गुरुवार, 3 अक्टूबर 2024

श्राद्ध कर्म की विस्तृत जानकारी त्रयंम्बकेश्वर तीर्थ पूरोहित श्री भूषण साम्ब शिखरे नासिक के अनुसार ।

यह सन्देश मुझे  नासिक जिला - त्र्यंबकेश्वर के तिर्थ पुरोहित श्री भूषण साम्भ शिखरे महोदय द्वारा प्रेषित किया गया। 
यह पूरा संकलन एवम् सम्पादन जबलपुर के श्री अरुण शास्त्री जी का है।
सन्देश अग्रेषित है। इसमें मेरा किञ्चित भी योगदान नही है। न ही ये मेरे विचार हैं।
लेकिन आस्थावान जनों की जिज्ञासा शान्त करनें की दृष्टि से अग्रेषित किया गया है।

#श्राद्ध_की_परिभाषा---------!!
पितरों के उद्देश्य से विधिपूर्वक जो कर्म श्रद्धा से किया जाता है-उसे श्राद्ध कहतेहै--
#श्रद्धया_पितृन्_उद्दिष्य_विधिना_क्रियते_यत्कर्म_तत्_श्राद्धम्!

श्रद्धा से ही श्राद्ध की निष्पत्ति होती है!

#श्रद्धार्थमिदं_श्राद्धम्--#श्रद्धया_कृतं_सम्पादितं_श्रद्धया_दीयते_यस्मात्_तच्छ्राद्धम्**#तथा_श्रद्धादौ_इदं_श्राद्धम्।

अर्थात अपने मृत पितृगणों के उद्देश्य से श्रद्धापूर्वक किया जाने वाला कर्मविशेषं को श्राद्ध शब्द के नाम से जाना जाता है।
इसे ही पितृयज्ञ भी कहते हैं!जिसका वर्णन मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्रों ,पुराणों ,वीरमित्रोदय ,श्राद्धकल्पलता, श्राद्ध तत्व ,पितृदयिता आदि अनेक ग्रंथो में प्राप्त होता है।

महर्षि पराशर के अनुसार देश,काल तथा पात्र में हविष्यादि विधिद्वार जो कर्म तिल(यव)और दर्भ (कुश)तथा मन्त्रो से युक्त होकर श्रद्धापूर्वक किया जाए वही श्राद्ध है।
 महर्षि वृहस्पति तथा श्राद्ध तत्व में वर्णित महर्षि पुलस्त्य के अनुसार--
जिस कर्म विशेष में दुग्ध-घृत-मधु से युक्त सुसंस्कृत (अच्छी प्रकार से पकाए हुये)उत्तम व्यंजन को श्रद्धापूर्वक पितृगण के उद्देश्य से ब्राह्मणादि को प्रदान किया जाए,उसे श्राद्ध कहते है!
इसी प्रकार ब्रह्मपुराण में भी श्राद्ध का लक्षण लिखा हुआ है--देश काल और पात्र में विधिपूर्वक श्रद्धा से पितरों के उद्देश्य से जो ब्राह्मण को दिया जाए उसे श्राद्ध कहते है। #देशे_काले_च_पात्रे_विधिना_हविषा_च_यत्।
#तिलैर्दर्भैश्च_मन्त्रैश्च_श्राद्धम्_स्याच्छ्रद्धया_युतम्।।
#संस्कृतं_व्यंजनाद्यं_च_पयोमधुघृतान्वितम्।
#श्रद्धया_दीयते_यस्माच्छ्राद्धं_तेन_निगद्यते।।
#देशे_काले_च_पात्रे_च_श्रद्धया_विधिना_च_यत्।
#पितृनुद्दिष्य_विप्रेभ्यो_दत्तं_श्राद्धमुदाहृतम्।।
**********************

#श्राद्ध_कर्ता_का_भी_कल्याण--!!
जो प्राणी विधिपूर्वक शान्तमन होकर श्राद्ध कर्ता है,वह सभी पापों से रहित होकर मुक्ति को प्राप्त होता है तथा फिर संसार चक्र में नही आता ।
#योनेन_विधिना_श्राद्धं_कुर्याद्_वै_शान्तमानस:!
#व्यपेतकल्मषो_नित्यं_याति_नावर्तते_पुनः!!
 अतः प्राणी को पितृगण की संतुष्टि तथा अपने कल्याण के लिये भी श्राद्ध करना चाहिये।
इस संसार मे श्राद्ध करने वाले के लिये श्राद्ध से श्रेष्ठ अन्य कोई कल्याणकारक उपाय नही है।
इस तथ्य की पुष्टि महर्षि सुमन्तु द्वारा की गयी है----:
#श्राद्धात्_परतरं_नान्यच्छ्रेयस्करमुदाहृतम्।
#तस्मात्_सर्वप्रयत्नेन_श्राद्धं_कुर्याद्विचक्षण:!!
 अर्थात-इस जगत में श्राद्ध से श्रेष्ठ अन्य कोई कल्याणप्रद उपाय नही है,अतः वुद्धिमान मनुष्य को यत्नपूर्वक श्राद्ध करना चाहिये।
इतना ही नही ,श्राद्ध अपने अनुष्ठाता की आयु बढ़ा देता है,पुत्र प्रदानकर कुल-परम्परा को अक्षुण्ण रखता है,धन-धान्य की वृद्धि करता है, शरीर मे बल पौरुष की वृद्धि का संचार करता है, पुष्टि प्रदान करता है और यश का विस्तार करते हुए सभी प्रकार का सुख प्रदान करता है!
यथा--: #आयु:#पुत्रान्_यथा_स्वर्गं_कीर्तिं_पुष्टिं_बलं_श्रियम्।
#पशून्_सौख्यं_धनं_धान्यं_प्राप्नुयायात्_पितृपूजनात्।।

प्रश्न नही स्वाध्याय करे
**********************

||---#श्राद्ध_से_मुक्ति---||
इस प्रकार श्राद्ध सांसारिक जीवन को सुखमय तो बनाता ही है, परलोक भी सुधारता है और अंत मे मुक्ति भी प्रदान करता है--
#आयु:प्रजां_धनं_विद्यां_स्वर्गं_मोक्षं_सुखानि_च ।
#प्रयच्छन्ति_तथा_राज्यं_पितरःश्राद्ध_तर्पिता:।।
मार्कण्डेय पुराण
 अर्थात श्राद्ध से संतुष्ट होकर पितृगण श्राद्ध कर्ता को दीर्घ आयु ,सन्तति,धन, विद्या,राज्य ,सुख,स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करते है।
अत्रि संहिता का वचन है--जो पुत्र भ्राता पौत्र अथवा दौहित्र आदि पितृकर्म (श्रद्धानुष्ठान)-में संलग्न रहते हैं ,वे निश्चय ही परमगति को प्राप्त होते हैं।
#पुत्रो_व_भ्रातरो_वापि_दौहित्र:#पौत्रकस्तथा!
#पितृकार्ये_प्रसक्ता_ये_ते_यान्ति_परमां_गतिम्।।(सुमन्तु)
यहां तक लिखा है कि जो श्राद्ध कर्ता है ,जो उसके विधि विधान को जानता है, जो श्राद्ध करने की सलाह देता है प्रेरित करता है और जो श्राद्ध का अनुमोदन करता है --इन सबको श्राद्ध का पुण्य फल अवश्य प्राप्त होता है। #उपदेष्टा_नुमन्ता_च_लोके_तुल्य_फलौ_स्मृतौ--बृहस्पति
*********************

#श्राद्ध_न_करने_से_हानि----इसलिये श्राद्ध अवश्य करे||

 शास्त्र ने श्राद्ध न करने से होनेवाली जो हानि बताई है उसे जानकर रोंगटे खड़े हो जाते है।
अतः श्राद्ध तत्व से परिचित होना तथा उसके अनुष्ठान के लिये तत्पर रहना अत्यंत आवश्यक है।
यह सर्वविदित है कि मृत व्यक्ति इस महायात्रा में अपना स्थूल शरीर भी नही ले जा सकता है तब पाथेय (अन्न जल)कैसे ले जा सकते है?
उस समय उसके सगे सम्बन्धी श्राद्ध विधि से जो कुछ देते हैं, वही उसे मिलता है।शास्त्र ने मरणोपरांत पिंडदान की व्यवस्था की है, सर्वप्रथम शवयात्रा के अंतर्गत छ:पिंड दिए जाते है
 जिनसे भूमि के अधिष्ठातृ देवताओं की प्रसन्नता तथा भूत -पिशाचों द्वारा होनेवाली वाधाओं का निराकरण आदि प्रयोजन सिद्ध होते हैं।
इसके साथ ही दशगात्र में दिए जानेवाले दश पिंडो के द्वारा जीव को आतिवाहक सूक्ष्म शरीर प्राप्त होता है।
 मृत व्यक्ति की महायात्रा के प्रारम्भ की बात हुई ।
अब आगे उसे पाथेय (रास्ते के भोजन --अन्न जल आदि--)की आवश्यकता पड़ती है, जो उत्तम षोडसी में दिए जाने वाले पिण्डदान से उसे प्राप्त होता है।यदि सगे -सम्बन्धी पुत्र -पौत्रादि न दे तो भूख-प्यास से उसे वहां महादारुण दुख होता है----:::
 #लोकांतरेषु_ये_तोयं_लभन्ते_नान्यमेव_च।
#दत्तं_न_वंशजैर्येषां ते_व्यथां_यान्ति_दारुणम्।---सुमन्तु..
>>>>>>>।  >>>>>>>>>>>>>>

 #श्राद्ध_न_करने_वाले_को_कष्ट---।
श्राद्ध न करने वाले को भी पग पग पर कष्ट का सामना करना पड़ता है।
 मृत प्राणी बाध्य होकर श्राद्ध न करनेवाले अपने सगे सम्बन्धियो का रक्त चूसने लगता हैं----:
 #श्राद्धं_न_कुरुते_मोहात्_तस्य_रक्तं_पिवन्ति_ते--ब्र-पु--
साथ ही साथ वह श्राप भी देते हैं---
#पितरस्तस्य_शापं_दत्वा_प्रयान्ति_च-नागरखण्ड-!
 फिर इस अभिशप्त परिवार को जीवन भर कष्ट-ही सहन करना पड़ता है।उस परिवार में पुत्र नही उत्पन्न होता ,कोई निरोग नही रहता,लंबी आयु नही होती,किसी तरह का कल्याण प्राप्त नही होता और मरने के बाद नरक भी जाना पड़ता है।
#न_तत्र_वीरा_जायन्ते_नारोग्यं_न_शतायुष:।
#न_च_श्रेयोधिगच्छन्ति_यत्र_श्राद्धं_विवर्जितम्--हारीत--
#श्राद्धमेतन्न_कुर्वाणो_नरकं_प्रति_पद्यते--विष्णु स् ---
 उपनिषद् में भी कहा गया है--#देवपितृ_कार्याभ्यां_न_प्रमदितव्यम्--तै-उप-१-११-१अर्थात देवता तथा पितृ कार्यो में मनुष्य को कदापि प्रमाद नही करना चाहिये।
प्रमाद से प्रत्यवाय होता है।
>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>

#पितरों_को_श्राद्ध_प्राप्ति_कैसे_होती_है?
 यह जिज्ञासा स्वाभाविक है कि श्राद्ध में दी गयी अन्न आदि सामग्रियां पितरों को कैसे मिलती है, क्योकि विभिन्न कर्मो के अनुसार मृत्यु के वाद जीव को भिन्न-भिन्न गति प्राप्त होती है।
कोई देवता,कोई पितर, कोई प्रेत ,कोई हाथी, कोई चींटी ,कोई वृक्ष, कोई तृण,!

श्राद्ध में दिए गए छोटे से छोटे पिंड से हाथी का पेट कैसे भरेगा?
इसी प्रकार चींटी इतने बड़े पिंड को कैसे खा सकती है?
देवता अमृत से तृप्त होते हैं, पिण्ड से उन्हें कैसे तृप्ति मिलेगी ?

इन प्रश्नों का शास्त्र ने सुस्पष्ट उत्तर दिया है कि नाम गोत्र के माध्यम से विश्वेदेव एवं अग्निश्वात्त आदि दिव्य पितर हव्य-कब्य को पितरों प्राप्त करा देते हैं।
 यदि पिता देवयोनि को प्राप्त हो गया तो दिया गया अन्न उसे वहां अमृत रूप होकर प्राप्त हो जाता है।मनुष्य योनि में अन्न रूप में तथा पशु योनि में तृण रूप में उसे उसकी प्राप्ति होती है।नागादि योनियों में वायु रूप से ,यक्ष योनि में पान रूप से,तथा अन्य योनियों में भी उसे श्राद्धीय वस्तु भोगजनक तृप्तिकर पदार्थो के रूप में प्राप्त होकर अवश्य तृप्त करती है---
#नाममन्त्रास्तथा_देशा_भवन्तरगतानपि ।
#प्राणिन:#प्रीणयन्त्येते_तदाहारत्वमांगतान्।।
#देवो_यदि_पिता_जात:#शुभकर्मानुयोगत:!
#तस्यान्नममृतं_भूत्वा_देवत्वेप्यनुगच्छति ।।
#मर्तयत्वे_ह्यन्नरूपेण_पशुत्वे_च_तृणं_भवेत्।
#श्राद्धान्नं_वायुरूपेण_नागत्वे_प्युपतिष्ठति।।
#पानं_भवति_यक्षत्वे_नाना_भोगकरं_तथा--÷
 जिस प्रकार गोशाला में भूली माता को बछड़ा किसी-न- किसीप्रकार ढूढ ही लेता है,उसी प्रकार मन्त्र तत्तद् वस्तुजात को प्राणी के पास किसी न- किसी प्रकार पहुंचा ही देता है।
नाम गोत्र,ह्रदय की श्रद्धा एवं उचित संकल्प पूर्वक दिए हुए पदार्थो को भक्तिपूर्वक उच्चारित मन्त्र उनके पास पहुंचा देता है।
जीव चाहे सैकड़ो योनियों को भी पार क्यो न कर गया हो तृप्ति तो उसके पास पहुंच ही जाती है।
#यथा_गोष्ठे_प्रणष्टां वै_वत्सोविंदेतमातरम्।
#तथा_तं_नयते_मन्त्रोजंतुर्यत्रावतिष्ठते।।
#नामगोत्रं_च_मन्त्रश्च_दत्तमन्नंनयन्ति तम्।
#अपि_योनि_शतं_प्राप्तांस्तृप्तिस्ताननुगच्छति।
 #नामगोत्रंपितृणाम्_तु_प्रापकं_हव्यकव्ययो:!
श्राद्धस्यमन्त्रस्तस्तत्त्वमुप_लभ्येत्भक्तित:!!
#अग्निश्वात्तादयस्तेषामधिपत्येव्यवस्थिता:!
#नाम_गोत्रास्तथा_देशा_भवन्त्युद्भवतामपि!!
>>>>>><<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<
#ब्राह्मण_भोजन_से_भी_श्राद्ध_की_पूर्णता!!
सामान्यतः श्राद्ध की दो प्रकिया है---१पिण्डदान और २-ब्राह्मण भोजन
मृत्यु के बाद जो लोग देवलोक या पितृलोक में पहुंचते हैं वे मन्त्रो द्वारा बुलाये जाने पर उन -उन लोको से तत्क्षण श्राद्ध देश मे आ जाते हैं और निमंत्रित ब्राह्मणों के माध्यम से भोजन कर लेते हैं।
सूक्ष्मग्राही होने से भोजन के सूक्ष्मकणों के आघ्राण से उनका भोजन हो जाता है, वे तृप्त हो जाते हैं।वेद ने बताया है कि ब्राह्मणों को भोजन कराने से वह पितरों को प्राप्त हो जाता है----:
#इममोदनंनिदधे_ब्राह्मणेषु_विष्टारिणम्_लोकजितं_स्वर्गम्।अथर्व-४-३४-८)
(इमं ओदनम् )इस ओदनोपलक्षित भोजन को (ब्राह्मणेषु नि दधे)ब्राह्मणों में स्थापित कर रहा हूं ।यह भोजन विस्तार से युक्त है और स्वर्ग लोक को जीतने वाला है।
इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए मनु ने लिखा है---:
#यस्यास्येनसदास्न्नती_हव्यानित्रिदिवौकस:!
#कव्यानिचैवपितरः#किं_भूतमधिकं_तत:!
अर्थात ब्राह्मण के मुख से देवता हव्य को और पितर क़व्य को ग्रहण करते हैं।
पितरों के लिये लिखा है-कि ये अपने कर्मवश अंतरिक्ष मे वायवीय शरीर धारण कर रहते हैं।अंतरिक्ष मे रहनेवाला इन पितरों को श्राद्धकाल आ गया है-----यह सुनकर ही तृप्ति हो जाती है।
ये मनोजव होते हैं अर्थात इन पितरों की गति मन की गति की तरह होती है।ये स्मरण से ही श्राद्ध देश मे आ जाते हैं और ब्राह्मणों के साथ भोजन कर तृप्त हो जाते हैं।इनको सब लोग इसलिये नही देख पाते क्योकि इनका शरीर वायवीय होता है--!
#तस्य_तेपितरः#श्रुत्वाश्राद्धकालमुपस्थितम्।
#अन्योन्यंमनसा_ध्यात्वा_सम्पतन्तिमनोजवा:!!
#ब्राह्मणैस्तेसहास्नन्तिपितरो_ह्यन्तरिक्षगा:!
#वायुभूतास्तुतिष्ठन्ति_भुक्त्वायान्ति_परांगतिम्।कूर्म-उ वि२२!३-४
इस विषय मे मनुस्मृति में भी कहा गया है--श्राद्ध के निमित्त ब्राह्मणों में पितर  गुप्त रुप सेनिवास करते है।
प्राणवायु की भांति उनके चलते समय चलते हैं और वैठते समय वैठते है।श्राद्धकाल मे निमंत्रित ब्राह्मणों के साथ ही प्राणरूप या वायु रूप में पितर आते हैं-----!:
#निमंत्रितान्_हि_पितरउपतिष्ठन्तितान्_द्विजान्।
#वायुबच्चानुगच्छन्ति_तथासीनानुपासते।।मनु-३/१८९
मृत्यु के उपरांत पितर सूक्ष्म शरीर धारी होते हैं, इसलिये उनको कोई देख नही पाता।शतपथ ब्राह्मण में कहा है कि----:
#तिर_इव_वैपितरो_मनुष्येभ्य:"(२!३!४!२१)
अर्थात सूक्ष्म शरीरधारी होने के कारण पितर मनुष्यो से छिपे हुए से होते हैं।अतएव सूक्ष्म शरीरधारी होने के कारण ये जल अग्नि तथा वायु प्रधान होते हैं, इसलिये लोक -लोकान्तरों में आने-जाने में उन्हें कोई रुकावट नही हो.
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

#धना_भाव_मे_भी_श्राद्ध_की_सम्पन्नता???

धन की परिस्थिति सबकी एक -सी नही रहती । कभी कभी धन का अभाव हो जाता है, ऐसी परिस्थिति में जबकि श्राद्ध का अनुष्ठान अनिवार्य है,इस दृष्टि से शास्त्र ने धन के अनुपात से कुछ व्यवस्थाएं की है --
यदि अन्न खरीदने में पैसों का अभाव हो तो उस परिस्थिति में शाक से श्राद्ध कर देना चाहिये--- #तस्माच्छ्राद्धंनरो_भक्त्या_शाकै_रपि_यथा_विधि--!
यदि शाक खरीदने में भी असमर्थ हो तो तृण काष्ठ आदि को वेचकर द्रव्य एकत्रित करें और उन पैसों से शाक ख़रीदकर श्राद्ध करे--
#तृणकाष्ठार्जनंकृत्वा_प्रार्थयित्वा_वराटकम्।
#करोति_पितृ_कार्याणि_ततो_लक्षगुणो_भवेत्।।-
अधिक श्रम से यह श्राद्ध किया गया है-अतः फल लाख गुना होता है।
--देशविशेष और कालविशेष के कारण लकड़ियाँ भी नही मिलती !ऐसी परिस्थिति में शास्त्र ने बताया है कि घास से श्राद्ध हो सकता है। घास काटकर गाय को खिला दे।यह व्यवस्था पद्मपुराण ने दी है ।इसके साथ ही इसने इस सम्बंध की एक छोटी सी घटना प्रस्तुत की है--
 एक व्यक्ति धन के अभाव से अत्यंत ग्रस्त था!उसके पास इतना पैसा नही था कि शाक खरीदा जा सके ।इस तरह वह शाक से भी श्राद्ध करने की स्थिति में वह नही था।आज ही श्राद्ध तिथि थी।'"कुतप काल "भीआ पहुंचा था।इस काल के वीतने पर श्राद्ध नही हो सकता था।वेचारा घबरा गया--रो पड़ा--श्राद्ध करे तो कैसे करें??एक विद्वान ने उसे सुझाया --अभी कुतप काल है, शीघ्र ही घास काटकर पितरो के नाम पर गाय को खिला दे ।वह दौड़ गया और घासकाटकर गायों को खिला दी ।इस श्राद्ध के फलस्वरूप उसे देवलोक की प्राप्ति हुई --
#एतत्_पुण्य_प्रसादेन_गतोसौसुरमन्दिरम्-
 ऐसी भी परिस्थिति आ जाती है कि घास का भी मिलना सम्भव नही होता।तब श्राद्ध कैसे करें??
शास्त्र ने इसका समाधान यह किया है कि श्राद्धकर्ता को देश कालवश जब घास का भी मिलना सम्भव न हो ,तब श्राद्ध का अनुकल्प यह है कि श्राद्धकर्ता एकांत स्थान में चला जाये।दोनों भुजाओं को उठाकर निम्नलिखित श्लोक से पितरो की प्रार्थना करे--
#न_मेस्ति_वित्तं_न_धनं_च_नान्यच्छ्राद्धोपयोग्यं_स्वपितृन्नतोस्मि।
#तृप्यन्तु_भक्त्या_पितरो_मयेतौ_कृतौ_भुजौ वर्तम्नि_मारुतस्य!!
 अर्थात हे मेरे पितृगण ।मेरे पास श्राद्ध के उपयुक्त न तो धन है ,न धान्य आदि है।हाँ मेरे पास आपके लिए श्रद्धा और भक्ति  है।में इन्ही के द्वारा तृप्त करना चाहता हूं।आप तृप्त हो जाये।मैंने(शास्त्र की आज्ञा के अनुरूप )दोनों भुजाओं को आकाश में उठा रखा है।
◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

         #यह_स्मरण_अवश्य_रखे!!
 श्राद्ध कार्य मे साधन धन सम्पन्न व्यक्ति को वित्तशाठ्य (कंजूसी) नही करनी चाहिये---
#वित्तशाठ्यम्_न_समाचरेत्।अपने उपलब्ध साधनों से विशेष श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध करना चाहिये।
◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆
 उपयुक्त अनुकल्पो से यह स्पष्ट प्रतीत हो जाता है कि किसी- न- किसी तरह श्राद्ध को अवश्य करे।शास्त्र ने तो स्पष्ट शब्दों में श्राद्ध का विधान दिया है और न करने का निषेध भी किया है।
 श्राद्ध करे ही---
#अतोमूलै:#फलैर्वापितथाप्युदकतर्पणै:#पितृतृप्तिंप्रकुर्वीत् -------!!
श्राद्ध छोड़े नही---
#नैव_श्राद्धम्_विवर्जयेत्।
||व्यर्थ कुछ लिखने से अच्छा है कुछ सार्थक लिखे||
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
#श्राद्ध_के_अधिकारी_कौन???
पिता का श्राद्ध करने का अधिकार मुख्य रूप से पुत्र को ही है।बहुत पुत्र होने पर अंत्येष्टि से लेकर एकादशाह तथा द्वादशाह की सभी क्रियाएं ज्येष्ठ पुत्र को करनी चाहिये।
विशेष परिस्थिति में बड़े भाई की आज्ञा से छोटा भाई भी कर सकता है।यदि सभी भाइयों का संयुक्त परिवार हो तो वार्षिक श्राद्ध भी ज्येष्ठ पुत्र के द्वारा एक ही जगह सम्पन्न हो सकता है।यदि पुत्र अलग-अलग हो तो उन्हें वार्षिक श्राध्द अलग अलग करना चाहिये----!:
#मृते_पितरि_पुत्रेणक्रिया_कार्या_विधानत:!
#वहव:स्युर्यदापुत्रा:#पितुरेकत्रवासिनः।।

#सर्वेषां_तु_मतं_कृत्वा_ज्येष्ठे_नैव_तु_यत्कृतम्।
#द्रव्येण_चाविभक्तेनसर्वेरैव_कृतं_भवेत्।।---वीरमित्रोदय श्रा0प्र०में प्रचेता का वचन)

#एकादशाद्या:क्रमशो ज्येष्ठस्य विधिवत् क्रिया:।
क़ुर्युर्नैकेकश: श्राद्धमाब्दिकं तु प्रथक् प्रथक्।।--उपरोक्त--

: यदि पुत्र न हो तो शास्त्रों में श्राद्धाधिकारी के लिये विभिन्न व्यस्थाये प्राप्त है।स्मृतिसंग्रह तथा श्राद्धकल्पलता के अनुसार श्राद्ध के अधिकारी पुत्र पौत्र प्रपौत्र दौहित्र(पुत्री का पुत्र)भाई भतीजा भानजा पिता पत्नि माता पुत्र वधु वहिन सपिंड(स्वयं से लेकर पूर्व की सात पीढ़ी तक का परिवार)तथा सोदक (आठवी से लेकर चौदहवीं पीढ़ी तक के परिवार) कहे गए हैं!यथा----: मूलपुरुषमारभ्य सप्तमपर्यंतं सपिंडा:,अष्टमारभ्य चतुर्दशपुरूषपर्यंतं सोदका:,पंचदशमारभ्य एकविंशतिपर्यन्तं सगोत्रा:।पित्रादयस्त्रयश्चैव तथा तत्पूर्वजास्त्रय:।।

सप्तम:स्यात्स्वयं चैव तत्सापिण्ड्यम् वुधै:स्मृतम्। 
सापिंड्यम् सोदकं चैव सगौत्रम् वै क्रमात्।।

एकैकं सप्तकं चैकं सापिण्ड्यकमुदाहृतम्।।--लघवाश्वलायन स्मृति--२०/८२-८४)

कहे गए है--इनमें पूर्व -पूर्व के न रहने पर क्रमश: बाद के लोगो का श्राद्ध करने का अधिकार प्राप्त है।
 पुत्र पौत्राश्च तत्पुत्रः पुत्रिका पुत्र एव च।
पत्नि भ्राता च तज्जश्च पिता माता स्नुषा तथा!!

भगिनी भागिनेयश्च सपिंड: सोदकस्तथा।
असन्निधाने पूर्वेषामुत्तरे पिण्डदा:स्मृताः।।(स्मृति-सं०,श्राध्द०कल्प०)

 विष्णुपुराण के वचन अनुसार पुत्र पौत्र प्रपौत्र भाई भतीजा अथवा अपनी सपिंड सन्तति में उत्पन्न हुआ पुरुष ही श्राद्ध क्रिया करने अधिकारी होता है।यदि इन सबका अभाव हो तो समानोदक की सन्तति अथवा मातृपक्ष के सपिंड अथवा समानोदक को इसका अधिकार है।मातृकुल और पितृकुल दोनों के नष्ट हो जाने पर स्त्री ही इस क्रिया को करे अथवा(यदि स्त्री भी न हो तो)साथियों में से ही कोई करे या बाँधवहीन मृतक के धन से राजा ही उसके प्रेत कर्म करावे।

पुत्र:पौत्र:प्रपौत्रोवा भ्राता वा भ्रातृसन्तति:!
सापिण्डसन्ततिर्वापि क्रियार्हो नृप जायते!!

तेषामभावे सर्वेषां समानोदक सन्तति:!
मातृपक्ष सपिंडेन सम्बद्धा ये जलेन वा ।

कुलद्वेपि चोच्छिन्नो स्त्रिभि: कार्या: क्रिया नृप!!
सङ्घातान्तर्गतैर्वापि कार्या: प्रेतस्य च क्रिया:!उत्सन्नबन्धुरिक्थाद्वा कारयेदवनी पति:!!

 हेमाद्रि के अनुसार पिता की पिण्डदानादि क्रिया पुत्र को ही करनी चाहिये।
(पुत्र के अभाव में पत्नी करे पत्नी के अभाव में सहोदर भाई को करनी चाहिये-)
पितु:पुत्रेण कर्तव्या पिण्डदानोदक क्रिया।
पुत्राभावे तु पत्नीस्यात् पत्न्यभावे तु सोदर:(हेमाद्रि में शंख का वचन)
 मार्कण्डेय पुराण में बताया गया है कि चूंकि राजा सभी वर्णों का बन्धु होता है।अतः सभी श्राद्धाधिकारी जनों के अभाव होने पर राजा उसमृत व्यक्ति के धन से उसके जाति के बांधवों द्वारा भलीभांति दाह आदि सभी और्ध्वदैहिक क्रिया कराये।।--।।

सर्वाभावे तु नृपति:कारयेत तस्य रिक्वत:!
तज्जातीयेन वै सम्यग् दाहाद्या: सकला:क्रिया:!!

||सर्वेषामेव वर्णानां वांधवो नृपतिर्यत:||
••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••

शास्त्रों में श्राद्ध के अनेक भेद है, किंतु यहाँ उन्ही श्राद्धों को उल्लेखित किया जाता है ,जो अत्यंत आवश्यक और अनुष्ठेय है---
मत्स्यपुराण में तीन प्रकार के श्राद्ध बताये गये है--
#नित्यं नैमित्तिकं काम्यं त्रिविधं श्राद्ध मुच्यते--!!
नित्य नैमित्तिक और काम्य -भेद से श्राद्ध तीन प्रकार के होते हैं||

यम स्मृति में पांच प्रकार के श्राद्ध का उल्लेख मिलता है--नित्य,नैमित्तिक, काम्य,वृद्धि और पार्वण--
#नित्यं नैमित्तिकं काम्यं वृद्धिश्राद्धमथापरम्।
#पार्वणम् चेति विज्ञेयं श्राद्धं पञ्चविधं वुधै||
प्रतिदिन किये जाने वाले श्राद्ध को नित्य श्राध्द कहते हैं।इसमें विश्वेदेव नही होते तथा अशक्तावश्था में केवल जलप्रदान से भी इस श्राद्ध की पूर्ति हो जाती है---:

#अहन्यहनि यच्छ्राद्धम् तन्नित्यमिति कीर्तितम्!
#वैश्विदेवविहीनं तदशक्तावुदकेन तु!!
तथा एकोदिष्ट श्राद्धको नैमित्तिक श्राध्द कहते हैं, इसमें भी विश्वेदेव नही होते ।किसी कामना की पूर्ति निमित्त किये जाने वाले श्राद्ध को काम्यश्राद्ध कहते हैं!
वृद्धिकाल में पुत्रजन्म तथा विवाहादि मांगलिक कार्य मे जो श्राद्ध किया जाता है, उसे वृध्दि श्राद्ध (नांदिश्राद्ध)कहते हैं।पितृपक्ष, अमावश्या ,अथवा पर्व की तिथि आदि पर जो सदैव (विश्वेदेव सहित) श्राद्ध किया जाता है उसे पार्वण श्राद्ध कहते हैं||
 विश्वामित्र स्मृति तथा भविष्यपुराण नित्य,नैमित्तिक, वृद्धि,पार्वण ,सपिण्डन, गोष्ठी ,शुद्धयर्थ कर्मांग,दैविक,यात्रार्थ,तथा पुष्ट्यर्थ --ये द्वादश प्रकार के श्राद्ध बताये गये है----÷
#नित्यं नैमित्तिकं काम्यं वृद्धिश्राद्ध सपिंडनम्।
#पार्वणम् चेति विज्ञेयं गोष्ठीम् शुद्धयर्थमष्टकम्।।

#कर्मागं नवमं प्रोक्तं दैविकं दशमं स्मृतम्!
#यात्रास्वेकादशं प्रोक्तं पुष्ट्यर्थं द्वादशं स्मृतम्।।

--------ये बारह प्रकार के श्राद्ध बताये गये है ।प्रायः सभी श्राद्धों का अंतर्भाव उपर्युक्त पञ्चश्राद्धों में हो जाता है।
जिस श्राद्ध में प्रेतपिण्ड का पितृपिण्डो में सम्मेलन किया जाये,उसे सपिण्डन श्राध्द कहते है।
समूहोंमें जो श्राद्ध किया जाता है, उसे गोष्ठीश्राद्ध कहते हैं।शुद्धि के निमित्त जिस श्राद्ध में ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है ,उसे शुद्धयर्थ श्राद्ध कहते हैं।गर्भाधान, सीमन्तोनयन,तथा पुंसवन आदि संस्कारो के समय जो श्राध्द किया जाता है उसे कर्मांग श्राद्ध कहते हैं।सप्तमी आदि तिथियों में विशिष्ठ हविष्य के द्वारा देवताओं के निमित्त जो श्राध्द किया जाता है, उसे दैविक श्राध्द कहते हैं!तीर्थ के उद्देश्य से देशांतर जाने के समय घृतद्वारा जो श्राद्धकिया जाता है ,उसे यात्रार्थश्राध्द कहते है!शारीरिक अथवा आर्थिक उन्नति के लिये जो श्राद्ध किया जाता है,उसे पुष्ट्यर्थश्राध्द कहते हैं।

उपर्युक्त सभी श्राद्ध श्रोत स्मार्त्त --भेद से दो प्रकार के होते है।पिण्डपितृयाग--÷÷
(अमावश्यायां पिण्डपितृयाग:--(इस वचन के अनुसार पिंडपितृयाग "अमावश्या के लिए होता है ।इस याग को करने का अधिकार केवल अग्निहोत्री को है)को श्रोतश्राद्ध कहते हैं-और-एकोदिष्ट ,पार्वण ,तथा तीर्थश्राद्ध से लेकर मरणतक के श्राद्ध को स्मार्त श्राद्ध कहते हैं।

श्राद्ध के ९६अवसर है।बारह मास की अमावश्याएँ ,सत्ययुग,त्रेतादि,युगों की प्रारम्भ की चार युगादि तिथियाँ,मनुओं के आरंभ की चौदह,मन्वादि तिथियां, बारह संक्रांतियाँ, बारह वैधृति योग,बारह व्यतीपात योग,पंद्रह महालय श्राद्ध(पितृपक्ष)पांच अष्टका,पांच अनवष्टका,तथा पांच पूर्वेद्यु:--ये ९६अवसर श्राद्ध के लिये है--||

#अमायुगमनुक्रान्तिधृतिपातमहालया:!
#अष्टकान्वष्टकापूर्वेद्यु:श्राद्धैर्नवतिश्च षट्||
<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<

#मृत्युतिथि_तथा_पितृपक्ष_में_श्राद्ध_करना_आवश्यक---||वर्तमान समय मे अधिकांश मन

सोमवार, 30 सितंबर 2024

आर्य समाज और संघ में अन्तर

संघ परिवार हमेशा कहता है कि, हमें इज्राइल से सीखना चाहिए, यहुदियों से सीखना चाहिए, मुस्लिमों से सीखना चाहिए, यूरोप, अमेरिका और चीन से सीखना चाहिए।
महर्षि दयानन्द सरस्वती कहते थे कि, हमें वेदों से सीखना चाहिए वापस वेदों की ओर चलो विश्व को श्रेष्ठ, सदाचारी, सद्धर्म में प्रवर्त आर्य बनाओ (कृण्वन्तम विश्वार्यम्) आर्यसमाज भी हमेशा कहता है कि हमें वैदिक शिक्षा ही ग्रहण करना चाहिए। वेदों से ही शिक्षा मिल सकती है। वेदों से ही सीखो।
ऐसा कभी संघ या संघ परिवार कहना तो दूर सोच भी नहीं सकता। क्योंकि उनके आदर्श मुसोलिनी और फ़ासिज़्म है, तान्त्रिक हैं वैदिक नहीं।
उधर 
इज्राइल कहता है कि, यह युद्ध कौशल हमने शिवाजी से सीखा।
सम्भवतः शिवाजी मानते हों कि, यह युद्ध कला हमने भगवान श्रीकृष्ण की नारायणी सेना से सीखी।
भगवान श्रीकृष्ण कहते थे कि, उन्होंने वेदों से शिक्षा ग्रहण की। नारायणी सेना यजुर्वेद और धनुर्वेद के सिद्धान्तों पर आधारित संगठन था।
अन्त में दिल्ली आर्यसमाज के डॉक्टर विवेक आर्य के शब्दों में ⤵️

धार्मिक क्षेत्र में संघ अभी तक अपनी मान्यताएं स्थापित नहीं कर पाया है । 
 संघ ने ऐसा कार्य नहीं किया, जिससे कोई बड़ा सामाजिक/धार्मिक परिवर्तन किया हो ।
परन्तु, आर्यसमाज के ऐसे अनेक कार्य हैं जो संघ ने स्वयं आर्यसमाज से उधार लिया है  । 
संघ की सबसे बड़ी अशक्तता उसका सनातन वैदिक धर्मियों  के धार्मिक मामलों में किसी भी प्रकार का कोई मार्गदर्शन नहीं दे पाना है । जैसे ,  संघ ने परम्परागत हिन्दुओं को ना कभी मजारों/ कब्रों पर सर पटकने से रोका है, और ना ही साईं बाबा उर्फ़ चाँद मियां को ईश्वर के रूप में पूजने से | ना ही रामरहीम, रामपाल, राधे माँ के पाखंड में फंसने से रोका, और ना ही वेद ज्ञान के प्रचार प्रसार के लिए कुछ किया है । 
जबकि संघ के पास देश, प्रदेश की सरकार से लेकर नगर निकायों की सत्ता, हजारों विद्यालय, लाखों स्वयंसेवक, मजबूत संगठन आदि सब कुछ है । 
आर्यसमाज के युवा हजारों की संख्या में दिन-रात बिना किसी लोभ, प्रलोभन, पद, नेतागिरी के सनातन धर्मी समाज को वो बात सिखला रहा है , जो वो पिछले 1200 वर्षों में भी नहीं समझ पाया है ।
स्वामी दयानन्द सरस्वती जो समझाना चाहते थे, वह सनातन धर्मी समाज समझने को तैयार नहीं है । 
संघ का चर्चा में रहना, और जुमलेबाजी करना कि 2021 में भारत विश्व गुरु बन जायेगा हम जानते हैं । परन्तु संघ को भी स्वयम् यह ज्ञात नहीं है कि, कैसे बनेगा ? और धरातल पर यथार्थ कार्य करने में और जुमले बाजी करने में बहुत अंतर है। 
आर्यसमाज को भी अपनी प्रचार शैली में परिवर्तन की आवश्यकता है । सरल, प्रभावशाली रूप में स्वामी दयानन्द सरस्वती की मान्यताओं को प्रचारित किया जाये ।
मैं संघ की संगठन क्षमता की प्रशंसा करना चाहूँगा, जिसकी आर्यसमाज में कमी है । 
आशा है कि आप मेरी बात को अन्यथा न लेकर मेरे चिंतन को समझेगें । मैं व्यर्थ में किसी की निंदा करने में अपना समय व्यर्थ नहीं करता । परन्तु मैंने जो वर्षों में देखा, समझा वो आपसे साझा किया है ।

रविवार, 29 सितंबर 2024

पौराणिकों ने सदाचारी, सच्चरित्र श्रीकृष्ण को हिन्दू अर्थात काला-कलूटा, चौर- लुटेरा, लुच्चा-लफंगा-बदमाश, दास-दस्यु, डाकू और बलात्कारी सिद्ध कर दिया।

धूर्त यूरोपीय लोगों ने ईरान के स्थान पर हमेशा पर्शिया शब्द का उपयोग किया जिसमें ईरान के साथ इराक (असीरिया और बेबीलोन) आ जाता है। और अधिक विस्तार देखें तो सीरिया और पूर्वी टर्की भी आ जाता है। जिससे चन्द्रवंशियों अर्थात आदमियों (खातियों और यादवों) को असली आर्य सिद्ध कर सकें।

चन्द्रवंशियों में एकमात्र अपवाद।
जो सदाचारी थे। जिन्हें वास्तव में आर्य कहा जा सकता है।
लेकिन 
हमारे पौराणिकों नें तो श्रीकृष्ण को भी नहीं छोड़ा, उन्हें पक्का हिन्दू अर्थात काला-कलूटा, चोर (चोल), लूटेरा, सेंधमार, लुच्चा- लफंगा, बदमाश, दास- दस्यु (दृविड़), डाकू, बलात्कारी
सिद्ध कर दिया।

यह है तो, थोथा तर्क, लेकिन इस परिकल्पना को आसानी से सिद्ध किया जा सकता है कि,
जरथ्रुस्त्र से अथर्ववेदीय ब्राह्मण ग्रन्थ अवेस्ता पर शास्त्रार्थ करने भारत से ईरान गये श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास जी को अवेस्ता के जेन्द भाष्य में श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास जी को कृष्ण वर्णिय देखकर हिन्दू अर्थात काला  (कृष्ण) लिखा है।
इससे प्रेरित होकर पारसी शब्द हिन्दू के अर्थ काला-कलूटा, चोर (चोल), लूटेरा, सेंधमार, लुच्चा- लफंगा, बदमाश, दास- दस्यु (दृविड़), डाकू, बलात्कारी जान समझकर  पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण के चरित्र पर उक्त सभी आरोप लगा कर श्रीकृष्ण चरित्र लिख दिया हो।

रविवार, 22 सितंबर 2024

श्राद्ध पक्ष में कुतप मुहूर्त मतलब दिन का आठवाँ मुहूर्त और रोहिण मुहूर्त मतलब दिन का नौवा मुहूर्त।

सूर्यास्त समय में से सूर्योदय समय घठाएँ। जो अन्तर घण्टा मिनट आयेगा, वह दिनमान कहलाता है।
दिनमान में पन्द्रह का भाग दें।
भागफल के जो घण्टा मिनट सेकण्ड आये वह एक मुहूर्त का मान होगा। जो लगभग 48 मिनट के आसपास होता है।
भागफल के घण्टा मिनट सेकण्ड में सात का डुणा करें। 
गुणनफल के जो घण्टा मिनट आये उसमें उस दिन का सूर्योदय समय जोड़ दें। योग फल के घण्टा मिनट कुतप काल का प्रारम्भ आयेगा।
कुतप मुहूर्त के प्रारम्भ होने के समय में एक मुहूर्त का मान के घण्टा मिनट जोड़ दें। तो कुतप मुहूर्त का समाप्त होने और रोहिण मुहूर्त का प्रारम्भ समय आयेगा।
रोहिण मुहूर्त में पुनः मुहूर्त मान के घण्क मिनट जोड़ दें तो रोहिण काल आ जाएगा।
धर्मशास्त्र के अनुसार धार्मिक कार्यों में सूर्योदय समय और सूर्यास्त गणितागत भूकेन्द्रीय सूर्योदय समय ही मान्य होता है।
गूगल पर, मौसम एप वाले या समाचारपत्रों में भूपृष्ठ पर उपरी बिम्ब दृष्य सूर्योदय समय और भूपृष्ठ पर उपरी बिम्ब दृष्य सूर्यास्त बतलाया जाता है।
गणितागत सूर्योदय अर्थात धार्मिक सूर्योदय और सूर्यास्त में और भूपृष्ठ पर उपरी बिम्ब दृष्य सूर्योदय/ सूर्यास्त समय में लगभग साढ़े तीन मिनट का अन्तर रहता है। जो ऋतुओं के साथ घटता बढ़ता है।
इसके अलावा एक मुहूर्त के मान में क्रमशः 
7 का गुणा कर गुणनफल नोट करलें।
फिर 
8 का गुणा कर गुणनफल नोट करलें।
और फिर 
9 का गुणा कर गुणनफल नोट करलें।
फिर 
सूर्योदय + 7का गुणनफल = कुतप मुहूर्त का प्रारम्भ समय।=11 बजकर 55 मिनट।
फिर 
सूर्योदय + 8 गुणनफल = कुतप मुहूर्त का प्रारम्भ समय + मुहूर्त मान= कुतप मुहूर्त का समाप्त होने का समय। और रोहिण मुहूर्त का प्रारम्भ समय = 12 बजकर 44मिनट।
फिर 
सूर्योदय + 9 गुणनफल = रोहिण मुहूर्त का प्रारम्भ होने का समय + मुहूर्त मान= रोहिण मुहूर्त का समाप्त होने का समय। अपराह्न काल प्रारम्भ होने का समय।13 बजकर 32 मिनट



उदाहरणार्थ 
दिनांक 28 सितम्बर 2024 को 
धार में गणितागत सूर्यास्त - धार में गणितागत सूर्योदय= दिनमान।
18h22m-6h17m=12h05m

दिनमान ÷15 = मुहूर्त मान।
12h05m÷15=0h48m20s

मुहूर्त मान × 7 = गुणनफल।
0h48m15s ×7= 5h38m20s

सूर्योदय समय+ गुणनफल= कुतप मुहूर्त का प्रारम्भ समय।=11 बजकर 55 मिनट ⤵️
06h17m+5h38m20s=11h55m20s

कुतप मुहूर्त का प्रारम्भ समय + मुहूर्त मान= कुतप मुहूर्त का समाप्त होने का समय। और रोहिण मुहूर्त का प्रारम्भ समय = 12 बजकर 44मिनट⤵️
11h55m20s+0h48m20s= 12h43m40s

रोहिण मुहूर्त का प्रारम्भ होने का समय + मुहूर्त मान=  रोहिण मुहूर्त का समाप्त होने का समय। अपराह्न काल प्रारम्भ होने का समय।13 बजकर 32 मिनट⤵️
12h43m40s+ 0h48m20s=13h32m00s

शनिवार, 21 सितंबर 2024

जो जीवन भर तीर्थ यात्रा पर नहीं जा पाये उनके लिए भरणी श्राद्ध।

भरणी श्राद्ध 
सूर्य से चन्द्रमा के प्रत्येक बारह अंश (12°) के अन्तर को तिथि कहते हैं। और सूर्य से चन्द्रमा के प्रत्येक छः अंश (6°) के अन्तर को करण कहते हैं।
चन्द्रमा भू परिभ्रमण में 27 तारा मण्डल के सम्मुख से निकलता है। जिस तारा मण्डल के सम्मुख से निकलता है उस अवधि को चन्द्र नक्षत्र कहते हैं।
तिथियों के अतिरिक्त नक्षत्रों के श्राद्ध भी होता है। इसमें भरणी श्राद्ध मुख्य है। इसके अलावा मघा श्राद्ध भी होता है।
कारण यह है कि, भरणी नक्षत्र के देवता यम हैं। और यम सप्त पितरों में से एक हैं।
मघा नक्षत्र के देवता पितरः हैं।
इसलिए इन नक्षत्रों के अपराह्न व्यापी होने के दिन श्राद्ध होता है।
इनके अतिरिक्त उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के देवता अर्यमा तो सप्त पितरों के राजा हैं। जिनका अधिकार कव्य में है। अर्थात अर्यमा को भी श्राद्ध भाग प्राप्त होता है।
और 
उत्तराषाढ़ नक्षत्र के स्वामी विश्वेदेवाः को भी श्राद्ध भाग दिया जाता है।

दो सूर्योदय के बीच के समय (प्रायः 24घण्टे) को वार कहते हैं।

सूर्य स्पष्ट और चन्द्र स्पष्ट के योग का सत्ताइसवाँ भाग योग कहलाता है। ये सब पञ्चाङ्ग के अङ्ग है।

श्राद्ध प्रकरण में इन सबके श्राद्ध का भी उल्लेख है। लेकिन प्रचलित केवल तिथियों के श्राद्ध ही हैं शेष प्रचलित नहीं है। फिर भी भरणी श्राद्ध प्रचलित है।

अब मूल मुद्दे *भरणी श्राद्ध पर ही विचार किया जाएगा।* 
सनातन धर्म के स्मृति ग्रन्थों के अनुसार प्रत्येक मानव को जीवन में तीर्थ यात्रा करना ही चाहिए।
चार प्राचीन तीर्थ ये हैं- 
सतयुग का तीर्थ पुष्कर तीर्थ (अजमेर के पास)।
त्रेता का तीर्थ नैमिशारण्य (निमिस उत्तर प्रदेश), 
द्वापर का तीर्थ कुरुक्षेत्र (हरियाणा)। और
कलियुग का तीर्थ गङ्गा। 
सौरों (पश्चिम उत्तर प्रदेश), प्रयागराज, काशी (वाराणसी), हरिद्वार, ऋषिकेश, गङ्गोत्री, और गौ मुख, गङ्गा ग्लेशियर और गङ्गासागर ये गङ्गा के प्रमुख तीर्थ हैं।
ऐसे ही चार अर्वाचीन तीर्थ हैं---
बद्रीनाथ, जगन्नाथपुरी, डाकोर और द्वारका पुरी तथा रामेश्वरम (तमिलनाडु) या परशुरामेश्वर (कर्नाटक-केरल सीमा पर गुरवायुर के निकट)। 
इन तीर्थ स्थानों पर जीवन में एकबार स्नान, दान, होम-हवन, यज्ञ, श्राद्ध, तर्पण और तपस्या करना चाहिए।
जो लोग तीर्थ यात्रा पर नहीं ज पाये उनका श्राद्ध पक्ष में भरणी श्राद्ध भरणी नक्षत्र के दिन किया जाता है।
जो पूरे जीवन काल में तीर्थ यात्रा नहीं कर पाये उसके लिए, और तीर्थ स्थल पर मृत्यु नहीं होने, मृत्यु के समय गोबर से लेपन की हुई भूमि पर पद्मासन में बैठकर ॐ मन्त्रोच्चार के साथ परमात्मा का ध्यान करते हुए मृत्यु न होने या उत्तर में सिर करके चित लेटकर ॐ मन्त्रोच्चार के साथ परमात्मा का चिन्तन न करते हुए मृत्यु को प्राप्त हुए मानव का, मरते समय मुख में गङ्गा जल और तुलसी पत्र नहीं था, ख़राब तिथि, वार, नक्षत्र योग करण, मुहूर्त , घटि या लग्न में मृत्यु होने के लगे दोष के लिए दशाह, एकादशाह, द्वादशाह, मङगलश्राद्ध तृयोदशाह, मासिक श्राद्ध, द्विमासिक श्राद्ध, त्रेमासिक श्राद्ध, अर्ध वार्षिक श्राद्ध (छः मासी), वार्षिक श्राद्ध (बरसी), द्वि वार्षिक श्राद्ध और श्राद्ध में लेने के लिए विष्णु पूजा के समय प्रायश्चित किया जाता है।
बाद में गया श्राद्ध, और बद्रीनाथ में ब्रह्म कपाली में भी इनका प्रायश्चित होता है। अतः बाद में वापस करना आवश्यक नहीं है। लेकिन भयभीत वंशज फिर भी ये श्राद्ध करते हैं।
भरणी श्राद्ध भरणी नक्षत्र में मातृ गया (सिद्धपुर- गुजरात)/ पितृ गया (बिहार), ब्रह्मकपाली - बद्रीनाथ (उत्तराखण्ड) में श्राद्ध पक्ष में अपराह्न व्यापी भरणी नक्षत्र के दिन किया जाता है।

शुक्रवार, 20 सितंबर 2024

श्राद्ध प्रकरण में पार्वण श्राद्ध और एकोद्दिष्ट श्राद्ध का अन्तर तथा दिन रात के विभाग।


 पार्णव श्राद्ध का मतलब क्या है?
उत्तर --
श्राद्ध के मुख्य दो प्रकार हैं - पार्वण श्राद्ध और एकोद्दिष्ट श्राद्ध।
तीर्थ श्राद्ध, विवाह, यात्रा आदि अवसर पर नान्दिमुख श्राद्ध के कर्म सब एकोद्दिष्ट श्राद्ध के अन्तर्गत ही आते हैं।
जो श्राद्ध - श्राद्धपक्ष में किया जाता है, अथवा पूर्णिमा, अमावस्या या संक्रान्ति पर्व पर किया जाता है वह श्राद्ध पार्णव श्राद्ध कहलाता है।
इसमें माता-पिता की मृत्यु तिथि जिस दिन अपराह्न व्यापी हो उस दिन ही श्राद्ध होता है। या अपराह्न व्यापी पूर्णिमा-अमावस्या के दिन श्राद्ध होता है। 
लेकिन श्राद्ध का प्रारम्भ मध्याह्न में करके अपराह्न समाप्ति के पहले तर्पण आदि करके श्राद्ध पूर्ण कर लिया जाना चाहिए।
 जिस दिन कोई पर्व हो या नहीं हो, लेकिन व्यक्ति की मृत्यु तिथि हो, या तीर्थ स्थल पर या विवाह आदि अवसर पर, या यात्रा आदि के पहले किसी कार्यवश किसी एक ही व्यक्ति का श्राद्ध हो तो उसे एकोद्दिष्ट श्राद्ध कहते हैं। यह मध्याह्न काल व्यापी तिथि में किया जाता है।

दुसरा प्रश्न है कि, पूर्वाह्न काल, मध्याह्न काल, अपराह्न काल आदि कैसे ज्ञात करें?
उत्तर -
सामान्यतः सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन कहलाता है। और सूर्यास्त से सूर्योदय तक रात्रि कहलाती है।
उक्त दिन और रात के विभिन्न प्रकार से विभाग किये गए हैं। जैसे दिन के तीन भाग - पूर्वाह्न, मध्याह्न और अपराह्न। साधारणतः इनका ही प्रयोग होता है। विशेष कर देवकर्म में ये ही विभाग उपयोग किये जाते हैं।
दिन के पाँच भाग - प्रातः काल, सङ्गव काल, मध्याह्न काल, अपराह्न काल और सायाह्न काल। ये प्रायः पितृ-कर्म अर्थात श्राद्धादि में ही अधिक उपयोग होते हैं।
सूर्यास्त समय में से सूर्योदय का समय घटाने पर दिनमान आता है।
दिनमान में पाँच का भाग देने पर एक-एक काल की अवधि ज्ञात होती है। उदाहरणार्थ दिनमान यदि बारह घण्टे का हो तो 12÷5= 2 घण्टे 24 मिनट।
अर्थात दिन का प्रत्येक काल 02 घण्टे 24 मिनट का ही होता है। 
सूर्योदय समय में 2 घण्टे 24 मिनट जोड़ने पर सूर्योदय से योगफल तक प्रातः काल।
फिर प्रातः काल के समाप्ति समय में पुनः 2 घण्टे 24 मिनट जोडें तो सङ्गव काल का समाप्ति समय आयेगा। सङ्गव काल का समाप्ति समय में 2 घण्टे 24 मिनट जोडें तो मध्याह्न काल का समाप्त होने का समय मिलेगा। मध्याह्न काल का समाप्त होने का समय में 2 घण्टे 24 मिनट जोडें तो अपराह्न काल का समाप्त होने का समय आयेगा ।अपराह्न काल का समाप्त होने का समय में 2 घण्टे 24 मिनट जोडें तो सायाह्न काल समाप्ति का समय मिलेगा अर्थात सूर्यास्त समय आयेगा।
ऐसे ही रात्रि के भी पाँच विभाग होते हैं। लेकिन अन्तर केवल इतना ही है कि, रात्रि के काल समान न होकर भिन्न-भिन्न होते हैं।
यदि अगले सूर्योदय समय में से आज का सूर्यास्त समय घटाय जाए तो रात्रि मान आयेगा।
रात्रि मान में पन्द्रह का भाग देने पर एक मुहूर्त की अवधि मिलेगी। जो प्रायः 48 मिनट के आसपास होगा।
यदि रात्रि मान 12 घण्टे हुआ तो---
एक मुहूर्त=00 घण्टा 48 मिनट।
दो मुहूर्त = 1 घण्टा 36 मिनट।
तीन मुहूर्त= 02 घण्टे 24 मिनट।
चार मुहूर्त= 3 घण्टे 12 मिनट।
पाँच मुहूर्त= 04 घण्टे।

सूर्यास्त से तीन मुहूर्त (02 घण्टे 24 मिनट) तक प्रदोषकाल।
फिर अगले चार मुहूर्त (3 घण्टे 12 मिनट) तक पूर्व रात्रि काल।
फिर अगला एक मुहूर्त (00 घण्टा 48 मिनट) निशा/ निशिता काल (या महानिशिथ काल)।
फिर अगले पाँच मुहूर्त (4 घण्टे 00 मिनट) तक उत्तर रात्रि।
अन्त में दो मुहूर्त (1 घण्टा 36 मिनट) जोड़ने पर अरुणोदय काल का समाप्ति समय अर्थात अगले सूर्योदय का समय आ जाएगा।
ऐसे सामान्य घण्टा मिनट का जोड़ने का अभ्यास करने पर कोई भी ज्ञात कर सकता है।

ऐसे ही दिनमान के तीन भाग पूर्वाह्न मध्याह्न और अपराह्न भी ज्ञात कर सकते हैं।

स्पष्ट मध्याह्न अर्थात दिनमान के ठीक मध्य का समय।
दिनमान ÷2= अर्ध दिवस।
सूर्योदय+अर्ध दिवस= स्पष्ट मध्याह्न।

स्पष्ट मध्य रात्रि मतलब रात्रि मान का ठीक मध्य का समय।

रात्रि मान ÷2= अर्ध रात्रि।
सूर्यास्त+अर्ध रात्रि= स्पष्ट मध्यरात्रि।

निशा या निशिता काल को ही कालाष्टमी, मास शिवरात्रि, पूर्णिमा, अमावस्या और विशेषकर शरद पूर्णिमा, दीपावली और महाशिवरात्रि पर्व की रात में महानिशिथ काल कहलाता है।
अरुणोदय का उत्तरार्ध अर्थात रात्रि की अन्तिम घटि (लगभग 24 मिनट) या अगले सूर्योदय के पहले की घड़ी (लगभग 24 मिनट) को उषाकाल कहते हैं।
और सूर्यास्त के ठीक बाद की घड़ी (लगभग 24 मिनट) को सन्ध्या कहते हैं।
दिनमान और रात्रि मान का पन्द्रहवाँ भाग (दिनमान या रात्रि मान÷ 15=लगभग 48 मिनट के आसपास का समय) मुहूर्त मान होता है।
और दिनमान और रात्रि मान का तीसवाँ भाग (दिनमान या रात्रि मान÷ 30= लगभग 24 मिनट के आसपास का समय) घटि मान होता है।
प्रत्येक दिन और रात्रि में अथर्व वेदोक्त पन्द्रह-पन्द्रह मुहूर्त होते है।

बुधवार, 18 सितंबर 2024

शास्त्रोक्त कर्म ही करें और शास्त्रोक्त कर्म भी शास्त्रीय विधि से ही करें।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि,

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्‌॥ श्रीमद्भगवद्गीता 16/23
जो पुरुष शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को ही ॥16/23
 तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥ श्रीमद्भगवद्गीता 16/24
इससे तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्र विधि से नियत कर्म ही करने योग्य है ॥16/24॥
केवल शास्त्रीय विधि से ही शास्त्रीय कर्म ही करे। अतः शास्त्र ज्ञान प्राप्त करना सभी का कर्तव्य है।

सम्पूर्ण रूपेण ईश्वरार्पण होकर ही केवल निष्काम भाव से केवल परमात्मा की ही आराधना - उपासना  करें।
क्योंकि,
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसा: ।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जना: श्रीमद्भगवद्गीता 17/4
सत्वगुणी लोग देवताओं की पूजा करते हैं, रजोगुणी लोग यक्षों और राक्षसों की पूजा करते हैं, और तमोगुणी लोग पञ्चमहाभूतों, और मृतकों की कब्र में स्थित प्रेतों (पिशाचों) की पूजा करते हैं. 

प्रश्न उठता है कि कर्म बन्धन से छूटकर परम शान्ति लाभ करने के लिये मनुष्य को क्या करना चाहिये? इस पर भगवान् उसका कर्तव्य बतलाते हुए कहते हैं-

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् श्रीमद्भगवद्गीता 18/ 62

हे भारत ! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में जा। उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शान्ति को तथा सनातन परम धाम को प्राप्त होगा 18/62
 
 इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात कही है --- 
 तमेव शरणं गच्छ सर्व भावेन भारतः। 
 तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में जा।

सभी लोगों को शास्त्र ज्ञान नहीं है; इसलिए मैं व्रत, पर्व, उत्सव और त्योहारों का शास्त्रोक्त कर्मकाल / पर्वकाल/ पूजा का दिनांक और समय बतला देता हूँ।
मैरी सास ऐसा करती थी, मैरे पापा ऐसा करते थे। हम तो केवल चौघड़िया देखते हैं, या हम कोई मुहूर्त नहीं देखते। ऐसा मानने वाले अपने कर्मों के लिए स्वयम् उत्तरदाई हैं न कि, उनके पापा या सास।
सप्तर्षियो द्वारा महर्षि वाल्मीकि को समझाया गया ज्ञान इस बात का प्रमाण है।
वैदिक/ श्रोत्रिय तो दुर्लभ हो गये हैं। सनातनियों में स्मार्त, वैष्णव, सौर, शैव, शाक्त, गाणपत्य और कौमार (कार्तिकेय उपासक) अपनी-अपनी परम्पराओं का पालन करते हैं। और आर्य समाजी, कबीर पन्थी आदि जीते जी माता-पिता और बुजुर्गो की सेवा ही श्राद्ध मानते हैं। ये सब सनातनधर्मी भी जी रहे हैं। और
नाथ, खालसा,जैन, बौद्ध, नवबौद्ध, चीनी, पारसी, यहुदी, इसाई और मुस्लिम अपने-अपने केलेण्डर के अनुसार और उनके शास्त्रों में बतलाई गई विधि से श्राद्ध करते हैं। वे भी जी रहे हैं। 
इसलिए मानना- न मानना व्यक्तिगत स्वातंत्र्य है।