वर्णाश्रम धर्म और प्रवृत्ति मार्ग , निवृत्ति मार्ग और श्रमण परम्परा, और नास्तिक मत और तन्त्र मार्ग
वेदिक वर्णाश्रम धर्म (प्रवृत्ति मार्ग) और निवृत्ति मार्ग के साथ ही तन्त्र भी सहचारी रहा हैं। या यदि समयान्तर है भी तो बहुत कम समय का। जिन्हें वेदों में असुर कहा है वे मूलतः तान्त्रिक ही थे।
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा ने आरम्भ में सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, सनातन और नारद जैसे अकेले पुरुष ही रचे। उनसे सृष्टि का विकास नही होसका अतः फिर उनके रोष से अर्धनारीश्वर महारुद्र शंकर हुए। किन्तु रुद्र के स्वभाव सृजन नहीं प्रलय था। रुद्र हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के आदेश पर रुद्र सृजन नहीं कर पाये अतः हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के आदेश पर रुद्र तप में संलग्न होगये।
फिर हिरण्यगर्भ ब्रह्मा ने प्रजापति और सरस्वति को उत्पन्न किया।
प्रवृत्ति मार्ग -- यह वर्णश्रम धर्म कहलाता है।
प्रजापति - सरस्वती ने स्वःलोक यानि देवलोक के लिये 1 देवेन्द्र - शचि, 2अग्नि - स्वाहा ये दो जोड़े और 3 देवर्षि नारद को उत्पन्न किया।
भुवः लोक (अन्तरीक्ष) के लिए पितरः (अर्यमा) - स्वधा को उत्पन्न किया और पुर्व में उत्पन्न रुद्र को भी भुवः लोक में स्थापित किया। ऋग्वेद में रुद्र का वास अन्तरीक्ष बतलाया गया है।
फिर भूलोक के लिये 1 दक्ष - प्रसुति, 2 रुचि - आकुति, 3 कर्दम - देवहूति नामक प्रजापतियों के तीन जोड़े उत्पन्न किये और 1 मरीची, 2 भृगु, 3 अङ्गिरा, 4 वशिष्ठ, 5 अत्रि, 6 कृतु, 7 पुलह, 8 पुलस्य ऋषियों को उत्पन्न किया। दक्ष को छोड़ शेष सबकी सन्तान ब्रह्मज्ञानी होने से ब्राह्मण कहलाई। जबकि दक्ष प्रजापति राजर्षि हुए।
स्वायम्भुव मनु - शतरूपा भूलोक के लिये राजाधिराज महाराज और सम्राट हुए। इनकी सन्तान क्षत्रिय कहलाई। बाद में इन क्षत्रियों में से ही वैष्य और राजकीय सेवक यानि शुद्र भी हुए।
1 दक्ष और 2 रुचि और 3 कर्दम तीनों प्रजापति कहलाये। वर्तमान का उत्तराखण्ड ,कश्मीर, और तिब्बत, पामिर, और ताजिकिस्तान, किरगिस्तान, उजाबेगिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, कजाकिस्तान इन ऋषियों का क्षेत्र रहा।
शेष 4 मरीचि 5 भृगु,6 अङ्गिरा, 7 वशिष्ठ, 8 अत्रि, 9 कृतु, 10 पुलह और 11 पुलस्य ऋषि कहलाते हैं। दक्ष प्रजापति की पुत्रियों से इनके विवाह हुए।
1 मरीची की पत्नी सम्भूति , 2 भृगु की पत्नी ख्याति , 3 अङ्गिरा की पत्नी स्मृति, 4 वशिष्ठ की पत्नी उर्ज्जा, 5 अत्रि पत्नी अनसूया, 6 कृतु की पत्नी सन्तति, 7 पुलह की पत्नी क्षमा, 8 पुलस्य की पत्नी प्रीति हुई।
वस्तुतः स्वायम्भुव मनु भी प्रजापति ही हैं। इनका क्षेत्र वर्तमान, वर्तमान,इरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान (उतर पश्चिम सीमान्त प्रान्त,बलुचिस्तान,सिन्ध, पञ्जाब, ) और भारत में पञ्जाब हरियाणा राजस्थान और गुजरात, और उत्तर प्रदेश एवम् उत्तरी मध्य प्रदेश रहा तथा उत्तर पश्चिमी महाराष्ट्र रहा।
[सुचना - उस समय दक्षिण भारत का हिस्सा भारतीय भूभाग से मिला ही था। विन्द्याचल उँचा हो रहा था। वर्तमान हिमालय के क्षेत्र में उत्तर सागर सिकुड़ कर हिमालय बन रहा था। युराल पर्वत भी उँचा हो रहा था। अतः दक्षिण भारत और पुर्व भारत में बसाहट नही थी। प्रायः वन क्षेत्र था।]
इन सभी (बारहों) नें वर्णाश्रम धर्म यानि प्रवृत्ति मार्ग के प्रवर्तक हुए। ये यज्ञ , योग और ज्ञान मार्गी थे।ये सर्वव्यापी विष्णु के स्वरुप मे ईश्वर की आराधना उपासना यज्ञ और योग के द्वारा करते थे।
इन तीनों जोड़ों ने नर नारी रुप सृष्टि की। दक्ष प्रजापति की पत्नी प्रसुति और रुचि प्रजापति की पत्नी आकुति और कर्दम प्रजापति की पत्नी देवहूति को स्वायम्भुव मनु की पुत्री भी माना गया। स्वायम्भुव मनु के पुत्र उत्तानपाद और प्रियवृत हुए। उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव और उत्तम हुए। और प्रियवृत के आग्नीन्ध्र आदि नौ पुत्र हुए।
स्वायम्भुव मनु और शतरूपा के पुत्र प्रियवृत को के दस पुत्र और तीन (मानस) पुत्रियाँ हुई। जिनमें तीन पुत्र निवृत्ति परायण हो गये। मनु पुत्रों में निवृत्ति मार्ग का प्रारम्भ यहीँ से हुआ। शेष सात पुत्रों को प्रियवृत ने 1 आग्नीन्ध्र, 2 मेधातिथि, 3 वपुष्मान, 4 ज्योतिष्मान, 5 द्युतिमान, 6 भव्य, और 7 सवन सप्तद्विपों का उत्तराधिकारी बनाया।
उन में से आग्नीन्ध्र को जम्बूद्वीप का राज्य मिला। शेष को वर्तमान एशिया से बाहर के द्वीप मिले।
आग्नीन्ध्र के नौ पुत्र 1 नाभि (जो अजनाभ भी कहलाता है), 2 किम्पुरुष 3 हरिवर्ष, 4 इलावृत, 5 रम्य, 6 हिरण्यवान, 8 भद्राश्व, 9 केतुमाल हुए। अजनाभ को जम्मुद्वीप का दक्षिणी भाग का उत्तराधिकार मिला। शेष आठ पुत्रों को भारत से बाहर के क्षेत्र मिले। अजनाभ ने उसके राज्यक्षेत्र को अजनाभ वर्ष नाम दिया। अजनाभ को नाभि भी कहते हैं अतः अजनाभ वर्ष को नाभिवर्ष भी कहते हैं।
अजनाभ के तीन.पुत्र 1 ऋषभदेव 2 अतिशय और 3 कान्तिमान हुए। इनमे वरिष्ठ पुत्र ऋषभदेव को भी नाभिवर्ष का राज्य उत्तराधिकार में मिला।
ऋषभदेव के पुत्र भरत सहित सौ पुत्र हुए। इनमें भरत चकृवर्ती सबसे बड़े थे।
ऋषभदेव नें शरीर और इन्द्रियों के बलवान रहते ही सन्यास धारण कर लिया।
ऋषभदेव के वरिष पुत्र भरत चकृवर्ती को भी नाभिवर्ष (अजनाभ वर्ष) उत्तराधिकार में मिला पर उनने अजनाभ वर्ष / नाभिवर्ष का नाम बदलकर भारतवर्ष रखा। तब से इस देश का नाम भारतवर्ष प्रचलित है।
निवृत्ति मार्ग
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के मानस पुत्रों सनक, सनन्दन, सनत्कुमार और सनातन, नारद ने निवृत्ति मार्ग का आरम्भ सृष्टि के आदि में ही कर दिया था। जिसे मानवों में उत्तानपाद और प्रियवृत के पुत्रों ने अपनाया। कपिल ऋषि भी निवृत्त हुए। वेदव्यास जी के पुत्र शुकदेवजी भी निवृत हुए। किन्त वेदानुयायियों को वर्णश्रम धर्म ही अधिक प्रिय रहा है।
परवर्ती शैव परम्परा नें निवृत्ति मार्ग को अपनाया किन्तु वैष्णव प्रवृति मार्गी ही रहे।
श्रमण परम्परा
निवृत्ति का भिन्न स्वरूप श्रमण परम्परा -- निवृत्ति मार्ग का ही विकृत स्वरूप श्रम परम्परा है। ये स्वयम को तार्किक और बुद्धिवादी मानते थे इसलिए बौद्ध भी कहे जाते थे। जिनकी परम्परा में ही सिद्धार्थ को गोतम बुद्ध कहा गया। सिद्धार्थ गोतम बुद्ध के समय महावीर ने इस परम्परा को जैन कहा। इस प्रकिया में यह दो बौद्ध और जैन सम्प्रदायों में विभक्त हो गया।
ऋषभदेव ने सन्यास आश्रम की अन्तिम अवस्था मे नग्न रहना आरम्भ किया। इनके पहले के सन्यासी वन में ही रहते किन्तु दिगम्बर नही रहते थे। तब से निवृत्ति मार्ग का एक नवीन स्वरूप श्रमण परम्परा आरम्भ हुई। श्रमण मार्गियों में जैन परम्परा ने ऋषभदेव को आदिगुरु मान लिया। ऋषभदेव को जैन आदि तिर्थंकर कहते है।
नास्तिक मत
जो वेदों को परम सत्य और प्रमाण नही मानते वे नास्तिक कहलाते हैं।
चुँकि वेद सृष्टिकर्ता, और सृष्टि संचालक तथा प्रलय कर्ता परमात्मा के ईश्वर स्वरूप को मानते हैं अतः ईश्वर को सृष्टिकर्ता, और सृष्टि संचालक तथा प्रलय कर्ता न मानने वाले भी नास्तिक कहलाते हैं।
वेद विरोधी मत
पुर्व काल में असुर भी वेदानुयायी ही थे। किन्तु बाद में देत्यों और दानवों के संसर्ग में असुर वेद विरोधी होगये। इसकारण वे वेदों के अनुशासन को अस्वीकार करने लगे। ये वेदिक व्यवस्था को अस्वीकार कर उसका विरोध करने वाले वेद विरुद्ध मतों के प्रवर्तक हुए।
तन्त्रमार्ग
तन्त्रमार्ग -- पशुपति महारुद्र शंकर के शिश्य शुक्राचार्य और शुक्राचार्य के पुत्र त्वष्टा और त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप हुए। त्वष्टा और उनके विश्वरूप ने शाक्त सम्प्रदाय और तन्त्रमत आरम्भ किया। उनके अलावा अत्रिपुत्र दत्तात्रय भी विश्वरूप के अनुगामी हुए। पशुपति महारुद्र शंकर जी से हटयोग सीखा और प्रचारित किया। एवम् पशुपतिनाथ महारुद्र शंकर के शिश्य मण्डला मण्डल के कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन तथा लक्ष्यद्वीप क्षेत्र में लंकावासी रावण भी शाक्त मत, तन्त्र और हटयोग के अनुयायी हुए। इन सबने शाक्त मत, तन्त्र और हटयोग का प्रचार किया।
तन्त्र का मतलब व्यवस्था है । यह वेदिक वर्णश्रम व्यवस्था से भिन्न नई व्यवस्था है जो वेदों को अन्तिम प्रमाण नही मानती। तन्त्र अवेदिक और कुछ हद तक वेदविरोधी मत है।
तन्त्रमत वेदिक स्थापनाओं और मान्यताओं का विरोध करते हैं।
विश्वामित्र और वशिष्ठ ने आपसी संघर्ष के चलते सर्वप्रथम त्वष्टा के तन्त्र का प्रयोग किया । किन्तु त्वष्ठा के पुत्र विश्वरूप के असुर प्रेम को देखते हुए पहले वशिष्ठ ने और बादमें विश्वामित्र ने तन्त्रमत को छोड़ दिया और वेदों की ओर लोट आये। वशिष्ठ और विश्वामित्र द्वारा अपनाया गया त्वष्टा रचित तन्त्रमत समय मत नाम से प्रचलित है जिसको आगम ग्रन्थों और पाञ्चरात्र ग्रन्थों में अपनाया गया । सौन्दर्य लहरी के रचियता शंकराचार्य भी इसी मत के थे।
कार्तिकेय के जन्म से शंकर जी ने फिर तन्त्रमार्ग को आरम्भ किया। शंकरजी के शिष्य शुक्राचार्य ने तन्त्रमार्ग को आगे बढ़ाया।
शुक्राचार्य के पुत्र त्वष्टा ने भी आदित्य त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप के मार्ग पर चल कर शाक्त पन्थ की स्थापना की सिन्धु घाँटी में मिली मात्रका और लिङ्ग योनि प्रतिमा इनके प्रमाण है। युनान के पास क्रीट द्वीप की शाक्त परम्परा इन्ही की देन है। यह परम्परा कलियुग में भारत में पुनः आई। इसमें नन्द यशोदा की पुत्री जो कन्स के हाथों छूट कर तड़ित विद्युत के रूप में आकाश में चली गई थी उन्हे ही आदिशक्ति विन्द्यवासिनी देवी के रूप में पुजा जाने लगा।
फिर दत्तात्रय ने वर्तमान तन्त्र मत की स्थापना की। दत्तात्रय के शिष्य कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन हैं। यह भी शैव और शाक्त पनँथ का मिश्रित रूप है। इसमें इष्ट शंकर और उनकी शक्ति पार्वती तथा पुत्र विनायक गजानन और कार्तिकेय भी पुज्य हैं । साथ ही भैरव को शंकर के अवतार के रुप में पुजा जाता है। भैरव इनका मुख्य देव भी है। बगलामुखी देवी और पीताम्बरा पीठ इनकी ही परम्पराए को आगे बढ़ा रहे है। यह भी समय मत का ही विकृत रुप ही था।
दत्तात्रय के दुसरे शिष्य रावण ने सुमाली के सानिध्य में कोल मत आरम्भ किया। मयासुर से शिक्षा ग्रहण कर रावणपुत्र मेघनाद ने इन्द्रजाल का आरम्भ किया।
इधर जैनाचार्यों ने निवृत्ति के साथ तन्त्र मार्ग को संयुक्त कर अनेकान्त दर्शन के साथ अतिवादी शैवपन्थ का नवीन संस्करण श्रमण संस्कृति तैयार की। जिसे महापीर ने जैन मत नाम दिया। यह भी तन्त्रमार्ग का ही अनुसरण करता हैं
सिद्धार्थ गोतम बुद्ध ने भी इसी परम्परा को आगे बढ़ाया। इनके महायानी शिश्यों नें शुन्यवाद और विज्ञानवाद बनाये।
इनमें से ही निकला तान्त्रिक सम्प्रदाय वज्रयान मत। जिसपर बादमे ताओ का भी प्रभाव पड़ा।
गिरनार वासी एकमुखी दत्तात्रय ने कापालिक मत का वैतालिक रुप विकसित किया। यह वज्रयान का निकटवर्ती था। जिसे नेपाल के मत्स्येंद्रनाथ को सिखाया। यह लोकमान्य नही हो पाया। मत्स्येंद्रनाथ ने गोरखनाथ को शिष्य बनाया। लेकिन गोरखनाथ ने रावण आदि के ग्रन्थों और अन्य परम्पराओं से सीख कर योग का नवीन स्वरूप हठयोग अपनाया। तन्त्र में शुन्यवाद और सांख्य दर्शन मिलाकर नया दर्शन तैयार किया जिसका लक्ष्य शिवकेली रखा। इसप्रकार यह भक्तिमत भी दिखता है।यह बहुत लोकप्रिय हुआ।
जलन्धरनाथ ने वैतालिक मत को ही आगे बढ़ाया।
नाथों का एक विचित्र टोटके ने भारत से बौद्धों की समाप्ति में बड़ा योगदान दिया।वह आपने भी पढ़ा होगा। यदि बौद्ध भिक्षु भिक्षा लेने द्वार पर आये वैसे ही उसके सर पर एक लट्ठ मार दो तो वह सोनें का बन जायेगा।
अब वह सोनें का बनें ना बनें भिक्षु तो कम हो ही गया।😂
मोर पंख की झाड़नी भी इनकीही देन है। जो सुफियों ने इस्लाम में भी अपनाई ।
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