इस कारण स्वतन्त्र इच्छा वाले एक व्यक्तिगत तानाशाह सम्प्रभु शासक के रूप में ईश्वर की अवधारणा के स्थान पर कर्मफल सिद्धान्त पुनर्जन्म का सिद्धान्त स्थापित किया गया। (जिसे मैं करो और भुगतो का सिद्धान्त कहता हूँ। यदि करते समय सोच-विचार नहीं तो भोगने में सोच विचार क्यों?)
परमात्मा के - विश्वात्मा ॐ संकल्प से - प्रज्ञात्मा परब्रह्म परमेश्वर परम पुरुष विष्णु और परा प्रकृति माया -- प्रत्यगात्मा ब्रह्म महेश्वर -पुरुष प्रभविष्णु सवितृ और प्रकृति श्री लक्ष्मी सावित्री -- जीवात्मा अपरब्रह्म जगदीश्वर - अपर पुरुष नारायण श्रीहरि और त्रिगुणात्मक अपरा प्रकृति कमलासना गज सेविता लक्ष्मी --- भूतात्मा अण्डाकार पञ्च मुखी हिरण्यगर्भ ब्रह्मा - प्राण (चेतना/ देही) त्वष्टा और धृति रचना, और अर्धनारीश्वर एक रुद्र --- सूत्रात्मा प्रजापति - ओज दक्ष, रुचि , कर्दम, और आभा (कान्ति), प्रसुति, आकुति, देवहूति, , --- अणुरात्मा वाचस्पति - तेज इन्द्र और विद्युत शचि, --- विज्ञानाचार्य ब्रह्मणस्पति - चित्त द्वादश आदित्य और वृत्ति - (तुरीय, जागृति, स्वप्न निद्रा), --- ज्ञानात्मा बृहस्पति - बुद्धि अष्ट वसु और बोध, --- लिङ्गात्मा पशुपति - अहंकार एकादश रुद्र और अस्मिता, --- मनसात्मा गणपति - मन सोम और सङ्कल्प - विकल्प वर्चा --- स्व सदसस्पति (सिंगुलैरिटी) और स्वभाव मही (एनर्जी) ---- वैकारिक स्वभाव स्वाहा (आधिदैविक शक्ति) - तेजस स्वभाव वषट (अध्यात्मिक शक्ति) - भूतादिक स्वभाव स्वधा (भौतिक शक्ति/कास्मिक एनर्जी ) ।
(आगे भी है.....)
दिए गए वैदिक सूक्त, तेरह उपनिषद और श्रीमद्भगवद्गीता को यदि मस्तिष्क पर लगा चश्मा हटाकर पढ़ ले तो सभी तत्व, उनके परस्पर सम्बन्ध सभी प्रकाशित हो जाएंगे।
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