शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

निर्णय सिन्धु के अनुसार नवरात्र

आश्विन शुक्ल षष्ठी तिथि में सायंकाल में बिल्व के पास जाकर देवी और बिल्व का पूजन कर प्रार्थना करें कि, रावण के वध के लिए श्रीराम का अनुग्रह के लिए असमय में ब्रह्मा ने देवी का बोधन पहले आप मे (बिल्व में) किया अतः मैं भी सायंकाल के समय षष्ठी तिथि में आपके आश्रित देवी का बोधन करता हूँ। श्रीशैल पर्वत के शिखर में उत्पन्न श्रीफल (बिल्वफल) लक्ष्मी का निवास स्थान है। मैं आपको ले जाऊँगा। कृपया आप आइयेगा। दुर्गा स्वरूप आप पूज्य हैं।
रावणस्य वधार्थाय रामास्यानुग्रहाय च।अकाले ब्रह्मणा बोधो देव्यास्त्वयि कृतः पुरा।।
अहमप्याश्रितः पृष्ठायाम् सायाह्ने बोधयाम्यतः। श्रीशैलिखरे जातः श्रीफलः श्री निकेतनः।। नेतव्योऽसि मयागच्छ पूज्यो दुर्गास्वरूपतः।। निर्णय सिन्धु पृष्ठ 346-347

कालिका पुराण के अनुसार ---
इस प्रकार देवी का अधिवासन कर दुसरे दिन सप्तमी को निमन्त्रित बिल्व की शाखापत्री में प्रवेश कर पूजा करें‌
इसमें सप्तमी तिथि की मुख्य है, मूल नक्षत्र भी हो तो सर्वोत्तम।
दो नूतन बिल्व के फलों का युग्म तथा शाखा को वैसे ही देवी प्रतिमा का स्नान कराकर अभ्युक्षण कर प्रवेश करें‌। इसमें दाक्षिणात्य (महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आन्ध्र प्रदेश में) षष्ठी युक्त सप्तमी तिथि ग्रहण करते हैं लेकिन गोड़ (बङ्गाल, उड़ीसा, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार, असम आदि सेवन सिस्टर्स में प्रचलित) मत है कि,चाहे एक घटि भी उदिया सप्तमी तिथि हो तो भी उदिया सप्तमी का ही महत्व है। निर्णय सिन्धु पृष्ठ 348
नव पत्रिका ---
केल का पत्ता, दारु हल्दी का पत्ता, हल्दी का पत्ता , जयन्ती (मेउडी) , धान (चावल की का पोधा) आदि। निर्णय सिन्धु पृष्ठ 348

देवी पुराण के अनुसार ---
दक्षिण मुखी दुर्गा प्रतिमा शुभदायक, पूर्वाभिमुख दुर्गा प्रतिमा विजयप्रद, पश्चिमामिमुख दुर्गा प्रतिमा भी उत्तम है। लेकिन उत्तराभिमुख दुर्गा प्रतिमा स्थापना भूल कर भी न करें। निर्णय सिन्धु पृष्ठ 350

यह बिल्वपत्र आदि केवल पूजा में रखी जाने वाली दुर्गा सप्तशती की पुस्तक में सप्तमी तिथि (मूल नक्षत्र) में प्रातः स्थापित कर सरस्वती पूजन करें। पठन-पाठन, पाठ अध्ययन के लिए दुर्गा सप्तशती की दूसरी पुस्तक रखें। निर्णय सिन्धु पृष्ठ 346

 अष्टमी तिथि (पूर्वाषाढ़ नक्षत्र) में प्रातः सरस्वती सरस्वती पूजन, नवमी तिथि (उत्तराषाढ़ नक्षत्र) में प्रातः सरस्वती के निमित्त बलिदान (धार्मिक कर अदायगी) करें, और दशमी तिथि (उत्तराषाढ़ नक्षत्र) में प्रातः सरस्वती विसर्जन करें। निर्णय सिन्धु पृष्ठ 330-331,, प्रातः काल का महत्व, तिथि का ही महत्व पृष्ठ 331,334,
नवरात्र में पूजा ही प्रधान है उपवास आदि तो उसका अङ्ग है। निर्णय सिन्धु पृष्ठ 342
घटस्थापना सूर्योदय से दस घटि के अन्दर ही करें। पृष्ठ 336, रात्रि 
पारण दशमी तिथि में करें पृष्ठ 372

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