें। तदनुसार ही आगे भी ००ं-२१' से ००-४०' तक इ की मात्रा  ि  की मात्रा लगायें। ००ं-४१' से ०१ं-००' तक ई की मात्रा ।०१ं-०१' से ०१ं-२०' तक की मात्रा।०१ं-२१' से ०१ं-४०' तक ऊ की मात्रा की मात्रा।०१ं-४१' से ०२ं-००' तक ऋ की मात्राकी मात्रा।०२ं-०१' से ०२ं-२०'  तक ए की मात्रा   े की मात्रा।०२ं-२१ से ०२ं-४०' तक ऐ की माात्रा की मात्रा। ०२ं-४१' से ०३ं-००' तक ओ की  मात्रा ो ।  ०३ं-००' से ०३ं-२०' तक औ की माात्रा   ौ की मात्रा लगाकर नाम का प्रथमाक्षर रखें।

जबकि, जिन नक्षत्रों में चारों चरणों में एक ही व्यञ्जन हो वहाँ प्रथम एवम् द्वितीय चरण में मुल वर्ण से नाम का प्रथमाक्षर रहेगा।जबकि, तृतीय और चतुर्थ चरण में ००ं-००' से ००ं-४०' तक की मात्रा लगायें। तदनुसार ही आगे भी ००ं-४१' से ०१-२०' तक  ि  की मात्रा लगायें। ०१ं-२१' से ०२ं-००' तक ई की मात्रा ।०२ं-०१' से ०२ं-४०' तक की मात्रा । ०२ं-४१' से ०३ं-२० तक की मात्रा।०३ं-२१' से ०४ं-००' तक की मात्रा।०४ं-०१' से ०४ं-४०'  तक   े की मात्रा।०४ं-४१ से ०५ं-२०' तक की मात्रा। ०५ं-२१ से ०६ं-००' तक की आत्रा । और , ०६ं-०१' से ०६ं-४०' तक की मात्रा लगाकर नाम का प्रथमाक्षर रखें।

नाम की संस्कृत, / हिन्दी या मराठी वर्तनी के अक्षरों के अंक।

जन्मसमय के वेदिक मास के गतांश अर्थात सायन सुर्य के गतांश का ईकाई अंक को मूलांक माना जायेगा और जन्म लग्न के राशि/ नक्षत्र चरण के वर्ण पर रखा जन्मनाम जो नाम शासकीय कार्यों में/ स्कुल में लिखवाया जाना हो उस नाम के साथ उपनाम (सरनेम) सहित नाम के अंको को जोड़कर प्राप्त योगफल का ईकाई अंक भी मुलांक ही हो ऐसा नाम रखा जाये। ताकि, प्रचलित नाम अंकविद्या के अनुकूल होने से जीवन में कठिनाई ना आये।

0-   अ,  क,  ट,  प,  ष,  अः, क्ष, ऽ    0

1-  आ,  ख,  ठ,  फ,  स,  त्र ,           1

 2-   इ,   ई,   ग,   ड,  ब,  ह ,           2

 3-   उ,   ऊ,  घ,   ढ,  भ,                3

 4-   ऋ,   ङ, ण,  म,                      4
  
 5-    ए,   च,  त,  य,                      5

 6-    ऐ,   छ,  थ,  र,  ज्ञ,                 6

 7-   ओ,  ज,  द,  द,  ल,  ड़,ॉ         7

 8-   औ,  झ,  ध,  व,  ढ़                  8
 
 9-    अं,  ञ,   न,  श,                      9

  0-    अ, अः, क,   ट,  प,  ष, ऽ         0


तथा जन्म नाम कीअंग्रेजी स्पेल्लिंग के अक्षरों के अंको का योग का योग या योग कें अंकों का  योगांक ग्रेगोरियन केलेण्डर की सुर्योदय वाली दिनांक एक ही हो। क्योंकि राजकाज की भाषा अंग्रेजी होने के कारण अंग्रेजी में नाम लिखना हम भारतीयों की विवशता है।

किरो विधि अनुसार जन्म नाम कीअंग्रेजी स्पेल्लिंग के अक्षरों के अंक ।

1 = A. I. J. Q. Y      = 1
2 = B. K. R.            = 2
3 = C. G. L. S.        = 3
4 = D. M. T            =  4
5 = E. H. N. X        =  5
6 = U. V. W             = 6
7 = O. Z                  = 7
8 = F. P                   = 8

अंग्रेजी में संस्कृत वर्णमाला से आधे अक्षर हैं। वे भी वर्ण नही हैं।
शुन्य और नौ के लिए कोई अंक ही नही है। पर अंग्रेजी भारतीयों की कानुनी विवशता है।

रविवार, 5 जुलाई 2020

भारतीय होरा ज्योतिष स्कन्द अर्थात फलित ज्योतिष की कुछ विशिष्ठ देन।

ज्योतिषीय जानकारियाँ।

बाथक स्थान- 

चर लग्न - १ मेष, ४ कर्क,  ७ तुला  और १० मकर लग्न के लिये एकादश भाव बाधक स्थान होता है।
स्थिर लग्ऩ - २ वृष, ५ सिंह, ८ वृश्चिक और ११ कुम्भ लग्न के लिये नवम भाव बाधक स्थान होता है।
द्विस्वभाव लग्न - ३ मिथुन, ६ कन्या, ९ धनु और १२ मीन लग्न के लिये सप्तम भाव बाधक स्थान होता है।


कौन सी महादशा किस जातक पर लागु होती है --

विंशोत्तरी दशा :- शुक्ल पक्ष कर्क होरा / कृष्ण पक्ष सिंह होरा।
शोडषोत्तरी दशा :- शुक्ल पक्ष सिंह होरा/कृष्ण पक्ष कर्क  का होरा ।


रोगी प्रश्न लग्न से 

लग्न से वैद्य (डॉक्टर)
चतुर्थ भाव से औषधी
पञ्चम भाव से रोग
दशम भाव से रोगी 

लग्न एवम् दशम में सुसम्बन्ध हो,  मैत्री हो तो वैद्य (डॉक्टर ) से लाभ होगा।
सप्तम और चतुर्थ भाव बलवान एवम् परस्पर मित्र हो तो औषधी से लाभ होगा।
विपरित स्थिति में हानी होगी। रोग बढ़ेगा।

पितृदोष -
सूर्य शनि,राहु - केतु से पीड़ित हो तो पितृदोष, 
चन्द्रमा शनि,राहु - केतु से पीड़ित हो तो मातृ दोष,
शुक्र से पत्नी, मंगल से भाई ।

बुधवार, 1 जुलाई 2020

वेदिक, पौराणिक काल गणना और भारतीय मौसम विज्ञान के आधार।

*वेदिक अहोरात्र, मास, ऋतु ,अयन एवम्  तोयन तथा संवत्सर चक्रीय कालगणना के आधार पर भारतीय मौसम विज्ञान*

वेदिक काल में अयन, तोयन, ऋतुओं, मासों और दिवसों में संवत्सर के विभाग किये गये। 
सुर्य, चन्द्रमा के उदय, अस्त, ग्रहण,दिनमान, रात्रिमान  तथा बुध और शुक्र के पारगमन,व्यतिपात, वैधृतिपात, अलावा बुध,शुक्र,मंगल,ब्रहस्पति और शनि ग्रहों की परस्पर युति, प्रतियोग, दर्शन, लोप, उदय, अस्त, अगस्त तारा उदयास्त ,धुमकेतु दर्शन लोप  से मोसम का सम्बन्ध का अध्ययन गुरुकुलों में कराया जाता था। उक्त सभी  सायन गणना से सिद्ध होते हैं।

इनके साथ नाक्षत्रिय पद्यति / निरयन गणनानुसार आकाश में ताराओं के दर्शन और उनके साथ ग्रहों आदि की युति प्रतियोग, दृष्टि आदि से भी मोसम का सम्बन्ध अध्ययन कराया जाता था।
और आकाश का रंग, सुर्य चन्द्रादि बिम्बों के आसपास बने मण्डल,द्वितीया के चन्द्रमा का उत्तर- दक्षिण में झुकाव का वायु की दिशा, गति, वेग,तथा बादलों के गर्भ, बादलों कारंग-रुप, आकार-प्रकार, उँचाई, गमन, दिशा आदि पर भी सतत ध्यान रखकर इनसे भी मोसम का सम्बन्ध अध्ययन कराया जाता था। 
मोसम को भारतीय पर्वोत्सव से सायन सौर, निरयन सौर एवम् निरयन सौर संस्कृत चान्द्र गणना द्वारा मोसम को सम्बद्ध किया गया था।

इनके अलावा मानवों, पशु-पक्षियों, कीट- पतङ्गों के व्यवहार और व्यवहार परिवर्तनों पर भी ध्यान रखना सिखाया जाता था।
इन सबके आधार पर मोसम की भविष्यवाणी करने के विज्ञान को उपवेद त्रीस्कन्ध ज्योतिष के संहिता स्कन्ध में सिखाया जाता था।

 *घटि, पल विपल* 
साव विपल का एक पल, साठ विपल का एक पल और 3600 विपल अर्थात साठ पल की एक घटि।और साठ घटि का एक अहोरात्र जिसे सावन दिन भी कहते हैं।
दो घटि का एक मुहुर्त होता है। तदनुसार तीस मुहुर्त का एक अहोरात्र (सावन दिन) और तीस सावन दिन का एक सावन मास होता है।

*वेदिक मास,ऋतु ,अयन एवम् तोयन, संवत्सर चक्र* 

 वेदिक मास -- 

(सुचना -- विगत हजारों वर्षों से कलियुग संवत 5071 के तपस्य मास के अन्त तक  अर्थात 20 मार्च 1971ई. तक ग्रेगोरियन केलेण्डर के अनुसार आरम्भ अगले दिनांक Next dates से आरम्भ होते थे। जैसे  मधुमास 22 मार्च से आरम्भ होता था।) 

वेदिक मास अवधि  निम्नानुसार -  ग्रेगोरियन केलेण्डर के अनुसार आरम्भ की Dates दी जा रही है।
ये Dates ईसवी वर्ष 1972 से लागु होकर आगामी कई हजारों वर्ष तक लगभग यथावत रहेगी।

मधु मास 21 मार्च से 31 दिन। सुर्य की राशि  सायन मेष ।
माधव मास 21 अप्रेल से31 दिन। सुर्य की राशि सायन वृष।
शुक्र मास 22 मई से 31 दिन। सुर्य की राशि  सायन मिथुन।
शचि मास 22 जून से 31दिन। सुर्य की राशि  सायन कर्क।
नभस मास 23 जुलाई से 31दिन। सुर्य की राशि  सायन सिंह।
नभस्य मास 23 अगस्त 31दिन। सुर्य की राशि  सायन कन्या।
ईष मास 23 सितम्बर से 30दिन। सुर्य की राशि सायन तुला।
उर्ज मास 23 अक्टूबर से 30दिन। सुर्य की राशि सायन वृश्चिक।
सहस मास 22 नवम्बर से 30दिन। सुर्य की राशि सायन धनु।
सहस्य मास 22 दिसम्बर से 29 दिन। सुर्य की राशि  सायन मकर।
तपस मास 20 जनवरी से 30 दिन। सुर्य की राशि  सायन कुम्भ।
तपस्य मास 19 फरवरी से 30 या 31 दिन। सुर्य की राशि   सायन मीन।

 वेदिक ऋतु चक्र 

ऋग्वेद में मुख्य रुप से पाँच ऋतुओं के ही नाम आये हैं हेमन्त ऋतु का नाम नही आया है। और अधिक मास की छटी ऋतु कहा गया है।
किन्तु यजुर्वेद में छः ऋतुएँ और उनके नाम और अवधि की धारणा स्पष्ट है।
तदनुसार

 *वेदिक उत्तरायण में तीन ऋतुएँ होती है।* 

 वेदिक वसन्त ऋतु - 

वेदिक मधु एवम्  माधव मास की वेदिक वसन्त ऋतु  होती थी।21 मार्च से  22 मई तक।
वेदिक मधु मास सायन मेष का सुर्य दिनांक 21 मार्च से 20 अप्रेल तक।
तथा वेदिक माधव मास सायन वृष का सुर्य  21 अप्रेल से 21 मई तक में वेदिक वसन्त ऋतु होती थी। 

 वेदिक ग्रीष्म ऋतु - 

वेदिक शुक्र एवम्  शचि मास की वेदिक ग्रीष्म ऋतु  होती थी। 22 मई से 22 जुलाई तक।
वेदिक शुक्र मास सायन मिथुन का सुर्य 22 मई से 21 जून तक
तथा वेदिक शचि मास सायन कर्क के सुर्य  22 जून से 22 जुलाई तक वेदिक ग्रीष्म ऋतु होती थी ।

 वेदिक वर्षा ऋतु -

वेदिक नभस एवम् नभस्य मास  की वेदिक वर्षा ऋतु  होती थी।23 जुलाई से 22 सितम्बर तक।
वेदिक नभस मास सायन  सिंह  का सुर्य दिनांक 23 जुलाई से 22 अगस्त तक 
तथा वेदिक नभस्य मास सायन कन्या का सुर्य 23 अगस्त से 22 सितम्बर तक में वेदिक वर्षा ऋतु होती थी।

तथा वेदिक दक्षिणायन में तीन ऋतुएँ होती है।


 वेदिक शरद ऋतु -

वेदिक ईष एवम् उर्ज मास की वेदिक शरद ऋतु  होती थी। 23 सितम्बर से 21 नवम्बर तक।
वेदिक ईष मास सायन तुला का सुर्य 23 सितम्बर से 22 अक्टूबर तक 
तथा वेदिक उर्ज मास सायन वृश्चिक का सुर्य 23 अक्टूबर से 21 नवम्बर तक में वेदिक शरद ऋतु होती थी।

 वेदिक हेमन्त ऋतु - 

वेदिक सहस एवम् सहस्य मास की वेदिक हेमन्त ऋतु होती थी। 22 नवम्बर से 19 जनवरी तक।
वेदिक सहस मास सायन धनु का सुर्य  22 नवम्बर से 21 दिसम्बर तक
तथा वेदिक सहस्य मास सायन मकर का सुर्य 22 दिसम्बर से 19 जनवरी तक वेदिक हेमन्त ऋतु होती थी।

 वेदिक शिशिर ऋतु - 

वेदिक तपस मास एवम् तपस्य मास की वेदिक शिशिर ऋतु होती थी। 20 जनवरी से 20 मार्च तक।
वेदिक तपस मास सायन कुम्भ का सुर्य 20 जनवरी से 18 फरवरी तक
तथा वेदिक तपस्य मास मीन का सुर्य 19 फरवरी से 20 मार्च  तक वेदिक शिषिर ऋतु होती थी।
 

 वेदिक अयन और वेदिक तोयन

 वेदिक काल में उत्तरायण  मधु मासारम्भ से से नभस्य मासान्त तक छः मास का होता था । अर्थात-
 सायन मेष संक्रान्ति से सायन तुला संक्रान्ति  तक
 दिनांक 21 मार्च से दिनांक 23 सितम्बर तक उत्तरायण होता था।
तथा वेदिक काल में दक्षिणायन  ईष मासारम्भ से तपस्य मासान्त तक छः माह का होता था।अर्थात - 
 सायन तुला संक्रान्ति  से सायन मेष संक्रान्ति तक।
 दिनांक 23 सितम्बर से दिनांक 21 मार्च तक दक्षिणायन होता था।

पौराणिक काल में वेदिक  उत्तरायण (सायन मेष संक्रान्ति) दिनांक 21 मार्च से दिनांक 23 सितम्बर (सायन तुला संक्रान्ति) तक को उत्तर गोल कहा जाने लगा। 
 और  पौराणिक काल में वेदिक दक्षिणायन (सायन तुला संक्रान्ति) दिनांक 23 सितम्बर से दिनांक 21 मार्च (सायन मेष संक्रान्ति) तक को दक्षिण गोल कहा जाने लगा। 

इसी प्रकार वेदिक काल में संवत्सर के दो विभाग और थे जिन्हे तोयन कहा जाता था।

 वेदिक काल मेंं उत्तर तोयन  सहस्य मासारम्भ से से शुक्र मासान्त तक छः माह का होता था।
अर्थात वेदिक काल में सायन मकर संक्रान्ति दिनांक 22 दिसम्बर  से सायन कर्क संक्रान्ति दिनांक 23 जून तक उत्तर तोयन कहा जाता था।

 तथा वेदिक काल से दक्षिण तोयन  शचि मासारम्भ से सहस मासान्त तक छः मास का होता था। अर्थात
 वेदिक काल में सायन कर्क संक्रान्ति दिनांक  23 जून से सायन मकर संक्रान्ति दिनांक 22 दिसम्बर तक दक्षिण तोयन कहा जाता था।

 वेदिक संवत्सर वसन्त विषुव सम्पात से अर्थात सायन मेष संक्रान्ति 20/21 मार्च से आरम्भ होता था।

सावन वर्षान्त के बाद के पाँच दिन यज्ञ पुर्वक उत्सव मनाये जाते थे।
आज भी वसन्त पञ्चमी, दशापुजा, होला या होली पर्वोत्सव, तथा गुड़ीपड़वाँ , अक्षय तृतीया इसी के अवशेष हैं।

 पौराणिक सौर संवत्सर
 
वेदिक तोयन को अयन नाम देना, वेदिक अयन को गोल नाम देना।और ऋतुओं को एक मास पहले आरम्भ करना। वेदिक मासों को भी एक मास पहले आरम्भ करना।

पौराणिक काल से वेदिक उत्तर तोयन दिनांक 22 दिसम्बर से  दिनांक 23 जून तक को उत्तरायण कहा जाने लगा तथा वेदिक दक्षिण तोयन दिनांक  23 जून से दिनांक 22 दिसम्बर तक को   दक्षिणायन कहा जाने लगा।
क्योंकि,शुभ कार्य उत्तरायण में यानि सायन मेष के सुर्य से सायन कन्या के सुर्य तक  21मार्च से 23 सितम्बर तक  में किये जाते थे। किन्तु इसी अवधि में जून से सितम्बर तक वर्षा होती है।
इस कारण पौराणिक काल में धर्मशास्त्रियों ने विकल्प खोजा । और 
सायन मकर के सुर्य से सायन मिथुन के सुर्य  दिनांक 22 दिसम्बर से 23 जून तक उत्तर तोयन को उत्तरायण घोषित कर दिया। तथा - 
सायन कर्क के सुर्य से सायन धनु के सुर्य दिनांक 23 जून से 22 दिसम्बर तक दक्षिण तोयन को दक्षिणायन  घोषित कर दिया।
इससे वर्षाकाल की समस्या हल होगयी। कलियुग का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।

किन्तु जब वेदिक उत्तर तोयन को पौराणिक उत्तरायण कहा जाने लगा और वेदिक दक्षिण तोयन को पौराणिक दक्षिणायन कहा जाने लगा तो ऋतुओं के आरम्भ माह को एक मास पहले खिसकाना पड़ा। इसके लिये मासों का आरम्भ भी एक माह पहले से करना पड़ा। इसके लिये सावन वर्ष के स्थान पर निरयन सौर वर्ष सें संस्कारित चान्द्र वर्ष लागु किया जिसमें अधिक मास और क्षय मास का लाभ लिया गया। ताकि, प्रजा / जनता समझ नही पाये ।
 किन्तु वसन्त ऋतु का प्रथम मास मधुमास गत संवत्सर में और माधव मास वर्तमान संवत्सर में आने लगा। ऐसे ही पौराणिक उत्तरायण के तीन मास गत संवत्सर गत वर्ष में तो शेष तीन मास वर्तमान संवत्सर में आते है। वेदिक पद्यति में छः मास का वर्ष और दौ वर्ष का एक संवत्सर वाली पद्यति बन्द कर संवत्सर और वर्ष पर्यायवाची मानना पड़े। मधुमास के स्थान पर माधवमास से संवत्सर का आरम्भ  मानना पड़ा।
स्पष्ट ही गोलमाल  दृष्टगोचर हो रहा है।
खेर जो उस अवधि में होगया वह इतिहास तो बदला नही जा सकता पर आगे तो वापस सुधार होना ही चाहिए। 

वर्तमान में प्रचलित मासारम्भ की ग्रेगोरियन केलेण्डर से Dates और अवधि निम्नानुसार है -- 
 पौराणिक अयन, पौराणिक गोल, पौराणिक ऋतुएँ और पौराणिक मासारम्भ की  Dates .।

 पौराणिक उत्तरायण। पौराणिक दक्षिण गोल। पौराणिक वसन्त ऋतु।

मधु मास 19 फरवरी से 30 या 31 दिन। सायन मीन।

 *पौराणिक उत्तरायण। पौराणिक उत्तर गोल आरम्भ। पौराणिक वसन्त ऋतु।* 

माधव मास 21 मार्च से 31 दिन। सायन मेष ।

 पौराणिक ग्रीष्म ऋतु। 

शुक्र मास 21 अप्रेल से31 दिन। सायन वृष।
शचि मास 22 मई से 31 दिन। सायन मिथुन।

 पौराणिक दक्षिणायन आरम्भ। पौराणिक उत्तर गोल। पौराणिक वर्षा ऋतु।

नभस मास 22 जून से 31दिन। सायन कर्क।
नभस्य मास 23 जुलाई से 31दिन। सायन सिंह।

 पौराणिक दक्षिणायन ।  पौराणिक उत्तर गोल । पोराणिक शरद ऋतु।
ईष मास 23 अगस्त 31दिन। सायन कन्या।

 पौराणिक दक्षिणायन। पौराणिक दक्षिण गोल आरम्भ। शरद ऋतु

उर्ज मास 23 सितम्बर से 30दिन। सायन तुला।

 पौराणिक हेमन्त ऋतु।

सहस मास 23 अक्टूबर से 30दिन। सायन वृश्चिक।
सहस्य मास 22 नवम्बर से 30दिन। सायन धनु।

 पौराणिक उत्तरायण आरम्भ। पौराणिक दक्षिण गोल।.पौराणिक शिषिर ऋतु।

तपस मास 22 दिसम्बर से 29 दिन। सायन मकर।
तपस्य मास 20 जनवरी से 30 दिन। सायन कुम्भ।

 पौराणिक उत्तरायण। पौराणिक दक्षिण गोल। पौराणिक वसन्त ऋतु।

मधु मास 19 फरवरी से 30 या 31 दिन। सायन मीन।


 संवत्सर, अयन,तोयन, ऋतुओं और मासों के लिए  वेदिक काल में सायन सौर गणना ही प्रयुक्त होती थी। 
किन्तु आकाशीय विवरण के लिए वेदिक काल में नाक्षत्रिय निरयन गणनाएँ  प्रचलित थी।जैसी की आजतक भी है।

सायन गणनानुसार और नाक्षत्रिय निरयन गणनानुसार सौर वर्ष  में लगभग इकहत्तर सायन वर्ष में एक दिन का और 25780 सायन वर्षों में पुरे एक वर्ष का अन्तर पड़ता है। जब सायन सौर युग संवत्सर 25780 होगा तब निरयन सौर युग संवत्सर 25779 होगा।

चुँकि ग्रेगोरियन केलेण्डर सायन सौर गणनाधारित है अतः यही अन्तर ग्रेगोरियन केलेण्डर ईयर में भी लागु होता है। इस कारण लगभग 71 वर्ष में निरयन संक्रान्तियों की एक तारीख (Date) बढ़ जाती है। निरयन मेष संक्रान्ति 13 अप्रेल के स्थान पर 14 अप्रेल को होने लगती है।

वर्तमान में निरयन मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु मकर, कुम्भ और मीन मास का आरम्भ की ग्रेगोरियन केलेण्डर के दिनांक निम्नानुसार है।

 वर्तमान में निरयनमास का आरम्भ की ग्रेगोरियन केलेण्डर के दिनांक-- 

मेष         14 अप्रेल से          30 दिन।
वृष          14 मई से               31 दिन।
मिथुन     15 जून से             32 दिन। 
कर्क        16 जुलाई से         31 दिन।
सिंह        17 अगस्त से       31 दिन।
कन्या       17 सितम्बर से    30 दिन।
तुला         17 अक्टोबर से   30 दिन।
वृश्चिक      16 नवम्बर से      30 दिन।
धनु          16 दिसम्बर से    30 दिन।
मकर        14 जनवरी से      29 दिन।    
कुम्भ        13 फरवरी से      30 दिन।
मीन          14 मार्च से            31 दिन।

सुचना -- 
जब सुर्य और भूमि के केन्द्रों की दूरी जिस अवधि में अधिक होती है उस शिघ्रोच्च   (Apogee एपोजी) के  समय 30° की कोणीय दूरी पार करने में भूमि को अधिक समय लगता है अतः उस अवधि में पड़ने वाला सौर मास 31 दिन से भी अधिक 32 दिन का होता है। इसके आसपास के दो -तीन मास भी 31 होते हैं। इससे विपरीत उससे 180° पर शीघ्रनीच (Perigee  पेरिजी) वाला सौर मास 28 या 29 दिन का छोटा होता है। इसके आसपास के सौर मास भी 30- 30 दिन के होते हैं।
वर्तमान में 05 जनवरी को सुर्य सायन मकर  13°16' 20" या निरयन धनु 19° 08'25 " पर शिघ्रनीच का रहता है इस कारण यह मास 29 दिन का और इसके आसपास  तीन महिनें 30-30 दिन के  होते हैं। इसी कारण निरयन सौर संस्कृत चान्द्र संवत्सर में यह मास क्षय नही होता।
इसके 180° पर 04 जुलाई को सुर्य सायन कर्क  13°16' 20" या निरयन मिथुन 19° 08'25 " पर शिघ्रोच्च का रहता है इसी कारण यह मास 32 दिन का और इसके आसपास तीन तीन महिनें 31-31 दिन के  होते हैं।इसी कारण निरयन सौर संस्कृत चान्द्र संवत्सर में इस अवधि में ही कोई  मास  अधिक  होता है।

 निरयन सौर वर्ष और सायन सौर वर्ष में 25780 वर्षों में पुरे एक संवत्सर का अन्तर पड़ जाता है। इस अवधि में एक निरयन सौर संवत्सर से   सायन सौर संवत्सर एक वर्ष अधिक होता है। अर्थात यदि निरयन सौर संवत्सर 25780 है तो सायन सौर संवत्सर 25781 होगा। या यों भी कह सकते हैं कि,जब सायन सौर युग संवत्सर  
 25781होगा तब निरयन सौर युग 25780 रहेगा।
 लगभग 71 वर्षों में एक दिन का अन्तर एवम् 2148 वर्षों में एक मास का अन्तर पड़ जाता है। लगभग 4296 वर्षों में एक ऋतु का अन्तर, 6445 वर्षों में तीन मास का अन्तर पड़ता है।तथा 12890 वर्षों में एक अयन यानि छः मास का अन्तर पड़ जाता है। 

 लगध के ऋग्वेदीय वेदाङ्ग ज्योतिष के समय संवत्सरारम्भ सायन मेष संक्रान्ति के समय निरयन मकर संक्रान्ति भी पड़ती थी।
तो श्रीमद्भगवद्गीता में ऋतुओं में वसन्त और माहों में मार्गशीर्ष मास को विभूतिमय बतलाया है। क्यों कि किसी समय  संवत्सरारम्भ सायन मेष संक्रान्ति के समय निरयन सौर वृश्चिक संक्रान्ति पड़ती थी।

इसी कारण कभी संवत्सरारम्भ सायन मेष संक्रान्ति के समय निरयन सिंह संक्रान्ति भी पड़ती थी।
इसकारण केरल में निरयन सिंह संक्रान्ति को संवत्सर परिवर्तन होता है। 

 निरयन सौर युधिष्ठिर संवत

महाभारत काल के चान्द्र मास आधारित हर उनसाठवें और साठवें मास को अधिक मास कर फिर सामान्य मास वाली क्लिष्ट गणना को बन्द कर शुद्ध निरयन सौर युधिष्ठिर संवत लागु किया।
युधिष्ठिर नें निरयन सौर गणनानुसार  संवत्सर गणना आरम्भ करवा दी। ता कि, तारामंडल देखकर भी चलते रास्ते भी व्यक्ति संवत्सर और मास गणना कर सके।
किन्त इस गणना में 2248 वर्ष में एक मास का, 4296 वर्ष में एक ऋतु का अन्तर पड़ जाता है। इस कारण यह भी विशेष लोकप्रिय नही हुई। 

विक्रम संवत

युधिष्ठिर संवत 3044 पुर्ण होने पर उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने निरयन सौर विक्रम संवत  चला दिया। 


वेदिक सावन वर्ष गणना।

एक  सावन दिन दो सुर्योदय के बीच के समय को सावन दिन कहते हैं।
एक अहोरात्र या एक सावन दिन लगभग 60 घटिका का होता है।  
घटीका को घटी, घड़ी और नाड़ी भी कहते हैं। 
वर्तमान गणनानुसार एक सावन दिन 24 घण्टे का होता है।
एक सावन मास 30 सावन दिन का सावन मास होता है।
सामान्य सावन वर्ष  में बारह मास होते हैं अतः सामान्य सावन वर्ष में 360 सावन दिन होते हैं। 
पाँचवेँ वर्ष में एक अधिकमास किया जाता था अर्थात पाँचवा सावन वर्ष तेरह सावन मास का होता था। इसकारण पाँचवा वर्ष 390 सावन दिन का होता था।
किन्तु चालिसवाँ सावनवर्ष,और 3835 वाँ सावनवर्ष और 3840 वाँ सावन वर्ष 360 दिन का सामान्य वर्ष होता था। चालिसवाँ सावन वर्ष , तीन हजार आठ सौ पेंतीसवें सावन वर्ष और  तीन हजार आठ सौ चालिसवाँ सावन वर्ष बारह सावन मास का ही सामान्य सावन वर्ष होता था। फिर 7308 वाँ (सात हजार तीन सौ आठवाँ) सावन वर्ष भी 360 दिन का होता था।
इस प्रकार इन युग वर्षों में सायन वर्ष और सावन वर्षारम्भ एकसाथ हो जाते थे। यह गणना गणितागत न होकर मुलतः वेध आधारित थी । किन्तु गणीतीय सुत्र उपर्युक्तानुसार बनते हैं यह ऋषि गण जानते थे। 

                  वेदिक चान्द्र मास 

 वेदिक काल में भी अमावास्या से अमावस्या तक वाले चान्द्रमास भी प्रचलित थे। किन्तु संवत्सर आरम्भ का आधार सायन सौर मेष संक्रान्ति ही थी।
मा शब्द चन्द्रमा सुचक है। चन्द्रमा के मा से ही अमा अर्थात बिना चन्द्रमा वाली रात अमावस्या शब्द बना। और पुरे चन्द्रमा वाली रात पुर्णिमा से पुर्णिमा शब्द बना ।
मास यानि चन्द्रमा की एक सत्र पुर्ण होना। यह अवास्या से अमावस्या तक लगभग 29. 531 दिन का चान्द्रमास हो या पुर्णिमा से पुर्णिमा तक 29. 531 दिन का होता है।
तदनुसार बारह चान्द्रमास  354.367 दिन की अवधि को शुद्ध चान्द्र वर्ष कहते हैं। जो निरयन सौर वर्ष / नाक्षत्रीय वर्ष से 10.889 वर्ष छोटा है।और सायन सौर वर्ष से 10.875 दिन छोटा है।
बारह शुद्ध चान्द्रमास वाले शुद्ध चान्द्रवर्ष को सायन सौर वर्ष या निरयन सौर वर्ष से संगति बिठाने हेतु लगभग 32 चान्द्र  मास से 38 चान्द्र मास पश्चात अधिक मास करते हैं। इसकारण प्रायः अधिक मास वाला चान्द्र वर्ष तेरह चान्द्र मास का होता है। यानि अधिक मास वाला चान्द्र वर्ष 383.898 दिन का होता है।
इस पद्यति में चान्द्र मासों का नामकरण  चान्द्रमास के मध्य में  पुर्णिमा तिथि को चन्द्रमा जिस नक्षत्र में रहता है उस नक्षत्र के नाम के अनुसारं चैत्र, वैशाख, ज्यैष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन  नामकरण किया गया है। जो पुर्णिमा को होने वाले चन्द्र नक्षत्रानुसार  क्रमशः चित्रा से चैत्र, विशाखा से वैशाख, ज्यैष्ठा से ज्यैष्ठ, पूर्वाषाढ़ा से आषाढ़, श्रवण से श्रावण, उत्तराभाद्रपद से भाद्रपद, अश्विनी से आश्विन, कृतिका से कार्तिक, मृगशिर्ष से मार्गशीष, पुष्य से पौष, मघा से माघ और उत्तराफाल्गुनी से फाल्गुन मास नाम पड़े।

चान्द्र मास में अमावस्या से पुर्णिमा तक शुक्ल पक्ष और पुर्णिमा से अमावस्या तक कृष्णपक्ष कहलाता है। साथ ही चान्द्र मास मे अर्ध चन्द बिम्ब  रात्रि यानि शुक्ल पक्ष की साढ़े सप्तमी से कृष्णपक्ष की साढ़े सप्तमी तिथी  (साढ़े बाईसवीँ तिथी) तक उज्वल निषा से  अर्ध चन्द्र बिम्ब यानि कृष्णपक्ष की साढ़े सप्तमी तिथी  (साढ़े बाईसवीँ तिथी)  से शुक्ल पक्ष की साढ़े सप्तमी तक अन्धियारी रात वाले  तथा अष्टका एकाष्टका ( अष्टमी तिथि) के विभाग किये गये थे। यह प्रथक ईकाई है।

सुर्य से चन्द्रमा की 12° के अन्तर वाली  तिथियाँ  नही थी। केवल अमावस्या , पुर्णिमा तथा अर्धचन्द्र बिम्ब वाली रात्रि  अष्टमी तिथी तथा तेईसवीँ चन्द्रकला  (अष्टका - एकाष्टका)  ही प्रचलित थी।

 सुर्य से चन्द्रमा की 06° के अन्तर वाले करण भी प्रचलित नही थे।  सुर्य के सायन भोगांशों और चन्द्रमा के सायन भोगांशों के योग 180° और 369° या 00° होने पर व्यतिपात और वैधृतिपात योग प्रचलित थे।

                    महाभारत काल में

महाभारत काल मे निरयन सौर गणना और  चान्द्र मास तथा सावन दिन और चन्द्र नक्षत्र से तिथि गणना  प्रचलित हो गये थे।
 हर अट्ठावन चान्द्र मास के बाद दो अधिक मास होते थे।अर्थात हर उनसाठवाँ और साठवाँ चान्द्र मास अधिक होकर फिर अगले माह सामान्य होकर संवत्सर षुर्ण किया जाता था।
यह बहुत असहज गणना थी जो केवल भीष्म,विदुर, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, और युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण जैसे धर्मशास्त्री ही समझ पाते थे। दुर्योधन एवम् उसके साथी लोग भी समझाने पर भी नही समझ पाते थे।

पौराणिक निरयन सौर संस्कृत चान्द्र वर्ष 

निरयन सौर संक्रान्तियों से संस्कारित अमावस्या से अमावस्या तक वाले चान्द्र मास वाला निरयन सौर संस्कृत चान्द्र संवत्सर 

निरयन सौर संस्कृत चान्द्र संवत्सर जिस चान्द्र मास में दो निरयन सक्रान्तियाँ  पड़े अर्थात दो अमावस्याओं के बीच यदि दो निरयन सक्रान्तियाँ  पड़े  तो वह चान्द्रमास क्षय मास कहाता है। यह प्रायः 30 दिन वाले शीघ्र नीच वाले सौर मास के पहले वाले चान्द्रमास और बाद वाले चान्द्र मास में ही सम्भव होता है।  ऐसे क्षय मास 19 वें वर्ष,122 वें वर्ष और 141वें वर्ष मे पड़ते हैं।और
जिस निरयन सौर मास में दो अमावस्या पड़े अर्थात जब दो निरयन संक्रान्तियों के बीच दो अमावस्या पड़े तो वह चान्द्रमास अधिक मास कहलाता है। यह प्रायः 31 दिन वाले शिघ्रोच्च वाले सौर मास के पहले वाले चान्द्रमास और बाद वाले चान्द्र मास में ही सम्भव होता है।
जिस संवत्सर में क्षय मास आता है उस संवतसर में क्षय मास के पहले अधिक मास और क्षयमास के बाद पुनः अधिक मास होता है। इस प्रकार क्षय संवत्सर में दो अधिक मास होते हैं। इस कारण क्षय मास वाला संवत्सर और अधिक मास वाला संवत्सर दोनों ही  संवत्सर में तेरह चान्द्र मास होते हैं। इसकारण प्रायः क्षय मास वाला और अधिक मास वाले वर्ष भी 383.898 दिन का ही होता है। जबकि बिना अधिक मास बिना क्षयमास वाला सामान्य चान्द्रवर्ष शुद्ध चान्द्रवर्ष ही होता है इस कारण यह शुद्ध चान्द्र वर्ष 354.367   दिन का होता है।

 निरयन सौर संस्कृत चान्द्र शकाब्द

फिर विक्रम संवत 135 पुर्ण होनें पर  पेशावर, पटना और मथुरा में कुषाण वंशी सम्राट कनिष्क के राज्यारोहण पर कनिष्क नें शक संवत चला दिया। और उसी समय  दक्षिण में पैठण महाराष्ट्र में गोतमी पुत्र शातकर्णि  ने निरयन सौर संस्कृत चान्द्र गणनाधारित शकाब्द चला दिया गया। शक संवत चला दिया।जो लगभग अधिकांश.भारत में प्रचलित है।
अर्थात, 
युधिष्ठिर संवत 3178 वर्ष पश्चात युधिष्ठिर संवत 3179 के स्थान पर  और विक्रम संवत 135 समाप्त होने पर विक्रम संवत136 के स्थान पर शक संवत एक के साथ  निरयन सौर संस्कृत चान्द्र गणनाधारित शकाब्द चला दिया गया। जो आजतक चल रहा है।
ईस गणना से पुर्णिमा, अमावस्या तिथियों  और अष्टका एकाष्टका पर्व के अलावा चतुर्थी,  एकादशी, प्रदोष, शिवरात्रि आदि वृत आरम्भ हो गये।

 चन्दमा का भू परिभ्रमण

 चन्द्रमा के एक परिभ्रमण अवधि निरयन मेषादि बिन्दु / अश्विनी नक्षत्र आरम्भ बिन्दु से आरम्भ होकर पुनः निरयन मेषादि बिन्दु /अश्विनी नक्षत्र आरम्भ बिन्दु पर पहूँचने की  27. 322 दिन कीअवधि हो।

शनिवार, 27 जून 2020

ध्यान विधि

ध्यान
कृपया निम्न वाक्यांशों पर आपका ध्यानार्षण चाहूँगा।
आपने ध्यान दिया होगा, (गौर किया होगा), आपको ध्यान ही होगा, (स्मरण होगा), मैं आपका ध्यानाकर्षित करना चाहूँगा (चित्ताकर्षक/ एकाग्रता), विशेष ध्यान दीजिएगा (गौर फरमाइयेगा), आपको ध्यान है आज आपका जन्मदिन (नही) है? आपको ध्यान ही होगा कि, आजके ठीक एक साल पहलें ठीक इसी जगह इसी समय हमारा प्रथम परीचय हुआ था।(स्मरण होगा/ याद होगा), अरे आपका ध्यान भटक गया! चलो मुद्दे पर आते हैं।
इन सब वाक्यांशों में ध्यान शब्द आया है। सबमें ध्यान शब्द का अर्थ एकाग्रता, सचेत रहना, याद रखना, विशेष गौर करना आदि है। जिनको कहने आषय और उद्देश्य एक ही होता है।
अर्थात किसी चीज को सतत याद रखना, उसी पर केन्द्रित रहना ध्यान है। 
मैं आपसे पुछूँ कि, आपको ध्यान है आज आपने कौनसे कपड़े पहनें हैं, तो तुरन्त आपको स्मरण हो जायेगा , इस समय आप अन्य सब चीजें भूलकर केवल कपड़ो के विषय में ही सोचने लगे। बस यही तो ध्यान करना है । यही याद करना भी कहलाता है। आपका ड्रायविंग लायसेंस कब रिन्यू करवाना है ? उत्तर या तो सकारात्मक होगा या कहेंगे; अरे! अच्छा हुआ आपने याद दिला दिया मुझे तो ध्यान ही नही था।  यह विस्मृति ही ध्यान की विरुद्ध अवधारणा है। और स्मृति ही ध्यान है।
किसी स्वरुप का ध्यान करना मतलब उस नाम रूप को बारीकी से याद करना ही तो है।
अकारण दिमाग थकाने वाली जबर्जस्ती ध्यान नही है। क्योंकि, इस जबरजस्ती में आप मग्न नही हो सकते हैं। बिना मग्नता के ध्यान कैसा?
चित्ताकर्षक चिजों को याद करना,  भूली बिसरी कोई बात अचानक याद आजाना, उस याद में ही तल्लीन होजाना ये ध्यान ही तो है। फिर जोर जबरजस्ती की क्या आवश्यकता?
रमणेति रामः ; जो योगियों के चित्त में सदा रमण करता है वह राम है। योगिर्भिः ध्यान (न) गम्यम। योगियों के ध्यान से हटता ही नही। यहाँ यही अर्थ हुआ ना कि, योगियों को सदैव याद रहता हैयोगी उसे कभी भूलते नहीँ। 
आज तक के ध्यानाभ्यास में देखा होगा कि,
बैठनें का अभ्यास न होने के कारण पहले तो बैठने की आदत डालना पड़ता है, फिर प्राणायाम अभ्यास न होने से कभी श्वसन पर ध्यान जाना तो कभी कभी श्वसन ही भूलजाना और फिर लम्बी श्वाँस लेना या छोड़ना। प्रत्याहार का अभ्यास न होने से   कभी कहीँ खुजलाहट होना तो कभी असफलता की खीज होना, कभी पैरों में तो कभी कमर में दर्द होना बस यही ध्यान रहता है और धारणा का अभ्यास नही तो ध्यान कहाँ से लगेगा। ध्यान नही लगने की झुँझलाहट होती है। क्या ऐसे कोई ध्यान कर सकता है। कभी नही।
यह तो ठीक वैसा ही हुआ कि, भाषा के दोष निवारणार्थ सिखाया जाने वाला व्याकरण उसे सिखाते हैं जिसे वह भाषा न बोलना आती है न पढ़ना न लिखना। इसी कारण बच्चे गणित और विदेशी भाषा में कमजोर होते हैं।
अब आप उब गये ना? कहेंगे ये सब समस्या तो हमें भी पता है पर हल क्या है? यह तो बतलाओ।
हाँ भाई इसी जिज्ञासा को उत्पन्न करनें का ही उपक्रम कर रहा था। जिज्ञासु को दिया ज्ञान ही फलिभूत होता है। शोकिया ज्ञान भूलजाना स्वाभाविक है।
तो आप केवल चलते - फिरते, हँसते - रोते - गाते, सोते - जागते, कोई भी कार्य कर रहे हो हर समय किसी भी नाम या रुप को सतत याद रखनें की आदत बनालो।
अब आप कहेंगें कार्य करते समय, हँसते समय या रोते समय और विशेषकर सोते समय कैसे याद रहेगा?
अरे भाई! क्या कार्य करते समय आपको और कोई विचार नही आते? आते हैं ना?  तो उन विचारों में बहो मत। सतर्क रहो, सावधान होजाओ, बहना छोड़ो, अपनी इच्छानुसार तैरना सीखो। अपने मन को बारम्बार उसी ओर मोड़ते रहो।
  सर्वश्रेष्ठ तो है ॐ (ओ३म) का जप ध्यान या रामनाम जपना भी आसान है।पर यह केवल सुझाव है, निर्देश नही। आप अपना ध्यान कैसे रख सकते हैं यह आप स्वयम् किसी ओर से ज्यादा अच्छे से समझते हैं। ऐसे ही आप ध्यान कैसे कर सकते हैं यह आप ही ज्यादा अच्छी तरह जानते हैं।
मार्गदर्शक केवल दिग्दर्शन करते हैं मार्ग या पथ अपना स्वयम् ही खोजना चाहिए। कौनसी पट्टी सुगम होगी यह उसपर चलकर ही जानी जा सकती है। 
जैसे ही कोई अड़चन आई कि ॐ परमात्मा, ईश्वर गुरु (मार्गदर्शक) तत्काल उपस्थित होगें। आपको मार्गदर्शन कर चले जायेंगे। पर उँगली पकड़ कर नही चलायेंगे। हाथ तो आपको पकड़ना है। उनका सतत स्मरण ही हाथ पकड़ना है।
साथ साथ ही अहिन्सा, सत्य, अस्तैय,अपरिग्रह, पाँच यम।शोच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान ये पाँच नियम,आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधी के क्रम में ही अष्टाङ्गयोग अभ्यास जारी रखें।अन्तःकरण शुद्धि के लिये ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ,नृयज्ञ यानि अतिथि यज्ञ, , भूतयज्ञ यानि बलिवैश्वदेव और पितृयज्ञ भी साथ में करते रहें।जगत की निस्वार्थ सेवा में सदैव तत्पर रहैं।
बस योगिभिः ध्यानगम्यम्  प्रभु आके ध्यान से भी नही जायेंगे सदैव आपके ध्यान में बनें ही रहेंगे।

गायत्री मन्त्र का अर्थ

शुक्ल यजुर्वेद अध्याय 36 मन्त्र 3
ॐ भुर्भुवः स्वः । तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि ।  धियो यो नः प्रचोदयात् ।

ॐ भुः भुवः स्वः। 
तत् सवितुः वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि ।  
धियो यो नः प्रचोदयात्।

कल्याण स्वरुप,

भुः प्राणाधार , अर्थात जैसे जीवन का आधार भूमि है  वैसे जो प्राणों का आधार है अतः भूः।

भुवः अर्थात  अन्तरीक्ष के समान  दुःख नाशक होने से भुवः।

स्वः स्वर्ग (सुवर्ग) के समान प्रेरक, चेष्ठा करने की प्रेरणा देनेवाला, आनन्दघन होने से आनन्दकर्ता, आनन्द का कारण होने से स्वः।

तत् अर्थात वह, या उस ,

सवितुः ,  सवितृ अर्थात हमारे सुर्य मार्तण्ड के समान सृष्टिकर्ता जनक/ जन्मदाता, जगत को सत्कर्म में प्रेरित करनेवाला प्रेरक, सञ्चालक, तथा  रक्षक होने से सवितृ, 

वरेण्यम् अर्थात वरणीय या वरने योग्य,

भर्गो - भर्ग यानि  अविद्या नाशक, ज्ञान स्वरूप, प्रकाश  होने से भर्ग ,

देवस्य  - देव का
देव यानि प्रकाशक, जो अन्तकरण को ज्ञान से प्रकाशित करदे ऐसे ज्ञानदाता का

धीमहि अर्थात ध्यान करते हैं, अविरत हर समय स्मरण रखते हैं,
धिः मतलब बुद्धि और यो मतलब कर्म  
अतः धियो यानि बुद्धि और कर्मों को

यो मतलब जो,

नः हमारे एवम् अपनी ओर  दोनों अर्थ होते हैं।

प्रचोदयात् यानि प्रेरित करे और ले चले दोनों अर्थ हैं।

ॐ भुः भुवः स्वः। तत् सवितुः वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि ।  धियो यो नः प्रचोदयात्।

अर्थात कल्याण स्वरुप, परमात्मा ही प्राणाधार है,वह विश्वात्मा ही दुःखनाशक है, वह परब्रह्म ही चेष्ठा करवाने वाला, प्रेरक एवम् आनन्दघन , आनन्द का कारण,आनन्द कर्ता है।
हम उस वरने योग्य परमपिता जनक, प्रेरक, रक्षक , अविद्या नाशक, ज्ञान स्वरूप प्रकाश के प्रकाशक का यानि अन्तःकरण में ज्ञान का प्रकाश प्रकाशित करने वाले परम गुरु का ध्यान करते हैं, चित्त में धारण करते हैं ,अविरत हर समय, हर अवस्था में स्मरण रखते हैं।
वे परमेश्वर प्रभु हमारे बुद्वि और कर्मों को अपनी ओर प्रेरित करें, अपनी ओर ले चलें। 

परमात्मा ने वेदों को ब्रह्मर्षियों के अन्तःकरण में सीधे प्रकाशित किया, वेदिक मन्त्र बड़े से भी महत्तर हैं इसलिए वेदिक मन्त्रों को ब्रह्म कहा जाता है। ब्रह्म यानि वेदमन्त्र स्वयम् सिद्ध हैं। 
सावित्री मन्त्र सभी वेदों में है। यजुर्वेद में ही दो जगह है। यह गायत्री मन्त्र की महत्ता सिद्ध करती है।अतः इसे मन्त्रराज कहा जाता है। 
गायत्री मन्त्र के नाम से प्रसिद्ध इस सावित्री मन्त्र में अलोकिक स्तुति और अलोकिक प्रार्थना की गयी है। इसमें कोई भौतिक सुख सम्पदा की माँग न करते हुए सीधे अपने आप को ईश्वरार्पण करने की ,ईश्वरार्पित होनें की चाहत ही दर्शायी है। हमारे बुद्धि कर्मों को अपनी ओर ले चलो, ऐसी अद्भुत प्रार्थना की गयी है।
ऐसे स्वयम सिद्ध वेद मन्त्रों की सिद्धि नही होती। इन मन्त्रों को अन्तःकरण में धारण कर इन्हें अन्तःकरण में ही प्रकट करने वाले दृष्टा को ही ऋषि कहते हैं।
मतलब वेद मन्त्रों का दर्शन बोध होता है।वेद मन्त्र स्वयम्भू स्वयम् सिद्ध हैं। उन्हे क्या सिद्ध करोगे ?
किसी तान्त्रिक द्वारा रचित तान्त्रिक मन्त्रों को उनके द्वारा बतलाई गयी  निर्धारित तान्त्रिक विधि से निश्चित संख्या में तान्त्रिक मन्त्र का ध्यान पुर्वक जप करके सिद्ध करना पड़ता है। वेद मन्त्रों का दर्शन होता है।बोध होता है ; सिद्धि नही करना पड़ती है।



शुक्रवार, 26 जून 2020

भारत वर्ष में प्रचलित वर्ण व्यवस्था, वास्तविक जातियाँ यानि भौगोलिक जातियाँ / तथा वर्तमान जातिप्रथा में अन्तर

जातियाँ यानि  Human race

                          *ब्रह्मा* 

चार वर्ण और जातियोँ  यानि  Human *race*  की उत्पत्ति ब्रह्मा से बतलाई जाती है अतः ब्रह्मा का  विवरण समझना आवश्यक है। इस लिए पहलें भूमिका के रूप में ब्रह्मा कौन है, क्या है, कैसा है यह समझने के लिये सृष्टि उत्पत्ति  का विवरण संक्षिप्त में समझलें। ताकि,  वर्ण व्यवस्था, जातिव्यवस्था और  वर्तमान जातिप्रथा व्यवस्था का भेद समझनें में कठिनाई न हो।

सृष्टि उत्पत्ति विवरण ब्रह्मा की उत्पत्ति - परमात्मा से सदसस्पति तक

सर्रव प्रथम केवल परमात्मा ही था और कुछ नही था। परमात्मा ने ॐ संकल्प के साथ स्वयम् को विश्वात्मा ॐ के स्वरूप में प्रकट किया।

उस ॐ संकल्प के अन्तर्गत ही विश्वात्मा ॐ ने स्वयम् को प्रज्ञात्मा परब्रह्म के स्वरूप में प्रकट किया। 
किन्तु मानवीय समझ के अनुसार इन स्वरुपों को समझना कठिन होता है अतः  मानवीय सोच में पुरुष और नारी स्वरुप में ही देखने समझने की प्रवृत्ति अनुसार शास्त्रों ने प्रज्ञात्मा परब्रह्म को भी आध्यात्मिक और आधिदैविक दृष्टि से शक्तिमान और शक्ति एवम् पुरुष और स्त्री के स्वरूप में व्यक्त किया । तदनुसार  --

प्रज्ञात्मा परब्रह्म को  परम दिव्य पुरुष  और परा प्रकृति के आध्यात्मिक स्वरूप में वर्णित किया जिसे आधिदैविक दृष्टि से  विष्णु और  माया के स्वरूप में  भी वर्णित किया गया । 

यह ऐसा ही विभाजन है जैसे सुर्य और उसका प्रकाश। जिन्हें अलग अलग देखा तो नही जा सकता किन्तु समझा जा सकता है। ऐसे ही परम दिव्य पुरुष विष्णु की परा प्रकृति माया है। जो सत असत अनिर्वचनीय है। यह विष्णु के लिये उनकी कल्पना है और हमारे लिये अनुभव गम्य होने से सत्य है और ज्ञानियों के लिये आभास मात्र है।साथ ही

प्रज्ञात्मा परब्रह्म ने स्वयम् को प्रत्यागात्मा ब्रह्म के स्वरूप में प्रकट किया। 
प्रत्यागात्मा ब्रह्म को  शास्त्रों नें अध्यात्म दृष्टि से पुरुष और  प्रकृति  स्वरूप में बतलाया तथा आधिदैविक स्वरूप में सवितृ देव और सावित्री देवी के स्वरूप में वर्णन किया। ये ही पुराणों में श्री हरि और कमला कहलाते हैं।

प्रत्यागात्मा ब्रह्म ने स्वयम को जीवात्मा अपरब्रह्म के स्वरूप में प्रकट किया। 
जीवात्मा अपरब्रह्म को शास्त्रों नें अपर पुरुष जीव और त्रिगुणात्मक  अपरा प्रकृति के स्वरूप मे वर्णन किया।इस त्रिगुणात्मक अपरा प्रकति को सांख्य में प्रधान कहते है।  आधिदैविक रूप से इन्हे नारायण  और  श्री लक्ष्मी स्वरूप के स्वरूप में  बतलाया गया है।
(सुचना -- लोग विष्णु, हरि और नारायण सबको एक ही समझते हैं ऐसे ही माया,(योगमाया), कमला, श्री और लक्ष्मी सबको एक ही समझते हैं।  किन्तु विष्णु और माया तथा श्रीहरि और कमला तथा नारायण और श्री एवम् लक्ष्मी सब अलग अलग स्वरूप हैंं।)

जीवात्मा अपरब्रह्म ने स्वयम् को भुतात्मा पञ्चमुख  हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के स्वरूप में प्रकट किया।
शास्त्रों में भूतात्मा हिरण्यगर्भ ब्रह्मा को प्राण - धारयित्व, तथा चेतना - धृति, तथा  देही - अवस्था के अध्यात्मिक स्वरूप में वर्णन किया है। और आधिदैविक स्वरूप में इन्हें त्वष्टा और रचना के स्वरूप में बतलाया है। 

वर्तमान श्वेत वराह कल्प के आरम्भ में --भूतात्मा हिरण्यगर्भ ब्रह्मा ने स्वयम् को सनक, सनन्दन, सनत्कुमार ,सनातन और नारद जैसे अकेले पुरुष ही रचे किन्तु उनसे सृष्टि का विकास नही होसका। 
तब हिरण्य गर्भ ब्रह्मा को रोष (क्रोध) हुआ। हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के रोष से अर्धनारीश्वर महारुद्र पशुपति शंकर हुए।
किन्तु महारुद्र के स्वभाव में ही सृजनात्मकता नहीं थी । इसलिए महारुद्र ने सृजन करने में असमर्थता प्रकट की।तब हिरणयगर्भ ब्रह्मा के निर्देश पर  महारुद्र अपने कारण हिरण्यगर्भ ब्रह्मा में पुनर्लीन होकर तप में संलग्न हो गये। सृष्टि उत्पत्ति के अन्तिम चरण में ये पुनः प्रकट हुए।

हिरण्यगर्भ ब्रह्मा स्वयम् सुत्रात्मा  प्रजापति ब्रह्मा के स्वरूप में प्रकट हुए। 
सुत्रात्मा चतुर्मुख प्रजापति ब्रह्मा को शास्त्रों नें संज्ञान - संज्ञा, रेतधा- स्वधा तथा ओज- आभा के आध्यात्मिक स्वरुप में वर्णन किया जाता है  और पाँच आधिदैविक स्वरूप  
1 देवेन्द्र - शचि 
2 दक्ष प्रजापति - प्रसुति
3 रुचि प्रजापति - आकुति
4 कर्दम प्रजापति - देवहूति
5 स्वायम्भुव मनु - शतरूपा 
रूप देवराज इन्द्र एवम् चार प्रजापतियों और उनकी पत्नियों के स्वरूप में वर्णन किया है।
इनके अलावा सुत्रात्मा प्रजापति ने (6) मरीची, (7) भृगु, (8) अत्रि, (9) वशिष्ठ,(10) अङ्गिरा, (11) पुलह, (12) पुलस्य, (13) कृतु, (14) धर्म, (15) अग्नि और (16) सोम को उत्पन्न किया।
दक्ष (प्रथम) प्रजापति की पुत्रियों से उक्त प्रजापतियों का विवाह हुआ। 
इस प्रकार सुत्रात्मा प्रजापति ब्रह्मा ने ही जैविक सृष्टि का आरम्भ किया।
(सुचना -- नारायण ब्रह्मा , हिरण्यगर्भ ब्रह्मा, प्रजापति ब्रह्मा, ब्रहस्पति, ब्रह्मणस्पति, और वाचस्पति तथा दक्षादि नौ ब्रह्मा सबको ब्रह्मा कहा जाता है। सामान्य तया हिरण्यगर्भ ब्रह्मा को ब्रह्मा कहते हैं।)
(विशेष सुचना -- 1 ऐसा भी उल्लेख है कि, पहले प्रजापति ब्रह्मा भी पञ्चमुखी थे।प्रजापति ब्रह्मा ने हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के द्वारा उत्पन्न  वेद की देवी/  ज्ञान की देवी सरस्वती से विवाह किया। इससे नाराज रुद्र ने उनका एक सिर काट दिया इससे  वे पञ्चमुख से चतुर्मुख हो गये।)
(विशेष सुचना 2  उक्त इन्द्र प के अलावा भी प्रत्यैक मन्वन्तर में अलग अलग देवराज होते हैं। उन्हें भी इन्द्र कहा जाता है। वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर में पुरन्दर नामक इन्द्र हैं। पुरन्दर की पत्नी का नाम भी शचि है जो असुर पुत्री है। द्वादश आदित्यों में भी एक इन्द्र हैं। इसके अलावा कश्मीर तिब्बत पामिर के पठार के मध्य भी भूमि पर स्वर्ग कहलाता है। इनके राजा भी इन्द्र हैं। और सिरिया के सुरों के राजा सुरेश को भी इन्द्र कहा जाता है।)
(विशेष सुचना -- 3 दक्ष प्रथम की पत्नी प्रसुति थी। दक्ष प्रथम स्वायम्भूव मन्वन्तर में रहे। दक्ष प्रथम और प्रसुति की चौवीस पुत्रियाँ हुई। जबकि दक्ष द्वितीय प्रचेताओं के पुत्र थे। दक्ष द्वितीय वर्तमान वेवस्वत मन्वन्तर में हुए।दक्ष द्वितीय की पत्नी का नाम असिक्नि था। दक्ष द्वितीय की साठ पुत्रियाँ हुई।)

सुत्रात्मा चतुर्मुख प्रजापति ब्रह्मा ने स्वयम को अणुरात्मा बृहस्पति के स्वरूप में प्रकट किया।
अणुरात्मा ब्रहस्पति को तेज - विद्युत के रूप में और आधिदैविक दृष्टि से इन्द्र और शचि के रुप में बतलाया गया है।(ये सुत्रात्मा प्रजापति से उत्पन्न इन्द्र ही हैं।)
 
अणुरात्मा ब्रहस्पति नें स्वयम् को विज्ञानात्मा ब्रह्मणस्पति के स्वरूप में प्रकट किया। 
विज्ञानात्मा ब्रह्मणस्पति को शास्त्रों में अध्यात्मिक दृष्टि से विज्ञान- विद्या तथा चित्त - वृत्ति तथा चित्त और चेत के स्वरूप में जानते हैं (चेतन्यता को चेत कहा गया है) एवम् आधिदैविक दृष्टि से द्वादश आदित्य और उनकी शक्तियों के रूप में बतलाया गया हैं।

विज्ञानात्मा ब्रह्मणस्पति ने स्वयम् को ज्ञानात्मा वाचस्पति के स्वरूप में प्रकट किया। 
विज्ञानात्मा ब्रह्मणस्पति को बुद्धि और मेधा के अध्यात्मिक स्वरूप में तथा अष्टवसुओं और  उनकी शक्तियों के आधिदैविक स्वरुप में जाने जाते है।

विज्ञानात्मा ब्रह्मणस्पति ने स्वयम् को लिङ्गात्मा महारुद्र पशुपति अर्धनारीश्वर शंकर के स्वरूप में प्रकट किया। 
(सुचना -  ये वही महारुद्र पशुपति शंकर हैं जो हिरण्यगर्भ ब्रह्मा में पुनर्लीन होकर तप कर रहे थे।)
लिङ्गात्मा महारुद्र पशुपति अर्धनारीश्वर शंकर ने स्वयम् को दस और रुद्र स्वरूप में प्रकट किया। शंकरजी सहित ये ग्यारह रुद्र कहलाते हैं।
लिङ्गात्मा महारुद्र पशुपति अर्धनारीश्वर शंकर को अध्यात्मिक दृष्टि से अहंकार और अस्मिता के रूप में और आधिदैविक रूप में शंकर जी के द्वारा प्रकट दश रुद्र और रौद्रियो के रूप में जानते हैं।

लिङ्गात्मा महारुद्र पशुपति ने स्वयम् को मनसात्मा गणपति के स्वरूप में प्रकट किया।
मनसात्मा गणपति को अध्यात्मिक दृष्टि से  मन और संकल्प --विकल्प के रूप में एवम् आधिदैविक स्वरूप में सोम और वर्चा के स्वरूप में जानते हैं।

मनसात्मा गणपति ने स्वयम् को स्व और स्वभाव के अध्यात्मिक स्वरूप में एवम्  सदसस्पति और समिति (भारती देवी) के आधिदैविक स्वरूप में प्रकट किया।
समस्त भौतिक जगत के सभी तत्व इन स्व - स्वभाव यानि सदसस्पति - समिति (भारती देवी) से ही प्रकट हुए हैं।

 काल गणना -- हिरण्यगर्भ ब्रह्मा से बृहस्पति आदि देवगणों और फिर सदसस्पति तक की आयु, अवस्था एवम् शेष अवधि की गणना विवरण एवम्  कल्प, सृष्टि ,मन्वन्तर और महायुग का आरम्भ से अन्त तक की अवधि / आयु तथा व्यतीत समय/ अवस्था और शेष अवधि का विवरण -- 

 भूतात्मा हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की आयु और प्राकृत प्रलय-- 
भूतात्मा हिरण्यगर्भ ब्रह्माकी आयु ब्रह्मा के सौ वर्ष होती हैं। जिसमें मानवों के इकतीस नील, दस खरब, चालिस अरब सायन सौर वर्ष होते हैं।  वर्तमान में ब्रह्मा की आयु पचास वर्ष पुर्ण होकर एक्कावनवें वर्ष में प्रथम दिन के छः मन्वन्तर पुर्ण होकर सातवें मन्वन्तर के सत्ताइस महायुग पुर्ण होकर अट्ठाइसवें महायुग के सतयुग, त्रेता और द्वापर युग व्यतीत होकर अट्ठाइसवें कलियुग के 5121 वर्ष पुर्ण हो चुके हैं।  यानि मानवीय वर्ष में पन्द्रह नील,पचपन खरब, एक्कीस अरब, सिन्त्यानवे करोड़, उन्तीस लाख, उन्चास  हजार, एक सौ एक्कीस सायन सौर वर्ष पुर्ण हो चुके हैं। और पन्द्रह नील,पचपन खरब,अठारह अरब, दो करोड़, सत्तर लाख, पचास हजार आठ सौ नवासी सायन सौर वर्ष शेष हैं इसके बाद प्राकृत प्रलय हो जायेगा।और भूतात्मा हिरणण्गर्भ ब्रह्मा अपने कारण जीवात्मा अपर ब्रह्म में लीन हो जायेंगे। तब इकतीस नील, दस खरब, चालिस अरब सायन सौर वर्ष तक बुद्धि से अनुभवगय्य कुछभी नही रहेगा। एकार्णव में नारायण योगनिन्द्रा लीन रहेंगे। केेेवल महाकाल और महादिक एक ही हो जायेेंगे।

सुत्रात्मा प्रजापति की आयु एक कल्प और नैमित्तिक प्रलय --
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा का एक दिन अर्थात एक कल्प एक हजार महायुग का  और  एक एक हजार महायुग की रात्रि होती है। मानवीय गणना में हिरण्यगर्भ ब्रह्मा का एक दिन चार लाख बत्तीस हजार वर्ष का होता है जिसे कल्प कहते हैं। इस अवधि में ही सृष्टि रहती है। चार लाख बत्तीस हजार वर्ष की ही हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की एक रात्रि होती है। इस अवधि में नेमित्तिक प्रलय रहता है। इस समय ब्रह्माण्ड भी नही रहता। कल्पारम्भ पश्चात सृष्टि आरम्भ के समय ब्रह्माण्ड सुत्रात्मा प्रजापति से ही पुनः प्रकट होता है।

वर्तमान श्वेतवराह कल्प आरम्भ हुए एक अरब सिन्त्यानवे करोड़ उन्तीस लाख उनचास हजार एकसौ एक्कीस सायन सौर वर्ष पुर्ण हो चुके हैं।और दो अरब, चौतीस करोड़, सत्तर लाख,पचास हजार, आठ सौ नवासी सायन सौर वर्ष शेष हैं। 
कल्पान्त में चौदहवें मन्वन्तर के अन्त में भी कल्पान्त के एक सतयुग तुल्य अवधि अर्थात सत्रह लाख अट्ठाइस हजार वर्ष पहले  जैविक प्रलय आरम्भ होकर कल्पान्त में नैमित्तिक प्रलय हो जाता है । नैमित्तिक प्रलय में यह ब्रह्माण्ड नष्ट हो जायेगा।और सुत्रात्मा प्रजापति अपने कारण भूतात्मा हिरण्यगर्भ ब्रह्मा में लीन हो जायेंगे। 
फिर अगले ब्राह्म दिन यानि कल्प के आरम्भ में प्रजापति ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं। प्रजापति ब्रह्मा सृष्टि का सृजन करते हैं।

कल्पारम्भ में एक सतयुग तूल्य यानि सत्रह लाख अट्ठाइस हजार वर्ष  की सन्धि होती है इसके बाद  मन्वन्तर आरम्भ होता है। मन्वन्तर में जैविक सृष्टि होती है और पुरे मन्वन्तर में जेविक सृष्टि रहती है।

 देवताओं और मनुओं की आयु एक मन्वन्तर और जैविक प्रलय--
प्रत्येक कल्प में चौदह मनु होते हैं । मनु के जीवनकाल यानि मन्वन्तर तीस लाख बत्तीस हजार सायन सौर वर्ष का होत हैं। प्रत्येक मन्वन्तर के आरम्भ में सतयुग तुल्य सत्रह लाख अट्ठाइस हजार वर्ष की सन्धि और मन्वन्तर के अन्त में सतयुग तुल्य सत्रह लाख अट्ठाइस हजार वर्ष का सन्ध्यांश होता है। प्रत्येक मन्वन्तर में इकहत्तर महायुग व्यतीत हो जाते हैं। 
प्रत्यैक मन्वन्तर के अलग अलग  इन्द्र,  देवगण और  सप्तर्षि होते हैं। प्रत्येक मन्वनतर के आरम्भ में पुरानें मन्वन्तर के बीज से नवीन मन्वन्तर की जैविक सृष्टि होती है और मन्वन्तर के अन्त में जैविक प्रलय होता है। 

वर्तमान सृष्टि आरम्भ हुए एक अरब  पिच्चानवे करोड़, अट्ठावन लाख,पिच्चासी हजार, एकसौ एक्कीस सायन सौर वर्ष हो चुके हैं।तथा सृष्टि समाप्ति को दो अरब चौतीस करोड़, तिरपन लाख,बाईस हजार, आठसौ नवासी सायन सौर वर्ष शेष बचे हैं। फिर इसके बाद श्वेतवाराह कल्प का चौदहवाँ और अन्तिम जैविक प्रलय हो जायेगा। तथा एक सतयुग तुल्य अवधि; सत्रह लाख अट्ठाइस हजार सायन सौर वर्ष पश्चात कल्पान्त होने से नैमित्तिक प्रलय हो जायेगा। ब्रह्माण्ड नष्ट हो जायेगा। सुत्रात्मा प्रजापति ब्रह्मा अपने कारण भूतात्मा हिरण्यगर्भ ब्रह्मा में लीन हो जायेंगे।

वर्तमान मन्वन्तर के बारह करोड़, पाँच लाख, तैंतीस हजार, एकसौ एक्कीस सायन सौर वर्ष व्यतीत हो चुके हैं और अठार  करोड़, इकसठ लाख छिंयासी हजार, आठ सौ नवासी सायन सौर वर्ष शेष बचे हैं। इसके बाद जैविक प्रलय होगा।

अणुरात्मा ब्रहस्पति, (तेज - विद्युत / इन्द्र शचि) , विज्ञानात्मा ब्रह्मणस्पति (चित्त वृत्ति/ द्वादशआदित्य), ज्ञानात्मा वाचस्पति (बुद्धि-मेधा/ अष्टवसु), लिङ्गात्मा पशुपति (अहंकार- अस्मिता/दश रुद्र-रौद्रियाँ) और मनसात्मा गणपति (मन- संकल्प/ सोम- वर्चा) तक के सभी देवताओं की आयु एक मन्वन्तर अर्थात तीस लाख बत्तीस हजार सायन सौर वर्ष होती है। इसलिये ये देवता अमरगण कहलाते हैं।
एक महायुग तिरयालिस लाख, बीस हजार सायन सौर वर्ष का होता है। इसमें एक सदसस्पति की आयु पुर्ण होतीहै। जिसमें से वर्तमान महायुग आरम्भ और स्व /सदसस्पति समिति (भारती देवी) के अड़तीस लाख, तिरयानवे हजार, एक सौ एक्कीस सायन सौर वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। तथा वर्तमान महायुग और वर्तमान कलियुग को समाप्त होनें में अभी चार लाख,  छब्बीस हजार, आठ सौ नवासी सायन सौर वर्ष शेष हैं । इसके पश्चात स्वभाव समिति (भारती) अपने कारण मनसात्मा गणपति में लीन हो जायेंगे तथा वापस सतयुग आरम्भ हो जायेगा।

कल्कि अवतार होने को अभी चार लाख, छब्बीस हजार, अट्ठावन वर्ष शेष हैं। वे कलियुग समाप्ति के आठसौ एक्कीस वर्ष पहलें जन्म लेंगे।

 भारतवर्ष में वेदिक वर्णश्रम धर्म  या  वेदिक प्रवृत्ति मार्ग का आरम्भ   -- 

प्रजापति ब्रह्मा के प्रथम मन्वन्तर के आरम्भ में 1 दक्ष 2 मरीची, 3 भृगु, 4 अत्रि, 5 वशिष्ठ,6 अङ्गिरा, 7 पुलह,8 पुलस्य,9 कृतु,10 रुचि , 11 कर्दम ,12 स्वायम्भुव मनु 13 धर्म,14 अग्नि, 15 सोम को उत्पन्न किया। दक्ष (प्रथम) प्रजापति की पुत्रियों से इनका विवाह हुआ।
हुए ये सभी सब प्रजापति भी कहलाते हैं ।  इनमें से रुचि और कर्दम को छोड़   1 दक्ष 2 मरीची, 3 भृगु, 4 अत्रि, 5 वशिष्ठ,6 अङ्गिरा, 7 पुलह,8 पुलस्य,9 कृतु को नौ ब्रह्मा कहते हैं। 
प्रजापति ब्रह्मा ने दक्ष (प्रथम) -  प्रसुति, रुचि -आकुति,कर्दम - देवहूति और  स्वायम्भुव मनु  - शतरूपा, ये चार को  युग्म अर्थात जोड़े से  उत्पन्न किया। किन्तु प्रसुति, देवहूति और आकुति कै स्वायम्भुव मनु और शतरूपा की पुत्री भी माना जाता है। सम्भवतः  स्वायम्भुव मनु ने इनको पुत्री मान लिया हो अर्थात मानस पुत्रियाँ होंं। उक्त  सभी ऋषि और स्वायम्भूव मनु भी प्रजापति ही थे। पर इनमें विशेषरूप से दक्ष प्रजापति (प्रथम) रुचि प्रजापति और कर्दम  प्रजापति को प्रजापति कहते हैं।  ये वेदिक वर्णश्रम धर्म यानि प्रवृत्ति मार्ग के प्रवर्तक हुए। ये पञ्चमहायज्ञ यज्ञ ,अष्टाङ्गयोग  और ज्ञान मार्ग का अनुसरण कर सर्वव्यापी विष्णु के  स्वरुप मे ईश्वर की आराधना उपासना करते थे।

इन ऋषियों या प्रजापतियों की जो सन्तान ब्रह्म ज्ञानि ऋषि हुई वे ब्राह्मण कहलाये। जो वेदों के जानकार हुए वे विप्र कहलाये। जिनकी प्रवृत्ति रक्षण की थी, जो साहसी, वीर थे वे क्षत्रिय कहलाये। जो व्यव्हार कुशल कृषि,पशुपालन और लेनदेन में कुशल थे वे वैष्य कहलाये। जो सेवाभावी, कुशल कार्मिक थे वे शुद्र कहलाये। इनकी सन्तानों में उनके गुण कर्मानुसार उनके वर्ण की माने गये। 

 स्वायम्भुव मनु के पुत्र उत्तानपाद और प्रियवृत हुए। उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव और उत्तम हुए। और प्रियवृत के आग्नीन्ध्र आदि नौ पुत्र हुए।

स्वायम्भुव मनु और शतरूपा के पुत्र प्रियवृत को के दस पुत्र और तीन मानस पुत्रियाँ हुई। जिनमें तीन पुत्र निवृत्ति परायण हो गये। मनु पुत्रों में निवृत्ति मार्ग का प्रारम्भ यहीँ से हुआ। शेष सात पुत्रों को प्रियवृत ने सप्तद्विपों का उत्तराधिकारी बनाया। उनमें से आग्नीन्ध्र को जम्बूद्वीप मिला।

आग्नीन्ध्र के पुत्र अजनाभ हुए।अजनाभ को जम्मुद्वीप का दक्षिणी भाग का उत्तराधिकार मिला। उनने उसभाग को अजनाभ वर्ष नाम दिया।अजनाभ को नाभि और अजनाभ वर्ष को नाभिवर्ष भी कहते हैं। 

अजनाभ के पुत्र ऋषभदेव हुए। ऋषभदेव को भी अजनाभ वर्ष/नाभिवर्ष का राज्य उत्तराधिकार में मिला। 

ऋषभदेव के पुत्र भरत चकृवर्ती हुए । भरत चकृवर्ती को भी नाभिवर्ष उत्तराधिकार में मिला पर उनने अजनाभ वर्ष / नाभिवर्ष का नाम बदलकर भारतवर्ष रखा। तब से यही नाम प्रचलित है।


                     वर्ण व्यवस्था
 ब्राह्मण वर्ण -- ब्राह्मण वर्ण है न कि जाति।ब्राह्मण जन्म से नही होता। प्रजापति ब्रह्मा के पुत्र 1 दक्ष 2 मरीची, 3 भृगु, 4 अत्रि, 5 वशिष्ठ,6 अङ्गिरा, 7 पुलह,8 पुलस्य,9 कृतु हुए ये सब प्रजापति हुए। ये नौ ब्रह्मा कहलाते हैं। इनके अलावा 10 रुचि प्रजापति और 11 कर्दम  प्रजापति हुए जो सब आत्मज्ञ ब्रह्म ज्ञानी थे। इनकी सन्तान भी आत्मज्ञ ब्रह्म ज्ञानी होने से ब्राह्मण कहलाई। ये स्वायम्भूव मन्वन्तर में हुए और रहे।
 इन ऋषियों ने अपनी सन्तानों को हिरण्यगर्भ ब्रह्मा से प्राप्त वेदों का ज्ञान दिया।इस कारण वेआत्मज्ञ ब्रह्म ज्ञानी होगये अतः ये ब्राह्मण कहलाते हैं और *ब्रह्मज्ञानियों द्वारा पालन किया गया सनातन वेदिक धर्म ब्राह्म धर्म और ऋषियों द्वारा पालित होने से आर्षधर्म कहलाया।* 
ये ही वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर तक भी यही परम्परा विद्यमान है।
बाद में इनके कुछ वंशज गुण कर्मानुसार क्षत्रिय होगये तो कुछ वैष्य भी हुए और कोई कोई शुद्र भी हो गये।
वर्तमान में वास्तविक आत्मज्ञ ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण और वेदपाठी विप्र दुर्लभ हो गये हैं। पञ्चाग्निसेवी कर्मनिष्ठ श्रोत्रिय भी दुर्लभ हैं। द्विजत्व भी नही के बराबर ही बचा है।

क्षत्रिय वर्ण  मनुर्भरत - प्रजापति ब्रह्मा के पुत्र स्वायम्भुव मनु हुए।ये भी प्रजापति ही थे। स्वायम्भुव मनु की सन्तान गुण कर्मानुसार क्षत्रिय कहलायी हैं।इनका वर्ण क्षत्रिय था न कि, जाति।
स्वायम्भुव मनु के कई वंशज ब्रह्मज्ञानी होकर ब्राह्मण भी होगये, तो कुछ वैष्य भी हुए।  
स्वायम्भुव मनु की पत्नि शतरूपा के दो पुत्र उत्तानपाद और प्रियवृत  हुए। प्रियवृत के पुत्र आग्नीन्ध्र जम्मुद्वीप के शासक हुए। आग्नीन्ध्र के पुत्र नाभि या अजनाभ को जम्मुद्वीप का दक्षिणी हिस्से का शासनाधिकार मिला। उनने इसे नाभिवर्ष या अजनाभ वर्ष नाम दिया।
नाभि के पुत्र ऋषभदेव हुए।ऋषभदेव के पुत्र भरत चक्रवर्ती हुए।
भरत चक्रवर्ती ने जम्मुद्वीप के इस दक्षिणी भाग का नाम भारत वर्ष रखा। जो आजतक प्रचलित है। इन्ही भरत की सन्तान मनुर्भरत कहलाती है।  
मनुर्भरत मूल भारतीय है। मनुर्भरतों का निवास क्षेत्र मूख्यतः पञ्जाब,कश्मीर, सिन्ध वाले क्षेत्र में था। उस समय आर्यावृत में ही मानव फैल पाये थे। दक्षिण में मानव नही बसे थे। भारतीय धर्म संस्कृति इन्हीं की देन है।  वास्तव में आर्य किसी भी जाति का नाम नही है। उक्त दक्ष आदि वेदिक ऋषियों के अतिरिक्त वेदिक धर्म और संस्कृति के वाहक ये मनुर्भरत ही थे।  
सनातन वेदिक धर्म मर्यादा  का पालन स्वायम्भुव मनु ने किया अतः स्वायम्भूव मन्वन्तर में यह  मानव धर्म कहलाया। इन्हीं के कुछ वंशज ब्राह्मण भी हुए। अधिकतर वंशज क्षत्रिय हुए और कुछ वंशज वैष्य हुए तो कुछ शुद्र भी हुए।

 वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर में सूर्यवंशी क्षत्रिय मानवों, चन्द्रवंशी क्षत्रियों, दृविड़, देवासुर,गन्धर्व, नाग, यक्ष,दैत्य , दानव आदि जातियों की उत्पत्ति--

वास्तविक जातियाँ यानि  Human race  की उत्पत्ति --

वेद , वेदिक साहित्य, स्मृतियों,  रामायण, महाभारत, और पुराणों में उल्लेखित , द्विपदों (Human) की मुख्य जातियों का विवरण नीचे प्रस्तुत है। ये ही जाति है जो जन्मगत होती है। बदली नही जा सकती। कई पिढ़ियों बाद भी किसी जाति में जन्मे व्यक्ति को चेहरा देखकद ही पहिचाना जा सकता है। इन्ही जातियों में अन्तः विवाह की अनुशंसा मनुस्मृति में की गई है।

सुर्यवंशी - मरीची प्रजापति ब्रह्मा के पुत्र थे। मरीची के पुत्र महर्षि कश्यप का क्षेत्र कश्मीर से कश्यप सागर और तिब्बत, पामिर और रुस तक फैला था।
महर्षि कश्यप और अदिति की सन्तान द्वादश आदित्य नामक देवगण हुए। जो कश्मीर, तिब्बत पामिर में बसे। वैवस्वत मन्वन्तर में आदित्य विवस्वान के पुत्र  वैवस्वत मनु के वंशज सुर्यवंशी अयोध्या में बसे। ये भारत में मूल क्षत्रिय कहलाते हैं। किन्तु इनमें भी कुछ ब्रह्मज्ञानी हुए जो ब्राह्मण कहलाते हैं । कुछ सन्तान वैष्य भी हुई। तो कुछ शुद्र भी हो गये। ये वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर में हुए।
चन्द्रवंशी - टर्की के केनिया , बर्दूर, और हेसिलर नगरों  (दक्षिण पुर्व  अनाटोलिया पठार) में खत्तुनस के वंश हित्ती सभ्यता  वाले चन्द्रवंशी टर्की  से आये खाती, खत्री  चन्द्रवंशियों को सुदास ने प्रयागराज में बसाया। ये भी पहले कश्मीर में रहे थे। आज भी पञ्जाब, सिन्ध ,कश्मीर में इनके वंशज हैं। इनमें भी कुछ ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर ब्राह्मण कहलाये।
अधिकतर (कृषक) वैष्य और कुछ शुद्र भी होगये।
 नाग --नागवंशी सिरिया से आये। ये वही नाग है, जिनने यहोवा  (एल पुरुरवा) के आदेश के विरुद्ध  आदम (आयु) को बुद्धिवृक्ष का फल (परिपक्व होने से पहले ही) खाने की प्रेरणा दी। आदम (आयु) बुद्धिवृक्ष का (अधपका) फल खागया ।
(और  ये हूवा जो बैचारा मुर्ख था वह मुर्ख ही रह गया।😜😂) (महाभारत के अनुसार चन्द्र वंश में ययाति, नहुष , शान्तनु जैसे   एक से बड़कर कामुक और एक मुर्ख हूए।)
एल पुरुरवा (यहोवा) ने आयु (आदम) को दक्षिण पुर्वी टर्की से निकाला तो वह सिंहल द्वीप में आ गया। यहाँ से फारस की खाड़ी होते हुए इज्राइल तरफ गया। ये क्षत्रिय माने गये। इनमें कई शुद्र और कुछ म्लैच्छ भी हुए। ये भी वैवस्वत मन्वन्तर की ही घटना है।

                           देवगण  --देवता
 आदित्य गण  -- महर्षि कश्यप और अदिति के पुत्र  द्वादश आदित्य और  आदित्यों की सन्तान कश्यप सागर से पामिर- तिब्बत - कश्मीर में बसे। 
वसुगण -- वसुगण महर्षि कश्यप और वसु के पुत्र वसु देवगणों में सम्मिलित थे।  वसुओं की सन्तान भिन्न भिन्न स्थानों मे फैल गयी। 
 धर / धर्म वसु धर्म वसु दक्षिण में बसे, धर वसु के पुत्र दृविण की सन्तान दृविड़ कहलाई। 
 अनल वसु के वंशज आग्नेय कहलाते हैं ।आग्नेय पुर्व और दक्षिण पुर्व में आस्ट्रेलिया तक फैल गये।
 अनिल वसु वायु पुत्र और मरुद्गण वायव्य कोण में बलूचिस्तान से कजाकिस्तान तरफ बसे। 
 आपःवसु  आप (जल) की सन्तान सिन्ध से ईरान तक पश्चिम में बसे । ये वरुणोपासक हैं।
 प्रभास वसु --  प्रभास वसु का क्षेत्र  प्रभासक्षेत्र सोमनाथ गुजरात में  है। प्रभास वंशी पश्चिमी गुजरात में बसे।
 प्रत्युष-- प्रत्युष भी इसी क्षेत्र में बसे।
सोम और ध्रुव-- सोम और ध्रुव के वंशज हिमालय क्षेत्र में बसे
 असुर --  जानदार/ प्राणवान, बलिष्ट असुर  असीरिया (इराक), मेसापोटामिया, बेबीलोन, सऊदी अरब  में बसे। ये रुद्र भक्त शिवाई  (साबई), बालदेव उपासक असुर हुए। इनने शुक्राचार्य को अपना गुरु माना। शुक्राचार्य के पुत्र त्वष्टा ने युनान के पास  क्रीट में शाक्तपन्थ की स्थापना की।
 असुरों के आचार्य जरुथ्रस्त ने ईरान के मीड और मगों को आसुरी मत में बदला। ये अग्नि को प्रतिक मानकर असुरमहत् (अहुरमज्द) के उपासक हो गये।
दैत्य -  एल पुरुरवा (यहोवा) ने आयु (आदम) को दक्षिण पुर्वी टर्की की अदन वाटिका से निकाला तो वह सिंहल द्वीप में आ गया। यहाँ से फारस की खाड़ी होते हुए इज्राइल की तरफ गया।
 दैत्य - महर्षि कश्यप और दनु के पुत्र दैत्यगण मिश्र और  अम्मानके पास जोर्डन की जेरिको सभ्यता, इज्राइल, स्वेज और लेबनान (फोनिशिया सभ्यता) में बसे। पश्चिम एशिया दैत्यों का क्षेत्र था ।
दक्षिण भारत पर कब्जा जमाये राजा बलि को वामन / विष्णु द्वारा केरल (भारत)  से निकालने पर  राजा बलि भी भारत के दास, दस्यु ,चोल, चालुक्यों को लेकर पहले लेबनान (फोनिशिया) ही गया था। फिर लेबनान से निकलकर  दक्षिण अमेरिका महाद्वीप के बोलिविया बसा। 
ये दास दस्यु, चोल आदि रास्ते में लूटमार करते गये। काले रंग के इन चोर लुटेरों को ईरानियों ने फारसी भाषा में हिन्दू कहा।
ये दास दस्यु, चोल आदि कुछ सिन्ध, से गुजरात तक में  भी रुक गये। इसलिये हड़प्पा में इनके अवशेष मिलते हैं।
इस बीच बलि से नाराज शुक्राचार्य  मक्का (सऊदी अरब) में रुक गये। वहाँ शुक्राचार्य ने  अपने ईष्ट और गुरु महारुद्र पशुपति शंकर की उपासना के लिये  काव्य मन्दिर काबा में शिव परिवार की प्रतिमाओं की स्थापना की। जिसमें से मुख्य शिवलिङ्ग (संग ए अस्वद्) को छोड़ शेष सभी प्रतिमाएँ मोह मद ने तोड़ दी। और काबा को इस्लाम का भी तिर्थ घोषित कर दिया तथा तिर्थ के लिए जेरुसलम जाना बन्द कर दिया।
 दानव -  महर्षि कश्यप और दनु के पुत्र यानि  दनु (डेन्यूब नदी) के वंशज दानव  युगोस्लाविया  की लेपेन्स्की वीर सभ्यता (Lepennki Vir )  और प्राग(चेकोस्लोवाकिया) से जर्मनी  तक और युनान रोम की युरोपीय सभ्यता दानवों की है। सेल्ट या केल्ट लोग दानव थे ये इंग्लेण्ड में तप करते थे। ये दैत्यों के मित्र हुए।
 असुरों की विजय यात्रा
असुरों ने , दैत्य, दानवों को अपने पक्ष में कर बड़ी सेना बनाई। जिसमें मंगोलिया तक के क्रुर रुद्रगणों / सेनिकों को सम्मिलित किया। असुर जिते हुए क्षेत्र के सैनिकों को अपनी सेना में सम्मिलित कर लेते थे।
असीरिया (इराक) के असुर पहले सिरिया (नागलोक) पर आक्रमण करते,  सीरिया के बाद  दक्षिण पश्चिम इरान (यमलोक) पर आक्रमण करते। यम लोक जीत कर पृथ्वी पर यानि  राजा प्रथु द्वारा शासित भूमि (ईरान से पञ्जाब तक) पर आक्रमण करते। ईरान और पश्चिमी भारत विजय कर उत्तर में बड़ते। फिर सुवर्ग यानि स्वर्ग क्षेत्र कश्मीर तिब्बत पामिर (स्वर्ग) पर आक्रमण करते थे। स्वर्ग के देवतागण उनके राजेन्द्र के नैत्रत्व में अपने निकटतम रुद्र देव  सेनापति महारुद्र  शंकरजी से रक्षार्थ निवेदन करते। क्योंकि युद्ध रुद्र का ही क्षेत्र है।
ब्राह्मण और मानव (क्षत्रिय)  पितामह प्रजापति ब्रह्माजी से निवेदन करते। 
 प्रजापति ब्रह्माजी हिरण्यगर्भ ब्रह्मा से और हिरण्यगर्भ ब्रह्मा नारायण ब्रह्मा से विनती करते।
नारायण के कहने पर कोई  ब्रह्मज्ञानी सिद्ध भूमिभार हरने आता। जिसे अवतार कहा जाता है।
 किन्नर--  किन्नर  किन्नोर में रहते हैं।
गन्धर्व --  गन्धर्व कान्धार (बलुचिस्तान और अफगानिस्तान) में रहते हैं।
 यक्ष -- महर्षि कश्यप और  के पुत्र यक्ष चीन में रहते हैं ये, सदैव भूखे रहते हैं और सबकुछ खाजाते हैं, सर्वभक्षी हैं। इस कारण प्रतिमाओं में यक्षों को सुमो पहलवान के समान तोन्दवाला बतलाया जाता है।
 प्रमथ गण -  प्रमथ गण चीन और मंगोलिया की ओर बसे।
 राक्षस -- राक्षस (निग्रो)  अफ्रीका में बसे। राक्षस लोग पहले अङ्गरक्षक का काम करते थे।रक्षक थे। बादमें रावण के नेत्रत्व में आसुरी कर्म करने लगे।रावण ने अफ्रीका से उत्तर दक्षिण अमेरिका तक के राक्षसों को संगठित किया।

जाति प्रथा वाली आधुनिक जातियाँ जाती नही वंश या कुल हैं।

आज की जातिप्रथा वाली प्रचलित जातियाँ वास्तव में जाति ही नही है। ये किसी समय एक कुल या वंश थी।  वे कुल ही जनसँख्या वृद्धि के परिणाम स्वरूप और विभाजित होते गये। इनमें कुछ क्षेत्र विशेष में बसनें के आधार पर एक ही कुल के उप कुल हो गये। तो कहीँ उपकुलपति की योग्यता और प्रधानता वश नये उपकुल बन गये। कुछ कुल स्वस्थान छोड़कर अन्यत्र बस गये तो अलग जाति कहलाने लगी। तो कुछ नें अपना पारम्परिक व्यवसाय निर्धारित कर लिया तो नई जाति हो गई।। स्थान, व्यवसाय आदि आधारों पर ये कुल या वंश जातिप्रथा की जातियाँ कहलाने लगी। जबकि ये वंश या कुल वाली जातिप्रथा आधारित जातियाँ जन्माधारित जाति और स्पष्ट देहिक पहिचान वाली ज्ञाति नही होने से वास्तविक जाति नही है। इस्लामिक काल और ब्रिटिश काल में इन जातियो पर जाति का स्थाई सरकारी ठप्पा लग गया। किन्तु वस्तुतः ये जातियाँ नही कुल या वंश ही है।
वेद, ब्राह्मण, धर्मसुत्रों तथा मनुस्मृति याज्ञवल्य स्मृति के अनुसार जब एक ही ग्राम में रहने वालों मे, सगोत्रीयों मेंं अपने प्रवर में, सपिण्डों मे विवाह निषिद्ध है तो  इसी कारण  केवल यहुदियों की नकल कर अपने कुल में  अन्तः विवाह करना अनैतिक और धर्म विरुद्ध है।