होली मनाने का पारम्परिक तरीका प्रतिकात्मक रह गया है। सही ढङ्ग से वैदिक परम्परा में नव सस्येष्टि और वसन्तोत्सव के रूप में मनती थी। अब केवल प्रतिकात्मक रूप से वही सब होता है।
वैदिक यूग में अन्तिम मास मे अर्थात सायन मीन संक्रान्ति से संवत्सर आरम्भ दिवस सायन मेष संक्रान्ति के बीच पड़ने वाली अमावस्या के दुसरे दिन से अन्तिम चान्द्रमास आरम्भ होता था। इस अन्तिम चान्द्र मास की पूर्णिमा को यज्ञबेदी में समिधाएँ जमाकर अन्वाधान किया जाता था। और दुसरे दिन प्रतिपदा में होने वाले सामुहिक यज्ञ अर्थात इष्टि के समय नवान्नेष्टि यानी नव सस्येष्टि की जाती थी।
सम्पूर्ण ग्राम वासी एक ही स्थान (होली टेकरी) पर नवीन फसल यव (जौं), गेहूँ, आदि अन्न का यज्ञ सामग्री के साथ हवन करते थे। फिर अपनी फसल का एक भाग यज्ञ भाग के रूप में ब्राह्मणों की संस्था/ गुरुकुल आदि के लिए, एक भाग राज्य के कोष में लगान के रूप में। एक भाग संकट काल के लिए ग्राम प्रमुख के अनुसार ग्रामीण भाण्डार में जमा होता। कुछ अनाज कुम्हार, बढ़ाई, लोहार आदि शुद्रों (सर्विस सेक्टर में कार्यरत) लोगों को आवण्टन होता था, इसे यज्ञभाग वितरण कहते थे। ऐसी ही नव धान्येष्टि अग्रहायण पर्व पर भी होती थी।
धूलि वन्दन कर धूल और यज्ञ की भूत का तिलक कर सामुदायिक उत्सव मनाया जाता, कुछ लोग जो मिट्टी से स्नान करते उन्हें सब मिलकर कीचड़ से स्नान करवाया जाता।
फिर सामुहिक भोज होता, घुड़दौड़, पशुओं की दौड़, बैलगाड़ी दौड़, मल्ल, अग्नि में दौड़ना आदि क्रीड़ा होती थी।
वसन्तोत्सव के रूप में पलाश पुष्प अर्थात टेसु के फूल / किंशुक कुसुम से केसरिया रङ्ग बना कर रङ्ग खेला जाता था।अलग अलग ग्रामों में अलग अलग दिन पड़ोसी ग्राम वासी जाकर रङ्ग खेलते। वसन्तोत्सव मनाते थे। नव वर्ष के यज्ञ के लिए होली से ही अग्नि लाकर घरों में स्थापित की जाती थी। यज्ञ समापन दिवस को भी रङ्गोत्सव होता था।
प्रतिकात्मक रूप से आज होली में गेहूँ की बाली सेकी जाती है। पहले लोग होली से अङ्गारे भी लाते थे। रङ्ग आज भी खेलते हैं। सैल आज भी होती है। सैल में बच्चे और युवा खेलते भी हैं।
कुछ स्थानों पर यह आठ दिन, कुछ स्थानों पर सात दिन और कुछ स्थानों पर पाँच दिवसीय कार्यक्रम था। पाँचवे, सातवें या आठवें दिन होली ठण्डी करना मतलब यज्ञ समापन कर रंगोत्सव मनाया जाता था।
आज भी महाराष्ट्र तथा मध्य प्रदेश के मराठा शासित क्षेत्र इन्दौर, उज्जैन, देवास, धार, ग्वालियर में रङ्ग पञ्चमी को, गुजरात और गुजरात से लगे मध्यप्रदेश के धार जिले के पश्चिमी भाग, और झाबुआ में शील सप्तमी और राजस्थान तथा राजस्थान से लगे मध्यप्रदेश में शीतलाष्टमी को होली ठण्डी कर रङ्गोत्सव मनाते हैं।
इसके पीछे सूर्य रश्मियों के सतरङ्गों को विष्णु के रङ्ग अवतार की कथा भी जुड़ी है। विष्णु भगवान ने सर्वप्रथम धुलेण्डी को धुलिवन्दन कर रङ्गावतार धारण किया था। अतः सप्तरङ्ग से सप्तमी और पचरङ्गी से पञ्चमी को रङ्गोत्सव मनाया जाता है।
दशमी तिथि पर दशा पूजन भी मूलतः वर्षान्त के पञ्च दिवसीय यज्ञ में वर्ष में स्वयम् द्वारा किए गये शुभाशुभ कर्मों का लेखा (बेलेंस शिट) तैयार कर अपनी गलतियों को सुधारनें और अच्छाइयों को बढ़ानें के दृढ़ निश्चय का दिन दशापूजन है।
इसके साथ ही पञ्च दिवसीय उत्सव आरम्भ होता था।
पारसियों में यह प्रथा आंशिक रूप में आज भी प्रचलित है। गुजरात में दिवाली दीपावली के बाद का पञ्चदिवसीय अवकाश भी इसी का प्रतीक है।
वहाँ दीपावली को संवत्सर पूर्ण होता है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें