सोमवार, 11 जनवरी 2021

द्वादशाङ्ग अर्थात नवीन पञ्चाग कैसी हो?

द्वादशाङ्ग / पञ्चाङ्ग में निम्नांकित गणनाएँ / जानकारी दी जाना चाहिए।

 *विषुव सम्पात से गणना आरम्भ कर औसत सुर्योदय समय भारतीय मानक समय 06:00 बजे  के लिए ---* 

 *वेदिक सायन सौर मास के गते अनुसार*

 *सायन राशियों में* सूर्य चन्द्रमा सभी ग्रहों और पात (राहु-केतु) के *सायन भोगांश, शर और क्रान्ति,विशुवांश* आदि का ज्योतिष पत्रक (इफेमेरीज़/ अल्मनाक) की सारणी हो।* 

 *सायन राशियों में* सूर्य, चन्द्रमा,सभी ग्रहों और पात (राहु-केतु) के *प्रवेश का समय,* 
13°20' के *समान भोगांश वाले 27 नक्षत्रों का में सूर्य* , चन्द्रमा,सभी ग्रहों और पात (राहु-केतु) के *प्रवेश का समय* की सारणी हो।

03°20' के समान भोगांश वाले 108 *नक्षत्र चरणों में* सुर्य, चन्द्रमा, ग्रहों और पातों के *प्रवेश का समय* 
की *अलग अलग सारणियाँ* दी जाये।

साथ ही *प्रत्यैक 00°20'  के समान भोगांश वाले 1080 नक्षत्र  का चालिसवाँ अंश में*  सुर्य, चन्द्रमा, सभी ग्रहों एवम् पातों के *प्रवेश का समय* । साथ ही 03°20' के समान भोगांश वाले 108 *नक्षत्र चरणों  में* सुर्य, चन्द्रमा, सभी ग्रहों एवम् पातों के *प्रवेश का समय* को गाढ़े अक्षरों में दर्शाया जाये,13°20' के समान भोगांश वाले *27 नक्षत्रों  में* सुर्य, चन्द्रमा, सभी ग्रहों एवम् पातों के प्रवेश का समय को भी भिन्न रंगं में  गाढ़े अक्षरों में दर्शाया जाये। तथा वेदिक 12 मासों की आरम्भ की *सायन संक्रान्तियाँ तथा सायन राशियों में* सुर्य, चन्द्रमा, ग्रहों और पातों के *प्रवेश का समय* भिन्न रंग के गाढ़े अक्षरों में 
दर्शानें वाली सारणी भी प्रथक से दी जाये।

 *वास्तविक भोगांश वाले वेदिक 28 नक्षत्रों  में* सुर्य, चन्द्रमा, सभी ग्रहों एवम् पातों के *प्रवेश का समय* की सारणी दी जाये।

 *वास्तविक भोगांश वाले वेदिक 88 नक्षत्रों  में* सुर्य, चन्द्रमा, सभी ग्रहों एवम् पातों के *प्रवेश का समय* की सारणी दी जाये।



*(१)  सायन संक्रान्ति  गते, (२) सूर्योदय समय का वेदिक सायन सौर मास गतांश का समाप्ति समय,(गतांश क्षय हो तो अगले गतांश का समाप्ति समय) (३) के साथ दशाह के वासर, (४) निरयन सौर मास संक्रान्ति गतांश समाप्ति समय, (गतांश क्षय हो तो अगले गतांश का समाप्ति समय) (५) निरयन सौर मास गते, (६) सायन सौर संस्कृत चान्द्र मास और निरयन सौर संस्कृत चान्द्रमास के नाम सहित शुक्लपक्ष में 01 से 60 तक चन्द्र कलाओं (करणों) का समाप्ति समय और  (७) 01से 30 तक तिथी समाप्ति का समय,(क्षय तिथि हो तो अगली तिथि का समाप्ति समय) (८) और सूर्य और चन्द्रमा के सायन भोगांशादि के योग से निर्मित योग का समाप्ति समय,(योग क्षय हो तो अगले योग का समाप्ति समय) (९)  शुद्ध चान्द्र मास के अमावस्या गते , (१०) चन्द्र दर्शन गते, (११) ग्रेगोरियन केलेण्डर के दिनांक, और (१२) सप्ताह के वार दर्शक सारणी हो।*

सामने वाले प्रष्ठ पर

 *वेदिक सायन संवत्सर, वेदिक उत्तरायण (पौराणिक उत्तर गोल)/ वेदिक दक्षिणायन (पौराणिक दक्षिण गोल), उत्तर तोयन (पौराणिक उत्तरायण) / दक्षिण तोयन (पौराणिक दक्षिणायन), वेदिक ऋतु / पौराणिक ऋतु , वेदिक सायन सौर मास / पौराणिक सायन सौर मास , निरयन सौर मास, सायन सौर संस्कृत चान्द्र मास, निरयन सौर संस्कृत चान्द्र मास का नाम (आरम्भ का समय सहित),सौर व्यतिपात वैधृतिपात आरम्भ और अन्त का समय, भद्रा के आरम्भ और अन्त का समय, पर्व, व्रत, उत्सव सम्बन्धित सम्प्रदाय के मतानुसार , दर्शाये जाए।* 

 *साथ ही प्रथक प्रथक सारणियों में भी* 

 *वेदिक सायन कलियुग संवत्सर आरम्भ समय,* 

 *वेदिक उत्तरायण  आरम्भ समय,* 
*वेदिक दक्षिणायन आरम्भ समय,* 
 
 *वेदिक उत्तर तोयन  आरम्भ समय,* 
 *वेदिक दक्षिण तोयन  आरम्भ समय,* 

 *वेदिक ऋतु आरम्भ समय,* 

 *वेदिक सायन सौर मास आरम्भ समय,* 


 *सायन सौर संस्कृत युग संवत्सर आरम्भ समय* 
 *सायन सौर संस्कृत चान्द्र मास आरम्भ समय,* 

 *पौराणिक उत्तरायण  आरम्भ समय,* 
 *पौराणिक दक्षिणायन आरम्भ समय,* 

 *पौराणिक ऋतु आरम्भ समय ,* 
 
 *पौराणिक सायन सौर मास आरम्भ समय,* 

 *युधिष्ठिर  निरयन सौर संवत्सर एवम् विक्रम संवत्सर आरम्भ समय,* 
 *निरयन सौर मास आरम्भ समय,* 

 *निरयन सौर संस्कृत चान्द्र शकाब्द आरम्भ समय* 
 *निरयन सौर संस्कृत चान्द्र मास के आरम्भ का समय,* 

 *वास्तविक व्यतिपात वैधृतिपात आरम्भ और अन्त का समय,* 
 *भद्रा के आरम्भ और अन्त का समय,*
 
 *श्रोत्रिय (वेदिक), स्मार्त, पौराणिक, और  प्रत्यैक मत, सम्प्रदाय और पन्थ के आधार पर उन मत, सम्प्रदाय और पन्थ के नाम सहित आरम्भ और अन्त के समय सहित* 
 *पर्व* का आरम्भ और अन्त का समय,
 
 *व्रत* का आरम्भ और अन्त का समय,
 
 *उत्सव*  का आरम्भ और अन्त का समय 

दर्शाये जाए।

रविवार, 10 जनवरी 2021

उज्जैन में धर्मशास्त्रानुसार गणितागत अर्धबिम्ब सुर्योदयास्त और दिनमान की जानकारी।

सुर्योदयास्त और दिनमान 

 *20 मार्च को दिनरात बराबर 12 - 12 घण्टे के।* 
*सुर्योदय 06:35 बजे* और 
*सुर्यास्त *18:35 बजे।* 
(यानि शाम 06:35 बजे।)

*29 मई मे 20 जून तक सुर्योदय सबसे पहले 05:45 बजे* 

*19 एवम् 20 जून को सबसे बड़ा दिन 13 घण्टे 26 मिनट का*
 *सुर्योदय 05:45 सुर्यास्त 19:11 बजे।* 

*23 जून  मे 13 जुलाई  तक सुर्यास्त सबसे देरी से 19:12 बजे*
यानी शाम 07:12 बजे

 *23 सितम्बर को दिनरात बराबर 12 - 12 घण्टे के* 
*सुर्योदय 06:19  बजे* और 
*सुर्यास्त 18:19 बजे।*
(यानि शाम 06:19 बजे।)

*24 नवम्बर मे 30 नवम्बर या 01 दिसम्बर तक सुर्यास्त सबसे पहले 17:37 बजे* 
यानी शाम 05:37 बजे

*14 दिसम्बर से 29 दिसम्बर तक को सबसे छोटा दिन 10 घण्टे 36 मिनट का*
*सुर्योदय 07:04 सुर्यास्त 17:40 बजे से लेकर सुर्योदय 07:11 सुर्यास्त 17:47 बजे तक।* 

 *09 जनवरी  मे 21 जनवरी तक सुर्योदय सबसे देरी से  07:14 बजे*



 सुर्योदयास्त और दिनमान 

 *दिनमान ---* 
 *दिनरात बराबर 12 - 12 घण्टे के।* 

 *20 मार्च को* 
सुर्योदय *06:35*  बजे और 
सुर्यास्त *18:35* बजे। 
(यानि शाम 06:35 बजे।)
 *23 सितम्बर को* 
सुर्योदय *06:19*  बजे और 
सुर्यास्त *18:19* बजे। 
(यानि शाम 06:19 बजे।)

 *दिनमान ---* 
 *सबसे बड़ा दिन ---*
*13 घण्टे 26 मिनट का*
*दिनांक 19 एवम् 20 जून को।* 
 *सुर्योदय 05:45 सुर्यास्त 19:11 बजे।* 

*सबसे छोटा दिन ---* 
*10 घण्टे 36 मिनट का*
*दिनांक 14 दिसम्बर से 29 दिसम्बर तक को।* 
*सुर्योदय 07:04 सुर्यास्त 17:40 बजे से लेकर सुर्योदय 07:11 सुर्यास्त 17:47 बजे तक।* 

 *सुर्योदय ---* 
 *सुर्योदय सबसे पहले*
 *05:45 बजे* 
*दिनांक 29 मई मे 20 जून तक।* 

 *सुर्योदय सबसे देरी से  ---*
*07:14 बजे* 
*दिनांक 09 जनवरी  मे 21 जनवरी तक।*

 *सुर्यास्त ---*
*सुर्यास्त सबसे पहले* 
*17:37 बजे* 
यानी शाम 05:37 बजे
*दिनांक 24 नवम्बर मे 30 नवम्बर या 01 दिसम्बर तक।*

*सुर्यास्त सबसे देरी से ---* 
*19:12 बजे*
यानी शाम 07:12 बजे
 *दिनांक 23 जून  मे 13 जुलाई  तक।*

शनिवार, 19 दिसंबर 2020

आत्मा का अज, अनादि, अजर, अमर, अनन्त होते हुए मानव जनसंख्या वृद्धि क्यों और कैसे?

अध्यात्मिक दृष्टिकोण से  -- 
वास्तविक तर्क --
1 -- मूलतः आत्मा अर्थात वास्विकता मैं, और परमात्मा अर्थात परम मैं एक ही तत्व है।अतः यह अनेक नही अपितु एक ही है। 
वास्तविक तथ्य तो यही है कि, आत्म तत्व में अनेकत्व है ही नही।
जड़- चेतन सभी उसी आत्म तत्व के ही सःवरूप मात्र हैं ।

ख -- धार्मिक आधार से तर्क  --

1 -- यदि मान लिया जाये कि, सृष्टि में जीवों की संख्या बराबर ही रहती हो तोऐसा भी तो हो सकता है कि, स्वर्गादि उर्ध्व लोकों के जीव मानव योनि में जन्म लेरहे हों और अन्धलोकों/ अधोलोकों के जीव भी कर्मफल भोगकर मानव योनि में जन्म लेनें के कारण मानव जनसंख्या बड़ रही हो। और अधिकांश मानव दुराचारी, पापी होनें के कारण बेक्टीरिया, वायरस आदि अनेकरूद्र के रूप में जन्मलेकर रोगादि फैलाकर संहार कर रहे हैं।

2 -- जन्तुओं , वनस्पतियों और पाषाणादि जड़ पदार्थों की कई प्रजातियाँ लुप्त हो गयी।  सम्भवतया वे अधिकांश पुण्यात्मा हो और उन्हे मानव योनि में जन्म मिला हो इसकारण उन प्रजातियों के जन्तु वनस्पतियों की संख्या कम हो गई और मानवीय जनसंख्या बड़ गई हो।

वास्तविक तर्क --
अर्थात -- कोई कम हो रहा है कोई बढ़ रहा है। कुल मिलाकर  जीवों की संखा वही रहती हो।

ग -- आधिदैविक  दृष्टिकोण से 

1 -- जैसे एक सिद्ध व्यक्ति एक ही समय में अनेक स्थानों में प्रकट होजाते हैं। अनेक स्थानों पर भिन्न भिन्न कर्म करते देखे जाते हैं।
2 -- जैसे ईश्वर कई स्थानों पर कई स्वरूपों में प्रकट हुए दिखते हैं ,व्यवहार करते हुए दिखते हैं।
 तो क्या वह आत्मा कई टुकड़ों में बँट गई? और फिर एक हो गई। यह कल्पना ही परम मुर्खतापूर्ण लगती है।

घ --भौतिकवादी दृष्टिकोण से --
 

1 --जैसे आकाश के  दिगंश या राशि नक्षत्र के रुप में काल्पनिक विभाग किये गये, जैसे भूमि पर अक्षांश देशान्तर रेखाओं की कल्पना की गयी,
2 -- जैसे एक ही सागर को छः महासागर, कई सागरों, और खाड़ियों में काल्पनिक रुप से विभाजित किया गया। 
3 -- जैसे भूमि को महाद्वीपों में माना गया।

वास्तविक  तर्क --
वैसे ही विभाग रहित एक आत्मा को अनेकों प्रत्यागात्मा (अन्तरात्मा) और जीवात्माओं और भूतात्माओं आदि के स्वरूपों में विभाग माने जाते है।

रविवार, 13 दिसंबर 2020

सबका वास्तविक स्वरूप परम आत्म परमात्मा, सर्वाधिक प्रिय है; रौद्ररूप भयंकर नही।

*परमात्मा वास्तविक मैं, परम मैं, मेरा वास्तविक स्वरूप है। ईश्वर परमप्रिय है। भगवान प्रेमपात्र हैं रौद्र या भयंकर नही। मृत्यु नियत है, अवश्यम्भावी है, न एक पल पहले आयेगी न एक पल बाद होगी अतः मृत्यु अविचारणीय सत्य है।* 

*इष्ट का मतलब जिसकी इच्छा हो* / जैसे इष्ट मित्र, यथेष्ठ अर्थात जैसी इच्छा हो शब्दोंं मे स्पष्ट है।
 *सनातन धर्मियों के इष्ट भगवान होते है। सर्वाधिक प्रिय वह ईश्वर ही है। परम आत्म मतलब परम मैं अर्थात मेरा वास्तविक स्वरूप , वास्तविक मैं परमात्मा है ।* 
वे *सनातन धर्मी पापकर्म करने से डरते हैं। दुराचार करनें से डरते हैं। अनाचार अनीति पूर्ण कर्म से डरते हैं।पापियों, दुरात्माओं, दुष्टों, अनाचारियों, दुराचारियों के सङ्ग से दूर रहता है।* 
 *सनातन धर्मी मृत्यु को अवश्यम्भावी जानकर अमर होनें की चाह नही रखते।* इच्छा मृत्यु प्राप्त व्यक्ति भी अपनी मृत्यु का उपाय विपक्षी को स्वयम् बतलाता है। अर्थात सनातन धर्मी --
 *ईश्वर से/ भगवान से प्रेम करता है। अपना वास्तविक सत्य परमात्मा है यह जानता है। अवश्यम्भावी मृत्यु से भी नही डरता।* 
 *असुर लोग अनाचार दुराचार, पापाचार में सदैव सलग्न रहते हैं इसलिये असुर, दैत्य, दानव  ईश्वर से डरते हैं, भगवान से डरते हैं मृत्यु से डरते हैं।*
 सदाचारी सनातन धर्मी भगवान से प्रेम करते हैं। मित्रभाव से तो ठीक भगवान को पुत्र मानकर भी लाड़ प्यार करते हैं। नृसिंह मेहता और सुरदास तो भगवान से रुठ जाते थे और भगवान उन्हे मनाते थे। मीराबाई ने पति मानकर उपासना की तो अर्जुन ने मित्र मानकर द्रोपदी ने बन्धु और सखा भावसे उपासना की। ये लोग भगवान से क्यों डरनें वाले।
असुर,दैत्य दानव आज भी ही ईश्वर और मौत से डरते हैं। आज भी वे ही उपदेश देते हैं कि, ईश्वर से डरो, मौत से डरो । 
वेद कहते हैं ईश्वर सर्वाधिक प्रिय है ईश्वर से स्वाभाविक प्रेम होता है भय नही। मृत्यु समय पूर्व होना नही और समय होनें पर रुकना नही तो मृत्यु अविचारणीय सत्य है। हमें केवल अपने कर्तव्य पालन के प्रति सजग रहना है। वर्णाश्रम अनुकूल  स्वधर्म पालन में तत्पर रहना चाहिए न कि, भयभीत। डराहुआ व्यक्ति सदैव गलती ही करता है।

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

सायन सौर संक्रान्तियों, निरयन सौर संक्रान्तियों, पुर्णिमा, अमावस्या और अष्टमी तिथि सम्बन्धित व्रत,पर्वोत्सव मनाना।

सायन सौर संक्रान्तियों, निरयन सौर संक्रान्तियों, पुर्णिमा, अमावस्या और अष्टमी तिथि सम्बन्धित व्रत,पर्वोत्सव मनाना।

केवल होली दिवाली जैसी इष्टियाँ, कोजागरी - शरदपुर्णिमा जैसे कुछ विशिष्ट वृतपर्वोत्सवों को छोड़ शेष सभी वृत पर्वोत्सव सायन सौर संक्रान्तियों, और उनके गतांश के अनुसार ही मनाये जावें।
 
 इष्टियों और अष्टका-एकाष्टका वेदिक पर्व है।अतः इन विशिष्ट वृतपर्वोत्सवों को पुर्णिमा, अमावस्या और अष्टमी तिथि (अर्ध चन्द्रमा) पर ही किया जाता था अतः इन्हें दर्शाया जा सकता है।
कृष्णपक्ष की तिथियों को 16, 17, 18 से 30 तक गिनती मानकर जो व्रत पर्वोत्स्व जिस तिथि को मनाया जाता है उसी गतांश पर मनाया जाये। नागपञ्चमी जैसे कुछ व्रत पर्वोत्सवों में राजस्थान और शेष भारत में एक चान्द्र पक्ष अर्थात लगभग 15 दिन का अन्तर पड़ता है उनका निबटारा भी शास्त्रज्ञानियों की बैठक करवा कर करना होगा।

खालसा पन्थ के मनिषियों को भी समझाया जावे । वे भी यदि सायन सौर संक्रान्तियों से अपने व्रत पर्वोत्स्व जोड़ना उचित समझे तो अत्युत्तम होगा।

ऐसे ही जैन और बौद्ध सम्प्रदायों के आचार्यों, और उपाध्यायों को भी समझाया जावे। जैनों से तो आशा की जा सकती है। 

पारसियों और ईसाइयों के कुछ व्रतपर्वोत्सव तो पहले से सायन सौर संक्रान्तियों पर आधारित है ही।

यदि इसाई क्रिसमस सायन मकर संक्रान्ति (22/23 दिसम्बर) को और नव वर्ष आरम्भ सायन मेष संक्रान्ति (21 मार्च) के सुर्योदय से आरम्भ करना स्वीकार करले तो अत्युत्तम।
  
भारत में यहूदी तो नगण्य ही शेष हैं। 

यहूदियों की परम्परा पर चलनें वाले इस्लाम के कट्टर पन्थियों से कोई आशा नही है। 
विशेषकर भारतीय मुस्लिमों के लिये प्राकृतिक और वैज्ञानिक तथ्यों का कोई मुल्य नही है केवल परम्पराओं के प्रति आस्था ही सबकुछ है। अतः उन्हें उनके हाल पर ही छोड़देना उचित होगा। यदि वे स्वतः समझदारी दिखाये तो उनका स्वागत किया जाये।

शनिवार, 28 नवंबर 2020

अवसाद चिकित्सा

बच्चे के जन्म के बाद प्रायः हर माँ को डिप्रेशन होता है। पढ़ाई पूर्ण होनें पर हर विद्यार्थी को अवसाद होता है। व्यवसाय में नौकरी में उतार चड़ाव पर हर व्यक्ति को अवसाद होता है। यह जीवन के व्यस्थापन की मूलभूत प्रणाली है इसे बदला नही जा सकता। तो फिर इसकी चिन्ता क्यों पाली जाये।
जो सम्पूर्ण जगत का सञ्चालन कर रहा है वही इसकी भी व्यवस्था करेगा। आपसे यदि कोई गलती हो भी गई हो तो उस व्यवस्थाप के सामने अपना दोष स्वीकार कर व्यवस्था उसपर छोड़दो। यह हमारा कार्य नही है। वही निबटेगा। हम क्यों सोचे।
किसी नें हमारे साथ अनुचित किया है तो यह जान समझ लो कि, इसकी सुचना भी व्यवस्थापक को है और उसकी स्व नियन्त्रित प्रणाली (ऑटोमेटिव सिस्टम) में इसकी व्यवस्था भी हो चुकी है। (प्रोसेस हो चुकी है।) पर हर रिपोर्ट आपके ध्यान में लाई जाये यह आवश्यक नही है। आपकी क्षमता जितना झेल सकती है और जिस पर आपको कुछ करना आवश्यक हो उतनी ही जानकारी आप तक पहूँचाई जाती है। पुरी जगत की जानकारी आप झेल नही सकते। अतः उसे व्यवस्थाप पर ही छोड़ो।
इसकी चिकित्सा उच्च स्वर में भजन करना है न कि, उसी बात को बार बार सोचना।
भजन में आनन्द तो है ही सर्वकष्ट निवारण शक्ति भी होती है।
प्रत्यैक व्यक्ति के जीवन में उतार चड़ाव आते हैं। यदि श्री राम और श्री कृष्ण के जीवन का अध्ययन करें तो सर्वाधिक कष्ट उनके जीवन में आये। लेकिन उनने उनका निवारण किया चिन्तन नही।
आशा और विश्वास के योग्य केवल परमात्मा, ॐ, विष्णु ही है।अपनें आत्म स्वरूप का ध्यान, (परम आत्म यानी वास्तविक मैं का सदैव स्मरण रखना) परमात्मा का स्मरण - ध्यान ही है। 
सम्पुर्ण जगत में परमात्मा को ही देखना, परमात्मा के अलावा कुछ है ही नही यह ध्यान रखते हुए जगत से व्यवहार करना विश्वात्मा ॐ का ध्यान है।
सबकुछ परम आत्म परमात्मा ही है। वही जगत है वही मैं हूँ, परम आत्म (वास्तविक मैं) ही सबकुछ है, इसके अतिरिक्त कुछ हो ही नही सकता तो कौन मैं कौन तु, क्या मेरा,क्या तेरा सबकुछ तो मैं ही हूँ।
सोते समय और जागनें के बाद और बिस्तर छोड़नें/ उठने के पहले यह ध्यान करना। 
यही विष्णु का ध्यान है।
यही वास्तविक आराधना उपासना है। और जगत से व्यवहार के समय भी यही तथ्य याद रखते हुए ही व्यवहार करना है।
सदैव परमात्मा (आत्म स्वरूप/परम आत्म / परम मैं) का ध्यान रखना और हर समय जगत की सेवा में तत्पर रहना यही जीवन है।
यह समझ लेना ही वास्तविक जाग्रति। वास्तविक जागरण है।
जगत में न कोई भलाई है न कोई बुराई है। वह तो अपना दृष्टिकोण बदलने पर बदल जाता है। जगत वास्तवमें ऐसा नही है जैसा हम समझ रहे हैं। जिसे हम जगत / ब्रह्माण्ड कहते समझते हैं यह केवल हमारी सोच समझ में ही है। आधुनिक विज्ञान भी यह स्वीकारनें लगा है। अतः जगत चिन्तन त्याग कर आत्म चिन्तन करो।
दुसरों की भलाई-बुराई जो हम जान समझ रहे हैं यह यथार्थ से बहुत परे है।
जागो दुनिया वह नही है जो तुम देख समझ रहे हो। दुनिया को अपने आप में खोजो।जगत भी मैं ही हूँ यह ध्यान रखो। याद रखो आत्म से परे कुछ नही है।

गुरुवार, 19 नवंबर 2020

दान देने के नियम।

दान देनें के नियम।

दान देनें के लिये सुयोग्य पात्र मिलनें पर दानगृहिता द्वारा दान गृहण करनें की स्वीकृति प्रदान करनें पर दानगृहिता का आभार मानना चाहिए
जिन्हे दान गृहण करनें हेतु निवेदन करने, निमन्त्रण देनें और आमन्त्रित करनें जा रहे हैं वे , या बलिवैश्वदेव कर्म के समय बिना बुलाये अचानक उपस्थित अतिथि और याचक जिसकी प्रार्थना या यााचना पर दान देनें जा रहे हैं इन तीनों की जाँच परख करना अत्यावश्क है।

दान देने के पूर्व यह निश्चित करलें कि, दान गृहिता निर्व्यसनी, अहिंसक, सत्यवादी, सदाचारी, निर्लोभ, अपरिग्रही (अकारण संग्रह न करने वाला न हो), ब्रह्म की ओर चलनेवाला ब्रह्मचारी, स्वच्छ, पवित्र, शुद्ध अन्तःकरण वाला, प्राप्ति में सन्तुष्ट, विद्यध्ययन , दान देनें, परमार्थ कर्म और सेवा करने यानी यज्ञ करने में, ईश्वर भक्ति करनें में सदा असन्तूष्ट हो। स्वधर्म पालन में आनेवाली बाधाओं का सक्षमता पुर्वक सामना कर निवारण करनें में होनें वाले कष्टों को सहर्ष सहन करनें वाला तपस्वी, सत्शास्त्राध्ययन, मनन, चिन्तन और अनुशिलन करनें वाला योगाभ्यासी, और परमात्मा में एकनिष्ठ समर्पित हो ऐसा व्यक्ति सर्वश्रेष्ठ दान देनें के लिए सुपात्र होता है।

1- दानगृहिता का आभार मानना चाहिए ।क्योंकि दानगृहिता नें  हमे इस योग्य माना कि, वे दान गृहण करें/ हमसे दान स्वीकार करलें। इस प्रकार उननें हमारा सम्मान किया है।

2 - नियमानुसार दानदाता को दानगृहिता के पास स्वयम् जाना चाहिए। यदि उन्हे घर बुलाकर दान देना चाहे तो उन्हें पहले सादर निमन्त्रित करें, फिर मार्गव्यय और उनके समय की क्षतिपूर्ति पहले ही करके आमन्त्रित करना चाहिए। दानगृहण करने पर आभार प्रदर्शन कर उनके द्वारा दान गृहण क्रिय और कर्म के लिये पारिश्रमिक स्वरूप योग्य दक्षिणा देना चाहिए।

3 - यदि वे बिना बुलाये अतिथि स्वरूप उपस्थित होगये हों तो बिन्दु 2 में उल्लेखित भार अधिक मानकर सवाया दान दक्षिणा देना चाहिए।

4 - आमन्त्रित और अतिथि दोनों को घर के बाहर दस कदम छोड़नें जाना और चरण वन्दन और पुनः आभार प्रदर्शन कर बिदा करना चाहिए।
5 सन्तुष्ट होनें पर ही दान गृहिता आपको शुद्ध अन्तःकरण से शुभाशीष प्रदान करेंगे।

सज्जन और दुर्जन की परीक्षा का एक आसान उपाय श्लेष अलंकार में बतलाया गया है।
मंगत देखत देत पट। 
यहाँ पट शब्द के दो अर्थ हैं प्रथम (धारण किये हुए) वस्त्र और द्वितीय (घर के) द्वार
सज्जन वह जो याचक को देखकर अपने पहने हुए वस्त्र (पट) तक उतार कर दे दे। और
दुर्जन वह जो याचक / भिक्षुक को देखकर  घर के पट (द्वार) बन्द करदे।

तुलसीदास जी और रहीम का निम्नांकित संवाद स्मरणीय है।⤵️

ऐसी देनी देन जू - कित सीखे हो सैन।
  ज्यों-ज्यों कर ऊँचे करो, त्यों-त्यों नीचे नैन॥
                          #तुलसीदास

 देनहार कोई और है, देवत है दिन रैन।
 लोग भरम हम पर करें, याते नीचे नैन॥
                              #रहीम

अर्थ
हम कहाँ किसी को कुछ देते हैं। देने वाला तो दूसरा ही है, जो दिन-रात भेजता रहता है इन हाथों से दिलाने के लिए। लोगों को व्यर्थ ही भरम हो गया है कि रहीम दान देता है। मेरे नेत्र इसलिए नीचे को झुके रहते हैं कि माँगने वाले को यह भान न हो कि उसे कौन दे रहा है, और दान लेकर उसे दीनता का अहसास न हो।

पहले भगवान/ ईश्वर हमें धन,धान्य, सम्पदा, सामर्थ्य और सहृदयता का भाव देता है, तभी तो हम किसी को कुछ दे पाते हैं, किसी की कुछ सहायता कर पाते हैं। तो इसमें हमारा महत्व कुछ भी नही है। यह तो ईश्वरीय कृपा है जो उसनें हमें माध्यम बनाया।
अतः देनें वाला /कर्ता यह भ्रम कभी न पाले कि, मैं दे रहा हूँ या मैं मैं कर रहा हूँ।

दान, दक्षिणा, सहायता और भिक्षा में अन्तर।
ये सभी कर्तव्य है।

१ आय का १०% दान और उसपर दान ग्रहिता द्वारा दान प्राप्त करने हेतु किये गए श्रम के लिए उपयुक्त दक्षिणा देना नित्य कर्म है। क्योंकि, दान ग्रहिता दान लेकर आप पर उपकार करता है।
दान किसी व्यक्ति या संस्था या दोनों को दिया जाता है।

२ अबला, बालक, वृद्ध,  असहाय, रुग्ण, अपङ्ग, दरीद्र, दुःखी की बिना माँगे/ अयाचित करुणार्द्र होकर की गई सहायता दान नही कहलाता।  क्योंकि इसमें कोई दक्षिणा का प्रावधान नही है। यह सहायता कहलाती है। शरण देना भी इसी श्रेणी में आता है। इसका कोई निर्धारित समय नही हो सकता। ये अवसर मिलने पर ईश्वरीय कृपा समझना चाहिए।

३ उक्त कथित ये लोग ही यदि  याचक बनकर माँगे तब, इनको दी गई वस्तु भिक्षा कहलाती है। इसमें भी कोई दक्षिणा नही दी जाती। इसका समय भी निश्चित नही है। उनने आपको योग्य समझा यह उनकी कृपा है।

४ किसी कर्मकाण्ड की क्रिया करवानें के उपरान्त दी गई दक्षिण (फीस) भी दान नही है, बल्कि श्रम मुल्य है। जैसे ट्युटर, डॉक्टर, इञ्जिनयर, कारीगर आदि को फीस दी जाती है।

सारांश 
1 सदाचारी, 2 निर्वव्यसनी 3 जरूरतमन्द को 4 उसकी आवश्यकता की वस्तु 5 उसी समय  देना ही दान कहलाता है।
याचक हो या न हो यदि ऐसे व्यक्ति की आवश्यकताओं और विवशता की जानकारी मिलते ही उसकी आवश्यकता पूर्ति करना कर्तव्य है। लेकिन अपनी आय और सम्पत्ति का दस प्रतिशत से अधिक दान करना हो तो जनसहयोग लेना चाहिए।

 दानग्रहिता के श्रम और समय की क्षतिपूर्ति हेतु दान वस्तु के मुल्य का दस प्रतिशत दक्षिणा भी देना आवश्यक है।