धर्मशास्त्र की आँख ज्योतिष है। धर्मशास्त्र में देश-काल निर्धारण ज्योतिष के अनुसार होता है जिसे मुहूर्त और वास्तु कहते हैं।
लेकिन
मन्दिरों के पुजारियों, घर- घर जाकर सत्यनारायण की कथा करने वाले, मन्दिरों में या पीपल के चबूतरे पर बैठकर तिथि-व्रत- त्योहारों की कथा सुनाने वाले, तीर्थ पुरोहितों (पण्डों) आदि पण्डितों को लग्नायन (लगन निकालना) नहीं आता है। उनने बेचारों ने चौघड़िया की खोज कर काम चलाना शुरू किया, तो लोगों ने भी चौघड़िया निकालना सीख लिया।
गुण मिलान, मंगल, कालसर्प दोष, चौघड़िया, गोरखपत्रा से यात्रा मुहूर्त ऐसे ही पण्डितों की खोज है
धर्मशास्त्र और ज्योतिष दोनों में ही इनका कोई महत्व नहीं है।
ध्यान रखें वार सूर्योदय से सूर्योदय तक रहते हैं, और सूर्योदय से ही बदलते हैं। रात बारह बजे Day & Date (डे और डेट) ही बदलते हैं, वार नहीं।
प्रत्येक चौघड़िया बी डेड़-डेड़ घण्टे का नहीं होता। और दिन का चौघड़िया सुबह 6 बजे से और रात का चौघड़िया शाम 6 बजे से प्रारम्भ नहीं होता है।
दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक और रात सूर्यास्त से सूर्योदय तक रहती है।
अतः सूर्यास्त के समय में से सूर्योदय का समय घटाकर दिनमान के घण्टे-मिनट ज्ञात करते हैं। दिनमान के घण्टे-मिनट में आठ का भाग देकर प्रत्येक चौघड़िया का मान (घण्टा-मिनट) ज्ञात करते हैं। फिर सूर्योदय के समय में चौघड़िया का मान जोड़-जोड़ कर अगले चौघड़ियों का प्रारम्भ और समाप्ति समय ज्ञात करते हैं।
ऐसे ही रात्रि के चौघड़िया ज्ञात करने के लिए अगले सूर्योदय समय से आज के सूर्यास्त का समय घटाकर घण्टे-मिनट में रात्रि मान ज्ञात करते हैं। फिर रात्रि मान में बारह का भाग देकर रात्रि के प्रत्येक चौघड़िया का मान निकालते हैं। फिर सूर्यास्त समय में रात के चौघड़िया का समय जोड़ जोड़ कर अगले चौघड़िया का प्रारम्भ और समाप्ति समय ज्ञात करते हैं।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें