शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

ब्राह्मण, और क्षत्रिय वंश

वेद, ब्राह्मण ग्रन्थ, वाल्मीकि रामायण, महाभारत और विष्णु पुराण के अनुसार, 
प्रजापति के पुत्र दक्ष-प्रसुति, रुचि-आकुति, कर्दम-देवहुति तथा स्वायम्भुव मनु-शतरूपा भूमि के प्रजापति हुए।
धर्म तथा उनकी तेरह पत्नियाँ, अग्नि और स्वाहा तथा पितर और स्वधा भी प्रारम्भ में भूमि पर ही रहे। और प्रजा उत्पन्न की।

इनके अलावा  मरीची-सम्भूति, भृगु-ख्याति, अङ्गिरा-स्मृति, वशिष्ट-ऊर्ज्जा, अत्रि-अनसुया, पुलह-क्षमा, पुलस्य-प्रीति, कृतु-सन्तति की सन्तान ब्रह्मर्षि हुए जो मूलतः धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में रहते थे और वहाँ से अन्य स्थानों पर गये।
स्वाम्भुव मनु-शतरूपा की सन्तान - प्रियव्रत के पुत्र आग्नीध्र हुए। आग्नीध्रके पुत्र अजनाभ या नाभि हुए जिन्हें भारतीय उप महाद्वीप का शासनाधिकार मिला। अजनाभ के पुत्र ऋषभदेव हुए, ऋषभदेव के पुत्र भरत चक्रवर्ती हुए जिनके द्वारा इस क्षेत्र को भारतवर्ष नाम दिया। इन्ही भरत चक्रवर्ती की सन्तान परम्परा मुनुर्भरत कहलाई। ये सब क्षत्रिय कहलाते थे। मनुर्भरतों में दिवोदास के पुरोहित पहले भृगु थे। फिर वशिष्ठ जी हुए जो दिवोदास के पुत्र सुदास के समय भी रहे।
मनुर्भरतों का क्षेत्र भी हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, पञ्जाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तरी राजस्थान तथा उत्तरी मध्य प्रदेश (चम्बल,ग्वालियर सम्भाग) वाले क्षेत्र था। यह क्षेत्र आर्यावर्त कहलाता था।

पञ्जाब, और हरियाणा धर्म क्षेत्र कहलाता था।
हरियाणा के कुरुक्षेत्र अर्थात धर्म का राज्य क्षेत्र था। कुरुक्षेत्र के आस-पास का क्षेत्र धर्मक्षेत्र के अलावा ऋषि देश, गोड़ प्रदेश और मालवा क्षेत्र कहलाता है। गोड़ प्रदेश के निवासी आद्यगोड़, श्रीगोड़, गुजरगोड़ आदि पञगोड़ ब्राह्मण हुए। 
विक्रमादित्य के दादाजी नबोवाहन भी इसी क्षेत्र के निवासी मालव गणों के प्रमुख थे। उनके पुत्र महेन्द्रादित्य गन्धर्वसेन ने सोनकच्छ को राजधानी बनाया। महेन्द्रादित्य गन्धर्वसेन के पुत्र भृतहरि - और विक्रमसेन हुए। इन्होंने उज्जैन को राजधानी बनाया। तब से यह पठार मालवा कहलाया।

 मनुर्भरतों में तृत्सु वंश में उत्पन्न दिवोदास और उनके पुत्र सुदास के समय शत वर्षीय दशराज युद्ध हुआ। 

मरीचि नन्दन कश्यप के पुत्र आदित्य हुए जो तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान, पाकिस्तान, जम्मू कश्मीर, लद्दाख, नेपाल, भूटान, तिब्बत में बसे, यह क्षेत्र स्वर्ग कहलाता था।  ब्रह्मावर्त भी यही क्षेत्र कहलाता था।
इन्ही आदित्यों में से सप्तम आदित्य विवस्वान के पुत्र श्राद्ध देव के समय जल प्रलय हुआ जिसका वर्णन शतपथ ब्राह्मण में भी है और तनख (बाइबल ओल्ड टेस्टामेण्ट) में भी है।
इन श्राद्ध देव को महामत्स्य की कृपा से सभी मूल जीवों और ऋषियों सहित कश्मीर क्षेत्र में हिमालय के किसी शिखर पर सुरक्षित पहूँचाया।
इन्ही श्राद्ध देव को विवस्वान का पुत्र होने के कारण नामकरण वैवस्वत मनु हुआ । और इनके काल को वैवस्वत मन्वन्तर कहते हैं।इन वैवस्वत मनु की सन्तान सूर्य वंशी कहलाए; कश्यप ऋषि की सन्तान होने के कारण महर्षि कश्यप ने इन्हें कश्मीर में बसाया था। ये ऋषि सन्तान होने के कारण मनुर्भरतों के समान भारतीय मूल के ही थे। सूर्यवंश में इक्ष्वाकु वंश प्रमुख रहा। इक्ष्वाकु वंश में भी रघुवंश प्रमुख रहा। ये भी क्षत्रिय कहलाए। इस वंश की राजधानी अयोध्या थी।

भरत चक्रवर्ती की सन्तान मुनुर्भरतों में तृत्सु वंश में उत्पन्न दिवोदास और उनके पुत्र सुदास के समय टर्की से आये चन्द्रवंशी अनु, दुह, यदु, पुरु और तुर्वसु के वंशजों से सौ वर्ष तक दशराज युद्ध हुआ। इसमें वैवस्वत मनु की सन्तान आदित्यों ने दिवोदास और सुदास का साथ दिया। जबकि, सीरिया के नागों ने चन्द्रवंशियों का साथ दिया।

शत वर्षीय दशराज युद्ध में समझौता हुआ। इसके अन्तर्गत कश्मीर में बसे सूर्यवंशियों को अयोध्या सोपा गया। चन्द्र वंशियों को और नागों को कश्मीर में बसने की अनुमति दी गई।

हिमाचल प्रदेश, पञ्जाब, हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश, उत्तरी राजस्थान तथा उत्तरी मध्य प्रदेश (चम्बल,ग्वालियर सम्भाग) वाले क्षेत्र में दक्ष-प्रसुति, रुचि-आकुति और कर्दम-देवहुति का क्षेत्र था। यहाँ पञ्चायती राज व्यवस्था थी।

पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, मध्य भारत और गुजरात स्वायम्भुव मनु-शतरूपा का शासन क्षेत्र था। जिसमें गणतन्त्र था।
दक्षिण भारत में धर्म के पुत्र दृविण और उनकी सन्तानों का शासन था।
मनुर्भरतों वंश का स्वतन्त्र अस्तित्व समाप्त हो गया। अयोध्या वैवस्वत मन्वन्तर में सूर्यवंशियों की राजधानी बनी।
बाद में चन्द्रवंशी बिहार के गया क्षेत्र और झारखण्ड तरफ फैल गये।  जब नाग कश्मीर में प्रबल हो गये तो तो वे भी भारत के अन्य क्षेत्रों में यथा नगालैण्ड, मध्यभारत, नागपुर, राजस्थान तक फैल गये।
चन्द्रवंशियों ने प्रयागराज को राजधानी बनाया।
द्वापर युग में तो पहले हस्ति ने हस्तिनापुर बसाया फिर अजमीढ़ ने पुष्कर के पास अजमेरु (अजमेर) बसाया। पाण्डवों ने इन्द्रप्रस्थ बसाया। जिसे पृथ्वीराज चौहान ने दहली नाम दिया।
मनुर्भरतों का तो नाम ही नहीं रहा। किसी समय मनुर्भरतों को क्षत्रिय कहते थे। फिर सूर्य वंशी भी क्षत्रिय कहलाए। चन्द्रवंशियों का वर्चस्व बढ़ा तो भी क्षत्रिय कहलाने लगे। फिर नागों को भी क्षत्रिय मान लिया गया। जो अब कालबेलिया कहलाते हैं।

वेद ज्ञान परमात्मा में ही स्थित है, यह जानकर ही वेदपाठ करना सार्थक है।

ऋग्वेद १.१६४.३९

ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः।
यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते।।

अर्थ ---

वैदिक ज्ञान ऋचा अविनाशी अक्षर, सर्वव्यापी परम व्योम में, जिस में विश्व के समस्त देवता स्थित हैं या रहते हैं या हैं।
जो यह नहीं जानता, वह ऋग्वेद का क्या करेगा? अर्थात उसके द्वारा केवल वेद पाठ केवल दोहराना मात्र है। जो यह जानते हैं, वे ही परम अभेद (एकत्व) जानने वाले ज्ञानी हैं।

बुधवार, 26 नवंबर 2025

अहोरात्र में काल।

अहोरात्र में इतने काल होते हैं।⤵️
सूर्योदय, प्रातः, सङ्गव, मध्याह्न, अभिजित मुहूर्त, मध्याह्न काल, विजय मुहूर्त, अपराह्न काल, सायाह्न, सूर्यास्त, गोधुलि वेला, सायं सन्ध्या, प्रदोषकाल, रात्रि, मध्यरात्रि, महानिशा यानी महानिशिथ काल, उत्तर रात्रि, ब्रह्म मुहूर्त, प्रातः सन्ध्या, अरुणोदय काल। या फिर किसी लग्न विशेष ।

मानव जीवन के कर्तव्य ब्रह्म मुहूर्त में और रात्रि में शयन पूर्व परमात्मा का स्मरण, सर्वजन हिताय सेवा,दुसरों की गलती देख स्वयम् में सुधार और अधिकतम अर्जन।

मानव जीवन के कर्तव्य

परमात्मा किसी का भाग्य निर्धारित नहीं करता है।
प्रारब्ध तो अपने अनन्त जन्मों के कर्मों के सञ्चित में से इस जन्म में भोगे जा सकने वाले कर्मों का उदय मात्र है।
सत्सङ्ग और सत्कर्म से बड़े से बड़ा सञ्कट ऐसे निकल जाता है कि, कई बार तो पता भी नहीं चलता।
लेकिन कुसङ्गति में पड़े और अधर्मी को तो राज्य भी मिल जाए तो भी वह सुखी नहीं हो पाता है।
प्रातःकाल उठते से ही हरि स्मरण कर लो तो दिन भर हरिनाम संकीर्तन याद आता रहता है ‌
रात को सोते समय हरि स्मरण कर लो तो रात भर स्वप्न में भी भगवान के भजन ही चलते रहते हैं।
इसलिए सुबह से रात तक हरि बोल।

अधिकतम् अर्जन (कमाना) और सत्कर्मों में व्यय (खर्च) करना हमारा सामाजिक और राष्ट्रीय कर्तव्य है।
क्योंकि जैसे अड़ानी-अम्बानी धनार्जन कर रहे हैं तो, उनके बल पर राष्ट्रीय विकास हो रहा है। नौकरी करके या निवेश करके या अन्य प्रकार से समाज के लाखों लोग उनके कार्यों में सहयोग देकर स्वयम् भी सम्पन्न हो रहे हैं।
उन लोगों के बल बुते पर उनके घर काम करने वाले, उनके बच्चों को पढ़ाने वाले, उनका इलाज करने, हॉटेल-रेस्टोरेंट, गार्डन वाले, परिवहन वाले आदि अनेकानेक लोग स्वयम् की ग्रहस्थी चला पा रहे हैं।
और धन-सम्पदा साथ नहीं जाएगी का उपदेश देने वाले बाबा लोग उनसे और उनके सहयोगियों से करोड़ों रुपए की धन-सम्पदा लेकर खुद भी ऐश से जी रहे हैं और चेलों को भी एश करवा रहे हैं।😃

जो दूसरों के शुभाशुभ कर्म और उसके परिणाम स्वरूप उनके ऐश-आराम के बजाय उनके सुख-सन्तोष को देख कर शिक्षा ले वह स्वयम् में सुधार करके उत्तरोत्तर विकास कर जाता है,
इसके विपरित - कितना भी समझाने पर अपनी आदत के अनुसार ही कार्य करने वाले दासों, नौकरों को देखिए वे उत्तरोत्तर पतनोन्मुख ही होते जाते हैं।

गुरुवार, 20 नवंबर 2025

फलित ज्योतिष के अनुसार तलाक य पति-पत्नी में अनबन के कारण।


प्रायः जन साधारण मङ्गल के नाम से भयभीत हैं। और इसका लाभ पुरोहित वर्ग और उनके एजेंट ज्योतिष के नाम पर भय दोहन करने वाले उठाते हैं।
सन 1980 में नासिक के एक पण्डाजी ने कालसर्प दोष नामक नकली योग की खोज कर नागबलि करवा कर कालसर्प दोष की शान्ति का उपाय करवा कर भय दोहन करना शुरू किया।  आजकल काल सर्प दोष के नाम पर ठगी करते हैं।   
आर्किटेक्ट जिसे संस्कृत में वास्तुशास्त्र कहते हैं, उस वास्तुशास्त्र के अनजान लोगों को वास्तु के नाम पर भय दोहन करते हैं ।

दाम्पत्य जीवन में कष्ट के कारण --
कुण्डली में  कुण्डली का सातवाँ खाना जिसमें कोई भी अंक लिखा हो वह सप्तम भाव पति या पत्नी / जीवन-साथी, और विवाह का सूचक है।
सप्तम भाव का सप्तम भाव होने से  कुण्डली का पहला खाना जिसमें कोई भी अंक लिखा हो वह लग्न भाव भी विवाह सूचक है।
द्वितीय भाव दुसरे विवाह को दर्शाता है। तो दुसरे भाव से दुसरा भाव होने से तृतीय भाव भी द्वितीय विवाह का सूचक है। कभी-कभी एक पत्नी के रहते दूसरा विवाह भी तलाक का कारण बन जाता है। द्वितीय भाव सम्पत्ति का सूचक भी है। धन सम्पत्ति के लालच में कुछ लोग धन खोदने जैसी मुर्खतापूर्ण कार्य करने के चक्कर में तान्त्रिकों के चक्कर में फँसकर गृहस्थी बर्बाद कर लेते हैं।
पञ्चम भाव, जीवन-आनन्द (Please of life) और काम-सुख का सूचक है। व्यक्ति व्यभिचारी हो सकता है। और एकाधिक योन सम्बन्ध स्थापित कर दाम्पत्य जीवन नष्ट कर सकता है।
अष्टम भाव लिङ्ग (स्त्री या पुरुष की पहचान करवाने वाला अङ्ग) का सूचक है।
अति कामुकता शारीरिक अक्षमता का कारण बन कर तलाक का कारण बन सकता है।
नवम भाव बिना कर्म किए भाग्य से मिलने वाले सुख अर्थात भाग्य का सूचक है। भारत में पति को पत्नी का सौभाग्य (सुहाग) माना जाता है। जिसका पति जीवित है, वह स्त्री सौभाग्यवती (सुहागिन) कहलाती है। अतः स्त्री की कुण्डली में नवम भाव भी महत्वपूर्ण है।
लेकिन भाग्य भरोसे बैठने वाले पति परिवार का समुचित भरण-पोषण नहीं कर पाते हैं और व्यक्ति लालच में आकर टोने-टोटके और तान्त्रिकों के चक्कर में फँस कर घर गृहस्थी बर्बाद कर बैठते हैं। यह भी तलाक का कारण बन सकता है।
एकादश भाव आय और लाभ का सूचक है। विवाह द्वारा परिवार में एक सदस्य बढ़ता है,  लेकिन पति पर उत्तरदायित्व बढ़ जाता है, इसलिए वह अधिकतम आय अर्जित कर पत्नी और बच्चों तथा मात-पिता आदि की सुख-सुविधाओं के लिए अधिकतम धनार्जन करने के चक्कर में परिवार वालों को समय नहीं दे पाता, और परिवार में मतभेद, क्लेश-कलह उत्पन्न हो जाते हैं। और तलाक हो जाता है। निकाह और अन्य कई फिल्मों में यह तथ्य दिखाया गया है।
अर्थात एकादश भाव जो आवक का भाव है वह भी तलाक का कारण बन सकता है।
या कभी-कभी व्यक्ति लालच में आकर टोने-टोटके और तान्त्रिकों के चक्कर में फँस कर घर गृहस्थी बर्बाद कर बैठते हैं।

द्वादश भाव शय्या सुख (आराम, भोग, और व्यभिचार ) का सूचक है। अत्यधिक कामुकता भी पति-पत्नी में दूरियाँ उत्पन्न कर देती है। ता तो जीवनसाथी परेशान हो जाता है या असन्तुष्ट रहकर कर अवसाद ग्रस्त हो जाता है।
ऐसे में कुछ लोग टोने-टोटके और तान्त्रिकों के चक्कर में फँस कर घर गृहस्थी बर्बाद कर बैठते हैं।

इन (2, 7, 8, 9, 11 और 12) भावों में स्थित ग्रह, इन (2, 7, 8, 9, 11 और 12) भावों में लिखे राशि के अङ्क का स्वामी ग्रह, इन भावों में स्थित ग्रहों के नक्षत्र में स्थित ग्रह, और इन (2, 7, 8, 9, 11 और 12) भावों में लिखे राशि के अङ्क का स्वामी ग्रह के नक्षत्र में स्थित ग्रहों में से वक्री या अस्त ग्रह के नक्षत्र में स्थित ग्रह तथा जो ग्रह स्वयम् वक्री या अस्त हो उन ग्रहों को छोड़कर शेष ग्रह विवाह और पति - पत्नी और विवाह के सूचक ग्रह होते हैं।
इनकी दशा/ अन्तर्दशा/ प्रत्यन्तर दशा में जब ये विवाह सूचक ग्रह गोचर में इन्हीं विवाह सूचक भावों में और इन विवाह सूचक ग्रहों के राशि नक्षत्र में में भ्रमण करते हैं तब विवाह होता है। इन राशियों/नक्षत्रों और ग्रहों के स्वभाव, दिशा, स्थान आदि तथा राशियों/नक्षत्रों और ग्रहों के स्वभाव आदि के अनुसार ही पति/ पत्नी (जीवन-साथी) मिलता है।
इसी प्रकार इन भावों से षष्ठ (शत्रु या रोग के सूचक), अष्टम ( मृत्यु या दुर्घटना का सूचक) और द्वादश (दूरी, व्यय और हानि का सूचक) भाव में में स्थित ग्रह, इन भावों में लिखे राशि के अङ्क का स्वामी ग्रह, इन भावों में स्थित ग्रहों के नक्षत्र में स्थित ग्रह, और इन  भावों में लिखे राशि के अङ्क का स्वामी ग्रह के नक्षत्र में स्थित ग्रहों में से वक्री या अस्त ग्रह के नक्षत्र में स्थित ग्रह तथा जो ग्रह स्वयम् वक्री या अस्त हो उन ग्रहों की दशा/ अन्तर्दशा/ प्रत्यन्तर दशा में जब ये तलाक या मृत्यु के सूचक ग्रह गोचर में इन्हीं तलाक या मृत्यु  सूचक भावों में और इन तलाक या मृत्यु  सूचक ग्रहों के राशि नक्षत्र में में भ्रमण करते हैं तब तलाक या मृत्यु होता/ होती है।
सप्तम भाव का द्वादश भाव षष्ठ भाव है। जो झगड़ा करवाना, शत्रु पैदा करवाना आदि का सूचक है।
सप्तम भाव का सप्तम (मारक भाव) लग्न है जो  अहंकार को चोंट पहूँचने के कारण विवाह विच्छेद सूचित करता है।
सप्तम भाव का द्वितीय भाव अष्टम भाव (सम्पत्ति का भाव) है, जो दहेज की मांग के कारण सम्बन्ध विच्छेद दर्शाता है।
सप्तम भाव का अष्टम भाव (द्वितीय भाव) जीवन-साथी की मृत्यु की स्थितियाँ और कारण दर्शाता है।
ऐसे ही सप्तम भाव से द्वितीय (अष्टम भाव)और सप्तम भाव ( लग्न) की दशा, अन्तर्दशा, प्रत्यन्तर दशा जीवन-साथी की मृत्यु का समय दर्शाती है।
इसी प्रकार देख सकते हैं।

इसी प्रकार ग्रहों के स्वभाव भी तलाक का या अनबन का कारण दर्शाते हैं।
सूर्योदय के समय जन्में बच्चों में -- लग्न में सूर्य।
जैसे --
सूर्यदेव का तेज उनकी पत्नी सरण्यु (संज्ञा) सहन नहीं कर पाई। और सूर्यदेव को छोड़कर चली गई। (अश्विनी के रूप में बाद में मिली। तब अश्विनी कुमार हुए।)
हनुमान जी ने विवाह नहीं किया।
ऐसे ही तलाक की सम्भावना बनती है।

सूर्यास्त के समय जन्में बच्चों में भगवान नृसिंह के समान क्रोधी स्वभाव कष्टकारी होकर क्रोध के कारण एसीडिटी बढ़ती है। गेस के कारण क्षमता कम हो जाती है। तलाक करवा देता है। 

चन्द्रमा -- सत्ताइस पत्नियों में से केवल रोहिणी के साथ ही लगाव रहने के कारण श्वसुर दक्ष प्रजापति (द्वितीय) द्वारा शाप देने के कारण क्षय रोग ग्रस्त हो गये।
स्वयम् की सत्ताईस पत्नियाँ होते हुए देवगुरु ब्रहस्पति की पत्नी तारा का हरण कर लिया और बुध को जन्म दिया।
मतलब व्यभिचारी प्रवृत्ति के कारण अलगाव हो जाता है।
स्त्री का मायके वालों से ही लगाव और ससुराल वालों से द्वेष का स्वभाव।

बुध -- नपुंसक ग्रह है। इसलिए अक्षमता अलगाव का कारण बनता है।

गुरु ब्रहस्पति -- जहाँ बेठता है, वहाँ की हानि करता है।
स्वयम् की पत्नी (तारा) को नहीं सम्भाल पाये। तारा को चन्द्रमा हरण कर ले गया। और बुध को जन्म दिया।
ऐसे ही सप्तम भाव का गुरु गृहस्थ जीवन में विशेष रुचि नहीं होने के कारण दाम्पत्य सम्बन्ध खराब कर देता है।
पति का अपने परिवार वालों से ही लगाव और ससुराल वालों से द्वेष का स्वभाव।

शुक्र -- अत्यधिक काल्पनिक, फिल्म नवरङ्ग जैसे कवि, चित्रकार, मूर्तिकार, गायक, नर्तक, अभिनेता होने के कारण दाम्पत्य जीवन में सफल नहीं होते।
प्रायः अभिनेताओं - अभिनेत्रियों मे तलाक अधिक देखे जाते हैं।
कुटील स्वभाव, दुष्ट सङ्गति भी दाम्पत्य जीवन में बाधक होता है।
द्वादश भावस्थ शुक्र व्यभिचारी बनाता है।
स्त्री हो या पुरुष दोनों का अपने स्वजनों से ही लगाव और ससुराल वालों से द्वेष का स्वभाव।

शनि -- कठोर अनुशासन, न्याय के लिए दण्ड देने की प्रवृत्ति दाम्पत्य जीवन सफल नहीं होने देती।
हत्या- मार-पीट कुछ भी कर सकते हैं।
ससुराल वालों से द्वेष का स्वभाव।

राहु -- भ्रम, भ्रमित करने का स्वभाव, अत्यधिक छल-कपट, षड़यंत्र करना, नीच सङ्गति, जुआ-सट्टा में ही दिमाग व्यस्त रहना आदि कारणों से दाम्पत्य जीवन में पूर्ण असफलता पैदा करता है।
परिवार वालों के प्रति द्वेष का स्वभाव।


केतु -- त्याग प्रवृत्ति, पत्नी का विवाह पत्नी के पूर्व प्रेमी या विवाहेतर सम्बन्ध रखने वाली पत्नी का उसके प्रेमी से विवाह करवाने वाले, घर बेंच कर तीर्थ करने वाले। भक्त नृसिंह मेहता जैसे लोगों का दाम्पत्य जीवन में लगाव ही नहीं होता।
इसलिए तलाक हो जाता है।
द्वादश भावस्थ केतु -- केतु के नक्षत्र में स्थित ग्रह की दशा -अन्तर्दशा में व्यक्ति, नौकरी - धन्धा, या घर गृहस्थी कुछ भी छोड़ देता है। तलाक भी हो सकता है।
परिवार वालों के प्रति द्वेष का स्वभाव।

सोमवार, 17 नवंबर 2025

ॐ विष्णवे नमः ही क्यों लिखता हूँ?

🙏🏼 ॐ विष्णवे नमः।🙏🏼

श्रीरामचन्द्र जी के परम भक्त महाकवि, महा नीतिज्ञ तुलसीदास जी महाराज जी के जीवन की यह घटना मुझे सदैव प्रेरणा देती रही है।
जब सन्त तुलसीदास जी को छल पूर्वक ज्ञान गोदड़ी नामक स्थान पर श्रीकृष्ण मन्दिर ले गये।
तुलसीदास जी केवल श्री रामचन्द्र जी के रूप में ही सर्वत्र परमात्मा के दर्शन करना पसन्द करते थे।
लेकिन जैसे ही तुलसीदास जी की दृष्टि मन्दिर में स्थापित प्रतिमा पर पड़ी तो वे हतप्रभ रह गए।
और उन्होंने भगवान से निवेदन किया कि,
*कहा कहो छवि आपकी, भले बिराजे नाथ ।*
*तुलसी मस्तक तब नवै, धनुष बाण लो हाथ॥*

तत्काल ही भगवान ने भक्त की भावना को आदर देते हुए प्रतिमा का स्वरूप बदल दिया। और

 *कित मुरली कित चन्द्रिका कित गोपियन को साथ।*
*अपने जन के कारणे श्री कृष्ण भये रघुनाथ ॥*
मुझे यह भी भली-भांति स्मरण रहता है कि,
*तुलसी नर का क्या बड़ा? समय बड़ा बलवान।*
*भीलां लूटी गोपियाँ वही अर्जुन वही बाण ||*

इसलिए ईश्वरार्पण होकर भगवान से यही प्रार्थना करता हूँ कि, मेरी आस्था परमात्मा के ॐ सञ्कल्प के साथ प्रकट हुए परमात्मा के परब्रह्म स्वरूप जिसे मानवीय बुद्धि के अनुसार परम पुरुष, परमेश्वर, सर्वव्यापी भगवान विष्णु और उनकी माया शक्ति के रूप में जानते हैं।
बस उसी स्वरूप में मेरी मति स्थिर रहे।
🙏🏼

राशि और वार मिश्र, पश्चिम तुर्कीये, बेबीलोन (इराक) और तुर्किस्तान की खोज है, भारत में आचार्य वराहमिहिर ने परिचय करवाया।

मिश्र,  पश्चिम टर्की (जिसे यूरोपीय लोग ग्रीक सभ्यता कहते हैं),इराक के बेबीलोन, और तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, कज़ाकस्तान,  किर्गिस्तान, और तिब्बत के शिनजियांग प्रांत  में प्रचलित 30° वाली मेष, वृषभ आदि राशियाँ  तथा 19 वर्षीय चक्र वाले सायन सौर संक्रान्ति आधारित चान्द्र वर्ष और रविवार- सोमवार आदि वार प्रचलित थे। 
तिब्बत के शिनजियांग प्रांत के निवासी शक और कुषाणों को भारतीय शक कहते थे। ये लोग अफगानिस्तान से लगे ईरान के पूर्वी भाग में भी बस गए थे इसलिए उस क्षेत्र के निवासी आचार्य वराहमिहिर को भी शक माना जाता है।
आज के 2082 वर्ष पहले सम्राट विक्रमादित्य के राज ज्योतिषी आचार्य वराहमिहिर ने  भारत में 30° वाली मेष, वृषभ आदि निरयन राशियाँ  तथा 19 वर्षीय चक्र वाले निरयन सौर संक्रान्ति आधारित चान्द्र वर्ष और रविवार- सोमवार आदि वार प्रचलित किये थे। 

लेकिन हरियाणा के कुरुक्षेत्र के आस-पास के गोड़ प्रदेश और मालवा प्रान्त के निवासी नाबोवाहन के पुत्र गन्धर्वसेन महेन्द्रादित्य  सोनकच्छ के पास गन्धर्वपुरी के राजा हुए। उनकी पत्नी सोम्यदर्शना  वीरमती के पुत्र उज्जैन के राजा भृतुहरि के अनुज विक्रमसेन ने  सम्राट विक्रमादित्य के रूप में राज्याभिषेक के अवसर पर पञ्जाब-हरियाणा में प्रचलित निरयन सौर मेष-वृषभ मास वाला निरयन सौर विक्रम संवत प्रचलित किया। 
विक्रम संवत 135 के बाद मथुरा से कुषाण वंशीय राजाओं ने उत्तर भारत में तथा  महाराष्ट्र के नासिक के पास पैठण से सातवाहन वंशीय राजाओं ने दक्षिण भारत और मध्य भारत में 19 वर्षीय , 122 वर्षीय और 141 वर्षीय चक्र वाले निरयन सौर संक्रमण आधारित चान्द्र वर्ष शालिवाहन शक संवत चलाया।
इसके पहले तीस अंश वाली मेष-वृषभ राशियाँ और रविवार-सोमवार आदि वार भारत में प्रचलित नहीं थे।

तिथियों के देवता -
1 प्रतिपदा के अग्नि देव, 
2 द्वितीय के ब्रह्मा जी, 
3 तृतीया की गौरी, 
4 चतुर्थी के गणेश, 
5 पञ्चमी के नागदेव, 
6 षष्टी के कुमार कार्तिकेय, 
7 सप्तमी के सूर्य, 
8 अष्टमी के शिव, 
9 नवमी की दुर्गा देवी, 
10 दशमी के यमराज 
11 एकादशी के विश्वेदेवाः, 
12 द्वादशी के विष्णु भगवान, 
13 तृयोदशी के कामदेव, 
14 चतुर्दशी के शंकर ,
15 पूर्णिमा के चन्द्रदेव और 
30 अमावस्या के देवता पितरः हैं । अतः  तिथियों को उनके देवता की ही पूजा करते थे।
लेकिन 
सोशल मीडिया पर और उसके प्रभाव से व्यवहार में भी एक विचित्रता देखने में आती है कि, 
दैनिक और व्यावहारिक जीवन में वारों का महत्व अत्यधिक बढ़ रहा है। 

आजकल रविवार को सूर्यदेव का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे सब देवता गौण हो जाते हैं।
सोमवार को शंकर जी का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे देवता गौण हो जाते हैं ।
मङ्गलवार को हनुमान जी का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे सब देवता गौण हो जाते हैं ।
बुधवार के देवता भगवान विष्णु हैं; लेकिन बुधवार को विनायक गजानन का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे सब देवता गौण हो जाते हैं। 
दुसरे देवता गौण हो जाते हैं ।
गुरुवार के देवता ब्रह्मा जी हैं, लेकिन गुरुवार को भगवान विष्णु या नारायण श्रीहरि  का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे सब देवता गौण हो जाते हैं ।
शुक्रवार को लक्ष्मी जी  का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे सब देवता गौण हो जाते हैं ।और
शनिवार को शनि देव के साथ हनुमान जी और हनुमान जी के साथ भगवान श्री रामचन्द्र जी का भी  का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे सब देवता गौण हो जाते हैं ।
सोमवार को शिव मन्दिर में भीड़, मङ्गलवार को  महाराष्ट्र कर्नाटक तेलङ्गाना, आन्ध्र प्रदेश तमिलनाडु और केरल में विनायक गजानन मन्दिर में और मालवा में हनुमान मन्दिर में भीड़, 
बुधवार को मालवा में विनायक गजानन मन्दिर में भीड़।
गुरुवार को श्रीकृष्ण मन्दिर या श्रीराम मन्दिर में भीड़,
शुक्रवार को लक्ष्मी मन्दिर में भीड़, और शनिवार को शनि मन्दिर और हनुमान मन्दिर में भीड़ हो जाती है।
लेकिन अन्य दिनों में ये मन्दिर सुनसान रहते हैं।