गुरुवार, 25 जून 2026

मृत्यु उपरान्त गति

 मृत्यु पर क्या होता है?
व्यक्ति का *स्वत्व* (स्व पन) समाप्त हो जाता है। इसलिए देह को *अमुक व्यक्ति की देह* कहा जाता है *न कि, अमुक व्यक्ति।* 
ऐसा कहा जाता है कि, " *क* " मर गया यह उसकी (" *क* " की) लाश पड़ी है। 
अब उसका कोई *स्व भाव* (स्वभाव) नहीं बचा।
आँखे, कान, नाक, जीभ, त्वचा सभी दिख रहे हैं लेकिन ज्ञानेन्द्रियाँ नहीं रही। मृत देह न देख सकती है, न सुन सकती है, न स्पर्ष का अनुभव कर सकती है, न सुंघ सकती है, न चख सकती है।
हाथ-पैर, मुँह होते हुए भी न चल नहीं सकती है। न बोल सकती है।
न कोई संकल्प कर सकती है क्योंकि अब मन नहीं रहा, न किसी क्रिया के प्रति मैं लेटा हूँ ऐसा अहम पाल सकती है, न विचार कर सकती है क्योंकि अब बुद्धि नहीं रही, न जाग्रत है, न स्वप्न में है, न निद्रा में है, न समाधि में है न सचेत (होश में) है और न अचेत (बेहोश) है क्योंकि अब चित्त नहीं रहा।।
अब शरीर में न न स्पन्दन है, न तेज (गर्मी) है, न ओज- कान्ति है न अब यह किसी सन्तान को जन्म दे सकती है क्योंकि अब रेतधा- स्वधा नहीं रहा।अब उसके गुण धर्म किसी अगली पीढ़ी में अन्तरित नहीं हो सकते हैं, क्यों कि, सुत्रात्मा नहीं रहा।

अब वह न बालक, युवा या वृद्ध नहीं कहलाता है क्योंकि जब देही ही नहीं रहा तो, अवस्था किसकी होगी। 

इन सब का कारण एक ही है कि, उस *क नामक* व्यक्ति के प्राण निकल गए। लोग कह रहे हैं कि, उसके प्राण पखेरू उड़ गए। अब वह (देही) नहीं रहा।
अरे! पर अचानक क्या हुआ? थोड़ी देर पहले तो लोग कह रहे थे कि, *"क"* नामक उस व्यक्ति के प्राण नहीं निकल पा रहे हैं क्योंकि इनका जीव तो इसके पुत्र में अटका है।
पुत्र आया, *क* ने आँखे खोली, हाथ उठाकर पुत्र के सर पर रखा, पुत्र ने सर गोद में लेकर चम्मच से गङ्गा जल पिलाया, तुलसी दल मुँह में रखा और *क* के प्राण निकल गए।
अब जीव की परलोक की ओर गति प्रारम्भ हो गई।
इस जन्म के भले-बुरे कर्मानुसार भगवान के पार्षद या देव दूत या यम दूत अपनी रीति-नीति अनुसार उसे सम्बन्धित लोक के मार्ग से ले जाएंगे। और कर्मफल अनुसार निर्धारित लोक में निर्धारित अवधि के लिए सुख-दुःख भोगने हेतु तदनुकूल शरीर में रखा जाएगा। या कर्म फलानुसार मृत्युलोक में किसी योनि में जन्म मिलेगा।

अब बचा जीव जिसकी निर्धारित आयु होती है। यह आयु ही जीव की शक्ति होती है। जीवात्मा और आयु को संयुक्त रूप से जीवात्मा कहते हैं। 
अर्थात मृत्यु उपरान्त गति इस जीवात्मा की होती है। यह जीवात्मा प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) का कही जा सकती है। क्योंकि प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) इसी जीवात्मा के केन्द्र में रहती है।
अतः जीवात्मा के साथ ही प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) की गति भी होती है। जैसे चलता वाहन है, उसमें बैठे सभी लोगों की यात्रा उस वाहन के साथ स्वतः होती है। ऐसे ही जीवात्मा के साथ प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) की गति भी होती है। सुविधाएँ या कष्ट पीड़ा जो भी भोग होते हैं इस जीवात्मा को ही प्राप्त होते हैं। लेकिन जीवभाव में स्थित प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) भी मोह वश उन सुविधाओं से सुखी या कष्टों के कारण दुखी होता है।
लेकिन यदि प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) का झुकाव प्रज्ञात्मा की ओर रहता है तो वह मार्ग की सुख सुविधाओं के प्रति तटस्थ रहकर केवल दृष्टा भाव से देखता रहता है लेकिन अप्रभावित ही रहता है।

जिस लोक में जीवात्मा को भेजा जाता है वहाँ जीवात्मा के प्रति आकृष्ट प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) तो वहाँ जीवात्मा को मिलने वाली सुविधाओं से सुखी अनुभव करता है या कष्टों से दुखी होता है। लेकिन यदि इन सब अनुभवों से सांसारिक सुख सुविधाओं के प्रति विरक्त होकर प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) का रुझान प्रज्ञात्मा की और होने लगे तो विवेक जागृत होने से प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) की लगन प्रज्ञात्मा परब्रह्म की ओर हो जाती है और प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) प्रज्ञात्मा परब्रह्म की शरण ले लेता है और श्रेय मार्ग पर कल्याण को प्राप्त कर लेता है। और उसी देव योनि में रहते हुए भी मुक्त हो जाता है।
इसके विपरित जीव भाव के प्रति आकृष्ट प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) को जीवात्मा को प्राप्त योनि का भोग पूर्ण होने पर पुनः मृत्यु लोक में जन्म लेना पड़ता है। सुकर्मों का फल भोगकर लौटे जीवात्मा का जन्म श्रेष्ठ (आर्य) परिवार में होता है और कुकर्मों का भोग कर लौटे जीवात्मा को मृत्यु लोक में भी दास/ दस्युओं के घर जन्म लेना पड़ता है। फिर स्वयम् का कल्याण या पुनरावर्तन या निम्न योनियों में जन्म या पातालादि में अन्धतम लोकों में नर्कादि भोग भोगने हेतु तदनुकूल योनि में जाना पड़ता है।
 इससे स्पष्ट हो गया कि, जन्म, मृत्यु, लोक- लोकान्तर गति, और वास हेतु तदनुकूल योनि में जन्म लेना यह सब जीवात्मा का होता है।
जीवात्मा से जुड़े प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) इन्हें स्वानुभुति मान लेता है और उस लोक के भोग भोगकर मृत्यु लोक में पुनर्जन्म को प्राप्त होता है। लेकिन विवेकवान प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) प्रज्ञात्मा की से युक्त होकर प्रज्ञावान होने के कारण उक्त सभी विषयों को तटस्थ भाव से केवल देखता रहता है। उनसे प्रभावित नहीं होता है। इसलिए वह क्रम मुक्ति के द्वारा मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

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