शनिवार, 23 मई 2020

*अवतार और देवांश*


 *अवतार सम्बन्धित देवता के गुण, स्वभाव का प्रतिनिधि है तो देवांश जेनेटिक पुत्र है।* 

 *अवतरण मतलब उतरना* --

जब कोई बुद्धियोगी तुरीय अवस्था में अष्टाङ्ग योग की सर्वोच्च या उच्चतम अवस्था संयम पर पहूँचने में सिद्ध हो जाता है और  वह सकल जगत कल्याण हेतु अपने प्रारब्ध पुर्ण होनेतक लोकसंग्रह कार्यार्थ स्वयम् को निवेष करता है।
 
जन्मजात  बुद्धियोगी सिद्ध  होते हुए भी  अगले जन्म में एक साधारण व्यक्ति की भाँति हो जीवन यापन कर ऋत द्वारा नियत कार्य सिद्ध करता है।
तो उस ज्ञानि का तुरीयावस्था में ही रहते हुए भी जन साधारण में उनके ही समान दिखता हुआ लोकसंग्रह अर्थात लोक कल्याणकारी कर्म करता है तो वह अवतार कहलाता है।
सिद्धि के तारतम्य के अनुसार इनकी कला निर्धारित होती है। तथा प्रयोजन के अनुसार

 जिन सिद्ध बुद्धियोगियों के प्रारब्ध भोग सिमित  होते हैं, वे कम समय के भूमि पर रहते हैं। जैसे मत्स्यावतार, कुर्मावतार, वराह अवतार, और नृसिह अवतार। इन्हे आवेशावतार भी कहते हैं।
 किसी व्यक्ति में किसी देवता का आवेश आने को भी आवेशावतार कहते हैं । जैसे आदि शंकराचार्य के शिष्य पद्मपादाचार्य को तान्त्रिक से शंकराचार्य जी की रक्षार्थ नृसिंह आवेश हुआ था ।


जिन सिद्ध बुद्धियोगियों के प्रारब्ध इतने अधिक होते हैं कि अवतार का दायित्व पुर्ण होनें के पश्चात भी वे भूमि पर चिरञ्जीवी रहते हैं।जैसे परशुराम जी और हनुमान जी।
प्रायः इन्है अंशावतार भी कहते हैं। जबकि महा तपस्वी महर्षि नारायण के अगले जन्म में श्रीकृष्ण के रुप में जन्में अकेले ही षोडषकलात्मक पुर्ण अवतार कहेगये हैं । अर्थातश्रीकृष्ण को छोड़ सभी अंशावतार ही थे। श्रीराम भी द्वादशकलात्मक अंशावतार थै।

हनुमानजी रुद्र के अवतार होते हुए भी वायु पुत्र होनें से पवनांश भी कहलाते हैं।  दुष्टदलन राक्षसों के प्रति रौद्ररूप होनें से रुद्रावतार भी कहलाते हैं।और श्री रामभक्त होनें से रघुनाथ कला भी कहलाये।
बालि सुर्यपुत्र होनें से सुर्यांश, सुग्रीव इन्द्रपुत्र होनें से इन्द्रांश, जामवन्त जी दक्ष प्रजापति ब्रह्मा (प्रथम )  के पुत्र होनें से ब्रह्मांश कहलाते थे।

कर्ण सुर्यपुत्र होने से सुर्यांश कहलाते हैं   युधिष्ठिर धर्म के पुत्र होने सें  धर्मांश कहलाते हैं। ऐसे ही भीम वायु पुत्र वातांश/ पवनांश कहाते हैं। अर्जुन इन्द्रपुत्र होनें से इन्द्रांश कहलाये आदि आदि।
मतलब किसी देवता का पुत्र उस देवता का देवांश कहलाता है। 
उपनिषदों में तो समान्य मानव को भी पिता का अंश और पिता का ही दुसरा जन्म कहा गया है।
अतः देवांव मतलब देवपुत्र। तो हनुमानजी पवनांश और रुद्रावतार हुए  दोनों हैं।अवतार सम्बन्धित देवता के गुण, स्वभाव का प्रतिनिधि है तो देवांश जेनेटिक पुत्र है।
वायु के अभिमानी देवता का औरस पुत्र वातांश/ पवनांश और शंकर के समान भक्ति में लीन, दुनियादारी से दूर  भोले भाले (ब्रह्मचारी), बलीष्ट और वीर होते हुए भी अपनेआप में मस्त और निरभिमानी किन्तु राक्षसों का काल, दुष्टों का दमन करनें वाला, अपराध का दण्डदेनें वाला होनें से शंकर सुवन रुद्रावतार हनुमान जी वायुपुत्र वातांश थे। यह सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।

सोमवार, 18 मई 2020

एक रुद्र, एकादश रुद्र, एकादश रुद्रगण, तथा अनेक रुद्र

एक रुद्र से ग्यारह रुद्र तथा एकादश रुद्रगण और फिर अनेक रुद्र का यथार्थ।
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के रोष से नीललोहित वर्णी, अर्धनारीश्वर एक रुद्र हुआ जिसे कालान्तर में पशुपति का पद दिया।
यह एकरुद्र पशुपति यथा आवश्यकता अपना पुरुष रूप और स्त्री रूप अलग - अलग कर सकता था। इन्हें ही शङ्कर   कहते हैं। जिन्हें शंकर और उमा कहा जाता है।
पुरुष रूप शंकर ने और स्त्री रूप उमा ने स्वयम् को दस दस भागों में प्रकट किया। चुँकि, प्रजापति और एकरुद्र (शंकर- उमा) दोनों ही हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की उत्पत्ति है अतः समकक्ष है। लेकिन पहले उत्पन्न होने के आधार पर वरिष्ठता क्रम में एकरुद्र वरिष्ठ होगये। प्रजापति और एकरुद्र दोनों के पाँच मुख थे, ऐसा कहा जाता है कि, एकरुद्र नें प्रजापति का एक शिर काट दिया। और प्रजापति ब्रह्मा चतुर्मुख हो गये।
इन एक रुद्र से दश रुद्र और हुए। स्वाभाविक रुप से ये दशरुद्र प्रजापति की सन्तानों के तूल्य हुए। अतः ये इन्द्र, आदि के समतुल्य हुए। लेकिन इन्द्र आत्मज्ञ, ब्रह्मज्ञानी हैं अतः देवराज होकर वरिष्ठ हैं।
 शंकर के अतिरिक्त दश रुद्रगण ये हैं - 1 हर, 2 त्र्यंबक (त्रिनैत्र),3 वृषाकपि, 4 कपर्दि (जटाधारी), 5 अजैकपाद,6 अहिर्बुध्न्य  (सर्पधर), 7 अपराजित, 8   रैवत, 9  बहुरुप,10 कपाली (कपाल धारी),।

एक रुद्र (पशुपति) तथा दस रुद्र जो एकरुद्र शंकर जी से प्रकट हुए थे कुल मिलाकर ग्यारह रुद्र कहलाते हैं।

पशुपति एक रुद्र   शंकर सहित 1  शंकर  तथा दश रुद्रगण  2 हर, 3 त्र्यंबक ,4 वृषाकपि, 5 कपर्दि , 6 अजैकपाद,7 अहिर्बुध्न्य  , 8 अपराजित, 9 रैवत, 10 बहुरुप,11 कपाली मिलकर एकादश रुद्र कहलाते हैं।

और शेष दस रुद्रों के नामों में मतैक्य नही है। क्योंकि कुछ लोग प्रभास-वरस्त्री के पुत्र विश्वकर्मा के पुत्र एकादश रुद्गगणों के नामों 
1 शम्भु, 2 ईशान, 3 महान, 4 महिनस,  5 भव, 6 शर्व, 7 काल, 8 उग्ररेता,  9 मृगव्याघ, 10 निऋति, 11 स्थाणु  को भी उक्त एकादश रुद्र नाम से प्रस्थापित करते हैं।
 ऐसे दो प्रकार के एकादश रुद्र हैं। 
इनके अलावा  रुद्र की अष्टमुर्ति ये हैं  1भव,2 शर्व ,3 ईशान, 4 पशुपति, 5 द्विज,6 भीम, 7 उग्र, 8 महादेव।

ये सब नाम एक दुसरे में प्रस्थापित कर कई स्थानों पर एकादश रुद्रों के नामों में अन्तर देखे जाते हैं।
एकरुद्र शंकरजी प्रमथ गणों के गणपति थे फिर मिढ गणों के गणपति मिढिश भी कहलाये बाद में रुद्रगणों के गणपति और गणाधिपति भी कहलाये। कुबेर के पहले शंकरजी ही नीधिपति का कार्य भी देखते थे। क्योंकि कल्याणकारी कार्यों के कारण ये सबके विश्वसनीय और प्रियातिप्रिय प्रियपति हो गये थे।
फिर इन दस रुद्रों ने रुद्र सृष्टि की यह रुद्र सृष्टि ही अनेकरुद्र कहलाती है।
भैरव,वीरभद्र, भद्रकाली, नन्दी, भृङ्गी, तथा
 विनायक गजानन को प्रकट किया।  यक्षराज मणिभद्र ,यक्ष  कुबेर तथा पुष्पदन्त गन्धर्व भी रुद्रगण हैं।
 गजानन विनायक सहित अष्ट विनायक हुए हैं। पहले एकरुद्र शंकरजी प्रथमेश और रुद्रगणों के गणपति थे। गजानन विनायक को सर्वप्रथम प्रमथ गणो के गणपति और बाद म समस्त  रुद्रगणो का गणपति स्वीकारा गया।
 अष्ट विनायकों के नाम ये हैं।
1 सम्मित,             5 उस्मित;
2 मित,                 6 देवयजन;
3 शाल,                7 कटंकट;
4 कुश्माण्ड,          8 राजपुत्र।

[ये विनायक रुद्रगण हैं, पिशाच हैं]





 सुचना --

1   जैसे रावण यथावश्यक्ता स्वयम् को एक मुखी या दशमुखी दिखा सकता था। वैसे ही रूद्र अपने आपको स्त्री पुरुष रूप में दिखा सकता था।
2   पुरुष रूप ने और स्त्री रूप ने स्वयम् को दस दस भागों में प्रकट किया। जैसे कौशिकी के शरीर से सब देवियाँ निकली और फिर समा गयी ऐसे ही।
3   यदि एक रुद्र ने स्वयम् को स्त्री पुरुष रुप में विभाजित तक फिर स्त्री और पुरुष भाग ने ग्यारह ग्यारह भागों में विभाजित कर लिया तो  मूल स्वरूप एकरुद्र सहित बारह रुद्र कहलाते।

शनिवार, 26 अक्टूबर 2019

सनातन धर्म के व्रतपर्वोत्सव में निर्धारित पुजा समय और मुहुर्त ।

सनातन धर्म के व्रतपर्वोत्सव में निर्धारित पुजा समय और मुहुर्त ।

सनातन धर्म की पुजाओं के समय निर्धारित हैं।

सर्वप्रथम यह स्मरण कराना चाहूँगा कि, आपके मुख्य धर्मशास्त्र ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, और अथर्ववेद संहिता है। हमारे आत्मज्ञानी ब्रह्मज्ञ ऋषियों ने उक्त वेदिक संहिताओं की जो व्याख्या की उसे ब्राह्मण ग्रन्थ कहते हैं। उन्ही ब्राह्मण ग्रन्थों के अन्तिम अध्याय में वानप्रस्थ आश्रम के लिए चिन्तन मनन हुआ उसे आरण्यक कहते हैं। और इन आरण्यकों के भी अन्त में जो आत्मतत्व चिन्तन ब्रह्मवाद पर चर्चा हुई उसे उपनिषद कहते हैं।

ईशावास्योपनिषद शुक्लयजुर्वेद संहिता का अन्तिम अध्याय है अर्थात चालीसवाँ अध्याय है।

कृष्ण यजुर्वेद में संहिता भाग के साथ ब्राह्मण भाग मिश्रित है। इसलिए इसे काला/  कृष्ण यजुर्वेद कहते हैं।श्वेताश्वेतरोपनिषद कृष्णयजुर्वेद संहिता का भाग है।

ब्राह्मण ग्रन्थों के कर्मकाण्ड सम्बन्धित भागों को क्रियाओं के समय याद रखने के सुत्र बड़े यज्ञों के लिए श्रोतसुत्रों, संस्कार, व्रतपर्वोत्सवों के लिए ग्रह्यसुत्र, आचरण के लिए धर्मसुत्र और यज्ञ वैदी /बेदी और मण्डप आदि रचनार्थ शुल्बसूत्र ऋषियों ने रचे।और हम उन्ही ग्रह्य सुत्रों के अनुसार अपने व्रत, पर्व और उत्सव मनाते हैं। 

ब्राह्मणारण्यकोपनिषदों में मतान्तर नही है अपितु एकवाक्यता है यह सिद्ध करनें के लिए आचार्य जेमिनी ने पूर्वमीमांसा दर्शन और आचार्य बादरायण ने उत्तरमीमांसा दर्शन रचा। उत्तर मीमांसा दर्शन को ब्रह्मसूत्र और शारीरक सुत्र भी कहते हैं।

धर्मसुत्रों को सरलता से समझाने हेतु स्मृतियाँ बनी, श्रोतसुत्रत्रों और गृह्य सुत्रों को सरलता से समझाने के लिए कर्मकाण्ड भास्कर, कर्मकाण्ड प्रदीप जैसे निबन्ध ग्रन्थ बने। इनको भी और सरल करने के लिए ब्रह्म नित्य कर्म समुच्चय ग्रन्थ बना। अब तो गीता प्रेस गोरखपुर ने भी नित्यकर्म पूजा प्रकाश ग्रन्थ प्रकाशित कर दिया है।

इनके संयुक्तिकरण और पूराणों की उक्तियों का समायोजन कर  हेमाद्रि, कालमाधव आदि निबन्ध ग्रन्थ बनाकर और सरलीकरण किया गया।

निर्णयसिन्धुकार कमलाकर भट्ट ने निबन्धग्रन्थों और पौराणिक मतों की मीमांसा कर निर्णयसिन्धु ग्रन्थ में निर्णायक मत प्रस्तुत किये। जिसे भारतीय न्यायपालिका भी मान देती है।

निर्णय सिन्धु के केवल निर्णयों को एक स्थान पर संग्रहित कर धर्मसिन्धु की रचना की गई। इसे भी माननीय न्यायालय में मान्यता प्राप्त है।

हम उन ब्राह्मण ग्रन्थों और सुत्र ग्रन्थों के अनुयायी हैं यह दर्शानें के लिए प्रतिदिन कर्मकाण्ड की क्रियाओं के संकल्प के समय अपना गोत्र और प्रवर उच्चारण करते हैं।

किन्तु दासत्व की शताब्दियों में हमपर शक, हूण, खस,ठस, बर्बरों और इब्राहिमियों ने नानाविध अत्यधिक अत्याचार किये कि, हमारे पूर्वजों को बाध्य होकर एकान्त में छुपकर इन व्रतों,पर्वों और उत्सवों का अनुष्ठान करनें बाध्य होना पड़ा। वही परम्परा हम आज भी अपने अपने घरों में घर के अन्दर बन्द होकर संयुक्त परिवार सहित या अबतो केवल  एकल परिवार के साथ व्रतों,पर्वों और उत्सवों का अनुष्ठान करते हैं।

इस कारण आचार्यों के बिना की जाने वाली आराधना,उपासनाओं की विधियों में भेद पड़ गया। जिसे हम लज्जास्पद माननें के स्थान पर सगर्व कुल रीति कहते हैं। मूल रीति तो उन गोत्र ऋषि द्वारा स्थापित रीति है जो उननें शास्त्रों में लिखी है।  देखादेखी में कुछ त्रुटियाँ कुछ जुड़ती गई, कुछ नवीन परम्पराएँ जुड़ती गई और कूलरीति बनती गई।

हमारी मूल रीति तो, ब्राह्मणारण्यकोपनिषद, और सुत्र ग्रन्थों मे ही उल्लेखित है और वही मान्य है। उतना नही तो निबन्ध ग्रन्थों को तो स्वीकारनें को हम बाध्य हैं। तभी हम सनातन धर्मी कहलानें की पात्रता रखते हैं। और तभी हमें संकल्प में गोत्रोच्चार की पात्रता होगी।


अब मूल बात पर आते हैं।

 *व्रतपर्वोत्सव में निर्धारित पुजा समय और मुहुर्त ।* 

व्रत का नियम है कि, जिसदिन/ जिस तिथि में/ जिन तिथियों में व्रत करो उसके दुसरे दिन/ उस तिथि की/ उन तिथियों की अगली तिथि में पारण अवश्य करो।अन्यथा व्रत भङ्ग हो जायेगा।

जैसे एकादशी का पारण द्वादशी तिथि में होना आवश्यक है। अन्यथा एकादशी व्रत भङ्ग होजायेगा। अतः एकादशी व्रत करनें वाला द्वादशी का उपास/ उपवास व्रत नही कर सकता।

द्वादशी तिथि का एक चौथाई भाग हरिवासर पूर्ण होने के बाद द्वादशी तिथि में उसे पारण (अन्न ग्रहण) करना ही होता है।

नवरात्र का व्रत करने वाले को दशमी में पारण करना आवश्यक है अन्यथा नौ तिथियों में किया गया व्रत भङ्ग हो जायेगा। अतः वह दशमी तिथि को उपास/ उपवास का व्रत नही कर सकता।

इसी कारण वैदिक परम्परा में या तो पूर्ण उपास/ उपवास होता है या एक भक्त व्रत होता हे। (सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच एक ही बार भोजन करने को एकभक्त कहते हैं।) चूँकि, रात्रि भोजन निषेध है इसकारण केवल तन्त्र में प्रदोषव्रत आदि नक्त व्रत की व्यवस्था है वैदिक धर्म में नक्त व्रत की मान्यता नही है। एकादशी व्रत करने वालों को प्रदोषव्रत न करनें की सलाह इसी कारण दी जाती है। ताकि, द्वादशी में एकादशी का पारण हो सके। ऐसे ही जन्माष्टमी का पारण नवमी तिथि में होना ही चाहिए। जो लोग श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाकर उत्तर रात्रि में पारण कर लेते हैं वे व्रत भङ्ग कर लेते हैं। क्योंकि व्रती को रात्रि भोजन ही नही करना चाहिए तो व्रती के लिए उत्तर रात्रि में भोजन करना तो सर्वथा अनुचित होगा।

अमान्त आश्विन पूर्णिमान्त भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की मध्याह्न व्यापी चतुर्थी में गणपति पुजन में मध्याह्न में पार्थिव गणेश स्थापित कर गणपति उत्सव पूजन करें । और दुसरे दिन प्रातः पार्थिव गणेश विसर्जन करें।

जिन पण्डितों को उक्त शास्त्रों का ज्ञान नही होता वे नवरात्र में दुर्गा पूजा के लिए उल्लेखित विधि निषेध सप्तमी भेद युक्त अष्टमी में दुर्गा पूजा नही करनें की दुहाई देकर श्रीकृष्ण जन्माष्टमी में सप्तमी भेद युक्त अष्टमी में जन्माष्टमी नही मनाना कहते हैं। किन्तु वे ही पण्डित जन दशमी युक्त नवमी में दुर्गा पूजा नही करनें का विधान नही बतलाते।  और धड़ल्ले से दशमी विद्धा नवमी में नवरात्र में महानवमी बतलाते हैं।  रामनवमी के समय भी उन्हे उक्त नियम याद नही आता। तब भी उदिता/ उदिया तिथि में रामनवमी बतलाते हैं।

जबकि शास्त्रोक्त नियम पर्वकाल व्यापि तिथि में ही पर्वोत्सव मनाने का विधान है। 

अतः मध्याह्न व्यापी भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी में श्री गणेश स्थापना करना चाहिए। 

श्रीकृष्ण जन्म का पर्वकाल मध्यरात्रि है अतः मध्यरात्रि व्यापी अमान्त श्रावण पूर्णिमान्त भाद्रपद कृष्णपक्ष की अष्टमी में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाना चाहिए। और 

मध्याह्न व्यापी चैत्र शुक्ल नवमी में राम नवमी मनाना चाहिए।

श्राद्ध नित्यकर्म है। ब्रह्म यज्ञ, देवयज्ञ के पश्चात पितृयज्ञ के अन्तर्गत श्राद्धकर्म में  मध्यान्ह पश्चात अपराह्न काल में श्राद्ध करना।

पञ्चबलि निकालना भूतयज्ञ का अङ्ग है। उसी में से नृबलि के अन्तर्गत निकाला गया भोजन अतिथि को परोस कर अतिथि यज्ञ होता है।


 नवरात्रि में  द्वितीय युक्त प्रतिपदा में सुर्योदय से दस घटि यानि चार घण्टे के अन्दर ही घटस्थापना करना। इसके बाद घटस्थापना नही होना चाहिए। जयति (जँवारे बोना) भी इसी का अङ्ग है।

प्रतिमा स्थापना का कोई कर्तव्य नही है। प्रतिमा स्थापना घटस्थापना के साथ ही उसी का अङ्ग है।इसकी कोई अलग व्यवस्था नही है। अतः प्रतिमा स्थापना भी सूर्योदय से चार घण्टों में ही होता है।

आश्विन पूर्णिमा परा अर्थात उदिया/ उदिता तिथि में ही होती है। उसमें भी चन्द्रोदय व्यापी पूर्णिमा का महत्व अधिक है।

 किन्तु शरद पूर्णिमा का रास महोत्सव मध्यरात्रि का है। मतलब शरद पूर्णिमा महोत्सव मध्यरात्रि व्यापि आश्विन पूर्णिमा में मनाया जाना चाहिए। न कि, चन्द्रोदय व्यापि आश्विन पूर्णिमा में।

 को जागरी अर्थात (लक्ष्मी कहती है;) कौन जागता है (मैं उसे धन दूँगी।) सूर्यास्त के समय तो यह प्रश्न उत्पन्न ही नही होता। स्पष्ट है कोजागर का मुख्यकाल महानिशा (मध्यरात्रि) ही है। और इस तिथि में प्रदोष काल में कलश स्थापित कर लक्ष्मी पूजा का विधान है। अतः प्रदोषकाल और मध्यरात्रि व्यापि आश्विन पूर्णिमा में कोजागरी पूर्णिमा पूजन होना चाहिए। न कि, चन्द्रोदय व्यापि आश्विन पूर्णिमा में।


धन्वन्तरि त्रयोदशी में अमान्त आश्विन पूर्णिमान्त कार्तिक कृष्ण पक्ष में प्रदोषकाल व्यापी त्रयोदशी में धनतेरस मनाते हैं। धनतेरस मूलतः धन्वन्तरि जयन्ती है।

धनतेरस में प्रदोषकाल में यम और पितरों के निमित्त दीपदान करें। इसमें धन्वन्तरि पूजन होता है न कि, धन की पूजा।

नर्क चतुर्दशी / रूप चौदस में चतुर्दशी तिथि में चन्द्रोदय के पूर्व अभ्यङ्ग स्नान कर उदयीमान चन्द्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। इससे रूप सँवरता है। यम दण्ड से बचाव होता है। रूप चौदस पर चाँन्दी या रुपयों की पूजा करनें का कोई विधान नही है।


दिवाली अमान्त आश्विन पूर्णिमान्त कार्तिक कृष्ण पक्ष में  प्रदोषकाल व्यापी और मध्यरात्रि व्यापी अमावस्या में दीवाली होती है।  दीपावली पुजन मे यज्ञवेदी में नवीन समिधा डालकर अग्न्याधान करें।

प्रदोषकाल यानि सुर्यास्त पश्चात छः घटि यानि लगभग 2 घण्टे 24 मिनट के अन्दर ही दीप पूजन कर यमराज के और पितरों के निमित्त दीपदान किया जावे।  इससे पितरों को अपनें लोक लौटनें का मार्ग प्रशस्थ होता है। दीपदान के बाद स्थिर लग्न/ वृष लग्न में नारायण सहित श्री लक्ष्मी , इन्द्र और कुबेर की पूजन करें। धन, सम्पदा, स्वर्ण, मुद्रा आदि की पूजन का कोई विधान नही है।

दीवाली को मध्यरात्रि के एक घटि पहले से मध्यरात्रि से एक घटि बाद तक की महानिशा में काली पूजन होता है। दवात में काली स्याही कै रूप में काली पूजन का विधान है।


उपपत्ति ----

प्रदोषकाल समाप्ति समय  = [सुर्यास्त समय + (अगला सुर्योदय -सुर्योदय)÷ 5]

या

प्रदोषकाल समाप्ति समय  = सुर्यास्त समय + (रात्रिमान÷5) ।


दीवाली के दुसरे दिन हवन कर नवीन धान्य अर्थात ज्वार (ग्वार) धान (चाँवल), गन्ना आदि की आहुति देकर नवधान्येष्टि करें।

तुलसी विवाह कब करें प्रथक ब्लॉग में वर्णन है।


शिवरात्रि में अमान्त माघ पुर्णिमान्त फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की मध्यरात्रि व्यापी चतुर्दशी तिथि में महाशिवरात्रि पर्व मनाते है। शिवरात्रि को रात्रि में चारों प्रहर में अलग अलग चार बार जलाभिषेक कर  बिल्वपत्र अर्पित कर पुजन करना ।

सूर्यास्त / प्रदोषव्यापिनी फाल्गुनी पूर्णिमा में यज्ञ कुण्ड में नवीन समिधा अर्पित कर अग्न्याधान कर होलिका दहन कर दुसरे दिन प्रतिपदा में सामुहिक / सामुदायिक रूप से नवस्य, यव (जों), हवन  में गेहूँ आदि नवान्न की आहुति देकर  इष्टि कर्म करें।


इनमें न कोई लग्न का उल्लेख है न चौघड़िया का।

इनके लिए मुहुर्त देखने की परम्परा बहुत बाद की है।

मुहुर्त शास्त्र से पूजाओं को जोड़ने के लिये मुहुर्त का सबसे महत्वपूर्ण तत्व लग्न को ग्रहण किया गया।

वैदिक काल में सायन सौर संक्रान्तियों से मासारम्भ होता था अतः दो सायन संक्रान्तियों के बीच पड़ने वाली अमावस्या के दुसरे दिन प्रतिपदा से चान्द्रमास आरम्भ होता था। विष्णु पुराण तक में यही उल्लेख है। किन्तु वराह मिहिर के समय निरयन सौर वर्ष से संस्कारित / संस्कृत  चान्द्रमासों की परिपाटी चली।


वर्तमान में प्रचलित चैत्र वैशाख आदि माह वाली शकाब्ध पञ्चाङ्ग नाक्षत्रिय सौर वर्ष यानि निरयन सौर वर्ष से संस्कारित / संस्कृत चान्द्रमास दिये जाते हैं। अभी तक सायन सौर संक्रान्तियों और निरयन सौर संक्रान्तियों में चौविस दिनों का अन्तर होने के कारण किसी भी व्रत,पर्वोत्सव के निरयन सौर दिनांक में एक माह से अधिक अन्तर नही आता। इस कारण व्रत,पर्वोत्सवके दिन पर्वकाल / पुजा की निर्धारित अवधि में निश्चित लग्न मिल जाता है।

जैसे चैत्र में घटस्थापना के समय स्थिर लग्न वृष, आश्विन नवरात्रि मे घटस्थापना के समय स्थिर लग्न वृश्चिक, गणेश चतुर्थी में  स्थिर लग्न सिंह , और दिवाली में प्रदोषकाल में वृष लग्न और महानिशीथ काल में स्थिर लग्न सिंह मिल जाता है।

किन्तु जिन्हे लग्न साधन की गणना नही आती थी और जो ज्योतिषियों को दक्षिणा देना भी नही चाहते थे ऐसे नाथ आदि तान्त्रिकों ने यात्रा में अनुकूल वार / वासर नही होने पर उस वार के प्रहर में यात्रा करने का वैकल्पिक साधन चौघड़िया और होरा का उपयोग शुरू किया। किसी व्रत पर्वोत्सवों में  व्रत पर्वोत्सव के निर्धारण समय में कोई निश्चित चौघड़िया मिलना निश्चित नही है। क्यों कि चौघड़िया वार/ वासर आधारित सांख्यिकी गणना / अंकविद्या है।

आप यह निश्चित नही कर सकते कि, दिवाली को प्रदोषकाल में मंगलवार और शनिवार को छोड़कर अन्य वार में लाभ के चौघड़िया में ही पुजन कर सकें।

वर्तमान में अधिकांश पुरोहित / पण्डित भी लग्न साधन और न यह तथ्य जानते हैं कि होरा के समान ही चौघड़िया भी (चार घड़ि = 96 मिनट) भी वारों के स्वामी ग्रहों का ही प्रतीकही  हैं।

सुर्य - उद्वेग।

चन्द्रमा -अमृत।

मंगल- रोग।

बुध - लाभ।

गुरु - शुभ।

शुक्र - चर।

शनि - काल।

दिन के चौघड़िया का प्रथम चौघड़िया वार स्वामी ग्रह का ही होता है। जैसे होरा में होता है। बादमें वही होरा वाला क्रम में अर्थात वार से छटा फिर उससे छटा फिर उससे छटा ।

जबकि रात्रि में वार से पाँचवाँ फिर उससे पाँचवाँ फिर उससे पाँचवाँ ।

कुल मिलाकर यह अति साधारण सांख्यिकी या अंक विद्या मात्र है ज्योतिष नही है। जबकि लग्न साधन ज्योतिष है। मिलना निश्चित नही है। क्यों कि चौघड़िया वार/ वासर आधारित सांख्यिकी गणना / अंकविद्या है।

आप यह निश्चित नही कर सकते कि, दिवाली को प्रदोषकाल में मंगलवार और शनिवार को छोड़कर अन्य वार में लाभ के चौघड़िया में ही पुजन कर सकें।
अधिकांश पुरोहित / पण्डित भी नही जानते कि होरा के समान ही चौघड़िया (चार घड़ि = 96 मिनट) भी वारों के स्वामी ग्रहों का ही प्रतीक हैं।
सुर्य - उद्वेग।
चन्द्रमा -अमृत।
मंगल- रोग।
बुध - लाभ।
गुरु - शुभ।
शुक्र - चर।
शनि - काल।
दिन के चौघड़िया का प्रथम चौघड़िया वार स्वामी ग्रह का ही होता है। जैसे होरा में होता है। बादमें वही होरा वाला क्रम में अर्थात वार से छटा फिर उससे छटा फिर उससे छटा ।
जबकि रात्रि में वार से पाँचवाँ फिर उससे पाँचवाँ फिर उससे पाँचवाँ ।
कुल मिलाकर यह अति साधारण सांख्यिकी या अंक विद्या मात्र है ज्योतिष नही है। जबकि लग्न साधन ज्योतिष है।

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2019

पुत्र धर्म और माता-पिता के कर्मों का सन्तान पर प्रभाव नही।

नारायणी धर्म ( भगवान नारायण ब्रह्मा द्वारा हिरण्यगर्भ ब्रह्मा को उपदिष्ट  वेदिक धर्म/ श्रोतीय धर्म,ब्राह्मण धर्म/ ब्राह्मधर्म । आदि प्रजापति  द्वारा दक्ष प्रजापति आदि ऋषियों और देवताओं, स्वायम्भुव मनु को उपदिष्ट प्रजापत्य धर्म, मनुस्मृति पर आधारित  मानवधर्म  के अध्ययन से प्राप्त मेरी शास्त्रीय जानकरियों के अनुसार  दैत्य हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रहलाद जी परम विष्णुभक्त हुए। प्रहलाद जीकी भक्ति के प्रताप से पिता द्वारा दियेगये कष्टों से भी कोई प्रभाव नही पड़ा।
मतलब पिता के कर्म नही अपने कर्म ही काम आते हैं।
न्याय से चुके उत्तानपाद के पुत्र भक्त ध्रुव अपनी साधना, आराधना के बल पर ध्रुव / अचल पद और बाद में परमपद पा गये।
माता जबाला कई लोगों की सेवा में रही, इस कारण पुत्र को पिता का नाम और गौत्र नही बतला पाई। उन माता के पुत्र अपनी सत्यनिष्ठा के बल पर महर्षि सत्यकाम जबाल हुए।
याज्ञवल्क्य द्वारा विवाह कर सन्तानोत्पत्ति न करने के कारण  श्राद्ध - तर्पण न करने, पिता का ऋण न चुकाने, पिता के अधुरे कार्य पुर्ण न करने के कारण उनके पितर कष्ट झेल रहे थे।नर्क में गिरने वाले हैं यह बतलाकर पुत्र को विवाह कर सन्तानोत्पत्ति का कर्तव्य बोध कराया।
महर्षि कपिल के शाप की अग्नि में जल रहे सगर के एक हजार पुत्रों को उनके वंशजों ने तप कर सुर सरिता गङ्गा को कपिल आश्रम लेजाकर सद्गति करवाई।
माता-पिता के कर्मों का फल सन्तान को भोगना पड़े ऐसा उल्टा ज्ञान मेने नही पढ़ा सुना।
यहाँ तक कि, जैन, बौद्ध ,खालसा भी उक्त मत वाले ही हैं इससे विपरीत नही मानते हैं।

हाँ आदम के वंशजों का पन्थ आदमी पन्थ  के  इब्राहीमी, साबई, दाउदी, सुलेमानी,यहुदी, ईसाई और इस्लाम सम्प्रदाय अवश्य यह मानते हैं कि, यहोवा (पिता) के आदेश के विरुद्ध बुद्धिवृक्ष का फल खाने के पाप स्वरुप मैथुन में प्रवृत्त होने का पाप सभी आदमी (आदम के वंशज) भोग रहे हैं।उस पाप से मुक्ति दिलाने का कार्य मसिहा करेगा।ईसाई यीशू को मसीह मानते हैं।यहुदी नही मानते। किसी मसीह की प्रतिक्षारत हैं।मुस्लिम भी  ईसा मसीह को पुनः भेजे जाने और मेंहदी नामक नबी की प्रतिक्षा में हैं। अतः उनके मत में भी किसी मसीहा का इन्तजार ही है।कोई हल नही है।
उक्त आदमी पन्थ में मुझे किञ्चित मात्र भी श्रद्धा नही है। अतः मैं किसी मसीहा की प्रतिक्षा न स्वयम् करता हूँ, न इसका उपदेश देसकता हूँ।
मेरी मान्यता तो यही है कि, पुर्व जन्मों के सञ्चित कर्मों में से इस जन्म में भोगे जा सकने वाले कर्मों का समुह यानि प्रारब्ध भोगने के लिये श्री राम, श्री कृष्ण, गोतमबुद्ध, शङ्कराचार्य, रामकृष्ण परम हन्स, रमण महर्षि, और विवेकानन्द जैसी हस्तियाँ भी बाध्य थी तो हमें तो भोगना ही है।
हाँ, वर्तमान शुभकर्मों से उनका प्रभाव कम किया जा सकता है। और अशुभ कर्मों से बढ़ाया जा सकता है।
ऋत का ज्ञान होने से केवल आत्मज्ञ / ब्रह्मज्ञानी ही प्रारब्ध भोगते हुए भी श्रीकृष्ण की तरह अप्रभावित रह सकता है।
इति शुभम्।

गुरुवार, 29 अगस्त 2019

अशुद्ध पञ्चाङ्गो और दक्षिण भारतीय आचार्यों के अनुयायी परम भागवतों के विभिन्न मत/ सम्प्रदायों के कारण वृत पर्वोत्सवों में मत भिन्नता से विकृत स्थितियाँ निर्मित। कुछ विचित्र किन्तु सही उदाहरण सहित।

विचित्र किन्तु सत्य

नोट --
सनातन धर्म में वार एवम् दिन परिवर्तन सुर्योदय से होता है। वार एवम दिन सुर्योदय से सुर्योदय तक रहते हैं

न कि, मध्यरात्रि से। रात्रि 12:00 बजे से केवल अंग्रेजी तारीख  Date  एवम् Day   ही बदलते है।वार एवम दिन नही बदलते।

वार एवम दिन सुर्योदय से सुर्योदय तक चलते हैं।
मेकाले शिक्षा से उत्पन्न मान्सिकता ने भारतीयों में भी रात्रि 12:00 बजे बाद दिन बदल गया इसलिए उपास छोड़ दो/ उपवास तोड़ लो वाक्य सुनने में आते हैं।जो धर्मशास्त्र के विपरीत है।
यह विचित्र किन्तु सत्य है , कि, आम भारतीय की मानसिकता अधर्मी हो गयी।

हमारे देश में सनातन धर्म में पञ्चदेवोपासना तो समझ में आती है किन्तु इन देवों के उपासकों के भी विभिन्न पन्थ - सम्प्रदायों (Schools) की प्रथक-प्रथक वृत पर्वोत्सव विधियों के कारण धार्मिक कार्यों में अनेक मतभेद होगये।
दक्षिण भारत में  सुर्य की निरयन राशि और चन्द्रमा के नक्षत्र से निर्णय होता है, तिथियाँ नही चलती है।
दक्षिण भारतीय आचार्यों के अनुयायियों ने दक्षिण भारतीय सुर्य की निरयन राशि और चन्द्रमा के नक्षत्र को तिथियों में बदलने के चक्कर में बहुत गड़बड़ करदी।

और शेष भास्कराचार्य के बाद मुगलकाल में  हुवे गणेश देवज्ञ ने आंशिक रुप से वैध लिये। और बाद में वेध लेने की परम्परा का ही लोप होगया। परिणामस्वरूप वेधसिद्ध शुद्ध पञ्चाङाग बनना बन्द होगई।और किसी ने आकाश में स्थित ग्रह नक्षत्रों से मैल नही रखने वाली  गलत पञ्चाङ्गो को सही सिद्ध करने के लिये बाण वृद्धि रसक्षय का सुत्र रच  लिया जिसका मतलब होता है कोई भी तिथि पाँच घटि यानि दो घण्टे से अधिक वृद्धि नही होती और छः घटि यानि दो घण्टे चौविस मिनट से कम नही होती।
अर्थात तिथिमान  21 घण्टे 36 मिनट से कम नही होता और 26 घण्टे से अधिक बड़ी नही होती।
बाबा ने इसे धर्मशास्त्रीय सिद्धान्त कहकर लोगों कै दिग्भ्रमित किया।और पढ़ने लिखने से परहेज करने वाले आलसी लोगों के द्वारा बाबा वाक्यम् प्रमाणम् मानने से नयी परम्परा आरम्भ हो गयी।
स्व.श्री दीनानाथ शास्त्री चुलेट की अध्यक्षता में शुद्ध पंचांग प्रवर्तक कमेटी इन्दौर में होल्कर शासन ने बिठाई जिसकी रिपोर्ट 06 अप्रेल 1931 ई. को प्रकाशित की गयी।उक्तरिपोर्ट के प्रष्ठ 49 पर निर्णय दिया गया है कि, धर्मशास्त्र कहलाने वाले वेदों, - उपवेदों, वेदाङ्गो, सुत्रों / कल्प सुत्रों, स्मृतियों और षडदर्शनों में बाणवृद्धि रसक्षय का सिद्धान्त कहीँ उल्लेखित नही है। इस दावे को गलत पाया।
इसी रिपोर्ट में दृग्तुल्य पञ्चाङ्ग (जैसा आकाश में दिखे वही पञ्चाङ्गो में अंकित हो ।) और चित्रापक्षीय अयनांश को ही स्वीकार्य की गयी। (चित्रा तारे से 180° पर निरयन मेषादि बिन्दु और अश्विनी नक्षत्रारम्भ बिन्दु को स्वीकारा गया। )
श्री निर्मलचन्द्र लाहिरी की अध्यक्षता में भारत शासन द्वारा नियुक्त केलेण्डर रिफार्म कमेटी ने भी उक्त प्रश्न पर विचार किया किन्तु कोई धर्मशास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध नही हुआ न कोई दावा प्रस्तुत कर पाया।मार्च 1956 में प्रकाशित रिपोर्ट में दृग्तुल्य पञ्चाङ्ग (जैसा आकाश में दिखे वही पञ्चाङ्गो में अंकित हो ।)
और चित्रापक्षीय अयनांश (चित्रा तारे से 180° पर निरयन मेषादि बिन्दु और अश्विनी नक्षत्रारम्भ बिन्दु को स्वीकारा गया।) को ही स्वीकार्य की गयी।
फिरभी हटी लोभियों ने गलत पञ्चाङ्गो के पक्ष में कुछ महामण्डलेश्वरों से मान्यता लिखवाकर अशुद्ध/ गलत पञ्चाङ्ग प्रकाशन जारी रखा।
जिनका  डॉटा ही गलत होता है तो पञ्चाङ्ग तो गलत होगी ही क्योंकि, भास्कराचार्य के सुत्र होँ चाहे न्युटन के, परिणाम तो गलत आयेगा ही।

अतः सहुलियत के लिये गणेश देवज्ञ के  ग्रहलाघव करणग्रन्थ और बाद में बने मकरन्द नामक करणग्रन्थ की सारणियाँ ही पञ्चाङ्ग बनाने के साधन हो गये।
साधारण गणित जानने वाला भी इनके आधार पर जोड़ बाकी गुणाभाग करके पञ्चाङ्ग बनाने लगा। और विभिन्न स्थुल पञ्चाङ्ग प्रकाशित होने लगे।
न वेध लिया न गणित सही तो पञ्चाङ्गो का बण्टाढार कर दिया।

स्थिति यह होगयी कि, 24 अगस्त 2019 शनिवार कोसुबह गोगा नवमी मनी और रात में दक्षिण भारतीय आचार्यों के अनुयायी महाभागवतों ने जन्माष्टमी मनाई। जबकि पर्व कालीन  मध्यरात्रि में अष्टमी शुक्रवार 23 अगस्त 2019 को थी शनिवार 24 अगस्त 2019 को अष्टमी तिथि प्रातः 08:32 बजे ही समाप्त हो गयी थी। अतः जन्माष्टमी 23 अगस्त 2019 शुक्रवार को थी। पर दक्षिण भारतीय आचार्यों के अनुयायी महाभागवतों ने दुसरे दिन शनिवार 24 अगस्त 2019 को  जन्माष्टमी  मनाई।
मतलब पहले नवमी  (09)  फिर अष्टमी (08)। है ना विचित्र।
ऐसाही दिनांक 26 अगस्त 2019 सोमवार को एकादशी वृत था। एकादशी तिथि क्षय थी । दिनांक 26 अगस्त 2019 सोमवार  प्रातः 07:03 बजे लगी और दिनांक 26 /27 अगस्त 2019 सोमवार (Tuesday) को हीउत्तर रात्रि 05:10 बजे समाप्त होगयी।  एकादशी मंगलवार के सुर्योदय समय के लगभग एक घण्टा पहले ही समाप्त होगयी।किन्तु दक्षिण भारतीय आचार्यों के अनुयायी महाभागवतों ने दुसरे दिन  मंगलवार 27 अगस्त 2019 को  द्वादशी तिथि में एकादशी वृत किया । है ना विचित्र।
गलत पञ्चाङ्गो के कारण 02 सितम्बर 2019 सोमवार को सुबह चतुर्थी में  गणेश स्थापना होगी और रात में हरतालिका तृतीया  का पुजन जागरण होगा। जबकि हरतालिका तृतिया रविवार 01 सितम्बर 2019 को है तृतीया तिथि क्षय है, 01/02 सितम्बर 2019 रविवार ( Monday) को रात्रि 04:58 बजे ही समाप्त हो जायेगी।
मतलब पहले चतुर्थी (04) फिर तृतीया (03)
है ना विचित्र किन्तु सत्य।

रविवार, 19 मई 2019

*तुलसी विवाह कब करें*

नवमी तिथि अधिक होने कार्तिक शुक्ल नवमी सोमवार Tuesday दिनांक 04/05 नवम्बर 2019 को उत्तर रात्रि 04:57 पूर्वाह्न से लगेगी और बुधवार 06 नवम्बर 2019 को प्रातः 07:22 पूर्वाह्न तक रहेगी।
अतः *आँवला नवमी मंगलवार दिनांक 05 नवम्बर 2019 को मनेगी।*

कार्तिक शुक्ल एकादशी  गुरुवार 07 नवम्बर 2019 को प्रभात काल 09:55 पूर्वाह्न से शुक्रवार 08 नवम्बर 2019 को 12:25  दोपहर तक है।

अतः *वेदिक स्मार्त , वैष्णव, भागवत सभी मतावलम्बी. देव प्रबोधनी एकादशी 08 नवम्बर 2019 शुक्रवार को मनायेंगें।*

*श्रोत्रिय (वेदिक) और स्मार्त जन शुक्रवार 08 नवम्बर 2019 को एकादशी वृत तथा तुलसी विवाह करेंगे।*
जबकि *भागवत जन एकादशी वृत तो शुक्रवार 08 नवम्बर 2019 को ही करेंगे किन्तु तुलसीविवाह पारण दिवस शनिवार 09 नवम्बर 2019 को को रात्रि प्रथम प्रहर में करेगें।*

द्वादशी तिथि शुक्रवार 08 नवम्बर 2019 को 12:25 बजे से शनिवार 09 नवम्बर 2019 को  14:40 बजे अर्थात दोपहर 02:40 बजे अपराह्न तक है।

अतः *वेदिक श्रोत्रिय स्मार्त जन तथा वैष्णव/ भागवत सभी एकादशी वृत पारण शनिवार 09 नवम्बर 2019 को करेंगे।*

शनिवार 09 नवम्बर 2019 को   विवाह नक्षत्र उत्तराभाद्रपद नक्षत्र 14:56 अर्थात दोपहर 02:56 तक रहेगा तदुपरान्त विवाह नक्षत्र रेवती लगेगा जो रविवार 10 नवम्बर 2019 को 17:18 बजे तक अर्थात सायं 05:18 बजे तक रहेगा।
अतः *तन्त्र मतावलम्बी रेवती नक्षत्र योग में  शनिवार 09 नवम्बर 2019 को रात्रि प्रथम प्रहर में तुलसीविवाह करेंगे।*

भागवत तन्त्र मतानुसार देव प्रबोधन पारण दिवस की रात्रि के प्रथम प्रहर मे को करना चाहिए।
साथ ही पारण दिवस की रात्रि के प्रथम प्रहर मे ही तुलसी विवाह भी करना चाहिए।

अतः *भागवत तन्त्रमतानुसार तुलसीविवाह शनिवार 09 नवम्बर 2019 रेवती नक्षत्र में रात्रि प्रथम प्रहर में करेंगे।*

श्रोत्रिय स्मार्त वैष्णव जन आँवला नवमी से द्वादशी पर्यन्त भगवान श्री विष्णु को तुलसीदल अर्पित करते हैं। और कार्तिक शुक्ल एकादशी तिथि में तुलसीविवाह करते है।

कार्तिक शुक्ल पुर्णिमा सोमवार  11  नवम्बर 2019  को 18:02 अर्थात सायं 06:02 बजे अपराह्न  से मंगलवार 12 नवम्बर 2019 को 19:04 अर्थात सायं 07:04
बजे अपराह्न तक रहेगी। अतः
*कार्तिक पुर्णिमा मंगलवार 12 नवम्बर 2019 को मनेगी।*

एक परम्परानुसार यह भी है कि आँवला नवमी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक या कार्तिक शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल पुर्णिमा के बीच जिस दिन (या रात्रि प्रथम प्रहर में) विवाह नक्षत्र (उत्तराषाढ़ा), उत्तराभाद्रपद, रेवती, (या रोहिणी) नक्षत्र हो उस दिन (या रात्रि प्रथम प्रहर) में तुलसी विवाह करें।
*तदनुसार शनिवार 09 नवम्बर 2019 को दिन में या रात्रि प्रथम प्रहर में या रविवार 10 नवम्बर 2019 को 17:18 बजे के पुर्व अर्थात सायं 05:18 के पहले तुलसीविवाह करें।*

निष्कर्ष - *तुलसी विवाह-  सर्व प्रचलित परम्परा से शुक्रवार 08 नवम्बर 2019 को तुलसी विवाह होगा।*
किन्तु *भागवतचार्यों से दिक्षित शंख चक्राङ्कित भागवत जन शनिवार 09 नवम्बर 2019 को तुलसीविवाह करेंगे।*

शनिवार, 27 अप्रैल 2019

सनातन धर्मियों की दुर्दशा का मूल कारण सनातन धर्मियों द्वारा वैदिक सनातन धर्म का त्याग है।

पहले संक्षिप्त इतिहास की झलकियाँ देखिये। यह इतिहास सनातन धर्मियों द्वारा अपना मूल वैदिकधर्म त्यागनें के तत्काल बाद का है।⤵️

महाराज नाबोवाहन ने पञ्जाब- हरियाणा के मालव प्रान्त से आकर (भोपाल के निकट सोनकच्छ से लगभग २० कि.मी. दर) गंधर्वपुरी को राजधानी बनाया था। बाद में नाबोवाहन के पुत्र गन्धर्वसेन गन्धर्वपुरी के राजा हुए। जिन्हें महेन्द्रादित्य भी कहा जाता था। उनकी पत्नी सोम्यदर्शना थी जिनका अन्य नाम वीरमती था।
भृतहरि और विक्रमादित्य के पिता गन्धर्व पूरी के शासक  गन्धर्वसेन कट्टर वेदिक धर्मावलम्बी और विष्णु भक्त थे। इस कारण जैन आचार्य महेसरा सूरी उनसे रुष्ट थे। जैन आचार्य महेसरा सूरी ने अफगानिस्तान तक पैदल जाकर शक राजा/ कुषाण क्षत्रप के दरबार में गंधर्वसेन के विरुद्ध गुहार लगाई तथा उज्जैन पर आक्रमण हेतु आमन्त्रित किया। शक शासक/ कुषाण क्षत्रप ने महाराज गन्धर्वसेन पर अनेक अत्याचार किये परिणाम स्वरूप गंधर्वसेन की मृत्यु जंगल में होगई। जैन ग्रन्थों में गन्धर्वसेन को गर्दभिल्ल, गदर्भ भिल्ल, गदर्भ वेश भी कहा गया है।
जैनाचार्य ने अफगानिस्तान तक पैदल यात्रा कर गन्धर्व पूरी के राजा गन्धर्व सेन पर आक्रमण करनें के लिए शकराज को आमन्त्रित किया। गन्धर्व सेन के पुत्र भृतहरि की पत्नी को पर भ्रष्टकर भृतहरि को नाथ सम्प्रदाय में सम्मिलित करने की कुटिल चाल तान्त्रिकों ने चली। बौद्धाचार्यों वें चन्द्रगुप्त द्वितीय के भाई रामगुप्त के विरुद्ध चीन के शकराज को समर्थन दिया और समझोते में रामगुप्त की पत्नी ध्रुव स्वामिनी को शकराज के हवाले करनें का दुष्ट समझोता करवाया। जिसे चन्द्रगुप्त (द्वितीय) ने असफल कर शकराज का वध किया।
इस प्रकार वास्तविक विक्रमादित्य और चन्द्रगुप्त द्वितीय में अन्तर स्पष्ट करनें के बाद मूल विषय पर आते हैं।

हम सनातनियों ने स्वयम् अपना धर्म, कर्म, नित्य- नैमित्तिक क्रियाएँ/ कर्मकाण्ड,संस्कृति,  भाषा, भुषा  सब त्याग दिया है।और स्वयम् को हिन्दू मानने लगे है।
हिन्दू का पारसी भाषा में अर्थ  काला- कलुटा, दास, दस्यु, लुटेरा,चोर, सेंधमार,और बलात्कारी के अर्थ में दी जाने वाली गाली है।और हम सचमुच ही उत्तरोत्तर उसी अर्थ में हिन्दू बनने लगे। बल्कि कह सकते है बन ही गये।

आज प्रायः धर्मोपदेशक तो बचे ही नही।बस कथावाचक ही सन्त और आचार्य कहाने लगे हैं। कोई भी धर्मोपदेशक या कथावाचक अपने वाचिक और आचरण से समाज को नित्य प्रातः - संध्या;  पञ्च महायज्ञ करना, अष्टाङ्ग योगाभ्यास करना, माता-पिता, बुजुर्गो, अतिथियों को प्रणाम करना, सत्य भाषण, सदाचरण, अविरत ॐ का मांसिक जप पुर्वक हरिस्मरण और निरन्तर जगत सेवा करना नही सिखाता।
अष्टाङ्ग योग साधना, नित्य सुबह शाम सन्ध्योपासना,गायत्रीमंत्र जप, ॐ का ध्यान पुर्वक जप कर ॐकार उपासना,वेदाध्ययन, पञ्चमहायज्ञ , बलिवैश्वदेव कर्म तो वे स्वयम ही नही करते तो सिखाये कैसे! नगर / ग्राम, मोहल्ला, कालोनी के स्तर पर ही सामुहिक रुप से सभी उत्सव (त्यौहार) मनाने और वर्णाश्रम धर्म पालन का उपदेश नही देते है। 

बल्कि, वे  अपने सम्प्रदाय का परम्पराएँ निर्वहन की ,नित्य प्रातः सायंकाल मन्दिर जाने का, रामचरितमानस पाठ का, भागवत पुराण कथा श्रवण का या शिव पुराण या दुर्गा सप्तशती पाठ  का उपदेश देते हैं।तथा राम  राम या जय सीताराम और राधे राधे या राधेकृष्ण, या जय शिव शम्भो  या जय माताजी या जय गजानन बोल कर अभिवादन करना सिखाते हैं। उनकी दृष्टि से यही धर्म है।
मतलब उनकी दृष्टि से वैदिक ऋषि और उनका ज्ञानोपदेश अप्रासंगिक है या अप्रासंगिक हो गया है।

वे अपने सम्प्रदाय/ मठ/पन्थ के मन्दिरों में और मठाधीशों/  महन्तों को दान देना, और सम्प्रदाय/ पन्थ के पन्थियों में ही आपसी एकता का  उपदेश देते है।उनका समुदाय बस उनका पन्थ है; सनातनधर्म नही।
यही कार्य वे सोशल मिडिया के माध्यम से करने लगे हैं। और अब तो किसी राजनीतिक दल का या नेता का प्रचार करना ही उनका अपना कर्त्तत्व मानने लगे हैं।
यही हाल परिवारों के मुखियाओं का भी  है।वे परिवार में  बच्चों को नित्य प्रातः - संध्या; माता-पिता, बुजुर्गो, अतिथियों को प्रणाम करनानही सिखाते।
सत्य भाषण, सदाचरण, अविरत ॐ का मांसिक जप पुर्वक हरिस्मरण और निरन्तर जगत सेवा, अष्टाङ्ग योग साधना, नित्य सुबह शाम सन्ध्योपासना, गायत्रीमंत्र जप, ॐ का ध्यान पुर्वक जप कर ॐकार उपासना,वेदाध्ययन, पञ्चमहायज्ञ , बलिवैश्वदेव कर्म स्वयम् नही करते तो सिखाने का सोच ही नही सकते।
नगर / ग्राम, मोहल्ला, कालोनी के स्तर पर ही सामुहिक रुप से सभी उत्सव (त्यौहार) मनाने और वर्णाश्रम धर्म पालन का संस्कार स्वयम् भूल चुके हैं तो बच्चों को कहाँ से सिखाये?

वे पारिवार में एकता की ही सीख भी नही दे सकते। क्यों कि, वे स्वयम् कभी भाई बहनों में एकता नही रख पाये, एकल परिवार बना कर ही रहे। माता- पिता के आज्ञाकारी रहना,उनकी सेवा सुश्रुषा करना उनने सीखा ही नही तो शिक्षा कैसे दें? और शिक्षा दें भी तो उसका असर कैसे हो?

आजकल लोग जाति प्रथा वाली जाति कै अपना समाज कहते हैं। उस स्वजाति में बल्कि उपजाति में ही एकता अवश्य चाहते हैं पर अपनी शर्तों पर।
विवाह में, सुरज पुजा, जन्मदिन में और मृत्युभोज  में जातिगत परम्परा निर्वहन करना,जाति/ समाजवालों को आमन्त्रित करना, दिखावे में अपव्यय करने में शान समझते है।
मन्दिर जाने,मान- मन्नत लेकर सकामोपासना करना,और मान पुरी नही करने पर देवता रुष्ठ होजायेंगे ऐसा सावधान करते हैं क्योंकि, उनके मतानुसार कर्मफल सिद्धान्त औचित्य हीन होगया है। वे मठाधीशों/  महन्तों को ही दान देने का संस्कार देते हैं।
अब तो ज्यादातर परिवार इंग्लिश बोलना, इंग्लिश कल्चर, केरियर ओरिएंटेड डिग्री लेकर व्हाइट कॉलर , रुतबे वाला, आराम वाला जॉब करने तथा खुब धनार्जन कर ऐशपुर्वक जीवन - यापन करना ही सिखाने लगे हैं। परिवार ही  मिथ्याभाषण, रिश्वतखोरी , ओछापन, चापलूसी के संस्कार भी देने लगे हैं।

राजनैतिक नेताओं और राजनीतिक दलों से तो धर्माचरण की आशा ही नही की जा सकती। वे  देश- धर्म के प्रति अपना  कोई कर्त्तव्य नही मानते।
नेता लोग सत्ता प्राप्ति के लिये और सम्प्रदायों/ पन्थों , जाति/समाजों से समर्थन प्राप्त करने के लिये राजनेता भण्डारे करवाने, मन्दिर बनवाने जैसे हथकण्डों को वे धार्मिकता कहते हैं।
सनातन धर्म और राष्ट्रधर्म का तो कोई नाम लेवा ही नही बचा। धर्म तो आचरण से पुष्ट होता है। धर्यम को खतरा तब होता है जब हम धर्माचरण त्याग अधर्म को धर्म का चोला ओढ़ाकर स्वयम् को धार्मिक बतलाने लगते हैं।
आज धर्म वास्तव में खतरे में है।और हल हमारे ही आचरण सुधार में है।
वेदों की ओर चलने में है। इसे वेदों की ओर लोटना नही वेद की ओर चलना ही कहेंगे। वेद मन्त्रों को ब्रह्म कहते हैं, ब्रह्म की ओर चलने को  ब्रह्मश्चर्य कहते हैं।