वर्तमान में उपलब्ध पुराण किसकी रचना है? कब रचे गए? और क्यों रचे गए?
*पुराण*
हर घर में कोई न कोई पुराण अवश्य मिल ही जाएगा।
प्राचीन काल में यज्ञों के दौरान सायंकाल में सभाओं में पुराणों का पाठ होता था। अतः वेदों और ब्राह्मण ग्रन्थों में भी पुराण शब्द आया है। इन्हीं पुराणों को वेदव्यास जी ने सम्पादित किया।
वर्तमान में भी मन्दिरों में, और सार्वजनिक पाण्डालों में और घरो में भी पुराण पाठ, पुराण प्रवचन होते रहते हैं। इसलिए पौराणिक ज्ञान व्यापक प्रसारित हुआ।
लेकिन वर्तमान में उपलब्ध पुराण न वैदिक पुराण है, न वेदव्यास जी रचित पुराण है।
विष्णु पुराण वेदव्यास जी के पिता महर्षि पराशर की रचना थी।
क्वोरा एप के सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रसिद्ध विद्वान लेखक श्री अरविन्द कुमार व्यास महोदय के द्वारा पुराणों के बारे में कुछ जानकारी सहित उनके कुछ विवादास्पद तथ्यों पर जानकारी प्रस्तुत है शीर्षक से लिख गए आलेख में उन्होंने विष्णु पुराण की प्राचीनता के सम्बन्ध में लिखा है कि,---
"विष्णु पुराण में ध्रुव तारे का विवरण उसके थुबन होने का परिचायक है; तथा इसके अनुसार यह लगभग चार हजार वर्ष से अधिक प्राचीन (2600–1900 ईसा पूर्व) खगोलीय परिस्थिति है; जोकि विशाखा नक्षत्र में शारदीय विशुव (2000–1500 ईसा पूर्व) तथा दक्षिण अयनान्त के श्रवण नक्षत्र में (लगभग 2000 ईसा पूर्व) से सुदृढ़ होता है।"
अर्थात विष्णु पुराण कम-से-कम 2600ईसा पूर्व से 2000 ईसा पूर्व में रचा गया है।
जब परीक्षित अभिमन्यु पत्नी उत्तरा गर्भ में थे, उसके बहुत पहले शुकदेव जी का ब्रह्मलोक प्रयाण हो चुका था। यह बात महाभारत युद्ध समाप्त होकर युधिष्ठिर के राज्याभिषेक होने के पश्चात धर्मनीति जिज्ञासु युधिष्ठिर आदि पाण्डवों को शर शैय्या पर लेटे भीष्म पितामह ने कही। प्रमाण देखें--- महाभारत शान्ति पर्व/ मौक्षधर्म पर्व/ अध्याय ३३२ एवम् ३३३ गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित महाभारत पञ्चम खण्ड (शान्ति पर्व) पृष्ठ ५३२५ से ५३२९ तक देखें। विशेषकर श्लोक २६-१/२ पृष्ठ ५३२८ देखें।
शुकदेव जी के ब्रह्मलोक प्रयाण के बहुत बाद में परीक्षित जन्में तो परीक्षित की मृत्यु के समय शुकदेव जी भागवत कथा सुनाने कैसे आ गये, यह बात शुकदेव जी के पिता वेदव्यास जी कैसे लिख सकते हैं? मतलब आश्चर्य तो यह भी है कि, परीक्षित की मृत्यु तक भी पाण्डु और धृतराष्ट्र के जैविक पिता वेदव्यास जी तीसरी पीढ़ी के समाप्ति कैसे तक जीवित थे! और न केवल जीवित रहे अपितु पुराणों की रचना कर रहे थे! यह विचारणीय है।
ऐसे पुराणों को वेदव्यास जी की रचना मानने वालों को हमारा प्रणाम है।
तो फिर वर्तमान उपलब्ध पुराण किसने लिखे? का उत्तर।
आद्य शंकराचार्य जी का सही समय ५०९ ईसापूर्व से ४७७ ईसापूर्व का है।
कामकोटि पीठके ३८वें आचार्य चिदम्बरम वासी श्री विश्वजी के पुत्र आचार्य श्री अभिनवशंकर जी ७८७ ईस्वी से ८४० ईस्वी तक ५३ वर्ष विद्यमान रहे। वे ३० वर्ष तक जगन्नाथ पुरी के गोवर्धन मठ के शंकराचार्य के पद पर रहे।इन्होंने कश्मीर के वाक्पतिभट्ट को शास्त्रार्थ में पराजित किया था।
वर्तमान इतिहासकार इन्हीं शंकराचार्य अभिनवशंकर जी को आद्य शंकराचार्य बतलाते हैं और उनका काल ७८८ - ८२० ई. का बताते हैं।
लगभग ईसापूर्व ४९२ से ईसापूर्व से ४७७ की अवधि में आद्य शंकराचार्य जी के द्वारा बौद्धाचार्यों और जैनाचार्यों को शास्त्रार्थ में हरा कर उन बौद्धाचार्यों और जैनाचार्यों को शुद्धिकरण कर सनातन धर्म में वापसी करवाईं। इन पूर्व बौद्धाचार्यों और पूर्व जैनाचार्यों नें अपनी रुचि अनुसार वैष्णव, सौर, शेव, शाक्त और गाणपत्य सम्प्रदाय अपनाकर अपने -अपने मठ स्थापित कर उनके मठाधीश महन्त बनकर अपने सम्प्रदाय के ग्रन्थों की रचना प्रारम्भ की।
वर्तमान पुराण रचयिता ---
इनमें दक्षिण भारत के पूर्व बौद्ध और जैनाचार्यों ने इन मठों में रहकर पूर्व संस्कार और दक्षिण भारत में प्रचलित अथर्ववेद, कृष्ण यजुर्वेद तथा गाथाओं के, तन्त्र, और दृविड़ वेद की परिपाटी और दक्षिण भारतीय संस्कृति और परम्पराओं के अनुरूप अपने मठ की परिपाटी और परम्पराओं का निर्धारण करने हेतु आगम ग्रन्थ रचे तथा लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व वेदव्यास जी द्वारा रचित पुराणों में अपने सिद्धान्तों के अनुरूप संशोधन कर नवीन पुराणों की रचना की।
पुराणों में परिवर्तन और परिवर्धन का क्रम (सिलसिला) मुख्य रूप से पुष्यमित्र शुङ्ग के शुङ्गवंश के शासन (१८५ ई.पू. से १४९ ई.पू. तक) से प्रारम्भ हुआ जो शुङ्गवंश, विक्रमादित्य के शासनकाल में भी चलता रहा। शालिवाहन / सातवाहन वंश, गुप्त वंश के बाद पुराणों में परिवर्तन का सिलसिला अधिक बढ़ गया जो धार के राजा भोज के शासनकाल (१०१० ईस्वी से १०५५ ईस्वी) तक चला। जिसका प्रमाण बोपदेव की रचनाएँ हैं।
शास्त्रार्थ में पराजित होकर जैनाचार्य अधिकांशतः शैव हो गये जबकि ,वज्रयान बौद्ध आचार्य शैव-शाक्त हुए। कुछ बौद्ध वैष्णव हुए जिन्होंने बुद्ध को नौवा अवतार घोषित कर दिया। संशोधित पुराणों में देवताओं और ऋषियों के चरित्र पर अनेक कलंक लगाये। असुरों को महा तपस्वी बतलाया।
वेदव्यास कृत पुराण के अनुसार ध्रुव के तप से सन्तुष्ट हो भगवान श्रीहरि नें स्वयम् दर्शन देकर ध्रुव को विष्णु का परमपद प्राप्त करने योग्य आत्मज्ञान/ ब्रह्म ज्ञान प्रदान किया इसकी तुलना में नवीन पराणों में प्रह्लाद की भक्ति की प्रशंसा अधिक कीगई है और ध्रुव को पद लोभी सिद्ध कर दिया।
वेदों में महाराज दिवोदास के दान की प्रशंसा की गई है। जबकि नवीन पुराणों में असुरराज बलि के दान की प्रशंसा की गई ।असुरों की भूरीभूरी प्रशंसा की। असुरों, दैत्यों, दानवों राक्षसों को महा तपस्वी बतलाया गया।केवल ऋषभदेव और बुद्ध को उत्तम चरित्रवान बताया और ऋषि-मुनियों और देवताओं को कामुक बतलाया गया।
जैनों के अनुसार रावण भविष्य में उनके तीर्थंकर होनें वाले हैं। अतः उस दुष्ट राक्षस को तान्त्रिक के स्थान पर महान शिवभक्त और तपस्वी बतलाया गया।
जातक कथाओं के अनुरूप नवीन पुराणों में अवतारवाद बनाया।
ललित सागर ग्रन्थ के अध्याय २१ पृष्ठ १७८ अनुसार बिहार में गया के निकट कीटक नामक स्थान पर पिता श्री अजिन (मतान्तर से हेमसदन) और माता श्रीमती अञ्जना के पुत्र श्रीबुद्ध हुए थे।
वेदव्यास कृत पुराण में आठवें अवतार बलराम और नौवे अवतार कृष्ण को बतलाया है। नवीन भागवत पुराण में पूर्व बौद्धाचार्यों नें नें आठवाँ अवतार श्रीकृष्ण को और नौवा अवतार कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन और उनकी पत्नी माया देवी के पुत्र सिद्धार्थ गोतम बुद्ध को बतला दिया।
"कृपया गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित महाभारत पञ्चम खण्ड,शान्ति पर्व/ मौक्ष पर्व/ अध्याय २८४ पृष्ठ ५१६६ या संक्षिप्त महाभारत का पृष्ठ १२८१ देखें।"
महाभारत में उल्लेखित दक्षयज्ञ विध्वंस की कथा के अनुसार प्रचेताओं के पुत्र दक्ष द्वितीय द्वारा किए गए यज्ञ में सभी देवताओं और ऋषियों को बुलाया लेकिन शंकर पार्वती को नहीं बुलाया।
देवताओं को समुह में जाते देख पार्वती ने शंकर जी से पुछा, तब शंकर जी ने पार्वती को बतलाया कि, दक्ष (द्वितीय) यज्ञ कर रहे हैं, उसमें उनके निमन्त्रण / आह्वान पर देवता यज्ञभाग लेने जा रहे हैं।
पार्वती द्वारा यह आपत्ति जताई कि, आप रुद्र को यज्ञभाग लेने हेतु क्यों आमन्त्रित नहीं किया गया।
तब शंकर जी बतलाते हैं कि, इसमें दक्ष का कोई दोष नहीं है। सृष्टि के आदि में प्रजापति ब्रह्मा ने रुद्र को यज्ञभाग न देने का विधान किया गया था। इसलिए मुझे नहीं बुलाया।
दक्ष द्वारा यज्ञ में न बुलाने और यज्ञभाग न देने की जानकारी से रुष्ट पार्वती (न कि, सती) को साथ लेकर स्वयम् शंकर जी दक्ष यज्ञ स्थल पर गये। वहाँ पार्वती अपनी नाराज़गी प्रकट करती है। केवल दधीचि पार्वती का समर्थन करते हैं। शेष सब मौन ही रहते हैं। दक्ष पर पार्वती के रोष का कोई प्रभाव न देखकर पार्वती जी और रुष्ट हो गई। इसे देखकर शंकरजी ने वीरभद्र और भद्रकाली का आह्वान किया। और वीरभद्र और भद्रकाली को दक्षयज्ञ विध्वंस का आदेश दिया। वीरभद्र और भद्रकाली को दक्षयज्ञ विध्वंस कर दक्ष द्वितीय का सिर काट दिया। और देवताओं को भी प्रताड़ित किया।
फिर प्रजापति ब्रह्मा ने नियमों में संशोधन कर भविष्य में रुद्र को यज्ञभाग देने का नियम बना दिया तब, शंकर जी ने दक्ष द्वितीय को पुनर्जीवित किया। और सहर्ष पार्वती जी को लेकर वापस लौट गए।
जब सती ने आत्मदाह किया ही नही तो, शंकर जी द्वारा विक्षिप्त हो कर दग्ध सती का शव लेकर घुमने, और भगवान विष्णु द्वारा चक्र से सती के शव के ५१ टुकड़े करने और जहाँ जहाँ वे टुकड़े गिरे, वहाँ शक्तिपीठ स्थापित होने की कहानी स्वतः गलत हो जाती है। साथ ही हिमवान और मैना की सन्तान के रूप में सती का पार्वती के रूप में पुनर्जन्म होना, फिर तपस्या कर शंकर जी से विवाह करना सभी कथाएँ गलत सिद्ध हो जाती है।
तो शिवपुराण सहित जिन पुराणों में उक्त वर्णन है, वे सभी पुराण गलत सिद्ध हो जाते हैं।
स्मृतियों की रचना किननें और कब की?
*स्मृतियाँ*
स्मृतियों का आधार वेदाङ्ग - कल्प- धर्मसुत्र है।मनुस्मृति वैवस्वत मनु द्वारा रचित उनका संविधान ग्रन्थ है।
यह सत्य है कि, धर्मसुत्रों में जोड़-तोड़ कर स्मृतियाँ बनाई गई।
पुष्यमित्र शुङ्ग ने (१८५ ई.पू. से १४९ ई.पू. तक) मनुस्मृति को अपना संविधान घोषित किया। शुङ्गवंश का शासन ७३ ई. पू. तक चला। कुछ प्रमाण पुष्यमित्र शुङ्ग को मोर्य सिद्ध करते हैं। कुछ लोग चीन के शुङ्गवंश का मानते हैं लेकिन इसका कोई प्रमाण नही है।
बाद में कण्व राजवंश (७३ ई.पू. २८ ई.पू. तकसे ) के प्रमुख राजाओं नें मनु स्मृति को संविधान के रूप में अपनाया।
इसी बीच उज्जैन के प्रतापी सम्राट विक्रमादित्य (५७ ई.पू. से) के समय भी मनुस्मृति ही संविधान रही।
इसके बाद शालिवाहन या सातवाहन वंश २८ ई. पू. से २२० ईस्वी तक नें भी मनु स्मृति और अन्य स्मृतियों में संशोधन करवा कर और अन्य स्मृतियों की रचना करवा कर स्मृतियों को संविधान घोषित किया।
चुंकि,स्मृतियाँ विधि विधान हैै, संविधान है; कानून की किताब है, लॉ बुक्स है; इसलिए जन साधारण को स्मृृृतियोंंका ज्ञान नही के बराबर ही रहता है और न ही सामान्य जीवन में स्मृतियों का कोई विशेष काम पड़ता है। इसलिए स्मृतियों के ज्ञाता केवल आचार्य गण और न्यायकर्ता ही रहे थे।
आज भी विधि विशेषज्ञ ही स्मृतियों पर चर्चा करते हैं। लगभग नगण्य घरों में भी कोई स्मृति ग्रन्थ मिल पाएगा।
अतः वैदिक ब्राह्म धर्म को स्मृतियों ने भ्रष्ट नहीं किया अपितु पुराणों ने वैदिक ब्राह्म धर्म को भ्रष्ट किया है।
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