बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

सूतक में पूजन करना चाहिए।

सूतक में भी नवरात्र पूजन पूर्ववत ही करना। केवल मूर्ति पूजा नहीं करना चाहिए।

अशोच (सूतक) में भी केवल मूर्ति को स्पर्श नहीं किया जाता है। लेकिन सन्ध्या, पञ्च महायज्ञ, अष्टाङ्ग योग,पूजन सब नित्य कर्म है।
पुत्र अपने पिता की मृत्यु पर और पुत्र की मृत्यु पर उस बालक के पिता स्वयम् तेरह दिनों तक नित्य विष्णु पूजन करेंगे, धूप देंगे। तो अन्य लोगों को पूजा करने से रोकना यह शास्त्र नीति नहीं है; केवल लोकरीति है।
सूर्यग्रहण में भी ग्रहण अवधि में जप किए जाते हैं। जबकि, उस अवधि को भी सूतक ही कहते हैं।
दूर्गा सप्तशती/ प्रथम चरीत्र में भगवान नारायण की योगनिद्रा की अवतार ही मध्यम चरीत्र की महिषासुर मर्दिनी महालक्ष्मी अवतार कही गई है। उन्ही ने देवताओं को आशीर्वाद दिया था और वचन दिया था कि, तुम जब भी पुकारोगे तुम्हारे संकट हरनें में आऊँगी।
इसीलिए जब उत्तर चरीत्र में देवताओं ने जब हिमालय पर देवी की स्तुति की तभी देवी पार्वती देवताओं से पूछतीं है कि, तु लोग किसकी स्तुति कर रहे हो; तो वे योगनिद्रा देवी तुरन्त पार्वती के शरीर कोश से प्रकट होकर प्रकट होकर पार्वती जी को उत्तर देतीं है कि, ये सब देवता मेरी स्तुति कर रहे हैं।
पार्वती जी के शरीर कोश से उत्पन्न होने के कारण वे कोशिकी कहलाई।
उन्ही से उत्पन्न नौ देवियों द्वारा निशुम्भ की सेना से युद्ध कर रही थी तब निशुम्भ ने उलाहना दिया कि, तुम इन सब देवियों की सहायता से लड़ रही हो। तो देवी कोशिकी कहतीं हैं कि, ये सब तो मेरे ही स्वरूप हैं। और सभी देवियाँ कोशिकी में समा जाती हैं।
मतलब सभी देवियाँ भगवान श्रीमन्नारायण की योग निद्रा का ही स्वरूप है।
जब हम दस दिन सूतक में उनके स्वामी भगवान विष्णु की पूजा करते हैं तो , माता जी की पूजन का निषेध तो सम्भव ही नहीं है।

लोग पढ़ते तो हैं नहीं बस मेरे पिताजी ऐसा करते थे, मेरी सास ऐसा करती थीं इसलिए मुझे भी यही करना है।

जबकि, उपनिषद में समावर्तन संस्कार के समय गुरुकुल के शिष्यों को आचार्य का वचन स्पष्ट है कि, हमने जो या जैसा किया उसे भूलकर हमने जो कहा उसी का पालन करना।

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