बुधवार, 19 अक्टूबर 2022

महाअसुर से पारसी ईश्वर अहुर मज्द। यह्व से यहुदियों और ईसाइयों के ईश्वर का नाम याहवेह (यहोवा)। एल पुरुरवा से यहुदियों और ईसाइयों का ईश्वर वाचक शब्द एल। एल पुरुरवा से इस्लाम का ईश्वर वाचक शब्द अल, अल्लाह, इलाही।।

अथर्ववेद के ब्राह्मण ग्रन्थ अवेस्ता पर जेन्द व्याख्या असूरोपासक जरथुस्त्र द्वारा की गई। उस जेन्दावेस्ता के ग्रन्थ के आधार पर पारसी सम्प्रदाय का आरम्भ हुआ इसलिए पारसी ईश्वर वरुण को महाअसुर अर्थात अहुरमज्द कहते है। अतः परसियों का ईश्वर महा असुर कहलाता है। वेदों में भी वरुण को महा असुर कहा है।मित्र देवता इनके साथी हैं।

ऋग्वेद में यह्व शब्द आया है। अग्नि को देवताओं में बड़ा बतलानें के लिए अग्नि को यह्व अर्थात महादेव कहा गया है।

चन्द्रमा के पुत्र बुध और वैवस्वत मनु की पुत्री इला का पुत्र पुरुरवा हुए। इला के पुत्र होनें के कारण पुरुरवा एल कहलाते हैं। एल मतलब इलापुत्र।

 सीरिया की अरामी या पुरानी अरामी या पश्चिम आरमेइक भाषा/ चाल्डियन या खाल्डियन भाषा में ऋग्वेद का यह्व शब्द याहवेह या यहोवा हो गया और एल शब्द तो यथावत एल ही रहा।
लेकिन, बेबीलोनिया की भाषा पूर्वी अरामी में एल के रूप अल,  अल्लाह, इलाही आदि बनें।

पश्चिम अरामी (या अरमाया) भाषा में यहुदी धर्मग्रन्थ तनख (बाइबल पुराना नियम) लिखा गया है। मूसा, दाउद और सुलेमान आदि और सम्भवतः इब्राहिम भी सीरिया की भाषा पश्चिमी या पुरानी अरामी ही बोलते थे। यीशु बेबीलोनिया की पूर्वी आरमेइक भाषा बोलते थे।

इब्राहिम नें एल  शब्द को ईश्वर वाचक कहा और उस ईश्वर का नाम याहवेह / यहोवा (यह्व)  बतलाया। इसलिए बाइबल में एल और यहोवा शब्द प्रचलित रहा लेकिन अरब प्रायद्वीप में अल, अल्लाह और इलाही शब्द ही प्रचलित रहे।

अरब में ईश्वर के लिए अल्लाह शब्द प्रचलित था जिसे मोहमद नें अपनाया। अतः कुरान में अल्लाह और इलाही ईश्वर वाचक शब्द हैं।

बाइबल में एल ईश्वर वाचक जाति वाचक सञ्ज्ञा  और यहोवा व्यक्ति वाचक सञ्ज्ञा के रूप में प्रयुक्त हुआ है। लेकिन कुरान में अल्लाह केवल जाति वाचक सञ्ज्ञा के रूप में ही प्रयोग हुआ है। कुरान में ईश्वर के लिए कोई व्यक्तिवाचक सञ्ज्ञा नही है, जैसे; बाइबल मे एल की व्यक्ति वाचक सञ्ज्ञा यहोवा है।

शनिवार, 15 अक्टूबर 2022

पुरुषार्थ नहीं पराक्रम सही शब्द है।

पुरुषार्थ नहीं पराक्रम सही शब्द है।
अन्तरात्मा / प्रत्यगात्मा को ही पुरुष और प्रकृति कहा जाता है।
इस पुरुष के निमित्त, पुरुष के लिए पुरुष के अर्थ जो धर्म, अर्थ, काम और मौक्ष इन चारों लक्ष्यों में सफलता प्राप्त्यर्थ जो उपक्रम, पराक्रम किया जाता है उसे पुरुषार्थ यो पुरुष द्वारा की गई क्रिया/ कर्म नही कहा जा सकता।
अर्थात पुरुषार्थ का रूढ़ अर्थ पुरुष द्वारा की गई क्रिया/ कर्म  सरासर गलत ही है। 
उसके स्थान पर पराक्रम ही उचित शब्द है।
त्रिविक्रम और विक्रमादित्य शब्द में भी यही भाव है।

शनिवार, 1 अक्टूबर 2022

दुर्गा सप्तशती में उल्लेखित देवियाँ और नवरात्र में वास्तविक पूज्य नौ देवियो के नाम।

दुर्गा सप्तशती प्रथमोऽध्याय श्लोक ५४ में जगतपति विष्णु की योगनिद्रा महामाया के प्रभाव को संसार की स्थिति का कारण कहा है।
श्लोक ५५ और ५६ में हरेष्चैशा महामाया को जगत का सम्मोहित कर्ता कहा है जो ज्ञानियों के भी चित्त को बल पूर्वक हरण कर मोहित कर देती है।
श्लोक ५६ में महामाया को ही सृष्टि सृजनकर्ता कहा है।
श्लोक ५७-५८ में संसार बन्धन का का हेतु और प्रसन्न होनें पर मुक्ति का वरदान देने वाली और मुक्तेर्हेतुभूता पराविद्या कहा है। 
६४-६५ में उन्हें नित्य, जगन्मुर्ति, और सर्वमिदम् ततम् कहा है। उन्हे ही देवताओं के कार्यसिद्धि के लिए बहुदा उत्पन्न होनें वाली कहा है।
ये महामाया योगनिद्रा ही मूल देवी हैं। दुर्गा सप्तशती प्रथमोऽध्याय श्लोक ८९ एवम् ९० के अनुसार जिनका प्रथम अवतरण में मधुकेटभ के संहार हेतु हिरण्यगर्भ ब्रह्मा द्वारा जिनकी स्तुति करने पर जो श्रीहरि के देहकोश से प्रकट हो कर योगनिद्रा  दशभुजा महाकाली के रूप में प्रकट हुई। और श्री हरि नें योगनिद्रा से जागकर मधुकेटभ का वध कर हिरण्यगर्भ ब्रह्मा जी का संकट दूर किया। ये महाकाली उत्तर चरित्र की ५/८८  कालिका (पार्वती) और ७/६, ७/१६ एवम् ७/२३ काली (चामुण्डा) से भिन्न हैं।
 जिनका द्वितीय अवतरण का वर्णन दुर्गा सप्तशती  मध्यम चरित्र के रूप में द्वितियोऽध्याय श्लोक ९ में उल्लेखित महिषासुर संहार हेतु श्रीहरि के मुख से और देवताओं के शरीर से निकले तेज के एकीकृत होनें पर  नारी के स्वरूप में प्रकट  महालक्ष्मी अवतार के नाम से द्वितियोऽध्याय श्लोक १३ में किया है। इन्हीं ने महिषासुर का वध किया था। 
उन्ही का तीसरा अवतार दुर्गासप्तशती उत्तर चरित्र में पञ्चमोऽध्याय श्लोक ८७ में उल्लेखित पार्वती के शरीर से कौशिकी के रूप में हुआ।
उत्तर चरित्र दुर्गा सप्तशती पञ्चमोनध्याय से त्रयोदशोऽध्याय तक में देवताओं की स्तुति करने पर शुम्भ निशुम्भ दैत्यों के संहार करने हेतु उमा पार्वती के शरीर कोश से कौशिकी स्वरूप में महासरस्वती अवतार धारण करनें का वर्णन है।  शुम्भ निशुम्भ वध में इन्ही कौशिकी देवी की सहायतार्थ प्रकट हुई क नौदुर्गाओं का उल्लेख है दुर्गासप्तशती पञ्चमोऽध्याय से त्रयोदशोऽध्याय तक है।
पार्वती का उल्लेख दुर्गासप्तशती पञ्चमोऽध्याय श्लोक ८५ में है।
दुर्गासप्तशती पञ्चमोऽध्याय श्लोक ८८ के अनुसार पार्वती के शरीर कोष से कोशिकी के प्रकट होनें से पार्वती जी की देह काली पड़ गई।तब उन्ही का ही नया नाम/ रूप हिमालय में विचरण करने वाली कालिका हो गया।  ये कालिका पार्वती ही हैं और प्रथम चरित्र १/८९-९० में पूर्व कथित महाकाली से भिन्न है और आगे उत्तर चरित्र ७/६, ७/१६ एवम् ७/२३ में वर्णित काली (चामुण्डा)  से भी भिन्न हैं।

पार्वती के शरीर कोष से कोशिकी के प्रकटीकरण का उल्लेख दुर्गासप्तशती पञ्चमोऽध्याय श्लोक  ८७ में है।
देवताओं के बाद कोशिकी को सर्वप्रथम चण्डमुण्ड ने देखा था। दुर्गासप्तशती पञ्चमोऽध्याय श्लोक ८९)
 दुर्गासप्तशती  अष्मोटमोऽध्याय श्लोक २२ के अनुसार कौशिकी को चण्डी कहा है  
दुर्गासप्तशती  अष्मोटमोऽध्याय श्लोक २९ में कौशिकी को ही कात्यायनी भी कहा है।
 दुर्गासप्तशती  सप्तम और अष्टमोऽध्याय  के अनुसार वास्तविक नौदुर्गाओं का वर्णन --- ये देवताओं और अवतारों की शक्तियाँ है जिननें शुम्भ निशुम्भ युद्ध में कौशिकी की सहायता की। इनके नाम देव्याः कवच में भी आये हैं। दुर्गा सप्तशती अध्याय/ श्लोक संख्या  और देव्याकवच श्लोक संख्या दी जा रही है।

काली - दुर्गासप्तशती सप्तमोऽध्याय श्लोक ६ तथा ७/१६ एवम् ७/२३ में कौशिकी के क्रोध के कारण उनका रङ्ग काला पड़ गया, भौएँ टेड़ी हो गई। उनकी भृकुटी से काली उत्पन्न हुई। ये "काली देवी देवी मूलतः महाभारत शान्ति पर्व/ मौक्ष पर्व/ अध्याय २८३ से २८४ तक  दक्षयज्ञ का भङ्ग और उनके क्रोध से ज्वर की उत्पत्ति तथा उसके विविध रूप के अन्तर्गत अध्याय २८४ श्लोक २९,३० और विशेषकर ३१ में उल्लेखित भद्रकाली देवी ही हैं। ये काली देवी प्रथम चरित्र १/८९ - ९० की महाकाली अवतार और उत्तर चरित्र ५/८८ की कालिका (पार्वती) से भिन्न हैं।
चण्ड मुण्ड को मारकर उनके शिर कोशिकी को भेट करनें पर कोशिकी ने  काली का ही नाम चामुण्डा रखा दुर्गासप्तशती सप्तमोऽध्याय श्लोक २७। ये ही चामुण्डा देव्य कवच श्लोक ९ में और २० में है। श्लोक ४ की इन्हें ही कालरात्रि भी मान सकते हैं।

ब्राह्मी - दुर्गा सप्तशती अष्टमोऽध्याय श्लोक१५ के अनुसार शुम्भ निशुम्भ वध में कोशिकी की सहायतार्थ हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की शक्ति ब्राह्मी आई। इसी का उल्लेख देव्य कवच श्लोक ११ में है। और १९ में ब्रह्माणी आया है। श्लोक ३ की ब्रह्मचारिणी भी मान सकते हैं।

माहेश्वरी - दुर्गा सप्तशती अष्टमोऽध्याय श्लोक१६ शंकर जी की शक्ति उमा माहेश्वरी स्वरूप में आई। देव्य कवच श्लोक१० में और ईश्वरी श्लोक ११ में है। श्लोक ३ की शैलपुत्री भी मान सकते हैं। श्लोक ४ की स्कन्द माता भी मानी जा सकती है।

कौमारी -  दुर्गा सप्तशती अष्टमोऽध्याय श्लोक१७। कुमार कार्तिकेय की शक्ति देवसेना ही कौमारी के स्वरूप में आई।  
देव्य कवच श्लोक १० और १८ । 

वैष्णवी - दुर्गा सप्तशती अष्टमोऽध्याय श्लोक १८। श्रीहरि की शक्ति वैष्णवी स्वरूप में आई।
 देव्य कवच श्लोक ९ और १९ में तथा लक्ष्मी नाम श्लोक १० ।

वाराही -  दुर्गा सप्तशती अष्टमोऽध्याय श्लोक १९। वराह अवतार की शक्ति वाराही स्वरूप में आई। देव्य कवच श्लोक ९ और १८ में है।

नारसिंही - दुर्गा सप्तशती अष्टमोऽध्याय श्लोक २०। नृसिंह अवतार की शक्ति नारसिंही स्वरूप में आई। देव्याः कवच में यह नाम नही है।

ऐन्द्री - दुर्गा सप्तशती अष्टमोऽध्याय श्लोक २१। इन्द्र की शक्ति शचि ऐन्द्री स्वरूप में आई।
 देव्याः कवच श्लोक ९ और १७ ।

चण्डिका शक्ति  - दुर्गा सप्तशती अष्टमोऽध्याय श्लोक २३ के अनुसार कोशिकी को रोष उत्पन्न होनें पर उनकी देह से ही अनेक गिदड़ियों के समान आवाज करने वाली अत्यन्त भयानक स्वरूप में चण्डिका शक्ति प्रकट हुई। उनने  दूत बनाकर शुम्भ निशुम्भ देत्य के पास शंकरजी को दूत बनाकर भेजा। इसलिए शिवदूती कहलाती है।दुर्गा सप्तशती अष्टमोऽध्याय २८।
(अर्थात चण्डिका शक्ति को ही शिवदुती भी कहा है ८/२८।)। यह नाम देव्याः कवच में नही है।

शुक्रवार, 30 सितंबर 2022

वास्तविक नौदुर्गा

उत्तर चरित्र दुर्गा सप्तशती पञ्चमोनध्याय ५ से त्रयोदशोऽध्याय तक में उमा पार्वती के कौशिकी स्वरूप में महासरस्वती अवतार धारण वर्णन के अन्तर्गत नौदुर्गाओं का उल्लेख।
पार्वती ५/८५ ।
पार्वती का ही नया नाम/ रूप हिमालय में विचरण करने वाली कालिका है। ५/८८।)

० कौशिकी ५/ ८७ ।
(जिन्हें सर्वप्रथम चण्डमुण्ड ने देखा था।५/८९)
 (कौशिकी को चण्डी कहा है ८/२२।) 
कौशिकी को ही कात्यायनी भी कहा है।८/२९ 
 तथा कौशिकी की नौदुर्गाओं का वर्णन जिननें शुम्भ निशुम्भ युद्ध में कौशिकी की सहायता की।
१ काली   ७/६ 
(तथा ७/१६ एवम् ७/२३।) 
(काली का ही नाम चामुण्डा भी ७/२७)
२ ब्राह्मी ८/१५। 
३माहेश्वरी८/१६। 
४ कौमारी ८/१७।  
५ वैष्णवी८/१८।
६ वाराही ८/१९।
७ नारसिंही८/२०।
८ ऐन्द्री ८/२१।  
९ चण्डिका शक्ति ८/२३
(चण्डिका शक्ति को ही शिवदुती भी कहा है ८/२८।)

रविवार, 25 सितंबर 2022

दिनांक, समय और स्थान तीनों का साथ साथ उल्लेख आवश्यक है।

१ देश (स्थान) और काल (दिनांक और समय) का उल्लेख एक साथ होना आवश्यक है।तीनों में से एक भी चीज नही लिखी तो समय या स्थान की कोई सार्थकता सिद्ध नहीं होती है। 
जैसे आज दिनांक २५ सितम्बर २०२२ रविवार को २२:३० बजे राऊ (इन्दौर) में यह आलेख लिखा गया। 
पत्र लेखन और समाचार लेखन में यह बात प्रचलित है।
जैसे १४ /१५ अगस्त १९४७ को रात्रि ००:०० के पहले का भारत का नक्षे में हम पाकिस्तान और बांग्लादेश को भारत कहते हैं। और १४ /१५ अगस्त १९४७ को रात्रि ००:०० के बाद का भारत का नक्षे में भारत और पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान अलग अलग है। जबकि बांग्लादेश को मान्यता प्रदान करने के पश्चात वही क्षेत्र भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश कहलाता है।
सिक्किम विलय के पूर्व भारत और सिक्किम दो देश थे जबकि आज सिक्किम भारत का प्रदेश है।
बर्लिन की दीवार बननें के पहले, और दीवार तोड़ने तक पूर्वी बर्लिन और पश्चिम बर्लिन थे। जबकि बर्लिन की दीवार बननें के पहले और दीवार तोड़ने के बाद केवल बर्लिन नगर है। अर्थात दिनांक और समय के बिना देश (स्थान) का कोई अर्थ नही।
२ उज्जैन (भारतवर्ष) पूर्व देशान्तर ७५°४६' में २१ मार्च को सुर्योदय के समय सायन मेष लग्न उदय हो रहा होता है तभी / ठीक उसी समय 
उज्जैन के ९०°पूर्व में परभद्राश्ववर्ष यमकोटि पत्तनम पूर्व देशान्तर १६५°४६' में मध्यान्ह हो रहा होता है और सायन कर्क लग्न उदित हो रहा होता है ।
उज्जैन के १८०° पर कुरुवर्ष सिद्धपुर (मेक्सिको का लियोनेल द्वीप) पश्चिम देशान्तर १०४°१४' सूर्यास्त हो रहा होता है एवम सायन तुला लग्न उदित हो रहा होता है।
उज्जैन के २७०° पर यानी उज्जैन के ९०° पश्चिम में केतुमालवर्ष रोमक पत्तनम। (सहारा/ मोरिटेनिया का सिसिस्नेरोस) पश्चिम देशान्तर १४°१४' में मध्य रात्रि हो रही होती है और सायन मकर लग्न उदित हो रहा होता है।
अर्थात स्थान के बिना समय का कोई अर्थ नही होता।
अतः देश (स्थान) और काल (समय) का उल्लेख एक साथ होना आवश्यक है।

जहाँ भी लग्न का उल्लेख हो या स्थानीय सूर्योदय सूर्यास्त पर आधारित अभिजित मुहूर्त या विजय मुहुर्त, या ब्रह्म मुहूर्त (वाले दो घटि वाले मुहुर्त) या प्रदोष काल, या महानिशिथ काल या उषा काल,  या चौघड़िया आदि का उल्लेख आये वहाँ स्थान का नाम अत्यावश्यक है।
मैरे सभी सन्देशों में स्पष्ट लिखा है कि, ये मुहुर्त इन्दौर के लिए है। ये इन्दौर, राऊ, महू, बेटमा शिप्रा  (उज्जैन रोड पर) धरमपुरी साँवेर तक ही चलेंगे।
धार उज्जैन में लगभग दो मिनट खरगोन में एक मिनट का अन्तर पड़ता है।
लेकिन सब स्थानों पर नही चलेंगे। 

४  चौथी विशेष बात मुहुर्त में मुख्यता प्रातः काल/ मध्यान्ह काल/ प्रदोष काल/ महानिशिथ काल, उषा काल, अरुणोदय  या अभिजित मुहूर्त/ विजय मुहुर्त, ब्रह्म मुहूर्त, आदि दो घड़ि मुहुर्त का तथा इनके साथ वृष, सिंह, वृश्चिक और कुम्भ लग्न अर्थात स्थिर लग्न के साथ मिथुन, कन्या,धनु, और मीन लग्न अर्थात द्विस्वभाव लग्न अथव मेष, कर्क,तुला और मकर लग्न अर्थात चर लग्न के साथ मिथुन, कन्या,धनु, और मीन लग्न अर्थात द्विस्वभाव लग्न का ही महत्व है। 
धर्मशास्त्र में चौघड़िया का कोई महत्व नहीं है। यह केवल परम्परागत पद्धति है। 
पाँचवी विशेष बात यह है कि, मैंरे सन्देश में प्रायः गणितागत, वास्तविक, धर्मशस्त्रोक्त सूर्योदय सूर्यास्त के आधार पर ही गणना अंकित रहती है। जहाँ कहीँ भी आभासी दृश्य सूर्योदय सूर्यास्त या आभासी दृश्य सूर्योदय सूर्यास्त पर आधारित गणना अंकित होंगे तो वहाँ मैं स्पष्ट उल्लेख करता हूँ।
सूर्योदय सूर्यास्त दो प्रकार के होते हैं।
 गणितागत, वास्तविक, धर्मशस्त्रोक्त सूर्योदय सूर्यास्त। और दुसरा आभासी दृश्य सूर्योदय सूर्यास्त।
आभासी दृश्य सूर्योदय की तुलना में यह गणितागत, वास्तविक , धर्मशस्त्रोक्त सूर्योदय बाद में होता है। जबकि आभारी दृश्य सूर्यास्त से  गणितागत, वास्तविक, धर्मशस्त्रोक्त सूर्यास्त पहले होता है। इसलिए गणितागत, वास्तविक, धर्मशस्त्रोक्त दिनमान छोटा और रात्रिमान बढ़ा होता है। जबकि आभासी दृष्य दिनमान बड़ा और रात्रिमान छोटा होता है।
यह वायु मण्डल में सूर्य का अप वर्तन होने के कारण होता है। जैसे पानी से भरी बाल्टी में पड़ा सिक्का उपर दिखता है और छड़ टेढ़ी दिखती है वैसे ही सूर्योदय के पहले सूर्य दिखने लगता है और सूर्यास्त के बाद भी सूर्य दिखता रहता है।


बुधवार, 21 सितंबर 2022

संघ, जनसंघ और भाजपा की कमजोरियाँ ।

वर्तमान संघ, जनसंघ और भाजपा को अपनी इन कमजोरियों से सबक लेकर कट्टर वैदिक सनातन वर्णाश्रम धर्म को ही अपना आधार बनाकर समत्व वादी आर्थिक नीतियों और वैदिक सनातन वर्णाश्रम धर्म हितेषी, संस्कृत और प्राचीन वैदिक संस्कृति और अभ्युत्थानम् धर्मस्य, विनाशाय च दुष्कृताम् तथा विप्र, धैनु, सुर, सन्त हितकारी और कम से कम भारतीय उपमहाद्वीप को भारत राष्ट्र राज्य बनानें का लक्ष्य लेकर राष्ट्रवादी नीतियों वाले साहसिक निर्णय लेकर तुरन्त कार्यक्रम तैयार कर लागू करने वाला दल बनना चाहिए। अन्यथा निकट भविष्य में भा.ज.पा. कांग्रेस का रूपांतरित वर्ज़न से अधिक कुछ नहीं रहने वाली है।
अभी तो भाजपा की वास्तविकता यह है। ---
दासता मूलक और सनातन धर्म विरोधी कानूनों को स्वतन्त्र भारत में बनाए रखने, संविधान संशोधनों तथा सनातन धर्म विरोधी एवम् मुस्लिम पक्षधर नवीन कानूनों को लाने और बनाये रखने  का दोषी नेहरू था। न कि, गान्धी।
सावरकर पन्थियों का मानना है कि, सावरकर अपनी लाइन बड़ी नही कर पाये और  गान्धी की लाइन बड़ी होती रही इसके लिए गांधी ही दोषी हैं। उनको भ्रम है कि, सावरकर को गान्धी नें आगे नही बढ़ने दिया।
जबकि वास्तविकता यह है कि, इसमें पूर्ण रूपेण दोषी केवल सावरकर स्वयम् थे, न कि, गान्धी। सावरकर स्वयम् नास्तिक थे, और स्वयम् को नास्तिक ही कहते थे, वेदों, गौ, गंगा, ब्राह्मण और वर्णाश्रम धर्म में उनकी आस्था नहीं थी। लेकिन भारतीय मूल के लोगों को हिन्दू कहते थे और ऐसे हिन्दुत्व की बात करते थे। सावरकर कभी कोई युक्ति संगत लोगों को अपील करे ऐसा कोई कार्यक्रम नही दे पाये। इस कारण सावरकर जनता में अपनी पैठ नही बना पाये।
जब कि, रामप्रसाद बिस्मिल, चन्द्रशेखर आजाद, भगतसिंह, अशफाक उल्ला खां अपनी पैठ जनता में जमा पाये। जिननें अंग्रेजी खजाना लूटने और दुष्ट अंग्रेज अधिकारियों की हत्या तक की। फिर भी जनता में उनकी पैठ थी। 
सुभाष चन्द्र बोस जन नेता बन गये। नेताजी ने आजाद हिन्द फौज बनाली, विदेशी सहयोग जुटा लिया। युद्ध भी जीते। सरकार भी बना ली।
कम्युनिस्टों नें नेवी में अपनी जबरदस्त पकड़ बना ली और हड़ताल तक करवानें में समर्थ रहे।
अम्बेडकर और जिन्ना तक ने अपनी जात बिरादरी में ही सही पर गहरी पैठ बना ली।
सरदार पटेल लोकप्रिय नेता रहे। पूर्ण जनमत उनके साथ रहा।
नेहरू नें गांधी के बल पर पैठ बना ली तो, 
लाला लाजपत राय, और प. मदनमोहन मालवीय की हिन्दू सभा और हिन्दू महासभा का नेतृत्व और उत्तराधिकार मिलने के बावजूद अकेले सावरकर को ही जन सहयोग क्यों नहीं मिला?
जो गलती आरम्भ में बाल ठाकरे ने की थी सबसे प्रमुख कारण वही थे।
सावरकर ने केवल न्यूज पेपर निकालने के अलावा जन सम्पर्क कभी नहीं रखा। भारत भ्रमण नही किया। महाराष्ट्र और मराठी तक सीमित रहे। शिवाजी के अलावा विक्रमादित्य, राजा भोज, पृथ्वीराज चौहान, छत्रसाल,  राणा सांगा, महाराणा प्रताप, राजेन्द्र चौल जैसे राजाओं का महिमा मण्डन नही किया। इसलिए केवल महाराष्ट्र के क्षेत्रीय नेता बन कर रह गये।
जिनका उत्तराधिकार मिला वे लाला लाजपतराय स्वयम् लाठियों से पीट पीट कर अंग्रेजों द्वारा बलिदान कर दिए गए लेकिन डटे रहे, डरे नही।
सावरकर एक बार जेल हो आये तो जेल की यातनाओं से इतना डर गये कि, उसी जेल यात्रा की यातनाओं को भुनाते रहे। लगातार आन्दोलन  चलाने का साहस नही जुटा पाये।  कहा भी है कि,"जो डर गया वो मर गया।"
सुभाष चन्द्र बोस कभी नही डरे, रामप्रसाद बिस्मिल, चन्द्रशेखर आजाद, भगतसिंह, अशफाक उल्ला खान कभी नही डरे। बस केवल सावरकर ही डरे। जिन्हें वीर सावरकर कहलाना पसन्द था। लेकिन वीरता दिखाना नही।
सावरकर ने हिन्दू महासभा जैसे राष्ट्रीय दल को शिवसेना जैसा  छोटा स्थानीय दल बना दिया। इतने बड़े दल का नेतृत्व सम्हालना भी सबके वश में नही होता।
जिन सावरकर जी को वर्तमान में संघ परिवार अपना पितृ पुरुष घोषित करना पसन्द करता है वे ही सावरकर रा. स्व.से. संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार जी को खुलेआम अंग्रेजों का एजेण्ट और देशद्रोही कहते थे। सुभाष चन्द्र बोस सहयोग की आशा लेकर मिले  हेडगेवार जी नें सुभाष चन्द्र बोस को भी अंग्रेजों से लड़ना छोड़ हिन्दू एकता के लिए कार्य करने का गुरु मन्त्र देनें की कोशिश की तो सुभाष चन्द्र बोस अत्यन्त ही निराश होकर लौटे। हेडगेवार जी पर्व में पं. रामप्रसाद बिस्मिल चन्द्रशेखर आजाद और भगत सिंह जी को भी अंग्रेजी शासन से आजादी का क्रान्तिकारी कार्यक्रम त्याग कर हिन्दू एकता के लिए काम करनें का उपदेश दे चुके थे। हेडगेवार जी नें भी कभी वेदों, गौ, गंगा, ब्राह्मण और वर्णाश्रम धर्म को अपना लक्ष्य घोषित नही किया। वे भी भारतीय मूल के लोगों को हिन्दू कहते थे और ऐसे हिन्दुत्व की बात करते थे। 
फिर भी जनसंघ और भाजपा कभी  चन्द्रशेखर भगतसिंह, सुभाष चन्द्र बोस जैसे मार्क्सवादियों को अपना आदर्श बतलाते हैं, कभी सरदार पटेल जैसे गांधी वादियों अपना आदर्श बतलाते हैं,  (संकटकाल के बाद) कभी गांधीवादी समाजवाद को अपना अजेण्डा घोषित करते हैं। मोदीजी का गांधी जी के प्रति स्पष्ट आदर सम्मान प्रदर्शित कर अपना रथ बढ़ाते हैं।
इनके पास अपनी कोई विचारधारा ही नहीं है, अपना कोई कार्यक्रम भी नहीं है।
पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेई जी आजीवन नेहरू को फॉलो करते रहे और इन्दिरा गांधी की स्तुति तक कर चुके।
वर्तमान प्रधानमन्त्री मोदी जी भी जवाहर लाल नेहरू की वेशभूषा और व्यक्तित्व से प्रभावित हैं। और नेहरू, नरसिंहा राव और मनमोहन सिंह के घोषित कार्यक्रमों को फॉलो कर रहे हैं।
पं. दीनदयाल उपाध्याय के बाद  अटल बिहारी वाजपेई ने भी भारतीय जनसंघ की ऐसी ही  दुर्दशा कर दी थी कि, लोकसभा में दो सीट पर सिमट गये थे। फिर भी जनसंघी उनको वैसे ही पूजते रहे जैसे अभी मोदी जी को पूज रहे हैं।
संघ परिवार की विशेषता है कि, उननें केशव (बलिराम हेडगेवार) - माधव (सदाशिव गोलवलकर),
पं.दीनदयाल उपाध्याय- बलराज मधौक, अटल- अड़वानी,  मोदी - योगी की जोड़ी को पूजा। इनमें से केवल मोदी - योगी ही  इसलिए सफल दिख रहे हैं क्योंकि,विपक्ष में कोई दमदार विकल्प ही नही बचा इस कारण वे संयोग से सफल हो रहे हैं।
जबकि बैचारे नितिन जयराम गडकरी और हेमन्त बिस्वा सोरेन को भाजपा में वह महत्व नही मिला जिसके वे अधिकारी हैं।

रविवार, 18 सितंबर 2022

नवरात्र पूजन विधि

नवरात्र पूजन विधि
नवरात्र का नियम है कि, 
१ द्वितीया युक्त प्रतिपदा, उदिया तिथि में सूर्योदय से चार घण्टे के अन्दर ही स्थिर / द्विस्वभाव लग्न में घटस्थापना करना चाहिए ।
देवता के दाहिने हाथ की ओर तथा उपासक के बाँये हाथ की ओर घी का दीपक रखें। तथा देवता के बाँये हाथ की ओर तथा उपासक के दाहिने हाथ की ओर तेल का दीपक लगाएँ।
२ नवरात्र में नौ तिथियों का महत्व है। नवरात्र चाहे आठ दिन का हो या नौ दिन का हो या दस दिन का नवरात्र हो महत्वपूर्ण तिथियाँ हैं दिन नही। इसी प्रकार तिथि और नक्षत्र का योग उस तिथि का महत्व बढ़ा देते हैं, लेकिन महत्वपूर्ण केवल तिथि ही है, नक्षत्र नही।
जो कर्म जिस तिथि में और जिस समय में बतलाया गया है उस तिथि और समय में ही हो। चाहे उस दिन कोई सा भी नक्षत्र पड़े या अपेक्षित नक्षत्र रहे या न रहे। ऐसे ही नवरात्र में वार, योग, चौघड़िया , राहुकाल आदि का भी कोई महत्व नहीं है। 
३ प्रति दिन पहले १०८ मनको वाली तुलसी की माला से दो माला गायत्री का मन्त्र जप करें। 
फिर गीता प्रेस गोरखपुर की दुर्गासप्तशती में बतलाई गई विधि अनुसार प्रतिपदा तिथि से चतुर्थी तिथि तक एक- एक बार दुर्गा सप्तशती का पूरा पाठ करना चाहिए साथ ही तुलसी की एक सौ आठ मनके की माला से एक माला नवार्ण मन्त्र का जप अवश्य करें। ऋगवेदोक्त देवी सूक्त की व्याख्या अर्थात ब्राह्मण भाग श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् है। उसी अथर्वशीर्ष से निकला नवार्ण मन्त्र भी वैदिक मन्त्र ही है; तान्त्रिक मन्त्र नहीं है। अतः सात्विक उपासक तुलसी की १०८ मनकों की माला से ही जप करें। चाहे तो स्फटिक की माला भी प्रयोग कर सकते हैं। सकामोपासक राजसी उपासक रुद्राक्ष की माला का उपयोग करते हैं। तान्त्रिक तमोगुणी साधक मूंगा की माला से जप करते हैं।
और (ललिता) पञ्चमी से (दुर्गा) नवमी तक दो-दो बार दुर्गा सप्तशती का पूरा पाठ करना चाहिए साथ मे तुलसी की एक सौ आठ मनके की माला से दो माला नवार्ण मन्त्र का जप अवश्य करें। 
कुल चौदह पाठ होंगे। जो दशांश हवन, शतांश श्राद्ध-तर्पण और सहस्त्रांश ब्राह्मण भोजन तथा भूल-चूक के लिए अतिरिक्त पाँच पाठ और पाँच माला नवार्ण मन्त्र जप किया जाता है। इसलिए कुल चौदह पाठ और चौदह माला हो जाती है।
४ यथा शक्ति यथा सामर्थ्य या तो नौ दिन तक रोज एक एक कन्या को भोजन कराएँ इस प्रकार नौ दिन में कुल नौ कन्याओं को भोजन कराएँ, या पहली तिथि में एक कन्या द्वितीया में दो कन्या, तृतीया में तीन कन्या ऐसे बढ़ते क्रम में इस प्रकार नौ दिन में ४५ कन्याओं को भोजन कराएँ या प्रत्येक तिथि को नौ-नौ कन्याओं को भोजन कराकर नौ दिन में कुल ८१ कन्याओं को भोजन कराएँ।
५ जो सक्षम है, पूर्ण स्वस्थ्य हैं, कर सकते हैं वे ही प्रतिपदा से नवमी तक नौ दिन व्रत उपवास करें। या नौ दिन न कर पाए तो सप्तमी, अष्टमी और नवमी तिथि को व्रत, उपवास अवश्य ही रखें। यदि तीन दिन न कर पायें तो अष्टमी और नवमी को व्रत उपवास अवश्य करें। यदि दो दिन भी न कर पायें तो नवमी को तो व्रत उपवास अवश्य करें ही। निर्णय सिन्धु पृष्ठ ३४२ पर स्पष्ट निर्देश है कि, पूजा (सेवा) मुख्य है, (भोजन त्याग रूप लंघन) उपास/ उपवास गौण है। उपास/ उपवास पूजा का अङ्ग है। मुख्य तो पूजा ही है। उपास उसमें सहायक है।
मूलतः उपास का अर्थ समीप आसन लगाना या समीप बैठना और उपासना का अर्थ समीप होना या समीप रहना है। भोजन न करने को लङ्घन कहते हैं; उपास या उपवास नहीं कहते।
६ षष्टि तिथि में प्रदोषकाल में बेलपत्र पौधे के पास जाकर जो भी पत्तियाँ पहली बार दिखे उनको प्रणाम कर आव्हान करें / नीमन्त्रण दें कि, दुसरे दिन अर्थात कल सप्तमी तिथि में सरस्वती के रूप में पूजन करने हेतु हम आपका आव्हान करते हैं / निमन्त्रित करते हैं। सप्तमी तिथि में प्रातः काल उक्त बेलपत्र को नमस्कार, पूजन कर आमन्त्रित कर तोड़ लें और घर लेजाकर दुर्गासप्तशती पुस्तक में रखकर प्रतिपदा से नवमी तक सरस्वती के रूप में पूजा करें। बेलपत्र में लक्ष्मी का वास है, तान्त्रिक लोग बेलपत्र के स्थान पर देशी खेजड़ी अर्थात शमी वृक्ष की पत्ती रखकर पूजा करते हैं।
७ मूल नक्षत्र युक्त सप्तमी तिथि महा सप्तमी कहाती है। सप्तमी तिथि मूल नक्षत्र में प्रातः पुनः  बेलपत्र  या शमी की उन्ही पत्तियों को प्रणाम कर आमन्त्रित कर तोड़ लें। और घर पर दुर्गासप्तशती की पोथी में लाकर सरस्वती के रूप में स्थापित कर पूजा करें। यह पोथी पाठ में काम नही आयेगी। अतः बिना फटी पुरानी पोथी लेना उचित है।
८ पूर्वाषाढ़ नक्षत्र युक्त अष्टमी महा अष्टमी कहलाती है। उत्तराषाढ़ नक्षत्र युक्त नवमी महा नवमी कहलाती है।
महा अष्टमी और महा नवमी की पूजा एक ही आसन पर बैठे बैठे ही बिना उठे ही करें। महाअष्टमी और महानवमी के सन्धि काल मे अष्टमी समाप्ति तक महाअष्टमी की पूजा करें फिर नवमी लगते ही महानवमी की पूजा करें।   
९ बलिदान मतलब धार्मिक कर अदायगी। कुष्माण्ड (भूरा कोला), मातुलिङ्ग (बिजोरा नींबू), आँवला, नारिकेल (नारियल), श्रङ्गार सामग्री, वस्त्राभूषण, अन्न - धन, गौ दान करनें को बलिदान कहते हैं। उत्तराषाढ़ नक्षत्र युक्त नवमी तिथि में सरस्वती के निमित्त बलिदान करें। फिर नवरात्र उत्थापन / उद्यापन करें। 
क्षत्रिय जन (सैनिक, पूलिस वाले, गार्ड आदि) लोहाभिसारण (शस्त्र पूजन) करते हैं।
१० दशमी तिथि दसरा/ विजया दशमी है। श्रवण नक्षत्र युक्त दशमी तिथि में प्रातः काल में दुर्गा सप्तशती में स्थापित सरस्वती अर्थात बेलपत्र या शमी के पत्तों का पूजन कर विसर्जन करें। विसर्जन में उक्त बेलपत्र ( या शमी की पत्तियों) का ही सरस्वती मान कर विसर्जन होता है पुस्तक का नहीं। फिर मध्याह्न  में अपराजिता का पूजन करें। 
विजया दशमी पर्वोत्सव पर अपराजिता की पूजा कर दसरा अर्थात दक्षिण दिशा की यात्रा करें।

सन्दर्भ ---

नवरात्र पूजन निर्णय - ठाकुर प्रसाद एण्ड संस द्वारा संवत २०२७ में प्रकाशित कमलाकर भट्ट प्रणीति ग्रन्थ निर्णय सिन्धु के अनुसार।

  प्रतिपदा तिथि उदयकाल में दो मुहुर्त (१ घण्टा ३६ सिनट) हो तो भी नवरात्र घटस्थापना में ग्राह्य है। 
 एक कला और अमावस्या युक्त प्रतिपदा तो नवरात्र घटस्थापना में कदापि न लें। - पृष्ठ ३२९, ३३१,

अधिक तिथि की स्थिति में शुद्ध तिथि होने से अमावस्या रहित प्रथम दिन ही लें। ऐसे ही क्षय तिथि की स्थिति में क्षण मात्र भी शुद्ध प्रतिपदा न हो तो अमावस्या युक्त प्रतिपदा भी ग्रहण करें।- पृष्ठ ३३०,

देवी का आवाहन, प्रवेश,पूजन और विसर्जन आदि समस्त कर्म प्रातः काल मे ही करें। - पृष्ठ ३३०,३३१ 

घटस्थापना सूर्योदय से १० नाड़ी (अर्थात ४ घण्टे) तक में करें। रात्रि में कदापि न करें।- पृष्ठ पर  ३३१, ३३५

महत्व केवल तिथि का है, तिथि देवता का शरीर है। (न दिन संख्या का, न करण का , न नक्षत्र का, न वार का, न योग का केवल तिथि का ही महत्व है शेष सब गौण हैं।) - पृष्ठ ३३१, ३३४,३४७, ३७२

प्रति तिथि में एक एक कन्या को भोजन कराएँ, या प्रतिपदा को एक, द्वितीया को दो, तृतीया को तीन ऐसे नवमी तिथि पर्यन्त बढ़ते क्रम से कन्या पूजन कर भोजन कराएँ। या प्रति तिथि नौ-नौ कन्याओं का पूजन कर भोजन कराएँ। - पृष्ठ ३३८

प्रतिपदा को जितनी पूजा करें, द्वितीया को उससे द्विगुणित, तृतीया को त्रिगुणित ऐसै ही नवमी तिथि पर्यन्त वृद्धि क्रम में पूजा, पाठ, जप आदि करें। - पृष्ठ ३४२, ३७२

नवरात्र में पूजा ही प्रधान है, उपवास आदि तो उसका अङ्ग है।
तिथि के ह्रास में दोनो तिथियों के निमित्त पूजा करें। - पृष्ठ ३४२, ३७२

संकल्प लेने के बाद या नवरात्र घटस्थापना होने के बाद सूतक होने पर सूतक में देवी पूजा और दान कर सकते हैं। निषेध नहीं है। लेकिन रजस्वला स्त्री दुसरे से पूजा करवाए - पृष्ठ ३४५

सौभाग्यवती/ सुहागिन स्त्री नवरात्र उपवास में भी श्रङ्गार कर सकती हैं, ताम्बूलादि चर्वणकर सकती है। (पान खा सकती है।) - पृष्ठ ३४५
नवरात्र में (सप्तमी को) मूल नक्षत्र प्रथम चरण में या मूल नक्षत्र में देवी का स्थापन करें । तथा (दशमी तिथि) श्रवण नक्षत्र प्रथम चरण या श्रवण नक्षत्र तक नित्य पूजन करें। (दशमी तिथि) श्रवण नक्षत्र प्रथम चरण या श्रवण नक्षत्र में विसर्जन करें। ए- पृष्ठ - ३४६

बङ्गाल, उड़िसा, असम आदि पूर्व और उत्तर पूर्व के प्रदेशों में नवरात्र के स्थान पर सप्तमी, अष्टमी और नवमी तिथि में त्रिरात्र का महत्व है। उनके कार्यक्रम ललिता पञ्चमी से विजया दशमी तक चलते हैं। उसमें भी १ज्येष्ठा नक्षत्र, २ मूल नक्षत्र, ३ पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र - ४ उत्तराषाढा नक्षत्र और ५ श्रवण नक्षत्र का विशेष महत्व है।


ज्येष्ठा नक्षत्र युक्त षष्ठी तिथि में बिल्व का अभिमन्त्रण (आवाहन) करे। ३४६, ३४७, 
यदि सप्तमी को पत्रिका प्रवेश दिन के पूर्व दिन सायंकाल में षष्ठी तिथि का अभाव हो तो, अधिवासन करना चाहिए। सायंकाल में अत्यन्त असत्व में अधिवासन का लोप हो जाता है पृष्ठ - ३४७
नवपत्रिका कथनम पृष्ठ ३४८ - १रम्भा (केल के पत्ते/ केला फल के पौधे के पत्ते), २ कवी (दारु हल्दी) के पत्ते, ३ हरिद्रा (हल्दी/ हलदी) के पत्ते, ४ जयन्ती (मेउडी) के पत्ते, ५ बिल्व (बिल्वपत्र/ बेलफल के वृक्ष के पत्ते), ६ दाडिम (अनार) के पौधे के पत्ते , ७ अशोक / सीता अशोक वृक्ष के पत्ते, ८ मानवृक्ष (अमलतास) के पत्ते, ९ धान्य (चांवल) के पत्ते, ९

मूल नक्षत्र युक्त सप्तमी तिथि में पत्रिका (उक्त कथित नव पत्रिका) का प्रवेश करें। (पत्ते तोड़कर घर लायें। सप्तशती पुस्तक में स्थापित करें।)
पूर्वाषाढ़ से युक्त अष्टमी तिथि में पूजा, होम,उपोषण आदि करें। - पृष्ठ ३४६, ३४७

देवता का शरीर तिथि है और तिथि में नक्षत्र आश्रित है। इसलिए तिथि के बिना नक्षत्र में (आह्वान, स्थापना, पूजन, बलिदान, विसर्जन आदि) नही करते हैं।
तिथि नक्षत्र योग हो तो दोनों के युग्म काल में करें। किन्तु तिथि-नक्षत्र के योग का अभाव हो तो केवल तिथि का ग्रहण करना चाहिए। - ३४७, ३४८, ३७२

पत्रिका प्रवेश और स्थापना में षष्टियुक्त सप्तमी न लेकर उदिया सप्तमी अर्थात शुद्ध सप्तमी तिथि में पत्रिका प्रवेश और स्थापना करें‌। पृष्ठ ३४८
नवरात्र व्रत, उपवास, आवाहन, प्रवेश, स्थापना , पूजन, बलिदान, विसर्जन सब में एक घटिका (२४ मिनट) उदिया तिथि मिले तो उदिया तिथि ही ग्रहण करें। एक घटिका (२४ मिनट) उदिया तिथि न मिले तो ही पूर्वविद्धा तिथि ग्रहण करे। - पृष्ठ ३४८, ३५०

पत्रिका पूजन (पत्ते का पूजन) भी पूर्वाह्न में ही करें। मूल नक्षत्र हो या न हो। - पृष्ठ ३४८

जो प्रतिपदा से नवमी तक उपवास करने में असमर्थ हो वे सप्तमी, अष्टमी, नवमी तीन तिथियों में उपवास करें। पृष्ठ - ३४८, ३४९

दक्षिणाभिमुखी दुर्गा प्रतिमा शुभ दात्री, पूर्वाभिमुखी दुर्गा प्रतिमा जय वर्द्धिनी, पश्चिमाभिमुखी दुर्गा प्रतिमा स्थापनार्थ सदा उत्तम है। किन्तु दुर्गा की उत्तराभिमुखी मुर्ति स्थापना कदापि न करें। - पृष्ठ ३५०

शारदीय नवरात्र में नवमी तिथि युक्त अष्टमी तिथि महाअष्टमी पूज्य होती है। - पृष्ठ ३५०

पहले दिन अष्टमी पूर्वाह्न व्यापि (मध्याह्न तक अष्टमी तिथि) हो तो ही पूर्वा अष्टमी तिथि ग्रहण करे। -३५५ 

यदि अष्टमी तिथि सूर्यास्त के पश्चात तक हो तो उसमें दुर्गोत्सव करें। पृष्ठ - ३५६

अष्टमी तिथि नवमी तिथि से युक्त हो तथा साथ में मूल नक्षत्र से युक्त हो तो महानवमी कहलाती है। यह योग अत्यन्त दुर्लभ है।- पृष्ठ ३५५, ३५७

उदिया नवमी तिथि तभी ग्रहण करे जब नवमी तिथि सूर्यास्त के पश्चात तीन मुहुर्त (२ घण्टा २४ मिनट) बाद तक रहे। - पृष्ठ ३६५

अष्टमी तिथि के अवशिष्ट भाग में और नवमी तिथि के पूर्व भाग में की हुई पूजा ही महाफल देने वाली है। 
अष्टमी पूजा मध्यरात्रि में महाविभव के विस्तार से करें। - पृष्ठ ३६६।

पूर्वाषाढ़ नक्षत्र युक्त अष्टमी तिथि में पूजा, होम, और उपवास करें - ३६७

प्रतिपदा से नवमी तकनीकी, या सप्तमी , अष्टमी और नवमी का व्रत उपवास का पारणा दशमी तिथि में करें। पृष्ठ- ३७२, ३७३

पारण में सूतक का निषेध नही है। पृष्ठ ३७४

मध्याह्न के दस पल (चार मिनट) बाद वाले प्रहर अपराह्न व्यापी दशमी तिथि को विजया दशमी कहते हैं।
यदि यह सूर्यास्त पश्चात तीन मुहुर्त (२ घण्टे २४ मिनट) पश्चात तक अर्थात प्रदोष व्यापिनी भी मिले तो सर्वोत्तम। यदि यह श्रवण नक्षत्र युक्त हो तो भी पूर्व विद्धा न करें। - पृष्ठ ३७७

आश्विन शुक्ल पूर्णिमा को जागरी पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा परा ग्रहण करें। - पृष्ठ ३७८
विशेष --- बङ्गालियों का मत है कि, मुख्य नवरात्र तो चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से रामनवमी तक होती है, लेकिन (किष्किन्धा में सुग्रीव आवास पर रहते) श्री राम ने आश्विन शुक्ल पक्ष में (प्रतिपदा से दुर्गा नवमी तक) शक्ति पूजा कर विजया दशमी/ दसरा से शरद पूर्णिमा के बीच सीता जी की खोज हेतु दल भिजवाए थे। और रावण वध हेतु भी शक्ति पूजा की थी। इसलिए आश्विन मास में शुक्ल पक्ष में (प्रतिपदा से दुर्गा नवमी तक)शारदीय नवरात्र में शक्ति पूजा की नव्य परम्परा प्रारम्भ हुई। इसलिए वे शारदीय नवरात्र को अकाल नवरात्र अर्थात असामयिक नवरात्र कहते हैं।