गुरुवार, 17 नवंबर 2022

दार्शनिक जिज्ञासाओं के उत्तर।

१ सत मतलब अस्ति (है), अस्तित्व (हैपन), सत्य, वास्तविक।
असत कुछ होता ही नही। जो है वह सत ही है।
सत ऋत (परमात्मा के संविधान) से भी उच्चतर है। ऋत विश्वात्मा ॐ के निकटतम है। परमात्मा ही सत है।
सत अक्षर ब्रह्म होते हुए भी; उस अक्षर ब्रह्म से भी परे साक्षात परमात्मा ही है।
सत के अलावा कुछ है ही नही। अतः जो कुछ दिख रहा है, अनुभव हो रहा है; वह सब वह परमात्मा है। अर्थात सत ही तो है।
अक्षर ब्रह्म तो प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) (पुरुष- प्रकृति) ब्रह्म (सवितृ- सावित्री) है।
इससे उत्कृष्ट प्रज्ञात्मा (परम दिव्य पुरुष- परा प्रकृति) परब्रह्म (विष्णु-माया) है। 
इससे उच्चतर विश्वात्मा - परमात्मा का ॐ संकल्प है। इससे उच्चतर और सर्वोच्च परम आत्मा/ परमात्मा ही है। जो एकमात्र सत है/ सत्य है।
सत सदैव एकसा, समरस, अपरिवर्तनशील, अक्षर, एकमेव, सर्वोत्कृष्ट, सर्वोच्च, सर्वोत्तम परमात्मा है।
जबकि ऋत परमात्मा का अर्थात सत का  अपरिवर्तनशील, अटल संविधान है। 
लेकिन ऋत में धर्म के समान बहुत अधिक परन्तुक  होनें से सदैव गतिशील ,अटल लेकिन अचल नही है। इसे एकसाथ पूर्णरूपेण समझ कर स्मरण रखना सबसे कठीन काम है। केवल लगभग आत्मज्ञ ही समझ पाते हैं।
शुन्य मतलब परम मध्य। न धनात्मक न ऋणात्मक। गुण साम्यावस्था।
अ शुन्य मतलब धनात्मक हो या ऋणात्मक लेकिन शुन्य से अनन्त के बीच की अवस्था। विषम, प्रकृति में विक्षेप की अवस्था ।

जो कुछ है सब सत ही है। यही इसका भौतिक स्वरूप है। जो कुछ है सब सत ही है, इसलिए सत के अतिरिक्त कुछ भी नही है, न सत के आगे कुछ है न सत के पीछे दाँये- बाँये, उपर- नीचे कुछ भी नहीं है। ऐसा समझा जा सकता है। लेकिन यह कुछ भी नहीं भी तो सत ही है। नेति नेति।
सत स्थाई, स्थिर है इसीलिए सापेक्ष सबकुछ गतिशील है। इसलिए ऋत भी गतिशील है।
यही बात सत (परमात्मा) से असत (वास्तव में मिथ्या) जगत की उत्पत्ति और असत (केवल परमात्मा) से सत (वर्तमान स्वरूप में जगत) की उत्पत्ति है।
सत्य (परमात्मा) को जितना जान लिया उतने ही आप चेतन होते जाते हैं। और परमात्मा के निकट होते जाते हैं। आनन्दित रहते हैं। पूर्णतः जान लेनें पर परमात्मा ही रह जाता है।
परमात्मा के ॐ संकल्प के परिणाम स्वरूप उत्पन्न जैविक  और जड़ जगत रूपी यह सृष्टि परमात्मा की लीला मात्र है।
सृष्टि, स्थिति और लय उस परमात्मा का मौज है, लीला है।

बुधवार, 16 नवंबर 2022

अत्यावश्यक षडकर्म

निम्नांकित षडकर्म अनिवार्य है। इनमें से किसी को भी नही छोड़ा जा सकता।

क -शारीरिक गतिविधियाँ-
व्यायाम - अष्टाङ्ग योग के आसन और प्राणायाम,(शारीरिक व्यायाम) और मल्ल। प्रत्याहार (विचारों को दृषटाभाव से देखना, लेकिन अपनी ओर से कुछ भी नहीं करना।)
क्रीड़ा/खेलना - आउटडोर गेम्स।

ख -मानसिक गतिविधियाँ।
३ अष्टाङ्ग योग के धारणा और ध्यान (मानसिक आराम)।
४ पढ़ना - पुस्तक वाचन

पञ्चमहायज्ञ - इसमे उपर्युक्त सभी चीजें स्वतः सम्मिलित है 

1 -ब्रह्मयज्ञ - अध्ययन, चिन्तन - मनन, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि, अध्यापन, जप। 

2 देवयज्ञ - दैनिक यज्ञ, सप्ताहिक यज्ञ, पाक्षिक पौर्णमास यज्ञ -अमावस्या के यज्ञ, मासिक हवन - सायन सौर संक्रान्तियों पर हवन, ऋतु के, अयन - तोयन के और वार्षिक यज्ञ और भजन, किर्तन, स्तवन।

3 नृ यज्ञ/ मनुष्य यज्ञ - मानव सेवा - निकटतम उपलब्ध दुर्बल, असहाय, पिड़ित, दरिद्र (गरीब), अस्वस्थ्य, रोगी, अपङ्ग, वृद्धों, बालकों और अबलाओं की सेवा - उन्हें आवश्यकतानुसार और योग्यतानुसार उनके जल, भोजन, वस्त्र,बिस्तर, निवास, मनोरञ्जन, औषधि, चिकित्सा, परिचर्या में तन, मन, धन से योगदान करना।

4 भूत यज्ञ - पेड़ - पौधे, पशु - पक्षी की नृयज्ञ के समान ही सेवा करना और अपना योगदान करना। पर्यावरण संरक्षण के कार्यों में अपना योगदान करना।

5 पितृ यज्ञ - स्वयम् के और अन्य सभी के माता -पिता, दादा - दादी, नाना- नानी की नृ यज्ञ के समान सेवा करना। अपनी सन्तान और अन्य अनाथ, जरूरत मन्द बच्चों की सेवा- सहायता द्वारा उनके माता - पिता, पालकों की सहायता करना। अपने मृत बुजुर्गों की जन सेवा सम्बन्धित अपूर्ण इच्छा पूर्ण करने का प्रयत्न करना। यथा - जल आपूर्ति (कुए- बावड़ी, तालाब, नदी, नहर की सफाई, विकास आदि), सदाव्रत, पथिक सेवा केन्द्र, धर्मशाला, विद्यालय, वाचनालय, औषधालय, चिकित्सालय आदि के निर्माण, व्यवस्थापन में सहयोग करना। 

धनार्जन - कमाना, बचाना, निवेश करना हम सबका राष्ट्रीय और सामाजिक कर्तव्य है।
हम कमाएंगे तो हमारे बुते पर दुसरे दुकानदार, उद्योग, कार्मिक, शासकीय सेवक सब कमा पायेंगे। और हमारी गृहस्थी के लिए तो आवश्यक है ही।

उक्त में से कुछ भी नही छोड़ा जा सकता है। सभी करना ही चाहिए।

गुरुवार, 3 नवंबर 2022

*वैदिक कालीन संवत्सर व्यवस्था।*

*वैदिक कालीन संवत्सर व्यवस्था।* 
(श्री शंकर बालकृष्ण दीक्षित रचित और हिन्दी समिति उ.प्र. शासन से प्रकाशित ग्रन्थ भारतीय ज्योतिष ग्रन्थ , श्री पाण्डुरङ्ग काणे रचित धर्मशास्त्र का इतिहास ग्रन्थ भाग एवम् श्री दीनानाथ शास्त्री चुलेट कृत वैदकाल निर्णय ग्रन्थ के पृष्ठ ३७ से ६३ से उद्धृत) -

 *संवत्सर व्यवस्था -* 

यह वैज्ञानिक तथ्य है कि, दिक - काल का संयुक्त वर्णन ही सम्भव है।
यथा राजनितिक भुगोल में आपनें मोर्यकालीन भारत या गुप्त कालीन भारत के नक्षे देखे होंगे। अर्थात स्थान के विवरण के साथ समय दर्शाना आवश्यक है। इसी प्रकार ग्रीनविच मीन टाइम मा भारतीय मानक समय में समय के साथ स्थान दर्शाना आवश्यक है। ऋतुएँ अक्षांश और सूर्य की सायन संक्रान्तियों पर आधारित होती है। अतः पहले वैदिक ऋषियों प्रजापतियों और राजन्यों का कार्यक्षेत्र समझ लिया जाना आवश्यक है। क्योंकि वैदिक ग्रन्थों में इन्ही स्थानों (अक्षांशों) की ऋतुकाल के अनुसार वर्णन मिलना स्वाभाविक है। 
वेदव्यास जी के पिता महर्षि पराशर रचित विष्णु पुराण के अनुसार हरियाणा का धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र (थानेसर जिला) वाला क्षेत्र प्राचीन ऋषि देश कहलाता है ।
क्योंकि, प्रजापति ब्रह्मा नें १अर्धनारीश्वर महारुद्र २ सनक, ३ सनन्दन, ४ सनत्कुमार, ५ सनातन, ६ नारद, ७ इस क्षेत्र के राजा धर्म, ८ अग्नि - स्वाहा की जोड़ी, ९ पितरः (अर्यमा) - स्वधा की जोड़ी, के अलावा तीन प्रजापति - १० दक्ष प्रजापति (प्रथम) - प्रसुति की जोड़ी, ११ रुचि प्रजापति - आकुति की जोड़ी, १२ कर्दम प्रजापति - देवहूति की जोड़ी उत्पन्न किए। इनके अलावा ब्रह्मर्षि गण उत्पन्न किए जिनका विवाह दक्ष- प्रसूति की पुत्रियों से हुआ और जिनकी सन्तान ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण हुए) -- १३ महर्षि भृगु - ख्याति (जो मैरे आदि पूर्वज हैं) तथा १४ मरिची - सम्भूति, १५ अङ्गिरा - स्मृति, १६ वशिष्ट-ऊर्ज्जा, १७ अत्रि - अनसुया, १८ पुलह - क्षमा, १९ पुलस्य - प्रीति, २० कृतु - सन्तति आदि ऋषियों तथा २१ स्वायम्भू मनु - शतरुपा की जोड़ी को कुरुक्षेत्र में ही उत्पन्न किया था । इसे गोड़ देश भी कहते हैं।
 
पञ्जाब - हरियाणा का मालव प्रान्त भी इससे लगा हुआ है। और कुछ क्षेत्र तो कॉमन ही है।
मालवा प्रान्त से अफगानिस्तान तक और गुजरात से तजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान, उज़्बेकिस्तान, तिब्बत, मङ्गोलिया के दक्षिण में पश्चिमी चीन पर स्वायम्भुव मनु के वंशज मनुर्भरतों का शासन था।अर्थात लगभग उत्तर अक्षांश २३° से ३५° विशेष क्षेत्र रहा।

(विक्रमादित्य के दादा जी महाराज नबोवाहन ने भी इसी क्षेत्र से आकर मध्यप्रदेश में सिहोर जिले के सोनकच्छ के निकट गन्धर्वपुरी में आकर गन्धर्वपुरी को राजधानी बनाया था। उनके बाद विक्रमादित्य नें अवन्तिकापुरी (उज्जैन) को राजधानी बनाया। राजा भोज के काका श्री मुञ्जदेव नें धारानगरी (धार) बसायी और राजा भोज ने धार को राजधानी बनाया। मालवा के पठार का नामकरण भी उक्त मालव प्रान्त के शासकों द्वारा शासित होनें के आधार पर ही हुआ। खेर यह विषयान्तर होगया।)

*देवा ऋतवः वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु उत्तरायण में होती है।* 
शतपथ ब्राह्मण 2/1/3 तथा तै.सं. 6/5/3 तथा नारायण उपनिषद अनु. 80
*उदगयन शब्द और देवयान / देवलोक शब्द स्पष्ट आये हैं।* 
मैत्रायण्युपनिषद में उत्तरायण और नारायण उपनिषद अनु 80
(भा. ज्यो.पृष्ठ 44 एवम् 45)

*वसन्त को प्रथम ऋतु और संवत्सर का शिर, ग्रीष्म को दक्षिण पक्ष (पंख) और शरद को उत्तर पक्ष कहा है।* 
तै.ब्रा. 1/1/2/6 एवम् 7 एवम् 3/10/4/1
*हेमन्त को संवत्सर का मध्य और वर्षा को पुच्छ कहा है।*
तै.ब्रा. 3/10/4/1
(भा. ज्यो. पृष्ठ 47)

इससे निम्नांकित तथ्य प्रमाणित होते हैं।
१ वैदिक संवत्सरारम्भ विषुव सम्पात यानी सायन मेष संक्रान्ति (वर्तमान में २०/२१ मार्च) से होता था जिस दिन सूर्य भूमध्य रेखा पर होकर उत्तरी गोलार्ध में प्रवेश करता है। दिनरात बराबर होते हैं, उत्तरी ध्रुव पर सूर्योदय होता है और दक्षिण ध्रुव पर सूर्यास्त होता है।
२इसी वसन्त सम्पात दिवस से
 उत्तरायण आरम्भ होता था।
३ वसन्त ऋतु का आरम्भ भी इसी वसन्त सम्पात दिवस से होता था।
वैदिक मास मधुमास का आरम्भ भी इसी वसन्त सम्पात दिवस से होता था।

*तीन मौसम / ऋतु के नाम आये हैं।* 
अग्निर्ऋतुः सूर्य ऋतुश्चन्द्रमा ऋतु।
तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/10/1
(भा.ज्यो पृष्ठ 49)
इससे प्रमाणित होता है कि, वर्तमान के ही समान वैदिक युग में भी तीन मौसम मुख्य रहते थे १ गर्मी, वर्षा और ठण्ड।

 *फाल्गुन पूर्णिमा/ पूर्वाफाल्गुनी के दिन को संवतर का अन्तिम दिन कहा है। और उसके अगले दिन उत्तराफाल्गुनी को संवतरारम्भ कहा है।* 
तैत्तिरीय संहिता 7/4/8 में तथा पृष्ठ 51 पर सामवेद के ताण्यब्राह्मण 5/9
 तैत्तिरीय ब्राह्मण 7/4/8
(भा.ज्यो.पृष्ठ 50)

*अधिक मास वर्षान्त में जुड़ता था।*
 वाजसनैय संहिता 22/30 एवम् 31 
ऐतरेय ब्राह्मण 3/1 और 17 और तैत्तिरीय ब्राह्मण 3/8/3
(भा. ज्यो. पृष्ठ 40 एवम् 41)

इससे सिद्ध होता है कि, सामान्यतः अमान्त मास भी प्रचलित थे लेकिन संवत्सर आरम्भ के लिए सायन मेष संक्रान्ति ही मुख्य थी। उस दिन पड़ने वाले चन्द्रमा जिस नक्षत्र के साथ होता था उस नक्षत्र से भी इंगित करते थे। या पूर्णिमा अमावस्या, एकष्टका अष्टका तिथि से भी इंगित करते थे। 

*शुक्ल पक्ष और कृष्णपक्ष को अर्धमास कहा है।* 
*अर्धमासों के नाम पवित्रादि हैं।* 
अथ यदाह । पवित्रन् पवयिष्यन्त्सहस्वान्त्सहीयानरुणोरणरजा इति। एष एव तत्। ए ह्येव तेर्धमासाः एषः मासाः ।
तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/6/3 ।
(भा. ज्यो.पृष्ठ 48)
इससे प्रमाणित होता है कि, छब्बीस पक्षों के भी नामकरण किया गया था।

 *कृष्णपक्ष की प्रतिपदा को व्यष्टका और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को उदृष्ट कहा है।* 
तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/8/2 तथा ताण्ड्य ब्राह्मण 10/3/11 ।
 *कृष्णपक्ष की अष्टमी को अष्टका और शुक्ल पक्ष की अष्टमी को एकाष्टका कहा है।* 
तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/5/12 तथा ताण्ड्य ब्राह्मण 10/3/11 ।
(भा.ज्यो.पृष्ठ 59)
इससे प्रमाणित होता है कि, तिथियाँ प्रचलित नही थी। लेकिन चन्द्रमा के चारो फेस का निर्धारण गणना करते थे। यानी अमावस्या, उदृष्यका या शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, एकाष्टका (शुक्ल पक्ष की अष्टमी), पूर्णिमा, व्यष्टका (कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा), अष्टका (कृष्ण पक्ष की अष्टमी), और अमावस्या की गणना की जाती थी।

*दिन के पाँच विभाग - प्रातः, सङ्गव, मध्याह्न, अपराह्न और सायम्* 
 तै.ब्रा. 1/5/3 में
(भा.ज्यो.पृष्ठ 64)
*दिन के तीन विभाग - सङ्गव, मध्याह्न और अपराह्न चार प्रहरों की संधि या दिन के तीन विभाग बतलाये हैं।* 
शतपथ ब्राह्मण 2/2/3/9 एवम् अथ. सं. 9/6/46 में
(भा.ज्यो.पृष्ठ 65)
इससे सिद्ध होता है कि, दिनमान और रात्रिमान के भी तीन- तीन और पाँच-पाँच विभाग किये गए थे।

*ऋग्वेद में खग्रास सूर्यग्रहण वर्णन*

*खग्रास सूर्यग्रहण वर्णन में कहा है* -- इन्द्र तुम द्यु के नीचे रहने वाली स्वर्भानु की मायाओं का नाश करते हो। *अपव्रत तम से आच्छादित सूर्य को अत्रि ने तूरीय ब्रह्म द्वारा प्राप्त किया।* 
ऋग्वेद संहिता 5/40/ 6 ।

*सूर्य ने अत्रि और वरुण से अन्धकार से निगल न जाये अस्तु रक्षा याचना की जिस सूर्य को स्वर्भानु ने अन्धकार से आच्छादित किया उसे अत्रि ने प्राप्त किया।दुसरा कोई प्राप्त न कर सका।* 
ऋग्वेद संहिता 5/40/ 7

*अत्रि नें ग्रावा की योजना कर देवताओं के लिए सोम निकाल कर स्तोत्रों से देवताओं का यजन कर नमस्कार कर स्वर्भानु की मायाएँ दूर की। और सूर्य के प्रकाश के स्थान पर अपना नैत्र रख दिया।* 
ऋग्वेद संहिता 5/40/ 8 ।

 *जिस सूर्य को स्वर्भानु ने अन्धकार से आच्छादित कर दिया था उसे अत्रि ने प्राप्त किया और कोई न कर सका।* 
ऋग्वेद संहिता 5/40/ 9 ।
(भा.ज्यो. पृष्ठ 82)

ब्राह्मण ग्रन्थों में सूर्यग्रहण वर्णन --
ताण्डय ब्राह्मण 4/5/2, 4/6/13, 6/6/8, 14/11/14एवम् 15, 23/16/5 में सूर्य ग्रहण का उल्लेख है। 
ताण्डय ब्राह्मण 6/6/8, 14/11/14एवम् 15 में उल्लेख है कि, *अत्रि ने भास (तेज) द्वारा अन्धकार का नाश किया।* 
गोपथ ब्राह्मण 8/19 मे कहा है कि, *स्वर्भानु ने तम से सूर्य को वेधित किया और अत्रि ने उसका अपनोद किया।* 
ताण्डय ब्राह्मण 4/5/2, 4/6/13,में कहा है कि, *देवों नें अन्धकार का नाश किया* तथा शतपथ ब्राह्मण 5/3/22 में कहा है कि, *सोम तथा रुद्र ने तम का नाश किया।*
(भा.ज्यो.पृष्ठ 83)  
इससे सिद्ध होता है कि, महर्षि अत्रि ने सूर्यग्रहण और मौक्ष की ठीक ठीक गणना करना सीख लिया था।

*6586 दिन अर्थात 223 चान्द्रमासों में अर्थात सौर 18 वर्ष 12 दिन में पहले के ग्रहण पुनः पुनः आते हैं। रीपीट होते रहते हैं।* 
(भा.ज्यो.पृष्ठ 83)  
इति वैदिक संवत्सर वर्णन।

बुधवार, 2 नवंबर 2022

भारतीय ज्योतिष - शंकर बालकृष्ण दीक्षित रचित भारतीय ज्योतिष ग्रन्थ के अनुसार ।

भारतीय ज्योतिष - (शंकर बालकृष्ण दीक्षित। हिन्दी समिति उ.प्र. शासन का  प्रकाशन) से उद्धृत -
पृष्ठ 40 एवम् 41
 वाजसनैय संहिता 22/30 एवम् 31 ।
ऐतरेय ब्राह्मण 3/1 और 17 और तैत्तिरीय ब्राह्मण 3/8/3 *अधिक मास वर्षान्त में जुड़ता था।*

पृष्ठ 44 एवम् 45  ।
शतपथ ब्राह्मण 2/1/3 तथा तै.सं. 6/5/3 तथा नारायण उपनिषद अनु. 80  से प्रमाणित होता है कि, *देवा ऋतवः वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु उत्तरायण में होती है।* 
मैत्रायण्युपनिषद  में  उत्तरायण और  नारायण उपनिषद अनु 80 में *उदगयन शब्द  और देवयान / देवलोक शब्द स्पष्ट आये हैं।* 

पृष्ठ 47 से -    तै.ब्रा. 1/1/2/6 एवम् 7 एवम् 3/10/4/1 में *वसन्त को प्रथम ऋतु  और संवत्सर का शिर, ग्रीष्म को दक्षिण पक्ष (पंख) और शरद को उत्तर पक्ष कहा है।* 
तै.ब्रा. 3/10/4/1 में *हेमन्त को संवत्सर का मध्य और वर्षा को पुच्छ कहा है।*

पृष्ठ 48 तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/6/3 में        अथ यदाह । पवित्रन् पवयिष्यन्त्सहस्वान्त्सहीयानरुणोरणरजा इति। एष एव तत्। ए ह्येव तेर्धमासाः एषः मासाः ।
में *पवित्रादि मासों के नाम आये हैं।* 
तथा *शुक्ल पक्ष और कृष्णपक्ष को अर्धमास कहा है।* 

 भारतीय ज्योतिष पृष्ठ 49 तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/10/1 में        अथ यदाह । पवित्रन् पवयिष्यन् पूतो मेध्यः यशो यशस्वानायुरमृतः ।  
में *पवित्रादि अर्धमासों के नाम आये हैं।* 
अर्थात शुक्ल पक्ष और कृष्णपक्ष के समान  है।


पृष्ठ 49 तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/10/1 में        

अग्निर्ऋतुः सूर्य ऋतुश्चन्द्रमा ऋतु कहकर *तीन मौसम / ऋतु के नाम आये हैं।* 


पृष्ठ 50 तैत्तिरीय संहिता 7/4/8 में  तथा पृष्ठ 51  पर सामवेद के ताण्यब्राह्मण 5/9
 तैत्तिरीय ब्राह्मण 7/4/8 में     
में *फाल्गुन पूर्णिमा/ पूर्वाफाल्गुनी के दिन को संवतर का अन्तिम दिन कहा है। और  उसके अगले दिन उत्तराफाल्गुनी को संवतरारम्भ कहा है।* 


पृष्ठ 59 तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/5/12 तथा ताण्ड्य ब्राह्मण 10/3/11 में  *कृष्णपक्ष की अष्टमी को अष्टका और शुक्ल पक्ष की अष्टमी को एकाष्टका कहा है।* 

तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/8/2 तथा ताण्ड्य ब्राह्मण 10/3/11 में *कृष्णपक्ष की प्रतिपदा को व्यष्टका और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को उदृष्ट कहा है।* 


पृष्ठ 64 तै.ब्रा. 1/5/3 में *दिन के पाँच विभाग -
प्रातः, सङ्गव, मध्याह्न, अपराह्न और सायम्* 
पृष्ठ 65 शतपथ ब्राह्मण 2/2/3/9 एवम् अथ. सं. 9/6/46 में *सङ्गव, मध्याह्न और अपराह्न चार प्रहरों की संधि या दिन के तीन विभाग बतलाये हैं।* 


भा.ज्यो. पृष्ठ 82 पर ऋग्वेद संहिता 5/40 में *खग्रास सूर्यग्रहण वर्णन में कहा है* --

 5/40/ 6 इन्द्र तुम द्यु के नीचे रहने वाली स्वर्भानु की मायाओं का नाश करते हो। *अपव्रत तम से आच्छादित सूर्य को अत्रि ने तूरीय ब्रह्म द्वारा प्राप्त किया।* 

  5/40/ 7 *सूर्य ने अत्रि और वरुण से अन्धकार से निगल न जाये अस्तु रक्षा याचना की* 
 *जिस सूर्य को स्वर्भानु ने  अन्धकार से आच्छादित किया उसे अत्रि ने प्राप्त किया।दुसरा कोई प्राप्त न कर सका।* 

5/40/ 8 *अत्रि नें ग्रावा की योजना कर देवताओं के लिए सोम निकाल कर स्तोत्रों से देवताओं का यजन कर नमस्कार कर स्वर्भानु की मायाएँ दूर की। और सूर्य के प्रकाश के स्थान पर अपना नैत्र रख दिया।* 
5/40/ 9 *जिस सूर्य को स्वर्भानु ने अन्धकार से आच्छादित कर दिया था उसे अत्रि ने  प्राप्त किया और कोई न कर सका।* 

पृष्ठ 83  से 
 *6586 दिन अर्थात 223 चान्द्रमासों में अर्थात सौर 18 वर्ष 12 दिन में पहले के ग्रहण पुनः पुनः आवर्तन होता हैं अर्थात रीपीट होते रहते हैं।* 

पृष्ठ 83  से 
ताण्डय ब्राह्मण 4/5/2, 4/6/13,  6/6/8,  14/11/14एवम् 15,  23/16/5  में सूर्य ग्रहण का उल्लेख है। 
ताण्डय ब्राह्मण 6/6/8,  14/11/14एवम् 15 में उल्लेख है कि, *अत्रि ने भास (तेज) द्वारा अन्धकार का नाश किया।* 
गोपथ ब्राह्मण 8/19 मे कहा है कि, *स्वर्भानु ने तम से सूर्य को वेधित किया और अत्रि ने उसका अपनोद किया।* 
ताण्डय ब्राह्मण 4/5/2, 4/6/13,में कहा है कि, *देवों नें अन्धकार का नाश किया* तथा शतपथ ब्राह्मण 5/3/22 में कहा है कि, *सोम तथा रुद्र ने तम का नाश किया।*

बुधवार, 19 अक्टूबर 2022

महाअसुर से पारसी ईश्वर अहुर मज्द। यह्व से यहुदियों और ईसाइयों के ईश्वर का नाम याहवेह (यहोवा)। एल पुरुरवा से यहुदियों और ईसाइयों का ईश्वर वाचक शब्द एल। एल पुरुरवा से इस्लाम का ईश्वर वाचक शब्द अल, अल्लाह, इलाही।।

अथर्ववेद के ब्राह्मण ग्रन्थ अवेस्ता पर जेन्द व्याख्या असूरोपासक जरथुस्त्र द्वारा की गई। उस जेन्दावेस्ता के ग्रन्थ के आधार पर पारसी सम्प्रदाय का आरम्भ हुआ इसलिए पारसी ईश्वर वरुण को महाअसुर अर्थात अहुरमज्द कहते है। अतः परसियों का ईश्वर महा असुर कहलाता है। वेदों में भी वरुण को महा असुर कहा है।मित्र देवता इनके साथी हैं।

ऋग्वेद में यह्व शब्द आया है। अग्नि को देवताओं में बड़ा बतलानें के लिए अग्नि को यह्व अर्थात महादेव कहा गया है।

चन्द्रमा के पुत्र बुध और वैवस्वत मनु की पुत्री इला का पुत्र पुरुरवा हुए। इला के पुत्र होनें के कारण पुरुरवा एल कहलाते हैं। एल मतलब इलापुत्र।

 सीरिया की अरामी या पुरानी अरामी या पश्चिम आरमेइक भाषा/ चाल्डियन या खाल्डियन भाषा में ऋग्वेद का यह्व शब्द याहवेह या यहोवा हो गया और एल शब्द तो यथावत एल ही रहा।
लेकिन, बेबीलोनिया की भाषा पूर्वी अरामी में एल के रूप अल,  अल्लाह, इलाही आदि बनें।

पश्चिम अरामी (या अरमाया) भाषा में यहुदी धर्मग्रन्थ तनख (बाइबल पुराना नियम) लिखा गया है। मूसा, दाउद और सुलेमान आदि और सम्भवतः इब्राहिम भी सीरिया की भाषा पश्चिमी या पुरानी अरामी ही बोलते थे। यीशु बेबीलोनिया की पूर्वी आरमेइक भाषा बोलते थे।

इब्राहिम नें एल  शब्द को ईश्वर वाचक कहा और उस ईश्वर का नाम याहवेह / यहोवा (यह्व)  बतलाया। इसलिए बाइबल में एल और यहोवा शब्द प्रचलित रहा लेकिन अरब प्रायद्वीप में अल, अल्लाह और इलाही शब्द ही प्रचलित रहे।

अरब में ईश्वर के लिए अल्लाह शब्द प्रचलित था जिसे मोहमद नें अपनाया। अतः कुरान में अल्लाह और इलाही ईश्वर वाचक शब्द हैं।

बाइबल में एल ईश्वर वाचक जाति वाचक सञ्ज्ञा  और यहोवा व्यक्ति वाचक सञ्ज्ञा के रूप में प्रयुक्त हुआ है। लेकिन कुरान में अल्लाह केवल जाति वाचक सञ्ज्ञा के रूप में ही प्रयोग हुआ है। कुरान में ईश्वर के लिए कोई व्यक्तिवाचक सञ्ज्ञा नही है, जैसे; बाइबल मे एल की व्यक्ति वाचक सञ्ज्ञा यहोवा है।

शनिवार, 15 अक्टूबर 2022

पुरुषार्थ नहीं पराक्रम सही शब्द है।

पुरुषार्थ नहीं पराक्रम सही शब्द है।
अन्तरात्मा / प्रत्यगात्मा को ही पुरुष और प्रकृति कहा जाता है।
इस पुरुष के निमित्त, पुरुष के लिए पुरुष के अर्थ जो धर्म, अर्थ, काम और मौक्ष इन चारों लक्ष्यों में सफलता प्राप्त्यर्थ जो उपक्रम, पराक्रम किया जाता है उसे पुरुषार्थ यो पुरुष द्वारा की गई क्रिया/ कर्म नही कहा जा सकता।
अर्थात पुरुषार्थ का रूढ़ अर्थ पुरुष द्वारा की गई क्रिया/ कर्म  सरासर गलत ही है। 
उसके स्थान पर पराक्रम ही उचित शब्द है।
त्रिविक्रम और विक्रमादित्य शब्द में भी यही भाव है।

शनिवार, 1 अक्टूबर 2022

दुर्गा सप्तशती में उल्लेखित देवियाँ और नवरात्र में वास्तविक पूज्य नौ देवियो के नाम।

दुर्गा सप्तशती प्रथमोऽध्याय श्लोक ५४ में जगतपति विष्णु की योगनिद्रा महामाया के प्रभाव को संसार की स्थिति का कारण कहा है।
श्लोक ५५ और ५६ में हरेष्चैशा महामाया को जगत का सम्मोहित कर्ता कहा है जो ज्ञानियों के भी चित्त को बल पूर्वक हरण कर मोहित कर देती है।
श्लोक ५६ में महामाया को ही सृष्टि सृजनकर्ता कहा है।
श्लोक ५७-५८ में संसार बन्धन का का हेतु और प्रसन्न होनें पर मुक्ति का वरदान देने वाली और मुक्तेर्हेतुभूता पराविद्या कहा है। 
६४-६५ में उन्हें नित्य, जगन्मुर्ति, और सर्वमिदम् ततम् कहा है। उन्हे ही देवताओं के कार्यसिद्धि के लिए बहुदा उत्पन्न होनें वाली कहा है।
ये महामाया योगनिद्रा ही मूल देवी हैं। दुर्गा सप्तशती प्रथमोऽध्याय श्लोक ८९ एवम् ९० के अनुसार जिनका प्रथम अवतरण में मधुकेटभ के संहार हेतु हिरण्यगर्भ ब्रह्मा द्वारा जिनकी स्तुति करने पर जो श्रीहरि के देहकोश से प्रकट हो कर योगनिद्रा  दशभुजा महाकाली के रूप में प्रकट हुई। और श्री हरि नें योगनिद्रा से जागकर मधुकेटभ का वध कर हिरण्यगर्भ ब्रह्मा जी का संकट दूर किया। ये महाकाली उत्तर चरित्र की ५/८८  कालिका (पार्वती) और ७/६, ७/१६ एवम् ७/२३ काली (चामुण्डा) से भिन्न हैं।
 जिनका द्वितीय अवतरण का वर्णन दुर्गा सप्तशती  मध्यम चरित्र के रूप में द्वितियोऽध्याय श्लोक ९ में उल्लेखित महिषासुर संहार हेतु श्रीहरि के मुख से और देवताओं के शरीर से निकले तेज के एकीकृत होनें पर  नारी के स्वरूप में प्रकट  महालक्ष्मी अवतार के नाम से द्वितियोऽध्याय श्लोक १३ में किया है। इन्हीं ने महिषासुर का वध किया था। 
उन्ही का तीसरा अवतार दुर्गासप्तशती उत्तर चरित्र में पञ्चमोऽध्याय श्लोक ८७ में उल्लेखित पार्वती के शरीर से कौशिकी के रूप में हुआ।
उत्तर चरित्र दुर्गा सप्तशती पञ्चमोनध्याय से त्रयोदशोऽध्याय तक में देवताओं की स्तुति करने पर शुम्भ निशुम्भ दैत्यों के संहार करने हेतु उमा पार्वती के शरीर कोश से कौशिकी स्वरूप में महासरस्वती अवतार धारण करनें का वर्णन है।  शुम्भ निशुम्भ वध में इन्ही कौशिकी देवी की सहायतार्थ प्रकट हुई क नौदुर्गाओं का उल्लेख है दुर्गासप्तशती पञ्चमोऽध्याय से त्रयोदशोऽध्याय तक है।
पार्वती का उल्लेख दुर्गासप्तशती पञ्चमोऽध्याय श्लोक ८५ में है।
दुर्गासप्तशती पञ्चमोऽध्याय श्लोक ८८ के अनुसार पार्वती के शरीर कोष से कोशिकी के प्रकट होनें से पार्वती जी की देह काली पड़ गई।तब उन्ही का ही नया नाम/ रूप हिमालय में विचरण करने वाली कालिका हो गया।  ये कालिका पार्वती ही हैं और प्रथम चरित्र १/८९-९० में पूर्व कथित महाकाली से भिन्न है और आगे उत्तर चरित्र ७/६, ७/१६ एवम् ७/२३ में वर्णित काली (चामुण्डा)  से भी भिन्न हैं।

पार्वती के शरीर कोष से कोशिकी के प्रकटीकरण का उल्लेख दुर्गासप्तशती पञ्चमोऽध्याय श्लोक  ८७ में है।
देवताओं के बाद कोशिकी को सर्वप्रथम चण्डमुण्ड ने देखा था। दुर्गासप्तशती पञ्चमोऽध्याय श्लोक ८९)
 दुर्गासप्तशती  अष्मोटमोऽध्याय श्लोक २२ के अनुसार कौशिकी को चण्डी कहा है  
दुर्गासप्तशती  अष्मोटमोऽध्याय श्लोक २९ में कौशिकी को ही कात्यायनी भी कहा है।
 दुर्गासप्तशती  सप्तम और अष्टमोऽध्याय  के अनुसार वास्तविक नौदुर्गाओं का वर्णन --- ये देवताओं और अवतारों की शक्तियाँ है जिननें शुम्भ निशुम्भ युद्ध में कौशिकी की सहायता की। इनके नाम देव्याः कवच में भी आये हैं। दुर्गा सप्तशती अध्याय/ श्लोक संख्या  और देव्याकवच श्लोक संख्या दी जा रही है।

काली - दुर्गासप्तशती सप्तमोऽध्याय श्लोक ६ तथा ७/१६ एवम् ७/२३ में कौशिकी के क्रोध के कारण उनका रङ्ग काला पड़ गया, भौएँ टेड़ी हो गई। उनकी भृकुटी से काली उत्पन्न हुई। ये "काली देवी देवी मूलतः महाभारत शान्ति पर्व/ मौक्ष पर्व/ अध्याय २८३ से २८४ तक  दक्षयज्ञ का भङ्ग और उनके क्रोध से ज्वर की उत्पत्ति तथा उसके विविध रूप के अन्तर्गत अध्याय २८४ श्लोक २९,३० और विशेषकर ३१ में उल्लेखित भद्रकाली देवी ही हैं। ये काली देवी प्रथम चरित्र १/८९ - ९० की महाकाली अवतार और उत्तर चरित्र ५/८८ की कालिका (पार्वती) से भिन्न हैं।
चण्ड मुण्ड को मारकर उनके शिर कोशिकी को भेट करनें पर कोशिकी ने  काली का ही नाम चामुण्डा रखा दुर्गासप्तशती सप्तमोऽध्याय श्लोक २७। ये ही चामुण्डा देव्य कवच श्लोक ९ में और २० में है। श्लोक ४ की इन्हें ही कालरात्रि भी मान सकते हैं।

ब्राह्मी - दुर्गा सप्तशती अष्टमोऽध्याय श्लोक१५ के अनुसार शुम्भ निशुम्भ वध में कोशिकी की सहायतार्थ हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की शक्ति ब्राह्मी आई। इसी का उल्लेख देव्य कवच श्लोक ११ में है। और १९ में ब्रह्माणी आया है। श्लोक ३ की ब्रह्मचारिणी भी मान सकते हैं।

माहेश्वरी - दुर्गा सप्तशती अष्टमोऽध्याय श्लोक१६ शंकर जी की शक्ति उमा माहेश्वरी स्वरूप में आई। देव्य कवच श्लोक१० में और ईश्वरी श्लोक ११ में है। श्लोक ३ की शैलपुत्री भी मान सकते हैं। श्लोक ४ की स्कन्द माता भी मानी जा सकती है।

कौमारी -  दुर्गा सप्तशती अष्टमोऽध्याय श्लोक१७। कुमार कार्तिकेय की शक्ति देवसेना ही कौमारी के स्वरूप में आई।  
देव्य कवच श्लोक १० और १८ । 

वैष्णवी - दुर्गा सप्तशती अष्टमोऽध्याय श्लोक १८। श्रीहरि की शक्ति वैष्णवी स्वरूप में आई।
 देव्य कवच श्लोक ९ और १९ में तथा लक्ष्मी नाम श्लोक १० ।

वाराही -  दुर्गा सप्तशती अष्टमोऽध्याय श्लोक १९। वराह अवतार की शक्ति वाराही स्वरूप में आई। देव्य कवच श्लोक ९ और १८ में है।

नारसिंही - दुर्गा सप्तशती अष्टमोऽध्याय श्लोक २०। नृसिंह अवतार की शक्ति नारसिंही स्वरूप में आई। देव्याः कवच में यह नाम नही है।

ऐन्द्री - दुर्गा सप्तशती अष्टमोऽध्याय श्लोक २१। इन्द्र की शक्ति शचि ऐन्द्री स्वरूप में आई।
 देव्याः कवच श्लोक ९ और १७ ।

चण्डिका शक्ति  - दुर्गा सप्तशती अष्टमोऽध्याय श्लोक २३ के अनुसार कोशिकी को रोष उत्पन्न होनें पर उनकी देह से ही अनेक गिदड़ियों के समान आवाज करने वाली अत्यन्त भयानक स्वरूप में चण्डिका शक्ति प्रकट हुई। उनने  दूत बनाकर शुम्भ निशुम्भ देत्य के पास शंकरजी को दूत बनाकर भेजा। इसलिए शिवदूती कहलाती है।दुर्गा सप्तशती अष्टमोऽध्याय २८।
(अर्थात चण्डिका शक्ति को ही शिवदुती भी कहा है ८/२८।)। यह नाम देव्याः कवच में नही है।