मंगलवार, 27 अप्रैल 2021

क्या जीव और प्रकृति अनादि, अनन्त है?

वैदिक मत के अनुसार परमात्मा का कल्याणमय संकल्प विश्वात्मा ॐ  के साथ परमात्मा ने स्वयम् को प्रज्ञात्मा परब्रह्म स्वरूप में प्रकट किया।
विश्वात्मा मतलब विश्व का मूल स्वरूप, विश्वात्मा मतलब विश्व का वास्तविक स्वरूप। विश्व को जिस रूप में हम समझ रहे हैं यह आभासी स्वरूप है। विश्व का मूल स्वरूप विश्वात्मा ॐ ही है।
ॐ परमात्मा का कल्याण मय संकल्प है। स्रष्टि उत्पत्ति के पहले ॐ शब्दनाद हुआ। इसे परमात्मा की प्रथम अभिव्यक्ति भी कहा जा सकता है। ॐ ही वेद (ज्ञान) है। ॐ परमात्मा का नाम कहा गया है। ॐ परमात्मा को सम्बोधित करनें के लिए ध्यान करने (याद करनें) के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति है। अ+उ+म् +अनुस्वार जिसका स्वतन्त्र उच्चारण नही किया जा सकता। यो उच्चारण की दृष्टि से यदि तीन सेकण्ड ओ का उच्चारण हो तो एक सेकण्ड म् का उच्चारण कर अनुस्वार का उच्चार होता है।

अनादिमत्परब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते गीता 13/2
प्रज्ञात्मा परब्रह्म को आत्म तत्व,परमपद, परमधाम, परमगति, पुरुषोत्तम, सनातन, अक्षर, अव्यक्त, अधियज्ञ, क्षैत्रज्ञ, कुटस्थ, निर्गुण, सर्वगुण कहा जाता है।
परमात्मा की प्रेरणा से ---
प्रज्ञात्मा परब्रह्म ने स्वयम् को परम पूरुष और परा प्रकृति के रूप में प्रकट किया। वस्तुतः यह स्वरूप ऐसा ही है जैसे सूर्य और प्रकाश । बिना प्रकाश के सूर्य नही होता (ब्लैक होल हो जायेगा) और बिना सूर्य के (सोर्स के बिना) प्रकाश नही हो सकता। अतः इन्हे अलग अलग नही रखा जा सकता। किन्तु शक्ति और शक्तिमान की मानवीय अवधारणा के कारण यह समझनें के लिए है। वास्तविक नही माना हुआ है।
परम पूरुष को दिव्य पूरुष, अक्षर पूरुष भी करते हैं। 
आधिदैविक दृष्टि से परम पूरुष को विष्णु और परा प्रकृति को माया कहते हैं।
सर्वव्यापी, सर्वव्यापक, सर्वव्याप्त विष्णु को परम पद कहा है। विष्णु को किसी शेप साईज में मापतोल नही हो सकती। अर्थात विष्णु का कोई रूप आकार नही है। माया को भी केवल विष्णु की शक्ति के रूप में समझा जा सकता है। जैसे सूर्य का प्रकाश, चुम्बक का चुम्बकत्व।
माया विष्णु की कल्पना स्वरूप सत असत अनिर्वचनीय है। जैसे आप जाग्रति में कल्पना करो, तन्द्रावस्था (हिप्नोसिस) के अनुभव और स्वप्नावस्था में अनुभव किये गये लोग और उनके द्वारा की गई परस्पर अन्तःक्रियाओं को उन कल्पना या स्वप्न के लोगों की दृष्टि से कभी गलत नही कहा जा सकता। क्योंकि उनने उसे भोगा है। किन्तु क्या उनका कोई यथार्थ अस्तित्व है ? बिल्कुल नही। अतः ऐसे ही यह कल्प, यह सृष्टि यथार्थतः सत्य नही है। विष्णु के लिए उनकी कल्पना मात्र है अतः कल्प कहलाती है। किन्तु जबतक ऋत को जानने के बाद आत्मस्वरूप का ज्ञान नही हो जाता तबतक इस मोहावस्था में  हमारे लिए पूर्ण सत्य है। हम इसे अनुभव कर रहे हैं इसमें अन्तःक्रिया कर रहे हैं। हम इसे गलत कह नही सकते पर मान तो सकते हैं।
अब माया सत्य है यह भी नही कहा जा सकता तो अनादि कहाँ से होगी? 

परमात्मा की प्रेरणा से ----
प्रज्ञात्मा परब्रह्म ने स्वयम् को प्रत्यगात्मा (सबका अन्तरात्मा) स्वरूप में प्रकट किया। आधिदैविक स्वरूप में इसे ब्रह्म कहते हैं। 
ब्र मतलब बरः यानी बड़ा। बरः इति ब्रह्म।
महः मतलब महा, महियो महियान,
जो बड़ों में महत् (महा) हो वह ब्रह्म। जो महा (विशाल) से भी बड़ा हो वह ब्रह्म। 
जैसे फारसी का अहुर मज्द --- महा असूर। अरबी का अकबर -- अकस्मात बरः इति अकबरः। जिससे बड़ा कोई न हो वह अकबर है। यह एक उपमा है जो इस्लाम में अल्लाह नामक अश्शुर   के लिए प्रयुक्त है। इनमें एक महत है दुसरा बरः (बड़ा) है।किन्तु ब्रह्म बड़े से भी महत और महा से भी बड़ा है।
यह सर्वगुणसम्पन्न प्रथम सगुण स्वरूप है। फिरभी इसके गुणों का वर्णन अति संक्षिप्त है पर सभी महत्वपूर्ण गुण इसीके हैं। ---
कालातीतम् त्रिगुण रहितम्, प्रकृतिस्थ, (हृदय गुहा में बुद्धि आकाश में चित्त में रहनें वाला। यहाँ हृदय मतलब केन्द्र है हार्ट Heart नही है।) ,सुखदुःख का हेतु, दृष्टा,अणियो अणिमाम्, महतो महियान, 
उपदृष्टा, अनुमन्ता, भर्ताभोक्ता,महेश्वरः कहा गया है। गीता 13/22
प्रत्यगात्मा ब्रह्म ही विधि विधाता है। अधिदेव है। महाकाश है। क्षेत्र है। 
वेदान्त शास्त्राभ्यास उपरान्त निर्मल अन्तःकरण के शिष्य को जब सद्गुरु कहते हैं सर्वखल्विदम् ब्रह्म। (आकाशादि सबकुछ ब्रह्म है।), ईशावास्यम् इदम् सर्वम्, यत्किच् जगत्याम् जगत। (ईस जगत में जोकुछ भास रहा है उन सबको ईश यानी परमेश्वर परब्रह्म में ही जानलो। ईश से ही आच्छादित करदो ताकि, ईश को छोड़कर कोई अनुभव न रहे।)  तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा, मा गृधः कस्यस्वीधनम्। (तब उसे त्याग पूर्वक भोग करो, किसी के किसी धन का लोभ मत करो क्योंकि, हिरण्यगर्भ ब्रह्मा का रचा यह जगत उसकी रात्रि में निन्द्रा मग्न होनेपर उसी में लीन होजाता है। तो तुम्हारा कहाँ रहेगा। ), प्रज्ञानम् ब्रह्म (प्रज्ञान ही ब्रह्म है।), अयमात्मा ब्रह्म (यह आत्मा ही ब्रह्म है।), अहम् ब्रह्मास्मि (मैं भी वही ब्रह्म हूँ यह जानले।) तत् त्वम् असि (वह ब्रह्म तुह्मी हो, वह तुमसे अलग भी नही है, तुम्ही हो।)
यह सुनते ही सर्वमेधयाजी, (जिसके समस्त कर्तव्य पूर्ण होचुके), योगस्थः (निर्मल अन्तःकरण होनें से जिसके सन्देह मिट चुके होने से सदा समाधिस्थ), विवेकशील (स्वभाविक रूप से जिसे सत् असत् का बोध होचुका है) शिष्य के द्वारा उक्त महावाक्य श्रवण होते ही उसे आत्मबोध हो जाता है और वह कह उठता है *"अहम्ब्रह्मास्मि"* ।
परमात्मा की प्रेरणा से ----
 (मानव बोध में) प्रत्यगात्मा ब्रह्म ने स्वयम् को पूरुष और प्रकृति के विभाग स्वरूप में प्रकट किया।
आधिदैविक दृष्टि से पूरुष सवितृ है। सवितृ देव, अज (अजन्मा),प्रभविष्णु (होने वाला , जिसके प्रभाव से ही सबकुछ / भव हुआ है।) है।महेश्वर है। 
संस्कृत में हमारे सूर्य मार्तण्ड  की तुलना सवितृ से की गई है। सवितृ मतलब जो प्रसवित्र होकर सृष्टि का सृजन करता है। सृष्टि को प्रेरित करता है।(जीवित करता है।), सृष्टि की रक्षा करता है। रक्षण करता है। सावित्री मन्त्र / गायत्रीमन्त्र में इन्ही की उपासना की गई है। ये प्रथम उपास्य हैं।
पूरुष (सवितृ) की शक्ति प्रकृति है जिसे आधिदैविक दृष्टि से सवितृ की सावित्री कहा गया है। ये ही प्रभविष्णु की प्रभा है। जिसको मूल आधार मानकर जिससे तुलना कर तुलनात्मक  प्रमाणन होता है प्रमाणित किया जाता है;वह प्रमा है।

परमात्मा की प्रेरणा से ----

प्रत्यगात्मा ब्रह्म ने स्वयम् को जीवात्मा के स्वरूप में प्रकट किया। जिसे आधिदैविक दृष्टि से अपरब्रह्म कहा जाता है। यह स्वरूप विराट कहलाता है। इसे प्रथम साकार स्वरूप कहा जासकता है। किन्तु इसका कोई निश्चित रूप नही है। कूट स्वरूप है। समझनें के लिए आकाश का कोई रूप या आकार नही होता लेकिन सभी आकारों का मूल आकाश को कहा गया है। ऐसे ही समझ सकते हैं। और सुगमता के लिए वायु से तुलना कर सकते हैं। जिसको देखा नही जा सकता। जिसका कोई निश्चित रूप और आकार नही होता।
अग्नि का रूप और आकार दोनों होते हुए भी अग्नि को किसी आकृति में नही ढाल सकते हैं।
और आसानी के लिए पानी का रूप तो होता है। देखा भी जा सकता है लेकिन आकृति निश्चित नही होती। लेकिन इसे किसी बरतन में रखकर आकृति दी जा सकती है। 
त्रिआयामी भूमि ही है। जिसे मनचाहा आकार दिया जा सकता है अतः उसका वास्तविक स्वरूप क्या था नही कहा जा सकता।
जीवात्मा अपरब्रह्म काल है अर्थात  नियति चक्र है। भगवान विष्णु के हाथ में नब्भै गुणित चार अंशों का (360° का संवत्सर चक्र) नियति चक्र है। ऐसा ऋग्वेद में उल्लेख है, यह वही है। 
जीवात्मा अपर ब्रह्म जिष्णु है। जो स्वभाव से ही विजेता है। 

जीवात्मा अपर ब्रह्म की स्थिति  शिशुमार चक्र के केन्द्र  कही गई है।  शिशुमार चक्र को आकाश में छोटा सप्त ऋषि मण्डल भी कहा जाता है। इन सात तारों में एकतारा ध्रुव तारा है। (उत्तरीध्रुव का तारा।)

गणना का साधन काल है। जिससे समय  की गणना की जा सकती है। (समय की गणना अवधि में होती है।)
तो जीवात्मा का कोई निश्चित रूप नही होता। अतः तरङ्गाकार कह सकते हैं।
यह महाकाल है। गीता में जीवात्मा को स्व भाव (स्वभाव) और अध्यात्म कहा है, क्षर कहा गया है। जीवात्मा को प्रकृति जन्य गुणों का भोक्ता और गुण सङ्गानुसार योनियों में संचरण करनें वाला कहा गया है।
परमात्मा की प्रेरणा से ----
जीवात्मा अपर ब्रह्म ने स्वयम् को अपर पूरुष और   अपरा प्रकृति में प्रकट किया। अपरा प्रकृति त्रिगुणात्मक है।अपरा प्रकृति के तीन गुण सत्व, रज,तम कहे गये हैं।
वेदान्त में अपर पूरुष को जीव और अपरा प्रकृति को (जीव की) आयु कहा गया है।
सांख्य शास्त्र में अपर पूरुष को पूरुष और अपरा प्रकृति को प्रधान कहा गया है।
सांख्य शास्त्र के अनुसार प्रधान को पूरुष द्वारा प्रेरित करने पर प्रधान में विक्षेप होता है। फल स्वरूप गुणों में सक्रियता आजाती है। और सृष्टिचक्र का आरम्भ होता है।
 सांख्य शास्त्र में प्रधान (त्रिगुणात्मक अपरा प्रकृति) तो व्यापक होकर एक ही है किन्तु पूरुष अनेक हैं। अतः ये पूरुष प्रकृति पर निर्भर लगते हैं। 
आस्तिकों नें वेदोक्त पूरुष सुक्त के पूरुष से सांख्य शास्त्र के पूरुष को जोड़कर एक पूरुष जो प्रकृति पर शासन करता है कि, कल्पना करली जिसका सर्वश्रेष्ठ वर्णन भागवत पूराण में मिलता है। किन्तु यह सांख्यशास्त्र के विरुद्ध मत है।
अध्यात्मिक दृष्टि से (सत असत् का) विवेक और विद्या कहा गया है।
आधिदैविक दृष्टि से अपर पूरुष (जीव) को नारायण कहा जाता है। ये नार अर्थात प्रकृति मे अयन करते हैं।   नार यानी प्रकृति अर्थात देह में अयन करते हैं। अर्थात जीवकी गति देह में हैं। नार अर्थात जल में गति करते हैं।  अतः नारायण को क्षीरसागर वासी कहा गया है। धातृ नामक वेदिक देवता जिनकी शक्ति धात्री है यही हैं। 
नारायण की शक्ति नारयणी दो स्वरूप में विभक्त है; श्री और लक्ष्मी।स्वाभाविक गुणों, विशेषताएँ, विद्या;  राज्य सत्ता,अचल सम्पत्ति, समृद्धि श्री का कार्यक्षेत्र हैं। अर्थात सरस्वती श्री है। जबकि, सोना, चान्दी, रत्न,शासकीय मुद्रा (रुपये/ डालर/ पौण्ड/युरो), वाहन आदि सम्पन्नता लक्ष्मी के कार्यक्षेत्र है।
क्षीरसागर में शेषशय्या पर लेटे नारायण के शीष की ओर श्री चँवर डुलाती है तथा लक्ष्मी चरण सेवा करती हैं। मतलब श्री गुण धर्म में है अतः अचला है और लक्ष्मी चला है अतः चरणों में है।
 जीव/ नारायण को जगदीश या जगत के ईश्वर अर्थात जगदीश्वर कहते हैं अपर ब्रह्म इस जगत पर शासन करता है अतः जगदीश है; जगदीश्वर है।
यहाँ तक के वर्णन से स्पष्ट होजाता है कि, जीव और आयु स्वरूप अपर पूरुष और अपरा प्रकृति अनादि नही हैं। संख्यात्मक दृष्टि से जीव अनन्त हैं। पर अनादि-अनन्त नही है। सिमित है, बद्ध है।

परमात्मा की प्रेरणा से ----
जीवात्मा अपर ब्रह्म (विराट, महाकाल) नें स्वयम् को भूतात्मा के स्वरूप में प्रकट किया। जिसे आधिदैविक दृष्टि से हिरण्यगर्भ ब्रह्मा कहते हैं। 
भूतात्मा हिरण्यगर्भ विश्वकर्मा (सृष्टि के ब्रह्माण्डों के रचियता) हैं।भूतात्मा हिरण्यगर्भ महादिक है। भूतात्मा हिरण्यगर्भ को दीर्घगोल / या दीर्घ वृत्तीय गोलाकार कह सकते हैं। भूतात्मा हिरण्यगर्भ प्रथम वास्तविक साकार स्वरूप हैं।
भूतात्मा हिरण्यगर्भ ब्रह्मा को पञ्चमुख (सर्वतोमुख यानी सभीओर मुख वाले। या अण्डाकार) माना गया है। भूतात्मा हिरण्यगर्भ ब्रह्मा को वेदवक्ता भी कहा जाता है।
 भूतात्मा हिरण्यगर्भ की आयु दो परार्ध अर्थात इकतीस नील, दस खरब चालिस अरब सायन सौर वर्ष हैं। जिसमें से आधी से कुछ आयु पूर्ण कर चुके हैं। इनकी आयु के पचास वर्ष पूर्ण होकर इक्कावनवें वर्ष का प्रथम दिन भी आधे के  लगभग पूर्ण कर चौदह में से सप्तम मन्वन्तर चल रहा है।
अतः ये प्रथम अनुभवगम्य, प्राकृतिक, भौतिकवैज्ञानिक तत्व हैं। 
भूतात्मा हिरण्यगर्भ को गीता में अधिभूत कहा गया है।
परमात्मा की प्रेरणा से ----
भूतात्मा हिरण्यगर्भ विश्वकर्मा ने स्वयम् को प्राण और धारयित्व (धारण शक्ति धृति) के स्वरूप में प्रकट किया। 
प्राण ही चेतना कहलाता है और चेतना की शक्ति धृति कहलाती है।
प्राण/ चेतना को कठोपनिषद और  गीता में देही कहा है।तथा धारयित्व या धृति को देही की अवस्था कहा जाता है।
आधिदैविक दृष्टि से प्राण/ चेतना/ देही को त्वष्टा कहा गया है।  तथा धारयित्व या धृति/  अवस्था को त्वष्टा की शक्ति रचना कहते हैं।
ऋग्वेद में कहा गया है कि, त्वष्टा ने ही ब्रह्माण्ड के गोलों को सुतार की भाँति घड़ा या गढ़ा। अतः ये अनेक ब्रह्माण्ड त्वष्टा की ही रचना है।
ये ईश्वर श्रेणी के देवताओं में ये अन्तिम कड़ी हैं। इन्हे इश्वर कहते हैं।

परमात्मा की प्रेरणा से ----
भूतात्मा हिरण्यगर्भ विश्वकर्मा नें स्वयम को सूत्रात्मा स्वरूप में प्रकट किया।
आधिदैविक दृष्टि से सूत्रात्मा को प्रजापति ब्रह्मा या आदि प्रजापति कहते हैं।
और आधिभौतिक दृष्टि से सूत्रात्मा को प्रजापति ब्रह्मा को विश्वरूप कहते हैं।
सूत्रात्मा को प्रजापति ब्रह्मा विश्वरूप ब्रह्माण्ड स्वरूप हैं। अर्थात विशाल अण्डाकार रूप में  निर्धारित आकृति वाले प्रथम स्वरूप हैं। प्रजापति को चतुर्मुख (चारों ओर मुख वाले या गोलाकार) कहा गया है। ये प्रथम जीववैज्ञानिक तत्व हैं। सूत्रात्मा को प्रजापति ब्रह्मा को विश्वरूप देवताओं में प्रथम होने से सबसे वरिष्ठ देवता महादेव कहलाते हैं। 
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा पञ्चमुखी और प्रजापति ब्रह्मा चतुर्मुखी होने से यह कथा प्रचलित होगई कि, रुद्र नें ब्रह्मा का एक मुख काटकर पञ्चमुखी से चतुर्मुख कर दिया। रावण की गरदन काटने पर वापस आ जाती थी। रक्तबीज की रक्त बुन्दों से रक्तबीज उत्पन्न हो जाते थे। लेकिन ब्रह्मा का सिर कटने पर वापस नही आया।शंकर जी गजानन बना देते हैं लेकिन असली सिर खोजकर वापस नही लगा सके थे। है ना आश्चर्यजनक। देवताओं से असूर अधिक बलशाली गजब! धन्य है पौराणिक लोग।  
सूत्रात्मा  प्रजापति ब्रह्मा  विश्वरूप की आयु हिरण्यगर्भ ब्रह्मा का एक दिन अर्थात एक कल्प है। यानी चार अरब बीस करोड़ सायन सौर वर्ष है। जिसमें से लगभग आधी से थोड़ी कम आयु पूर्ण कर चौदह में से  सप्तम मन्वन्तर चल रहा है।
परमात्मा की प्रेरणा से ----
सूत्रात्मा  प्रजापति ब्रह्मा  विश्वरूप ने स्वयम् को संज्ञान और संज्ञा के स्वरूप में प्रकट किया जिसे वेदान्त में ओज और उसकी आभा के रूप में वर्णन किया जाता है। रेतधा और उसकी शक्ति स्वधा भी यही हैं। आधिदैविक दृष्टि से दक्ष (प्रथम) प्रजापति -प्रसूति, रूचि- आकुति, और कर्दम - देवहूति नामक प्रजापति कहते हैं।
विशेष सुचना ---
विष्णु, श्रीहरि (सवितृ), नारायण, वामन या आदित्य विष्णु सबको विष्णु कह दिया जाता है।
नारायण, हिरण्यगर्भ, आदिप्रजापति, प्रजापति गण (नौ ब्रह्मा नाम से विख्यात ऋषिगण),ब्रहस्पति, वाचस्पति, ब्रह्मणस्पति सब ब्रह्मा कहलाते हैं।
देवराज इन्द्र, इन्द्र नामक आदित्य गौतम पत्नी अहल्या के साथ रमण करनें वाला तिब्बत कश्मीर, तुर्किस्तान क्षेत्र के देवस्थान का शासक, सीरिया अर्थात सूर् संस्कृति का राजा सुरेश सभी इन्द्र कहलाते हैं।
सबसे वरिष्ठ देवता प्रजापति, देवताओं में प्रथम जन्मा पशुपति अर्धनारीश्वर रुद्र, एकादश रुद्रों में से शंकर जी सब महादेव कहलाते हैं।
पशुपति अर्धनारीश्वर रुद्र, एकादश रुद्रों में से शंकर जी, मनसात्मा महा गणपति, गणों के अलग अलग गणपति जिनमें से एक प्रमथ गणों के गणपति गजानन जिन्हें सभी रुद्रगणों का गणपति नियुक्त किया गया, , सदसस्पति और गणराज्य का चुनागया नेता/ राजा/ राष्ट्रपति रूपी गणपति सब गणपति कहलाते हैं।
इन कारणों से पुराणों में बहुत भ्रम फैला है।

आगे का वर्णन भाग -- 2 में।

गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

वेदिक अष्टाङ्गयोग तथा राजयोग और तान्त्रिक हटयोग।

वेदिक संहिताओं से उपनिषदों तक में अष्टाङ्गयोग / राजयोग का स्पष्ट उल्लैख है। ब्रह्मयज्ञ का का एक भाग अष्टाङ्गयोग है।
पहले अष्टाङ्गयोग सिद्ध युक्त पूरुषों को ही योगी कहा जाता था। निवृत्ति मार्गी अष्टाङ्गयोग सिद्ध ज्ञानियों को मुनि कहा जाता था।  ये भक्तिभाव लीन होते थे।

वेदिक मत के ठीक विरुद्ध तन्त्रमत है। अतः तन्त्र को वेदमत में कोई स्थान नही है।
अतः  अष्टाङ्गयोग और  राजयोग में हटयोग और तन्त्रमत के अष्टचक्र / सप्तचक्रों का उल्लेख नही है।
  
 श्रमणों में शैव और शाक्त पन्थ के उदय के पश्चात सर्वप्रथम दत्त सम्प्रदाय ने ही तान्त्रिकों, अघोरियों और औघड़ो को योगी शब्द से सम्बोधित करना आरम्भ किया जो नाथ सम्प्रदाय में रूढ़ हो गया।
दत्त सम्प्रदाय ने हटयोग और तन्त्रशास्त्र को योग से जोड़ा। और सर्वप्रथम योग के निबन्ध के आरम्भिक ग्रन्थों में तन्त्र और हटयोग के आरम्भिक ग्रन्थों में अष्ट चक्र --  
1सहस्रार चक्र- 2आज्ञाचक्र; 
3अनाहत चक्र- 4विशुद्ध चक्र;
 5 मणिपूरक चक्र- 6 स्वाधिस्ठानचक्र:
 और  7 मूलाधार चक्र - 8 कुण्डली 
को मुख्य चक्र और उप चक्र जैसा माना है।
मूलाधार रूपी शिवलिङ्ग को साढ़े तीन लपेटे से लिपटे नाग / नागिन के रूप में कुण्डलिनी शक्ति चक्र माना गया है।

जबकि मूल तन्त्र ग्रन्थों में सप्त चक्रों का ही उल्लेख है।
1सहस्रार चक्र,  2आज्ञाचक्र,3 विशुद्ध चक्र, 4 अनाहत चक्र,  5 मणिपूरक चक्र, 6 स्वाधिस्ठानचक्र, और 7 मूलाधार चक्र  को ही माना है। कुण्डली शक्ति चक्र के रूप में का प्रथक उल्लेख नही है।


मंगलवार, 30 मार्च 2021

सनातन धर्म में सृष्टि का कालक्रम, चतुर्युग, मन्वन्तर, कल्प, और प्रलय तथा ब्रह्मा की आयु और दशावतार।

कलियुग की कालावधि चार लाख बत्तीस हजार वर्ष होती है। कलियुग में एकमात्र कल्कि अवतार होते हैं।
कुछ लोग श्रीमद्भागवत पुराण में उल्लेख बतलाकर बिहार और नेपाल की सीमा पर लुम्बिनी नामक स्थाध पर ईसापूर्व 563 में राजा शुद्धोदन की पत्नी मायादेवी के गर्भ से जन्में सिद्धार्थ गोतम बुद्ध को विष्णुअवतार मानते हैं। किन्तु यह सही नही लगता क्योंकि,
1तथागत बुद्ध का वर्णन रामायण अयोध्या काण्ड/सर्ग 108 एवम् 109 में है। सर्ग 109 के 34 वें श्लोक में श्रीराम ने जाबालि को बुद्ध के मत को माननें वालों से वार्तालाप करना तक निषिद्घ और उन्हें चोर के समान दण्ड का पात्र  बतलाया है। मतलब बुद्ध और उनके मतावलम्बी श्रीरामचन्द्रजी के पूर्व में भी थे। स्पष्टतः यह वर्णन श्रमण सम्प्रदाय का है जो वर्तमान में 1नागा,2 शैव, 3 शाक्त, 4 गाणपत्य, 4 नाथ,6 जैन और 7बौद्ध  सम्प्रदाय के रूप में पाया जाता है।

 श्रीबुद्ध नामक बुद्धावतार द्वापर युग में श्रीकृष्ण के बाद कीटक नामक स्थान पर आश्विन शुक्ल दशमी (विजयादशमी/ दशहरे) के दिन अजिन के घर हुआ।

हरिवंश पुराण 01/41, विष्णु पुराण 3/18, पद्म पुराण3-252 एवम् गरुड़ पुराण उ/15/26 में मायामोह और नग्न नाम से श्रमण और जैन सम्प्रदाय का वर्णन है।

सिद्धार्थ गौतम बुद्ध जिनका जन्म  बिहार नेपाल सीमा वर्ती लुम्बिनी नामक स्थान पर 563 ई.पू. हुआ। उनके पिता राजा शुद्धोधन तथा माता का नाम माया देवी था।  सिद्धार्थ के जन्म के समय ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि, यह बालक चक्रवर्ती राजा होगा या बुद्ध होगा। 
मतलब उनके जन्म के पहले कोई बुद्ध हो चुके थे। उन श्रीबुद्धावतार के अनुयायी और उनके पन्थ   पर  जैन तिर्थंकर और अन्य बुद्ध तथा सिद्धार्थ गोतम बुद्ध भी चले थे। 
जबकि भविषपुराण में तथागत गोतम बुद्ध को राक्षस कहागया है। और कल्कि पुराण में तो सिद्धार्थ गोतम बुद्ध और उनके माता मायादेवी और पिता शुद्दोधन पुनः उत्पन्न होकर अपने अनुयायी बौद्धों को साथ लेकर कल्कि अवतार से युद्ध करनें और परास्त होनें का वर्णन है।
अतः सिद्धार्थ विष्णु अवतार तो कदापि नही माने जा सकते।

(कलियुग की अवधि 4,32,000 वर्ष युग की इकाई है।)
द्वापर की कालावधि कलियुग से दुगनी आठ लाख चौंसठ हजार वर्ष होती है। द्वापर में श्रीकृष्ण और बलराम अथवा मतान्तर से श्रीकृष्ण और श्रीबुद्ध दो अवतार होते हैं।

पुराणों में उल्लेख और संकल्प बोले जानेवाले तथा पञ्चाङ्गो में लिखे जानेंवाले चौवीस अवतारों में से इक्कीसवें और दशावतारों में नौवे अवतार श्री बुद्धावतार द्वापर युग में श्रीकृष्ण जन्म के बाद आश्विन शुक्ल दशमी (विजयादशमी/ दशहरे) के दिन कीटक नामक स्थान पर अजिन के घर हुआ बतलाया जाता है। किन्तु कोई विशेष प्रामाणिक उल्लेख उपलब्ध नही है।

( 4,32,000 वर्ष × 2 = 8,64,000 वर्ष। है ना द्वापर।)

त्रेता की कालावधि कलियुग से तिगुनी बारह लाख छियानवे हजार वर्ष होती है। त्रेता में वामन, परशुराम और श्रीराम ये तीन अवतार होते हैं।

(4,32,000 वर्ष × 3 = 12,96,000 वर्ष। है ना त्रेता।)

कृतयुग (सतयुग) की कालावधि कलियुग से चौगुनी सत्रह लाख अट्ठाइस हजार वर्ष होती है। सतयुग में मत्स्यावतार (मधुकैटभ का वध कर ब्रह्मा जी को वेद / ज्ञान लोटानें वाले।।), कश्यप (समुद्रमंथन), वराह (हिरण्याक्ष वध कर भूमि सागर में लुप्त भूमि का उद्धार करनें वाले।) तथा नृसिंह (हिरण्यकशिपु का वध कर प्रहलाद के उद्धारक।) ये चार अवतार होते हैं।

4,32,000 वर्ष × 4 = 17,28,000 वर्ष। है ना कृतयुग।)

प्रत्येक महायुग उक्त चारों युगों की कालावधि का योग है। अर्थात 43,20,000 वर्ष में ये चारों युग एक एक बार आते हैं। अतः हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के एक दिन अर्थात 4,32,00,00,000 वर्ष में यानी एक कल्प में एक हजार बार आते हैं। हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के प्रत्यैक दिवस के बाद इतनी ही अवधि की रात्रि या नैमित्तिक प्रलय रहता है जिसमें पूरी सृष्टि बीज रूप में हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के चित्त में रहती है और कल्पारम्भ में पुनः प्रकट होती है।

हिरण्यगर्भ ब्रह्मा का एक दिन अर्थात एक कल्प (4,32,00,00,000 वर्ष) प्रजापति ब्रह्मा की आयु होती है। 30,67,20,000 वर्ष का मन्वन्तर होता है। प्रत्यैक कल्प में पहले और 17,28,000 वर्ष यानी कृतयुग तुल्य सन्धि फिर मन्वन्तर, फिर सन्धि फिर मन्वन्तर ऐसे क्रम में चौदह मन्वन्तर और पन्द्रह सन्धि होती है। सं्धि की अवधि में जैविक प्रलय रहता है। केवल मन्वन्तर काल में ही जैविक सृष्टि रहती है। अर्थात एक कल्प में 4,29,40,80,000 वर्ष ही जैविक सृष्ट रहती है और 2,59,20,000 वर्ष जैविक प्रलय रहता है।

हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की आयु स्वयम हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के सौ वर्ष के बराबर है अर्थात मानवीय वर्ष में ब्रह्मा की आयु इकतीस नील, दस खरब, चालिस अरब वर्ष है। (31,10,40,00,00,00,000 वर्ष है) इसमें 360×100 दिन होंगे।अर्थात 36,000 दिन। (ब्रह्मा की आयु में 36,000 कल्प होते हैं।)

अतः हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की पूरी आयु में 4,29,40,80,000 × 36000 = 15,45,86,88,00,00,000 वर्ष जैविक सृष्टि रहती है। और 15,64,53,12,00,00,000 वर्ष निर्जीव अवस्था ही रहती है।

36,000 × 1000 =3,60,00,000 महायुग होते हैं।

अर्थात ब्रह्मा की आयु में तीन करोड़, साठ लाख बार कृतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग की आवृत्ति होती है।

शुक्रवार, 19 मार्च 2021

ग्रहण काल में जन्में या कुण्डली में षडबल में सूर्य कमजोर हो और सूर्य की महादशा, अन्तर्दशा, प्रत्यन्तर्दशा, सुक्ष्मदशा और प्राण दशा में यदि गोचर में सूर्य का प्रतिकूल भ्रमण में शुभकार्यार्थ सूर्य की दान सामग्री दान विधि।

*सूर्य की दान सामग्री एवम् दान विधि*  ----

*नोट -- पहले ये दो मन्त्र अच्छी तरह याद करलें।* --

उच्चारण की सुविधा हेतु अन्वय सहित सावित्री / गायत्री मन्त्र -- 

ओ३म्   भूः भूवः स्वः ।
तत् सवितुः वरेण्यम्  ।
भर्गो देवस्य धीमहि ।
धियो यो नः प्रचोदयात्।।

सावित्री / गायत्री मन्त्र

*ओ३म्   भूर्भूवः स्वः।*
*तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गोदेवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।*

उच्चारण की सुविधा हेतु अन्वय सहित सूर्य का पौराणिक मन्त्र --

जपा कुसुम संकाशम्  काश्यपेयम्  महाद्युतिम्।
तमोअ्रिम्  सर्व पापघ्नम्  प्रणतो अ्स्मि दिवाकरम् ।।

सूर्य का पौराणिक मन्त्र -- 

*जपाकुसुमसंकाशम् काश्यपेयम्  महाद्युतिम्।तमोsरिम्  सर्वपापघ्नम्  प्रणतोsस्मि दिवाकरम् ।।*

फिर निम्नांकित सामग्रियाँ शनिवार तक एकत्र कर अपने घर के देवस्थान या भण्डारगृह या  रसोईघर में सुरक्षित रख लें।
घर में ही पौधे में लगा हो या सम्भव हो तो रक्त पुष्प रविवार को सुबह भी ले सकते हैं।

 रविवार को सूर्योदय के पहले ही स्नान कर निम्नांकित समस्त दान सामग्री लेकर निकटतम किसी भी देवस्थान पर पहूँच जायें।

 रविवार को सूर्योदय होते ही तत्काल बाद में किन्तु बीस मिनट के अन्दर ही निकटतम किसी भी देवस्थान में ये दान सामग्रियाँ ईश्वरार्पण कर प्रार्थना करें कि है प्रभु ( गोत्र सहित अपना नाम  लेकर) मैं सूर्य को बल प्रदान करने के निमित्त सूर्य की अनुकूलता प्राप्तर्थ्य दान कर रहा हूँ।
दान सामग्री कृपया योग्य पात्र तक पहूँचाने की कृपा करें। क्योंकि योग्य पात्र खोजना मेरे सामर्थ्य में नही है। यह निवेदन कर दान सामग्री ईश्वरार्पण करने के पहले। गायत्री मन्त्र --

ओ३म्   भूर्भूवः स्वः ।
तत्सवितुर्वरेण्यम् ।
भर्गोदेवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्।।

का एक बार जप कर फिर ; सूर्य के पौराणिक मन्त्र --

जपाकुसुमसंकाशम् काश्यपेयम्  महाद्युतिम्।
तमोsरिम्  सर्वपापघ्नम्  प्रणतोsस्मि दिवाकरम् ।।

का एक बार जप कर 
दान सामग्री ईश्वर को समर्पित करदें।

आपको ईश्वर को समर्पित करना है अतः मन्दिर बन्द हो तो द्वार पर रखदें। मन्दिर खुला हो किन्तु पुजारी हो या न हो केवल मन्दिर में दान रखने की जगह रखदें।किसी से कोई बात नही करना है।

सूर्य की दान सामग्रियाँ निम्नलिखित हैं--

1-- स्वर्ण का आभुषण।

(सामर्थ्य अनुसार सोने का काँटा से हार तक कुछ भी चलेगा ले लें।)
 
2 -- माणिक Rubey 3 रत्ती।

(अथवा कंटकिज मणी Spinel स्पाइनल या तामड़ा Garnet .
या सामर्थ्य न हो तो इमिटेशन ही ले लें।)

3 -- लाल वृषभ। (लाल रङ्ग का साण्ड या बेल।) 

यदि सामर्थ्य न हो तो --
ताम्बे की शीट पर उकेरी हुई  वृषभ प्रतिमा ले लें।
 या चान्दी के पत्रे फर उकेरी सुर्य की मुर्ति जो वास्तु पुजा में लगती है वह ले लें।

4 -- ताम्र  ताम्बे का बर्तन।

सामर्थ्य अनुसार आचमनी से लेकर घड़े तक कुछ भी लेलें ।

5 -- शुद्ध रेशम का या शुद्ध काटन का चटकीला लाल  कपड़ा।

( सुती या शुद्ध रेशम का ही हो। चटक लाल रंग का शर्ट पीस या ब्लाउज पीस या रुमाल यथा सामर्थ्य  लेलें ।)

6 -- गेहूँ (सवाया लें।)

(सवा क्विण्टल या सवाधड़ी या सवा किलोग्राम या सवा सौ ग्राम या  सवापाव चन्दोसी से लेकर लोकवन तक कोई सा भी गेहूँ ले लें।)

7 -- गन्ने से बना मालवी गुड़।(सवाया लें।) 

(सवा धड़ी या सवा किलोग्राम या सवा सौ ग्राम या सवापाव मालवी गुड़ ही लें।)

8 -- लाल पुष्प।

लाल गुलाब, लाल कनेर, या गुडहल का फुल लेलें।

और सम्भव हो तो ये तीन वस्तुएँ भी ले सकते हैं।

9 --गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित वैदिक सूक्त संग्रह पुस्तक या यथा सामर्थ्य चारों वेद, ब्राह्मण आरण्यक उपनिषद, श्रोतसुत्र, ग्रह्य सुत्र, शुल्बसुत्र,धर्मसुत्र, पुर्वमिमांसा, उत्तरमीमांसा दर्शन, सांख्य कारिका और सांख्य दर्शन और योग दर्शन, न्याय और वैशेषिक दर्शन, मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति, वाल्मीकि रामायण- महाभारत,सुर्यसुक्त, उषःसुक्त, चाक्षुषोपनिषद, सन्ध्योपासना विधि, सावित्री जप/ गायत्री जप विधि, आदित्यहृदय स्तोत्र आदि यथा सामर्थ्य कुछ भी लेलें।

10 -- बैंत की जड़ या बैल मूल। ( बि्ल्वपत्र की जड़ आपके दाहिने हाथ की कनिष्ठा उँगली के बराबर ही लें।)

11 -- गमले में अर्क/ आँक /आँकड़े का पौधा लेलें।

उक्त दान सामग्री ईश्वरार्पण करने के तत्काल पश्चात सुर्य के पौराणिक मन्त्र -- 
जपाकुसुमसंकाशम् काश्यपेयम्  महाद्युतिम्।
तमोsरिम्  सर्वपापघ्नम्  प्रणतोsस्मि दिवाकरम् ।।

का जप करें। फिर गायत्री मन्त्र --

ओ३म्   भूर्भूवः स्वः ।
तत्सवितुर्वरेण्यम् ।
भर्गोदेवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्।।

का जप एक बार पुनः जप कर घर आ जायें।

उक्त समस्त क्रियाओं के क्रियान्वयन  सूर्योदय के पश्चात सूर्योदय से बीस मिनट के अन्दर ही करना है। अतः चाहें तो एक दिन पहले रिहल्सल करलें।

इसके बाद उगते सूर्य को अर्ध्य देते हुएँ नित्य  केवल गायत्री मंत्र

ओ३म्   भूर्भूवः स्वः ।
तत्सवितुर्वरेण्यम् ।
भर्गोदेवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्।।

का ही जप यथाशक्ति करना चाहिए।

कुण्डली में सूर्य निर्बल हो या सूर्य ग्रहण काल में जन्म हुआ हो तो सूर्य को बलवान बनाने के लिए सूर्य के पौराणिक मन्त्र जप की विधि।

*सूर्य की दान सामग्री एवम् जप विधि*  ----

*नोट -- पहले ये दो मन्त्र अच्छी तरह याद करलें।* --

उच्चारण की सुविधा हेतु अन्वय सहित सावित्री / गायत्री मन्त्र -- 

ओ३म्   भूः भूवः स्वः ।
तत् सवितुः वरेण्यम्  ।
भर्गो देवस्य धीमहि ।
धियो यो नः प्रचोदयात्।।

सावित्री / गायत्री मन्त्र

*ओ३म्   भूर्भूवः स्वः।*
*तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गोदेवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।*

उच्चारण की सुविधा हेतु अन्वय सहित सूर्य का पौराणिक मन्त्र --

जपा कुसुम संकाशम्  काश्यपेयम्  महाद्युतिम्।
तमोअ्रिम्  सर्व पापघ्नम्  प्रणतो अ्स्मि दिवाकरम् ।।

सूर्य का पौराणिक मन्त्र -- 

*जपाकुसुमसंकाशम् काश्यपेयम्  महाद्युतिम्।तमोsरिम्  सर्वपापघ्नम्  प्रणतोsस्मि दिवाकरम् ।।*

फिर निम्नांकित सामग्रियाँ शनिवार तक एकत्र कर अपने घर के देवस्थान या भण्डारगृह या  रसोईघर में सुरक्षित रख लें।
घर में ही पौधे में लगा हो या सम्भव हो तो रक्त पुष्प रविवार को सुबह भी ले सकते हैं।

 रविवार को सूर्योदय के पहले ही स्नान कर निम्नांकित समस्त दान सामग्री लेकर निकटतम किसी भी देवस्थान पर पहूँच जायें।

 रविवार को सूर्योदय होते ही तत्काल बाद में किन्तु बीस मिनट के अन्दर ही निकटतम किसी भी देवस्थान में जाकर दान सामग्री ईश्वरार्पण करने के पहले।

गायत्री मन्त्र --

ओ३म्   भूर्भूवः स्वः ।
तत्सवितुर्वरेण्यम् ।
भर्गोदेवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्।।

का एक बार जप कर फिर ; सुर्य के पौराणिक मन्त्र --

जपाकुसुमसंकाशम् काश्यपेयम्  महाद्युतिम्।
तमोsरिम्  सर्वपापघ्नम्  प्रणतोsस्मि दिवाकरम् ।।

का एक बार जप कर प्रार्थना करें कि है प्रभु ( गोत्र सहित अपना नाम  लेकर) मैं सूर्य को बल प्रदान करने के निमित्त सूर्य की अनुकूलता प्राप्तर्थ्य दान कर रहा हूँ।
योग्य पात्र खोजना मेरे सामर्थ्य में नही है अतः कृपया आप ये  दान सामग्री योग्य पात्र तक पहूँचाने और सूर्य के पौराणिक मन्त्र के दस हजार जप (सौ माला जप) सफलतापूर्वक पूर्ण करवाने की कृपा करें। यह प्रार्थना कर ये दान सामग्रियाँ ईश्वरार्पण कर 
पुनः गायत्री मन्त्र ---

ओ३म्   भूर्भूवः स्वः ।
तत्सवितुर्वरेण्यम् ।
भर्गोदेवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्।।

का एक बार जप कर फिर ; सूर्य के पौराणिक मन्त्र --

जपाकुसुमसंकाशम् काश्यपेयम्  महाद्युतिम्।
तमोsरिम्  सर्वपापघ्नम्  प्रणतोsस्मि दिवाकरम् ।।

का एक बार जप कर 
दान सामग्री ईश्वर को समर्पित करदें।

आपको ईश्वर को समर्पित करना है अतः मन्दिर बन्द हो तो द्वार पर रखदें। मन्दिर खुला हो किन्तु पुजारी हो या न हो केवल मन्दिर में दान रखने की जगह रखदें।किसी से कोई बात नही करना है।

सूर्य की दान सामग्रियाँ निम्नलिखित हैं--

1-- स्वर्ण का आभुषण।

(सामर्थ्य अनुसार सोने का काँटा से हार तक कुछ भी चलेगा ले लें।)
 
2 -- माणिक Rubey 3 रत्ती।

(अथवा कंटकिज मणी Spinel स्पाइनल या तामड़ा Garnet .
या सामर्थ्य न हो तो इमिटेशन ही ले लें।)

3 -- लाल वृषभ। (लाल रङ्ग का साण्ड या बेल।) 

यदि सामर्थ्य न हो तो --
ताम्बे की शीट पर उकेरी हुई  वृषभ प्रतिमा ले लें।
 या चान्दी के पत्रे फर उकेरी सूर्य की मुर्ति जो वास्तु पुजा में लगती है वह ले लें।

4 -- ताम्र  ताम्बे का बर्तन।

सामर्थ्य अनुसार आचमनी से लेकर घड़े तक कुछ भी लेलें ।

5 -- शुद्ध रेशम का या शुद्ध काटन का चटकीला लाल  कपड़ा।

( सुती या शुद्ध रेशम का ही हो। चटक लाल रंग का शर्ट पीस या ब्लाउज पीस या रुमाल यथा सामर्थ्य  लेलें ।)

6 -- गेहूँ (सवाया लें।)

(सवा क्विण्टल या सवाधड़ी या सवा किलोग्राम या सवा सौ ग्राम या  सवापाव चन्दोसी से लेकर लोकवन तक कोई सा भी गेहूँ ले लें।)

7 -- गन्ने से बना मालवी गुड़।(सवाया लें।) 

(सवा धड़ी या सवा किलोग्राम या सवा सौ ग्राम या सवापाव मालवी गुड़ ही लें।)

8 -- लाल पुष्प।

लाल गुलाब, लाल कनेर, या गुडहल का फुल लेलें।

और सम्भव हो तो ये तीन वस्तुएँ भी ले सकते हैं।

9 --  गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित वैदिक सूक्त संग्रह पुस्तक या यथा सामर्थ्य चारों वेद, ब्राह्मण आरण्यक उपनिषद, श्रोतसुत्र, ग्रह्य सुत्र, शुल्बसुत्र,धर्मसुत्र, पुर्वमिमांसा, उत्तरमीमांसा दर्शन, सांख्य कारिका और सांख्य दर्शन और योग दर्शन, न्याय और वैशेषिक दर्शन, मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति, वाल्मीकि रामायण- महाभारत,सुर्यसुक्त, उषःसुक्त, चाक्षुषोपनिषद, सन्ध्योपासना विधि, सावित्री जप/ गायत्री जप विधि, आदित्यहृदय स्तोत्र आदि यथा सामर्थ्य कुछ भी लेलें।

10 -- बैंत की जड़ या बैल मूल। ( बि्ल्वपत्र की जड़ आपके दाहिने हाथ की कनिष्ठा उँगली के बराबर ही लें।)

11 -- गमले में अर्क/ आँक /आँकड़े का पौधा लेलें।

उक्त दान सामग्री ईश्वरार्पण करने के तत्काल पश्चात सूर्य के पौराणिक मन्त्र -- 
जपाकुसुमसंकाशम् काश्यपेयम्  महाद्युतिम्।
तमोsरिम्  सर्वपापघ्नम्  प्रणतोsस्मि दिवाकरम् ।।

का जप करें। फिर गायत्री मन्त्र --

ओ३म्   भूर्भूवः स्वः ।
तत्सवितुर्वरेण्यम् ।
भर्गोदेवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्।।

का जप एक बार पुनः जप कर घर आ जायें।

उक्त समस्त क्रियाओं के क्रियान्वयन  सूर्योदय के पश्चात सूर्योदय से बीस मिनट के अन्दर ही करना है। अतः चाहें तो एक दिन पहले रिहल्सल करलें।

*घर पर जप करने हेतु--*

घर आने के बाद जब भी समय मिले दिन में, रात में, देवस्थान/ देवघर में या सोफे पर जहाँ कर सकें शान्ति से बैठकर सूर्य का पौराणिक मन्त्र --

जपाकुसुमसंकाशम् काश्यपेयम्  महाद्युतिम्।
तमोsरिम्  सर्वपापघ्नम्  प्रणतोsस्मि दिवाकरम् ।।

का जप करें।

नोट --

इस बीच हर दिन कम से कम एक। बार 108  बार या अति विकट स्थिति में कम से कम ग्यारह बार पौराणिक मन्त्र का मान्सिक जप अवश्य करें। अपरिहार्य परिस्थितियों में भी कम से कम एकबार तो जप करें ही।
चाहे घर में या स्वयम् को जनन अशोच  (बिरदी), मरण अशोच (सुतक) हो, स्त्रियों का मासिक धर्म अवधि हो, घरमें कोई बिमार हो और उसकी सेवा में व्यस्त हों स्वयम् बिमार हो,या यात्रा में हो या कही कर्त्तव्य पर तैनात हों,वैवाहिक आदि किसी कार्यक्रम मे व्यस्त हों,किसी कारण स्नान न कर पाये हों कैसी भी परिस्थिति हो 108 बार या 11 बार या एक बार तो मान्सिक जप कर ही लें।

एक बार में कम से कम 108 मनकों की एक माला जप पुर्ण होने पर एक लिख लें।
यथा सम्भव एक माला अवश्य जपें।

एक माला जपने पर 100 ( एक सौ) मन्त्र ही गिनती में माने।
दो माला पर दो सौ मन्त्र माने।
माला तुलसी की हो। 108 मनकों की ही लें।
फुल / सुमेरु पर्वत आने पर माला पलट दें क्योंकि सुमेरु का उल्लङ्घन नही करना है।
आसन पर बैठें तो आसन छोड़ने के पहलें आसन थोड़ उँचा कर भूमि पर जल छिड़क कर भूमि का जल नैत्रों पर या भृकुटि मध्य लगाकर ही आसान से उठें।

*निर्धारित जप संख्या 10,000 (दस हजार)यानि 100 माला पुर्ण होने के बाद अगले रविवार तक मन्त्र सूर्य मन्त्र जप चालू रखें चाहे रोज एक माला ही ही करें या ग्यारह मन्त्र हो ही जप करें किन्त  बन्द न करें।अगले रविवार को सूर्योदय से बीस मिनट के अन्दर के कार्य कर्म --*

10,000 (दस हजार ) मन्त्र जप यानि 108 मनकों की 100 माला जप पुर्ण होंने के बाद जो भी रविवार आये उस दिन पुनः सूर्योदय के तत्काल पश्चात किन्तु सूर्योदय के बीस मिनट के अन्दर 

सूर्य की निम्नलिखित दान सामग्रियाँ  --

1-- स्वर्ण का आभुषण।

(सामर्थ्य अनुसार सोने का काँटा से हार तक कुछ भी चलेगा।)
 
2 -- माणिक Rubey 3 रत्ती।

(अथवा कंटकिज मणी Spinel स्पाइनल या तामड़ा Garnet .
या सामर्थ्य न हो तो इमिटेशन ही ले लें।)

3 -- लाल वृषभ। (लाल रङ्ग का साण्ड या बेल।) 

यदि सामर्थ्य न हो तो --
ताम्बे की शीट पर उकेरा वृषभ।
 या चान्दी के पत्रे उकेरी सुर्य की मुर्ति जो वास्तु पुजा में लगती है।

4 -- ताम्र  ताम्बे का बर्तन।

सामर्थ्य अनुसार आचमनी से लेकर घड़े तक कुछ भी चलेगा।

5 -- चटकीला लाल या गुलाबी शुद्ध रेशम का या शुद्ध काटन का कपड़ा।

( सुती या शुद्ध रेशम का ही हो। ब्लाउज पीस या शर्ट पीस रुमाल यथा सामर्थ्य जो ले सकें।)

6 -- गेहूँ (सवाया लें।)

(सवा क्विण्टल या सवाधड़ी या सवा किलोग्राम या सवा सौ ग्राम या  सवापाव चन्दोसी से लेकर लोकवन तक कोई सा भी गेहूँ।)

7 -- गन्ने से बना मालवी गुड़।(सवाया लें।) 

(सवा धड़ी या सवा किलोग्राम या सवा सौ ग्राम या सवापाव मालवी गुड़ ही लें।)

8 -- लाल पुष्प।

लाल गुलाब, लाल कनेर, या गुडहल का फुल।

और सम्भव हो तो ये तीन वस्तुएँ भी ले सकते हैं।

9 --गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित वैदिक सूक्त संग्रह पुस्तक या यथा सामर्थ्य चारों वेद, ब्राह्मण आरण्यक उपनिषद, श्रोतसुत्र, ग्रह्य सुत्र, शुल्बसुत्र,धर्मसुत्र, पुर्वमिमांसा, उत्तरमीमांसा दर्शन, सांख्य कारिका और सांख्य दर्शन और योग दर्शन, न्याय और वैशेषिक दर्शन, मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति, वाल्मीकि रामायण- महाभारत,सुर्यसुक्त, उषःसुक्त, चाक्षुषोपनिषद, सन्ध्योपासना विधि, सावित्री जप/ गायत्री जप विधि, आदित्यहृदय स्तोत्र आदि यथा सामर्थ्य कुछ भी ।

10 -- बैंत की जड़ या बैल मूल। ( बि्ल्वपत्र की जड़ आपके दाहिने हाथ की कनिष्ठा उँगली के बराबर ही लें।)

11 -- गमले में अर्क/ आँक /आँकड़े का पौधा।

उक्त दान सामग्री ईश्वरार्पण करने के तत्काल पश्चात सुर्य के पौराणिक मन्त्र -- 

जपाकुसुमसंकाशम् काश्यपेयम्  महाद्युतिम्।
तमोsरिम्  सर्वपापघ्नम्  प्रणतोsस्मि दिवाकरम् ।।
का जप करें।

फिर गायत्री मन्त्र --

ओ३म्   भूर्भूवः स्वः ।
तत्सवितुर्वरेण्यम् ।
भर्गोदेवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्।।

एक बार पुनः जप कर घर आ जायें।

इसके बाद उगते सुर्य को अर्ध्य देते हुएँ नित्य  केवल गायत्री मंत्र

ओ३म्   भूर्भूवः स्वः ।
तत्सवितुर्वरेण्यम् ।
भर्गोदेवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्।।

का ही जप यथाशक्ति करना चाहिए।
 सुर्य का पौराणिक मन्त्र जाप बन्द करदें अब नही करना है।


वेदों में सूर्य को विष्णु स्वरूप माना है।सूर्य जनक, प्रेरक और रक्षक है अर्थात सूर्य को ही सवितृ कहा गया है।सूर्य का प्रकाश सावित्री है। सूर्य को सूर्यनारायण कहते हैं। सूर्य की परिक्रमा करने वाली भूदेवी है। सूर्य को प्रजापति भी कहा है और देवता, मानव असुर सब प्रजा है।तथा सूर्य को  प्राण कहा गया है। सूर्य सौरमण्डल का केन्द्र (नाभि) है।  अर्थात सामान्य अर्थ में सूर्य सौर मण्डल का नियन्ता होनें से शासक या ईश्वर माना गया है। अतः सूर्य का अधिदेवता ईश्वर यानी सवितृदेव है। (न कि, ईशान या शंकर।)
सूर्य का प्रत्यधिदेवता अग्नि है।क्योंकि, अग्नि परमात्मा का मुख है। और सूर्य भी अग्नि स्वरूप है। रूप तन्मात्रा अग्नि की है। रूप दर्शन के लिए प्रकाश चाहिए जो सूर्य से मिलता है। स्वरूप दर्शन हैतु ज्ञान चाहिए। सूर्य को गुरुओं का गुरु कहा है।
सन्यासी, ब्राह्मण तुलसीदास जी के गुरु हनुमान और हनुमान के गुरु सूर्य।
देवगुरु ब्रहस्पति से भी वरिष्ठ प्रजापति सूर्य को ही माना है। 

सूर्य स्वयम् सवितृदेव,साक्षात धर्मस्वरूप सूर्य की सन्तान  धर्मराज यम,यमुना, दण्डाधिकारी शनि, मान्दी, तथा आयुर्वेद के जनक अश्विनी कुमार नासत्य और दस्र हैं।

 ईष्टि (अग्निहोत्र) और अष्टाङ्गयोग साधना तथा वेदशास्त्र स्वाध्याय, धर्मपालन, और सदाचारी जीवन, आयुर्वेद के नियमों का पालन करना ही सूर्य को बलवान बनानें का उपाय है।

अतः सूर्य को बल देनें के लिए सन्ध्योपासना , गायत्री जप करके सूर्य को नमस्कार कर और सूर्य को अर्घ्य देना, अष्टाङ्गयोग  साधन, वेदिक स्वाध्याय करना  पञ्चमहायज्ञ सेवन ,प्रातः सन्ध्या में सूर्योदय पश्चात और सायम् सन्ध्या मे सूर्यास्त के पूर्व दैनिक अग्निहोत्र करना।

सायन संक्रान्तियों और निरयन संक्रान्तियों तथा पूर्णिमा, अमावस्या के अन्त में मासिक अग्निहोत्र करना।

प्रत्यैक दो सायन संक्रान्तियों पर ऋतुओं के आरम्भ में ऋतु यज्ञ अग्निहोत्र करना।
प्रत्यैक तीन सायन संक्रान्तियों पर अयन तोयन आरम्भ पर अयन का अग्निहोत्र या योयन का अग्निहोत्र करना। अर्थात 

सायन मेष संक्रान्ति 21 मार्च को संवत्सरारम्भ, वेदिक उत्तरायण (पौराणिक उत्तर गोल) आरम्भ ,  वेदिक वसन्त ऋतु आरम्भ तथा वेदिक मधुमासारम्भ का संयुक्त अग्निहोत्र करें।

सायन कर्क  संक्रान्ति 22 जून को   वेदिक दक्षिण तोयन (पौराणिक दक्षिणायन), वेदिक शचिमासारम्भ का अग्निहोत्र करें।

सायन तुला संक्रान्ति 23 सितम्बर को वेदिक दक्षिणायन (पौराणिक दक्षिण गोल गोल) आरम्भ ,  वेदिक शरद ऋतु आरम्भ तथा वेदिक ईष मासारम्भ का संयुक्त अग्निहोत्र करें।

सायन मकर  संक्रान्ति 22 दिसम्बर को   वेदिक उत्तर तोयन (पौराणिक उत्तरायण), वेदिक  सहस्य मासारम्भ का अग्निहोत्र करें।
सूर्यग्रहण की अवधि में ग्रहण आरम्भ के पूर्व स्नान कर शरीर गीला रहते ही नदि सङ्गम / तिर्थ में या घरपर ही स्वच्छ, पवित्र और शुद्ध रहकर गायत्री मन्त्र जप आरम्भ करना। और ग्रहण समाप्ति पर पुनः स्नान कर जप पूर्ण कर दान करना। और अग्निहोत्र कर शुद्धि करना।
(सुचना -- इन यज्ञों में सभी मुख्य पर्वोत्सव आजाते हैं। इसमें स्वतः सूर्य आराधना होजाती है।)

अस्त, वक्री, और अत्यन्त क्षीण, निर्बल ग्रहों को बलवान बनाने के लिए ग्रहों के पौराणिक मन्त्र की जप विधि ।

*ग्रहों के पौराणिक मन्त्र जप करनें में सहायक विधि निषेध।* 

1 *यह प्रायश्चित्त और शान्तिकर्म है। अतः स्वयम् को ही करना होगा।* 
आपके  माता - पिता, भाई-बहन, पति या पत्नी अथवा सन्तान आपके लिए जप नही कर सकती। वे यदि करेंगे तो वह उनकी कुण्डली के ग्रहों को ही बल पहूँचायेगा। आपकी कुण्डली के ग्रह अप्रभावित रहेंगे। ऐसे ही कोई आचार्य, पुरोहित या पण्डित भी आपसे संकल्प करवा कर सुपारी लेकर जप करनें को कहे तो वह भी कोई लाभकारी नही होसकता। 
जैसे यज्ञ में, पूजा पाठ में आचार्य केवल निर्देशक और सहयोगी की भूमिका में रहकर यज्ञ या पूजा करवाते हैं; उनकी उतनी ही भूमिका हो सकती है।
 यज्ञ में आहूति  आपको ही डालना पड़ती है। पूजन आपको ही करना होती है, वैसे ही जप भी आपको ही करना है।
दुसरे के खाने से आपका पेट नही भर सकता और दुसरा दवाई खा ले या ऑपरेशन करवाले तो आप स्वस्थ्य नही हो सकते।
 ऐसे ही प्रायश्चित्त स्वरूप जप आपको ही करना है। दुसरा कोई नही कर सकता।
जब शिक्षा मण्डल, विश्वविद्यालय और परिक्षा मण्डल आपके स्थान पर दुसरे को परीक्षा देना स्वीकार नही करता तो देवता क्यों अनुमति देंगे?
निस्सन्देह यह कोई आराधना उपासना या साधना नही है किन्तु यह कोई सकाम उपासना या टोटकेबाजी भी नही है। 
बल्कि छुटे हुए कर्तव्यकर्म की क्षतिपूर्ति है। जिसे करना अनिवार्य है। 
जैसे कोई विद्यार्थी पूर्व कक्षा में  एक या दो विषय की परीक्षा उत्तीर्ण न कर पाता है तो विश्वविद्यालय अगली कक्षा में प्रवेश लेकर आगामी परीक्षा के साथ उन बचे हुए अनुत्तीर्ण विषयों की परीक्षा देकर उत्तीर्ण करनें का अवसर देता है। वैसे ही ईश्वर नें इस जन्म में गत जन्म के बचे हुए कर्तव्य कर्म पूर्ण करनें और त्रुटियों को सुधारने का अवसर देते हैं। वही प्रायश्चित कर्म कहलाते हैं।

2 ग्रहों के पौराणिक मन्त्र के जप की विधि बहुत विस्तार से समझा कर लिखी गई है।अतः यह केवल पढ़ने में बहुत बड़े। पर करने में में बहुत आसान है। करना शुरू करो तो हो जाते मैं। जब लाभ मिलता है तो स्वतः श्रद्धा बड़ती है।

3 मूलतः हमारा कर्तव्य है कि, जब भी कोई ग्रह अस्त हो या वक्री हो या नीचस्थ, शत्रुराशि/ नक्षत्र/ नवांशादि में हो। या कालबल या दृग्बल में क्षीण चल रहा हो तब उस ग्रह को बल देनें के लिए ईश्वर आराधना वैसे ही करना चाहिए जैसे अधिक मास क्षय मास में करते हैं। किन्तु कोई नही करता।

4  इसी का फल इस जन्म के समय कुछ ग्रह अस्त या वक्री या बलहीन होते हैं । अतः इस जन्म में उनको अस्त, वक्री या निर्बल ग्रहों को बल देनें के लिए उन अस्त , वक्री या निर्बल ग्रहों के पौराणिक मन्त्र जप निर्धारित विधि से करना पड़ता हैं।

5 वस्तुतः चलित चक्र में ग्रह जिस भाव  में स्थित हो उस भाव के फलों को सूचित करता है तथा भावस्पष्ट के अनुसार वह ग्रह जिस भाव का स्वामी हो उन भावों के फलों को भी सूचित करता है। 
इसके अलावा वह ग्रह जिस किसी ग्रह से अंशात्मक युति बनाता है या अंशात्मक पूर्ण दृष्ट हो उस ग्रह से सम्बद्ध भावों के फल भी सूचित करता है। 

6 कृष्णमूर्ति पद्यति के अनुसार केवल विंशोत्तरी महादशा पद्यति ही मान्य है। तथा
 विंशोत्तरी दशापद्यति के अनुसार नक्षत्रों के स्वामी सबसे महत्पूर्ण माने जाते हैं। 
तदनुसार  जिस नक्षत्र में वह ग्रह स्थित होता है उस नक्षत्र का स्वामी जिस भाव में स्थित हो और जिन जिन भावों का स्वामी हो उन भावों का फल विशेष रूप से सूचित करता है। 

 7  ग्रह जिस राशि नक्षत्र में ग्रह स्थित होता हैं उन राशि नक्षत्रों के स्वभावानुसार तथा  स्वयम् अपनी प्रकृति के अनुकूल उस भाव का फल फल सूचित करते हैं जिस भाव में वह ग्रह चलित चक्र में स्थित हो, या भावस्पष्ट के अनुसार जिन भावों का स्वामी हो। तथा कृष्णमूर्ति पद्यति के अनुसार जिन भावों का सूचक (Significator) हो।
 
8 किन्तु अस्त ग्रह, वक्री ग्रह और केशवी जातक ग्रन्थ में बतलाये गये तथा वृहत्पाराशर होराशास्त्र में भी उल्लेखित  षड्बलों  में अत्यन्त निर्बल ग्रह जिन शुभफलों को सुचित करते हैं उन फलों का मिलने का मात्र आभास होता है, पर मिलते नही हैं। जबकि जिन अशुभ फलों को सूचित करते हैं वे अशुभ फल अत्यधिक तीव्रता से और भरपूर मात्रा में मिलते हैं। 

9 किसी भी अस्त वक्री या बलहीन ग्रह को सबल बनानें के लिए उस ग्रह के पौराणिक मन्त्र का जप करने से उस ग्रह द्वारा सूचित शुभ फल पूर्ण रूप से घटित होने लगते हैं। जबकि उस ग्रह द्वारा सूचित अशुभ फल केवल आभास देकर ही पूर्ण हो जाते हैं।

10  ग्रहों के पौराणिक मन्त्रों की जप विधि का आधार ठीक वही है जो सूर्य  ग्रहण के समय सूर्य को बल देनें के लिए और चन्द्रग्रहण के समय चन्द्रमा को बल देनें के लिए धर्मशास्त्रों में उल्लेखित है।

11 ग्रहण काल में सूर्य या चन्द्रमा को बल देने के लिए पहले दान धर्म कर ग्रहण आरम्भ के तत्काल पूर्व स्नान कर सूर्य ग्रह ग्रहण अवधि में वेद मन्त्र का जप एवम् चन्द्र ग्रहण अवधि में पौराणिक मन्त्र का जप कर ग्रहण समाप्ति पर स्नान कर सूर्यग्रहण में सूर्य को या चन्द्र ग्रहण में चन्द्रमा को अर्घ्य देकर फिर दान धर्म किया जाता है। 

12  अस्त वक्री या अत्यन्त क्षीण ग्रह को बल प्रदान करनें हेतु उस अस्त वक्री या अत्यन्त क्षीण ग्रह के पौराणिक मन्त्र के जप करनें की विधि भी ठीक यही  है।

13  कागज पर मन्त्र लिख कर रख ले। याद रहे ना रहे। समय पर भूल सकते हैं। अतः प्रिण्ट निकाललें।

14   तुलसी की 108 मनकों की जप करनें की माला गौवर्धन नाथ मन्दिर या मारोठ्या इन्दौर में शंकर सुगन्धि के यहाँ मिल सकती है।

15 -गुगल पर सुर्योदय समय देख लें।
जैसे 21 मार्च को सुर्योदय समय 06:35  है। 

16 - परिवार जनों को पहले से समझादें ताकि जाते आते समय वे पूछताछ / टोका - टोकी ना करें।
घर से बिना बोले निकलें। निकटतम मन्दिर में 06:35 के पहलें नही पहूँचे और 06:55  के बाद रुके नही। इसी बीच में ही दान सामग्री अर्पण,प्रार्थना और जप करना है।  

17  सम्बन्धित  ग्रह के वार में प्रथम घटि उसी ग्रह की होती है। अतः सूर्योदय पूर्व स्नान कर अस्त, वक्री या अत्यन्त क्षीण/ निर्बल  ग्रह की दान सामग्रियाँ और  मन्त्र लिखा कागज लेकर घर से निकटतम मन्दिर के लिए निकलें।

18  अस्त,वक्री और अत्यन्त क्षीण/ निर्बल ग्रह के वार का सूर्योदय होते ही किसी भी निकटतम देवालय में पहूँच जायें। अर्थात ठीक सूर्योदय के समय मन्दिर की सीड़ियो, या द्वार पर पहूच जायें। 

19  सूर्योदय से बीस मिनट के अन्दर ही ईश्वर को सम्मुख अनुभव कर ईश्वर से प्रार्थना करें कि, कलिकाल के कारण मैं योग्यपात्र को खोज कर दान करनें में  असमर्थ हूँ अतः कृपया  (सम्बन्धि ग्रह का नाम लेकर कहें कि, अमुक) ग्रह की दान सामग्रियाँ योग्यपात्र तक पहूँचानें की कृपा कर (सम्बन्धित ग्रह का नाम लेकर कहें कि, अमुक) ग्रह के पौराणिक मन्त्र जप का अनुष्ठान सफलता पूर्वक पूर्ण करवाने की कृपा करें। यह प्रार्धना करते हुए उस अस्त/ वक्री या अत्यन्त क्षीण निर्बल ग्रह की दानसामग्रियाँ  ईश्वर को समर्पित कर दें ।

20  फिर कागज पर लिखे मन्त्र को पढ़कर वहीं से सम्बन्धित ग्रह के पौराणिक मन्त्र का जप आरम्भ कर दें।
 कम से कम एक बार या (सूर्योदय के बाद के) बीस मिनट पूर्ण होने तक जितनी बार  मन्त्र जप हो सके करें। 
फिर बिना कुछ बोले ही सीधे घर आजायें।

21 घर आनें के बाद फिर आवश्यक कर्तव्य कर्म पूर्ण कर सकते हैं। किन्तु प्रयत्न पूर्वक उसी दिन कमसे कम उस ग्रह के पौराणिक मन्त्र की एक माला जप अवश्य करलें।
तथा फिर नित्य कमसे कम एक माला जप अवश्य ही करें।

22 अपरिहार्य परिस्थिति में जप हो पाये ना हो पाये अतः सुर्योदय पश्चात या देरी से उठें तो सुबह जागते ही/ बिस्तर छोड़नें से पहले और नहाते समय तथा सामान्य पूजा करते समय बिना माला के  एक बार मन्त्र जप अवश्य करें। ता कि लांघा ना हो।

23 जनन अशोच (बिरदी) में, मरणाशोच (सूतक) में, ग्रहण, बिमारी में, यात्रा में, स्नान न हो पाये तो भी मन ही मन जप अवश्य करें किन्तु गीनें नही। गणना में न लें।

24 माला दाहिने हाथ (सीधे हाथ) की बड़ी उँगली मध्यमा पर रखकर अंगूठे की सहायता से अपनी ओर घुमाएँ।
 माला में एक फुन्दा/ फूल होता है उसे सुमेरु कहते हैं। सुमेरू आते ही सुमेरु को दोनों भौंहों (भृकुटी) के बीच आज्ञाचक्र से स्पर्ष करा कर नमन करे और फिर बड़ी उँगली मध्यमा और अंगुठा मिलाकर माला अंगूठे पर लेकर बड़ी उँगली मध्यमा में माला लेकर माला को उलट लें/ पलटी मारदें। क्योंकि, सुमेरु का उल्लंघन नही होता है।

25 यदि आसन पर बैठकर जप करें तो आसन का कोणा उठाकर उस जगह भूमि पर जल छिड़क कर दाहिने हाथ की बीच की दो उँगलियों (मध्यमा और अनामिका) सें उस गीली भूमि का स्पर्ष कर के वह जल भृकुटी मध्य और नैत्र त्रय पर लगायें। फिर उठें।

26 -- एक माला से कम हो तो ना गिनती में ना लें यानी नोट ना करें।
प्रयत्न पूर्वक एक बैठक में कमसे कम एक माला अवश्य पूर्ण करलें। 
जितनी माला पूर्ण होती जाये लिखते जायें। माना कि, पहले दिन पाँच माला हुई तो छोटी डायरी में 05 लिख कर माला के साथ ही रखदें। दुसरे दिन सात हुई तो दिनांक डालकर (पिछली पाँच और आज की सात मिलाकर) 12 लिखलें। तिसरे दिन दस माला की तो (पिछली बारह और आज की दस मिलाकर) 22 लिखलें।  माला संख्या पूर्ण होजायेगी तो स्वतः पता चल जायेगा।

 27  जब किसी को दो या दो से अधिक ग्रहों के मन्त्र जप करना हो तब ज्योतिषी  घातक फल रोकनें के लिए या वाञ्छित शुभ फल की तत्कालीन आवश्यकतानुसार  दशा और गोचर देखकर बतलायेंगे कि, पहले कौन से ग्रह के मन्त्र का जप करना है और कौनसा बाद में। 
यदि ऐसा नही बतलाए या किसी एक दो ग्रहों के लिए ही निर्देश देकर शेष ग्रहों के जप का वरीयता क्रम न बतलाये तो जिसकी जप संख्या (माला की संख्या) सबसे कम हो वह पहले करें ताकि, एक कार्य पूर्ण हो जाये। 
फिर बचे ग्रहों में से सबसे कम जप संख्या वाले दुसरे  ग्रह का जप करें। 
ऐसे क्रम से सबसे अन्त में अधिकतम माला (जप संख्या) वाले ग्रह का मन्त्र जप करें। 
 एस साथ करनें में कोई भी पूरा नही होगा।

28  चाहे तो दस या पाँच माला रोज करके एक सप्ताह में  दो सप्ताह में बुध मन्त्र जप  पूरा हो ही जायेगा।
दस माला करनें में डेड़ / दो घण्टा लगेंगे। पाँच माला भी की तो एक घण्टे से कम समय लगेगा। और जप धीरे धीरे पूरे होजायेंगे।

29 सभी देवता विष्णु को भोग लगा भोजन / नैवेद्य ही ग्रहण करते हैं।
अग्नि परमात्मा का मुख है अतः पहले  छोटी सी टिकड़ी जैसी रोटी बनाकर उसमें घीँ लगाकर थोड़ा सा गुड़ और तुलसी दल रखकर भगवान विष्णु को नैवेद्य अर्पण कर 
मन्त्र बोलकर ⤵️
 ॐ अग्नये स्वाहा स्वाहाः।इदम् अग्नये न मम्। बोलकर अग्नि में डालें अर्थात अग्नि को भोग लगायें। किन्तु तुलसीदल अग्नि में न डालें। 
फिर पहली रोटी बनें वह गौमाता को दीजाती है उसमें यह तुलसी दल (गायकी रोटी में) रखलें।

30 रोज पहली रोटी में सम्बन्धित ग्रह का की खाद्यवस्तु और अनाज रखकर देशी गाय को खिलाना चाहिए। और अन्तिम रोटी कुत्ते को खिलाना चाहिए। यह कर्म भी सपोर्टिंग सिस्टम का कार्य करेगा।

31 सुबह का भोजन बनाकर किसी को भी भोजन परोसनें के पहले भोजन बनाकर सर्वप्रथम तुलसी दल रखकर भगवान विष्णु को भोजन का नैवैद्य लगायें। तदुपरान्त ही पहले अतिथि को भोजन करायें, फिर घर के बुजुर्ग वृद्ध - वृद्धाओं को, प्रसुताओं को, बालक/ बालिकाओं को, और  घर में यदि कोई रोगी या अशक्त हो तो उन रोगियों को पहले भोजन करवायें। या उनके लिए पहले निकालें।  बादमें स्वयम् ग्रहण करें।
 
32 *नवग्रह स्तोत्र* 

सभी ग्रहों के मन्त्र और उनके हिन्दी अर्थ।
जिस मन्त्र का जप करना हो उसका अर्थ अच्छी तरह समझलें।

जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महद्युतिं।
तमोरिसर्व पापघ्नं प्रणतोस्मि दिवाकरं ।। (रवि)
जो जपा पुष्प के समान अरुणिमा वाले महान तेज से संपन्न अंधकार के विनाशक सभी पापों को दूर करने वाले तथा महर्षि कश्यप के पुत्र हैं उन सूर्य को मैं प्रणाम करता हूं 
दधिशंख तुषाराभं क्षीरोदार्णव संभवं।
नमामि शशिनं सोंमं शंभोर्मुकुट भूषणं ।। (चंद्र)
जो दधि, शंख तथा हिम के समान आभा वाले छीर समुद्र से प्रादुर्भूत भगवान शंकर के सिरो भूषण तथा अमृत स्वरूप है उन चंद्रमा को मैं नमस्कार करता हूं।


धरणीगर्भ संभूतं विद्युत्कांतीं समप्रभं।
कुमारं शक्तिहस्तंच मंगलं प्रणमाम्यहं ।। (मंगळ)
जो पृथ्वी देवी से उद्भूत विद्युत की कांति के समान प्रभाव आ दें कुमारावस्था वाले तथा हाथ में  शक्ति लिए हुए हैं उन मंगल को मैं प्रमाण प्रणाम करता हूं।


प्रियंगुकलिका शामं रूपेणा प्रतिमं बुधं।
सौम्यं सौम्य गुणपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहं ।। (बुध)
जो प्रियंगु लता की कली के समान गहरे हरित वर्ण वाले अतुलनीय सौंदर्य वाले तथा सौम्य गुण से संपन्न है उन चंद्रमा के पुत्र बुद्ध को मैं प्रणाम करता हूं।


देवानांच ऋषिणांच गुरुंकांचन सन्निभं
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिं (गुरु)
जो देवताओं और ऋषियों के गुरु हैं स्वर्णिम आभा वाले हैं ज्ञान से संपन्न है तथा तीनों लोकों के स्वामी हैं उन बृहस्पति को मैं नमस्कार करता हूं।

हिमकुंद मृणालाभं दैत्यानां परमं गुरूं।
सर्वशास्त्र प्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहं।। (शुक्र) 
जो हिमकुंद पुष्प तथा कमलनाल के तंतु के समान श्वेत आभा वाले, दैत्यों के परम गुरु, सभी शास्त्रों के उपदेष्टा तथा महर्षि ध्रुव के पुत्र हैं, उन शुक्र को मैं प्रणाम करता हूं। 

नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजं।
छायामार्तंड संभूतं तं नमामि शनैश्वरं।। (शनि)
जो नीले कज्जल के समान आभा वाले, सूर्य के पुत्र यम के जेष्ठ भ्राता तथा सूर्य पत्नी छाया तथा मार्तंड से उत्पन्न है उन शनिश्चर को मैं नमस्कार करता हूं।
अर्धकायं महावीर्यं चंद्रादित्य विमर्दनं।
सिंहिका गर्भसंभूतं तं राहूं प्रणमाम्यहं।। (राहू)
जो आधे शरीर वाले हैं महान पराक्रम से संपन्न है, सूर्य तथा चंद्रमा को ग्रसने वाले हैं तथा सिंह ही का के गर्भ से उत्पन्न उन राहों को मैं प्रणाम करता हूं।

पलाशपुष्प संकाशं तारका ग्रह मस्तकं।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहं।। (केतु)
पलाश पुष्प के समान जिनकी आभा है जो रुद्र शोभा वाले और रुद्र के पुत्र हैं भयंकर हैं तारक आधी ग्रहों में प्रधान है उनके तो को मैं प्रणाम करता हूं।

फलश्रुति :
इति व्यासमुखोदगीतं य पठेत सुसमाहितं दिवा वा यदि वा रात्रौ।
विघ्नशांतिर्भविष्यति नर, नारी, नृपाणांच भवेत् दु:स्वप्न नाशनं
ऐश्वर्यंमतुलं तेषां आरोग्यं पुष्टिवर्धनं।।
भगवान वेद व्यास जी के मुख से प्रकट इस स्तुति को जो दिन में अथवा रात में एकाग्रचित होकर पाठ करता है उसके समस्त दिल शांत हो जाते हैं स्त्री पुरुष और राजाओं के दुख में दुख सपनों का नाश हो जाता है पाठ करने वाले को अतुलनीय ऐश्वर्या और आरोग्य प्राप्त होता है तथा उसके पुष्टि की वृद्धि होती है

इति श्री व्यासविरचित आदित्यादि नवग्रह स्तोत्रं संपूर्णं

इसमें सभी ग्रहों की दान सामग्रियों का चार्ट बना दिया है। इसका एक बार सुबह एक बार शाम को करना चाहिए।

31 प्रत्यैक ग्रह की ग्यारह प्रकार की दान सामग्री दान करना होती है। ग्रहों ये दान सामग्रियाँ क्या है और कहाँ मिलेगी यह भी यह भी बतलाया है।⤵️

मंगलवार, 16 मार्च 2021

क्या यज्ञ,योग, जप, तप और ज्ञान से आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान हो सकता है ? क्या उक्त साधनों से ईश्वर को जाना जा सकता है और ब्रह्म प्राप्ति सम्भव है?

यज्ञ का तात्पर्य परमार्थ कर्म है।  सर्वभूतहितेरता व्यक्ति द्वारा किये जानें वाले ऐसे कर्म जिससे सर्वहित हो वे यज्ञ कहलाते हैं।  पञ्च महायज्ञों में से एक ब्रह्मयज्ञ का ही एक भाग वेदाध्ययन या स्वाध्याय ,जप तथा अष्टाङ्ग योग है। देव यज्ञ में प्रकृति से प्राप्त सुख सुविधाओं, उपहारों के लिए देवताओं के रूप में परमात्मा का आरधन है। भूत यज्ञ में सर्वभूतों की यथायोग्य सेवा है। पर्यावरण रक्षण है। नृ यज्ञ में मानवसेवा है। तो पितृयज्ञ में असहायों ,बेसहाराओं, रोगी, अशक्तों वृद्धों की सेवा तथा समस्त पूर्वजों के प्रति श्रद्धावन्त हो कूप, तड़ाग, धर्मशाला, सदावृत, विद्यालय, चिकित्सालय आदि बनवाने में सहयोग कर उनकी अतृप्त इच्छा पूर्ति करना और श्राद्ध तर्पण करना निहित है। अतः
पञ्चमहायज्ञ किसी भी व्यक्ति विशेष का हित साधन नही अपितु सर्वजन हिताय कर्म है। पञ्च महायज्ञ कर्तव्य है।करणीय कर्म या श्रीमद्भगवद्गीतोक्त कार्य कर्म है।अतः पञ्च महायज्ञ धर्म ही है। और धर्म पालन में आई बाधाओं का समाधान  निश्चयात्मिका बुद्धि से धैर्यपूर्वक करनें के दौरान तितिक्षा यानी बिना परेशानी महसूस किये, प्रसन्नता पूर्वक कष्ट सहन करना ही तप है। 
 
 देह - इन्द्रियाँ (बहिर्करण), मन, अहंकार, बुद्धि और चित्त रूपी अन्तःकरण चतुष्टय तथा तेज - ओज रूपी अधिकरण, तथा प्राण (देही) - जीव (अपर पुरुष) रूपी अभिकरण के माध्यम से प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) द्वारा किये जानेवाले कर्म केवल उक्त करणों की निर्मलता और शुद्धि में सहायक है। इन करणों की क्षमता वर्धन में सहयोगी है। ये प्रत्यगात्मा को प्रज्ञात्मा (परब्रह्म / विष्णु) से स्वयम् की अभिन्नता जाननें में प्रत्यक्ष सहायक नही है। क्योंकि- कर्म  उपाद्य,विकार्य, संस्कार्य, और आप्य ये चार प्रकार के ही होते हैं। कर्म से ज्ञान नही हो सकता।
कर्म के परिणाम भी चार प्रकार के ही होते हैं उत्पाद्य कर्म से आकृति देना, विकार्य कर्म से विकृति देना या विकार उत्पन्न करना, संस्कार्य कर्म से संस्कृति देना यानि संस्कारित कर उपयोगी या सुन्दर बनाना और आप्य कर्म से प्रकृति देना या स्थानान्तरण कर एक स्थान से दुसरे स्थान पर लाना लेजाना ही हो सकता है।
1  तकनीकी द्वारा उत्पाद करना या आकृति देना जैसे - उपादान कारण मिट्टी आदि से कोई वस्तु निर्माण करना उत्पाद्य कर्म है।
2  रासायनिक क्रिया द्वारा विकृति लाना या विकार उत्पन्न करना जैसे दूध का दहीँ बनाना, आटे से रोटी और चाँवल से भात बनाना जिसे पुनः मूलरूप में नही लाया जा सकता। या निर्मित सुन्दर वस्तु को तोड़़फोड़ देना विकार्य कर्म है।
 3   अग्नि में तपाकर अशुद्ध स्वर्ण से शुद्ध स्वर्ण में परिवर्तन करना, धोकर ,पौंछ कर, रङ्गरोगन कर सुन्दर बनाना संस्कार्य कर्म है।  और 
4   स्थानांतरण करना या एक स्थान से दुसरे स्थान पर लाना लेजाना आप्य कर्म है।

जन सामान्य सुचनाओं के संग्रह को स्मृति में बिठालेनें को ज्ञान समझते हैं। यह समझने वालों की गलती है। शास्त्रों में सुचनाओं के भण्डार या जानकरियों को कभी भी कहीं भी ज्ञान नही कहा।

अतः कर्म से ज्ञान होना सम्भव नही है। जबकि ब्रह्मसूत्र / वेदान्त दर्शन में उल्लेख है कि, ऋतेज्ञानान्मुक्ति। अर्थात मुक्ति का प्रथम चरण ऋत का ज्ञान है। सृष्टि चक्र को जाने समझे बिना बिना मुक्ति सम्भव नही है। मतलब मौक्ष का कारण ज्ञान है न कि, कर्म।
प्रज्ञानम् ब्रह्म भी उपनिषद वाक्य है। उपनिषद ब्राह्मण ग्रन्थों के अन्तिम भाग आरण्यक के भी अन्तिम अध्याय होनें के कारण ही वेदान्त अर्थात अन्तिम ज्ञान कहलाते हैं।
स्पष्ट है कि,विवेक से उपजे और आचरण में उतरे वास्तविक ज्ञान प्राप्त जिज्ञासु और मुमुक्षु को गुरु मुख से सर्वखल्विदम् ब्रह्म, ईशावास्यम् इदम् सर्वम, प्रज्ञानम् ब्रह्म, अयमात्मा ब्रह्म और  तत्वमसि महावाक्य श्रवण करते ही अहम् ब्रह्मास्मि का बोध होजाता है।
शुक्ल यजुर्वेद 32/1 से 32/12 तक यही बात कही है।
 तब उस  सर्वमेधयाजी को तत्काल अनुभव होता है कि, ब्रह्म ही अग्नि है, और अग्नि ब्रह्म ही है। सूर्य ब्रह्म है, और ब्रह्म ही सूर्य है। वही वायु है, वही चन्द्रमा है, और वायु -चन्द्रमा भी ब्रह्म ही है। वही लोक प्रसिद्ध शुद्ध वेद है और शुद्ध वेद ही वह (ब्रह्म) है। ये जल और.वह प्रजापति ब्रह्म ही है और ब्रह्म ही जल और प्रजापति है। शुक्ल यजुर्वेद 32/1 

तब  सर्वमेधयाजी को तत्काल अनुभव हुआ कि,
आकाश और पृथ्वी ब्रह्म है, लोक ब्रह्म है, दिशाएँ ब्रह्म है और आदित्य भी ब्रह्म है। 
उसने ब्रह्म को जाना और वह तत्काल  आत्म को अर्थात अपनें आप को ब्रह्म अनुभव करने लगा; क्योंकि, वह पहले से ब्रह्म ही था। शुक्ल यजुर्वेद 32/12