शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

निरयन मेष, कर्क, तुला और मकर संक्रमण का सम्बन्ध चित्रा तारे से है।

00 *क्रान्तिवृत में _चित्रा तारे से 180° पर क्रान्तिवृत का प्रारम्भ बिन्दु है।_ जिसे अश्विन्यादि बिन्दु अर्थात अश्विनी नक्षत्र का प्रारम्भ बिन्दु कहते हैं।*
  *क्रान्तिवृत में चित्रा तारे से 180° पर क्रान्तिवृत का प्रारम्भ बिन्दु को वर्तमान में निरयन मेषादि बिन्दु भी कहा जाता है।*
लेकिन
 *चित्रा तारे से 180° पर अश्विनी नक्षत्र के प्रारम्भ बिन्दु जिसे निरयन मेषादि बिन्दु कहते हैं उस बिन्दु पर वर्तमान में कोई तारा नही है।*  

01 *_जिस समय सूर्य चित्रा तारे से 180° पर होता है_* ;
*तब निरयन मेष संक्रमण कहलाता है।*
 या प्रकारान्तर से 
*_सूर्य केन्द्रीय ग्रहस्पष्ट में भूमि चित्रा तारे के समक्ष चित्रा तारे से 000° का कोण बनाते हैं_*;
 *तब निरयन मेष संक्रमण कहलाता है।*


02 *_जिस समय चित्रा तारे पर भूमि और सूर्य के बीच 270° का कोण बनता है उस समय को निरयन कर्क संक्रमण कहते हैं।_*
प्रकारान्तर से 
*_जिस समय उक्त अश्विन्यादि बिन्दु पर अर्थात निरयन मेषादि बिन्दु पर सूर्य और भूमि का 90° का कोण बनता है तो उस घटना को निरयन कर्क संक्रमण कहते हैं।_*

03 *चित्रा तारे पर क्रान्तिवृत का 180° अर्थात मध्य बिन्दु माना जाता है। चित्रा तारे को ही चित्रा नक्षत्र का भी मध्य बिन्दु कहा जाता है। संयोग से चित्रा नक्षत्र का एक ही तारा होने से चित्रा तारे को ही चित्रा नक्षत्र का भी कहा जाता है। चित्रा तारे को ही निरयन तुला राशि का आदि बिन्दु भी कहा जाता है।*


*_जिस समय सूर्य चित्रा तारे पर होता हैउसे निरयन तुला संक्रमण कहते हैं।_*
और प्रकारान्तर से 
*_सूर्य केन्द्रीय ग्रह स्पष्ट में भूमि चित्रा तारे से 180° पर होती है उसे निरयन तुला संक्रमण कहते हैं।_*


*_जिस समय चित्रा तारे पर भूमि और सूर्य के बीच 90° का कोण बनता है उस समय को निरयन मकर संक्रमण कहते हैं।_*
प्रकारान्तर से 
*_जिस समय उक्त निरयन मेषादि बिन्दु पर सूर्य और भूमि का 270° का कोण बनता है तो उस घटना को निरयन मकर संक्रमण कहते हैं।_*

*आकाश और नक्षत्रों को पहचानने वाले किसान तक भी इस घटना को देख सकते हैं। पुराने किसान इसी आधार पर महिनों का अनुमान भी लगा लेते थे।*
वर्तमान में भी एक एस्ट्रोनॉमर दूसरे एस्ट्रोनामर्स को किसी नये पिण्ड की सूचना देते समय अमुक तारा मण्डल (नक्षत्र) में, कितने अक्षांश (शर) पर कितनी क्रान्ति और अंशो पर स्थित है ऐसे ही सूचित करते हैं। वर्तमान एस्ट्रोनॉमी में तेरह नक्षत्र (राशि Sign) ही माने जाते हैं। जबकि भारत में पहले अभिजित नक्षत्र सहित अट्ठाईस नक्षत्र माने जाते थे। लेकिन अभिजित नक्षत्र का योग तारा लगभग 66° उत्तर में चला गया इसलिए अब सत्ताइस नक्षत्र मानते हैं।
और आधुनिक एस्ट्रोनॉमी की सर्पधारी राशि () Sign चूंकि भचक्र (नक्षत्र पट्टी) से काफी उत्तर में है इसलिए सर्पधारी राशि (Sign) को सिद्धान्त ज्योतिष में मान्यता नहीं मिली। इसी कारण प्लुटो को भी कभी ग्रह नहीं माना गया।

रामायण, महाभारत कालीन काल गणना में सायन/ ट्रॉपिकल पोजीशन (Tropical Position)
 नाक्षत्रीय/ साइडरियल पोजीशन (Sidereal position) दोनों का साथ-साथ उपयोग किया जाता है।
 नक्षत्रों का उल्लेख और स्थिर भचक्र (फिक्स्ड ज़ोडिऐक) में नक्षत्र विशेष के साथ या सामने 180° पर सूर्य-चन्द्र और ग्रहों की स्थिति बतलाया जाना ही नक्षत्रीय पद्धति है। इसका उल्लेख ब्राह्मण, सूत्र ग्रन्थों सभी में है। वाल्मीकि रामायण और महाभारत में भरपूर मात्रा में उल्लेख है।

लेकिन सूर्य- चन्द्रमा, और ग्रह किस प्रधि (Tropical sign) के कितने अंश पर स्थित है यह कहीं पढ़ने में नहीं आया।
जबकि शुल्ब सूत्रों में गणितीय सूत्रों का उल्लेख है। लेकिन ग्रहगणित का नहीं है।

 *खगोलीय पिण्डों (Celestial object) और पातों / नोड्स (Nodes) की स्थिति/ पोजीशन (Position) बतलाने की तीन विधियाँ है -* 
 *१ सायन/ ट्रॉपिकल पोजीशन (Tropical Position)* 
*२ नाक्षत्रीय/ साइडरियल पोजीशन (Sidereal position)* और 
*३ उन्नतांश और दिगंश/ एल्टिट्युड अजिमुथ (Altitude azimuth) पद्धति।*

जिसमें उन्नतांश और दिगंश/ एल्टिट्युड अजिमुथ (Altitude azimuth) पद्धति सबसे नवीन है। लेकिन एविएशन में यही सर्वाधिक उपयुक्त है। इसी प्रकार उपग्रह लॉन्च करते समय भी उन्नतांश और दिगंश/ एल्टिट्युड अजिमुथ (Altitude azimuth) पद्धति का ही उपयोग होता है।

कोई किसी का विकल्प नहीं है।

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