यजुर्वेद अध्याय 40 मन्त्र प्रथम एवम् द्वितीय --
जगत में जो कुछ भी है वह सब परमात्मा के ॐ संकल्प के साथ परमात्मा का प्रज्ञात्मा परब्रह्म परमेश्वर परम पुरुष विष्णु स्वरूप से व्याप्त है, आच्छादित है। सब-कुछ विष्णुमय है।
विवेचना --चूंकि यहाँ सम्पूर्ण जगत (परा प्रकृति माया) को व्याप्त करने का और ईश शब्द का प्रयोग हुआ है इसलिए विष्णु अर्थ ही सार्थक सिद्ध होता है।
इसलिए जगत का अनासक्त भाव से भोग सिमीत अत्यावश्यक होने पर उतनी ही मात्रा में करना उचित है जितना शरीर निर्वाह हेतु आवश्यक है। भोजन और भोग किया जाए ठूँसा नहीं जाए। भोग को लक्ष्य नहीं साधन समझा जाए।
परमात्मा के द्वारा निर्मित यह जगत स्वयम् विनाशशील है। इसलि एदुसरे के पास की विश्व की किसी चीज के प्रति आकर्षित न हो, किसी के धन का लोभ न करें।
इस प्रकार सदैव केवल निष्काम भाव से शास्त्रोक्त सौद्देश्य कर्म केवल शास्त्रोक्त विधि से ही करते रहें। यही एकमात्र श्रेय और कल्याण का मार्ग है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें