मंगलवार, 14 सितंबर 2021

तिथि, नक्षत्र और वार के देवता और ज्योतिष में नवीन अनुप्रयोग।


सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय तिथियों, नक्षत्रों और वार के देवताओं की शास्त्रोक्त जानकारी प्रस्तुत है।⤵️
तिथि-
ध्यान रहे तिथियों का आरम्भ समय और समाप्ति का समय केतकी ग्रहगणितम् आधारित पञ्चाङ्गों में ही देखें।

तिथियों के देवता -
1 प्रतिपदा के अग्नि देव, 
2 द्वितीय के ब्रह्मा जी, 
3 तृतीया की गौरी
4 चतुर्थी के गणेश
5 पञ्चमी के नागदेव
6 षष्टी के कुमार कार्तिकेय
7 सप्तमी के सूर्य
8 अष्टमी के शिव
9 नवमी की दुर्गा देवी, 
10 दशमी के यमराज 
11 एकादशी के विश्वेदेवाः
12 द्वादशी के विष्णु भगवान, 
13 तृयोदशी के कामदेव
14 चतुर्दशी के शंकर ,
15 पूर्णिमा के चन्द्रदेव और 
30 अमावस्या के देवता पितरः हैं।

नक्षत्र--
ध्यान रहे नक्षत्रों का आरम्भ समय और समाप्ति का समय केतकी ग्रहगणितम् आधारित पञ्चाङ्गों में या गुगल सर्च पर ही देखें।

 नक्षत्रों के भी देवता ⤵️
1 अश्विनी के अश्विनीकुमार (दस्र और नासत्य सूर्यदेव और अश्विनी के पुत्र हैं),
2 भरणी के यमराज (सूर्यदेव और सरण्यु के पुत्र, यमुना जी के भाई।)
3 कृतिका के अग्निदेव। (अग्नि वसु)
4 रोहिणी के ब्रह्मा जी।
5 मृगशीर्ष के सोम देव (जिनका निवास मृगशीर्ष नक्षत्र/ हिरणी के ताराओं में माना गया है। ) (सोम वसु।)
6 आर्द्रा के शिव
7 पुनर्वसु की अदिति (आदित्यों की माता)।
8 पुष्य के ब्रहस्पति (देवताओं के आचार्य।) (देवगुरु ब्रहस्पति देवता हैं। केवल विंशोत्तरी महादशा में पुष्प नक्षत्र के स्वामी शनि ग्रह बतलाये हैं। कर्मकाण्ड/ पूजा में इसका कोई महत्व नही है।)
9 आश्लेषा के सर्प। (सुरसा की सन्तान।)
10 मघा के पितरः (सप्त पितरः पहले तीन निराकार और बादके चार साकार हैं। 1 अग्निष्वात 2  बहिर्षद 3 कव्यवाह 4 अर्यमा 5  अनल , 6 सोम , 7 यम ।) (अर्यमा आदित्य भी है। यहाँ अर्यमा सप्त पितरः के मुखिया हैं।अनल और सोम वसु भी हैं।)
11 पूर्वाफाल्गुनी के भग आदित्य।
12 उत्तराफाल्गुनी के अर्यमा आदित्य।
13 हस्त के सवितृ आदित्य ।
14 चित्रा के त्वष्टा आदित्य।
15 स्वाती के वायुदेव  (वसु)
16 विशाखा के इन्द्राग्नि।  (इन्द्र आदित्य और अग्नि वसु)
17 अनुराधा के मित्र आदित्य।
18 ज्यैष्ठा के वरुण आदित्य। (मतान्तर से इन्द्र आदित्य।)
19 मूल के निऋति (राक्षसों के राजा)/ मतान्तर से निऋति को अलक्ष्मी अर्थात कालरात्रि भी मानते हैं।)
20 पूर्वाषाढ़ा के अप् (जल वसु)।
21 उत्तराषाढ़ा के विश्वैदेवाः। (1कृतु 2 दक्ष 3 श्रव 4 सत्य 5 काल 6 काम 7 मुनि 8 पुरुरवा 9 आर्द्रवसु 10 रोचमान मुख्य हैं। कहीँ कहीँ तीन तथा तिरसठ विश्वैदेवाः भी मानें गये हैं।)
22 अभिजित के विधि (ब्रह्म अर्धात विधाता  अर्थात सवितृ और सावित्री दोनों संयुक्त। )
23 श्रवण के विष्णु आदित्य (वामन अवतार)।
24 धनिष्टा के अष्ट वसु (1 प्रभास 2 प्रत्युष, 3 धर्म 4 ध्रुव 5 सोम 6 अनल  7 अनिल 8 आप या अपः)।
25 शतभिषा (शततारका) के इन्द्र आदित्य/ मतान्तर से वरुण आदित्य।
26 पूर्वाभाद्रपद के  अजेकपात रुद्र/ (अज एक पाद या अज का एक चरण।)
27 उत्तराभाद्रपद के अहिर्बुधन्य रुद्र।(सर्पधर।)
28 रेवती के पूषा आदित्य।

वार --
वार का आरम्भ सूर्योदय होते ही होजाता है। इसके पहले नही।
वार की समाप्ति अगले दिन के सूर्योदय होते ही होती है इसके पहले नही।

ग्रहों के अधिदेवता (मुख्य देवता) और प्रत्यधिदेवता
 (उपदेवता)  जो वार के भी देवता माने जाते हैं।

1 रविवार -  सूर्य  के अधिदेवता ईश्वर तथा  प्रत्यधिदेवता  अग्नि
2 सोमवार - चन्द्रमा की अधिदेवता  उमा तथा प्रत्यधिदेवता अप्  (जल)।
3 मंगलवार  -  मङ्गल के अधिदेवता स्कन्द (कार्तिकेय) तथा प्रत्यधिदेवता पृथ्वी
4 बुधवार - बुध के अधिदेवता और प्रत्यधिदेवता दोनो ही विष्णु  हैं।
5 गुरुवार - ब्रहस्पति  के अधिदेवता ब्रह्मा तथा प्रत्यधिदेवता इन्द्र
6 शुक्रवार - शुक्र के अधिदेवता इन्द्र तथा प्रत्यधिदेवता इन्द्राणी (शचि)।
 7 शनिवार - शनि के अधिदेवता यम तथा प्रत्यधिदेवता प्रजापति
8 राहु के अधिदेवता काल तथा प्रत्यधिदेवता सर्प
9 केत के अधिदेवता चित्रगुप्त तथा प्रत्यधिदेवता ब्रह्मा

वासर या वार या दिन -- ध्यान रखें कि  वासर प्रवृत्ति सूर्योदय से होती है।  आपके ग्राम/ नगर का उस दिन और अगले दिन का सूर्योदय गुगलसर्च पर  देखें या केतकी पञ्चाङ्गों में ही देखें। पञ्चाङ्गों में प्रायः धर्मशास्त्रोक्त सूर्य का अर्धबिम्बोदय का समय दर्शाया जाता है। वही उचित भी है। किन्तु हर एक स्थान का सूर्योदयास्त पञ्चाङ्गों में नही मिल पाता अतः गुगल पर खोजें। लेकिन गुगल में सूर्योदय में सूर्य की उपरीकोर का दर्शन का समय और सूर्योदयास्त में सूर्य की उपरी कोर के अन्तिम दर्शन का समय बतलाया जाता है। इसकारण सूर्योदय लगभग तीन/ चार मिनट पहले और सूर्यास्त तीन चार मिनट बाद बतलाया जाता है। परिणामस्वरूप दिनमान सात-आठ मिनट बड़ जाता है। गुगल सर्च पर  हिन्दी में अपने ग्राम/ कस्बे का नाम या निकटतम नगर का नाम  और सुर्योदय समय लिखकर सर्च करें।
क्योकि  दो सूर्योदय के बीच का समय ही वार  कहलाता है। तात्पर्य यह कि, सूर्योदय के पहले वार चालू नही होता और समाप्त भी नही होता। न ब्रह्म मुहूर्त से न मध्यरात्रि से। बल्कि सूर्योदय से ही वार बदलता है।
रात्रि 00:00 बजे या रात 12:00 बजे Day & Date बदलते हैं। वार या तिथि, नक्षत्र नही बदलते।)

【नीचे कुछ नवीन जानकारी मेरे मत में  ⤵️
सुचना -- यह मेरी मान्यता है। मेने प्रयोगों एवम् निरिक्षणों में इसे जाँचा परखा और सही पाया। किन्तु यह कोई शास्त्रीय मत नही है अतः सर्वस्वीकार्य हो यह आवश्यक नही है। किसी के द्वारा न माननें पर मुझे कोई आपत्ति नही है।

1 - भूमि की अधिदेवता श्रीदेवी और प्रत्यधिदेवता भूदेवी
युरेनस (हर्षल) के अधिदेवता निऋति और प्रत्यधिदेवता विरोचन
नेपच्युन के अधिदेवता इन्द्र और प्रत्यधिदेवता वरुण

2 - वैदिक कालीन दशाह पद्यति को इस रूप में पूनर्प्रचलित किया जाना उचित होगा।
दशाह के वासर --
1रविवासर, 2 सौम्य वासर, 3 बुधवासर, 4 शुक्र वासर, 5 भूमिवासर, 6 मंगलवासर, 7 ब्रहस्पति वासर,8 शनिवासर, 9 निऋति वासर, 10 अदिति वासर।

3 इसी प्रकार अंकविद्या में अंको का स्वामित्व भी इसप्रकार निर्धारित कर संस्कृत पद्यति से जन्मनाम निकालकर अंकविद्या अनुसार नाम निर्धारण किया जाना उचित होगा।
अनको के देवता और स्वामी ग्रह -- 
अंक स्वामी ग्रह। अधिदेवता / प्रत्यधिदेवता
0      सूर्य          सवितृ / त्वष्टा                            00
1      चन्द्रमा      वरुण / सोम                              01
2      शुक्र          रुद्र / अहिर्बुधन्य                        02
3      शनि          यम / अश्विनौ                            03
4      मङ्गल        अग्नि / विश्वैदेवाः                       04
5      भूमि          विष्णु / विष्णु (सूर्य से 180° पर) 05
6       बुध           वायु / वसु                               06
7       ब्रहस्पति    ब्रहस्पति / प्रजापति                   07
8       युरेनस       निऋति/ सर्प/ पितृ                    08
9       नेपच्युन      इन्द्र /अदिति                            09     

नामकरण की सुविधार्थ अक्षरों के अंक⤵️

नाम की संस्कृत, / हिन्दी या मराठी वर्तनी के अक्षरों के अंक।

नाम सरनेम सहित जन्मसमय के सायन सौर गतांश का ईकाई अंक और नाम सरनेम सहित जन्म नाम के अंको को जोड़कर प्राप्त योगफल का ईकाई अंक  एक ही हो।

0-   अ,  क,  ट,  प,  ष,  अः, क्ष, ऽ     0

1-  आ,  ख,  ठ,  फ,  स,  त्र ,           1

 2-   इ,   ई,   ग,   ड,  ब,  ह ,           2

 3-   उ,   ऊ,  घ,   ढ,  भ, ळ            3

 4-   ऋ,   ङ, ण,  म,                       4
  
 5-    ए,   च,  त,  य,                       5

 6-    ऐ,   छ,  थ,  र,  ज्ञ,                  6

 7-   ओ,  ज,  द,  द,  ल, ड़,ॉ           7

 8-   औ,  झ,  ध,  व,  ढ़ ऴ                8
 
 9-    अं,  ञ,   न,  श,                        9

  0-    अ,  क,  ट,  प,  ष,  अः, क्ष, ऽ     0   

जन्मनाम निर्धारण संस्कृत पद्यति से।
देखिये अग्निपुराण अध्याय 293 श्लोक 10 से 15 तक।
यह विधि अग्नि पुराण  मन्त्र - विद्या  के अन्तर्गत नक्षत्र - चक्र, राशि चक्र और सिद्धादादि मन्त्र शोधन प्रकार।से ली गई है।

जन्मलग्न के नक्षत्र चरण के अनुसार जन्मनाम/ देह नाम रखें।
नही बने तो अपवाद में दशम भाव स्पष्ट के नक्षत्र चरणानुसार कर्मनाम भी रख सकते हैं।
सुर्य के नक्षत्र चरणानुसार गुरु प्रदत्त अध्यात्मिक नाम / आत्म नाम।
तन्त्र क्रिया हेतु तान्त्रिक आचार्य प्रदत्त नाम मानस नाम जन्म कालिक चन्द्रमा के नक्षत्र चरणानुसार रखें।

राशि/नक्षत्र के चरणानुसार जन्म नाम का प्रथम वर्ण


राशि /नक्षत्र चरण    1   2    3   4  
  
मेष  /   अश्विनि       अ  अ   अ  अ                              मेष  /    भरणी       आ आ  आ  आ                            मेष  /   कृतिका      इ    
                 
                          1   2    3   4  

वृष   / कृतिका            इ    ई    ई
वृष   / रोहिणी      उ   उ   ऊ   ऊ
वृष   / मृगशिर्ष     ऋ  ऋ  

                          1   2    3   4  

मिथुन/ मृगशिर्ष               ऋ  ऋ
मिथुन/ आर्द्रा         ए   ए    ऐ   ऐ
मिथुन/पुनर्वसु       ओ  ओ  औ 

                           1   2    3   4  

कर्क  / पुनर्वसु                      औ
कर्क  / पुष्य           अं  अं  अः अः
कर्क  / आश्लेषा      क  क  ख  ख 

                             1  2    3   4  

सिंह  / मघा             ग  ग    घ  घ
सिंह/पुर्वाफाल्गुनि     च  च   छ  छ
सिंह/उत्तराफाल्गनि   ज

                                1  2    3   4  

कन्या/उत्तराफाल्गुनि     ज  झ  झ
कन्या  /  हस्त               ट  ट    ठ  ठ
कन्या  /  चित्रा              ड  ड   

                                  1  2    3   4  

तुला  /    चित्रा                         ढ  ढ
तुला  /    स्वाती              त  त   थ  थ
तुला  /  विशाखा             द   द   ध    

                                    1  2    3   4  

वृश्चिक/ विशाखा                             ध
वृश्चिक/ अनुराधा              न  न    न   न
वृश्चिक/ ज्यैष्ठा                  प  प   फ  फ

                                     1  2    3   4  

धनु   /  मुल                     ब  ब   भ  भ
धनु   / पुर्वाषाढ़ा               म  म   म   म
धनु  / उत्तराषाढ़ा              य

                                      1  2    3   4  

मकर/ उत्तराषाढ़ा                   य    य   य
मकर /  श्रवण                    र   र    र   र
मकर / धनिष्ठा                    ल  ल

                                      1   2    3   4  

कुम्भ / धनिष्ठा                               ल  ल
कुम्भ / शतभिषा                 व   व    व  व
कुम्भ / पुर्वाभाद्रपद             श  श   ष  

                                       1  2    3   4  

मीन /  पुर्वाभाद्रपद                              ष
मीन / उत्तराभाद्रपद            स  स    स   स
मीन /  रेवती                      ह  ह     ह   ह


मात्रा लगाने की विधि / नियम --

प्रथम एवम् त्रतीय चरण में मुल स्वर हैं। द्वितीय और चतुर्थ चरण में आ से औ तक की मात्रा वाले अक्षर  जन्मनाम का प्रथमाक्षर रहेगा।

जिन नक्षत्रों में प्रथम और त्रतीय चरण में अलग अलग वर्ण हो उनमें द्वितीय चरण में प्रथम चरण के वर्ण में और चतुर्थ चरण में त्रतीय चरण के वर्ण में ००ं-००' से ००ं-२०' तक ा की मात्रा लगायें। तदनुसार ही आगे भी ००ं-२१' से ००-४०' तक ि  की मात्रा लगायें।००ं-४१' से ०१ं-००' तक ई की मात्रा ।०१ं-०१' से ०१ं-२०' तक ु की मात्रा।०१ं-२१' से ०१ं-४०' तक ू की मात्रा।०१ं-४१' से ०२ं-००' तक ृ की मात्रा।०२ं-०१' से ०२ं-२०'  तक   े की मात्रा।०२ं-२१ से ०२ं-४०' तक ै की मात्रा। ०२ं-४१' से ०३ं-००' तक ो की आत्रा । और , ०३ं-००' से ०३ं-२०' तक ौ की मात्रा लगाकर नाम का प्रथमाक्षर रखें।

जबकि, जिन नक्षत्रों में चारों चरणों में एक ही व्यञ्जन हो वहाँ प्रथम एवम् द्वितीय चरण में मुल वर्ण से नाम का प्रथमाक्षर रहेगा।जबकि, तृतीय और चतुर्थ चरण में ००ं-००' से ००ं-४०' तक ा की मात्रा लगायें। तदनुसार ही आगे भी ००ं-४१' से ०१-२०' तक  ि  की मात्रा लगायें। ०१ं-२१' से ०२ं-००' तक ई की मात्रा ।०२ं-०१' से ०२ं-४०' तक ु की मात्रा । ०२ं-४१' से ०३ं-२० तक ू की मात्रा।०३ं-२१' से ०४ं-००' तक ृ की मात्रा।०४ं-०१' से ०४ं-४०'  तक   े की मात्रा।०४ं-४१ से ०५ं-२०' तक ै की मात्रा। ०५ं-२१ से ०६ं-००' तक ो की आत्रा । और , ०६ं-०१' से ०६ं-४०' तक ौ की मात्रा लगाकर नाम का प्रथमाक्षर रखें।】

सुचना -- मेरी मंशा तो असमान भोगांश वाले अट्ठाइस नक्षत्रों के चरणों के अनुसार नामकरण करनें की विधि विकसित करनें की थी। किन्तु  तैत्तरीय संहिता आदि प्राचीन वैदिक खगोलशास्त्रिय ग्रन्थों में स्थिर भृचक्र (Fixed Zodiac) में नक्षत्रों की दर्शाई गई आकृति के असमान भोगांश वाले अट्ठाइस नक्षत्रों के योगतारा को केन्द्र मानकर नक्षत्र योगतारा के आसपास असमान भोगांश वाले नक्षत्र के चरणानुसार नाम का प्रथमाक्षर निर्धारण करने की थी। 
किन्तु ऐसे असमान भोगांश वाले अट्ठाइस नक्षत्रों की दर्शाई गई आकृति के आरम्भ और समाप्ति वाले भोगांश की सुची और नक्षत्र चरणों के आरम्भ और समाप्ति वाले भोगांश की सुची उपलब्ध न होनें से आधुनिक 13°20' के समान भोगांश वाले सत्ताईस नक्षत्र और 03°20' के समान भोगांश वाले नक्षत्र चरणानुसार जन्मनाम के प्रथम वर्ण निर्धारित करना पड़े।

वर्तमान गलत परम्पराएँ ---

आजकल लोग ईश्वर, भगवान और देवी-देवताओं  को एलोपैथिक दवाई जैसा उपयोग करने लगे हैं। जैसे पिछली बार डिस्प्रिन से दर्द बन्द नही हुआ तो इसबार पेरासिटामोल लेलिया। ऐसे ही आज इस देवता को पूज लिया कल दुसरे को पटालेंगे।
इष्टदेव कौन है यह तो कोई समझता ही नही।
जो समझते हैं वे भी कभी इष्ट देवता को, कभी कुलदेवता को, कभी दिन विशेष के देवता को तो कभी कार्य विशेष के लिए देवता को जैसे परीक्षा में सरस्वती जी तो धनप्राप्ति हेतु लक्ष्मीजी को पटालो।
ये कोई पूजा (सेवा) हुई। पूजा में पूर्ण समर्पण चाहिए। अव्यभिचारिणी भक्ति चाहिए।
रविवार के देवता ईश/ ईश्वर और अग्नि हैं लेकिन लोग सूर्याय नमः लिखते हैं यहाँ तक भी ठीक पर सवितृ और सूर्य (मार्तण्ड) का अन्तर तो कोई जानता समझता नही लेकिन ज्ञानोपदेश अवश्य प्रेषित कर देते हैं।
सोमवार या तो नमः शिवाय या चन्द्रदेव को नमस्कार।सोम और चन्द्रमा का अन्तर कोई जानता नही। पर ज्ञान जरूर बघारते हैं। जबकि सोमवार के देवता उमा और अप् हैं।
मंगलवार को हनुमानजी याद आ जाते हैं। महारष्ट्रीय गाणपत्य सम्प्रदाय वालों को मंगलवार को सिद्धिविनायक याद आते हैं। जबकि मंगलवार के देवता कार्तिकेय और भूमि है।
बुधवार विष्णु का वार है लेकिन इसदिन विष्णुजी को कोई नही पूछता। मालवा में लोगों को गणेशजी याद आजाते हैं।
गुरुवार ब्रह्माजी और इन्द्र का वार है पर इसदिन ब्रह्माजी और इन्द्रदेव को कोई नही पूछता लोगों को नारायण याद आजाते हैं।
शुक्रवार इन्द्र और शचि (इन्द्राणी) का वार है पर इन्द्रदेव और इन्द्राणी को कोई नही पूछता सब लक्ष्मीजी को प्रणाम करने लगते हैं। शनिवार को भय के मारों को शनिदेव और हनुमानजी याद आ जाते हैं।
पर यमराज और प्रजापति को कोई याद नही करता।
तिथियों का महत्व तो नगण्य लोग ही जानते हैं। कुछ लोग ही सप्तमी के स्थान पर षष्टी को सूर्य की पूजा करते हैं।, अष्टमी को शिवजी के स्थान पर देवी की पूजा करते हैं जबकि नवमी को दुर्गा देवी को भूल जाते हैं। एकादशी को विश्वेदेवाः के स्थान पर विष्णु जी को याद करते हैं लेकिन विष्णुजी की तिथि द्वादशी को भगवान विष्णु को भूल जाते हैं। तृयोदशी को यदि प्रदोष हो तो शंकरजी को याद करते हैं जबकि तिथि कामदेव की है और शंकरजी की तिथि चतुर्दशी को शंकरजी को कोई नही पूछता। पूर्णिमा को चन्द्रमा और अमावस्या को सप्त पितरः को याद नही करते।

शनिवार, 4 सितंबर 2021

गर्व से कहो हम सनातन वैदिक ब्राह्मधर्मी हैं। हमारे ईष्ट विष्णु हैं। सावित्री मन्त्र हमारा गुरु मन्त्र है।

ब्राह्मधर्म अर्थात सनातन वैदिक धर्म में परमात्मा,विश्वात्मा ॐ,प्रज्ञात्मा  परब्रह्म, परम दिव्य पुरुष विष्णु, परमेश्वर आदि परम दिव्य शक्ति के नाम बतलाये गये हैं।
किन्तु सनातन धर्मी (जो स्वयम् को हिन्दू अर्थात दास मानते हैं वे) इनमें से कोई नाम लेनें में डरते हैं कि, कहीँ, सेकुलर छवि पर धब्बा न लग जाये।
और आलस्यवश चीनियों या पाकिस्तानियों द्वारा फैसबुक/व्हाट्सएप/ इण्ट्राग्राम/ ट्वीटर के लिए तैयार किये गये मेसेज फारवर्ड करते रहते हैं।
जैन नास्तिक हैं किसी सृष्टि सृजेता, सृष्टि नियामक और सृष्टि सञ्चालक के अस्तित्व को नही मानते फिरभी वे भगवान बोलते हैं। 
बौद्ध नास्तिक हैं, ईश्वर के विषय में मौन हैं, फिरभी भगवान बुद्ध बोलते हैं। 
खालसा अकाल पुरुख बोलते हैं। या वाहेगुरु बोलते हैं।
पारसी अहुरमज़्द बोलते हैं।  
यहुदी और ईसाई यहोवा परमेश्वर , परम पिता परमेश्वर बोलते हैं।
मुस्लिम अल्लाह बोलते हैं।
किन्तु सनातन धर्मी सर्वशक्तिमान, परम शक्ति, कोई शक्ति है जो सबकुछ सञ्चालित कर रही है, ऐसे उद्गार प्रकट कर स्वयम् को विकसित वैज्ञानिक मानसिकता का प्रदर्शित करने का प्रयास करते हैं। जो पूर्णतः अनुचित और गलत है।
हमें भी अपने धर्म के परम देव का नाम सगर्व लेना चाहिए। सश्रद्धा विश्वास पूर्वक सगर्व स्वीकारना चाहिए कि, परमात्मा ने सृष्टि सृजित की, परमात्मा परब्रह्म विष्णु स्वरूप में सृष्टि सञ्चालित करते हैं। हमारा मुख्य मन्त्र ॐ है। हमारा गुरुमन्त्र सावित्री मन्त्र अर्थात गायत्री मन्त्र है। 
हम वैदिक सनातनधर्मी हैं। परमात्मा, ॐ या विष्णु हमारे इष्टदेव हैं।

रविवार, 29 अगस्त 2021

महाभारत के गूढ़ रहस्योद्घाटन स्व. श्री ग. वा. कवीश्वर द्वारा।

आदरणीय ग. वा. कवीश्वर जी ने ही गहन अध्ययन कर महाभारत के गुढ़ रहस्य और महाभारत के तेरह वर्ष एवम् गीता तत्व मीमान्सा जैसी कालजयी पुस्तकों में महाभारत के ऐसे बहुत से रहस्यों पर से पर्दा उठाया इसमें ---

 गीता प्रवचन अमान्त कार्तिक (पूर्णिमान्त मार्गशीर्ष) कृष्ण अमावस्या को हुआ। और युद्ध में परस्पर भिड़न्त दुसरे दिन मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ हुआ।

युद्ध एक दिन छोड़ कर होता था। कुल अठारह बार दोनों सेनाएँ भिड़ी किन्तु एक दिन छोड़कर युद्ध होने से अमान्त कार्तिक पूर्णिमान्त मार्गशीर्ष कृष्ण अमावस्या से पौष शूक्ल चतुर्थी तक कुल पैंतीस दिन युद्ध चला। 
महाभारत युद्ध में प्रथम दिन युद्धाभ्यास रखा, दुसरे दिन प्रत्यक्ष युद्ध हुआ। तीसरे दिन युद्धक्षेत्र की सफाई,और मरहम-पट्टी हेतु विश्राम दिवस रखा। चौथे दिन फिर प्रत्यक्ष युद्ध हुआ। ऐसे एक दिन युद्ध एक दिन विश्राम दिवस रखा जाता था। 

दो अपवाद -  
कुरुक्षेत्र में सेना आने के सत्ताईसवें दिन और प्रत्यक्ष लड़ाई के चौदहवें दिन की लड़ाई में जयद्रथ वथ के बाद रात्रि में बिना विश्राम के मशालों के प्रकाश मेंं युद्ध जारी रहा और कुछ देर विश्राम पश्चात चन्द्रोदय के बाद पुनः युद्धारम्भ हुआ जो दुसरे दिन भी चलता रहा। 
ऐसे ही दुर्योधन वध के बाद भी अन्तिम दिन रात्रि में भी युद्ध चला। कुल मिलाकर अठारह लड़ाइयाँ पैंतीस दिन में लड़ी गई।

 महाभारत युद्ध में वास्तविक युद्धारम्भ के एक दिन पहले अर्थात अमान्त कार्तिक पुर्णिमान्त मार्गशीर्ष कृष्ण अमास्या को प्रथम बार व्युह रचनाकर तैयार कर युद्धाभ्यास के लिए  सेना खड़ी की गई थी । बिना युद्ध वाले दिन अर्थात मात्र युद्धाभ्यास वाले दिन अमान्त कार्तिक (पुर्णिमान्त मार्गशीर्ष) कृष्ण अमास्या को गीताप्रवचन हुआ था।
उसके अगले दिन मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा से प्रत्यक्ष लड़ाई से व्यावहारिक युद्ध आरम्भ हुआ था। 
(न कि मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को। )
दुर्योधन वध एवम् युद्ध समाप्ति पैंतीसवें दिन पौष शुक्ल चतुर्थी को हुआ। उस दिन सूर्य ज्यैष्ठा नक्षत्र पर एवम् चन्द्रमा श्रवण नक्षत्र पर था।

उन्नीसवें दिन अर्थात प्रत्यक्ष लड़ाई के दसवें दिन अमान्त मार्गशीर्ष (पूर्णिमान्त पौष) कृष्ण तृतीया को शरशय्या पर भीष्म का पतन हुआ। सञ्जय नें स्वयम् पूरे युद्ध में प्रत्यक्ष लड़ाइयाँ लड़ी। और युद्ध में सञ्जय ने कुछ पाण्डवपक्षी योद्धाओं का वध भी किया था।  
कौरव सेना के सेनापतियों के पतन पर दुसरे दिन अवकाश होनें के कारण हस्तिनापुर जाकर (भीष्मपर्व, द्रोण पर्व, कर्णपर्व और शल्य पर्व) सुनाया था।भीष्म के शरशय्या पर पतन के बाद भी विश्राम दिवस होने के कारण सञ्जय नें हस्तिनापुर जाकर धृतराष्ट्र को महाभारत का भीष्मपर्व सुनाया। और फिर लौट आया। (भीष्मपर्व में ही  अध्याय 25 से 42 तक अमान्त मार्गशीर्ष (पूर्णिमान्त पौष) कृष्ण चतुर्थी को सञ्जय वें धृतराष्ट्र को श्रीमद्भगवद्गीता भी है सुनाई थी।) 
कुरुक्षेत्र में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता प्रवचन अमान्त कार्तिक (पुर्णिमान्त मार्गशीर्ष) कृष्ण अमास्या को दिया था। और सञ्जय वें धृतराष्ट्र को अमान्त मार्गशीर्ष (पूर्णिमान्त पौष) कृष्ण चतुर्थी को श्रीकृष्ण अर्जून संवाद रूप श्रीमद्भगवद्गीतासुपनिषद सुनाया था। अतः मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को गीता जयन्ती मनाने का कोई तुक नहीं है।

अर्जुन का मोह -  
अर्जून को भ्रम हुआ कि, युद्ध में उसके भाग लेने के कारण कुरुवंश के पुरुषों के वध से उन योद्धाओं विधवाओं में व्यभिचार पनपेगा इस पाप का दोषी मैं भी होऊँगा; इस पाप भय के भ्रम/ सम्मोह से अर्जुन युद्ध से विरत हो रहा था। 
श्री ग. वा. कविश्वर नें श्रीमद्भगवद्गीता के भी कई कूट स्पष्ट किये जैसे अर्जुन को लग रहा था कि, 
इस महायुद्ध के अन्त में लगभग सभी पुरुवंशी पुरुषों का वध हो जायेगा तो उनकी विधवाओं में व्यभिचार पनपेगा और संकर / वर्णसंकर जन्मेंगे जो पितरों के भी पतन का कारण बनेंगें। इस कारण उसके स्वयम् के साथ ही सभी योद्धा इस पाप के दोषी होंगे। इस पाप से बचने के लिए अर्जून युद्ध नही करना चाहता था। श्रीकृष्ण नें अर्जुन को यह बात समझाया कर युद्ध के लिए तैयार किया कि, यदि युद्ध में तेरे भाइयों का वध होगा और लोग तुम पर भय वश युद्ध से विरत होनें का आक्षेप लगायेंगे तब तुम विवश होकर या भाइयों के वध से उत्तेजित होकर युद्ध में उतरोगे तो तुम्हारे इस कर्म से तुम्हारा और तुम्हारे कुल का अपयश फैलेगा अतः इसके बजाय क्षत्रिय धर्म पालन कर कर्तव्य पालनार्थ युद्ध करो। यह बात जब अर्जुन को समझ आई तभी वह अपने क्षात्रधर्म निर्वहनार्थ युद्ध करने को तैयार हुआ।

 जयद्रथ वध -- 
कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़ी पाण्डव सेना का मुख पश्चिम की ओर तथा कौरव सेना का मुख पुर्व की ओर था। जयद्रथ मृत्युपर्यन्त पीछे मुड़ कर सुर्य देखता रहा। उसे मायीक या ऐन्द्रजालिक या जादुई सुर्यास्त कभी भी नही दिखा। इसलिये वह चिन्तित था। जबकि पुरी कौरव सेना को जयद्रथ वध के पहले वह मायीक सुर्यास्त दिखा। कौरव सेना द्वारा सुर्यास्त के भ्रम मे जयद्रथ की सुरक्षा करना छोड़ दी। उसी समय श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि, वास्तव में सूर्यास्त नही हुआ है अतः बाण चला और जयद्रथ वध कर तब अर्जुन ने युद्ध जारी रखते हुए असुक्षित जयद्रथ का वध किया।
उसदिन सूर्य अनुराधा नक्षत्र में और चन्द्रमा चित्रा नक्षत्र में होकर अमान्त मार्गशीर्ष पूर्णिमान्त पौष कृष्ण एकादशी थी अतः कोई सुर्य ग्रहण नही हुआ था। 
जयद्रथ वध अमान्त मार्गशीर्ष पूर्णिमान्त पौष कृष्ण एकादशी को हुआ था, अमावस्या को नही अतः सूर्यग्रहण होना सम्भव नही है।
वह सुर्यास्त माया रचकर किया था जैसे जादुगर लोग चलती ट्रेन गायब कर देते हैं या ताज महल गायब कर देते हैं श्रीकृष्ण ने भी वैसी ही माया  रची थी। 
(सुचना --- उल्लेखनीय है कि, श्रीकृष्ण ने महर्षि सान्दीपनि से चौसठ विद्याओं/ कलाओं के अन्तर्गत इन्द्रजाल भी सीखा था।)

महाभारत युद्ध के छिंयत्तरवें दिन भीष्म के शर शय्या पर गिरने के अट्ठावनवें दिन  जब सूर्य उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में और चन्द्रमा पुष्य नक्षत्र में था उस समय उत्तरायण आरम्भ में माघ शुक्ल पूर्णिमा को भीष्म नें देह त्यागी थी। 

श्री ग. वा. कविश्वर नें महाभारत के तेरह वर्ष और महाभारत के गुढ़ रहस्य पुस्तक में युधिष्ठिर और दुर्योधन के बीच तेरह वर्ष पूर्ण होने के बाद अज्ञात वास का वर्ष पूर्ण हुआ या नहीं? इस विवाद को भीष्म ने कैसे हल किया? दोनों पक्षों को कैसे समझाया कि, युधिष्ठिर का पक्ष सही है।जिसे दुर्योधन ने न नही माना। बहुत विद्वता पूर्ण तरीके से इसका  विवेचन किया। 
श्री ग.वा. अधिश्वर नें सिद्ध किया कि, महाभारत काल में हर अट्ठावन माह पश्चात दो अधिक मास रखकर पाँच वर्ष की युग गणना की जाती थी।इसका रहस्य सुलझा कर तेरह वर्ष पुरे होनें का गणित, हल किया। और महाभारत युद्ध के पैंतीस दिनों की भी शुद्ध गणना कर इसे प्रमाणित किया।

ऐसे बहुत से कुट रहस्यों के अर्थ स्पष्ट किये हैं। किन्तु पता नही क्यों कविश्वर जी के वंशजों ने इन महान रचनाओं का प्रकाशन बन्द कर दिया।फल स्वरूप इस यथार्थ ज्ञान का प्रसार नही हो पाया।

कृपया विद्वतजन पहल करें।

मंगलवार, 24 अगस्त 2021

सायन निरयन दोनों का महत्व है। दोनों गणनाओं के अलग अलग उपयोग हैं।

क्या सायन गणना के बिना श्रोत, स्मार्त और पुराणोक्त व्रतपर्वोत्सव और मुहुर्तादि की गणना सम्भव है?
क्या नाक्षत्रीय/ निरयन गणना के बिना नक्षत्रों में भ्रमणशील ग्रहों की स्थिति दर्शाना और  होराशास्त्रीय फलित के नियम बनाना सम्भव है?
इन दोनों ही प्रश्नों के उत्तर नकारात्मक हैं।

प्रथम प्रश्न क्या सायन गणना के बिना श्रोत, स्मार्त और पुराणोक्त व्रतपर्वोत्सव और मुहुर्तादि की गणना सम्भव है? का उत्तर ---
1 श्रोत, स्मार्त और पुराणोक्त व्रतपर्वोत्सव और मुहुर्तादि का आधार उत्तरायण/ दक्षिणायन और ऋतुएँ तथा सायन सौर मधु, माधवादि मास एवम् सूर्य के भोगांश और बाण आदि में कहीँ कहीँ संक्रान्ति गत दिवस हैं। इसके बाद अमावस्या, पूर्णिमा और अर्ध चन्द्र दिवस (शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि)  तथा करण का महत्व है। फिर व्यतिपात, वैधृतिपात आदि योग का भी महत्व है। इनके अलावा क्रान्ति- शर ग्रहण- मौक्ष, सूर्योदय-सूर्यास्त, चन्द्रोदय-चन्द्रास्त,  ग्रहों और नक्षत्रों का लोप- दर्शन-अदर्शन (बृहस्पति-शुक्र और अगस्त तारे का उदय अस्त), ग्रहों का वक्री-मार्गी इत्यादि सबकुछ सायन गणना से ही सिद्ध होते हैं। 
इसके अलावा चन्द्रमा का नक्षत्र भ्रमण अर्थात चन्द्रमा का नक्षत्र भी देखा जाता है जो एकमात्र नाक्षत्रीय/ निरयन गणना आधारित है। क्योंकि, नक्षत्रमण्डल भृचक्र (स्थिर झोडिएक) में निर्धारित नक्षत्रों की निश्चित आकृतियों में चन्द्रमा का भ्रमण ही दिवस नक्षत्र कहलाता है। अतः यह नाक्षत्रीय (सेडरल) गणना आधारित होता है।
अर्थात सायन गणना के बिना न आप व्रत पर्व, उत्सव का दिन और समय ज्ञात कर सकते हैं न मुहूर्त देख सकते हैं।
मात्र 2004 वर्ष बाद कलियुग संवत 7126, विक्रम संवत 4079 शके 3944  ईसवी सन 4025 में दो ऋतु आगे निकल जाने के कारण वर्तमान निरयन सौर वर्ष और निरयन संक्रान्तियों पर आधारित 19, 122, 141 वर्षीय चक्र वाली पञ्चाङ्गों के आधार पर मनाये जाने वाले व्रत पर्व, उत्सव के दिन और मुहुर्त शास्त्र सब अप्रासङ्गिक हो जायेंगे। कुछ तो अभी भी हो चुके हैं किन्तु चान्द्रमास स्वयम् भी लगभग 29 दिन आगे पीछे होनें से 24-25 दिन का अन्तर जन साधारण को समझ नही आता है।
किन्तु जिस समय रामनवमी वर्षा ऋतु में आने लगेगी। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी शिशिर ऋतु (ठण्ड) में आने लगेगी। आषाढ़ मास में कोयल नही दिखेगी तो कोकिला व्रत कैसे होगा। 
एवम् 3424 वर्ष बाद कलियुग संवत 8546, विक्रम संवत 5499 शके 5364 में निरयन मकर संक्रान्ति वैदिक उत्तरायण परम्परागत उत्तरगोल में पड़ेगी। उत्तरायण के चैत्रादि मास दक्षिणायन में पड़ेंगें। तब मुहुर्त शास्त्र फिर से गड़बड़ा जायेगा।
 दक्षिण भारत में वसन्त ऋतु पहले आ जाती है और उत्तर भारत में देरी से आती है। सायन मेष संक्रान्ति से सायन तुला संक्रान्ति के बीच पड़ने वाला उत्तरायण (20 मार्च से 23 सितम्बर के बीच) वर्षाऋतु होनें से वैवाहिक कार्यक्रमों में विघ्न पडता था अतः वराह मिहर से भास्कराचार्य के काल में उत्तरायण तीन मास पहले सायन मकर संक्रान्ति से आरम्भ मान लिया गया। मधु मास जो सायन मेष संक्रान्ति (20/21 मार्च) से आरम्भ होता था उसे सायन मीन संक्रान्ति (18 फरवरी) से आरम्भ बतला कर चैत्र मास से जोड़नें का प्रयोग किया गया। कुछ कार्य तो निरयन संक्रान्तियों पर आधारित चान्द्रमासों के 29 दिन आगे पीछे होनें से अपने आप होजाता है।
ऐसा ही संकट 3424 वर्ष बाद पुनः आने वाला है। तब  निरयन संक्रान्तियों से सम्बद्ध वर्तमान पञ्चाङ्ग बे मतलब हो जायेंगे। जैसे आज भी व्यतिपात और वैधृतिपात का सम्बन्ध व्यतिपात योग और वैधृतिपात योग से नही बैठता।
अतः सर्वश्रेष्ठ हल यही है कि, सायन सौर वर्ष और मधु माधव मास आधारित पञ्चाङ्ग का ही उपयोग किया जावे। 
ग्रेटर नोएडा के आचार्य दार्शनेय लोकेश ने श्री मोहन कृति आर्ष पत्रकम प्रकाशित कर उक्त बातें आवश्यकता की पूर्ति की है।
पूर्व में यह कार्य वाराणसी के बापूजी शास्त्री कर चुके थे। किन्तु जन सहयोग न मिलने और विद्वानों के असहयोग के कारण उन्हें बन्द करना पड़ा।
यही स्थिति श्री मोहन कृति आर्ष पत्रकम की न हो इस हेतु सभी विद्वानों और विदुषियों का कर्तव्य है कि, आचार्य दार्शनेय लोकेश को पूर्ण समर्थन दिया जावे। और श्री मोहन कृति आर्ष पत्रकम का ही उपयोग किया जावे।
----------------------------
अब दुसरे प्रश्न क्या नाक्षत्रीय/ निरयन गणना के बिना नक्षत्रों में भ्रमणशील ग्रहों की स्थिति दर्शाना और  होराशास्त्रीय फलित के नियम बनाना सम्भव है? का उत्तर ---
तैतरीय संहिता में चित्रा तारे को आकाश के मध्य में बतलाया गया है। यही बात अन्य भी कई वैदिक ग्रन्थों में उल्लेखित है। इसका तात्पर्य यह भी निकलता है कि, चित्रा तारा नक्षत्र मण्डल (फिक्स्ड झोडिएक ) में 180° पर अवस्थित है। इस तथ्य से वर्तमान में लगभग सभी ज्योतिर्विज्ञानि सहमत हैं। ऐसे ही मघा और चित्रा के योगताराओं में लगभग 54° का अन्तर वैदिक काल से आज तक यथावत है। ऐसे हैं सभी नक्षत्रों के ताराओं की परस्पर दूरी यथावत बनी हुई होने से इसे फिक्स्ड झोडिएक कहते हैं।  लाहिरी की इण्डियन इफेमेरीज़ में 01 जनवरी की स्थिति में नक्षत्र ताराओं के निरयन स्थिति (पोजीशन) बतलाई जाती है। वही स्थिति हजारों वर्षों में भी बहुत कम बदलने वाली है।
अतः रामायण-महाभारत आदि ग्रन्थों में उल्लेखित नक्षत्रीय और ग्रहों की स्थिति के आधार पर उनके काल का ज्ञान प्राप्त किया जाता रहा है।
चूँकि इनकी परस्पर दूरी अपरिवर्तित है अतः इनसे बनने वाले रेखाचित्रों के आधार पर ही इनके नक्षत्रों के नाम रखे गये। और इन नक्षत्रों में भ्रमणशील ग्रहों के आधार पर होराशास्त्र में जातक का फलित देखा जाता है।
ईसवी सन 285 में जो सायन और निरयन मेष राशि एक समान ही थी जबकि ईसवी सन 2435 में निरयन मीन राशि सायन मेष राशि बन जायेगी। अर्थात जो उत्तराभाद्रपद और रेवती के जो तारे सायन मेष राशि में माने जायेंगे। तब क्या सायन मेष राशि का स्वभाव निरयन मीन का स्वभाव समान माना जाये या अलग अलग? यह विचारणीय मुद्दा बन जायेगा। वैसे तो यह समस्या अभी भी है। 
कम से कम इतिहास की दृष्टि से तो नाक्षत्रीय/ निरयन स्थिति (पोजीशन) दर्शाना आवश्यक ही है।

रविवार, 22 अगस्त 2021

ब्रह्मायु, कल्प, सृष्टि, प्रलय, मन्वन्तर, महायुग और चतुर्युग।

ब्रह्मायु, प्रजापति की आयु -कल्प, सृष्टि संवत,सर्ग-प्राकृत, नैमित्तिक और जैविक प्रलय, मन्वन्तर, महायुग और युग व्यवस्था। 
(विष्णु पुराण प्रथम अंश/ अध्याय तीन से पाँच तक।
मनुस्मृति प्रथम अध्याय।
सूर्य सिद्धान्तोक्त मतानुसार।)

सायन मतानुसार दिनांक 20 मार्च 2021 को पुर्वाह्न 15:07 बजे (तथा निरयन मतानुसार दिनांक 13 उपरान्त 14 अप्रेल 2021 को उत्तर रात्रि में पूर्वाह्न 02:33 बजे ) नवीन कलियुग संवत्सर 5122 के आरम्भ होनें के समय के अनुसार संवत्सर संख्या दी जा रही है। ——
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की आयु -- हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के  कुल शत वर्ष (100 वर्ष) की ब्रह्मायु रहती है। जिसे एक पर कहते हैं। ब्रह्मायु को दो परार्ध भी कहते हैं।
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की कुल आयु मानव वर्ष अर्थात सायन सौर वर्षानुसार 31,10,40,00,00,00,000 वर्ष है। 
इसमें से वर्तमान हिरण्यगर्भ ब्रह्मा अपनी आयु के पचास वर्ष (अर्धायु) पूर्ण कर चुके हैं इसलिए वर्तमान में द्वितीय परार्ध चल रहा है। 
ब्रह्मायु के पचास वर्ष पूर्ण होने के पश्चात  द्वितीय परार्ध में अर्थात 51 वें वर्ष के प्रथम दिन (कल्प) का भी लगभग 45.67% भाग (छः मन्वन्तर) व्यतीत हो चुके हैं। अर्थात वर्तमान प्रजापति की आयु भी 45 वर्ष 08 माह 01 दिन  पूर्ण हो चुकी है। 
वर्तमान कल्प के छः मन्वन्तर व्यतीत होकर सातवें मन्वन्तर के अट्ठाइसवें महायुग का कलियुग के 5120 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं।
एक कल्प में चौदह मन्वन्तर होते हैं। एक मन्वन्तर में सन्धि संन्ध्यांश  सहित 71 महायुग होते हैं। 43,20,000×71 = 30,67,20,000 सायन सौर वर्ष का मन्वन्तर होता है।

वर्तमान हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के आयु 31,10,40,00,00,00,000 सायन सौर वर्ष में से 
 15,55,21,97,29,49,122 सायन सौर वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। तथा हिरणगर्भ ब्रह्मा के जीवन के 15,55,18,02,70,50,878 सायन सौर वर्ष शेष रहेंगे। 
इसके बाद हिरण्यगर्भ ब्रह्मा अपने कारण जीवात्मा अपरब्रह्म विराट (नारायण - श्रीलक्ष्मी) में लीन हो जायेंगे और प्राकृत प्रलय होजायेगा। प्राकृत प्रलय की अवधि भी ब्रह्मायु के बराबर ही होती है ।अर्थात  31,10,40,00,00,00,000 सायन सौर वर्ष प्राकृत प्रलय रहेगा। इसके बाद ही दुसरे हिरण्यगर्भ ब्रह्मा प्रकट होंगे।
 इसी प्रकार वर्तमान हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की उत्पत्ति के पहले भी 31,10,40,00,00,00,000 सायन सौर वर्ष का प्राकृत प्रलय ही था।

प्रजापति ब्रह्मा की कुल आयु अर्थात हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के एक अहोरात्र अर्थात एक कल्प के बराबर होती है। हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के एक दिन अर्थात एक कल्प की कुल अवधि 4,32,00,00,000 सायन सौर वर्ष होती है। 
वर्तमान हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के वर्तमान दिन का नाम श्वेत वराह कल्प है।
जिसमें से वर्तमान प्रजापति को उत्पन्न हुए अर्थात कल्पारम्भ हुए 1,97,29,49,122 वर्ष पुर्ण हो चुके होंगे। तथा प्रजापति की शेष आयु अर्थात कल्प समाप्त होने को 2,34,70,50,878 वर्ष शेष रहेंगे । इसके बाद  4,32,00,00,000 सायन सौर वर्ष की हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की रात्रि में प्रजापति ब्रह्मा अपने कारण भूतात्मा हिरण्यगर्भ ब्रह्मा विश्वकर्मा में लय होजायेंगे परिणाम स्वरूप नैमित्तिक प्रलय होगा जिसकी अवधि प्रजापति की आयु या कल्प के बराबर 4,32,00,00,000 वर्ष ही रहेगा। 
नैमित्तिक प्रलय में आकाशादि समस्त ब्रह्माण्ड अपने कारण प्रजापति में बीज रूप में लय होकर प्रजापति भी अपनें कारण हिरण्यगर्भ ब्रह्मा में लीन रहेंगे। 
तथा 4,32,00,00,000 सायन सौर वर्ष बाद पुन्ः हिरणगर्भ ब्रह्मा के दिनोदय में नवीन कल्पारम्भ होगा। फिर नवीन सृष्टि सृजन होगा।

अर्थात वर्तमान प्रजापति ब्रह्मा की आयु भी 45 वर्ष 08 मास 01 दिन व्यतीत हो चुके हैं और  छियालीसवें वर्ष के नौवे मास का दुसरी रात्रि यानी दुसरा अहोरात्र चल रहा है। अर्थात सायन सौर 1,97,29,49,122 वर्ष व्यतीत हो चुके और 2,34,70,50,878  सायन सौर वर्ष कल्प समाप्ति को शेष है। इसके बाद नैमित्तिक प्रलय होजायेगा। सम्पूर्ण भौतिक जगत प्रजापति में बीज रूप में लय हो जायेगा और प्रजापति अपने कारण हिरण्यगर्भ में लय हो जायेगा। 
फिर एक ब्रह्मरात्रि 4,32,00,00,000 सायन सौर वर्ष तक नैमित्तिक प्रलय बना रहेगा। इसके बाद नवीन कल्प (हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के नये दिन) में नये प्रजापति उत्पन्न होंगे और नवीन सर्ग आरम्भ करेंगे। हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के केन्द्र / चित्त में बीज रूप में स्थित स्थावर जङ्गम जगत  पुनः नये सिरे से सृष्टि के रूप में प्रकट होगा।

प्रजापति का एक अहोरात्र  1,20,000सायन सौर वर्ष का होता है। और 60,000 सायन सौर वर्ष का एक दिन होता है और 60,000 सायन सौर वर्ष की ही एक रात्रि होती है।
कल्प संवत्सर गणना मन्वन्तर गणनानुसार -- पहले कृतयुग तुल्य (17,28,000 वर्ष की) संधि, फिर (30,67,20,000 वर्ष का) मन्वन्तर, फिर सन्धि फिर मन्वन्तर इस क्रम में
 (17,28,000 वर्ष की) 7 (सात) सन्धि = 1,20,96,000 वर्ष की सात सन्धि हुई।और 30,67,20,000 वर्ष के छः मन्वन्तर व्यतीत हो गये अर्थात (30,67,20,000×6) = 1,84,03,20,000 वर्ष। सातवें (वैवस्वत) मन्वन्तर के 27 महायुग व्यतीत हो चुके (43,20,000×27)= 11,66,40,000 वर्ष। 
अट्ठाइसवें महायुग के कृतयुग / सतयुग 17,28,000 वर्ष + त्रेतायुग 12,96,000 वर्ष+ द्वापरयुग 8,64,000 वर्ष + कलियुग के 5122 वर्ष व्यतीत हो गये। अर्थात वर्तमान महायुग के 38,93,122 वर्ष व्यतीत हो चुके।
सात सन्धियाँ,+ छ मन्वन्तर+ सत्ताइस महायुग + वर्तमान महायुग के व्यतीत वर्ष = कल्प संवत⤵️

          1,20,96,000 वर्ष सन्धियाँ
+1,84,03,20,000 वर्ष मन्वन्तर
+    11,66,40,000 वर्ष महायुग
+           38,93,122 वर्ष वर्तमान महायुग
----------------------------
=1,97,29,49,122  वर्ष कल्प ।

कल्प संवत 1,97,29,49,122  सायन सौर वर्ष।

मान्यता है कि, कल्पारम्भ के बाद सृष्टि सृजन में 1,70,64,000 लगे। अतः सृष्टि संवत कल्प संवत से 1,70,64,000 वर्ष छोटा है। सृष्टि के आरम्भ से 1,95,58,85,122 वर्ष पुर्ण हो चुके होंगे। इसकारण कल्प संवत 1,97,29,49,122 है तो  सृष्टि संवत 1,95,58,85,122 है।

एक मन्वन्तर की अवधि 30,67,20,000 वर्ष में से सप्तम मन्वन्तर यानि वैवस्वत मन्वन्तर आरम्भ हुए 12,05,33,122 वर्ष होचुके होंगें। अर्थात वैवस्वत मनु की अवस्था 39 वर्ष 03 मास 17 दिन से अधिक हो चुकी है।
तथा वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर समाप्त होने को 18,61,86,878 वर्ष शेष हैं। इसके पश्चात वैवस्वत मनु, इन्द्र,तथा देवगण, सप्तर्षिगण अपने कारण  सुत्रात्मा प्रजापति विश्वरूप में लय होजायेंगे। तथा 
एक कृतयुग तुल्य अवधि 17,28,000 वर्ष तक जैविक प्रलय रहेगा। फिर आठवें मनु सावर्णि मनु नवीन जैविक सृष्टि करेंगे।

कलियुग की कुल आयु 4,32,000 वर्ष है।कलियुग आरम्भ हुए 5122 वर्ष हो चुके होंगे। तथा कलियुग समाप्त होने को 4,26,878 वर्ष शेष रहेंगे। इसके बाद उन्तीसवाँ सतयुग (कृतयुग) आरम्भ होगा।

भारतीय गणना पद्यति 0,1,2,3,4,5,6,7,8,9,10,11 के क्रम में चलती हैं।इस कारण संवत्सर भी गताब्ध में दिये जाते हैं क्योंकि जब संवत्सर आरम्भ हुआ होता है तब संवत 00 कहलाता है। आरम्भ हुए एक वर्ष पुर्ण होने पर संवत 01 कहलाता है।अस्तु मारतीय संवत गताब्ध में दर्शाये जाते हैं। तदनुसार — —
कल्प संवत 01अरब 97 करोड़ 29 लाख 49 हजार 122 चल रहा है।
सृष्टि संवत 01अरब 95 करोड़ 58 लाख 85 हजार 122 चल रहा है।
एवम् कलियुग संवत 5122 चल रहा है।

  31,10,40,00,00,00,000 सायन सौर वर्ष की हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की आयु में सर्ग (सृष्टि) रहती है और इतनी ही अवधि के प्राकृत प्रलय रहता है। इस अवधि में
4,32,00,00,000 सायन सौर वर्ष के प्राकृत, वैकृत और प्राकृत-वैकृत नौ सर्ग होते हैं। और 4,32,00,00,000 का नैमित्तिक प्रलय रहता है।  सृष्टि में एक ब्राह्मदिन यानी एक कल्प या  सृष्टि काल  4,32,00,00,000 सायन सौर वर्ष में पन्द्रह सन्धि- सन्ध्यांश सहित चौदह मन्वन्तर होते है।
(30,67,20,00,000×14= 4,29,40,80,000 सायन सौर वर्ष कल्पावधि।
17,28,000×15= 2,59,20,000 सायन सौर वर्ष सन्धियाँ।)
4,29,40,80,000 चौदह मन्वन्तर अवधि
+    2,59,20,000 पन्द्रह सन्धि अवधि
----–-------------------
4,32,00,00,000 सायन सौर वर्ष  कल्पावधि।

पहले कृतयुग तुल्य 17,28,000 वर्ष की सन्धि फिर 30,67,20,000 सायन सौर वर्ष का मन्वन्तर फिर 17,28,000 वर्ष की सन्धि फिर 30,67,20,000 सायन सौर वर्ष का मन्वन्तर फिर 17,28,000 वर्ष की सन्धि इस क्रम में चौदह मन्वन्तर होते है। भौतिक सृष्टि में यह जैविक सृष्टि और सन्धि सन्ध्यांश अवधि में जैविक प्रलय होते रहते हैं। यह सृजन प्रलय की कालगणना है।
ब्राह्मदिन यानी कल्प को मनोवैज्ञानिक कालावधि में भी विभाजित किया गया है। जिसे महायुग और युगों में विभाजित किया गया है। क्रमशः व्यक्ति आत्म केन्द्रित होने लगते हैं और धर्म कम होने लगता है और अधर्म बड़ने लगता है। एक सीमारेखा पार होनें पर आपसी संघर्ष इतना बड़ जाता है कि, जनसंख्या बहुत कम बचती है। कुछ विरक्ति और बची हुई जनसंख्या के अनुपात में संसाधन बड़जाने और प्रतिस्पर्धी नही बचने के कारण पुनः धर्म प्रवृत्ति बढ़ने लगती है और कलियुग के अन्त में सतयुग आ जाता है। यही युग व्यवस्था है।
4,32,00,00,000 सायन सौर वर्ष के एक कल्प में 43,20,000 सायन सौर वर्ष के 1000 महायुग होते हैं।
प्रत्येक महायुग में 4:3:2:1 के अनुपात वाली कालावधि 17,28,000ः12,96,000:8,64,000:4,32,000 वर्षावधि वाले कृतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग होते हैं।  1,44,000 वर्ष की सन्धि, फिर 14,40,000 वर्ष का मूल कृतयुग फिर 1,44,000 वर्ष का सन्ध्यांश = कुल17,28,000 सायन सौर वर्ष का कृतयुग होता है। 
कृतयुग में सभी सदाचारी रहते हैं। धर्म शत प्रतिशत रहता है। अतः इसे सतयुग भी कहते हैं। 
इसके बाद मान्सिक दशा परिवर्तन होकर 75% धर्म (और 25% अधर्म) वाला 12,96,000 सायन सौर वर्ष का त्रेता युग रहता है। यह भी 1,08,000 वर्ष सन्धि, फिर 10,80,000 वर्ष का मूल त्रेतायुग फिर 1,08,000 वर्ष का सन्ध्यांश कुल 12,28,000 सायन सौर वर्ष का त्रेतायुग होता है। 
ऐसे ही इसके बाद फिर मान्सिक दशा परिवर्तन होकर 50% धर्म (और 50% अधर्म) वाला  72,000  वर्ष की सन्धि, फिर 7,20,000 वर्ष का मूल द्वापर युग फिर 72,000 वर्ष का सन्ध्यांश सहित कुल 8,64,000 सायन सौर वर्ष का द्वापर युग रहता है।
फिर मान्सिक दशा परिवर्तन होकर 25% धर्म (और 75% अधर्म) वाला 36,000 वर्ष की सन्धि फिर 3,60,000वर्ष का मूल कलियुग फिर 36,000 वर्ष के सन्ध्यांश सहित 4,32,000 सायन सौर वर्ष का कलियुग रहता है। 
पुनः इसी क्रम में मान्सिक दशा परिवर्तन होकर 100% धर्म (और 00% अधर्म) वाला 17,28,000 सायन सौर वर्ष का कृतयुग आजाता है। 
फिरसे मान्सिक दशा परिवर्तन होकर 75% धर्म (और 25% अधर्म) वाला 12,96,000 सायन सौर वर्ष का त्रेता युग आजाता है। 
फिर मान्सिक दशा परिवर्तन होकर 50% धर्म (और 50% अधर्म) वाला 8,64,000 सायन सौर वर्ष का द्वापर युग आजाता है। 
फिर मान्सिक दशा परिवर्तन होकर 25% धर्म (और 75% अधर्म) वाला 4,32,000 सायन सौर वर्ष का कलियुग होजाता है। 
पुनः मान्सिक दशा परिवर्तन होकर शतप्रतिशत धर्म (और शुन्यप्रतिशत अधर्म) वाला 17,28,000 सायन सौर वर्ष का कृतयुग आजाता है।
तदनुसार अभी 36,000 वर्ष की कलियुग सन्धि में से मात्र 5122 सायन सौर वर्ष व्यतीत हुए हैं। और 30880 सायन सौर वर्ष की कलियुग सन्धि व्यतीत होने के बाद मूल कलियुग आयेगा।
हमे तो इस कलियुग सन्धि में ही जीवन दुभर लगता है तो मूल कलियुग कैसा होगा?  उस कलिकाल से तो प्रभु ही बचाए।


सुचना - 1यह वर्णन स्मृतियों, रामायण, महाभारत,  लगभग सभी पुराणों में, सूर्य सिद्धान्त, सिद्धान्त शिरोमणि, संहिताओं आदि ज्योतिष ग्रन्थों में विस्तार से देखा जा सकता है। यहाँ केवल गणीतिय भाग की ही व्याख्या ही प्रस्तुत की गई है।  
2 कुछ आग्रही जन आपत्ति लेंगे कि, पुराणों और सिद्धान्त ग्रन्थों में नाक्षत्रीय वर्ष/ निरयन वर्ष के स्थान पर सायन वर्ष क्यों लिखे गये? 
इसका उत्तर यह है कि, प्राचीन ग्रन्थों में जहाँ भी मानवीय वर्ष का उल्लेख है या व्रत, पर्वोत्सवों का वर्णन है उनको सदैव अयन और ऋतुओं से सम्बन्धित बतलाया गया है।ऋतु और अयन सायन गणना से ही सिद्ध होते हैं निरयन या नाक्षत्रीय गणना से नही। नाक्षत्रीय/ निरयन सौर संवत्सर से सदा जन्माष्टमी वर्षा ऋतु में नही आ सकती, और न रामनवमी वसन्त में। न आषाढ़ मास में होनें वाले कोकिला व्रत में सदा कोयल की आवाज सुन कर व्रत खोलना सम्भव है। क्योंकि, साढ़े छः हजार वर्ष में ये व्रतोत्सव तीन मास (एक/दो ऋतु) पहले और तेरह हजार वर्ष में छः माह (तीन ऋतु) पहले होनें लगेंगे।
इसी कारण शास्त्रों में कहीँ माघ मास से संवत्सर आरम्भ बतलाया जाता है तो कहीँ, मार्गशीर्ष मास से तो कहीँ कार्तिक मास से तो कहीँ वैशाख मास से तो वर्तमान में चैत्र मास से आरम्भ होता है। ऐसे ही कहीँ कृतिका को प्रथम नक्षत्र मानते हैं तो कहीँ मघा को तो कहीँ, धनिष्टा को तो कहीँ चित्रा को और वर्तमान में अश्विनी को प्रथम नक्षत्र मानते हैं। ये सब प्रमाण सायन सौर वर्ष को ही मानव वर्ष मानने के प्रमाण है। लेकिन यह तथ्य केवल सिद्धान्त ज्योतिष गणिताध्याय और गोलाध्याय के जानकार (एस्ट्रोनॉमर्स) ही समझ पायेंगें। जिनको एस्ट्रोनॉमी (सिद्धान्त ज्योतिष) की जानकारी और समझ ना हो कृपया वे दिमाग को कष्ट न दें।

बुधवार, 18 अगस्त 2021

विक्रम संवत 136 में शकाब्द का आरम्भ होना एक अद्भुत घटना।

महाराज नाबोवाहन ने पञ्जाब- हरियाणा के मालव प्रान्त से आकर (भोपाल के निकट सोनकच्छ से लगभग २० कि.मी. दर) गंधर्वपुरी को राजधानी बनाया था। बाद में नाबोवाहन के पुत्र गन्धर्वसेन गन्धर्वपुरी के राजा हुए। जिन्हें महेन्द्रादित्य भी कहा जाता था। उनकी पत्नी सोम्यदर्शना थी जिनका अन्य नाम वीरमती था।
भृतहरि और विक्रमादित्य के पिता गन्धर्व पूरी के शासक  गन्धर्वसेन कट्टर वेदिक धर्मावलम्बी और विष्णु भक्त थे। इस कारण जैन आचार्य महेसरा सूरी उनसे रुष्ट थे। जैन आचार्य महेसरा सूरी/ कालक आचार्य ने अफगानिस्तान तक पैदल जाकर शक राजा/ कुषाण क्षत्रप के दरबार में गंधर्वसेन के विरुद्ध गुहार लगाई तथा उज्जैन पर आक्रमण हेतु आमन्त्रित किया। शक शासक/ कुषाण क्षत्रप ने महाराज गन्धर्वसेन पर अनेक अत्याचार किये परिणाम स्वरूप गंधर्वसेन की मृत्यु जंगल में होगई। जैन ग्रन्थों में गन्धर्वसेन को गर्दभिल्ल, गदर्भ भिल्ल, गदर्भ वेश भी कहा गया है।
जैनाचार्य ने अफगानिस्तान तक पैदल यात्रा कर गन्धर्व पूरी के राजा गन्धर्व सेन पर आक्रमण करनें के लिए शकराज को आमन्त्रित किया। गन्धर्व सेन के पुत्र भृतहरि की पत्नी को पर भ्रष्टकर भृतहरि को नाथ सम्प्रदाय में सम्मिलित करने की कुटिल चाल तान्त्रिकों ने चली। बौद्धाचार्यों वें चन्द्रगुप्त द्वितीय के भाई रामगुप्त के विरुद्ध चीन के शकराज को समर्थन दिया और समझोते में रामगुप्त की पत्नी ध्रुव स्वामिनी को शकराज के हवाले करनें का दुष्ट समझोता करवाया। जिसे चन्द्रगुप्त (द्वितीय) ने असफल कर शकराज का वध किया।
इस प्रकार वास्तविक विक्रमादित्य और चन्द्रगुप्त द्वितीय में अन्तर स्पष्ट कर मूल विषय पर आते हैं।

विक्रम संवत पञ्जाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और उड़िसा  में नक्षत्रीय वर्ष के रूप में  निरयन मेष संक्रान्ति (वर्तमान में 14 अप्रेल) से आरम्भ होता है।
यही विक्रम संवत गुजरात में निरयन सौर संस्कृत चान्द्र वर्ष के रूप में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होता है।
मालवा क्षेत्र (मःप्र) में यही विक्रम संवत निरयन सौर संस्कृत चान्द्र वर्ष के रूप में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होता है।

इन तीनों में सम्राट विक्रमादित्य द्वारा प्रचलित विधान अनुसार कौनसी परम्परा सही है इसका प्रमाण प्रायः अनुपलब्ध है।
किन्तु पञ्चाङ्गों में सर्वसम्मत मत से लिखा जाता है कि विक्रम संवत की प्रचलन अवधि मात्र 135 वर्ष ही रही । विक्रम संवत 135 व्यतीत होते ही विक्रम संवत 136 के (लगभग) आरम्भ में गान्धार क्षेत्र के पुरुष्पुर जिसका वर्तमान नाम  पैठण (पाकिस्तान) है और उत्तर भारत के मथुरा (उत्तर प्रदेश) में कुषाण वंश के क्षत्रप  (राजा) कनिष्क  और पैठण महाराष्ट्र में शालिवाहन / सातवाहन वंश के राजा गोतमीपुत्र  सातकर्णी नें शालिवाहन शक केलेण्डर प्रचलित कर दिया। जो निरयन सौर संस्कृत चान्द्र वर्ष के रूप में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होता है।
यदि विक्रम संवत भी निरयन सौर संस्कृत चान्द्र वर्ष के रूप में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होता होता तो शायद केवल संवत्सर का नाम बदलने की इतनी आवश्यकता नही थी। किन्तु कुषाणों में पहले से प्रचलित प्रणाली को भारत में लागू करनें के उद्देश्य से शक केलेण्डर लागु किया गया हो मह सम्भव है। जिसमें सासों के   परम्परागत भारतीय नाम होनें से जनता ने सहज स्वीकार कर लिया हो। सम्भव है कुशाणों के प्रभाव में सातवाहनों नें भी अपनें क्षेत्र में यही प्रणाली लागु कर दी हो।
यह प्रणाली आज तक प्रचलित है।  जैसा कि, पञ्चाङ्गों में लिखा जाता है कि, यह प्रणाली और शकाब्द अठारह हजार वर्ष तक चलेगा। भँलेही अठारह हजार वर्ष न  भी चले किन्तु दो हजार वर्ष तो चल ही गया। और भारत सरकार नें सायन सौर केलेण्डर के साथ आगे भी चलना सुनिश्चित कर दिया।
उल्लेखनीय है कि, 1 शक संभवतः उत्तरी चीन तथा यूरोप के मध्य स्थित झींगझियांग प्रदेश के निवासी थे। कुषाणों एवं शकों का कबीला एक ही माना जाता है
पश्चिमी चीन के गांसु प्रदेश में जिउक्वान शहर क्षेत्र में  डुहुआंग नगर,  उत्तर अक्षांश 40 ° 08″32"  N और पुर्व देशान्तर  94 ° 39 '43" E  पर स्थित डुहुआंग नगर, (डुनहुआंग नगरपालिका क्षेत्र) को युझी जाती  का मूल स्थानों में से एक माना जाता है। अर्थात कनिष्क आदि  (भारतीय शकों) का मूल स्थानों में से एक माना जाता है।
3 शक प्राचीन मध्य एशिया में रहने वाली स्किथी लोगों की एक जनजाति या जनजातियों का समूह था, जो सीर नदी की घाटी में रहता था
 4 (आर। ५२२-४८६ ईसा पूर्व) के शासनकाल के लिए , कहा जाता है कि शक सोग्डिया की सीमाओं से परे रहते थे। [४४] इसी तरह ज़ेरक्सस I
5 (आर। ४८६-४६५ ईसा पूर्व) के शासनकाल के एक शिलालेख ने उन्हें मध्य एशिया के दहे लोगों के साथ जोड़ा है । 
6 सोग्डियन क्षेत्र आधुनिक उज्बेकिस्तान में समरकंद और बोखरा के आधुनिक प्रांतों के साथ-साथ आधुनिक ताजिकिस्तान के सुगद प्रांत से मेल खाता है
मध्य चीन के तुर्फन के आसपास युएझी प्रान्त के निवासी युएझी कहलाते थे। वे लोग विजेता के रुप में पहले पश्चिम में ईली नदी पर पहूँच कर अकसास नदी की घाँटी घाँटी पामिर पठार की ओर फिर दक्षिण में हिन्दूकुश पर्वत, ईरान, अफगानिस्तान होते हुए सिन्ध में तक्षशिला,पञ्जाब होते हुए मथुरा तक पहूँच गये। गुर्जरों के कषाणा वंश या कसाणा कबीले को आत्मसात कर कोसोनो कहलाते थे तथा गुसुर कबिले के समान थे। भारत में कुषाण कहलाये । इनने पहले ग्रीक भाषा, फिर बेक्ट्रियाई भाषा और अन्त में पुरानी गुर्जर गांन्धारी और फिर संस्कृत भाषा अपनाई। तथा भारत में गुर्जर के रुप में भी प्रसिद्ध हुए।

इसी कुषाण वंश का सबसे प्रसिद्ध राजा कनिष्क हुआ। जिसका जन्म गान्धार प्रान्त के पुरुषपुर (पेशावर) में (वर्तमान पाकिस्तान) में 98 ई.पू. में हुआ। और निधन 44 ई. मे हुआ। इसकी राजधानी पेशावर थी एवम् उप राजधानी कपिशा (अफगानिस्तान) और मथुरा उ.प्र. भारत) को बनाया। तथा मथुरा से अफगानिस्तान, दक्षिणी उज़्बेकिस्तान , ताजिकिस्तान से लेकर मध्यचीन के तुर्फन तक फैला था। जन्मसे यह सनातन धर्मी था किन्तु बाद में बौद्ध धर्म अपना लिया। अफगानिस्तान तथा चीन में महायान बौद्धधर्म फैलाने में विशेष योगदान दिया।

चीन में प्रचलित उन्नीस वर्षिय चक्र वाला सायन सौर संस्कारित चान्द्र केलेण्डर कुषाणों में प्रचलित था।इससे मिलता जुलता उन्नीस वर्षीय चक्र मिश्र और मेसापोटामिया में भी प्रचलित था।  इसी का भारतीय स्वरुप उन्नीस वर्ष, एकसौ बाईस वर्ष और एक सौ एकतीस वर्षिय चक्र वाला निरयन सौर संस्कारित चान्द्र केलेण्डर कनिष्क ने ही उत्तर भारत तथा गुजरात में तथा दक्षिण में महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश के अलावा मध्यप्रदेश, और पुर्वी, दक्षिणी गुजरात में सातवाहन या शालिवाहन वंशी गोतमीपुत्र सातकर्णि ने प्रचलित किया। यह संवत उत्तर भारत में कनिष्क के सत्त्तारूढ़ होने की खुशी में और दक्षिण भारत में शकों पर शालिवाहन गोतमीपुत्र सातकर्णि की विजयोपलक्ष्य में इस्वी सन 78 में विक्रम संवत 135 में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से लागु किया गया।


शुक्रवार, 13 अगस्त 2021

सेवा या मुर्तिपूजा धर्मानुसार उचित क्या है।

मूल धर्म तो सेवा ही है। मुर्तिपूजा कदापि धर्म नहीं हो सकता। सर्वव्यापी परमात्मा को सीमित (एकदेशी), और साकार बतलाना धर्म कैसे हो सकता है। सर्वव्यापी परमात्मा को परम आत्म (अपना वास्तविक स्वरूप) समझने -माननें वाले अपनें इष्ट को किसी मुर्ति में सीमित कर उसके प्रति प्रेम-भाव कैसे रख सकते हैं।

वेदों में मूर्तिपूजा निषिद्घ थी।  (यजुर्वेद ३/३२ में) तस्य प्रतिमा अस्ति कहने वाले और (ऋग्वेद में) शिश्नेदेवाः (लिङ्गपूजक) की छाँव पड़नें पर यज्ञ बन्दकर पुनः शुद्धिकरण करनें के पश्चात ही यज्ञ आरम्भ करने वाले, ब्रह्मर्षियों के आर्ष ब्राह्म धर्म में मुर्ति पूजन की तो कल्पना भी नही थी। वैदिक काल में तो पूजा का मतलब सेवा ही होता है।

मातृदेवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव, अतिथि देवो भव मानने वाले, सूर्य को अर्घ्य देनें वाले, अग्नि को परमात्मा का मुख मानकर देवताओं के लिए अग्नि में हविष्य की आहुति देकर स्वाहा (स्व / अहंकार का हनन्) करने वाले धर्म में, मुर्ति पूजा की तो कल्पना भी नही थी। 

वैदिक परम्परा में प्रवृत्ति मार्ग और निवृत्ति मार्ग ये दो जीवन पद्यति थी। ये दोनो ही वैदिक मार्ग थे। उस समय देव, असुर और मानव तीनों जातियों के गुरु प्रजापति ही थे।
छान्दोग्योपनिषद् में अष्टम अध्याय, सप्तम खण्ड से द्वादश खण्ड तक में आत्मज्ञान प्राप्ति के लिए देवराज इन्द्र  और असुरराज विरोचन द्वारा प्रजापति के पास जाना, उनके निर्देश पर इन्द्र ने १०१ वर्ष तप कर प्रजापति से पूर्ण आत्मज्ञान प्राप्त करना किन्तु,  विरोचन द्वारा मात्र ३२ वर्ष तप कर अल्प जानकारी प्राप्त कर ही सन्तुष्ट होकर लौट जाने का विस्तृत वर्णन है।तथा छान्दोग्योपनिषद् में अष्टम अध्याय,पञचदश खण्ड में स्पष्ट कहा गया है कि, हिरण्यगर्भ ब्रह्मा द्वारा प्रजापति को आत्मज्ञान दिया। प्रजापति ने स्वायम्भुव  मनु को आत्मज्ञान का उपदेश दिया।
अर्थात वैदिक काल में देवताओं, मानवों और असुरों के सर्वमान्य गुरु प्रजापति ही थे।
वृहदारण्यकोपनिषद पञ्चम अध्याय, द्वितीय ब्राह्मण मन्त्र १से ३ प्रजापति ने बोला, देवताओं ने न इन्द्रिय दमन करना चाहिए, मानवों नें दान करना चाहिए, और असुरों ने दया करना चाहिए उपदेश ग्रहण किया। उक्त वर्णन से स्पष्ट है कि देवता, मानव और असुर तीनों ही प्रजापति को ही गुरु मानते थे। 
छान्दोग्योपनिषद् और वृहदारण्यकोपनिषद में कई बार प्रजापति द्वारा आत्मज्ञान उपदेश प्रकरण आये हैं। इससे सिद्ध है कि, पहले सभी वेदमार्गी ही थे। पुराणों को भी स्वीकार है कि, प्रहलाद जी असुर होते हुए परम वैष्णव थे। जैन परम्परा भी मानती है कि, ऋषभदेव जी तक तो केवल वैदिक धर्म ही था। ऋषभदेव जी के बाद श्रमण परम्परा आरम्भ हुई।

वैवस्वत मन्वन्तर में में शंकरजी द्वारा तन्त्र मार्ग की खोज कर नवीन पन्थ चला दिया।  कुछ वेद विरोधी मानवों, यक्षों, असुरों, दैत्यों और दानवों ने तन्त्र मार्ग अपनाया। शंकर जी, विश्वरूप, वत्रासुर, दत्तात्रेय, शुक्राचार्य, (शुक्राचार्य का पुत्र) त्वष्टा, कार्तवीर्य सहस्त्रार्जून, रावण, (जीवन के पूर्वार्द्ध में विश्वामित्र भी) जैसे लोग सर्वप्रथम तान्त्रिक हुए। 

वेदमार्ग में प्रवृत्ति मार्ग (वर्णाश्रम व्यवस्था)  और निवृत्ति मार्ग की पुष्टि भी वैदिक संहिताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों-आरण्यकों-उपनिषदों के आख्यानों से होती है। 
बादमें कुछ वेद विरोधी लोगों ने वैदिक निवृत्ति मार्ग को श्रमण परम्परा में परिवर्तित कर दिया। अवैदिक श्रमणों (जैन, बौद्ध और नाथों) नें तन्त्र मार्ग अपनाया। इन तान्त्रिकों नें मुर्तिपूजा आरम्भ की। ये लोग यक्षों को उपास्य मानकर, यक्ष- यक्षिणियों की पूजा-अर्चना करते हैं।

शंकर जी के शिष्य शुक्राचार्य थे। शुक्राचार्य जी ने शैवपन्थ चलाया। शंकरजी को संन्यासी मान कर शैवों में श्रमण परम्परा विकसित हुई। ये लोग शंकरजी को संन्यासी मानते हैं। शुक्राचार्य के पुत्र त्वष्टा ने शाक्त पन्थ की स्थापना शैव पन्थ की ही शाखा रूप में की। शाक्त पन्थ घोर तान्त्रिक पन्थ है। शाक्त पन्थ का मुख्य गड़ युनान के निकट क्रीट द्वीप रहा। फिर वहाँ से ही उत्तर पूर्वी भारत में और तिब्बत में और बाद में चीन तक फैला।  गाणपत्य सम्प्रदाय और कार्तिकेय सम्प्रदाय शैवों की ही शाखा है। चन्द्रवंशियों में दत्तात्रेय ने  घोर तान्त्रिक शाक्तपन्थ का प्रचार किया। दत्तात्रेय के शिष्य कार्तवीर्य सहस्त्रार्जून और रावण थे। इन लोगों ने पिशाचों और पिशाचीनियों की पूजा-अर्चना आरम्भ की।

सीरिया, मेसापोटामिया, असीरिया, बेबीलोन (इराक), सऊदी अरब,यमन, मिश्र, युनान, क्रीट, उत्तर अमेरिका महाद्वीप, दक्षिण अमेरिका महाद्वीप में मुर्तिपूजा पहले से प्रचलित थी। भारतीय तान्त्रिकों ने भी सीरिया, मेसापोटामिया, असीरिया, बेबीलोन (इराक), सऊदी अरब, यमन, मिश्र, युनान, क्रीट से मुर्ति पूजा सीखी थी। 
मुर्तिपूजा और मन्दिर निर्माण सर्वप्रथम जैनों और फिर बौद्धों नें आरम्भ किया। फिर शाक्त और शैवपन्थी बाबाओं नें अपने आश्रमों में मुर्तियाँ रखना शुरू की जिससे उनके सनातनधर्मी अनुयायियों में मुर्तिपूजा प्रचलित हुई। सबसे अन्त में पुष्यमित्र शुङ्ग के बाद वैष्णवाचार्यों वें मुर्तिपूजा अपनाई। विशेषकर गुप्तकाल में मुर्तिपूजा का बहुत प्रचार हुआ। बहुत से मन्दिर बनाये गये।
चूँकि, मुर्तिपूजा का गड़ मध्य एशिया, पश्चिम एशिया,  पूर्वी युरोप और मिश्र था इसलिए मुर्तिपूजा का विरोध भी इब्राहिम द्वारा मध्य एशिया और पश्चिम एशिया में ही आरम्भ किया। भारत में केवल तान्त्रिक लोग ही दबे छुपे अपने क्रियाकलाप करते थे और वैदिक इनके कट्टर विरोधी थे। इसलिए जब-तक मुर्तिपूजा का व्यापक चलन नहीं हुआ, तब तक विशेष विरोध भी नहीं हुआ। इब्राहिमी पन्थ अर्थात यहुदी, ईसाई और इस्लाम मत के आगमन तक यहाँ मुर्तिपूजा व्यापक स्तर पर प्रचलित हो गई थी। अतः इस्लाम के प्रभाव से कबीर पन्थियों और उनके ही अनुयाई नानक पन्थियों ने प्रथम बार मुर्तिपूजा विरोधी रुख अपनाया। बाद में सनातन धर्म में ही दयानन्द सरस्वती ने मुर्तिपूजा विरोध किया।
 मुर्तिपूजा के दोष - 
सर्वव्यापी को सीमित बतलाना। निराकार को आकार देना। परमात्मा को परम आत्म मानकर परमात्मा से प्रेम करनें के स्थान पर ईश्वर से डरो का प्रचार होना। परमात्मा के स्थान पर देवी-देवताओं को इष्ट मानकर अनेकानेक सम्प्रदायों में बँटना। और फिर अन्तर्विरोध, मनमुटाव, और द्वन्द उत्पन्न होना।
मन्दिर में देवता के सम्मुख भय मानकर सदाचारी रहना और मन्दिर के बाहर देवताओं की अनुपस्थिति मानकर निर्भिक होकर मनमाना दुराचरण, व्यभिचार करना। प्रतिमा भञ्जकों की कोई हानि न होते देख नास्तिकता का उदय होना और मुर्ति भञ्जकों का पन्थ अपनाना।आदि,-आदि।
जबसे सनातन धर्मियों नें वेदमार्ग के विरुद्ध जाकर तन्त्रोक्त मुर्तिपूजा अपनाई तभी से सनातन धर्म पतनोन्मुखी होगया। वर्ण व्यवस्था जातिप्रथा में बदल गई, गुरुकुल समाप्त हो गये।  वेदों में अधिक से अधिक धनार्जन सामाजिक और राष्ट्रीय कर्तव्य बतलाया गया है। जबकि पौराणिक धनार्जन को गौण बतलानें लगे। वेदों में आताताइयों, आक्रमणकारियों को येन-केन प्रकारेण नष्ट करनें के निर्देश होनें और धनुर्विद्या/ धनुर्वेद को उपवेद कहनें वाले धर्म में- दुष्ट, आक्रमणकारियों द्वारा बचने के लिए पीठ दिखानें पर,  गौ, ब्राह्मण, स्री, बालक, कमजोर को ढाल बनाकर छलने वालों को, शरणाङ्गत होनें वालों को अभयदान देनें का पाठ पढ़ाया जाने लगा। और बौद्धों और जैनों ने इसे अहिंसा से जोड़ दिया। जबकि यह अहिंसा नहीं आत्मघात है, राष्ट्रद्रोह है।
अब आप कहेंगे इन सबका मुर्ति पूजा से क्या सम्बन्ध?
इसका उत्तर है कि, मुर्तियो में ही भगवान देखने वाले, मुर्तियों को भगवान मानने वाले, मुर्तियों के सामने  नाच गा कर भगवान को रीझानें वाले स्वयम् को भक्त कहने लगे। जबकि पञ्चमहायज्ञ, अष्टाङ्गयोग, आत्मज्ञान और मौक्ष पुरुषार्थ को स्वार्थ और गौण आराधना कहकर अपमानित करनें लगे।
 मुर्तिपूजकों को उक्त अहिंसा इतनी रास आई कि, उन्होनें  (मुर्तिपूजकों ने) युद्ध करना, युद्धकला,  अस्श-शस्त्रार्थ संचालन सीखने और अभ्यास करनें हेतु आखेट को हिन्सा करार देकर निन्दनीय घोषित कर दिया। 
मुर्ति पूजा समर्थकों ने पुराण रचकर  इन्द्रादि वैदिक देवताओं और महाविज्ञानी ऋषियों को कामुक, ईर्ष्यालु, भीरु (डरपोक) घोषित कर दिया। जबकि वेदों में इन्द्र को जिष्णु, अजेय कहा है। ऋषियों को सदाचारी और व्रतधारी कहा है। पौराणिकों और मुर्तिपूजकों नें क्षत्रियों, राजा- महाराजाओं को मन्दिर निर्माण में संलग्न कर दिया और राष्ट्र रक्षा के कर्तव्य से विमुख कर दिया। परिणाम स्वरूप राजा- महाराजा रासरङ्ग में डुब गये।
मुर्ति पूजक तन्त्र मार्गियों के राष्ट्रद्रोह के कुछ उदाहरण --
महाराज नाबोवाहन ने पञ्जाब- हरियाणा के मालव प्रान्त से आकर (भोपाल के निकट सोनकच्छ से लगभग २० कि.मी. दर) गंधर्वपुरी को राजधानी बनाया था। बाद में नाबोवाहन के पुत्र गन्धर्वसेन गन्धर्वपुरी के राजा हुए। जिन्हें महेन्द्रादित्य भी कहा जाता था। उनकी पत्नी सोम्यदर्शना थी जिनका अन्य नाम वीरमती था। गन्धर्वसेन के पुत्र राजा भृतहरि और विक्रमादित्य हुए। विक्रमादित्य ने ही शकों को पराजित कर विक्रम संवत चलाया था।
भृतहरि और विक्रमादित्य के पिता गन्धर्व पूरी के शासक  गन्धर्वसेन कट्टर वेदिक धर्मावलम्बी और विष्णु भक्त थे। इस कारण जैन आचार्य महेसरा सूरी उनसे रुष्ट थे। जैन आचार्य महेसरा सूरी ने उज्जैन से अफगानिस्तान तक पैदल जाकर शक राजा/ कुषाण क्षत्रप के दरबार में गंधर्वसेन के विरुद्ध गुहार लगाई तथा गन्धर्वपपूरी और उज्जैन पर आक्रमण हेतु आमन्त्रित किया। शक शासक/ कुषाण क्षत्रप ने महाराज गन्धर्वसेन पर अनेक अत्याचार किये परिणाम स्वरूप गंधर्वसेन की मृत्यु जंगल में होगई। जैन ग्रन्थों में गन्धर्वसेन को गर्दभिल्ल, गदर्भ भिल्ल, गदर्भ वेश भी कहा गया है।
जैनाचार्य ने अफगानिस्तान तक पैदल यात्रा कर गन्धर्व पूरी के राजा गन्धर्व सेन पर आक्रमण करनें के लिए शकराज को आमन्त्रित कर देशद्रोह किया। 
तान्त्रिकों ने गन्धर्व सेन के पुत्र भृतहरि की पत्नी को पथ भ्रष्टकर भृतहरि को पत्नी और संसार के प्रति घृणा भाव पैदा कर नाथ सम्प्रदाय में सम्मिलित करने की कुटिल चाल (तान्त्रिकों) ने चली। 
बौद्धाचार्यों वें चन्द्रगुप्त द्वितीय के भाई रामगुप्त के विरुद्ध चीन के शकराज को उकसा कर आक्रमण का निमन्त्रण दिया और शकराज के विजयी होनें पर समझोते में रामगुप्त की पत्नी ध्रुव स्वामिनी को शकराज के हवाले करनें का दुष्ट समझोता करवाया। जिसे चन्द्रगुप्त (द्वितीय) ने असफल कर शकराज का वध किया।
इस प्रकार अपने राजाओं का विरोध, अपनें राजाओं को कमजोर करना, और अपने राज्य और राजाओं की कमजोरियाँ विदेशियों को बतलाना और उन्हें भारतीय राज्यों पर आक्रमण का निमन्त्रण देकर देशद्रोही कार्य किये।
मुर्तिपूजक तान्त्रिकों, पौराणिकों, जैनों, बौद्धों के द्वारा कमजोर किये गये राष्ट्र पर पारसियों, चीनियों, शक, हूण, बर्बर, और इब्राहिमी (ईसाई/ मुस्लिम) आक्रमणकारियों द्वारा विजित करना बहुत आसान हो गया।
भारत राष्ट्र और वैदिक धर्म को हानि पहूँचानें में मुर्तिपूजा के परम समर्थक  तान्त्रिकों, पौराणिकों, जैनाचार्यों, बौद्धाचार्यों का भरपूर योगदान रहा। 

इस प्रकार परहित को परम धर्म बतलाने वाले, सर्वव्यापी परमात्मा के उपासक धर्म में मुर्तिपूजा आ गई। और पञ्चमहायज्ञ, अष्टाङ्गयोग और आत्मज्ञान प्रधान मूल वैदिकधर्म को मूर्तिपूजक बना दिया।
फिर मुर्ति भञ्जकों द्वारा मुर्ति भञ्जन कर उनकी आस्था को चकनाचूर कर दिया। परिणाम स्वरूप वे इब्राहिमी ईसाई या मुसलमान बन गये।
आज पञ्चमहायज्ञ, अष्टाङ्गयोग और आत्मज्ञान प्रधान मूल वैदिक धर्मावलम्बी नगण्य ही बचे हैं। इतनी हानियाँ मुर्तिपूजा से हुई। क्या ये कम हैं?
अतः धार्मिक दृष्टि से मुर्तिपूजा को कहीँ से कहीँ तक उचित नहीं ठहराया जा सकता। सेवा ही उचित है।
पञ्चमहायज्ञ,अष्टाङ्गयोग और आत्मज्ञान पूर्वक सदा सर्वदा परमात्मा का स्मरण बनाते रखते हुए हर क्षण जगत की सेवा हेतु तत्पर रहना ही धर्म है।
एडिट -
एक सुझाव आया है कि, पञ्चदेवोपासना तथा श्रीमत् शंकराचार्य महाभाग की मुर्तिपूजा पर प्रकाश डाला जाये।
भगवान आदि शंकराचार्य जी के उपदेशामृत से प्रभावित हो जैन मत त्याग कर वैदिक मत में लौटने वाले राजा सुधन्वा के ताम्रपत्र में अंकित उल्लेखानुसार के अनुसार शंकराचार्य जी का जन्म युधिष्ठिर संवत २६३१ में अर्थात ई. पू. ५०७ में हुआ एवम् देहत्याग युधिष्ठिर संवत २६६३ अर्थात ई. पू. ४७५ में हुआ। अर्थात आज के २५२८ से २४९६ वर्ष पूर्व का है जो शंकराचार्य जी का काल सनातन धर्म के आधार स्तम्भ वेद, ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक, उपनिषद, उपवेद, वैदाङ्ग, तो ठीक षडदर्शन, रामायण से ही नही महाभारत और विष्णु पुराण तक की तुलना में अति आधुनिक है। 
शंकराचार्य जी का स्वयम् का मुख्य लक्ष्य अद्वैत वेदान्त मत की स्थापना था। न कि, कर्मकाण्ड की पुनर्स्थापना। कर्मकाण्ड की पुनर्स्थापना का कार्य आचार्य कुमारिल भट्ट और उनके शिष्य मण्डन मिश्र कर रहे थे। जिनमें से आचार्य कुमारिल भट्ट तुषाराग्नि में प्रवेश कर चुके थे। और मण्डल मिश्र को शास्त्रार्थ में पराजित कर उनसे कर्मकाण्ड का त्याग करवा कर संन्यास की दीक्षा दे दी। इससे स्पष्ट है कि, पञ्चमहायज्ञ, अष्टाङ्ग योग, कर्मकाण्ड और आराधना-उपासना का महत्व शंकराचार्य जी की दृष्टि में गौण था एवम् मनुष्य के सोच-विचार, मानसिकता मुख्य थी। इसी को बदलना शंकराचार्य जी का लक्ष्य था। इसलिए योग, कर्मकाण्ड की क्रियाओं, आराधना-उपासना के क्षेत्र में प्रचलित परम्पराओं को यथावत रखते हुए, अद्वैत वेदान्त दर्शन अपनाने पर ही जोर दिया।
उस समय कई सम्प्रदाय प्रचलित थे। वे आपस में झगड़ते रहते थे, इसलिए शंकराचार्य जी ने मुख्यरूप से प्रचलित प्राचीन वैष्णव मत, सवितृ सावित्री या ब्रह्म सावित्री के रूप में वैदिक परम्परा का पौराणिक स्वरूप सौरमत और शैव मत को ही मुख्यता देते हुए तीन मतों को ही प्रधानता दी थी। किन्तु तान्त्रिकों को ध्यान रखते हुए शाक्त मत को भी स्वीकारना और बाद में महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु से गाणपत्यों को स्वीकरते हुए पञ्चदेवोपासना स्वीकारी। किसी एक को इष्ट मानकर शेष चारों को भी स सम्मान पूजना प्रचलित करवा दिया। उनके समय मुर्तिपूजा प्रतिष्ठित हो चुकी थी। बौद्धों और जैनों से पुनः वैदिक मत में आनें वालों को तो मुर्तिपूजा की लय लग चुकी थी। अस्तु उनको भी स्वीकारते हुए स्वयम् भी दाक्षिणात्य शैल पूजन विधि अपनाई।
अतः शंकराचार्य जी मुर्तिपूजा करते थे और शंकराचार्य जी ने पञ्चदेवोपासना प्रचलित की अस्तु यह कोई प्रमाण नहीं हो जाता।