बुधवार, 11 अक्टूबर 2023

पुराणो और स्मृतियों की रचना किननें की।

क्या वेदव्यास जी रचित पुराण वर्तमान में उपलब्ध है? यदि नही तो
वर्तमान में उपलब्ध पुराण किसकी रचना है? कब रचे गए? और क्यों रचे गए?
 *पुराण* 
हर घर में कोई न कोई पुराण अवश्य मिल ही जाएगा।
प्राचीन काल में यज्ञों के दौरान सायंकाल में सभाओं में पुराणों का पाठ होता था। अतः वेदों और ब्राह्मण ग्रन्थों में भी पुराण शब्द आया है। इन्हीं पुराणों को वेदव्यास जी ने सम्पादित किया। 
वर्तमान में भी मन्दिरों में, और सार्वजनिक पाण्डालों में और घरो में भी पुराण पाठ, पुराण प्रवचन होते रहते हैं। इसलिए पौराणिक ज्ञान व्यापक प्रसारित हुआ।
लेकिन वर्तमान में उपलब्ध पुराण न वैदिक पुराण है, न वेदव्यास जी रचित पुराण है।
विष्णु पुराण वेदव्यास जी के पिता महर्षि पराशर की रचना थी।
क्वोरा एप के सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रसिद्ध विद्वान लेखक श्री अरविन्द कुमार व्यास महोदय के द्वारा पुराणों के बारे में कुछ जानकारी सहित उनके कुछ विवादास्पद तथ्यों पर जानकारी प्रस्तुत है शीर्षक से लिख गए आलेख में उन्होंने विष्णु पुराण की प्राचीनता के सम्बन्ध में लिखा है कि,---
"विष्णु पुराण में ध्रुव तारे का विवरण उसके थुबन होने का परिचायक है; तथा इसके अनुसार यह लगभग चार हजार वर्ष से अधिक प्राचीन (2600–1900 ईसा पूर्व) खगोलीय परिस्थिति है; जोकि विशाखा नक्षत्र में शारदीय विशुव (2000–1500 ईसा पूर्व) तथा दक्षिण अयनान्त के श्रवण नक्षत्र में (लगभग 2000 ईसा पूर्व) से सुदृढ़ होता है।"
 अर्थात विष्णु पुराण कम-से-कम 2600ईसा पूर्व से 2000 ईसा पूर्व में रचा गया है।

 जब परीक्षित अभिमन्यु पत्नी उत्तरा गर्भ में थे, उसके बहुत पहले शुकदेव जी का ब्रह्मलोक प्रयाण हो चुका था। यह बात महाभारत युद्ध समाप्त होकर युधिष्ठिर के राज्याभिषेक होने के पश्चात धर्मनीति जिज्ञासु युधिष्ठिर आदि पाण्डवों को शर शैय्या पर लेटे भीष्म पितामह ने कही। प्रमाण देखें--- महाभारत शान्ति पर्व/ मौक्षधर्म पर्व/ अध्याय ३३२ एवम् ३३३ गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित महाभारत पञ्चम खण्ड (शान्ति पर्व) पृष्ठ ५३२५ से ५३२९ तक  देखें। विशेषकर श्लोक २६-१/२ पृष्ठ ५३२८ देखें।

शुकदेव जी के ब्रह्मलोक प्रयाण के बहुत बाद में परीक्षित जन्में तो परीक्षित की मृत्यु के समय शुकदेव जी भागवत कथा सुनाने कैसे आ गये, यह बात शुकदेव जी के पिता वेदव्यास जी कैसे लिख सकते हैं? मतलब आश्चर्य तो यह भी है कि, परीक्षित की मृत्यु तक भी पाण्डु और धृतराष्ट्र के जैविक पिता वेदव्यास जी तीसरी पीढ़ी के समाप्ति कैसे तक जीवित थे! और न केवल जीवित रहे अपितु पुराणों की रचना कर रहे थे! यह विचारणीय है।
ऐसे पुराणों को वेदव्यास जी की रचना मानने वालों को हमारा प्रणाम है।

तो फिर वर्तमान उपलब्ध पुराण किसने लिखे? का उत्तर।

आद्य शंकराचार्य जी का सही समय ५०९ ईसापूर्व से ४७७ ईसापूर्व का है।
कामकोटि पीठके ३८वें आचार्य चिदम्बरम वासी श्री विश्वजी के पुत्र आचार्य श्री अभिनवशंकर जी ७८७ ईस्वी से ८४० ईस्वी तक ५३ वर्ष विद्यमान रहे। वे ३० वर्ष तक जगन्नाथ पुरी के गोवर्धन मठ के शंकराचार्य के पद पर रहे।इन्होंने कश्मीर के वाक्पतिभट्ट को शास्त्रार्थ में पराजित किया था। 
वर्तमान इतिहासकार इन्हीं शंकराचार्य अभिनवशंकर जी को आद्य शंकराचार्य बतलाते हैं और उनका काल ७८८ - ८२० ई. का बताते हैं। 

लगभग ईसापूर्व ४९२ से ईसापूर्व से ४७७ की अवधि में आद्य शंकराचार्य जी के द्वारा बौद्धाचार्यों और जैनाचार्यों को शास्त्रार्थ में हरा कर उन बौद्धाचार्यों और जैनाचार्यों को शुद्धिकरण कर सनातन धर्म में वापसी करवाईं। इन पूर्व बौद्धाचार्यों और पूर्व जैनाचार्यों नें अपनी रुचि अनुसार वैष्णव, सौर, शेव, शाक्त और गाणपत्य सम्प्रदाय अपनाकर अपने -अपने मठ स्थापित कर उनके मठाधीश महन्त बनकर अपने सम्प्रदाय के ग्रन्थों की रचना प्रारम्भ की।
वर्तमान पुराण रचयिता ---
इनमें दक्षिण भारत के पूर्व बौद्ध और जैनाचार्यों ने इन मठों में रहकर पूर्व संस्कार और दक्षिण भारत में प्रचलित अथर्ववेद, कृष्ण यजुर्वेद तथा गाथाओं के, तन्त्र, और दृविड़ वेद की परिपाटी और दक्षिण भारतीय संस्कृति और परम्पराओं के अनुरूप अपने मठ की परिपाटी और परम्पराओं का निर्धारण करने हेतु आगम ग्रन्थ रचे तथा लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व वेदव्यास जी द्वारा रचित पुराणों में अपने सिद्धान्तों के अनुरूप संशोधन कर नवीन पुराणों की रचना की। 
पुराणों में परिवर्तन और परिवर्धन का क्रम (सिलसिला) मुख्य रूप से पुष्यमित्र शुङ्ग के शुङ्गवंश के शासन (१८५ ई.पू. से १४९ ई.पू. तक) से प्रारम्भ हुआ जो शुङ्गवंश, विक्रमादित्य के शासनकाल में भी चलता रहा। शालिवाहन / सातवाहन वंश, गुप्त वंश के बाद पुराणों में परिवर्तन का सिलसिला अधिक बढ़ गया जो धार के राजा भोज के शासनकाल (१०१० ईस्वी से १०५५ ईस्वी) तक चला। जिसका प्रमाण बोपदेव की रचनाएँ हैं।

शास्त्रार्थ में पराजित होकर जैनाचार्य अधिकांशतः शैव हो गये जबकि ,वज्रयान बौद्ध आचार्य शैव-शाक्त हुए। कुछ बौद्ध वैष्णव हुए जिन्होंने बुद्ध को नौवा अवतार घोषित कर दिया। संशोधित पुराणों में देवताओं और ऋषियों के चरित्र पर अनेक कलंक लगाये। असुरों को महा तपस्वी बतलाया।
वेदव्यास कृत पुराण के अनुसार ध्रुव के तप से सन्तुष्ट हो भगवान श्रीहरि नें स्वयम् दर्शन देकर ध्रुव को विष्णु का परमपद प्राप्त करने योग्य आत्मज्ञान/ ब्रह्म ज्ञान प्रदान किया इसकी तुलना में नवीन पराणों में प्रह्लाद की भक्ति की प्रशंसा अधिक कीगई है और ध्रुव को पद लोभी सिद्ध कर दिया। 
वेदों में महाराज दिवोदास के दान की प्रशंसा की गई है। जबकि नवीन पुराणों में असुरराज बलि के दान की प्रशंसा की गई ।असुरों की भूरीभूरी प्रशंसा की। असुरों, दैत्यों, दानवों राक्षसों को महा तपस्वी बतलाया गया।केवल ऋषभदेव और बुद्ध को उत्तम चरित्रवान बताया और ऋषि-मुनियों और देवताओं को कामुक बतलाया गया।
जैनों के अनुसार रावण भविष्य में उनके तीर्थंकर होनें वाले हैं। अतः उस दुष्ट राक्षस को तान्त्रिक के स्थान पर महान शिवभक्त और तपस्वी बतलाया गया। 
जातक कथाओं के अनुरूप नवीन पुराणों में अवतारवाद बनाया। 
ललित सागर ग्रन्थ के अध्याय २१ पृष्ठ १७८ अनुसार बिहार में गया के निकट कीटक नामक स्थान पर पिता श्री अजिन (मतान्तर से हेमसदन) और माता श्रीमती अञ्जना के पुत्र श्रीबुद्ध हुए थे।
वेदव्यास कृत पुराण में आठवें अवतार बलराम और नौवे अवतार कृष्ण को बतलाया है। नवीन भागवत पुराण में पूर्व बौद्धाचार्यों नें नें आठवाँ अवतार श्रीकृष्ण को और नौवा अवतार कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन और उनकी पत्नी माया देवी के पुत्र सिद्धार्थ गोतम बुद्ध को बतला दिया।
"कृपया गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित महाभारत पञ्चम खण्ड,शान्ति पर्व/ मौक्ष पर्व/ अध्याय २८४ पृष्ठ ५१६६ या संक्षिप्त महाभारत का पृष्ठ १२८१ देखें।"
महाभारत में  उल्लेखित दक्षयज्ञ विध्वंस की कथा के अनुसार प्रचेताओं के पुत्र दक्ष द्वितीय  द्वारा किए गए यज्ञ में सभी देवताओं और ऋषियों को बुलाया लेकिन शंकर पार्वती को नहीं बुलाया।
देवताओं को समुह में जाते देख पार्वती ने शंकर जी से पुछा, तब शंकर जी ने पार्वती को बतलाया कि, दक्ष (द्वितीय) यज्ञ कर रहे हैं, उसमें उनके निमन्त्रण / आह्वान पर देवता यज्ञभाग लेने जा रहे हैं।
पार्वती द्वारा यह आपत्ति जताई कि, आप रुद्र को यज्ञभाग लेने हेतु क्यों आमन्त्रित नहीं किया गया।
तब शंकर जी बतलाते हैं कि, इसमें दक्ष का कोई दोष नहीं है। सृष्टि के आदि में प्रजापति ब्रह्मा ने रुद्र को यज्ञभाग न देने का विधान किया गया था। इसलिए मुझे नहीं बुलाया।
दक्ष द्वारा यज्ञ में न बुलाने और यज्ञभाग न देने की जानकारी से रुष्ट पार्वती (न कि, सती) को साथ लेकर स्वयम् शंकर जी दक्ष यज्ञ स्थल पर गये। वहाँ पार्वती अपनी नाराज़गी प्रकट करती है। केवल दधीचि पार्वती का समर्थन करते हैं। शेष सब मौन ही रहते हैं। दक्ष पर पार्वती के रोष का कोई प्रभाव न देखकर पार्वती जी और रुष्ट हो गई। इसे देखकर शंकरजी ने वीरभद्र और भद्रकाली का आह्वान किया। और वीरभद्र और भद्रकाली को दक्षयज्ञ विध्वंस का आदेश दिया। वीरभद्र और भद्रकाली को दक्षयज्ञ विध्वंस कर दक्ष द्वितीय का सिर काट दिया। और देवताओं को भी प्रताड़ित किया।
फिर प्रजापति ब्रह्मा ने नियमों में संशोधन कर भविष्य में रुद्र को यज्ञभाग देने का नियम बना दिया तब, शंकर जी ने दक्ष द्वितीय को पुनर्जीवित किया। और सहर्ष पार्वती जी को लेकर वापस लौट गए।
 जब सती ने आत्मदाह किया ही नही तो, शंकर जी द्वारा विक्षिप्त हो कर दग्ध सती का शव लेकर घुमने, और भगवान विष्णु द्वारा चक्र से सती के शव के ५१ टुकड़े करने और जहाँ जहाँ वे टुकड़े गिरे, वहाँ शक्तिपीठ स्थापित होने की कहानी स्वतः गलत हो जाती है। साथ ही हिमवान और मैना की सन्तान के रूप में सती का पार्वती के रूप में पुनर्जन्म होना, फिर तपस्या कर शंकर जी से विवाह करना सभी कथाएँ गलत सिद्ध हो जाती है।
तो शिवपुराण सहित जिन पुराणों में उक्त वर्णन है, वे सभी पुराण गलत सिद्ध हो जाते हैं।


स्मृतियों की रचना किननें और कब की?
 *स्मृतियाँ* 

स्मृतियों का आधार वेदाङ्ग - कल्प- धर्मसुत्र है।मनुस्मृति वैवस्वत मनु द्वारा रचित उनका संविधान ग्रन्थ है।
यह सत्य है कि, धर्मसुत्रों में जोड़-तोड़ कर स्मृतियाँ बनाई गई। 
पुष्यमित्र शुङ्ग ने (१८५ ई.पू. से १४९ ई.पू. तक) मनुस्मृति को अपना संविधान घोषित किया। शुङ्गवंश का शासन ७३ ई. पू. तक चला। कुछ प्रमाण पुष्यमित्र शुङ्ग को मोर्य सिद्ध करते हैं। कुछ लोग चीन के शुङ्गवंश का मानते हैं लेकिन इसका कोई प्रमाण नही है। 
बाद में कण्व राजवंश (७३ ई.पू. २८ ई.पू. तकसे ) के प्रमुख राजाओं नें मनु स्मृति को संविधान के रूप में अपनाया। 
इसी बीच उज्जैन के प्रतापी सम्राट विक्रमादित्य (५७ ई.पू. से) के समय भी मनुस्मृति ही संविधान रही।
इसके बाद शालिवाहन या सातवाहन वंश २८ ई. पू. से २२० ईस्वी तक नें भी मनु स्मृति और अन्य स्मृतियों में संशोधन करवा कर और अन्य स्मृतियों की रचना करवा कर स्मृतियों को संविधान घोषित किया।

चुंकि,स्मृतियाँ विधि विधान हैै, संविधान है; कानून की किताब है, लॉ बुक्स है; इसलिए जन साधारण को स्मृृृतियोंंका  ज्ञान नही के बराबर ही रहता है और न ही सामान्य जीवन में स्मृतियों का कोई विशेष काम पड़ता है। इसलिए स्मृतियों के ज्ञाता केवल आचार्य गण और न्यायकर्ता ही रहे थे।
आज भी विधि विशेषज्ञ ही स्मृतियों पर चर्चा करते हैं। लगभग नगण्य घरों में भी कोई स्मृति ग्रन्थ मिल पाएगा।
अतः वैदिक ब्राह्म धर्म को स्मृतियों ने भ्रष्ट नहीं किया अपितु पुराणों ने वैदिक ब्राह्म धर्म को भ्रष्ट किया है।

बुधवार, 4 अक्टूबर 2023

ज्ञान और ज्ञानी

जो व्यक्ति सबको अपने समान ही जानकर, सर्वभूत समभाव से सबको प्रेम करे, वह अहिन्सक है।

जो अहिन्सक हो वह सत्यवादी,सत्यव्रती, सत्याग्रही, सदाचारी हो सकता।
सत्य के भेद स्वार्थी, व्यावसायिक, परार्थी, व्यावहारिक,  वास्तविक, पारमार्थिक ऐसे भेद मान लिये गए हैं परन्तु हैं नही।
ब्रह्म सत्यम्। सच्चिदानन्द। सत्यम् शिवम् सुन्दरम् और सत्यम् ज्ञानम् अनन्तम् ब्रह्म । ॐ तत् सत्।
इन सब वाक्यों में सत्य को ब्रह्म कहा हैं।
जो देखते - समझते हैं, जो मानते हैं, वही व्यक्त करते हैं, कहते हैं वे सत्यनिष्ठ हैं‌। 
परमात्मा आकाश के समान सर्वव्यापी है। या परमात्मा बर्फ में पानी के समान सर्व व्यापक है
इस वाक्य को क्या कहें? सत्य या असत्य?
भाव की दृष्टि से सत्य है। वास्तव में ऐसा भी नहीं है, नेति-नेति , अतः असत्य है। क्योंकि सर्वव्यापकत्व को समझाना लगभग असम्भव है। इसलिए समझोता करना पड़ता है।
ऐसे ही दृष्ट व्यावहारिक सत्य और वास्तविक पारमार्थिक सत्य शब्द गढ़ लिये गए। इन रूढ़ शब्दों की टाँग पकड़ कर बैठे रहना अनुचित है।
कभी-कभी समझाने के लिए आचार्यों को कई प्रकार के समझौते करना पड़ते हैं। इसी कारण भ्रम उत्पन्न हो कर सम्प्रदाय बनते हैं।
एकम् सद बहुदा विप्राः वदन्ति।

जो सदाचारी है, वही यह समझ पाता है कि, जिस हिरण्यगर्भ ने यह सृष्टि रची, उसके शयनकाल में यह सृष्टि उसकी ही नही रहती, तो पराई वस्तु का लोभ क्यों रखना, अतः वह पराई वस्तु पर दृष्टि ही नहीं रखता। वही स्तेय रहित चोरी न करने वाला, अस्तेय सिद्ध व्यक्ति हो सकता है।

जो सबको आत्मवत देख पाता हो, जो सदाचारी हो, जो लोभी - लालची न हो; वही बड़े से भी महा और महा से भी बड़े ब्रह्म की ओर चल सकता  है / बढ़ सकता अतः वही ब्रह्मचारी हो सकता। जो जगत के सर्व पदार्थों के प्रति उदासीन हो गया हो अतः ब्रह्म की ओर चल पड़ा हो वह ब्रह्मचारी है।

जो ब्रह्मचारी है वह परमात्मा की इस सृष्टि को स्वयम् अपने लिए ही नही मानता है, बल्कि सब पर सबका अधिकार  मानता। जो सर्ववस्तु परमात्मा की ही है, ऐसा  मानता है, अतः किसी चीज पर स्वामित्व स्थापित करने का भाव नहीं  रखता अतः वह अपरिग्रही होता है।

जिसमें उक्त पाँचो गुण अहिन्सा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य ,अपरिग्रह हो वह स्वच्छ, पवित्र और शुद्ध हो सकता।
जो शुद्ध - पवित्र हो उसे सन्तोष हो सकता। जब व्यक्ति ईश्वर के दिए से पूर्ण सन्तुष्ट हों लेकिन अपने किये को भी ईश्वरीय कृपा से सम्पन्न हुआ माने तभी उसे सन्तोष प्राप्त होता है।

जो सन्तुष्ट है और वह जो पञ्च यज्ञों और योग आदि कर्तव्य कर्म करता रहता है, उसके लिए ही तितिक्षा सम्भव है, वही धर्मपालनार्थ कष्ट सह सकता है। वही तपस्वी होता है।

जिसमें तितिक्षा नही, जो जप, पञ्च यज्ञों और योग आदि के द्वारा एकाग्रता प्राप्त न कर सका वह स्वाध्याय नही कर सकता। 
केवल पढ़ना भर स्वाध्याय नही है। पढ़े हुए को समझने के लिए मीमांसा करना आवश्यक है। मीमांसा करने के लिए अध्ययन के साथ और अध्ययन के बाद मनन और चिन्तन करना नितान्त आवश्यक है। अध्ययन, चिन्तन और मनन पूर्वक निदिध्यासन (ध्यान- समाधी) करने को ही स्वाध्याय कहते हैं।

जो स्वाध्याई नही वह ईश्वरार्पित नहीं हो सकता। ईश्वर पर अनन्य, अटल विश्वास करना तभी सम्भव है जिसने उक्त सभी धर्म लक्षण रूपी सद्गुण धारण कर लिया हो। तब उसके लिए वासुदेव सर्वम्, सियाराम मय सब जग जानी के अभ्यास से आत्मवत सर्वभूतानां यः पश्यन्ती सः पश्यन्ती वाली स्थिति हो जाती है तब वह ईश्वर प्रणिधान कर पाता है। अब उसके लिए परमात्मा के अतिरिक्त कुछ भी नही रह जाता।

जिसमें उक्त दसों गुण हो वही धृतिवान धीर पुरुष होता है। वही धार्मिक व्यक्ति है।
 
स्वयम् को या दुसरे किसी को कुछ मानने और होने में अन्तर है।
अधिकांश लोग स्वयम् को धार्मिक मानते हैं। लेकिन यथार्थ में धार्मिक व्यक्ति दुर्लभ है।

वैदिक अभेदवादी यदि नास्तिक अनेकान्तवाद स्वीकार न कर सके तो, समझो भेद दृष्टि बनी हुई है। वैदिक अभेदवादी तो जानता है कि, इतना ही नही - इतना ही नही। नेति-नेति।
नास्तिक अनेकान्तवादी तो कहता है, यह भी सत्य है, वह भी सत्य है। यदि उसे यदि वैदिक अभेद दर्शन स्वीकार्य न हो तो, अनेकानेकान्त कहाँ रहा।

शरीरस्थ तत्वों का ज्ञान या स्वभाव है अर्थात प्रकृति का तत्वज्ञान अध्यात्म है। श्रीमद्भगवद्गीता के अष्टमोध्याय में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को कहा कि, स्वभाव अर्थात स्व भाव अर्थात प्रत्येक व्यक्ति और वस्तु का मूल भाव ही, वस्तु की मूल प्रकृति ही अध्यात्म है। अतः जो आडम्बर और दिखाया रहित स्वाभाविक जीवन जीने का आदि है, वह आध्यात्मिक व्यक्ति है। जिसके सर्वोत्तम उदाहरण स्वयम् श्रीकृष्ण ही हैं।
जनता साधकों और सिद्धों, हठयोगियों, अघोरियों और तान्त्रिकों को अध्यात्मिक व्यक्ति मानती है। बुद्ध के पहले आत्मज्ञान, तत्वज्ञान, ज्ञान - विज्ञान, अनुभूति आदि के लिए अध्यात्म शब्द प्रचलन में नही था। 
स्वभाव अर्थात व्यक्ति या वस्तु की गुण धर्म - सम्पदा (Property) को अध्यात्म कहते थे।
बुद्ध के पहले प्रकृति का पर्यायवाची शब्द स्वभाव छन्दस में तो ठीक संस्कृत में भी नहीं आया। लेकिन बौद्ध प्रभाव से प्राकृत में और प्राकृत से विकसित हिन्दी आदि भाषाओं में स्वभाव को प्रकृति और प्रकृति को पुरुष का स्वभाव माना जाने लगा; और यह अर्थ रूढ़ हो गया।

आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक शब्द से लोगों नें भौतिक और प्राकृतिक से परे अध्यात्म की कल्पना कर ली।
जबकि ये त्रिताप के नाम हैं। आधिभौतिक ताप मतलब चोरी, लूट, राजदण्ड; आधिदैविक ताप मतलब बिजली गिरना, अतिवर्षा, बाढ़, आंधी-तुफान, भूकम्प आदि से पीड़ा और आध्यात्मिक ताप मतलब दैहिक/ शारीरिक ताप - ज्वर, दर्द, मौच, फ्रेक्चर, इन्फेक्शन आदि होते हैं।
स्पष्ट है कि, आध्यात्मिक मतलब दैहिक है न कि, आत्मिक। रामचरितमानस तक में कहा है कि, दैहिक, देविक, भौतिक तापा; राम राज्य कबहुँ नहीं व्यापा। स्पष्ट है कि यहाँ दैहिक ताप आध्यात्मिक ताप को ही कहा है।

ब्रह्म की दो कृतियाँ (क्रिएशंस) हैं। अपर पुरुष जीव और त्रिगुणात्मक प्रकृति आयु। 
ये ही दो प्रकृति जीवभूत परा प्रकृति और अष्टधा प्रकृति कही है।

कृति और रचना में अन्तर होता है। कृति होती है, रचना की जाती है। 
परमात्मा के विश्वात्मा स्वरूप (ॐ सङ्कल्प) के साथ ही प्रज्ञात्मा (परब्रह्म) स्वरूप में प्रकटीकरण होना, और प्रज्ञात्मा (परब्रह्म) का (दिव्य) परम पुरुष (विष्णु) और परम प्रकृति (माया) के रूप में जाना। अर्थात परम प्रकृति/ परा प्रकृति हुई; रची नही गई।
जैसे महर्षि वाल्मीकि का प्रथम श्लोक उनकी कृति था, रचना नहीं। लेकिन आर्किटेक्ट द्वारा तैयार भवन उसकी रचना होती है, कृति नही।

प्रत्यगात्मा ब्रह्म को सवितृ पुरुष और प्रकृति सावित्री के रूप में जाना जाता है। क्योंकि यह भी प्र कृति है; रचना नहीं। ऐसे ही अपर ब्रह्म प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) को अपर पुरुष नारायण और त्रिगुणात्मक अपरा प्रकृति श्री लक्ष्मी के रूप में जाना गया।
यहाँ तक कोई रचना नही हुई। लेकिन भूतात्मा वाणी - हिरण्यगर्भ (विश्वकर्मा) को (देही) प्राण और धारयित्व/ धृति (अवस्था) हुए जिसे आधिदैविक रूप में त्वष्टा और रचना कहा जाता है।
तात्पर्य यह कि, रचना का प्रारम्भ विश्वकर्मा हिरण्यगर्भ के द्वारा त्वष्टा रूप मे सृष्टि के गोलों को सुतार की भाँति घड़ने / गढ़ने से प्रारम्भ हुआ। इसके पहले कृति/ प्रकृति थी रचना नहीं।

यदि यह मान लिया जाए कि, देह को स्व मानने वाले का अध्यात्म देह है, प्राण (देहि) को स्व मानने वाले के लिए देही (प्राण) अध्यात्म है, जीवभाव को स्व मानने वाले के लिए जीवात्मा अध्यात्म है, पुर (देह) के स्वामी पुरुष को स्व मानने वाले के लिए अन्तरात्मा (प्रत्गात्मा) अध्यात्म है और परम (दिव्य) पुरुष को स्व मानने वाले के लिए प्रज्ञात्मा अध्यात्म है तब तो अध्यात्म शब्द ही निरर्थक हो जाएगा।
अतः यहाँ स्वभाव अष्टधा प्रकृति और जीवभूत परा प्रकृति दोनो से ही भिन्न अर्थ वाला ही मानना पड़ेगा।
प्रापर्टीज़ ऑफ मेटर का प्रापर्टी वाले अर्थ में ही मूल भाव स्वभाव को ही अध्यात्म मानना पड़ेगा।

देवीय सम्पदा और आसुरी सम्पदा शब्द इसी (प्रापर्टीज़) के अर्थ में आए हैं।
किसी भी मानव का मूल स्वभाव उसकी मानवीय वृत्ति - प्रवृत्ति अर्थात मानवता है।
यह प्रवृत्ति शब्द वृत्ति से बना है। वृत्तियाँ चित्त की शक्ति है। इसलिए वृत्ति का निरोध योग है। तभी मानव अपनी मूल मानवीय प्रवृत्ति से उपर उठ पाता है।

जगत, जीव, ईश्वर, आत्मा, परमात्मा का ज्ञान को भ्रमवश आध्यात्मिक ज्ञान बोला जाता है। क्योंकि वे जानकारियों को ज्ञान कहते हैं। जबकि वस्तुतः जगत, जीवन, जगदीश अर्थात जगजीवनराम को जानना ही ज्ञान है।
यहाँ कुछ विद्वान स्वभाव का अर्थ  त्रिगुणात्मक अपरा प्रकृति तो कुछ जीवभूता परा प्रकृति करते हैं। लेकिन 
श्रीमद्भगवद्गीता सप्तमोऽध्याय श्लोक ४ से ६ में अष्टधा प्रकृति का वर्णन किया। इसके बाद अपर पुरुष के रूप में स्वयम् का वर्णन भी भली-भाँति किया। 
जिसे जीवभूता पराप्रकृति कहा है उस जीवात्मा को अध्यात्म कहना होता तो श्रीमद्भगवद्गीता अष्टमोऽध्याय में श्रीकृष्ण स्वभाव शब्द क्यों कहते।

सम्बन्धित कुछ श्लोकों के अर्थ को को उधृत किया जा रहा है। ⤵️

श्रीमद्भगवद्गीता ७/५ अष्टधा प्रकृति से भिन्न जीवभूत परा प्रकृति है। 
७/६ सर्वभूत अष्टधा अपरा प्रकृति और जीवभूत परा प्रकृति ही है। मैं जगत का प्रभव और प्रलय हूँ।
७/२५ योग माया से आवृत्त (ढंका हुआ) में सबके लिए अप्रकाशित हूँ। अज्ञानी जन मुझे जन्मरहित और अव्यय नही जानते ‌।
७/२९ जो मेरे आश्रित होकर जरामरण से मुक्त होने का यत्न करते हैं वे, उस ब्रह्म कृत्स्रम अध्यात्म और अखिल कर्म को जानते हैं।
७/३० जो अन्तकाल में भी अधिभूत,अधिदैव और अधियज्ञ सहित मुझे जानते हैं, वे युक्तचित्त (योगी), मुझे जानते हैं।
८/३ - ४ परम अक्षर ब्रह्म है। स्वभाव अर्थात स्व भाव अर्थात प्रत्येक व्यक्ति/ वस्तु का अपना मूल भाव अध्यात्म कहा जाता है। भूतभाव को उत्पन्न करने वाला विसर्ग कर्म कहा गया है। उत्पत्ति-विनाश वाले क्षर भाव अधिभूत हैं। पुरुष अधिदैव हैं और यहाँ (श्रीकृष्ण के) इस शरीर में मैं अधियज्ञ हूँ।
१५/१६ सर्वभूत क्षर पुरुष है और कूटस्थ अक्षर पुरुष है।
१५/१७ सर्वभूत क्षर पुरुष और कूटस्थ अक्षर पुरुष से अन्य त्रिलोक व्यापी ,सबका पोषक, अव्यय उत्तम पुरुष ईश्वर परमात्मा कहलाता है।
१५/१८ क्षर और अक्षर से उत्तम होने के कारण मुझे पुरुषोत्तम कहते हैं।
१५/१९ में इसे गुह्यतम शास्त्र कहा है, जिसे जानकर व्यक्ति बुद्धिमान और कृतकृत्य हो जाता है ।
कहीँ भी अध्यात्म नही कहा है।
अध्यात्म केवल स्वभाव को ही कहा है।

अध्याय ७ श्लोक २९-३० में श्रीकृष्ण ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ शब्दों का प्रयोग करते हैं तो अष्टमोऽध्याय श्लोक १- २ में अर्जुन इन शब्दों का स्पष्टीकरण चाहता है, तब श्रीकृष्ण श्लोक ३- ४ में उत्तर देते हुए बतलाते हैं कि, परम अक्षर ब्रह्म है।  स्वभाव अर्थात स्व भाव अर्थात प्रत्येक व्यक्ति/ वस्तु का अपना मूल भाव अध्यात्म कहा जाता है। भूतभाव को उत्पन्न करने वाला विसर्ग कर्म कहा गया है। उत्पत्ति-विनाश वाले क्षर भाव अधिभूत हैं। पुरुष अधिदैव हैं और यहाँ (श्रीकृष्ण के) इस शरीर में मैं अधियज्ञ हूँ।
यहाँ यह स्पष्ट है कि, जब अष्टधा प्रकृति और जीवभूत परा प्रकृति का वर्णन श्रीकृष्ण पहले कर चुके थे। यहाँ श्रीकृष्ण ने स्वभाव शब्द का प्रयोग किया। यदि वे अष्टधा प्रकृति या जीवभूत को अध्यात्म बतलाना चाहते तो कहते मैरे द्वारा पूर्व कथित अष्टधा प्रकृति या जीवभूत परा प्रकृति ही अध्यात्म है। लेकिन उनने ऐसा न कहकर स्वभावो अध्यात्म उच्चते कहा। अतः किसी प्रकार के संशय और भ्रम की कोई गुंजाइश ही नहीं है।

मूलतः अपने शरीर को साधना - आसन, प्राणों को साधना - प्राणायाम, मन को साधना - प्रत्याहार, अहंकार को साधना धारणा, बुद्धि को साधना ध्यान और चित्त को साधना समाधि है। तेज को साधना संयम है। इनसे सिद्धि (सफलता) मिल सकती है, अध्यात्म नही।
स्वभावो दुरीतम् अर्थात स्वभाव या सहज प्रवृत्ति में बदलाव अत्यन्त कठिन है। लेकिन यदि कोई वाल्मीकि के समान स्वभाव पलट सके/ बदल सके तब उस साधक को आध्यात्मिक कहा जा सकता है। या जो निराडम्बर एकदम स्वाभाविक जीवन जीता हो वह व्यक्ति आध्यात्मिक है। क्योंकि उसने अपने अहंकार को पूर्णतः त्याग दिया है, तभी तो वह निन्दा - स्तुति में सम रहकर दिखावा रहित स्वाभाविक जीवन जी रहा है। 
लोग अघोरियों को आध्यात्मिक होने का भ्रम पाल लेते हैं। जबकि, उन्हें वैसा जीवन जीना सीखना पड़ता है, अघोरी जीवन मानव स्वभाव नहीं है।
इसलिए ये अध्यात्म नही है। बल्कि स्वाभाविक हो जाना ही आध्यात्मिकता है। क्योंकि स्वभाव ही अध्यात्म कहलाता है।
अयमात्मा ब्रह्म, प्रज्ञानम् ब्रह्म और सर्व खल्विदम् ब्रह्म यह वास्तविक ज्ञान है।

 

गुरुवार, 21 सितंबर 2023

वैदिक और पौराणिक अयन - ऋतु और पर्वोत्सव में अन्तर।

दिनांक २३ सितम्बर २०२३ शनिवार को दोपहर १२:२० बजे शरद सम्पात, सातन तुला संक्रान्ति होगी।
दिन- रात बराबर होंगे, सूर्य भू-मध्य रेखा पर पहूँच कर दक्षिण गोलार्ध में प्रवेश करेगा। दक्षिण ध्रुव पर सूर्योदय और उत्तर ध्रुव पर सूर्यास्त होगा।
अर्थात वैदिक दक्षिणायन प्रारम्भ होगा। देवताओं का सूर्यास्त और पितरों का सूर्योदय होगा। यह वैदिक पर्व है।
 
वैदिक काल में आर्यावर्त पामीर के पठार से दक्षिण में तिब्बत, तुर्किस्तान, कश्मीर से विन्द्याचल या नर्मदा तक था। अतः कालगणना का का केन्द्र धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र था। तब संवत्सर प्रारम्भ, उत्तरायण प्रारम्भ, वसन्त ऋतु प्रारम्भ और मधुमास का प्रारम्भ वसन्त सम्पात, सायन मेष संक्रान्ति (अर्थात वर्तमान में २०/२१ मार्च) से होता था। उस दिन भी दिन- रात बराबर होंते हैं। उसी समय सूर्य भू-मध्य रेखा पर पहूँच कर उत्तर गोलार्ध में प्रवेश करता है। उत्तर ध्रुव पर सूर्योदय और दक्षिण ध्रुव पर सूर्यास्त होता है। देवताओं का सूर्योदय और पितरों का सूर्यास्त होता है। वैदिक काल का यह सबसे बड़ा महत्वपूर्ण पर्व, उत्सव और त्योहार था।
लेकिन, जब दक्षिण भारत में भी जनसंख्या बढ़ने लगी और तिब्बत, तुर्किस्तान में शक आदि म्लेच्छ जातियाँ बस गई तो आर्यावर्त के निवासी दक्षिण में विन्द्याचल पर बसने लगे कुछ विन्द्याचल पार कर दक्षिण में बस गए। तब पौराणिक काल में ज्योतिर्गणना का केन्द्र उज्जैन को घोषित किया गया। उत्तर परम क्रान्ति दिवस सायन मकर संक्रान्ति से उत्तरायण प्रारम्भ, शिशिर ऋतु का प्रारम्भ और तपस मास घोषित किया गया। वसन्त ऋतु और मधु मास सायन मीन संक्रान्ति (वर्तमान १८ फरवरी) से घोषित किया गया। इस प्रकार उत्तरायण तीन महीने पहले होने से वर्षा ऋतु पौराणिक दक्षिणायन में पड़ने लगी। तो उत्तरायण में निकलने वाले मुहुर्त में वर्षा ऋतु पड़ने से होने वाली बाधाएँ समाप्त हो गई।

भारत के सांस्कृतिक इतिहास के जानकार जानते हैं कि, जब वामन ने बलि को निष्कासित किया तो दक्षिण भारतीय पणि, दासजन, चौल आदि बलि के साथ सिन्ध - अफगानिस्तान - ईरान होते हुए लेबनान में बसे। वहाँ से बलि तो दासो सहित बोलीविया (दक्षिण अमेरिका) में बस गया लेकिन पणियों ने लेबनान में फोनिशिया बसाया। इन लोगों को ईरानियों ने काले होने के कारण हिन्दू कहा। महर्षि अगस्त द्वारा विन्द्याचल पार का सुगम मार्ग खोजा गया। श्री राम ने दण्डकारण्य को राक्षसों से मुक्त किया तो आर्यावर्त के निवासी दक्षिण भारत में बसने लगे।  तब वैदिक कैलेण्डर के अनुसार उत्तरायण में दक्षिण और मध्य भारत में वर्षा ऋतु के कारण उत्तरायण में होने वाले धार्मिक - सामाजिक उत्सवों में वर्षा से बाधा उत्पन्न होने लगी। विद्वानों ने विचार कर उज्जैन को काल गणना का केन्द्र बनाया। पुराणों में मधु माधव मास के स्थान पर चैत्र - वैशाख चान्द्रमासों की तिथियों से व्रत पर्व, उत्सव और त्योहार तथा मुहुर्त घोषित किए गए। इसमें सम्राट विक्रमादित्य और उनके राज ज्योतिषी आचार्य वराहमिहिर की भूमिका सर्वोपरि रही।
उल्लेखनीय है कि, महाभारत काल में प्रत्येक अट्ठावन चान्द्रमासों के बाद दो अधिक मास (अधिक मास की ऋतु) होती थी। १९ वर्षीय, १२२ वर्षीयऔर १४१ वर्षीय चक्र वाले निरयन सौर मासाधारित चान्द्र वर्ष (शकाब्द) के माहों और महाभारत के मासों में नाम साम्य दिखता है लेकिन है नही। इसी कारण महाभारत की काल गणना समझने में विद्वान भी उलझ जाते हैं।
कृपया ग. वा. कविश्वर की पुस्तकें महाभारत के तेरह वर्ष और महाभारत के गूढ़ रहस्य तथा गीता तत्व मीमांसा पढ़ें।

शनिवार, 9 सितंबर 2023

सनातन धर्म के मुख्य देवता।

सनातन धर्म के देवता।

परमात्मा सर्वव्यापी है, परमात्मा के बारे में कुछ भी और कितना ही कहा जाए अपूर्ण ही रहेगा। इस लिए नेति-नेति कहते हैं।
लगभग यही स्थिति ॐ की भी है। सृष्टि उत्पत्ति के लिए परमात्मा का संकल्प ॐ संकल्प कहलाता है। ॐ मतलब कल्याण स्वरूप। यह ॐकार तरङ्गाकार माने जाते हैं।
परब्रह्म (विष्णु-माया) भी सर्वव्यापी हैं। विष्णु का अर्थ ही व्यापक है।विष्णु के हाथ में नियति चक्र है । ऋग्वेदोक्त 90×4 =360 अरों का चक्र है। (नब्भे गुणित चार अर्थात 360अरोंं का संवत्सर चक्र है।)  "
विष्णु की मुर्ति शालिग्राम शिला है। लेकिन परवर्ती काल में काले पत्थर से शंख, चक्र, गदा, पद्म धारी खड़ी या बैबी हुई प्रतिमाएँ भी मिलती है।
ब्रह्म (सवितृ - सावित्री) का अर्थ बढ़ा महा है। सवितृ - सावित्री को ही हरि और कमला कहते हैं।
परब्रह्म महा आकाश हैं। अतः लगभग सर्वव्यापी हैं। इन्हें भी लगभग तरङ्गाकार ही कहा जा सकता है; लेकिन 
सवितृ - सावित्री (हरि और कमला) को  कमल के अलग-अलग आसन पर विराजित बतलानें की परम्परा है।

अपर ब्रह्म को नारायण और श्री तथा लक्ष्मी के रूप में जानते हैं। नारायण तरङ्गाकार लेकिन दीर्घवृत्तीय गोलाकार (अण्डाकार) हैं। 
नारायण को जिष्णु भी कहलाते हैं मतलब स्वाभाविक विजेता या अजेय भी कहते हैं। ये जगदीश्वर कहे जाते हैं इनको शिशुमार चक्र में क्षीर सागर में स्थित बतलाया जाता है। सत्ता ,गुणों, साख और स्थाई सम्पत्ति को श्री तथा रत्न, स्वर्ण, नगदी को लक्ष्मी मानते हैं।
चित्रों और मुर्तियों में शेषशय्या पर विराजमान अष्टभुजा नारायण की पाद सेवा करते हुए लक्ष्मी और चँवर सेवा करते हुए श्रीदेवी बतलाई जाती है।
नारायण महाकाल हैं। इसके पहले काल का अस्तित्व ही नहीं था। अतः इनकी काल गणना आयु आदि नहीं बतलाई जा सकती।

ॐकार, विष्णु, सवितृ (हरि) और अपरब्रह्म (नारायण- श्री और लक्ष्मी) सभी तरङ्गाकार ही कहे जा सकते हैं।

हिरण्यगर्भ की पत्नी (शक्ति) वाणी कहलाती है। पुरुषसूक्त के विश्वकर्मा यही हैं।
हिरण्यगर्भ को त्वष्टा और रचना के रूप में जानते हैं।
ऋग्वेद के अनुसार त्वष्टा नें ब्रहाण्ड के गोलों को सुतार की भाँति घड़ा। अतः ब्रह्माण्ड त्वष्टा की रचना है। हिरण्यगर्भ की आयु दो परार्ध (एकतीस नील, दस खरब, चालीस अरब वर्ष) है। हिरण्यगर्भ अण्डाकार हैं। अतः हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के पाँच मुख कहे गए हैं।

हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की मानस सन्तान 1 त्वष्टा-रचना के अलावा 2 सनक, 3 सनन्दन, 4 सनत्कुमार और 5 सनातन तथा 6 नारद , 7 प्रजापति, और 8 एकरुद्र हैं।
अर्थात प्रजापति और सरस्वती हिरण्यगर्भ की मानस सन्तान है।
जैसे सूर्य के साथ ही उसका प्रकाश भी उत्पन्न होता है। सूर्य की शक्ति उसका प्रकाश है। अतः प्रकाश (प्रभा) को सूर्य की पत्नी कहा जाता है। लेकिन साथ साथ जन्मे मानस सन्तान को जुड़वाँ भाई- बहन भी कह सकते हैं। सूर्य कारण है और प्रकाश कार्य है अर्थात सूर्य से उसका प्रकाश होता है, अतः प्रकाश (प्रभा) को सूर्य की पुत्री भी कह सकते हैं। जा की रही भावना जैसी सिद्धान्त से सबने अपनी भावनाओं के अनुसार समझा।
ऐसे ही हिरण्यगर्भ ब्रह्मा से उत्पन्न, प्रजापति ब्रह्मा के साथ उत्पन्न, प्रजापति की शक्ति सरस्वती को भी ब्रह्मा की पुत्री और ब्रह्मा की पत्नी वाला विवाद जन्मा।
प्रजापति ब्रह्मा पूर्ण गोलाकार हैं, इसलिए प्रजापति को चतुर्मुख (चारों ओर मूँह वाले) कहा जाता है।
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा और प्रजापति दोनों को ब्रह्मा कहा जाता है। इसलिए एक ब्रह्मा के पाँच मुख और दुसरे ब्रह्मा के चार मुख से भ्रम हुआ तो ब्रह्मा का उपर का मुख रुद्र नें काट दिया; यह कहानी गढ़ ली गई।

इन्द्र - शचि और अग्नि - स्वाहा देवस्थानी प्रजापति कहलाते हैं एवम् एक देवर्षि नारद मुनि हैं इसलिए प्रजापति नही कहे जाते। बल्कि देवर्षि कहलाते हैं।  
पितरः - स्वधा अन्तरिक्ष स्थानी प्रजापति हुए। पितरः ने स्वयम् सप्त पितरों और उनकी शक्ति के रूप में प्रकट किया। जिनमें से १ अग्निष्वात २ बहिर्षद और ३ कव्यवाह  तीन निराकार और ४ अर्यमा, ५ अनल ६ सोम और ७ यम चार साकार हैं। अर्यमा इनमें मुख्य हैं।
इन्द्र - शचि और अग्नि - स्वाहा के अलावा निम्नलिखित स्वर्गस्थानी देवगण हुए 
 रुद्र- रौद्री (शंकर - उमा), धर्म - और उनकी तेरह पत्नियाँ   (1 श्रद्धा, 2 लक्ष्मी, 3 धृति, 4 तुष्टि, 5 पुष्टि, 6 मेधा, 7 क्रिया, 8 बुद्धि, 9 लज्जा, 10 वपु, 11 शान्ति, 12 सिद्धि, 13 कीर्ति ) ये देवस्थानी प्रजापति हैं। इनकी पत्नियाँ दक्ष प्रजापति (प्रथम) और प्रसुति की कन्याएँ थी । धर्म द्युलोक का अर्थात स्वर्गस्थानी देवता है। लेकिन भूमि पर कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र कहाजाता है। 
रुद्र मूलतः अन्तरिक्ष स्थानी देवता है लेकिन भूलोक में हिमालय में शंकरजी कैलाश वासी भी हैं।

"तीन प्रजापतियों की जोड़ी को भूस्थानी प्रजापति बतलाया गया है।

1 दक्ष प्रजापति (प्रथम)-प्रसुति, 2 रुचि प्रजापति-आकुति और 3 कर्दम प्रजापति-देवहूति।
प्रसुति, आकुति और देवहूति भी ब्रह्मा की मानस सन्तान है किन्तु इन्हे स्वायम्भुव मनु-शतरूपा की पुत्री भी कहा जाता है।"
इनके अलावा आठ भूस्थानी प्रजापति ये हैं 4 मरीची-सम्भूति, 5 भृगु-ख्याति, 6 अङ्गिरा-स्मृति, 7 वशिष्ट-ऊर्ज्जा, 8 अत्रि-अनसुया, 9 पुलह-क्षमा,10 पुलस्य-प्रीति, 11 कृतु-सन्तति। ये सभी ब्रह्मर्षि भूस्थानी प्रजापति हुए। और इनकी पत्नियाँ दक्ष प्रजापति (प्रथम) और उनकी पत्नी प्रसुति की पुत्रियाँ थी। इन ब्रह्मर्षियों का वासस्थान ब्रह्मर्षि देश (हरियाणा) कहलाता है एवम इनकी सन्तान ब्रह्मज्ञ ब्राह्मण हुए। 

तैंतीस देवता गण - 1 प्रजापति, 2 इन्द्र, 3 से 14 तक द्वादश आदित्य, 15 से 22 तक अष्ट वसु तथा 23 से 33 तक एकादश रुद्र मिलकर तैंतीस देवता कहलाते हैं। कुछ लोग इन्द्रसभा में प्रजापति और इन्द्र के स्थान पर 1 दस्र और 2 नासत्य नामक अश्विनीकुमारों को रखकर इन्द्रसभा के तैंतीस देवता मानते हैं।
भूस्थानी प्रजापतियों का वासस्थान या राजधानी क्षेत्र पञ्जाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तरप्रदेश, उत्तराखण्ड, हिमाचल, जम्मू, कश्मीर, राजस्थान, गुजरात, सिन्ध, बलुचिस्तान, अफगानिस्तान, तुर्किस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ईरान तक था ।

ब्रहस्पति की तीन पत्नियाँ (शक्ति) है - १ शुभा, २ ममता और ३ तारा। 
मुख्य द्वादश आदित्यों को    1 विष्णु, 2 सवितृ, 3 त्वष्टा, 4 इन्द्र, 5 वरुण, 6 विवस्वान, 7 पूषा, 8 भग, 9 अर्यमा, 10 मित्र, 11 अंशु और 12 धातृ के नाम से जाना जाता है। 
आदित्यों का भूमि पर वासस्थान भी कश्मीर, उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, तिब्बत, तुर्किस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, कजाकिस्तान, पश्चिम चीन और युक्रेन तक था। विवस्वान की सन्तान वैवस्वतमनु नें अयोध्या को राजधानी बनाया।"

ब्रह्मणस्पति की पत्नी (शक्ति) सुनृता है। 
मुख्य अष्ट वसुओं के नाम 1 प्रभास, 2 प्रत्युष, 3 धर्म, 4 ध्रुव, 5 अर्क, 6 अनिल, 7 अनल और 8 अप् हैं ।

महारुद्र पशुपति एकादश रुद्र के रूप में प्रकट हुए। महारुद्र नें स्वयम को 1 हर, 2 त्र्यम्बकं, 3 वृषाकपि, 4 कपर्दी, 5 अजैकपात, 6 अहिर्बुधन्य, 7 अपराजित, 8 रैवत, 9 बहुरूप, 10 कपाली और 11शम्भु (शंकर)) के रूप में प्रकट किया।  ये अधिकांशतः कैलाश से टर्की तक, और अफ्रीका महाद्वीप कै उत्तर पूर्व में फैलेहुए थे।

मूलतः गणपति अर्थात गणों (समुदायों) के प्रधान को कहते हैं। रुद्र गणों के महागणाधिपति शंकर जी कहलाते हैं। उनने व्रात गणों के गणपति विनायक को गणपति का दायित्व सौंपा इसलिए विनायक भी गणपति कहाने लगे‌।

वेदों में सोम राजा और वरुण महाराज कहलाते हैं। वरुण, सोम और स्वायम्भूव मनु को गणपति कहा जा सकता है। स्वायम्भूव मनु की शक्ति शतरूपा है।

सभी प्राचीन ऋषि और ब्राह्मण 1 दक्ष - प्रसुति , 2 रुचि - आकुति, 3 कर्दम- देवहुति, 4 मरीची-सम्भूति, 5 भृगु-ख्याति, 6 अङ्गिरा-स्मृति, 7 वशिष्ट-ऊर्ज्जा, 8 अत्रि-अनसुया, 9 पुलह-क्षमा, 10 पुलस्य-प्रीति, 11 कृतु-सन्तति आदि भूस्थानी ग्यारह प्रजापतियों की सन्तान हैं। तथा सभी प्राचीन क्षत्रिय स्वायम्भूव मनु की सन्तान हैं।
ब्राह्मणों और क्षत्रियों में से ही वैष्य हुए। क्षत्रियों और वैष्यों में से कुछ कार्मिक (सेवक) शुद्र हुए। वैश्यों  और शुद्रों में से कुछ पञ्चम (चाण्डाल) हुए। शुद्रों  और पञ्चमों में से कुछ म्लेच्छ हुए।
बाद में इससे उलट भी हुआ। कुछ शुद्र, वैश्य और क्षत्रियों नें ब्राह्मणत्व भी प्राप्त किया।

सदसस्पति की शक्ति मही के तीन स्वरूप १ भारती २ सरस्वती और ३ इळा को तिस्रो देवताः कहा जाता है।

अष्टादित्यों के नाम 1 मार्तण्ड (विवस्वान), 2 इन्द्र, 3 वरुण, 4 मित्र, 5 धाता, 6 भग, 7 अंश और 8 अर्यमा) कश्यप और अदिति के पुत्र हैं।
दुसरे अष्ट वसु (1 द्रोण, 2 प्राण, 3 ध्रुव, 4 अर्क, 5 अग्नि 6 दोष, 7 वसु और 8 विभावसु ) कहते हैं। ये पूर्वकथित अष्ट वसु से भिन्न हैं। 
दुसरे एकादश रुद्र (1मन्यु, 2 मन , 3 महिनस, 4 महान, 5 शिव, 6 उग्ररेता, 7 भव, 8 काल, 9 वामदेव, 10 धृतवृत और 11 मृगव्याध हैं। या मतान्तर से अन्य नाम 1 सर्प,2 निऋति,3 पिनाकी, 4कपाली,5 स्थाणु, 6 ईशान नाम और 7 दहन भी। 
पञ्च मुख्य प्राण और पञ्च उपप्राण 1 उदान -देवदत्त, 2 व्यान - धनञ्जय,3 प्राण - कृकल, 4 समान - नाग, 5 अपान -कुर्म के रूप में जानते हैं। इनके अधिदेवता द्वादश तुषितगणों के नाम 1 बुद्धि, 2 मन,3 उदान, 4 व्यान, 5 प्राण, 6 समान, 7 अपान, 8 श्रोत, 9 स्पर्ष, 10 चक्षु, 11 रसनाऔर 12 घ्राण के रूप में भी जाने जाते हैं। 

2 अध्यात्म को हम पञ्चज्ञानेन्द्रिय तथा पञ्च कर्मेन्द्रिय १ श्रोत - वाक (कण्ठ) , २ त्वक - हस्त , ३ चक्षु - पाद , ४ रसना - उपस्थ और ५ घ्राण - पायु के रूप में जानते हैं। 
इनके अधिदेवता शक्तियों सहित उनचास मरुद्गण है। 
उनचास मरुद्गणों में सात प्रमुख माने गये हैं 
1 आवह, 2 प्रवह, 3 संवह, 4 उद्वह, 5 विवह, 6 परिवह और 7 परावह है। 
ये सातों सैन्य प्रमुख समान गणवेश धारण करते है। इनके प्रत्येक के छः छः स्वरूप (या पुत्र) अर्थात बयालीस मिलाकर उनचास मरुद्गण हुए।
ये भी सुकर्मों के फलस्वरूप कर्मदेव (देवता श्रेणी) में पदोन्नत हुए।अतः कर्मदेव कहलाते हैं।

3 अधिभूत को हम पञ्च महाभूत और पञ्च तन्मात्रा 1 आकाश -शब्द,  2 वायु - स्पर्ष,  3 अग्नि - रूप,  4 जल - रस और  5 भूमि - गन्ध के रूप में जानते हैं।
 ( तन्मात्राओं का सम्बन्ध उर्जाओं से जोड़ा जा सकता है --1 शब्द -ध्वनि से, 2 स्पर्ष विद्युत से, 3 रूप प्रकाश से सीधे सम्बंधित हैं, 4 रस का सम्बन्ध भी पकानें के रूप में ऊष्मा से लगता है। 5 किन्तु गन्ध का ही सीधा सम्बन्ध चुम्बकत्व नही दिखता है )) "

द्वादश साध्यगण के नाम 1 मन, 2 अनुमन्ता, 3 प्राण, 4 अपान, 5 विति , 6 हय, 7 हन्स, 8 विभु, 9 प्रभु, 10नय, 11 नर और 12 नारायण )  हैं। 

चक्र और चार उप चक्र के नाम 1 ब्रह्मरन्ध्र चक्र - आज्ञा चक्र, 2 अनाहत- विशुद्ध चक्र, 3 मणिपुरचक्र - स्वाधिस्ठानचक्र और  4 मूलाधार चक्र - कुण्डलिनी। 
चक्रों के अधिदेवता चौरासी सिद्धगण हैं।

प्रभास वसु और ब्रहस्पति की बहन वरस्त्री के पुत्र देवशिल्पी विश्वकर्मा हुए।

संस्थान और तन्त्र 1 मस्तिष्क - तन्त्रिका तन्त्र, 2 हृदय - श्वसन तन्त्र, 3 यकृत - पाचन तन्त्र और 4 लिङ्ग - जनन तन्त्र हैं। 
अष्ट सिद्धि (चार मुख्य सिद्धि एवम चार उप सिद्धि) 1 ईशित्व- वशित्व, 2 अणिमा-लघिमा, 3  महिमा- गरिमा और 4 प्रकाम्य - प्राप्ति के रूप में जानते हैं।

 सिद्धियों के अधिदेवता अष्ट विनायक 1 सम्मित-उस्मित, 2 मित- देवयजन, 3 शाल - कटंकट और 4 कुष्माण्ड - राजपुत्र ये आठों पिशाच हैं और शिवगण हैं।  
(सुचना - ये मूलतः पिशाच हैं। ये शुभकार्यों में विघ्नकर्ता ग्रह हैं। तन्त्र में विनायक शान्ति प्रयोग द्वारा विघ्नबाधाएँ दूर करनें का विधान है। )

दस विश्वैदेवगण - 1 दक्ष (द्वितीय), 2 कृतु, 3 सत्य, 4 काल (यम) 5 काम, 6 मुनि, 7 एल पुरुरवा, 8 श्रव, 9 रोचमान, 10 आर्द्रवान हैं।

तीन नाड़ियाँ १ सुषुम्ना २ पिङ्गला और ३ इड़ा है।

सृष्टि के मूल आधिदैविक तत्व।

                       परमात्मा 
                             !
                           ॐ
                             !
                         परब्रह्म
                            /\
            विष्णु                    माया  
                              !
                            ब्रह्म 
                             /\
     सवितृ प्रभविष्णु        श्री लक्ष्मी सावित्री 
                               !
                        अपर ब्रह्म 
                              /\
    नारायण श्री हरि        नारायणी कमलासना 
                                !
                          हिरण्यगर्भ 
                               /\
           त्वष्टा                           रचना 
                                 !
                            प्रजापति 
                               /।\ 
 दक्ष-प्रसुति,     रुचि-आकुति,   कर्दम-देवहुति 
                                 !
                           वाचस्पति 
                                /\
           इन्द्र                               शचि
                                 !
                         ब्रह्मणस्पति 
                                /\
                                          
         आदित्य                  आदित्य शक्तियाँ
                                 !
                            बृहस्पति
                                /\
          वसु                              वसु शक्तियाँ
                                 !
                            पशुपति 
                                /\
          रुद्रगण                             रौद्रियाँ
                                 !
                            गणपति 
                                 /\
            सोम                                 वर्चा
                                  !
                            सदसस्पति 
                                  ! 
                                मही
                                /।\
  भारती            सरस्वती              इळा
      !                     !                      ! 
अष्टादित्य       दुसरे अष्ट वसु   अष्ट मूर्ति रुद्र 
    /\                    /\                    /\
तुषित शक्ति   मरुद्गण शक्ति   अनेक रुद्र शक्ति 
        !                     !                       !
    साध्य            विश्वकर्मा              यह्व
        /\                  /\                     /\
सिद्ध सिद्धियाँ   त्वष्टा  रचना   विनायक ऋद्धि
          !                    !                       !
विश्वेदेव गण        विश्वरूप            एल भैरव
           \                  ।                       /
                            राजा  



० परमात्मा - 

१ ॐ - 

२ परब्रह्म - परम पुरुष विष्णु और परा प्रकृति माया।

३ ब्रह्म - सवितृ और सावित्री (प्रभविष्णु श्रीहरि और कमलासना श्री लक्ष्मी) ।

४ अपर ब्रह्म - नारायण और नारायणी।

५ हिरण्यगर्भ और वाणी - त्वष्टा और ‌रचना।

६ प्रजापति और सरस्वती- 
दक्ष-प्रसुति,  रुचि - आकुति और कर्दम- देवहुति।

७ वाचस्पति - इन्द्र और शचि।

८ ब्रह्मणस्पति  - आदित्य ।

९ ब्रहस्पति - वसु ।

१० पशुपति (महारुद्र) - रुद्र और रौद्री 

११ - गणपति - सोम ।

१२ सदसस्पति।

१३ मही।

१४ भारती, सरस्वती, इळा। 

१५ अष्टादित्य,वसुगण,अष्टमूर्ति एकादश रुद्र।

१६ तुषित- मरुद्गण- अनेक रुद्र।

१७ द्वादश साध्य ,विश्वकर्मा (प्राचेतस), यह्व।

१८ सिद्ध - त्वष्टा - विनायक।

१९ विश्वेदेवाः - विश्वरूप- एल (भैरव) ।

                       २० राजा।
 


सृष्टि के अध्यात्मिक तत्व।

० परमात्मा - 
१ विश्वात्मा - 
२ प्रज्ञात्मा - परम पुरुष और परा प्रकृति।
३ प्रत्गात्मा (अन्तरात्मा) - पुरुष और प्रकृति ।
४ जीवात्मा - अपर पुरुष जीव और त्रिगुणात्मक अपरा प्रकृति आयु (जीव और आयु)।
५ भूतात्मा - प्राण और धृति (धारयित्व/ रयि)  (देही और अवस्था) ‌।
६ सुत्रात्मा - ओज और आभा/ कान्ति  (रेतधा और स्वधा)।
७ अणुरात्मा - तेज और विद्युत 
(सुत्रात्मा और अणुरात्मा को संयुक्त रूप से आनन्दमय कोष और कारण शरीर भी कहते हैं।)
८ विज्ञानात्मा - चित्त और वृत्ति  (विज्ञान और विद्या)।
९ ज्ञानात्मा - बुद्धि और बोध (मेधा)।
(विज्ञानात्मा और ज्ञानात्मा को संयुक्त रूप से विज्ञानमय कोष और सुक्ष्म शरीर भी कहते हैं।)
१० लिङ्गात्मा - अहंकार और अस्मिता
११ - मनसात्मा - मन और संकल्प।
(लिङ्गात्मा और मनसात्मा को संयुक्त रूप से मनोमय कोष और लिङ्ग शरीर भी कहते हैं।)
१२ स्व।
१३ - स्वभाव।
१४  सात्विक स्वभाव - स्वाहा (वैकारिक स्वभाव)।
  राजस स्वभाव - वषट (तेजस स्वभाव)।
  तामसी स्वभाव - स्वधा(भूतादिक स्वभाव)। 
१५ अधिदेव,अध्यात्म,अधिभूत।

१६ प्राण - इन्द्रियाँ - भूत तन्मात्रा।

१७ कारण शरीर, सुक्ष्म शरीर, लिङ्ग शरीर।

१८ चक्र - संस्थान - सिद्धियाँ।

१९ सुशुम्ना - पिङ्गला- इड़ा ।

                    २० पिण्ड।

सृष्टि के मूल तत्व (अध्यात्मिक और आधिदैविक)।

० परमात्मा - 
१ विश्वात्मा ॐ - 
२ प्रज्ञात्मा परब्रह्म - परम दिव्य अक्षर पुरुष विष्णु और परा प्रकृति माया।
३ प्रत्गात्मा ब्रह्म - पुरुष सवितृ (श्रीहरि)और प्रकृति (कमला) ।
४ जीवात्मा अपर ब्रह्म - अपर पुरुष (जीव) नारायण और त्रिगुणात्मक अपरा प्रकृति (आयु) श्री लक्ष्मी।
५ भूतात्मा हिरण्यगर्भ और वाणी - प्राण (देही) त्वष्टा और धारयित्व (अवस्था) ‌रचना।
६ सुत्रात्मा प्रजापति और सरस्वती- रेतधा (ओज) और स्वधा (आभा/ कान्ति)।
दक्ष-प्रसुति, रुचि - आकुति, कर्दम- देवहुति।

७ अणुरात्मा वाचस्पति - तेज इन्द्र और विद्युत शचि।

८ विज्ञानात्मा ब्रहस्पति - विज्ञान (चित्त) आदित्य और विद्या (वृत्ति)।
९ ज्ञानात्मा ब्रह्मणस्पति - बुद्धि वसु और बोध (मेधा)।
१० लिङ्गात्मा पशुपति (महारुद्र) - अहंकार रुद्र और अस्मिता रौद्री 
११ - मनसात्मा गणपति - मन सोम और संकल्प।
१२ स्व सदसस्पति।
१३ - स्वभाव मही।
१४ वैकारिक (सात्विक) स्वभाव (स्वाहा) भारती।
 तेजस (राजस) स्वभाव (वषट) सरस्वती।
 भूतादिक (तामसी) स्वभाव (स्वधा) इळा। 
१५ अधिदेव अष्टादित्य,
अध्यात्म वसुगण,
अधिभूत अष्टमूर्ति एकादश रुद्र।

१६ प्राण तुषित-  
इन्द्रियाँ मरुद्गण - 
भूत तन्मात्रा अनेक रुद्र।

१७ कारण शरीर द्वादश साध्य -
सुक्ष्म शरीर विश्वकर्मा (प्राचेतस)
लिङ्ग शरीर यह्व।

१८ चक्र सिद्ध -     
संस्थान त्वष्टा- 
सिद्धियाँ विनायक।

१९ सुशुम्ना विश्वेदेवाः -  
पिङ्गला विश्वरूप-    
इड़ा एल (भैरव) ।

     २० पिण्ड, राजा (शासक), परमाणु (वैशेषिक का)।