शुक्रवार, 1 अप्रैल 2022

गणपति प्रथम वन्दना

वैदिक काल में योग्यता के आधार पर प्रमुख या राजा का निर्वाचन होता था। वाल्मीकि रामायण में  श्रीराम का युवराज पद पर चयन सम्बन्धी उल्लेख भी इसी का प्रमाण है।
राज्य के राजा, प्रान्त प्रमुख (क्षत्रप), नगर प्रमुख आदि को प्रथम नियन्त्रण और प्रथम वन्दना तब से आजतक प्रोटोकॉल में प्रचलित है।
गणराज्य के अध्यक्ष (राजा) को गणपति कहा जाता था और अनेक छोटे-बड़े गणराज्यों का महा गणाधिपति होता था। यह तथ्य सर्वविदित है। इसमें कुछ भी नया नही है।
लेकिन गणपति को प्रथम निमन्त्रण, गणपति की प्रथम वन्दना का दूसरा सामाजिक, राजनीति पहलू पर किसी ने ध्यान नही दिया।
गणराज्य के अध्यक्ष (राजा) को गणपति कहा जाता है। जिससे वाराणसी और लखनऊ से प्रकाशित दैनिक आज ने राष्ट्रपति शब्द गढ़ा और प्रचलित करवा दिया।
शंकर जी को महागणाधिपति का पद मिलने पर प्रमथ गणों के अध्यक्ष / गणपति पद प्राप्ति के लिए  कार्तिकेय के साथ विनायक के कुछ विवादों के निपटारे पश्चात शंकर जी ने विनायक को उत्तराधिकारी नियुक्त किया गया।
स्वाभाविक है, गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित महाभारत शान्ति पर्व/ मौक्ष पर्व/ ज्वर उत्पत्ति अध्याय २८३ पृष्ठ ५१६० और संक्षिप्त महाभारत द्वितीय खण्ड में पृष्ठ १२८०  में उल्लेखित दक्ष यज्ञ विध्वन्स जैसी घटना के कर्ता-धर्ता शंकरजी के उत्तराधिकारी भी उनके समान अपने समुदाय प्रमथ गणों में दमखम वाला ही हुआ।
पाण्डुरङ्ग वामन काणे रचित धर्मशास्त्र का इतिहास प्रथम भाग, द्वितीय खण्ड, संस्कार प्रकरण पृष्ठ १८६ में मानव गृह्यसुत्र २/४ में उल्लेखित चार विनायकों शालकटंकट, कुष्मांड राजपुत्र,उस्मित एवम् देवयजन अष्ट विनायक को पिशाच सिद्ध किया है। साथ ही  तथा भाग २ पृष्ठ ११३० में विनायकों को विघ्नकर्ता ही कहा है।
यहीं से भय की भक्ति स्वरूप सर्वप्रथम उक्त रुद्र गणों (उग्र लोगों) को प्रथम निमन्त्रण और प्रथम वन्दना की परम्परा प्रचलित हुई। जो आज भी गली- मोहल्ले के सामाजिक कार्यक्रमों से लेकर बड़े राजनीतिक कार्यक्रमों तक प्रचलित है।
ब्राह्मी लिपि के ॐ या वैदिक ॐ से गजानन का स्वरूप बना कर कई चित्रकार यह प्रमाणित कर चुके हैं कि, विनायक का गजानन स्वरूप ॐ से परिकल्पित है।

बुधवार, 23 मार्च 2022

पाँच प्रकार के प्रचलित संवत्सर।

सायन सौर वर्ष --- वैदिक संवत्सर --- कलियुग संवत

वैदिक युग में नव संवत्सर वसन्त विषुव से आरम्भ होता था। अर्थात सायन मेष संक्रान्ति से नव संवत्सर आरम्भ होता था। 
कल्प संवत, सृष्टि संवत और युग संवत प्रचलित थे।  सायन संक्रान्तियों से आरम्भ होने वाले मधु-माधवादि मास प्रचलित थे। अतः यह संवत्सर पूर्णतः ऋतु बद्ध और वैज्ञानिक है। मधु-माधवादि मास और उसके अंशों से और सूर्य संक्रान्ति गते (संक्रान्ति से व्यतीत दिन संख्या) द्वारा दिनांक / मिति दर्शाये जाते थे। दस दिन के दशाह के वासर (वार) प्रचलित थे।
सायन सौर मास के अंश/ संक्रान्ति गत दिवस के साथ ही नाक्षत्रमान से सूर्य और चन्द्रमा किस नक्षत्र के साथ है यह दर्शाया जाता था।

सुचना - 
तब सप्ताह नही चलता था। भारत में सप्ताह सम्राट विक्रमादित्य ने वराहमिहिर की सलाह पर प्रचलित किया।
वैदिक काल में अभिजित सहित अट्ठाइस नक्षत्र प्रचलित थे। जो क्रान्तिवृत में सम्बन्धित नक्षत्र के योगतारा के आसपास के अंशों में फैला रहता था। योगतारा की स्थिति से दो योगताराओं के मध्य बिन्दु को सन्धि स्थान मानकर दो सन्धियों के बीच का बिन्दु को आरम्भ / अन्त बिन्दु माना जाता था। लेकिन उसकी सुचि उपलब्ध नही है। 
अतः इसे योगतारा की वर्तमान स्थिति से दो योगताराओं के मध्य बिन्दु को सन्धि स्थान मानकर दो सन्धियों के बीच का बिन्दु को आरम्भ / अन्त बिन्दु माना जा सकता है।
नीचे उदाहरण में तत्सम्बन्धी सारणी के  अभाव में वर्तमान प्रचलित सत्ताईस नक्षत्रों और चरणों को दर्शाया है।

जैसे इस वर्ष इस कलियुग संवत ५१२३ का आरम्भ २० मार्च २०२२ रविवार को २१:०३ बजे वसन्त विषुव अर्थात सायन मेष संक्रान्ति से होगा। संकल्पादि में और व्यवहार मे २१ मार्च २०२२ रविवार को सूर्योदय के साथ कलियुग संवत ५१२३ का आरम्भ होगा।
उस समय को ऐसे लिखा जायेगा ---
कलियुग संवत ५१२३ मधु गतांश ००° गते ०० । सूर्य उत्तराभाद्रपदा नक्षत्र प्रथम चरण में और चन्द्रमा चित्रा नक्षत्र चतुर्थ चरण में। 
कृष्ण पक्ष में उज्वलार्ध चल रहा है। 
रात्रि का प्रथम प्रहर समाप्त होने वाला है। रात्रि का चतुर्थ मुहुर्त आरम्भ हुआ है। 
पूर्व दिशा में स्वाती नक्षत्र का प्रथम चरण उदय हो रहा है। आकाश के मध्य में ख स्वस्तिक पर पुष्य नक्षत्र का तृतीय चरण दर्शन दे रहा है। 
साथ ही उस समय कोई ग्रह आकाश में दृष्ट होता तो उसकी स्थिति नक्षत्र में दर्शाई जाती। 

मतलब संवत्सर विषुद्ध सायन संक्रान्तियों पर आधारित था। और आकाश दर्शन का वर्णन नाक्षत्रीय पद्यति से (नक्षत्रों में) किया जाता था। 
शुक्ल पक्ष / कृष्ण पक्ष और मास का उज्वलार्ध है या तमार्ध यह बतलाया जाता था।
पूर्णिमा और अमावस्या अथवा अर्धचन्द्र ही बतलाते थे। अन्य कोई तिथि प्रचलित नही थी।  अन्य कलाओं को चन्द्रमा का वक्र इस दिशा में है ऐसा ही कहा जाता था।यदि सूर्य ग्रहण/ चन्द्र ग्रहण हो तो उसका अवश्य किया जाता था।
इस प्रकार आकाश का नक्षा उभर कर सम्मुख आ जाता है।
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२  सायन सौर संस्कृत चान्द्र संवत्सर --- युधिष्ठिर संवत

ब्राह्मण ग्रन्थों ,उपवेदों और वेदाङ्गो के समय पूर्वोक्त युग संवत (जैसे वर्तमान में कलियुग संवत है वैसे ही उस युग का युग संवत) सूर्य के मधु माधव आदि मास, गते, वासर के साथ साथ संवत्सर प्रवर्तक उस युग के महत्वपूर्ण सम्राट के नाम का संवत्सर प्रचलित थे। (जैसे वर्तमान मे युधिष्ठिर संवत चल रहा है।) संवत के साथ चैत्र वैशाख मासों की कलाओं के आधार पर तिथि भी दर्शाने लगे। साथ ही आकाश का नक्षा नाक्षत्रीय पद्यति से दर्शाया जाता था।
जैसे इस वर्ष युधिष्ठिर संवत  ५१२३ का प्रारम्भ ०२ मार्च २०२२ बुधवार को २३:०६ बजे (अमान्त माघ की) अमावस्या समाप्त होने के साथ होगा। तथा व्यवहार में तथा संकल्प में ०३ मार्च २०२२ को सूर्योदय से युधिष्ठिर संवत ५१२३ का आरम्भ (अमान्त फाल्गुन) शुक्ल प्रतिपदा से होगा।
कलियुग संवत ५१२२ तपस्य मास गतांश १२° गते १२ दर्शाते थे। सूर्य शतभिषा नक्षत्र चतुर्थ चरण में और चन्द्रमा शतभिषा नक्षत्र चतुर्थ चरण में है। युधिष्ठिर संवत ५१२३ के चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि। रात्रि का द्वितीय प्रहर। रात्रि का षष्ट मुहुर्त। पूर्व दिशा में विशाखा नक्षत्र का प्रथम चरण। आकाश के मध्य में ख स्वस्तिक पर आश्लेषा नक्षत्र का तृतीय चरण। 
साथ ही उस समय कोई ग्रह आकाश में दृष्ट होता तो उसकी स्थिति नक्षत्र में दर्शाई जाती। 

लेकिन इस युधिष्ठिर संवत का आरम्भ मास प्रत्येक २१४८ वर्ष में एक-एक मास आगे खिसकता जाता है। तदनुसार युधिष्ठिर संवत ५५३४  (ईस्वी सन २४३३) में इस संवत्सर का आरम्भ वर्तमान प्रचलित वैशाख शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होगा।
युधिष्ठिर संवत सायन सौर संक्रान्तियों से आधार पर चलने वाला सायन सौर संस्कृत चान्द्र संवत्सर है। अतः यह संवत्सर भी लगभग ऋतुबद्ध ही है। केवल  लगभग २९.५३०५८९ दिन अर्थात एक चान्द्रमास आगे होकर लगभग २८ से ३८ माह में अधिक एक मास होकर पूनः बराबर हो जाता है। 
इसका चक्र १९ वर्ष और १४१ वर्ष का होता है। प्रायः प्रत्येक १९, ३८,५७,७६,९५, ११४, १२२,१४१ वें वर्ष में पुनः वसन्त विषुव सायन मेष संक्रान्ति से आरम्भ होता है।
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३  नाक्षत्रीय वर्ष / निरयन सौर वर्ष--- विक्रम संवत

विक्रमादित्य ने राज्यारोहण के समय राज्य ज्योतिषी आचार्य वराहमिहिर की राय पर नाक्षत्रीय संवत्सर को ही राजकीय संवत्सर के रूप में तथा सप्ताह के वारों को प्रचलित किया। जो आज भी पञ्जाब, हरियाणा, जम्मू, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड के कुछ भागों में यथारूप प्रचलित है। और बङ्गाल, असम, तमिलनाड़ू, केरल में अन्य नामों से प्रचलित है।
विक्रम संवत का आरम्भ वैशाखी अर्थात निरयन मेष संक्रान्ति से होता है। इसके आरम्भ के समय सूर्य के केन्द्र से भूमि चित्रा तारे के ठीक सीध में दिखती है और भुमि के केन्द्र से देखने पर चित्रा तारे से १८०° पर सूर्य दिखता है।
नाक्षत्रीय संवत्सर चित्रा तारे से १८०° पर स्थित बिन्दु पर सूर्य के आने से आरम्भ होकर वापस चित्रा तारे से १८०° पर स्थित बिन्दु पर सूर्य के आने पर ही पूर्ण होता है।
लेकिन नाक्षत्रीय ऋतुबद्ध नही है। वेदों में संवत्सर को प्रजापति कहा है। और वसन्त विषुव को संवत्सर की आत्मा माना है।
अतः वैदिक परम्परानुसार नाक्षत्रीय संवत्सरारम्भ का प्रथम मास बदलता रहता है। वर्तमान में निरयन मेष संक्रान्ति से आरम्भ होता है। विक्रम संवत 
प्रत्येक २१४८ वर्ष में एक मास आगे खिसक जाता है। और प्रत्येक ४२९६ वर्ष में एक ऋतु आगे खिसक जाता है।
मतलब  (२८५ ईस्वी को २२ मार्च को) विक्रम संवत ३४२ वसन्त विषुव सायन मेष संक्रान्ति के साथ आरम्भ होता था। वर्तमान में लगभग २४ दिन आगे बड़ गया है और १४/१५ अप्रेल से आरम्भ होता है। ईस्वी सन २४३३ में यह सायन वृष संक्रान्ति २० अप्रेल से आरम्भ होने पर इसे निरयन मीन संक्रान्ति से आरम्भ किया करना होगा। अन्यथा मालवा प्रान्त में ग्रीष्म ऋतु के प्रारम्भ में विक्रम संवत आरम्भ होगा। और ईस्वी सन ४५८१ में यह सायन मिथुन संक्रान्ति २१ मई से आरम्भ होगा। तदनुसार मालवा प्रान्त में  ग्रीष्म ऋतु के मध्य में प्रारम्भ में और ब्रह्मावर्त एवम् उत्तरी आर्यावर्त्त में ग्रीष्म ऋतु के आरम्भ मे विक्रम संवत आरम्भ होगा। इसलिए संवत्सर को ऋतुबद्ध रखने के लिए प्रत्येक २१४८ वर्ष में एक नाक्षत्रमास पीछे करना पड़ता है।
अलग अलग नक्षत्रों का प्रथम नक्षत्र होने और अलग अलग महिनों को प्रथम मास होने के प्रमाण वैदिक साहित्य में भरपूर है।
लगभग २५७८० वर्ष में यह पूनः वसन्त विषुव से आरम्भ होने लगता है। लेकिन  कलियुग संवत एक वर्ष अधिक हो जायेगा और विक्रम संवत एक वर्ष कम रह जायेगा। कलियुग संवत २९१६६ में विक्रम संवत २६१२१ होगा। अन्तर ३०४५ वर्ष का हो जाएगा जबकि आज ३०४४ वर्ष का अन्तर है।
इसमें विक्रम संवत के साथ मेष, वषभादि मास (या पञ्जाब-हरियाणा में वैशाख, ज्यैष्ठादि मास) के साथ सूर्य की निरयन संक्रान्ति गत दिवस (गते) दर्शाया जाता है। सप्ताह के वार दर्शाते हैं।

इस वर्ष विक्रम संवत २०७९ का प्रारम्भ १४ अप्रेल २०२२ गुरुवार को पूर्वाह्न ०८:४० बजे नाक्षत्रीय वर्षारम्भ निरयन मेष संक्रान्ति से होगा। तथा व्यवहार एवम् संकल्प में १५ अप्रेल २०२२ शुक्रवार वैशाखी से विक्रम संवत २०७९ का आरम्भ होगा।
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४  निरयन सौर संस्कृत चान्द्र वर्ष ---- शकाब्द

आपने देखा प्रत्येक संवत्सर आरम्भ कर्ता नवीन प्रणाली लागू करता है। युधिष्ठिर ने शुद्ध सायन सौर वर्ष को बदल कर सायन सौर संक्रान्तियों से सम्बन्धित चान्द्र मासों वाला संवत्सर लागू किया। ऐसे ही सम्राट विक्रमादित्य ने सायन सौर संवत्सर के स्थान पर नाक्षत्रीय वर्ष वाला निरयन सौर संवत्सर लागु किया।
विक्रमादित्य के १३५ वर्ष बाद विक्रम संवत १३६ के आरम्भ में पेशावर के कुषाण वंशीय क्षत्रप कनिष्क ने मथुरा विजय के उपलक्ष्य में मथुरा और उत्तर भारत में नाक्षत्रीय संवत आधारित चान्द्र संवत शकाब्द लागू किया। लगभग उसी समय पैठण महाराष्ट्र के सातवाहन राजा गोतमिपुत्र सातकर्णी ने महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश, तेलङ्गाना, और मध्य भारत में नाक्षत्रीय संवत आधारित चान्द्र संवत  शकाब्द लागू किया।
शकाब्द विक्रम संवत का अनुगामी है इसके मास निरयन सौर संक्रान्तियों पर आधारित हैं। अर्थात शकाब्द का आरम्भ निरयन मीन संक्रान्ति और निरयन मेष संक्रान्ति के बीच होनें वाली अमावस्या के समाप्ति समय से होता है। यदि निरयन मीन मास में दो अमावस्या पड़े तो (बादवाली) दूसरी अमावस्या समाप्ति के समय से शकाब्द आरम्भ होता है। और पहले वाला चान्द्रमास अधिक माना जाता है। तथा दुसरा चान्द्रमास चैत्र मास कहलाता है। संकल्पादि में और व्यवहार में शकाब्द का आरम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से माना जाता है।
शकाब्द का आरम्भ सदैव चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नही होता है।  युधिष्ठिर संवत के समान ही आरम्भ का चान्द्रमास बदलता रहता है, 
इस वर्ष शकाब्द १९४४ का प्रारम्भ ०१ अप्रेल २०२२ शुक्रवार को पूर्वाह्न ११:५३ बजे अमान्त फाल्गुन अमावस्या समाप्ति समय से होगा। तथा व्यवहार और संकल्प में दिनांक ०२ अप्रेल २०२२ शनिवार को सूर्योदय से शकाब्द १९४४ का आरम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होगा।
नाक्षत्रीय विक्रम संवत पर आधारित होनें के कारण विक्रम संवत के समान ही शकाब्द भी ऋतु आधारित संवत नही है।
प्रत्येक २१४८ वर्ष में शकाब्द का आरम्भ भी विक्रम संवत के समान ही एक मास पीछे खिसक जाता है। और प्रत्येक ४२९६ वर्ष में एक ऋतु पीछे खिसक जाता है।
मतलब शकाब्द २०७ (२८५ ईस्वी को २२ मार्च को) यह वसन्त विषुव सायन मेष संक्रान्ति के साथ आरम्भ होता था। वर्तमान में लगभग २४ दिन आगे बड़ गया है। ईस्वी सन २४३३ में यह सायन वृष संक्रान्ति २० अप्रेल से आरम्भ होगा इसलिए इसे फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ करना पड़ेगा। अन्यथा मालवा प्रान्त में ग्रीष्म ऋतु के प्रारम्भ में शकाब्द आरम्भ होगा। और ईस्वी सन ४५८१ में शकाब्द सायन मिथुन संक्रान्ति २१ मई से आरम्भ होने लगेगा; मालवा प्रान्त में  ग्रीष्म ऋतु के मध्य में प्रारम्भ होगा और ब्रह्मावर्त एवम् उत्तरी आर्यावर्त्त में ग्रीष्म ऋतु के आरम्भ मे शकाब्द आरम्भ होगा। अतः एव शकारम्भ माघ शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ करना होगा।
 अतः हर २१४८ वर्ष में विक्रम संवत के अनुसार ही एक-एक मास आगे से संवत्सर आरम्भ करना होता है। वैदिक साहित्य में इसके भरपूर प्रमाण हैं।
लगभग २५७८० वर्ष में यह पूनः वसन्त विषुव से आरम्भ होने लगता है। लेकिन युधिष्ठिर संवत एक वर्ष अधिक हो जाता है और शकाब्द  एक वर्ष कम रह जाता है।
इसमें चैत्र, वैशाख आदि मासों की तिथियाँ दर्शाई जाती है। साथ ही सप्ताह के वार और चन्द्रमा की १३°२०' के निश्चित भोगांश वाले सत्ताईस नक्षत्र सूर्य चन्द्रमा के निरयन भोगांशो के योग को सत्ताईस से विभाजित कर तदनुसार योग एवम् तिथ्यार्ध करण दर्शाते हैं। इन पाँचों को मिलाकर पञ्चाङ्ग कहलाती है।
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५  शुद्ध चान्द्र वर्ष ---- भारत और सनातन धर्म मे अप्रचलित है। (केवल इस्लामी क्षेत्रों में प्रचलित है।)

भारतवर्ष और सनातन धर्म में ३५४.३६७०६८ दिन का शुद्ध चान्द्र वर्ष अप्रचलित है। यह केवल सऊदी अरब और इस्लामी राष्ट्रों में ही मोहर्रम आदि मासों के साथ हिजरी सन नाम से  प्रचलित है।
इसमें न कोई अधिक मास होता है न क्षय मास। अत: शुद्ध चान्द्र वर्ष ऋतुओं से पूर्णतः असम्बद्ध है।
शुद्ध चान्द्र वर्ष युधिष्ठिर संवत और शकाब्द के माहों की तुलना में तीन वर्ष में माह पीछे हो जाता है। और छः वर्ष में एक ऋतु पीछे हो जाता है। एवम् तैंतीस वर्ष में पूरा एक वर्ष अधिक हो जाता है।
मुस्लिम देशों में मोहर्रम से आरम्भ होता है।
कल्प संवत को नाक्षत्रीय संवत मानकर अहर्गण प्राप्त कर ३५४.३६७०६८ दिन का भाग देने पर शेष बचे माह के अनुसार शुद्ध चान्द्र वर्ष का प्रथम मास मोहर्रम आता है। लेकिन यदि अरबी में इन मोहर्रम आदि के अर्थ देखें तो रबिउल अव्वल अर्थात वसन्त का प्रथम मास और रबिउल उस्सानी यानी वसन्त का दुसरा मास। तदनुसार ये सायन सौर मास रहे होंगे। जिन्हें बाद में शुद्ध चान्द्र वर्ष के माह मान लिया गया।
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६  सावन वर्ष --- अप्रचलित
सावन वर्ष ३६० दिन का होता था‌। लेकिन या तो इसे वसन्त विषुव से जोड़ कर शेष पाँच छः दिन का अवकाश रखकर यज्ञादि धार्मिक कर्म और क्रीड़ा, नाट्य, पुराण श्रवण आदि में व्यतीत किया जाता था जो आज भी पारसियों में प्रचलित है। और गुजरात में भी दीपावली (वर्षान्त) की पूजा कर सौभाग्य पञ्चमी तक पाँच दिन पूर्ण अवकाश रखते हैं। या 
प्रति पाँच वर्ष में अधिक मास करके उस अवधि को उपर्युक्त कार्यों में व्यतीत किया जाता था।
जैसा कि, लगधाचार्य के वेदाङ्ग ज्योतिष में बतलाया है।
वर्तमान में यह संवत अब कहीँ भी प्रचलित नही है।
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सोमवार, 21 मार्च 2022

होली - नव सस्येष्टि और धुलिवन्दन तथा रङ्गोत्सव

होली मनाने का पारम्परिक तरीका प्रतिकात्मक रह गया है। सही ढङ्ग से वैदिक परम्परा में नव सस्येष्टि और वसन्तोत्सव के रूप में मनती थी। अब केवल प्रतिकात्मक रूप से वही सब होता है।

वैदिक यूग में अन्तिम मास मे अर्थात सायन मीन संक्रान्ति से संवत्सर आरम्भ दिवस सायन मेष संक्रान्ति के बीच पड़ने वाली अमावस्या के दुसरे दिन से अन्तिम चान्द्रमास आरम्भ होता था। इस अन्तिम चान्द्र मास की पूर्णिमा को यज्ञबेदी में समिधाएँ जमाकर अन्वाधान किया जाता था। और दुसरे दिन प्रतिपदा में होने वाले सामुहिक यज्ञ अर्थात इष्टि के समय नवान्नेष्टि यानी नव सस्येष्टि की जाती थी।

सम्पूर्ण ग्राम वासी एक ही स्थान (होली टेकरी) पर नवीन फसल यव (जौं), गेहूँ, आदि अन्न का यज्ञ सामग्री के साथ हवन करते थे। फिर अपनी फसल का एक भाग यज्ञ भाग के रूप में ब्राह्मणों की संस्था/ गुरुकुल आदि के लिए, एक भाग राज्य के कोष में लगान के रूप में। एक भाग संकट काल के लिए ग्राम प्रमुख के अनुसार ग्रामीण भाण्डार में जमा होता। कुछ अनाज कुम्हार, बढ़ाई, लोहार आदि शुद्रों (सर्विस सेक्टर में कार्यरत) लोगों को आवण्टन होता था, इसे यज्ञभाग वितरण कहते थे। ऐसी ही नव धान्येष्टि अग्रहायण पर्व पर भी होती थी।

धूलि वन्दन कर धूल और यज्ञ की भूत का तिलक कर सामुदायिक उत्सव मनाया जाता, कुछ लोग जो मिट्टी से स्नान करते उन्हें सब मिलकर कीचड़ से स्नान करवाया जाता। 
फिर सामुहिक भोज होता, घुड़दौड़, पशुओं की दौड़, बैलगाड़ी दौड़, मल्ल, अग्नि में दौड़ना आदि क्रीड़ा होती थी।

वसन्तोत्सव के रूप में पलाश पुष्प अर्थात टेसु के फूल / किंशुक कुसुम से केसरिया रङ्ग बना कर रङ्ग खेला जाता था।अलग अलग ग्रामों में अलग अलग दिन पड़ोसी ग्राम वासी जाकर रङ्ग खेलते। वसन्तोत्सव मनाते थे। नव वर्ष के यज्ञ के लिए होली से ही अग्नि लाकर घरों में स्थापित की जाती थी। यज्ञ समापन दिवस को भी रङ्गोत्सव होता था।


प्रतिकात्मक रूप से आज होली में गेहूँ की बाली सेकी जाती है। पहले लोग होली से अङ्गारे भी लाते थे। रङ्ग आज भी खेलते हैं। सैल आज भी होती है। सैल में बच्चे और युवा खेलते भी हैं।

कुछ स्थानों पर यह आठ दिन, कुछ स्थानों पर सात दिन और कुछ स्थानों पर पाँच दिवसीय कार्यक्रम था। पाँचवे, सातवें या आठवें दिन होली ठण्डी करना मतलब यज्ञ समापन कर रंगोत्सव मनाया जाता था।
आज भी महाराष्ट्र तथा  मध्य प्रदेश के मराठा शासित क्षेत्र इन्दौर, उज्जैन, देवास, धार, ग्वालियर में रङ्ग पञ्चमी को, गुजरात और गुजरात से लगे मध्यप्रदेश के धार जिले के पश्चिमी भाग, और झाबुआ में शील सप्तमी और राजस्थान तथा राजस्थान से लगे मध्यप्रदेश में शीतलाष्टमी को होली ठण्डी कर रङ्गोत्सव मनाते हैं।
इसके पीछे सूर्य रश्मियों के सतरङ्गों को विष्णु के रङ्ग अवतार की कथा भी जुड़ी है। विष्णु भगवान ने सर्वप्रथम धुलेण्डी को धुलिवन्दन कर रङ्गावतार धारण किया था। अतः सप्तरङ्ग से सप्तमी और पचरङ्गी से पञ्चमी को रङ्गोत्सव मनाया जाता है।
दशमी तिथि पर दशा पूजन भी मूलतः वर्षान्त के पञ्च दिवसीय यज्ञ में वर्ष में स्वयम् द्वारा किए गये शुभाशुभ कर्मों का लेखा (बेलेंस शिट) तैयार कर अपनी गलतियों को सुधारनें  और अच्छाइयों को बढ़ानें के दृढ़ निश्चय का दिन दशापूजन है।
इसके साथ ही पञ्च दिवसीय उत्सव आरम्भ होता था।
पारसियों में यह प्रथा आंशिक रूप में आज भी प्रचलित है। गुजरात में दिवाली दीपावली के बाद का पञ्चदिवसीय अवकाश भी इसी का प्रतीक है।
वहाँ दीपावली को संवत्सर पूर्ण होता है।

शनिवार, 12 मार्च 2022

वैदिक नव संवत्सर आरम्भ विमर्श।

वैदिक नव संवत्सर स्पष्टीकरण

वेदों, ब्राह्मण ग्रन्थों, श्रोतसुत्रों, गृह्य सुत्रों, शुल्बसुत्रों, धर्मसुत्रों, रामायण-महाभारत आदि इतिहास और पुराणों में जिन मास और दिनों का वर्णन है वह सायन सौर संवत्सर,सायन सौर संक्रान्तियों पर आधारित है। अर्थात सायन सौर संक्रान्तियों पर से आरम्भ होनेवाले मधुमाधवादि मासों पर आधारित, सायन सौर सूर्य के अंश/ या संक्रान्ति गते आधारित, दशाह के वासर आधारित है। इसके साथ ही  सायन सौर संस्कृत चान्द्र संवत्सर के मास और तिथियों के अनुसार ही बतलाये हैं। है। 
(सुचना - पुराणों की रचना के समय सप्ताह को मान्यता मिली। इसके पहले सप्ताह प्रचलित नही था दस दिन का दशाह ही प्रचलन में था।) 
क्योंकि वेद, ब्राह्मण ग्रन्थों, सुत्रों, स्मृतियों, रामायण-महाभारत आदि इतिहास और पुराणों में संवत्सर और मासों को ऋतुओं से सम्बद्ध बतलाया गया है।  सभी व्रत, पर्व और उत्सवों का वर्णन ऋतु आधारित है।
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कृपया निम्नलिखित बिन्दुओं पर ध्यान दीजिएगा---
संवत्सरारम्भ वसन्त ऋतु में ही होना चाहिए।
श्री राम जन्म वसन्तऋतु में हुआ था।
कोकिला वृत ग्रीष्मान्त और वर्षा ऋतु के आरम्भकाल से सम्बन्धित है।
हरियाली अमावस्या , हरियाली तीज , श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, कुशोत्पाटिनी अमावस्या और यशोदा माता का जलवा पूजन देव झुलनी एकादशी वर्षा ऋतु से सम्बन्धित हैं। 
शारदीय नवरात्र और शरद पुर्णिमा के नाम से ही स्पष्ट है कि यह शरद ऋतु में ही होना चाहिए। इसी कारण वर्षाकाल समाप्त होने पर यात्रा आरम्भ का पर्व दसरा / विजया दशमी (जिसे लोकभाषा मे दशहरा बोलते हैं) मनाया जाता है। 
दीपावली पर किया जाने वाला दीप यज्ञ में (धान सेक कर बनाई गई) साल की धानी, ज्वार और गन्ने का हवन किया जाना; दीवाली के दूसरे दिन बलिप्रतिपदा पर अन्नकूट होना और मार्गशीर्ष मास की अग्रहायणी पूर्णिमा/ अमावस्या को नव धान्य यज्ञ कर यज्ञभाग आवण्टन का पर्व नव धान्य फसल आने पर ही मनाये जाते हैं।
(सायन) मकर संक्रान्ति (२१/२२ दिसम्बर) को ही सूर्य परम दक्षिण क्रान्ति को प्राप्त हो, भूमि की मकर रेखा पर लम्बवत होता है। ठण्ड में ही जब नये तिल आते हैं, नवीन तिलों का उपयोग आरम्भ होता है। तिल-गुड़ का प्रयोग शिशिर ऋतु / ठण्ड में ही उचित है।  तिलषटा एकादशी भी इसी उपलक्ष्य में मनाई जाती है  
होली पर्व पर नवस्येष्टि यज्ञ होना, खलिहान से नई फसल का गुरुकलों, ऋषियों, ब्राह्मणों को धर्मबलि के रूप में देना ( अर्थात धार्मिक कर अदायगी करना ), राज्य को लगान/ कर देना, और शुद्रों को सेवा शुल्क के रूप में अनाज देकर पुरस्कृत करना इस रूप मे यह यज्ञभाग आवण्टन करने का पर्व है, होली को वसन्तारम्भ का उल्लास उत्सव, धुलोत्सव, रङ्गोत्सव, वसन्तोत्सव भी वसन्त ऋतु के आरम्भ में ही मनाया जाता है। उक्त उदाहरणों से सिद्ध है कि, व्रत, पर्व और उत्सव ऋतु आधारित होते हैं।
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यदि परम्परागत पञ्चाङ्ग चलती रही तो ११०२७ ईस्वी के बाद
गुड़ी पड़वा हेमन्त ऋतु में आयेगी।
होली वर्षा ऋतु में आयेगी।
निरयन मकर संक्रान्ति वर्षा ऋतु में पड़ेगी।
अग्रहायण वसन्त अन्त ग्रीष्म आरम्भ मे होगा।
जन्माष्टमी हेमन्त ऋतु (ठण्ड के आरम्भ) में आयेगी।
शारदीय नवरात्र, दसरा, शरद पूर्णिमा, दीपावली  शिशिर ऋतु के अन्तिम माह (कड़ाके की ठण्ड) में आयेगी।
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इससे सिद्ध है कि,
संवत्सर आरम्भ, वैदिक अयन (पौराणिक गोल), वैदिक तोयन (पौराणिक अयन), ऋतुएं और वैदिक मधु-माधवादि मास ३६५ दिन ०५ घण्टे ४८ मिनट ४५.६ मिनट अर्थात (३६५.२४२१९० दिन) वाले सायन सौर वर्ष से ही सिद्ध होती है। इसी प्रकार; सूर्योदयास्त, चन्द्रोदयास्त, लग्नारम्भ साधन,  ख स्वस्तिक साधन (दशम भाव स्पष्ट), भाव स्पष्ट साधन, सूर्य ग्रहण-चन्द्र ग्रहण साधन, ग्रह लोप- दर्शन साधन, अगस्तादि तारा उदयास्त साधन, ग्रहों का वक्री-मार्गी और उदयास्त साधन आदि समस्त गणनाएँ केवल सायन गणना से ही सिद्ध होती है। 
उक्त किसी भी गणना में ३६५ दिन ०६ घण्टे ०९ मिनट, ०९.८ सेकण्ड वाले अर्थात ३६५.२५६३६३ दिन वाले नाक्षत्रीय वर्ष / निरयन सौर वर्ष गणना का किञ्चित मात्र भी उपयोग नही है।
केवल नाग पञ्चमी का सम्बन्ध आर्द्रा नक्षत्र पर सूर्य होने से सम्बंधित है और शिवरात्रि के वर्णन में ही व्याघ (बहेलिया) द्वारा मृगशीर्ष नक्षत्र के ताराओं और व्याघ तारा को रातभर देखने का वर्णन है। अन्य किसी व्रत, पर्व, उत्सव में नाक्षत्रीय गणना उपयोगी नही है।
नक्षत्रों के साथ ग्रहों की युति या नक्षत्र योगतारा से १८०° पर ग्रह होने (दृष्टि) के आधार पर संहिताओं और जातक शास्त्र/ होरा शास्त्र (फलित ज्योतिष) में ही नाक्षत्रीय गणना/ निरयन पद्यति का उल्लेख है। अन्यत्र कहीं नही। मतलब निरयन गणना का प्रचलन होरा स्कन्द/ जातक शास्त्र / फलित ज्योतिष के विकास के साथ हुआ पहले नही था।
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अस्तु 

कलियुग संवत ५१२३ का शुभारम्भ २१ मार्च २०२२ सोमवार से होगा।(संकल्पादि मे प्रयुक्त होगा।)

वैदिक नव संवत्सरारम्भ, वैदिक उत्तरायण आरम्भ / (पौराणिक उत्तरगोल आरम्भ), ब्रह्मावर्त और उत्तरी आर्यावर्त्त में वसन्त ऋतु आरम्भ, कलियुग संवत ५१२३ का प्रारम्भ, वसन्त विषुव, सायन मेष संक्रान्ति दिनांक २० मार्च २०२२ रविवार को २१:०३ बजे होगा। 
इस दिन देवताओं का सूर्योदय होगा, उत्तरी ध्रुव पर सूर्योदय होगा। दक्षिणी ध्रुव पर सूर्यास्त होगा, असुरों का सूर्यास्त होगा।

चूंकि, संकल्पादि में वर्तमान काल का उच्चारण होता है और संक्रान्ति सूर्योदय पश्चात संक्रान्ति होगी इस कारण  संकल्पादि में कलियुग संवत ५१२३ का प्रयोग २१ मार्च २०२२ सोमवार को सूर्योदय से होगा। 
इन्दौर में २१ मार्च २०२२ सोमवार को मध्याङ्ग सूर्योदय ०६:३४ बजे होगा।
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सायन सौर संस्कृत चान्द्र संवत्सर युधिष्ठिर संवत ५१२३ का आरम्भ दिनांक ०२ मार्च २०२२ बुधवार को २३:०६ बजे से सायन मीन संक्रान्ति से सायन मेष संक्रान्ति के बीच पड़ने वाली अमावस्या के समाप्ति समय (२३:०६ बजे)  होगा। 

लेकिन संकल्प में वर्तमान समय लिया जाता है अतः व्यवहार में सायन सौर संक्रान्तियों पर आधारित चान्द्र संवत्सर युधिष्ठिर संवत ५१२३ का आरम्भ दिनांक ०३ मार्च २०२२ गुरुवार से संकल्पादि में आरम्भ होगा ।
सामान्यतः यह संवत ३५४.३६७०६८ दिन का होता है। और अधिक मास वाले वर्ष में यह संवत ३८३.८९७६५७ दिन का होता है।
प्रायः बत्तीस से अड़तीस मास पश्चात अधिक मास होता है।
 
सुचना - इस गणना में संवत्सर का आरम्भ वर्तमान प्रचलित चैत्रादि मासो में से निश्चित मास में नही होते हुए लगभग २१४८ वर्ष में एक-एक मास आगे खिसकता जाता है। तदनुसार ईस्वी सन २४३३ में इस संवत्सर का आरम्भ वर्तमान प्रचलित फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होगा। 
इस गणना पर आधारित एकमात्र पञ्चाङ्ग ग्रेटर नोएडा उत्तर प्रदेश के आचार्य श्री दार्शनेय लोकेश कृत श्री मोहन कृति आर्ष पत्रकम् का परिचय आलेख के अन्त में दिया है। इस गणना के अनुसार कोई और पञ्चाङ्ग नही निकलती है।
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नाक्षत्रीय नव संवत्सर आरम्भ/ विक्रम संवत २०७९ आरम्भ पञ्जाब हरियाणा, जम्मु, हिमाचल प्रदेश, और उत्तराखण्ड के कुछ भागों में वैशाखी/ निरयन मेष संक्रान्ति गुरुवार १४ अप्रेल २०२२ गुरुवार को पूर्वाह्न ०८:४० बजे होगा। 
इस समय सूर्य के केन्द्र से देखने पर इस दिन (१४ अप्रेल २०२२ गुरुवार को पूर्वाह्न ०८:४० बजे)  भूमि चित्रा तारे के ठीक सामने दिखेगी। तदनुसार भूमि के केन्द्र से देखने पर सूर्य चित्रा नक्षत्र के योग तारे से १८०° पर दिखेगा।

सूर्योदय पश्चात आरम्भ होने से संकल्पादि में पञ्जाब-हरियाणा, दिल्ली, हिमालय प्रदेश, जम्मु, और उत्तराखण्ड के कुछ भाग में विक्रमादित्य राज्यारोहण संवत/ विक्रम संवत २०७९ का प्रयोग दिनांक १५ अप्रेल २०२२ शुक्रवार के सूर्योदय से होगा। 
इन्दौर में मध्याङ्ग सूर्योदय ०६:१० बजे होगा।

सुचना - उक्त नाक्षत्रीय संवत्सर ऋतु आधारित नही है। चित्रा तारे से १८०° पर स्थित एक निश्चित तारे  से आरम्भ होकर उसी तारे पर (Fixed star) पूर्ण होनें के कारण इस संवत्सर का नाम नाक्षत्रीय वर्ष (Sidereal year) कहलाता है। किन्तु वर्तमान में आकाश में उस बिन्दु फर कोई तारा (Star) नही है। 
इस गणना का उपयोग यह है कि, सूर्य चन्द्रमा एवम् कोई ग्रह किस नक्षत्र में भ्रमण कर रहा है यह केवल नङ्गी आँखों से देखा जा सकता है। 
यह संवत ऋतु आधारित नहीं है। प्रत्येक २१४८ वर्ष में कलियुग संवत से एक मास बाद आरम्भ होता है।
तदनुसार ४२९६ वर्ष में यह एक ऋतु आगे आरम्भ होता है।
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निरयन सौर संस्कृत चान्द्र शक नववर्षारम्भ शकब्द १९४४ का प्रारम्भ ०१ अप्रैल २०२२ शुक्रवार को पूर्वाह्न ११:५३ बजे से हो जायेगा।
किन्तु संकल्पादि में प्रयोग दिनांक ०२ अप्रेल २०२२ शनिवार को सूर्योदय से होगा। 
इन्दौर में सूर्योदय ०६:२२ बजे होगा।
सामान्यतः यह संवत ३५४.३६७०६८ दिन का होता है। और अधिक मास वाले संवत में यह ३८३.८९७६५७ दिन का होता है।
प्रायः बत्तीस से अड़तीस मास पश्चात अधिक मास होता है।
 सुचना - उक्त शकाब्द संवत्सर ऋतु आधारित नही है। इसका आरम्भ सदा चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही होता है। शकाब्द का प्रचलन (मथुरा एवम्) उत्तर भारत में कनिष्क ने और (पैठण तथा) मध्य भारत और महाराष्ट्र कर्नाटक में गोतमिपुत्र सातकर्णी द्वारा प्रारम्भ किया गया। वर्तमान प्रचलित सभी पञ्चाङ्ग इसी गणना पर आधारित निकलती है।
यह संवत ऋतु आधारित नहीं है। प्रत्येक २१४८ वर्ष में युधिष्ठिर संवत से एक मास बाद आरम्भ होता है।
तदनुसार ४२९६ वर्ष में यह एक ऋतु आगे आरम्भ होता है।
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शुद्ध चान्द्र संवत्सर भारत में और सनातन धर्म में प्रचलित नही है।
सिद्धान्त ग्रन्थोक्त निरयन सौर (नाक्षत्रीय) कल्प संवत के अहर्गण निकालकर शुद्ध चान्द्रवर्ष की अवधि ३५४.३६७०६८ दिन का भाग लगाकर शेष दिनों को भुक्त मास- तिथ्यादि मानकर गणना करनें पर भी प्रथम मास अरबी कमरी मास मोहरम ही आया। इसी अहर्गण से सप्ताह का वार भी ठीक बैठता है।
अतः मोहरम मास को प्रथम मास मान कर मोहर्रम मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुद्ध चान्द्र संवत्सर आरम्भ माना जा सकता है। लेकिन भारत में सनातन धर्म में इस प्रकार का कोई संवत्सर प्रचलित नही है। अतः इसके अधिक विवेचन की आवश्यकता भी नही है।
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सायन सौर संस्कृत चान्द्र संवत्सर पञ्चाङ्ग परिचय।
द्वारका के शारदामठ के शंकराचार्य जी ने इन्दौरी पञ्चाङ्ग के सम्पादक श्री वीसा जी रघुनाथ लेले को  सायन संक्रान्तियों पर आधारित संवत्सर, मास और चान्द्र मास के पक्ष में सम्मति प्रदान कर इन्दौर पञ्चाङ्ग शोधन कमेटी में प्रस्तुत करने हेतु विक्रम संवत १९४९, शके १८१४ (ईस्वी सन १८९३ में) फाल्गुन कृष्णाष्मी को दी थी। उक्त कमेटी के अध्यक्ष श्री वि.भु. दीनानाथ शास्त्री चुलैट थे। 
मुम्बई और पुणें में पञ्चाङ्ग शोधन समितियों में भी कई बार सायन संक्रान्तियों पर आधारित संवत्सर, मास और चान्द्र मास के पक्ष में मत प्रस्तुत किये गये थे। 
भारत शासन द्वारा स्थापित केलेण्डर रिफार्म कमेटी के अध्यक्ष श्री एम.एन. साहा भी सायन सौर संवत्सर और मासों के पक्ष मे़ं ही थे।
लेकिन प्रचलित पञ्चाङ्गकारों की आर्थिक लॉबी ने इन प्रयासों पर पानी फेर दिया।
सायन सौर संस्कृत चान्द्र संवत्सर का प्रचलन शकारम्भ तक रहा था। कुशाण वंशीय राजा कनिष्क द्वारा मथुरा क्षेत्र और उत्तर भारत में तथा सातवाहन राजा गोतमिपुत्र सातकर्णी द्वारा पैठण महाराष्ट्र, कर्नाटक और मध्य भारत में शकाब्द लागु किया। इसके पश्चात सायन संक्रान्तियों पर आधारित संवत्सर, मास और चान्द्र संवत्सर वाली पञ्चाङ्ग अप्रचलित हो गई थी। 
लगभग एक हजार नौ सौ वर्ष बाद काशी वाराणसी के बापु शास्त्री ने सायन सौर संस्कृत चान्द्र संवत्सर वाला पञ्चाङ्ग जारी किया लेकिन लोक प्रचलित नही होने से उन्हें अपना मत परिवर्तन करना पड़ा। महाराष्ट्र में व्यंकटेश बापूजी केतकर ने भी वैजन्ती ग्रन्थ में सायन गणनानुसार पञ्चाङ्ग का समर्थन किया किन्तु बाद में मत परिवर्तन कर ग्रह गणितम की रचना कर निरयन पञ्चाङ्ग का गणित रचा। 
विगत कुछ वर्षों से ग्रेटर नोएडा (उतर प्रदेश) के आचार्य श्री दार्शनेय लोकेश ने श्री मोहन कृति आर्ष पत्रकम् नाम से सायन सौर संक्रान्तियों पर आधारित संवत्सर और मासों वाली पञ्चाङ्ग प्रकाशित करना आरम्भ कर इसे पुनर्जीवित किया है। इसके लिए वे साधुवाद के पात्र है। इस पञ्चाङ्ग पर आधारित दो-तीन वाल केलेण्डर भी पूणे और बेंगलूर से प्रकाशित होने लगे हैं। दक्षिण भारत में यह पञ्चाङ्ग पर्याप्त लोकप्रिय होने लगा है।
मोहन कृति आर्ष पत्रकम् को श्रङ्गेरी मठाधीश शंकराचार्य स्वामी श्री जयेन्द्र सरस्वती जी एवम् ज्योतिर्मठ तथा द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानन्द सरस्वती जी , स्वामी श्रीमद्गङ्गाधरेन्द्र सरस्वती, शारदापीठ कश्मीर के स्वामी श्री अमृतानन्द देवतीर्थ और का आशीर्वाद और उत्तर कर्नाटक के श्री सोन्द स्वर्णवल्ली महासमर्थ जी (Shri Sonda Swarnavalli Mahasamartham) का आशिर्वाद और अनुमोदन प्राप्त है। तथा आर्यसमाज के आर्ष गुरुकुल, वङ्लुरु ,कामारेड्डी , जिला - इब्दुरु, आन्ध्र प्रदेश का भी पूर्ण समर्थन है।
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 श्री मोहन कृति आर्ष पत्रकम / पञ्चाङ्ग में संवत्सर सायन मीन संक्रान्ति से सायन मेष संक्रान्ति के बीच पड़नें वाली अमावस्या समाप्ति समय से और संकल्पादि में दुसरे दिन प्रतिपदा से आरम्भ होता है। इसके अधिक मास क्षय मास भी सायन संक्रान्तियों पर ही आधारित होते हैं। इसमें नक्षत्र योग ताराओं से आरम्भ कर दुसरे नक्षत्र के योग तारा तक भोग वाले /असमान भोग वाले अट्ठाइस सुक्ष्म नक्षत्र मान्य किये गये हैं। तदनुसार व्यतिपात, वैधृतिपात योग भी सूर्यचन्द्र क्रान्तिसाम्य आधारित योग ही स्वीकार किये गये हैं। ग्रह गणना भी सायन भोगांश ही दिये हैं।

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2022

हिन्दू फारसी भाषा में कहा गया अपशशब्द है न कि, संस्कृत शब्द।

सिन्धु शब्द के स का उच्चारण ह होनें का सिद्धान्त सरासर मिथ्या है। क्योंकि, भारत में सिकन्दर के आक्रमण के पहले से ईरान में प्रचलित हिन्दू शब्द प्राचीन ईरानी साहित्य में प्रचलित था।

एक लेख में उल्लेख है कि, जरथुस्त्र रचित- उनके धर्म गृन्थ की आयत 163 वें में लिखा है –

” अकनु विर हमने व्यास नाम अज हिन्द आमद दाना कि अकल चुनानेस्त वृं व्यास हिन्दी वलख आमद ,गस्ताशप जरतस्त रख ,ख्वानंद मन मरदे अम हिन्दी निजात व हिन्दुवा जगस्त”

मतलब ईरान में हिन्दू शब्द जरथुस्त्र के समय से प्रचलित है।

फारसी के प्राचीन शब्दकोशों के अनुसार हिन्दूशब्द का अर्थ काला, कलूटा,दास दस्यु ,चोर, डाकू, लुटेरा, सेंधमार , लूच्चा, लफङ्गा, बदमाश, मिथ्या भाषी (झूठा), आदि अर्थों में प्रयुक्त होता था।

अतः सिन्धु शब्द का फारसी उच्चारण हिन्दू कदापि सत्य नही हो सकता।

किन्तु सिकन्दर के आक्रमण के समय तो ठीक शकों और हूणों के आक्रमण तक भी किसी भारतीय नें अथवा भारतीय ग्रन्थ में हिन्दू जाति, हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति, या हिन्दूदेश हिन्दूस्थान या हिन्दूस्तान शब्द के प्रयोग भारतीय या संस्कृत ग्रन्थ और भारतीय इतिहास में नही पाया जाता है।

हिन्दू-कुश को संस्कृत साहित्य और इतिहास में पारियात्र पर्वत कहा जाता था और बाद में यह हिन्दू-कुश के नाम से प्रसिद्ध हो गया | फारसी भाषा में कुश शब्द का अर्थ होता है क़त्ल करना | जिस स्थान पर हिन्दुओं का कत्लेआम हुआ हो वह स्थान हिन्दू-कुश कहलाता है, – जैसे खुद-कुशी |

भविष्य पुराण में हिन्दूस्थान शब्द आया है।किन्तु उसमें तो राजाभोज का इतिहास तो है ही पृथ्वीराज चौहान, जयचन्द , अकबर और विक्टोरिया तक का इतिहास भविष्यकालिन रूप में नही बल्कि भूतकालिक रूप में दिया है।

बृहस्पति आगम -- आचार्य बृहस्पतिजी ने विशालाक्ष शिव द्वारा रचित राजनीति शास्त्र के ग्रन्थ का सार संक्षेप बार्हस्पत्य शास्त्र नामक ग्रन्थ में किया। वराहमिहिर ने बृहत्संहिता की रचना की। बृहत्संहिता की रचनाके बाद लगभग 300 ई. में बृहस्पति-आगम की रचना हुई। अतः ब्रहस्पति आगम में हिन्दू शब्द या भारत को हिन्दस्थान कहना कोई आश्चर्यजनक नही है। क्योंकि, उस समय मुस्लिम शासकों ने यही शब्द प्रचलित कर दिया था।

शैव तन्त्र के मेरुतंत्र नामक ग्रन्थ को बने हुए 300-400 वर्ष ही हुए हैं । अतः इसमें आये हिन्दू शब्द और उसका अर्थ देना कोई महत्व नही है।

पारिजात हरण नाटक लगभग 1325 ई. के आसपास अलाउद्दीन खिलजी के समकालीन मिथिलानिवासी उमापति उपाध्याय ने पारिजात हरण नाटक की रचना की थी। अतः इसमें आये हिन्दू शब्द और उसका अर्थ देना कोई महत्व नही है।

सम्राट विक्रमादित्य के समय 58 ई.पू. से 34 ई. के बीच रचित अमरकोश उपलब्ध कोषों में सबसे प्राचीन कोश है जिसमें हिन्दू शब्द नही है। शेष सभी कोश राजा भोज के समय 1000ई के बाद के हैं। उनमें से एक कल्पद्रुम नामक शब्दकोश भी परवर्ती ही है।कल्पद्रुम लक्ष्मीधर रचित है ।लक्ष्मीधर गडहवाल वंशी कन्नोजके राजपूत राजा गोपीचंद का मन्त्री था। जयचन्द गोपीचन्द का ही वंशज था जो ईसा की तेरहवीं सदी का है। अतः इसमें आये हिन्दू शब्द और उसका अर्थ देना कोई महत्व नही है।

माधव या माधव विद्यारण्य का समय 1296 -1386 का है वे विजयनगर साम्राज्य हरिहर राय और बुक्काराय के गुरु, संरक्षक,दार्शनिक सन्त थे। अतः माधवविजय भी ईसा की चौदहवीं सदी का ग्रन्थ है।

कालिका पुराण दसवी शताब्दी का ग्रन्थ है। औरशारंगधर पद्धति रचना 1363 ई. मे हुई |

अर्थात उक्त समस्त ग्रन्थ भारत में इस्लामिक शासन स्थापित होजाने के पश्चातवर्ती हैं। अतः मुस्लिमों द्वारा भारतियों के प्रति कहेजानेवाले अपमानजनक शब्द हिन्दू को संस्कृत शब्द घोषित करना उनलोगों रचनाकारों द्वारा शर्म छुपाने का प्रयास मात्र था।

कुछ आलेखों में कहा गया कि ऋग्वेद के अष्टम मण्डल में द्वितीय सुक्त के 41 वें मन्त्र में विवहिन्दू नामक किसी दानी राजा का वर्णन है। किन्तु श्रीपाद दामोदर सातवलेकर जी का ऋग्वेद सुबोध भाष्य में 08/02/41 में विवहिन्दु नही मिला। विभिन्दो या विऽभिन्दो शब्द को भ्रमवश विवहिन्दू समझने की भूल हुई होगी।

मूल मन्त्र प्रस्तुत है---

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:2» मन्त्र:41 | अष्टक:5» अध्याय:7» वर्ग:24» मन्त्र:6 | मण्डल:8» अनुवाक:1» मन्त्र:41

देवता: विभिन्दोर्दानस्तुतिः ऋषि: मेधातिथिः छन्द: पादनिचृद्गायत्री स्वर: षड्जः

शिक्षा॑ विभिन्दो अस्मै च॒त्वार्य॒युता॒ दद॑त् । अ॒ष्टा प॒रः स॒हस्रा॑ ॥

पद पाठ

शिक्ष॑ । वि॒भि॒न्दो॒ इति॑ विऽभिन्दो । अ॒स्मै॒ । च॒त्वारि॑ । अ॒युता॑ । दद॑त् । अ॒ष्ट । प॒रः । स॒हस्रा॑ ॥ ८.२.४१

पदार्थान्वयभाषाः -(विभिन्दो) हे शत्रुकुल के भेदन करनेवाले (ददत्) दाता ! आप (अस्मै) मेरे लिये (अष्टा, सहस्रा, परः) आठ सहस्र अधिक (चत्वारि, अयुता) चार अयुत (शिक्षा) देते हैं ॥४१॥

भावार्थभाषाः -सूक्त में क्षात्रधर्म का प्रकरण होने से इस मन्त्र में ४८००० अड़तालीस हज़ार योद्धाओं का वर्णन है अर्थात् कर्मयोगी के प्रति जिज्ञासुजनों की यह प्रार्थना है कि आप शत्रुओं के दमनार्थ हमको उक्त योद्धा प्रदान करें, जिससे शान्तिमय जीवन व्यतीत हो ॥४१॥

अन्य प्रकार से अर्थ ऐसा हो सकता है।

पदार्थान्वयभाषाः -(विभिन्दो) हे पुरन्दर=दुष्ट जनों का विशेषरूप से विनाश करनेवाले और शिष्टों के रक्षक ईश ! (ददत्) यद्यपि तू आवश्यकता के अनुसार सबको यथायोग्य दे ही रहा है। तथापि (अस्मै) इस मुझ उपासक को (चत्वारि) चा२र (अयुता) अयुत १०००× दश सहस्र=१००००×४=४०००० अर्थात् चालीस सहस्र धन (शि३क्ष) दे तथा (परः) इससे भी अधिक (अष्ट+सहस्रा) आठ सहस्र धन दे ॥४१॥

भावार्थभाषाः -यद्यपि परमात्मा प्रतिक्षण दान दे रहा है, तथापि पुनः-पुनः उसके समीप पहुँच कर अभीष्ट वस्तुओं की प्राप्त्यर्थ निवेदन करें और जो नयनादि दान दिए हुए हैं, उनसे काम लेवें ॥४१॥

टिप्पणी:१−विभिन्दु−भिदिर् विदारणे। पुरन्दर और विभिन्दु दोनों एकार्थक हैं। जो दुष्टों के नगरों को छिन्न-भिन्न करके नष्ट कर देता है, वह विभिन्दु।

सम्भवतः वि॒भि॒न्दो॒ या विऽभिन्दो शब्द से यह भ्रम हुआ है।


हीनम् च दुष्यतेव्हिन्दूरित्युच्च ते प्रिये ।

और हीनम् दुष्यति इति हिन्दूः

में हीन शब्द में ही दीर्घ मात्रा है जबकि हिन्दू में हि लघु मात्रा है। अत्ः शब्द व्युत्पत्ति ठीक ठीक नही बनती। यदि कोई विद्वान इसे सिद्ध करना चाहे तो सादर स्वागत है।

अब उचित समय है इस शब्द को त्याग कर वेदिकालीन शब्द ब्राह्म धर्म (अर्थात वेदिक धर्म) या परम्परागत सनातन धर्म ही अपनाना ही उचित होगा।

उल्लेखनीय है कि, वेदमन्त्रों को ब्रह्म कहते हैं अतः वेद आधारित धर्म होने से ब्राह्म धर्म कहते हैं। 
श्रुति आधारित धर्म श्रोत्रिय धर्म और वेद आधारित धर्म होने से वैदिक धर्म कहलाता है।
ब्राह्म धर्म का  दृढ़तापूर्वक आचरण करनें वाले व्यक्ति को ब्राह्मण कहते हैं। ऐसे ब्राह्मण के द्वारा आचरित और ब्राह्मण ग्रन्थों में व्याख्यायित धर्म ब्राह्मण धर्म कहलाता है।
ऋषियों द्वारा आचरित धर्म होनें से आर्षधर्म कहलाता है। तथा श्रेष्ठ जनों द्वारा आचरित धर्म होने से आर्यधर्म कहलाता है। और शाश्वत रूप से सनातन काल से प्रचलित धर्म होने से सनातन धर्म कहलाता है।
स्वायम्भुव मनु द्वारा रचित मानव धर्मशास्त्र के अनुसार आचरण किया गया मानव धर्म कहलाता था और स्वायम्भुव मनु से पाँचवी पीढ़ी में जन्में भरत चक्रवर्ती (भरत मुनि/ जड़भरत) के राज्य का  मानव धर्मशास्त्र आधारित संविधान के अनुसार आचरण भारतीय धर्म कहलाता है।

ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य और शुद्र जाति नही थी गुण कर्माधारित वर्ण हैं। 
श्रोत्रिय, वेदिक और ब्राह्मण समानार्थी शब्द हैं। वेद ज्ञाता विप्र कहलाते हैं। संस्कारवान व्यक्ति द्विज कहलाता हैं। 
समाज के रक्षक क्षत्रीय कहलाते हैं। व्यवहार कुशल, व्यावहारिक व्यक्ति वैश्य कहलाते हैं। सेवा करके ज्ञानार्जन के अभिलाषी शुद्र कहलाते हैं। 
शुद्र ही वैष्य बनता है फिर उत्तरोत्तर क्षत्रीय और फिर वैदज्ञ होकर विप्र और ब्रह्मज्ञ होकर ब्राह्मण होता है। यह वर्ण व्यवस्था है।
इसलिए वर्णाश्रम धर्म भी कहलाता है।

सोमवार, 7 फ़रवरी 2022

अयन, तोयन, ऋतु, मास और व्रत, उत्सव का सम्बन्ध सायन संक्रान्तियों से।

वैदिक काल में तो वसन्त सम्पात सायन मेष संक्रान्ति (२०/२१ मार्च) से ही संवत्सर आरम्भ, उत्तरायण आरम्भ, वसन्तऋतु आरम्भ  और मधुमास आरम्भ होता था। 
शरद सम्पात सायन तुला संक्रान्ति (२२/२३ सितम्बर) से वैदिक दक्षिणायन आरम्भ, शरद ऋतु आरम्भ और ईष मास आरम्भ होता था।
उत्तर परम क्रान्ति , सायन मकर संक्रान्ति (२१/२२ दिसम्बर) से उत्तर तोयन और सहस्य मासारम्भ होता था। तथा 
दक्षिण परम क्रान्ति, सायन कर्क संक्रान्ति (२२/२३ जून) से दक्षिण तोयन, शचि मास आरम्भ होता था।
इन सबका निर्धारण सायन सौर संक्रान्तियों के अनुसार ही होते थे। 
३० दिन के सावन मास भी प्रचलित थे। इस कारण पाँच वर्ष में दो अधिकमास करके संवत्सर आरम्भ वसन्त सम्पात से ही किया जाता था। 
साथ ही अमावस्या, पुर्णिमा को अन्वाधान अर्थात यज्ञ वेदी में समिधा डालने तथा दुसरे दिन इष्टि (हवन) होता था, अर्धचन्द्रमा का दिन (अष्टमी) को अष्टका, एकाष्टका के पर्व मनाते जाते थे।

परवर्ती ब्राह्मण ग्रन्थों के रचनाकाल और विशेषकर शुल्बसुत्र, श्रोतसुत्र, गृह्यसुत्र,धर्मसुत्रों के रचनाकाल में कहीँ अमान्त चान्द्रमास तो कहीँ पुर्णिमान्त चान्द्रमास प्रचलन में आये। 
किन्तु संवत्सर आरम्भ, अयनारम्भ, तोयनारम्भ, और ऋतु आरम्भ सायन सौर संक्रान्तियों से ही होता रहा। 
चान्द्र वर्ष को सायन सौर वर्ष के तुल्य करने के लिए दो संक्रान्तियों के बीच पड़ने वाली अमावस्या के समाप्ति काल से चान्द्रमास आरम्भ माना जाता था। मासो के नाम पूर्णिमान्त मे पड़ने वाले नक्षत्र के नाम के आधार पर पड़े। 
जिन दो संक्रान्तियों के बीच दो अमावस्या पड़ जाती वह (मास अहनस्पति का) अधिक मास माना जाने लगा। लेकिन जिन दो संक्रान्तियों के बीच कोई अमावस्या न पड़े बल्कि दो अमावस्याओं के बीच दो संक्रान्ति का दुर्लभ संयोग बने उसे क्षय मास कहने लगे। ऐसा योग प्रायः १९ वर्ष और फिर १४१ वर्ष के चक्र में पड़ता है। किन्तु संवत्सरारम्भ सायन मेष संक्रान्ति के पहले पड़ने वाली अमावस्या के समाप्ति काल से ही माना जाता है। फिर वह कोई सा भी चान्द्रमास क्यों न हो।

पौराणिक युग में विष्णु पुराण में भी संवत्सर, उत्तरगोल (वैदिक उत्तरायण) का आरम्भ वसन्त सम्पात सायन मेष संक्रान्ति (२०/२१ मार्च) से आरम्भ होना और दक्षिण गोल (वैदिक दक्षिणायन) शरद सम्पात (२२/२३ सितम्बर) से आरम्भ होना होना बतलाया है। 
विष्णु पुराण और शिव पुराण में पौराणिक उत्तरायण (वैदिक उत्तर तोयन) उत्तर परमक्रान्ति दिवस सायन मकर संक्रान्ति (२१/२२ दिसम्बर) से आरम्भ होना और पौराणिक दक्षिणायन (वैदिक दक्षिण तोयन) दक्षिण परमक्रान्ति दिवस, सायन कर्क संक्रान्ति (२२/२३ जून) से ही आरम्भ करने का वर्णन है। 
साथ ही ऋतुएँ भी तदनुसार सायन सोर संक्रान्तियों से ही आरम्भ करने के निर्देश हैं।

किन्तु वराहमिराचार्य, सूर्यसिद्धान्त रचियता मयासुर, और सिद्धान्त शिरोमणि (लीलावती गणितम् ग्रहगणिताध्याय, गोलाध्याय) के रचयिता भास्कराचार्य ने शकाब्ध को नाक्षत्रिय वर्ष गणना से जोड़कर, संवत्सर आरम्भ और चान्द्रमासों को निरयन सौर संक्रान्तियों से जोड़ दिया।
जिन दो निरयन संक्रान्तियों के बीच दो अमावस्या पड़ जाती वह अधिक मास माना जाने लगा। लेकिन जिन दो निरयन संक्रान्तियों के बीच कोई अमावस्या न पड़े बल्कि दो अमावस्याओं के बीच दो निरयन संक्रान्ति का दुर्लभ संयोग बने उसे क्षय मास कहने लगे। ऐसा योग प्रायः १९ वर्ष, १२२ वर्ष और फिर १४१ वर्ष के चक्र में पड़ता है। किन्तु संवत्सरारम्भ सायन मेष संक्रान्ति के पहले पड़ने वाली अमावस्या के समाप्ति काल से ही माना जाता है। फिर वह कोई सा भी चान्द्रमास क्यों न हो।

लेकिन इस निरयन संक्रान्तियों से संस्कृत चान्द्र मासो के कारण व्रत,पर्व, उत्सव और मुहुर्त सभी का सम्बन्ध वास्तविक ऋतुओं और वैदिक मासों से हट गया।
पहले पहल वाराणसी (काशी के ज्योतिषाचार्य) बापू शास्त्री जी ने इस गलती को सुधारने हेतु ब्राह्मण काल/ सुत्र रचनाकाल में प्रचलित सायन संक्रान्तियों से संस्कृत चान्द्रमासो वाली पञ्चाङ्ग प्रकाशित की। लेकिन कर्मकाण्डी पण्डितों ने इसे नही अपनाया, अस्तु जनता द्वारा स्वीकृत नही होने के कारण श्री बापू शास्त्री जी को प्रकाशन रोकना पड़ा। और बाद में सूर्यसिद्धान्त आधारित पञ्चाङ्ग प्रकाशित होने लगी।

आचार्य दार्शनेय लोकेश ने उक्त गलतियों को पकड़ा और सही पञ्चाङ्ग अपने पिताश्री के शुभ नाम से जारी किया जो श्री मोहन कृति आर्ष पत्रकम् नाम से प्रति वर्ष प्रकाशित हो रहा है।

रविवार, 6 फ़रवरी 2022

वसन्त सम्पात जिस नक्षत्र पर होता था तदनुसार व्रत पर्वों के आरम्भ में

वेद मन्त्रों को ब्रह्म कहते हैं। ,वेदों पर आधारित होनें के कारण हमारा सनातन वेदिक धर्म ब्राह्म धर्म है। 
 वेदों से लेकर पुराणों तक संवत्सर आरम्भ वसन्त विषुव दिवस अर्थात वसन्त सम्पात दिवस से होता है।वेदिककाल में वसन्त विषुव से उत्तरायण, वसन्त ऋतु और मधुमासारम्भ होता था। 
जिसदिन भूकेन्द्रीय ग्रह गणनानुसार सूर्य वसन्त सम्पात यानी सायन मेषादि बिन्दु पर होता है। इसदिन सूर्य ठीक भूमध्य रेखा पर होकर उत्तरी गोलार्ध में प्रवेश करता है। उत्तरी ध्रुव पर सूर्योदय होता है, दक्षिण ध्रुव पर सूर्यास्त होता है। तथा दिनरात बराबर होते हैं। वह दिन वसन्त महाविषुव दिवस कहलाता है। वेदों में इस दिन से संवत्सरारम्भ, उत्तरायण आरम्भ, वसन्त ऋतु आरम्भ, और मधुमास आरम्भ दिवस कहा गया है। क्योंकि, उसी अवधि में आर्यावर्त और ब्रह्मावर्त में वसन्त ऋतु आरम्भ होती है।
अर्थात वसन्त विषुव दिवस से ही पञ्जाब,हरियाणा, सिन्ध, कश्मीर, उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, तुर्किस्तान, तुर्कमेनिस्तान, तजाकिस्तान, पकजाकिस्तान, उजाबेगिस्तान, पामीर तथा ईरान,अफगानिस्तान,में वसन्त ऋतु आरम्भ होती है।
वेदों में वसन्त विषुव से उत्तरायण आरम्भ, वसन्त ऋतु आरम्भ, और मधुमास आरम्भ कहा गया है।तथा मुख्यरूप से 1 मधु, 2 माधव, 3 शुक्र, 4 शचि, 5 नभः, 6 नभस, 7 ईष, 8 ऊर्ज, 9 सहस, 10 सहस्य,11 तपस और 12 तपस्य नामक (सायन) सौर  मास प्रचलित थे। 
उत्तरायण मधु मास आरम्भ से नभस मासान्त तथा ईश मासारम्भ तक रहता था।  उत्तरायण में वसन्त, ग्रीष्म और वर्षाऋतु आती थी। दक्षिणायन  ईष मासारम्भ से तपस्य मासान्त तक अर्थात मधुमासारम्भ के दिन तक होती थी। दक्षिणायन में शरद, हेमन्त और शिशिर ऋतु होती थी।
उत्तरायण और ग्रीष्म ऋतु के मध्य में उत्तर तोयन और दक्षिणायन और हेमन्त ऋतु के मध्य में दक्षिण तोयन होता था।
इसके अतिरिक्त ऋग्वेदोक्त पवित्र आदि मास भी इसी प्रकार प्रचलित रहे।
उत्तर वेदिक काल में तैत्तरीय संहिता और शतपथ ब्राह्मण के अनुसार चित्रा तारे को नक्षत्र मण्डल का मध्य स्थान मानकर चित्रा तारे  से 180° पर नक्षत्र मण्डल का आरम्भ बिन्दू माना गया। इसे निरयन मेषादि बिन्दु कहा जाता है।
वर्तमान में 23 सितम्बर को पड़नें वाले शरद विषुव जिसदिन भूकेन्द्रीय ग्रह गणना से  सूर्य भूमध्य रेखा पर होकर भूमध्य रेखा से दक्षिण (दक्षिण गोलार्ध) में प्रवेश करता है उस समय से दक्षिणायन, शरद ऋतु, और ईष मास का आरम्भ होता था।
इसी प्रकार वर्तमान में 22/23 दिसम्बर को पड़ने वाली सूर्य की उत्तर परमक्रान्ति दिवस (सायन) कर्क संक्रान्ति जिसदिन सूर्य कर्क रेखा पर होता है उस समय वेदिककाल में उत्तर तोयन तथा शचि मास आरम्भ होता था। इसी प्रकार वर्तमान में 22/ 23 दिसम्बर को पड़नें वाली  दक्षिण परमक्रान्ति दिवसको  (सायन) मकर संक्रान्ति को जब सूर्य मकर रेखा पर होता है उस समय वेदिककाल में दक्षिण तोयन और सहस्य मास आरम्भ होता था।


 किन्तु वेदिक काल में  न तो 1 मेष, 2 वृष, 3 मिथुन, 4 कर्क,5 सिंह, 6 कन्या,7  तुला, 8 वृश्चिक, 9 धनु, 10 मकर,11 कुम्भ और 12 मीन (निरयन) राशियाँ प्रचलित थी। और 1 चैत्र, 2 वैशाख, 3 ज्यैष्ठ, 4 आषाढ़, 5 श्रावण, 6 भाद्रपद, 7 आश्विन, 8  कार्तिक, 9 मार्गशीर्ष, 10 पौष, 11 माघ, और 12 फाल्गुन मास भी अप्रचलित थे। 

जब निरयन मेषादि मास और निरयन सौर संस्कृत चैत्रादि मास प्रचलित हुए तब भी जो मास वसन्त सम्पात / वसन्त विषुव दिवस के आसपास आरम्भ होता उसी मास को प्रथम मास माना जाता था। 
ऋग्वेद  में तो निरयन शब्द सायन कर्कसंक्रान्ति और सायन मकर संक्रान्ति दिवस के लिए हुआ है। 
संवत्सरारम्भ सदैव सायन मेष संक्रान्ति से ही होता था। निरयन संक्रान्तियों में वसन्त सम्पात आने के कारण उन निरयन संक्रान्तियों को और उन निरयन संक्रान्तियों से सम्बद्ध चैत्रादि मासान्त अमावस्या या मासारम्भ तिथियों में पर्वोत्सव या पुर्णिमा में  मनाये जाते थे जिनकी परम्परा आज भी प्रचलन में है।
इसके उदाहरण नीचे है।⤵️
सन 25515 ई.पू. तथा सन 285 ईस्वी में वसन्त सम्पात (निरयन) मेष 00° पर था अर्थात (निरयन) मेष संक्रान्ति को  हुआ था। 
तब संवत्सरारम्भ फाल्गुन अमावस्यान्त / चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुड़ीपड़वा) से होता था। चैत्री नवरात्रि ईसी कारण मनाते हैं।

24440 ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) मीन 15° पर था। फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को नवसस्येष्टि पर्व एवम् होलीका उत्स्व इसी कारण मनाते हैं।

सन 23365 ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) मीन 00° पर था अर्थात (निरयन) मीन संक्रान्ति को  हुआ था। 
तब संवत्सरारम्भ माघी अमावस्यान्त /  फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा  से आरम्भ होता था।  महा शिवरात्रि पर्व एवम् मौनी अमावस्या व्रत इसी उपलक्ष्य में मनाया जाता है।

22290 ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) कुम्भ 15° पर था। माघी पूर्णिमा। विश्वकर्मा जयन्ती एवम् दाण्डा रोपिणी पूर्णिमा इसी उपलक्ष्य में मनाते हैं ।

सन 21215  ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) कुम्भ 00° पर था अर्थात (निरयन) कुम्भ संक्रान्ति को  हुआ था। 
तब संवत्सरारम्भ पौषी अमावस्यान्त /  माघ शुक्ल प्रतिपदा  से आरम्भ होता था। 
गुप्त नवरात्रि आरम्भ एवम् वसन्त पञ्चमी इसी उपलक्ष्य में मनाते हैं।

20140  ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) मकर 15° पर था। पौष शुक्ल पूर्णिमा शाकम्भरी जयन्ती पर्व।

सन 19065  ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) मकर 00° पर था अर्थात (निरयन) मकर संक्रान्ति को  हुआ था। 
तब संवत्सरारम्भ मार्गशीर्ष अमावस्यान्त (पित्र) अमावस्यान्त/  पौष  शुक्ल प्रतिपदा  से आरम्भ होता था। 

17990 ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) धनु 15° पर था। मार्गशीर्ष पूर्णिमा दत्त जयन्ती पर्व।

सन 16915  ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) धनु 00° पर था अर्थात (निरयन) धनु संक्रान्ति को  हुआ था। 
तब संवत्सरारम्भ कार्तिक अमावस्यान्त /  मार्गशीर्ष  शुक्ल प्रतिपदा  से आरम्भ होता था। 

15840 ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) वृश्चिक15° पर था। कार्तिक पूर्णिमा / काशी में देवदिवाली/ छोटी दिवाली पर्व।

सन 14765  ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) वृश्चिक 00° पर था अर्थात (निरयन) वृश्चिक संक्रान्ति को  हुआ था। 
तब संवत्सरारम्भ आश्विन अमावस्यान्त दिवाली/  कार्तिक  शुक्ल प्रतिपदा  से आरम्भ होता था। पञ्चदिवसीय  दिवाली पर्वोत्सव धन्वन्तरि जयन्ती, नर्क चतुर्दशी, दिवाली, बलिप्रतिपदा, अन्नकूट एवम् / यम द्वितीय इसी उपलक्ष्य में मनता है। 

 13690 ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) तुला 15° पर था। आश्विन पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा उत्सव, कोजागरी पूर्णिमा व्रत पर्व।

सन 12615  ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) तुला 00° पर था अर्थात (निरयन) तुला संक्रान्ति को  हुआ था। 
तब संवत्सरारम्भ भाद्रपद अमावस्यान्त /  आश्विन  शुक्ल प्रतिपदा  से आरम्भ होता था। सर्वपितृ अमावस्या और शारदीय नवरात्रि इसी उपलक्ष्य में मनता है। 

 11540 ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) कन्या 15° पर था। भाद्रपद पूर्णिमा, प्रोष्टपदी पूर्णिमा व्रत । महालय आरम्भ।

सन 10465  ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) कन्या 00° पर था अर्थात (निरयन) कन्या संक्रान्ति को  हुआ था। 
तब संवत्सरारम्भ  श्रावण अमावस्यान्त /  भाद्रपद  शुक्ल प्रतिपदा  से आरम्भ होता था। पितृ अमावस्या, कुशग्रहणी अमावस्या, हरियाली अमावस्या, पिठोरा अमावस्या, हरतालिका तृतीया, नाग पञ्चमी और  इसी उपलक्ष्य में मनता है। 

 9390 ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन)  सिंह 15° पर था। श्रावण पूर्णिमा, यजुर्वेदी उपाकर्म, राखी ।

सन 8315  ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) सिंह  00° पर था अर्थात (निरयन) सिंह संक्रान्ति को  हुआ था। 
तब संवत्सरारम्भ  आषाढ़ अमावस्यान्त /  श्रावण  शुक्ल प्रतिपदा  से आरम्भ होता था। पितृ अमावस्या, कुशग्रहणी अमावस्या, हरियाली अमावस्या, पिठोरा अमावस्या, हरतालिका तृतीया, नाग पञ्चमी और  इसी उपलक्ष्य में मनता है। 

 7240 ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन)  कर्क 15° पर था। आषाढ़ी पूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा/ गुरु पूर्णिमा ।

सन 6165  ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) कर्क  00° पर था अर्थात (निरयन) कर्क संक्रान्ति को  हुआ था। 
तब संवत्सरारम्भ  ज्यैष्ठ अमावस्यान्त /  आषाढ़  शुक्ल प्रतिपदा  से आरम्भ होता था। गुप्त नवरात्रि  इसी उपलक्ष्य में मनता है। 

 5090 ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन)  मिथुन 15° पर था। ज्यैष्ठ पूर्णिमा,वट सावित्री पूर्णिमा ।

सन 4015  ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) मिथुन  00° पर था अर्थात (निरयन) कर्क संक्रान्ति को  हुआ था। 
तब संवत्सरारम्भ वैशाख  अमावस्यान्त /  ज्यैष्ठ  शुक्ल प्रतिपदा  से आरम्भ होता था। वट सावित्री अमावस्या  इसी उपलक्ष्य में मनती है। 

 2940 ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन)  वृष 15° पर था। वैशाख पूर्णिमा,कुर्म जयन्ती, नृसिह जयन्ती।(सिद्धार्थ गोतम बुद्ध पूर्णिमा।)

सन 1865  ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन) वृष  00° पर था अर्थात (निरयन) वृषभ संक्रान्ति को  हुआ था। 
तब संवत्सरारम्भ चैत्र  अमावस्यान्त /  वैशाख  शुक्ल प्रतिपदा  से आरम्भ होता था। अक्षय तृतीया  इसी उपलक्ष्य में मनती है। 

790  ई.पू. में वसन्त सम्पात (निरयन)  वृष 15° पर था। चैत्र पूर्णिमा, हनुमान जयन्ती।

सन 285  ईस्वी में वसन्त सम्पात (निरयन) मेष  00° पर था अर्थात (निरयन) मेष संक्रान्ति को  हुआ था। 

तब संवत्सरारम्भ फाल्गुनी  अमावस्यान्त /  चैत्र  शुक्ल प्रतिपदा (गुड़ी)  से आरम्भ होना आरम्भ हुआ था। गुड़ीपड़वाँ चैत्री और नवरात्रि  इसी उपलक्ष्य में मनती है। 

1360  ईस्वी में वसन्त सम्पात (निरयन)  मेष 15° पर था। फाल्गुनी पूर्णिमा, होली।

यही स्थिति 22 मार्च 285 ईस्वी के आसपास का इतिहास देखिये।⤵️

जैसे ईस्वी सन 285 के 22 मार्च को जब  वसन्त सम्पात चित्रा नक्षत्र से 180° पर अर्थात निरयन मेषादि बिन्दु पर आया तो उस कालावधि से चैत्र मास प्रथम मास कहलाता है। 
इस समय को इतिहासकारों की दृष्टि से देखें तो निम्नानुसार स्थिति बनती है।⤵️
1 अयनांश 355° से 05° तक।
 सन 75ई.पू. से 645 ई. तक। 
शुंगवंश और *कण्व वंश* से  हर्षवर्धन, व्हेनसांग के यात्रा काल और दक्षिण में चालुक्य वंश के आरम्भ  का समय तक वसन्त सम्पात निरयन मेषादि बिन्दु अर्थात चित्रा तारे से 180° पर रहा। 
2 अयनांश 350° से 10° तक ।
सन 430ई.पू. से 1000ई. तक।
बिम्बिसार के पुत्र अजातशत्रु  और उज्जैन में शिशुनाग के शासन से राजा भोज के शासन , मोहमद गजनी के आक्रमण  और दक्षिण में चालुक्य वंश के अन्त और चोल वंश के उदय तक।
3  अयनांश 345° से 15° तक।
सन 790 ई.पू. से 1369 ई. तक।
ईतिहासकारों की दृष्टि से महाभारत रचनाकाल या महाकाव्य काल से  मोहम्मद तुगलक तक। इब्नबतूता के यात्राकाल तक।

मतलब ऐतिहासिक दृष्टि से भारत में वेदिक परम्पराओं का टूटना आरम्भ होकर पौराणिक स्थापनाएँ जमनें लगी थी।


मतलब  चैत्रादि मास अत्याधुनिक हैं।
वेदिक काल में (सायन) सौर गणनानुसार ही संवत्सर , अयन, तोयन, ऋतुएँ और मास और गतांश तथा संक्रान्ति गते के रूप में दिनांक प्रचलित रहे।
तत्पश्चात महाभारत के बाद चित्रा नक्षत्र से 180° पर सूर्य होनें के दिन/ समय से नाक्षत्र वर्ष , मास , और गतांश और गते प्रचलित हुए। जो पञ्जाब, हरियाणा, दिल्ली, जम्मू, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, बङ्गाल, उड़िसा, तमिलनाड़ु, केरल में आजतक प्रचलित है। 

पौराणिक काल में संवत्सर , अयन, तोयन, ऋतुएँ तो (सायन) सौर गणनानुसार ही रहे पर चैत्रादि चान्द्रमास और तिथियाँ प्रचलित हो गये। जिन्हें (निरयन) संक्रान्तियों से अधिक मास क्षय मास कर नाक्षत्रीय वर्ष के बराबर कर उत्तर भारत में कुषाण वंशिय कनिष्क नें शकाब्द नाम से कश्मीर, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, बिहार में प्रचलित किया और दक्षिण भारत में सातवाहन वंश ने और विशेषकर गोतमीपुत्र सातकर्णी नें शालिवाहन शकाब्द नाम से  आन्ध्रप्रदेश,तेलङ्गाना, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़, गुजरात प्रचलित किया। 
किन्तु यह (निरयन) सौर संस्कृत शकाब्द और इसके चान्द्रमासों का सम्बन्ध परम्परागत (सायन) सौर संवत्सर और ऋतुचक्र से संयुक्त रखनें का प्रयास जारी रहता है। किन्तु यह जुगाड़ बहुत लम्बे समय सम्भव नही होगा।
अतः उचित होगा कि,
1 वेदिक परम्परानुसार ही संवत्सर, अयन, तोयन, ऋतु, मधु माधवादि मास, संक्रान्ति गतांश, और संक्रान्ति गते तथा दशाह के वासर पुनः प्रचलित किये जायें।
यथा सम्भव मुख्य मुख्य व्रतोत्सव भी उक्त गतांश अनुसार ही निर्धारित किये जायें।
किन्तु  अमावस्या, पूर्णिमा या अर्धचन्द्र से सम्बन्धित व्रतोत्सव को तिथियों से मनाते हैं। 
2  सौर संक्रान्तियों और नक्षत्रों पर आधारित व्रतोत्सव को नक्षत्र योगतारा को केन्द्र में रखकर आसपास के तारासमुह को मही नक्षत्र मानकर असमान भोगांश वाले नक्षत्रों पर चन्द्रमा और सूर्य और बृहस्पति आदि ग्रहों की स्थिति अनुसार भी मनाये जासकते हैं। किन्तु इसमें वर्तमान प्रचलित 30° की (निरयन) राशि और 13°20"' के काल्पनिक नक्षत्रों को कोई महत्व नही दिया जावे। नक्षत्र भोग फिर से निर्धारित किये जाये।
3  इस विषय में आचार्य दार्शनेय लोकेश नें मोहन कृति आर्ष पत्रक में (सायन) सौर संक्रान्तियों पर आधारित (सायन) सौर संस्कृत चान्द्रमास और नक्षत्र योगतारा को आरम्भ बिन्दु मानकर असमान भोग वाले अट्ठाइस नक्षत्रों को भी मान्यता दी जा सकती है। 
4   चित्रा नक्षत्र से 180° से आरम्भ  फिक्स झोडिएक में  नक्षत्र योगतारा को केन्द्र में रखकर आसपास के तारासमुह को मही नक्षत्र मानकर असमान भोगांश वाले 88 आधुनिक नक्षत्रों और  28 वेदिक नक्षत्रों पर सौर मण्डल के चलित पिण्डों /सूर्य, चन्द्र और ग्रहों की पोजीशन (स्थिति) भी दर्शाई जाये। यह संहिता ज्योतिष में अति महत्वपूर्ण होंगे।
5  चित्रा तारे से 180° पर स्थित (निरयन) मेषादि बिन्दु से भी अंशात्मक स्थिति दर्शाई जाये। यह इतिहास निर्धारण में भविष्य में उपयोगी होगा।