मंगलवार, 29 जुलाई 2025

आजकल प्रचलित कर्मकाण्ड केवल दिखावा मात्र हो गया है।

आजकल तो सत्यनारायण कथा तक बन्द हो गई।
पहले मन्दिरों में ही भागवत सप्ताह चलता था।
अब पाण्डालों में नाचने-गाने के कार्यक्रम को भागवत कथा कहते हैं।
अब तो वह भी बन्द हो गई और प्रदीप मिश्रा और उनके अनुयाइयों द्वारा शिव पुराण के नाम पर टोने-टोटके सिखाये जाने लगे हैं।
अब एक चपेट पत्थर पर एक बेलनाकार पत्थर रखकर (स्थापित कर) उसपर दूध, घी, शहद, इत्र आदि रगड़ मसलकर पानी से बहाकर फिर उसपर भाँग-धतुरे का लेप कर बाद में उसे प्रसाद कहकर सेवन करने और चीलम में गाँजा भरकर धुम्रपान करते हुए पैदल यात्रा निकाल कर सड़कें जाम कर एक स्थान का पानी दुसरे स्थान पर लाकर उस पत्थर पर ढोल देने को ही धर्म-कर्म घोषित कर दिया गया है।
न किसी को वेद मन्त्रों का, न शिक्षा का, न विधि का ज्ञान है केवल पुस्तकों में देख-रेख कर रेसिपी से भोजन बनाने जैसे कर्मकाण्ड की क्रियाएँ करवा देते हैं। तो उसका फल क्या होगा?

संस्कृत का धर्मशास्त्र और हिन्दी में नीतिशास्त्र एक ही विषय है।

समुचित स्थान पर, समुचित समय पर किया गया समुचित प्रयत्न (कार्य) ही सफल होता है। यही धर्म है जिसे हिन्दी में नीति कहते हैं।
समुचित स्थान का चयन ही वास्तुशास्त्र है, समुचित समय का निर्धारण ही मुहूर्त शास्त्र है, और व्यवस्थित प्रयत्न करने की कला ही धर्मशास्त्र (हिन्दी में नीतिशास्त्र) है।
धर्मशास्त्र में आचरण के नियमों और निषेधों का उल्लेख होता है। कर्मकाण्ड की क्रियाओं का धर्मशास्त्र में कोई उल्लेख नहीं मिलता।
धर्मशास्त्र को ब्रह्माण्ड में खगोल-भुगोल के माध्यम से उचित स्थान और पञ्चाङ्ग की सहायता से उचित समय की जानकारी के लिए सिद्धान्त (गणित) ज्योतिष की सहायता लेना पड़ती है, इसलिए ज्योतिष को धर्मशास्त्र का नेत्र कहा जाता है।
जबकि, लोग कर्मकाण्ड को ही धर्म समझते हुए लिखते हैं कि, धर्म से बड़ा कर्म है।

सोमवार, 28 जुलाई 2025

यात्रा मुहूर्त के नियम/ सिद्धान्त।

सुखद यात्रा ---
योगिनी बाँये हाथ पर या बाँये हाथ पर और पीठ पीछे हो।
दिशाशूल बाँये हाथ पर हो।
चन्द्रमा दाहिने हाथ की ओर हो।
राहु सामने और पीठ पीछे न हो।




वाँच्छित फल दायक, धन लाभ कारी यात्रा ---

योगिनी पीठ पीछे हो।
दिशाशूल पीठ पीछे हो या पीठ पीछे और बाँये हाथ पर हो।
चन्द्रमा सामने हो।
राहु सामने और पीठ पीछे न हो।




धन हानि कारक यात्रा से बचाव हेतु ---

योगिनी दाहिने हाथ पर या दाहिने हाथ पर और सामने न हो।
दिशाशूल दाहिने हाथ पर न हो।
चन्द्रमा बाँये हाथ पर न हो।
राहु सामने और पीठ पीछे न हो।



मृत्यु कारक यात्रा से बचाव हेतु ---

योगिनी सामने या सामने और दाहिने हाथ पर न हो।
दिशाशूल सामने न हो।
चन्द्रमा पीठ पीछे न हो।
राहु सामने या पीठ पीछे न हो।

यात्रा मुहूर्त।

पूर्व दिशा में सुखद यात्रा ---
योगिनी द्वितीया, सप्तमी, दशमी या पूर्णिमा तिथि हो।
दिशाशूल बुधवार हो।
चन्द्रमा वृषभ , कन्या या मकर राशि में हो।
राहु मंगलवार या शनिवार न हो।


पूर्व दिशा में वाँच्छित फल दायक, धन लाभ कारी यात्रा ---

योगिनी षष्टी, सप्तमी, चतुर्दशी या पूर्णिमा तिथि हो।
दिशाशूल रविवार या शुक्रवार हो।
चन्द्रमा मेष, सिंह या धनु राशि में हो।
राहु मङ्गलवार या शनिवार न हो।




पश्चिम दिशा में सुखद यात्रा ---
योगिनी तृतीया, पञ्चमी, एकादशी या त्रयोदशी तिथि हो।
दिशाशूल गुरुवार हो।
चन्द्रमा कर्क, वृश्चिक या मीन राशि में हो।
राहु मङ्गलवार या शनिवार न हो।


पश्चिम दिशा में वाँच्छित फल दायक, धन लाभ कारी यात्रा ---

योगिनी प्रतिपदा, तृतीया, नवमी या एकादशी तिथि हो।
दिशाशूल सोमवार हो।
चन्द्रमा मिथुन, तुला या कुम्भ राशि में हो।
राहु मङ्गलवार या शनिवार न हो।




उत्तर दिशा में सुखद यात्रा ---
योगिनी चतुर्थी, षष्ठी, द्वादशी या चतुर्दशी तिथि हो।
दिशाशूल शुक्रवार हो।
चन्द्रमा मेष, सिंह या धनु राशि में हो।
राहु रविवार या गुरुवार न हो।


उत्तर दिशा में वाँच्छित फल दायक, धन लाभ कारी यात्रा ---

योगिनी चतुर्थी, पञ्चमी, द्वादशी या त्रयोदशी तिथि हो।
दिशाशूल शुक्रवार हो।
चन्द्रमा कर्क, वृश्चिक या मीन राशि में हो।
राहु रविवार या गुरुवार न हो।




दक्षिण दिशा में सुखद यात्रा ---
योगिनी प्रतिपदा, अष्टमी, नवमी या अमावस्या तिथि हो।
दिशाशूल सोमवार या शनिवार हो।
चन्द्रमा मिथुन, तुला या कुम्भ राशि में हो।
राहु रविवार या गुरुवार न हो।


दक्षिण दिशा में वाँच्छित फल दायक, धन लाभ कारी यात्रा ---

योगिनी द्वितीया, अष्टमी, दशमी या अमावस्या तिथि हो।
दिशाशूल मङ्गलवार या बुधवार हो ।
चन्द्रमा वृषभ, कन्या या मकर राशि में हो।
राहु रविवार या गुरुवार न हो।




ईशान (पूर्वोत्तर) कोण में सुखद यात्रा ---
योगिनी चतुर्थी, षष्ठी , द्वादशी या चतुर्दशी तिथि हो।
दिशाशूल रविवार या शुक्रवार हो।
चन्द्रमा मेष, सिंह, धनु राशि में हो।
राहु बुधवार न हो।


ईशान (पूर्वोत्तर) कोण में वाँच्छित फल दायक, धन लाभ कारी यात्रा ---

योगिनी चतुर्थी, षष्ठी, द्वादशी या चतुर्दशी तिथि हो।
दिशाशूल रविवार या शुक्रवार हो।
चन्द्रमा मेष, सिंह या धनु राशि में हो।
राहु बुधवार न हो।



नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) कोण मे सुखद यात्रा ---
योगिनी प्रतिपदा, अष्टमी, नवमी या अमावस्या तिथि हो।
दिशाशूल सोमवार या शनिवार हो।
चन्द्रमा मिथुन, तुला या कुम्भ राशि में हो।
राहु बुधवार न हो।


 नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) कोण में वाँच्छित फल दायक, धन लाभ कारी यात्रा ---

योगिनी प्रतिपदा, अष्टमी, नवमी या अमावस्या तिथि हो।
दिशाशूल सोमवार या शनिवार हो।
चन्द्रमा मिथुन, तुला या कुम्भ राशि में हो।
राहु बुधवार न हो।



आग्नेय (दक्षिण पूर्वी) दिशा में सुखद यात्रा ---
योगिनी द्वितीया, अष्टमी, दशमी या अमावस्या तिथि हो।
दिशाशूल मंगलवार, बुधवार या शनिवार हो।
चन्द्रमा वृषभ, कन्या या मकर हो।
राहु सोमवार या शुक्रवार न हो।

आग्नेय (दक्षिण पूर्वी) कोण में वाँच्छित फल दायक, धन लाभ कारी यात्रा ---

योगिनी द्वितीया, सप्तमी, दशमी या पूर्णिमा तिथि हो।
दिशाशूल मङ्गलवार, बुधवार या शनिवार हो।
चन्द्रमा मेष, सिंह, या धनु राशि में हो।
राहु सोमवार या शुक्रवार न हो।



वायव्य (पश्चिमोत्तर) कोण में सुखद यात्रा ---
योगिनी चतुर्थी , पञ्चमी, द्वादशी या त्रयोदशी तिथि हो।
दिशाशूल रविवार हो।
चन्द्रमा कर्क, वृश्चिक या मीन राशि में हो।
राहु सोमवार या शुक्रवार न हो।

 वायव्य (पश्चिमोत्तर) कोण में वाँच्छित फल दायक, धन लाभ कारी यात्रा ---

योगिनी तृतीया, पञ्चमी, एकादशी या त्रयोदशी तिथि हो।
दिशाशूल गुरुवार हो।
चन्द्रमा मिथुन, तुला या कुम्भ राशि में हो।
राहु सोमवार या शुक्रवार न हो।

भारत में वैदिक धर्म को सनातन धर्म के रूप में राजधर्म बनाए रखने का इतिहास।

भारत में जैन और बौद्ध मत के व्यापक प्रचार-प्रसार के बाद आचार्य श्री कुमारिल भट्ट ने बौद्ध मत का खण्डन कर बौद्धाचार्य को शास्त्रार्थ में हरा कर पुनः वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना की। उनके इसी कार्य को ईसापूर्व 509 से 477 के बीच आगे बढ़ाया भगवान श्री आद्य शंकराचार्य जी ने।
 
तत्पश्चात श्री विष्णु गुप्त चाणक्य ने बौद्ध मतावलम्बी धनानन्द को पदच्युत कर ईसा पूर्व 321 में चन्द्रगुप्त मौर्य को सत्तासीन करवा कर भारत की बिखरी राजसत्ता को केन्द्रीय सत्ता में परिवर्तित किया। वैदिक सनातन धर्म में बौद्धों और जैनों के प्रति सह अस्तित्व का भाव उपजा।
लेकिन चन्द्रगुप्त मौर्य की आस्था जैन मत में थी। और उसका उत्तराधिकारी अशोक बौद्ध हो गया। इसी परम्परा में अशोक के उत्तराधिकारी वृहदृथ ने तो भी बौद्ध मत का पालन करते हुए यूनानी क्षत्रप के आक्रमण के विरुद्ध प्रतिकार करने से इन्कार कर समर्पण की मंशा प्रकट की तो ईसापूर्व 187 में सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने कायर वृहदृथ की हत्या कर स्वयम् सत्ता सम्भाली। और अश्वमेध यज्ञ कर भारत में वैदिक धर्म की जाग्रति फैलाई।

शुंग वंश के बाद ईसापूर्व 73 से ईसा पूर्व 28 तक मगध में वासुदेव कण्व द्वारा स्थापित कण्व वंशीय राजाओं ने भी वैदिक धर्म को ही राजधर्म बनाया।

इसी समय कुरुक्षेत्र के आसपास हरियाणा के मालव प्रान्त के महाराज नाबोवाहन ने मध्यप्रदेश के सोनकच्छ के निकट आकर गंधर्वपुरी को राजधानी बनाया था। बाद में नाबोवाहन के पुत्र गन्धर्वसेन गन्धर्वपुरी के राजा हुए। जिन्हें महेन्द्रादित्य भी कहा जाता था। 
गन्धर्वसेन कट्टर वेदिक धर्मावलम्बी और विष्णु और शिव के भक्त थे। उनके पुत्र राजा भृतुहरि हुए। भृतुहरि को गोरखनाथ ने नाथ सम्प्रदाय में दीक्षित कर उन्हें संन्यास दिला दिया।राजा भृतुहरि ने अपने छोटे भाई विक्रम सेन को राजपाट सौंप दिया। जो बाद में विक्रमादित्य के नाम से प्रसिद्ध हुए।
विक्रमादित्य सम्राट हुए। सम्राट के अधिनस्थ बहुत से छोटे- बड़े राजा होते हैं जो सम्राट को कर देते हैं। विक्रमादित्य का शासन प्रबन्ध टर्की, युनान, मिश्र और रोमन साम्राज्य (इटली) तक था। उन्होंने रोम के जुलियन सीजर को बन्दी बनाकर उज्जैन में घुमाया था। विक्रमादित्य ने वैदिक सनातन धर्म का मान पूरे एशिया महाद्वीप में बढ़ाया था।
सम्राट विक्रमादित्य के बाद ईसापूर्व 30 में महाराष्ट्र के जुन्नर नगर में सिमुक ने कण्व वंश से राजसत्ता छीनकर सात वाहन वंश की स्थापना की और शुङ्ग वंश को भी समाप्त कर दिया। बादमें गोतमिपुत्र सातकर्णी ने पेठण को राजधानी बनाया।
सनातन धर्म का वर्तमान पौराणिक स्वरूप सातवाहन वंश के समय ही विकसित हुआ।

फिर वैदिक धर्मी श्री गुप्त ने 240ईस्वी में गुप्त वंश की स्थापना कर वैदिक धर्म को और मजबूत बनाया। चन्द्रगुप्त प्रथम ने 320 ईस्वी में सम्राट की उपाधि धारण कर तथा समुद्रगुप्त ने विशाल साम्राज्य स्थापित कर तथा चन्द्रगुप्त द्वितीय ने सनातन धर्म को राजधर्म घोषित कर इस कार्य को आगे बढ़ाया।
फिर उज्जैन में मुञ्जराज हुए जिनके भतिजे राजा भोज ने 1010 ईस्वी में धारा नगरी (धार) को राजधानी बनाया। 
फिर राजपूत राजाओं का दौर चला जिसमें अजमेर के राजा पृथ्वीराज चौहान ने 1166 से 1192 के बीच अन्तिम अश्वमेध यज्ञ कर सम्राट की उपाधि ग्रहण की। लेकिन मोह मद घोरी से परास्त होने से भारत में इस्लामिक राज्य प्राम्भ हुआ।

जिसे महाराष्ट्र के रायगढ़ दुर्ग में शिवाजी राजे भोसले ने 1674 ईस्वी में पुनः हिन्दू स्वराज्य की स्थापना कर चूनोति दी। लेकिन उनके पुत्र सम्भाजी राव भोसले ओरंगजेब से हार गये और मराठा साम्राज्य समाप्त हो गया।

मंगलवार, 15 जुलाई 2025

मृत्यु पूर्व क्या कर्तव्य है।

पहले एकादशी उद्यापन, तीर्थ यात्रा में गोदान , भूमि दान, स्वर्ण दान, अन्नदान, वस्त्र दान, कन्या दान  सब कर लेना चाहिए। 
तीर्थ में, पुण्यप्रदा नदी किनारे, या घर में पञ्चगव्य से स्नान कर शुद्धोदक स्नान कर पञ्चगव्य पान कर गङ्गा जल से आचमन कर, देशी गाय की कुंवारी केड़ी या देशी गाय के गोबर से लीपकर गौमुत्र छिड़ककर,  पद्मासन लगाकर कर तुलसीदल मुख मे रखकर गङ्गा जल से आचमन कर प्राणायाम करके ॐ का उच्चारण करके ईशावास्योपनिष का पाठ कर ॐ का जप करते हुए  शुद्ध अन्तःकरण से परमात्मा की धारणा खर परमात्मा के ध्यान करते हुए समाधिस्थ हो कर प्राणों को ब्रह्मरन्ध्र में स्थापित कर परमात्मा में लीन हो जाना कर्तव्य है।
इतना न हो सके तो जितना हो सके उतना तो करे ही।
गोबर से लीपकर गौमुत्र छिड़ककर,  पद्मासन लगाकर कर तुलसीदल मुख मे रखकर गङ्गा जल से आचमन कर जलप्राणायाम करके ॐ का उच्चारण करके दक्षिण दिशा में पेर करके पीठ के बल लेट जाएँ। और परमात्मा कोदक्षिण दिशा में पेर करके स्मरण करते हुए प्राणोत्सर्ग करना चाहिए।
यह भी न हो तो मरने के पहले मुख में गङ्गा जल और तुलसीदल रखकर गोबर से लीपकर गौमुत्र छिड़ककर, दक्षिण दिशा में पेर करके पीठ के बल लिटा दिया जाए।
मृत्योपरान्त कर्मकाण्ड में ये सब नहीं कर पाने का प्रायश्चित करवाया जाता है।

रविवार, 13 जुलाई 2025

देवताओं की वरीयता क्रम।

परमात्मा के इस ॐ संकल्प के साथ ही परमात्मा स्वयम् परब्रह्म स्वरूप में प्रकट हुए। मानवीय स्वभाव वश हम इस स्वरूप का एकात्मक स्वरूप नहीं समझ पाते हैं इसलिए इसे परमेश्वर परम पुरुष विष्णु और परा प्रकृति माया के रूप में जानते समझते हैं।
ऋग्वेद में कहा है, विष्णु परमपद को देखने के लिए देवता भी तरसते हैं।
यहाँ से ईश्वर - शासक की अवधारणा प्रारम्भ होती है। जो उत्तरोत्तर नीचे की ओर ब्रह्म (महेश्वर प्रभविष्णु-श्रीलक्ष्मी अर्थात सवितृ- सविता ) हुए फिर 
अपर ब्रह्म (जगदीश्वर नारायण श्री हरि-कमला लक्ष्मी) हुए। फिर 
पञ्च मुखी हिरण्यगर्भ ब्रह्मा - वाणी ( ईश्वर त्वष्टा-रचना और अर्धनारीश्वर महारुद्र)। फिर 
चतुर्मुख प्रजापति-सरस्वती ब्रह्मा (दक्ष प्रथम-प्रसूति, रुचि-आकुति और कर्दम देवहूति) हुए। उधर महा रुद्र से रुद्र- रौद्री हुए। फिर 
वाचस्पति (इन्द्र- शचि) हुए। फिर 
इसके बाद देवताओं की उत्पत्ति हुई।
ब्रह्मणस्पति (द्वादश आदित्य और उनकी शक्तियाँ) हुए। फिर 
ब्रहस्पति (जिसके नाम पर ब्रहस्पति ग्रह का नाम करण हुआ) (अष्ट वसु और उनकी शक्तियाँ) हुए। फिर 
पशुपति (एकादश रुद्र और उनकी शक्तियाँ) हूए। इन एकादश रुद्रों में एक शंकर-शंम्भु भी है। फिर  
गणपति (सोम राजा और वर्चा) हुए। यह गणपति उमा-शंकर सुत गजानन विनायक नहीं है।
फिर सदसस्पति हुए , सदसस्पति की शक्ति मही हुई। फिर 
मही से भारती, सरस्वती और इळा (इला) हुए।

(> यह चिह्न बड़ा है का है। अर्थात बढ़ा से > छोटा हुआ।)
कहने का तात्पर्य परमात्मा> परब्रह्म, परमेश्वर विष्णु> ब्रह्म महेश्वर प्रभविष्णु > अपरब्रह्म जगदीश्वर नारायण श्री हरि>  ईश्वर हिरण्यगर्भ त्वष्टा और महारुद्र से > प्रजापति  दक्ष > वाचस्पति इन्द्र > ब्रह्मणस्पति आदित्य > ब्रहस्पति वसु > पशुपति रुद्र (जिससे ग्यारह रुद्र हुए जिसमें एक कैलाश वासी शंकरजी भी हैं।) > गणपति (सोम-वर्चा) > सदसस्पति > मही > भारती > सरस्वती > इळा।

तैंतीस देवता - (1) प्रजापति (2) इन्द्र (3 से 14) तक द्वादश आदित्य (15 से 22) तक अष्ट वसु और (23 से 33) तक एकादश रुद्र। ये तैंतीस देवता हैं।

ग्रेडेशन का एक सूत्र है --- नारायण श्रीहरि के बाँये पेर के अङ्गठे से निकली गङ्गा ब्रह्मा जी के कमण्डलु में रही। वहाँ से निकल कर इन्द्र के स्वर्ग लोक में रही। स्वर्ग से निकलकर शंकर जी के सिर की जटा में समाई।
मतलब नारायण बड़े हैं ब्रह्मा से। 
ब्रह्मा बड़े हैं इन्द्र से
इन्द्र बड़े हैं शंकर जी से