सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

श्री किरित चन्दुलाल मेहता, स्वामी शंकरदेव जी, उनके शिष्य स्वामी, दिव्य फार्मेसी, स्वामी कर्मवीर, बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण, पतञ्जलि, राजीव दीक्षित, राष्ट्रीय स्वाभिमान ट्रस्ट का इतिहास ।


आस्था चेनल 

श्री किरित चंदूलाल मेहता की आस्था चैनल जिसने बाबा रामदेव को प्रमोट कर प्रसिद्ध कर दिया उसीपर दिव्य फार्मेसी और पतञ्जलि का कब्जा होना भी विचारणीय विषय है।


स्वामी शंकरदेव जी महाराज।
स्वामी शंकरदेव जी महाराज पतंजलि वाले बाबा रामदेव जी के संन्यास दीक्षा गुरु हुए थे।

स्वामी शंकरदेव जी महाराज ने कनखल में दिव्य फार्मेसी शुरू की थी, जो बाद में दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट बनी। वहीं से आयुर्वेदिक दवाइयाँ और योग का प्रचार शुरू हुआ। बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण शुरुआती दिनों में इसी आश्रम के दो कमरों में रहते थे और साइकिल से दवाइयाँ बेचते थे।

 14 जुलाई 2007 को सुबह टहलने के लिए निकले और फिर लौटे नहीं। कृपालु बाग आश्रम से रहस्यमय हालात में लापता हो गए। काफी खोज के बाद आचार्य बालकृष्ण ने कनखल थाने में गुमशुदगी दर्ज कराई। पुलिस को कोई सुराग नहीं मिला तो मामला सीबीआई को सौंप दिया गया।
उनके शिष्य स्वामी कर्मवीर ने अपनी किताब 'प्राण साधना एवं योग रहस्य' में लिखा है कि लापता होने से 2 दिन पहले शंकरदेव जी ने उनसे फोन पर कहा था - *'मैं आश्रम की कुछ गतिविधियों से बहुत निराश हूँ, मेरे साथ कोई भी अनहोनी हो सकती है, शायद मेरी आपसे अंतिम बात होगी'*। 

स्वामी कर्मवीर के अनुसार उनका आज तक शव नहीं मिला और न ही मृत्यु का कारण पता चला। सीबीआई आज भी इस मामले की जांच में लगी हुई है।

अपने आखिरी दिनों में स्वामी शंकरदेव जी महाराज बहुत सादगी और तंगहाली में रहते थे। आश्रम के गत्ते-बोरे तक खुद कबाड़ी को बेचते थे। 

श्री राजीव दीक्षित।

 *2009 ईस्वी मे श्री राजीव दीक्षित बाबा रामदेव के संपर्क मे आए और बाबा रामदेव को देश की गंभीर समस्याओ और उनके समाधानो से परिचित करवाया और विदेशो मे जमा कालेधन आदि के विषय मे बताया और उनके साथ मिल कर आंदोलन को आगे बढाने का फैसला किया। आजादी बचाओ के कुछ कार्यकर्ता राजीव दीक्षित के इस निर्णय से सहमत नहीं थे। फिर भी राजीव दीक्षित ने 5 जनवरी 2009 को भारत स्वाभिमान आंदोलन की नीव रखी। जिसका मुख्य उदेश्य लोगो को अपनी विचार धारा से जोडना, उनको देश की मुख्य समस्याओ का कारण और समाधान बताना। योग और आयुर्वेद से लोगो को निरोगी बनाना और भारत स्वाभिमान आंदोलन के साथ जोड कर 2014 मे देश से अच्छे लोगो को आगे लाकर एक नई पार्टी का निर्माण करना था जिसका उदेश्य भारत मे चल रही अँग्रेजी व्यवस्थाओ को पूर्ण रूप से खत्म करना, विदेशो मे जमा काला धन वापिस लाना, गौ हत्या पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाना, और एक वाक्य मे कहा जाए ये आंदोलन सम्पूर्ण आजादी को लाने के लिए शुरू किया गया था ।*

*29 नवंबर 2010 को छतीसगढ के दुर्ग जिले मे पहुंचे । उनके साथ छतीसगढ के राज्य प्रभारी दया सागर और कुछ अन्य लोग साथ थे । दुर्ग जिले मे उनकी दो विशाल जन सभाए आयोजित थी पहली जनसभा तहसील बेमतरा मे सुबह 10 बजे से दोपहर 01 बजे तक थी। राजीव दीक्षित ने विशाल जन सभा को आयोजित किया । इसके बाद का कार्यक्रम साय 04 बजे दुर्ग मे था। जिसके लिए वह दोपहर 02 बजे बेमेतरा तहसील से रवाना हुए ।*

 *(इसके बाद की सारी घटना उस समय उपस्थित छतीसगढ के प्रभारी दयासागर और कुछ अन्य साथियो द्वारा बताई गई है)*

*उन लोगो का कहना है गाडी मे बैठने के बाद श्री राजीव दीक्षित जी का शरीर पसीना पसीना हो गया । दयासागर ने राजीव दीक्षित जी से पूछा तो जवाब मिला की मुझे थोडी गैस सीने मे चढ गई है शोचालय जाऊँ तो ठीक हो जाऊंगा । फिर श्री दयासागर तुरंत उनको दुर्ग के अपने आश्रम मे ले गए वहाँ राजीव दीक्षित  जी शोचालय गए और जब कुछ देर बाद बाहर नहीं आए तो दयासागर जी ने उनको आवाज दी राजीव भाई ने दबी दबी आवाज मे कहा गाडी स्टार्ट करो मैं निकल रहा हूँ । जब काफी देर बाद राजीव दीक्षित जी बाहर नहीं आए तो दरवाजा खोला गया राजीव दीक्षित जी पसीने से लथपत होकर नीचे गिरे हुए थे । उनको बिस्तर पर लिटाया गया और पानी छिडका गया दयासागर जी ने उनको अस्पताल चलने को कहा । राजीव भाई ने मना कर दिया उन्होने कहा होमियोपैथी डॉक्टर को दिखाएंगे ।*

*थोडी देर बाद होमियोपैथी डॉक्टर आकर उनको दवाइयाँ दी । फिर भी आराम ना आने पर उनको भिलाई के सेक्टर 9 मे इस्पात स्वयं अस्पताल मे भर्ती किया गया । इस अस्पताल मे अच्छी सुविधाइए ना होने के कारण उनको अपोलो बी. एस. आर. मे भर्ती करवाया गया । राजीव भाई एलोपेथी चिकित्सा लेने से मना करते रहे । उनका संकल्प इतना मजबूत था कि वो अस्पताल मे भर्ती नहीं होना चाहते थे। उनका कहना था कि सारी जिंदगी एलोपेथी चिकित्सा नहीं ली तो अब कैसे ले लू ? ऐसा कहा जाता है कि इसी समय बाबा रामदेव ने उनसे फोन पर बात की और उनको आईसीयु मे भर्ती होने को कहा।*

*फिर राजीव भाई 5 डॉक्टरों की टीम के निरीक्षण मे आईसीयु भर्ती करवाएगे । उनकी अवस्था और भी गंभीर होती गई और रात्रि एक से दो के बीच डॉक्टरों ने उन्हे मृत घोषित किया ।*
*30 नवम्बर 2010 को दीक्षित को अचानक दिल का दौरा पड़ने के बाद पहले भिलाई के सरकारी अस्पताल ले जाया गया। उसके बाद अपोलो बी. एस. आर. अस्पताल में दाखिल कराया गया। उन्हें दिल्ली ले जाने की तैयारी की जा रही थी, लेकिन इसी दौरान स्थानीय डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। डाक्टरों का कहना था कि उन्होंने ऍलोपैथिक इलाज से लगातार परहेज किया। चिकित्सकों का यह भी कहना था कि राजीव दीक्षित जी आयुर्वेदिक दवाओं के लिये अड़े हुए थे। अस्पताल में कुछ दवाएँ और इलाज से वे कुछ समय के लिये बेहतर भी हो गये थे मगर रात में एक बार फिर उनको गम्भीर दौरा पड़ा जो उनके लिये घातक सिद्ध हुआ।*

 *राजीव दीक्षित जी की मृत्यु का कारण दिल का दौरा बता कर सब तरफ प्रचारित किया गया । 30 नवंबर 2010 को उनके मृत शरीर को पतंजलि, हरिद्वार लाया गया जहां हजारो की संख्या मे लोग उनके अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे । और 01 दिसंबर 2010 को राजीव दीक्षित जी का दाह संस्कार कनखल हरिद्वार मे किया गया ।*

*राजीव दीक्षित जी के चाहने वालों का कहना है कि अंतिम समय मे राजीव दीक्षित जी का चेहरा पूरा हल्का नीला, काला पड गया था । उनके चाहने वालों ने बार-बार उनका पोस्टमार्टम करवाने का आग्रह किया लेकिन पोस्टमार्ट्म नहीं करवाया गया ।  

*राजीव दीक्षित जी की मृत्यु से जुडे कुछ सवाल।*

*किसके आदेश पर ये प्रचारित किया गया ? कि राजीव दीक्षित की मृत्यु दिल का दौरा पडने से हुयी है ?*

*29 नवंबर 2010 को दोपहर 2 बजे बेमेतरा से निकलने के पश्चात जब उनको गैस की समस्या हुए और रात 2 बजे जब उनको मृत घोषित किया गया इसके बीच मे पूरे 12 घंटे का समय था 12 घंटे मे मात्र एक गैस की समस्या का समाधान नहीं हो पाया ?*

*आखिर पोस्ट मार्टम करवाने मे क्या तकलीफ थी ?*

*राजीव दीक्षित का फोन जो हमेशा आन रहता था उस 2 बजे बाद बंद क्यों था ?*

*राजीव दीक्षित के पास एक थैला रहता था जिसमे वो हमेशा आयुर्वेदिक, होमियोपैथी दवाएं रखते थे वो थैला खाली क्यों था ?*

*30 नवंबर 2010 को जब उनको पतञ्जलि योगपीठ मे अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था उनके मुंह और नाक से क्या टपक रहा था उनके सिर को माथे से लेकर पीछे तक काले रंग के पालिथीन से क्यूँ ढका था ?*

*राजीव दीक्षित की अंतिम विडियो जो आस्था चैनल पर दिखाई गई तो उसको एडिट कर चेहरे का रंग सफेद कर क्यों दिखाया गया ?? अगर किसी के मन को चोर नहीं था तो विडियो एडिट करने की क्या जरूरत थी ?*

*अंत पोस्टमार्टम ना होने के कारण उनकी मृत्यु आजतक एक रहस्य ही बन कर रह गई ।*

*राजीव दीक्षित के कई समर्थक उनके जाने के बाद बाबा रामदेव से काफी खफा है क्योंकि बाबा रामदेव अपने एक व्याख्यान मे कहा कि राजीव दीक्षित को हार्ट ब्लोकेज था, शुगर की समस्या थी, बी.पी. भी था राजीव दीक्षित पतञ्जलि योगपीठ की बनी दवा मधुनाशनी खाते थे । जबकि राजीव भाई खुद अपने एक व्याख्यान मे बता रहे हैं कि उनका शुगर, बीपी, कोलेस्ट्रोल सब नार्मल है । वे पिछले 20 साल से डॉक्टर के पास नहीं गए ! और अगले 15 साल तक जाने की संभावना नहीं ।*

और 
*राजीव दीक्षित के चाहने वालो का कहना है कि हम कुछ देर के लिए राजीव दीक्षित जी की मृत्यु पर प्रश्न नहीं उठाते लेकिन हमको एक बात समझ नहीं आती कि पतञ्जलि योगपीठ वालों ने राजीव दीक्षित जी की मृत्यु के बाद उनको तिरस्कृत करना क्यों शुरू कर दिया ?*

*मञ्चो के पीछे उनकी फोटो क्यों नहीं लगाई जाती ?*

*आस्था चैनल पर उनके व्याख्यान दिखाने क्यों बन्द कर दिये गए ?* 
*कभी साल अगर उनकी पुण्यतिथि पर व्याख्यान दिखाये भी जाते है तो वो भी 2-3 घण्टे के व्याख्यान को काट काट कर एक घण्टे का बनाकर दिखा दिया जाता है ।*

इसके अतिरिक्त उनके कुछ समर्थक कहते हैं कि ;
*भारत स्वाभिमान आन्दोलन की स्थापना जिस उदेश्य के लिए हुए थी राजीव दीक्षित जी की मृत्यु के बाबा रामदेव उस राह हट क्यों गए ।*

*राजीव दीक्षित जी और बाबा रामदेव खुद कहते थे कि सब राजनीतिक पार्टियां एक जैसी है हम 2014 मे अच्छे लोगो को आगे लाकर एक नया राजनीतिक विकल्प देंगे । लेकिन राजीव दीक्षित जी की मृत्यु के बाद बाबा रामदेव ने भारत स्वाभिमान के आंदोलन की दिशा बदल दी और राजीव दीक्षित जी की सोच के विरुद्ध आज वो भाजपा सरकार का समर्थन कर रहें । इसलिए बहुत से राजीव दीक्षित जी के चाहने वाले भारत स्वाभिमान से हट कर अपने अपने स्तर पर राजीव दीक्षित जी का प्रचार करने मे लगे हैं ।*

राजीव दीक्षित जी ने अपने पूरे जीवन मे देश भर मे घूम घूम कर 5000 से ज्यादा व्याख्यान दिये। सन 2005 तक वह भारत के पूर्व से पश्चिम उत्तर से दक्षिण चार बार भ्रमण कर चुके थे । उन्होने विदेशी कम्पनियो की नाक मे दम कर रखा था ।

*भारत के किसी भी मीडिया चैनल ने उनको दिखाने का साहस नहीं किया । क्योकि वह देश से जुडे ऐसे मुद्दो पर बात करते थे की एक बार लोग सुन ले तो देश मे 1857 से बडी क्रांति हो जाती।*

विनायक दामोदर सावरकर, हिन्दू महासभा, बालकृष्ण शिवराम मुञ्जे, केशब बलिराम हेडगेवार, रा.स्व.से.संघ, भारतीय जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी तक का इतिहास।

इटली के मुसोलिनी के फासिस्ट दल की व्यवस्था लागू करना भी 1925 से भी पहले से सावरकर वादियों का स्वप्न रहा है। इसलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार ने अपने राजनीतिक गुरु बालकृष्ण शिवराम मुञ्जे को मुसोलिनी के फासिस्ट दल की व्यवस्था सीखने और शाखा लगाने का प्रशिक्षण लेने इटली भेजा गया था। और लौटने पर रा.स्व.से.संघ की शाखाओं का गठन और सञ्चालन प्रारम्भ हुआ।
रा. स्व. से. संघ के अनुसार राष्ट्रवादी होने का प्रमाण के लिए केवल खाखी हाफ पैंट (अब फूल पैंट), सफेद शर्ट, काली टोपी (तीनों भारतीय नहीं हैं), पहन कर इटली के मुसोलिनी फासिस्ट दल के अनुसार ध्वज प्रणाम करने और रा. स्व. से. संघ के आदेश पर आधी रात को भी उठकर चले आना, जो काम बतलाया जाए बिना विचारे तुरन्त पालन करना। बस इतना ही पर्याप्त है।
*मतलब महत्वपूर्ण केवल नियमित रूप से शाखा में जाना और संघ के निर्देशों का पालन करना है न कि, चरित्रवान होना।*
फिर चाहे आप ड्रग सप्लायर हो, स्मगलर हो, लड़कियाँ सप्लाई करो, टेक्स चोरी तो भारत में अति साधारण बात मानी जाती है ऐसा कोई भी अनेतिक राष्ट्र विरोधी कार्य करें। रा. स्व. से. संघ को उससे कोई आपत्ती नहीं है।
यहीं इस सङ्गठन की विशेषता है । व्यक्तिगत स्तर पर कोई कार्यकर्ता कोई काम करता है और उससे कोई लाभ होता है तो सङ्गठन श्रेय लेने को तुरन्त आगे आ जाता है लेकिन उसके उस कार्य से किसी भी प्रकार की हानि हो तो सङ्गठन तुरन्त पल्ला झाड़ कर कहता है कि, वह मामला उस व्यक्ति विशेष का है , सङ्गठन से उसका कोई लेन देन नहीं है ।

इसी प्रकार सावरकर पन्थियों और रा.स्व.से.संघ के अनुसार चाहे कुरान पाठ करें और मस्जिद में नमाज पढ़े, बाइबल पढ़े चर्च में प्रार्थना करें ऐसा व्यक्ति स्वयम् को इण्डोनेशिया के लोगों के समान भारतीय संस्कृति को अपनी संस्कृति कहे (पालन का तो प्रश्न ही नहीं), भारत को अपना देश कहे, भारत को (तीर्थ भूमि नहीं) पवित्र स्थान कहे। (जैसे मुस्लिम अजमेर, हुसैन टेकरी, निजामुद्दीन, आगरा, लखनऊ, मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती की कबर को पवित्र स्थान मानते हैं। यहाँ तक कि, वहाँ पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी मुस्लिम आते हैं।), उर्दू जैसी भारतीय भाषा पर गर्व करें वह व्यक्ति सच्चा हिन्दू कहलाता है। संघ परिवार भारत को ऐसे नागरिकों का देश बनाने पर तुला हुआ है।
जबकि वास्तविक सनातन वैदिक वर्णाश्रम धर्मावलम्बी यह मानते हैं कि, यदि सनातन धर्म ही सुरक्षित नहीं रहा तो कलमा-कुरान , अल्लाह - मोह मद पर ईमान लाकर सुरक्षित हिन्दुस्तान में रहने से तो केसरिया शाका कर वीरगति को प्राप्त होना श्रेष्ठ समझता है।

मुसोलिनी के समान ही माओवादियों, नक्सलियों, कम्युनिस्टों (रा.स्व.से.संघ की भाषा में पञ्च माँगियों) और कांग्रेसियों का विनाश तो सावरकर वादियों का सपना रहा है। उसमें 2014 से लगे हैं।

उल्लेखनीय है कि, असम्बद्ध, किन्तु सहचारी , सहयोगी, अनुशङ्गी सँगठन के रूप में भाजपा के लिए जो कार्य आजकल बजरंग दल करता है। सावरकर की मंशा अनुसार प्रारम्भिक अवस्था में उसी प्रकार असम्बद्ध, किन्तु सहचारी , सहयोगी, अनुशङ्गी सँगठन के रूप में हिन्दू महासभा के लिए वही कार्य करने के लिए रा.स्व.से.संघ में बना था। यह काम केशव बलिराम हेडगेवार और उनके राइट हैंड, मुंजे ने बखूबी किया। वे हिन्दू महासभा के लिए वे सब करते जो पार्टी खुद करके बदनाम नही होना चाहती थी। बालकृष्ण शिवराम मुंजे आरएसएस और हिन्दू महासभा के बीच की कड़ी थे। 1940 में हेडगेवार की मृत्यु के बाद, लोगो की दृष्टि में मुंजे ही सरसंघचालक बनने थे। 

लेकिन आश्चर्य ! पर्ची खुली तो, चमत्कारी रूप से माधव सदाशिवराव गोलवलकर का नाम निकला। और माधव सदाशिवराव गोलवलकर ने आगे चलकर हिन्दू महासभा से किनारा करना शुरू कर दिया था। तब से रा.स्व.से. संघ गुरूजी मानकर माधव सदाशिवराव गोलवलकर की रीति-नीति पालन करता आ रहा है।

विनायक दामोदर सावरकर, पहले के ही समान राजनीतिक गतिविधियों रा.स्व.से. संघ को हिन्दू महासभा के अधीन काम करने वाला साधारण पदाति (प्यादा) के स्तर पर उपयोग करना चाहते थे, लेकिन माधव सदाशिवराव गोलवरकर ने सावरकर की उक्त मंशा के प्रति उदासीनता दर्शाकर कोई प्रतिक्रिया देना आवश्यक नहीं समझा। वे ब्रिटिश सरकार के प्रति समर्पित होने के कारण की बेड बुक में आना नही चाहते थे। इसीलिए ही उन्होंने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को भी क्रान्ति का मार्ग त्याग कर उपर्युक्त प्रकार के हिन्दुओं की एकता के लिए कार्य करने की प्रेरणा दी। लेकिन नेताजी सुभाष चन्द्र बोस चिड़ कर तुरन्त उठकर चले गए।

लेकिन प्रत्यक्ष, और आधिकारिक रूप से रा.स्व.से. संघ का स्वयंसेवक, हिन्दू महासभा के कार्यों
 में जुटना कम हो गया। तब चिड़कर विनायक दामोदर सावरकर ने कहा- 
*"आरएसएस के कार्यकर्ता की कब्र पर लिखा होगा, वह पैदा हुआ, शाखा गया, और बिना कुछ किये ही मर गया।"*
उस समय भी गोडसे जैसे कई लोग हिन्दू महासभा और रा.स्व.से. संघ दोनों से सम्बन्ध रखते थे और आजकल भी अधिकांश लोग रा.स्व.से. संघ दोनों से सम्बन्ध रखते हैं। 
इस प्रकार रा.स्व.से. संघ के सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवरकर के बनने के साथ ही रा.स्व.से. संघ मुख्य हो गया और गांधी हत्या के परिणाम स्वरूप हिन्दू महासभा पर प्रतिबन्ध लगने और के प्रति जनता का हिन्दू महासभा रुझान कम होने के आधार पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी और प्रोफेसर बलराज मधोक ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की। लेकिन प्रोफेसर बलराज मधोक पूर्वत केशव बलिराम हेडगेवार और डॉक्टर बालकृष्ण शिवराम मुञ्जे के समान रा स्व.से. संघ को भारतीय जनसंघ के अधिनस्थ पदाति कार्यकर्ता के रूप में रखना चाहते थे। लेकिन, नानाजी देशमुख, (प्रोफेसर बलराज मधोक के ही राजनीतिक शिष्य) लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेई आदि रा. स्व.से. संघ के अनुशंगी संगठन के रूप में भारतीय जनसंघ को रखने के पक्षधर थे। क्योंकि रा. स्व.से. संघ माधव सदाशिवराव गोलवरकर सरसंघचालक बनने के साथ रा. स्व.से. संघ कार्यकर्ताओं को व्यक्तिगत स्तर पर सभी अनेतिक कार्यों की छूट मिल गई थी इस कारण रा. स्व.से. संघ की लोकप्रियता बढ़ रही थी।
इसी समय से रा. स्व.से. संघ और उसके अनुशङ्गी संगठनों में द्वैदिभाव तथा कथनी और करनी में अन्तर स्पष्ट दिखने लगे। जैसे ही किसी अनुशङ्गी संगठन और उसके नेतृत्व कर्ता की लोकप्रियता बढ़ी और उसने सिद्धान्त बतलाने का साहस दिखाया कि, थोड़े से मतभेद के आधार पर उसे सङ्गठन से हटा दिया जाने लगा या मार्गदर्शक मण्डल नामक कुड़ेदान में डाल कर उसका राजनीतिक केरियर समाप्त करने की परम्परा प्रारम्भ हो गई।
डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ।
भारतीय जनसंघ की स्थापना 21 अक्टूबर 1951 से मृत्यु पर्यन्त 23 जून 1953 तक लगभग 01 वर्ष 08 माह संस्थापक अध्यक्ष रहे। 50 वर्ष 11 माह 17 दिन की अवस्था में ही निधन हो गया।

1953 के समय जम्मू-कश्मीर का अपना अलग संविधान, अलग ध्वज और अलग चिह्न था और वहां के मुख्यमंत्री को 'प्रधानमंत्री' कहा जाता था। इसके अलावा, किसी भी भारतीय नागरिक को जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने के लिए एक विशेष सरकारी 'परमिट' की आवश्यकता होती थी। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी इसके घोर विरोधी थे और उन्होंने नारा दिया था: "एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान नहीं चलेंगे"।

*डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी 8 मई 1953 को दिल्ली रेलवे स्टेशन से ट्रेन द्वारा जम्मू के लिए रवाना हुए। उनके साथ अटल बिहारी वाजपेयी और अन्य सहयोगी भी शामिल थे।* 
उनका उद्देश्य बिना परमिट के कश्मीर में प्रवेश कर इस दमनकारी नियम का विरोध करना और वहां तिरंगा फहराने के संकल्प को आगे बढ़ाना था।
*डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 11 मई 1953 को जैसे ही पंजाब की सीमा पार कर जम्मू-कश्मीर के माधवपुर चेकपोस्ट पर कदम रखा, जम्मू-कश्मीर की शेख अब्दुल्ला की सरकार द्वारा उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।*

*गिरफ्तारी के बाद उन्हें श्रीनगर से दूर एक सब-जेल (हिरासत केंद्र) में नजरबंद कर दिया गया।*
*जून के महीने में जेल में उनकी तबीयत अत्यधिक खराब हो गई। उन्हें दिल का दौरा पड़ने की बात कहकर एक छोटे अस्पताल में भर्ती कराया गया।*
*23 जून 1953 को हिरासत के दौरान ही अस्पताल में डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी की रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत्यु हो गई।*
डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी की माता जी और तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी आदि विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया था कि यह सामान्य मृत्यु नहीं बल्कि एक राजनीतिक षड़यंत्र था, क्योंकि डॉ. मुखर्जी को उनकी मेडिकल हिस्ट्री जानने के बावजूद सही इलाज और दवाएं नहीं दी गईं। हालांकि, तत्कालीन नेहरू सरकार ने इसकी कोई आधिकारिक स्वतंत्र जांच नहीं कराई।

डॉ. मुखर्जी के इसी बलिदान की याद में बाद के दशकों में जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी (BJP) द्वारा आंदोलन चलाए गए।
प्रोफेसर बलराज मधोक ने अपनी आत्मकथा में आरोप लगाया था कि, उस समय अटल बिहारी वाजपेई भी साथ में थे। लेकिन केवल डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी को ही केद किया गया। यह विचारणीय है।

 पण्डित दीनदयाल उपाध्याय ।

*पण्डित दीनदयाल उपाध्याय लखनऊ से पटना जाने के लिए 'सियालदह एक्सप्रेस' ट्रेन के फर्स्ट क्लास कंपार्टमेंट में यात्रा कर रहे थे।*
*11 फरवरी 1968 को प्रातः काल पण्डित दीनदयाल उपाध्याय का शव उत्तर प्रदेश के मुगलसराय रेलवे स्टेशन के पास रेलवे ट्रैक पर मिला था।*  

*केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) और न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ आयोग की जांच के अनुसार, चोरी के इरादे से उतरेगी उन्हें चलती ट्रेन से धक्का दिया गया था, जिससे पोल से टकराकर उनकी तुरंत मृत्यु हो गई। इसे चोरी के इरादे से की गई हत्या माना गया, हालांकि जनसंघ के कई नेताओं और समर्थकों का मानना था कि यह एक सुनियोजित राजनीतिक हत्या थी।

 प्रोफेसर बलराज मधोक ।

प्रोफेसर बलराज मधोक ने अपनी आत्मकथा में आरोप नाना जी देशमुख और अटल बिहारी बाजपेयी पर लगाया था, उसी के प्रोफेसर बलराज मधोक को भारतीय जनसंघ से निष्कासित किया जाने के कारणों में से यह भी एक रहा।
इसके अलावा प्रोफेसर बलराज मधोक ने अपनी आत्मकथा में आरोप लगाया था कि, 30 राजेंद्र प्रसाद रोड जो बीजेपी का मुख्यालय था जिसे अटल, आडवाणी ने अय्याशी का अड्डा बना दिया था जहां रोज नई नई लड़कियां आती थीं। इन सब कारणों से प्रोफेसर बलराज मधोक को भारतीय जनसंघ से छः वर्ष के लिए निष्कासित कर दिया गया था।

सुश्री उमा भारती 

श्रीमती विजया राजे सिंधिया की शिष्य सुश्री उमा भारती ने कर्नाटक के हुबली स्थित ईदगाह मैदान में 1994 में तिरंगा फहराने से जुड़े दंगे के एक पुराने मामले में अदालत द्वारा गैर-जमानती वारंट जारी किए जाने के बाद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से 23 अगस्त 2004 में इस्तीफा दिया था।

किसी आपराधिक मामले में गैर-जमानती वारंट जारी होने पर सीधे तौर पर मुख्यमंत्री पद छोड़ने का कोई संवैधानिक प्रावधान या नियम बाध्य नहीं करता है।
यह इस्तीफा राजनीतिक और नैतिक मूल्यों के तहत दिया गया था ताकि जांच निष्पक्ष रहे और पद की गरिमा बनी रहे।
कर्नाटक पुलिस ने उनके खिलाफ वारंट जारी किया था और वे गिरफ्तारी के लिए आगे बढ़ रही थीं।
पद पर रहते हुए गिरफ्तारी होने पर राज्य सरकार और पार्टी (भाजपा) की छवि पर गंभीर असर पड़ सकता था, जिससे पार्टी ने भी उन्हें पद छोड़ने और कानूनी का सामना करने का विकल्प चुना। और श्री बाबूलाल गौर को मुख्यमन्त्री बनाया।
लेकिन प्रकरण समाप्त होने पर भी स्व. श्री बाबूलाल गौर से पद वापस लेकर सुश्री उमा भारती को वापस मुख्यमन्त्री नहीं बनाया गया। बाद में भी श्री बाबूलाल गौर के स्थान पर सांसद रहते म.प्र.भा ज पा अध्यक्ष बनाये गये श्री शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमन्त्री बनाया गया।
इससे नाराज उमा भारती ने श्री आडवाणी जी की उपस्थिति में उन्हें पिता तुल्य मानते हुए बहुत सी खरी-खरी सुनाई।
परिणाम स्वरूप सुश्री उमा भारती को भा ज पा से छः वर्ष के लिए निष्कासित कर दिया गया।
छः वर्ष बाद सुश्री उमा भारती ने वापस भा ज पा की सदस्यता ग्रहण कर ली।

श्री कोडीपकम नीलमेघाचार्य गोविंदाचार्य।

 सुश्री उमा भारती के राजनीतिक गुरु श्री कोडीपकम नीलमेघाचार्य गोविंदाचार्य पिता श्री कोडिपक्कम वरदाचार्य नीलमेघाचार्य जी हुए।

वास्तविक निर्णय कर्ता श्री लालकृष्ण आडवाणी हैं और श्री अटल बिहारी वाजपेई केवल मुखोटा प्रधानमन्त्री हैं श्री गोविन्दाचार्य जी के नाम से उक्त कथन उछाले जाने के कारण नाराज श्री अटल बिहारी वाजपेई ने उनसे भा ज पा महासचिव पद से त्यागपत्र मांग लिया। श्री गोविन्दाचार्य द्वारा यह कहा गया कि, मेरा नाम जबरन जोड़ा गया है। लेकिन अटल बिहारी वाजपेई सन्तुष्ट नहीं हुए। तो श्री गोविन्दाचार्य को पद छोड़ना पड़ा। भाजपा के नागपुर सम्मेलन में सितम्बर 2000 में उन्होंने 14 जनवरी 2001 से दो वर्ष के लिए अध्ययन अवकाश चाहा। 14 जनवरी 2003 को उन्होंने भा ज पा की सदस्यता का नवीनीकरण नहीं करवाया। इस प्रकार भाजपा और रा.स्व.से.संघ से नाता तोड़ कर अब वे रा.स्व.से.संघ और भा.ज.पा.के धोर विरोधी हो गये।

कोडीपकम नीलमेघाचार्य गोविंदाचार्य का जन्म 2 मई 1943 को हुआ था । वे भारत विकास संगम, कौटिल्य इंटरनेशनल फाउंडेशन, कौटिल्य शोध संस्थान, राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन और प्रकृति केंद्रित विकास मंच (फोरम फॉर इकोसेंट्रिक डेवलपमेंट) के संस्थापक हैं। औपचारिक रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक, पर्यावरण कार्यकर्ता , सामाजिक कार्यकर्ता , राजनीतिक कार्यकर्ता और विचारक हैं । वे भारतीय जनता पार्टी के महासचिव रहे थे , लेकिन अब वे भारतीय जनता पार्टी के भी कट्टर आलोचक हैं ।

श्री प्रवीण तोगड़िया।

प्रवीण तोगड़िया का जन्म गुजरात के अमरेली जिले के टिम्बा गाँव में किसान पटेल परिवार में 16 दिसम्बर 1956 को हुआ। वे एम.बी.बी.एस. ,एम.एस.करके सर्जन बने।
दस वर्ष की अवस्था से रा.स्व.से.संघ की शाखा में जाने वाले श्री प्रवीण तोगड़िया सौलह वर्ष की अवस्था में रा.स्व.से.संघ के स्वयम् सेवक बन गये। और सत्ताइस वर्ष की वय में विश्व हिन्दू परिषद मे आये कार्यकारी अन्तर्राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर नियुक्त कर दिया गया। इसमें राम जन्मभूमि आन्दोलन में उनकी सक्रियता और पूरे विश्व भर में लगभग अड़सठ लाख से अधिक सदस्य बनाने का कौशल का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
लेकिन 
प्रवीण तोगड़िया ने विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में सिंघल की जगह ली थी किन्तु 14 जून 2018 को उन्होंने स्वयं को विश्व हिन्दू परिषद से अलग कर लिया तथा 24 जून 2018 को दिल्ली में अपने समर्थकों के साथ राम मंदिर, धारा-370 गौ हत्या पर कानून जैसे मुद्दों को केंद्र बना कर अंतरराष्ट्रीय हिन्दू परिषद (AHP) की स्थापना की ।
 विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकारी अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष और पेशे से विख्यात कैंसर सर्जन प्रवीण तोगड़िया ने आईबी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। तोगड़िया ने कहा कि उनकी एनकाउंटर की साजिश रची गई. तोगड़िया 15 जनवरी 2018 सोमवार को एक पार्क में बेहोश मिले थे और उसके बाद उन्‍हें अस्‍पताल में भर्ती कराया गया था. मीडिया के सामने तोगड़िया ने कहा कि कुछ समय से मेरी आवाज दबाने का हरदम प्रयास किया जाता रहा है. उनका नाम सबसे गद्दावर नेताओं में आता है।
रा.स्व.से. संघ और भा.ज.पा. के प्रमुख पदाधिकारी प्रचार-प्रसार का कार्य कर उँचाई तक पहूँचाने में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले लालकृष्ण आडवाणी और श्री मुरली मनोहर जोशी को सलाहकार मण्डल में डालने की जानकारी सबको है ही।


रा.स्व.से. संघ, भारतीय जनसंघ, के प्रमुख विचारकों की पुस्तकें, फिर रामकृष्ण मिशन और रामकृष्ण मिशन से प्रकाशित रामकृष्ण परमहंस पर लिखी पुस्तकें, विवेकानन्द और अन्य विचारकों की लिखी और विवेकानन्द जी पर लिखी पुस्तकों में  संशोधन कर दिया गया।

 स्वाध्याय मण्डल पारडी ।सातवलेकर जी के वेद भाष्य और वैदिक साहित्य प्रकाशन बन्द कर दिया गया है।
अब बारी गीता प्रेस गोरखपुर की है।
स्वामी रामसुखदास जी महाराज और सेठ जयदयाल गोयन्दका जी रचित लगभग सभी पुस्तकों में संशोधन कर दिया गया है।